Tuesday, 19 February 2013

लोक साहित्य के विविध रूप

अभी तक हमने लोकवार्ता के रूप को परखा है ओर उसके साथ लोक साहित्य के संबंध पर विचार किया है। अब लोक साहित्य के विविध रूपों पर हक्पात करना अप्रासंगिक न होगा। मोटे तौर पर हम इस साहित्य को तीन रूपों में प्राप्त करते हैं एक-कथा, दूसरा-गीत, तीसरा-कहावतें आदि। लोककथाओं की विभेदता भी तीन रूपों मेें मानी जाती है- धर्मगाथा,लोकगाथा तथा लोक कहानी। धर्मगाथा (माईथालाजी) पृथक अध्ययन का विषय है। शेष कथा के दो भाग रह जाते है लोकगाथा तथा लोक कहानी। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने इन दोनों का पृथक-पृथक अस्तित्व स्वीकार करते हुए लोक साहित्य को चार रूपों में बांटा है एक-गीत, दूसरा-लोकगाथा, तीसरा-लोककथा तथा चौथा-प्रकीर्ण साहित्य जिसमें अवशिष्ट समस्त लोकाभिव्यक्ति का समावेश कर लिया गया है।
वैसे तो धर्मगाथाएँ पृथक अध्ययन का विषय है किन्तु लोक-कहानी और धर्मगाथा में जो विशेष अन्तर आ गया है उसे समझ लेना अहितकर न होगा। धर्मगाथा अपने निर्माण काल में एक सीधी-सादी लोक-कहानी ही होती है परन्तु उस कहानी में धर्म की एक विशेष पुट लग जाती है जो उसे लोक-कहानी के वास्तविक आधार से पृथक कर देती है। डॉ. सत्येन्द्र ने इस ओर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि धर्मगाथा स्पष्टत: तो होती है एक कहानी पर उसके द्वारा अभीष्ट होता है किसी ऐसे प्राकृतिक व्यापार का वर्णन जो उसके सृष्टा ने आदिम काल में देखा था ओर जिसमें धार्मिक भावना का पुट होता है। ये धर्म गाथाएँ हैं तो लोक साहित्य ही, किन्तु विकास की विविध अवस्थाओं में से होती हुई वे गाथाएँ धार्मिक अभिप्राय: से संबद्ध हो गयी हैं। अत: लोक साहित्य के साधारण क्षेत्र से इनका स्थान बाहर हो जाता है और यह धर्मगाथा संबंधी अंश एक पृथक ही अन्वेषण का विषय है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'दि क्वीन ऑफ दि एअरÓ में जॉन रस्किन ने धर्मगाथा की मीमांसा देते हुए लिखा है कि यह अपनी सीधी-सादी परिभाषा में एक कहानी है जिससे एक अर्थ संपृक्त है और जो प्रथम प्रकाशित अर्थ से भिन्न है।
लोकगाथाएँ (अवसाद, किस्से या साके) वे काव्यमय कहानियाँ हैं जिनका आधार इतिहास है अथवा जिन्हें कालक्रम से ऐतिहासिक महत्व हासिल हो चुका है। लोक मानस की वे घटनाएँ जो कोरी कल्पना-जन्य हैं वह आगे चलकर ऐतिहासिक रूप प्राप्त कर जाती हैं। जिन जातियों का मानसिक विकास नहीं हुआ है उनमें थोड़े से चमत्कारपूर्ण कार्य करने वाले व्यक्ति युग-पुरूष अथवा ऐतिहासिक पुरूष की नाई पूजे जाते हैं। ठीक इसी प्रकार का एक किस्सा (अवदान, गाथा) हरफूल जाट जुलाणी वाले का है जिसने अपने जीवन की बाजी लगाा कर बधिकों से (कसाइयों से) गायें छुड़ा ली थीं। आज भी गोमाता के पुजारी प्रदेश हरियाणा की साधारण जनता हरफूल जाट के वीर रसात्मक किस्सों को गा-गाकर आनन्द मनाती है। अन्य जनपदीय जातियों में भी ऐसे अनेक किस्से आपकों मिल जायेंगे।
किस्सों की परख से यह स्पष्ट है कि इनमें इतिहास के अवशेषों को ही मरने से नहीं बचाया गया है पर साम्प्रतिक पुरूषों के किस्से भी चमत्कृत रूप में मिले हैं। अत: साके प्राचीन प्रवीरों और सिद्ध महात्माओं के ही हों ऐसी बात नही है, ये साके सामयिक पुरूष संबंधी भी हो सकते हैं, बल्कि होते भी हैं। यथा-'किस्सा हरफुल जाट जुलाण काÓ इन नये व्यक्तियों के संबंध में बड़ी अद्भुत कल्पनाएँ कर ली जाती हैं। सर आर. सी टेम्पल ने 'लीजेंड्स ऑफ दि पंजाबÓ में इन किस्सों को छ: भागों में बाँटा है। इन छ: चक्रों में से एक चक्र उन कथाओं का भी है जो स्थानीय वीरों से संबंध
रखती हैं।
हमने लोक गाथाओं को अवदान, साका, राग या किस्सा के नाम से अभिहित किया है। इस साहित्यिक विद्या का एक नाम राजस्थानी में ख्यात भी प्रचलित है। ये ख्यातें रासो से भिन्न वस्तु हैं। रासो साहित्यिक वीर कथाएँ हैं ओर ख्यातें मौखिक कथाएँ हैं। ये लोक गाथाएँ दो रूपों में मिलती हैं। एक प्राचीन पुरूषों की शौर्य की कहानियाँ है जिन्हें वीरकथा कहा जा सकता है। इन्हें ही 'पंवाराÓ भी कहते हैं यथा 'जगदेव का पंवारा।Ó इनमें पुराण पुरूषों का अस्तित्व निर्विवाद मान लिया जाता है। दूसरे-साके। ये उन पुरूषों के शौर्य से सम्बन्धित हैं जिनके प्रति इतिहास साक्षी है। साके में जीवन तथा शौर्य का विस्तार अपेक्षित है।
 लोककथा निस्संदेहात्मकतया लोकगाथा से भिन्न वस्तु है। जो विद्वान इन दोनों को एक लोक कहानी के ही लघु और विशाल रूप कहते हैं उन्होंने उनके मर्म को पहचानने का प्रयास नहीं किया। लोक साहित्य के ये दोनों रूप आपस में भिन्न हैं। लोक कथाओं में कहानियों के दोनों तत्व-मनोरंजन एवं शिक्षा पाये जाते हैं। जो कहानियाँ केवल शिक्षा के लिए ही निर्मित हुई हैं उनके लिए अलग नाम भी दिया गया है। इन कहानियों को भारतीय साहित्य में तंत्राख्यान या पशु पक्षियों की कहानियाँ कहा गया है। अंग्रेजी में ऐसी कहानियों का नाम फेबिल दिया गया है।
  'काल्पनिक कथाएँ, वास्तव में, वैसी नहीं जैसी दिखाई देती हैं। हमारे धर्मोपदेष्टा चूहे और मृगशावक भी हो सकते हैं। हम उपदेश सुनते-सुनते ऊँघने लगते हैं, किन्तु शिक्षाप्रद कहानियों को प्रसन्नतापूर्वक पढ़ते हैं और वर्णन का खूब आनन्द लेते हैं।Ó भारतीय कथा साहित्य में इस प्रकार के आख्यानों की कमी नहीं है। विष्णु शर्मा का पंचतंत्र और हितोपदेश शशश्रृगाल-काको लूक के मध्य चलने वाले जीवनोपयोगी आख्यान ही तो हैं। भारत के ये आख्यान संसार के श्रेष्ठतम फेबिलस् में से हैं। इनकी यही विशेषता है कि इनमें किसी न किसी प्रकार की शिक्षा अवश्य मिलती है।
यहाँ पर इतना और ध्यान दे लेना चाहिए कि प्रत्येक वह कहानी जिसमें पशु-पक्षी किसी भी रूप में आये है तंत्रमूलक अथवा नीतिमूलक कहानी नहीं कहला सकती। फेबलस् वे ही कहानियाँ हैं जिनमें नीति बतलाई गई है अथवा कोई सुनिश्चित उपदेश दिया गया है। बौद्ध जातकों में आई हुई वे पशु-पक्षी संबंधी कहानी कदापि तंत्राख्यान नहीं कहलायेंगी। कारण कि वे धर्मभावना को जागृत करके चुप हो जाती हैं और उनका आदर धर्म-श्रद्धा से होता है। यही स्थिति वेदों में मिलने वाली उन कहानियों की है जिनमें पशु-पक्षियों का नाम आया है।
 लोक साहित्य के कथा भाग पर विचार कर चुकने पर लोक गीत और लोक कहावतें, पहेलियाँ आदि रहती हैं। लोक गीत लोक मानस के वे अजस्त्र एवं निश्छल प्रवाह है जिनका प्रतिभा के द्वारा विभिन्न अवसरों पर निर्माण होता है एवं गान होता है। संक्षेप में लोकगीत लोक द्वार लोक के लिए गाया गया गीत होता है। लोक गीतों की संख्या उतनी हो सकती है जितने जीवन के पहलू हैं।
 प्रकीर्ण साहित्य में उस समस्त लोकाभिव्यक्ति का समावेश होता है जो लोककथा, लोकगाथा और लोकगीत की परिधि से बाहर पड़ जाती है। इस प्रकार इनमें लोक के वे सभी अनुभव जो समय-समय पर होते हैं आ जाते हैं। पहेलियाँ, सूक्तियाँ, बुझौबल, कहावतें, बालकों के खेलकूद के वाणी विलास आदि सब इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। इनका विवेचनात्मक वर्णन भी यथास्थान दिया गया है।
लोक साहित्य की विशेषताएँ -लोक साहित्य जिसके रूपादि का ऊपर वर्णन हुआ है उसकी विशेषताओं पर दृक्पात करना असमीचीन न होगा। लोक साहित्य को कुछ विद्वानों ने लोक श्रुति (वेद) कहा है। वेद का नाम श्रुति इसी विशेषता के कारण पड़ा है कि यह शिष्य परंपरा श्रुतिबल से चलता आया है। लोक साहित्य भी इसी कर्ण परम्परा से आगे बढ़ता है।  वह दादी से पोती तक, नानी से धेवती तक श्रुति मार्ग से आया है। यही इसकी प्रथम एवं प्रमुख विशेषता मानी जाती है। इसके विपरीत प्रणीत साहित्य मौखिक परम्परा की अपेक्षा लेखनी परम्परा पर गर्व करता है। यदि लेखबद्धता का वह गौरव लोक-साहित्य को मिल जाये तो वह एक प्रकार से वह निष्प्राण हो जायेगा। लिपि का प्रसाद भले ही गीतों, गाथाओं, कथा-कहानियों को सुरक्षित रख ले परन्तु उनकी अनुप्राणिकाशक्ति उसी क्षण नष्ट हो जाती है जब कि वे लेखनी की नोक पर सवार होकर कागज की भूमि पर उतरना आरंभ करते हैं। उनको सुरक्षा, सौन्दर्य एवं सम्मान भले ही मिल जाये किन्तु उनमें वह स्वाभाविक उन्मुक्त प्रवृत्ति नहीं रहती जिसमें वे जन्में हैं, पनपे हैँ और पुष्ट हुए हैं। वह गमले के पौधे की भाँति हरा-भरा रहता हुआ भी अशक्त और भविष्यत् की उन्नति से विमुख रहता है। फें्रक सिजविक के ये शब्द कितने तथ्यपूर्ण हैं कि लोक साहित्य का लिपिबद्ध होना ही उसकी मृत्यु है। वस्तुत: लोकसाहित्य की मौखिकता ने ही उसे व्यापकता एवं अनेक रूपता प्रदान की है।
 इसी बात को प्रो. किटरेज ने 'इंगलिश और स्काटिश बैलेड्सÓ की भूमिका में इस प्रकार कहा है- लोक-साहित्य का शिक्षा से कोई उपकार नहीं होता...... जब कोई जाति पढऩा सीख लेती है, तो सबसे पहले वह अपनी परंपरागत गाथाओं का तिरस्कार करना सीखती है। परिणाम यह होता है कि जो एक समय सामूहिक जनता की संपत्ति थी वह अब केवल अशिक्षितों की पैतृक संपत्ति मात्र रह जाती है।
 एक दूसरी विशेषता, जो लोक साहित्य के पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है, वह है उसकी अनलंकृत शैली। शिष्ट साहित्य में सालंकारता के प्रति विशेष आग्रह होता है। यत्र-तत्र अनलंकृत भी क्षम्य है-'अनलंकृति: पुन: क्वापिÓ (मम्मट-काव्य प्रकाश, काव्य का लक्षण) पर लोक साहित्य में बनावट, सजावट, कृत्रिमता ओर अलंकरणप्रियता का आग्रह नहीं है। यह तो उस वन्य कुसुम के सदृश है जो बिना संवारे हुए भी अपनी प्राकृतिक आभा से दीप्तिवान है। इसमें नैसर्गिक रूक्षता (खुरदरापन) है किन्तु है एक लावण्य एवं सौन्दर्य से संयुक्त। सालंकार काव्य से लोक-गीतों का वैशिष्टय प्रदर्शित करते हुए पं. रामनरेश त्रिपाठी के ये शब्द चिरस्मरणीय रहेंगे-'ग्राम-गीत और महाकवियों की कविता में अंतर है।Ó-ग्राम-गीतो में रस है, महाकाव्य में अलंकार। ग्रामगीत हृदय का धन है और महाकाव्य मस्तिष्क का। ग्रामगीत प्रकृति के उद्गार हैं, इनमें अलंकार नहीं केवल रस है, छंद नहीं केवल लय है, लालित्य नहीं केवल माधुर्य है, -'कितने सार्थक हैं त्रिपाठी जी के ये शब्द। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि इनमें दंडी का पद लालित्य, भारवी का अर्थ-गौरव और कालिदास की अनूठी उपमाएँ न देखने को मिलें-बेशक, पर इनमें रस का एक पारावार लहरा रहा है जो सहृदय संवेद्य है।Ó 
 सादगी लोक कविता का सर्वस्व है। साहित्यिक कविता में ऊहा और कल्पना के वे रंग हैं जो कालान्तर में छूछे हो जाते हैं। लोक कविता अपने नैसर्गिक रंग में मानव के उष:काल से जीवित है और जीवित रहेगी। इस काव्य क्षेत्र में अलंकार बहिष्कार की शपथ नहीं ली गई है। ये तत्व अस्पृश्य एवं त्याज्य नहीं ठहराये गये हैं। अत: रीत्यलंकार पारखी अनावश्यक रूप से निराश व चिंतित न हों। उन्हें स्थान-स्थान पर बड़े भव्य एवं सुन्दर अलंकार चारों ओर बिखरे मिलेंगे। हमारा कहने का अभिप्राय: केवल यह है कि लोक साहित्य में शिष्ट साहित्य की भाँति रीत्यलंकारों के प्रति आग्रह नहीं होता।
 लोक साहित्य की तीसरी प्रमुख विशेषता है रचयिता और रचना काल का अज्ञात होना। दादी नानी से चली आती हुई दंतकथाओं और गीतों आदि की परंपरा किस युग से चली और किस कृति के पुण्यों का परिणाम है इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं। यों तो सभी रचनाएँ किसी न किसी व्यक्ति की प्रतिभा का प्रसाद है किन्तु उसका व्यक्तित्व इस परंपरा में अज्ञातावस्था में है। वास्तव में, इन गीतादिकों के कत्र्ता वे निरीह जन हैँ जिन्होंने अपने नाम और ग्राम की चिंता न करते हुए समाज के लिए अपनी प्रतिभा की भेंट दी है। कालक्रम से अज्ञातनामा व्यक्ति विशेष की रचना में समुदाय ने भी अपना योगदान दिया और यह स्वाभाविक भी था क्योंकि वह वस्तुत समुदाय की है और समुदाय के लिए है। समुदाय का योग मिलना आवश्यक है। इसी से कविता के आरंभ पर विचार करते हुए कुछ विद्वानों ने कहा है कि आदि में कविता समस्त समुदाय के प्रयत्नों से बनी। किसी ने कुछ जोड़ा, किसी ने कुछ और एक पद बना। इसी प्रक्रिया से कविता आगे बढ़ी है। इससे एक कठिनाई अवश्य हुई है कि लोक साहित्य का कोई मूल पाठ नहीं मिलता। यह भी कहा जा सकता है कि संभवत: कोई निश्चित मूल पाठ रहा भी न हो। इसका एक विपरीत परिणाम यह भी हुआ है कि कई लोगों को घाघ, भड्डरी आदि की कहावतों की लोक साहित्य कहने में आपत्ति हुई है। किन्तु इन लोक कलाकारों का व्यक्तित्व इतना व्यापक और महान हो चुका था कि इनके नाम भी एक समुदायवाची बन गये हैं। इन्होंने 'स्कूल का रूपÓ  ले लिया है। सच पूछा जाये तो इन नामों में नाम की गंध न रह गई है। ये तो आप्त पुरूष के रूप में शेष हैं। भले ही वह पुरूष घाघ, भड्डरी हो, या हो अन्य कोई लोक नाट्यकार दीपचंद जैसा व्यक्ति। लखमी हरियाने का लोक सांगी इस रूप में है कि उसमें लोक नाट्यकार के लिए जिस सूझ, व्यक्तित्व और प्रतिभा की आवश्यकता होती है वे सब एक-एक करके विद्यमान हैं। उसकी कल्पना इतनी निराली और व्यापक तत्वों से समन्वित थी कि दर्शकवृन्द  'वाहा दादा, वाह दादाÓ कहकर पुकार उठते और रसानुभूति से उन्मत हो जाते थे। लोक साहित्य की अन्य विशेषता यह है कि यह प्रचार या उपदेशात्मक प्रवृत्तियों से अछूता है। विशुद्ध लोक साहित्य में प्रचार, प्रोपैगेन्डा अथवा उपदेश का अभाव रहता है। उसमें तो विरह, वीरता करूणादी के सात्विक भाव भरे होते हैं जो जन-जन को एक रूप से प्रिय एवं ग्राह्य हैं। यहाँ पर यह आपेक्ष किया जा सकता है कि लोकोत्तियों में भी तो उपदेशात्मक प्रवृत्ति है फिर वे लोक साहित्य का प्रमुख अंग क्यों कर हैं? विचारने पर प्रतीत होगा कि लोकोक्ति साहित्य का प्राण वह कोरा उपदेश ही नहीं है। लोकोक्ति तो वह विट् एवं चमत्कार है जो शत-शत अनुभवों के द्वारा प्राप्त हुआ है और किसी के मुख से चमत्कृत रूप में प्रसूत हुआ है। इसलिए लोकोक्ति केवल  'अभिव्यक्तिÓ पर जीवित है उपदेश पर नहीं। उपदेश तो वहाँ एक गौण तत्व है।
 लोक साहित्य की एक और विशेषता यह भी है कि उसमें साम्प्रदायिकता के लिए स्थान नहीं है। वह पक्षी व पवन के सदृश स्वच्छंद है। उसे शाक्त एवं वैष्णव की आलोचना से कुछ नहीं लेना देना है। उसे विष्णु भी उतने ही पूज्य हैं जितनी कि शक्ति या काली आराध्या। उसकी निर्गुण ब्रम्ह में उतनी ही आस्था है जितनी कि सीताराम, राधाकृष्ण और शिव-पार्वती में। लोक साहित्यों से महान बना दिया है।
 अंत में इस बात को समाप्त करते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं यदि कविता का कार्य पाठक को संवेदनशील बनाना, सोचने समझने की शक्ति देना और जीवन की रसमय व्याख्या करना है तो निश्चय ही शास्त्रीय कविताएँ अधिकांश में असफल रही हैं। लोकगीत चाहे जिस देश व जाति के हो कविता के वास्तविक उत्तरदायित्व को बहुत अंश में पूरा करते हैं, निभाते हैं।
लोक साहित्य का महत्व -उपरोक्त विवेचन से हम उस कोने पर पहुँच गये हैं जहाँ से सरलतया लोक साहित्य के महत्व  को आंका जा सकता है। लोकसाहित्य का महत्व बहुविध है। विचार करने पर पाठ को धर्मगाथा (माइ थालाजी), नृविज्ञान (एनथ्रापोलोजी), जाति विज्ञान (एथनोलोजी) और भाषा विज्ञान (फाइलालोजी) आदि क्षेत्रों में लोक साहित्य की महत्ता, विशेष रूप से अनुभव होगी। यदि हम कहें कि लोक साहित्य के सम्यक विवेचन के बिना इन क्षेत्रों का अध्ययन अपूर्ण एवं अद्र्धपूर्ण होगा तो कोई अत्युक्ति न होगी। लोक साहित्य धर्मगाथादिकों के अध्ययन के लिए आधारशिला का कार्य करता है। भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में तो लोक साहित्य की महत्ता सर्वविदित है।
 विश्व और मानव की रहस्यमय पहेली को सुलझाने के लिए, उसके प्राचीनतम रूपों की खोज के लिए और उसके यथार्थ स्वरूप को जानने के लिए जहाँ इतिहास के पृष्ट मूक हैं, शिलालेख और ताम्रपत्र मलीन हो गये हैं वहाँ उस तमसाच्छन्न स्थिति में लोक साहित्य ही दिशा निर्देश करता है। लोक साहित्य का गंभीर अध्ययन जीवन और जगत की मौलिक एवं प्राणाणिक खोज के लिए अत्यन्त आवश्यक है। आदिम मानव की आदिम प्रवृत्तियों को जानने का सबसे सरल, प्रामणिक एवं रोचक साधन लोक साहित्य ही तो है। इस स्थल पर एक ओर बात भी विचारणीय है कि सभ्य कही जाने वाली जातियों के वास्तविकतावादी लेखकों की भाँति अनेक असंस्कृत जातियों के मौखिक साहित्य में भोग व लिप्सा की दुर्गन्ध नहीं है। इनके गीतों में जीवन की निकृष्ट दशा को छोड़ जीवन के रमणीय पक्ष का प्रदर्शन हुआ है।
1. ऐतिहासिक महत्व - किसी देश व समाज के प्राचीन रूप को झांक देख लेने का अनुपम साधन लोक साहित्य है। जब श्रावण मास में चंदन के रूख पर रेशम की डोर से झूला डालने की मांग हरियाणों की नवोढ़ा करती है, बटेऊ  (अतिथि, विशेषकर जामाता) के पधारने पर सोने की कढ़ाई में पूरियाँ उतारने की बात कही जाती है तो बरबस मन समाज के विगत वैभव विलास की ओर खिंच जाता है। भले ही ये समाज की आदर्श कल्पनाएँ रही हों किन्तु जन मानस में ये वस्तुएँ रही अवश्य हैं। चन्दरावल तथा अन्यान्य पतिपरायणा महिलाओं के आदर्श पतिव्रत को प्रदर्शित करने वाले गीत तथा कामांध यवनों के निरीह जनता के गृहस्थ जीवन को पंकिल करने वाले कारनामे किस इतिवृत्त से अधिक प्रभावशील नहीं हैं?
 वर्णनात्मक दोहें जो ग्रामीण जनता के मुख में आसीन हैं बड़ी पते की बातें बतलाते हैं और पिछले इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। हरियाणा के विषय में गुरू गोरख नाथ के पर्यटन से सम्बन्धित यह दोहा-   
'कंटक देश, कठोर नर, भैंस मूत्र को नीर।
करमां का मारा फिरे, बांगर बीच फकीर।Ó
 नाथ कालीन इस प्रदेश के इतिहास को अपने में समेटे हुए है। यह संस्कृत में प्राप्त उस वर्णन के प्रतिकूल है जहाँ हरियाणे को 'बहुधान्यकभू:Ó कहा गया है। इस स्थिति में पाठक एक विचिकित्सा में पड़ जाता है कि राजाश्रित किसी कवि की वह संस्कृतोक्ति सत्य है अथवा रमते राम बाबा गोरखनाथ की यह ठेठवाणी। सामयिक परिस्थिति एवं वातावरण को देखते हुए गोरख बाबा वाली बात ही यथार्थ बैठती है। ऐसे ही अन्य अनेक तत्व इतिहास की खोज में सहायक होते हैं।
 पाश्चात्य विद्वानों ने भारतीय साहित्य में यह कमी बतलाई है कि इसमें इतिहास विषयक सामग्री का एक तरह से अभाव है परन्तु उनका यह आक्षेप शिष्ट और लोक साहित्य दोनों पर लागू नहीं होता। लोक मस्तिष्क ने अपने इतिहास की कडिय़ाँ अपने गीतों में, अपनी कथाओं में जोड़ी हैं। लोकगाथाएँ तो एक रूप से इतिहास की प्रचुर सामाग्री से समपन्न हैं। उनमें अतिरंजना भले ही हो किन्तु इतिहास के विद्यार्थी को कुछ ऐसे तथ्य अवश्य मिल जायेंगे जो प्रसिद्ध इतिहास लेखकों की दृष्टि से छूट गये हंै।
2. सामाजिक महत्व - लोक साहित्य काक सामाजिक मूल्य बहुत अधिक है। समाज-शास्त्र के समुचित अध्ययन के लिए लोक साहित्य की महत्ता सुविदित है। भारतीय समजा का ढंाचा किस प्रकार का रहा है यह लोक-गीतों, लोककथाओं और लोकोक्तियों से भली-भांति समझ में आ जाता है। सास बहू का कटु संबंध, ननद भौजाई का वैमनस्य, विप्रयुक्ता तथा विधवा की दशा का मार्मिक एवं यथातथ्यपूर्ण वर्णन किसी लिखित रूप में उतना मार्मिक नहीं मिलेगा। भाई बहन के निरीह निश्छल कोमल प्रेम के उदाहरण क्या कल्हण की राजतरंगिणी, अष्टदश पुराण और टाँड राजस्थान आदि महान ग्रंथों में देखने को मिंलेगे? शिशु जन्म पर होने वाले सामाजिक कृत्यों के प्रति क्या इतिहास लेखकों का ध्यान कभी गया है? इन सबके समीचीन अध्ययन के लिए लोक साहित्य ही तो एक मात्र साधन है।
3. शिक्षा विषयक महत्व - ज्ञान एवं नीति की दृष्टि से यह साहित्य पर्याप्त समृद्ध है। ग्रामों में चाहे स्कूल, कॉलेज एवं उच्च शिक्षा का समुचित प्रबंध न हो,चाहे ग्रामीण जनता को अक्षर ज्ञान की कोई सुविधा न हो परन्तु जनता के ज्ञान में बराबर वृद्धि होती रहती है। इस ज्ञान को ग्रामीण जनता आँखों द्वारा न लेकर कानों द्वारा ग्रहण करती है। इस प्रकार यह शिक्षा दिन और रात का प्रात: ओर मध्याह्न का, तथा संध्या व प्रदोषकाल का कोई ध्यान न कर सहज रूप में वायु ओर आकाश के पंखों पर चढ़ नारद की भांति जन-जन के द्वार पर अलख जगाती  है। ग्राहक को इस शिक्षा के हृदयंगम करने के लिए किसी विशेष वातावरण एवं परिस्थिति की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह कहना अनुचित न होगा कि ग्रामों में मौखिक विश्व विद्यालय खुले हुए हैं। परस (चौपाल) और पूअर (अलाव) इस ज्ञान-वितरण के लिए बड़े उपयुक्त स्थल हैं। इन संस्थाओं में शिक्षा के अलग-अलग स्तर हैं जहाँ आबालवृद्ध को आयु के अनुसार शिक्षा मिलती है। शिक्षार्थी को समयानुसार सब चीजें सीखने को मिलेंगी। कोर्स (पाठ्यक्रम) आयु के अनुसार चलता है। बचपन में बाल सुलभ और बुढ़ापे में बृद्ध सुलभ।
 इस शिक्षा वितरण के सर्वोत्तम साधन लोक-कथाएँ हैं। यों तो बालक की शिक्षा जननी की गोद में ही आरम्भ होती है। वहीं से वह चंदामामा, झूजू के म्याऊँ  के, आटे बाटे के द्वारा कुछ सीखता चलता है। कैसा सुन्दर ढंग है, शिक्षा की शिक्षा और मनोविनोद का मनोविनोद। घर-घर में किंडर गार्टन और मांटेसरी शालाएँ लगी होती हैं। माता-पिता, भाई-बहन, दादी-दादा, अड़ोसी-पड़ोसी अबोध बालक की ज्ञान झोली में कोई न कोई रत्न बिना मांगे डालते रहते हैं। बालक कुछ बड़ा होता है तो दादी-नानी की घरेलू कहानियाँ बालक को हुंकारे के साथ कभी आश्यर्च, कभी उत्साह और कभी उदारता के पाठ पढ़ाती चलती हैं। इन कहानियों में बालक के लिए परिचित कुत्ता, बिल्ली, कौंआ, मोर, तोता, सारस, गीदड़ और लोमड़ी आदि पात्र जीवन की व्याख्या बालक की मातृभाषा में करते चलते हैं। ये कहानियाँ श्रोता के सामाजिक व्यवहार का ज्ञान भी देती रहती हैं। इन ग्रामीण घरेलू कहानियों और पाठ्य-पुस्तकों में स्थान पाने वाली आधुनिक कहानियों में एक मौलिक अन्तर है। स्कूली कहानियों में पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति लहरें लेती है जब कि घरेलू कहानियों का पट उन्हीं तन्तुओं से निर्मित है जो पूर्णतया भारतीय हैं। वही-'एक राजा था। उसके सात छोरे थे और सात छोरियाँ थीÓ आदि पूर्व परिचित बातें हैं।
 बालिकाओं के दृष्टिकोण से देखें तो लोक साहित्य बड़ा उपयोगी मिलेगा। उनके लिए सामाजिक एवं कौटुम्बिक शिक्षा का समुचित प्रबन्ध यहाँ मिलता है। उदार जननी एवं सद्गृहस्थ बनना भारतीय पुत्रियों का प्रथम व पुरातन उद्देश्य रहा है। बालिकाएँ जीवन के आरम्भ से ही गुडिय़ों के साथ खेल-खेलकर अपना मनोरंजन करती हैं और गृहस्थ के अनेक रहस्यों को अनायास सीख लेती हैं, समझ लेती हैं। कुछ सयानी होती हैं तो गीतों की दुनिया में पदार्पण करती हैं। यह संसार उन्हें पर्याप्त मात्रा में शिक्षित कर देता है। यहीं से उन्हें ऐसे असंख्य नुस्खे (योग) मिलते हैं। जो भावी जीवन के लिए लाभप्रद एवं हितकर सिद्ध होते हैं। जिन बातों को ये गुड्डे-गुडिय़ों के रूप में कहती सुनती है उन्हीं से अपने भावी जीवन की दिशा निर्धारित करती चलती हैं। डॉ. वैरियर एलविन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'फोक्सांग्स् ऑफ मैकलल्स्Óि में एक स्थान पर लोक गीतों की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए लिखा है कि-'इनका महत्व इसलिए नहीं है कि इनके संगीत, स्वरूप और विषय में जनता का वास्तविक जीवन प्रतिबिम्बित होता है, प्रत्युत इनमें मानवशास्त्र (सोशियोलाजी) के अध्ययन की प्रामणिक एवं ठोस सामग्री हमें उपलब्ध होती है। Ó डॉ. एलविन के मत में एक सार है, एक तथ्य है।
4. आँचारिक महत्व - लोक में आचार का बड़ा महत्व है। लोक साहित्य में आचार संबंधी बातें यत्र-तत्र बिखरी मिलेंगी। यहाँ आचार संबंधी कितने ही अध्याय खुले पड़े हैं जिनमें एक लोकोत्तर नैतिक एवं आचारिक अवस्था का वर्णन है। सतीत्व का कितना ऊँचा आदर्श यहाँ उपलब्श होता है यह चन्दरावल के कथा-गीत से स्पष्ट है। लोक साहित्य में जिन उच्चादर्शों का वर्णन है जिन लोकोत्तर चरित्रों की कल्पना है उनमें राम, कृष्ण, शिव और सीता राधा, पार्वती को नहीं भुला सकते। वे हमारे आचार के केन्द्र हैं। इन्हीं आदर्शों को अपनाकर भारत भारत रह सकता है।
5. भाषा वैज्ञानिक महत्व - यह सत्य बात है कि 'भाषा-शास्त्रीÓ के लिए शिष्ट साहित्यिक भाषाएँ उतनी उपयोगी नहीं है जितनी कि  बोलचाल की भाषाएँ। इसलिए लोक साहित्य लोक-भाषा की वस्तु हाने के कारण भाषा-वैज्ञानिकों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है यही वह धरातल है जहाँ पर भाषातत्ववेत्ता भाषा के परतों को उघाड़कर देखते हैं और गंभीर से गंभीर स्तरों में प्रवेश पाते हैं।
 अर्थ परिवर्तन को समझने के लिए तथा शब्दों के इतिहास की खोज के लिए लोक साहित्य सर्वाधिक उपादेय है। पं. रामनरेश जी त्रिपाठी का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि 'आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता गाँव वाले हैं और उनका साहित्य इस भाषा को गढऩे के लिए टकसाल का काम दे रहा है। संस्कृत के शब्द किस प्रकार साधारण जन के लिए उपयोग सुलभ हुए हैं यह सब इस टकसाल का ही परिणाम है।Ó जब एक साधारण ग्रामीण किसी नई वस्तु या किसी नूतन प्राकृतिक व्यापार को देखता है तो उसे अपनी समझ से कोई न कोई नाम देना चाहता है। इसके लिए किसी पंडित व पुरोहित की अपेक्षा उसे नहीं होती। उसने साईकिल देखी। कभी नहीं सोचा कि यह अंग्रेजी अथवा ऐंग्लो-सेक्सन भाषा का शब्द है और उसके क्या मायने हैं। उसने देखा केवल एक नूतन व्यापार कि एक गाड़ी है और वह पैर से चलती है। अत: वह सहसा कह बैठा 'पैरगाड़ीÓ। यह एक साधारण शब्द है लेकिन कितना सार्थक एवं उपयोगी है।
 लोकमानस की शब्द निर्माण शक्ति की परख प्राय: क्रिया-विशेषण बनाने में सरलतया हो जाती है। जोर से गिरने के लिए 'धड़ाम से गिराÓ अधिक सार्थक एवं स्वत: बोधक है आदि। यदि हम किसी ग्रामीणजन को बोलता सुने तो हमें सहज ही ज्ञात हो जायेगा कि वह कितने ही ऐसे शब्द प्रयोग में लाता है जो भारतीय वातावरण में पनपे हैं यथा पौन (पवन) पौरख (पौरूष) वार (वारि) आदि ऐसे शब्द हैं जिनके अन्तस् में भारतीय वातावरण हिलोरें ले रहा है। एक सरल विवेचन से हम यह देख पायेंगे कि लोकभाषा शिष्ट भाषा से अधिक सम्पन्न और सरल भी बनेगी। हरियाणा लोक साहित्य का अध्ययन भी हिन्दी शब्दकोष की पर्याप्त अभिवृद्धि करेगा। इस बोली के उणियार (सदृश),ल्हास तथा दावें (पर्याप्त रूप से) आदि ऐसे शब्द हैं जो हिन्दी की भाव-प्रकाशिका को बढ़ायेंगे।
6. सांस्कृतिक महत्व -लोक साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष बड़ा विशद है। विश्व की संस्कृतियाँ कैसे उद्भूत हुई, कैसे पनपी, इस रहस्य की कहानी अथवा इतिहास हमें लोक साहित्य के सम्यक् अध्ययन से मिलता है। संस्कृतियों के पुनीत इतिहास की परख अनेकांश में लोक साहित्य से सँभव है। सच पूछा जाये तो लोक साहित्य ही संस्कृति का अमूल्य निधि है।
महात्मा गांधी के निम्नलिखित शब्द जिनमें लोक साहित्य के सांस्कृतिक पक्ष की महत्ता प्रकट की गयी है, चिरस्मरणीय रहेंगे- 'हाँ, लोकगीतों की प्रशंसा अवश्य करूँगा, क्योंकि मैं मानता हूँ कि लोकगीत समूची संस्कृति के पहरेदार होते हैं।Ó गुजराती मनीषी काका कालेलकर ने लोक साहित्य के सांस्कृतिक पक्ष को इन शब्दों में व्यक्त किया है- 'लोक साहित्य के अध्ययन से, उसके उद्धार से हम कृत्रिमता का कवच तोड़ सकेंगे और स्वाभाविकता की शुद्ध हवा में फिरने-डोलने की शक्ति प्राप्त कर सकेंगे। स्वाभाविकता से ही आत्मशुद्धि संभव हैÓ अंत में यदि हम यह कहें कि लोक साहित्य जन-संस्कृति का दर्पण है तो अत्युक्ति न होगी।
 संस्कृति की आधारशिला पुरातन होती है। इसके मूल तत्वों के संबंध में जो तत्व सबसे महत्वपूर्ण एवं विचारणीय हैं, वह है विगत का प्रभाव। आज भी हमारा आदर्श हमारा अतीत है। झूला-झूलते, चाकी पीसते, यात्रा करते हमारे आदर्श राम-लक्ष्मण के पुण्य चरित्र ही हैं। यही लोक साहित्य का सांस्कृतिक पक्ष है।साभार- रऊताही 2011 (द्वि.खं.)

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