Tuesday, 27 December 2011

सपने साकार करने कला होनी चाहिए : यादव

बिलासपुर. सपने उनके साकार होते हैं जो उन्हें साकार करना करना जानते हैं. मिसाल पेश करने करने के लिए हाथों में मसाल होना जरूरी है. उक्त वक्तव्य राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष डॉ. सोमनाथ यादव ने बिलासपुर जिला यादव समाज द्वारा इमलीपारा स्थित समाज भवन में आयोजित अपने सम्मान समारोह के अवसर पर व्यक्त किए.
सर्वप्रथम डॉ. सोमनाथ को समाज के लोगों द्वारा शाल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह देकर उनका सम्मान किया गया. तत्पश्चात जिले भर से आए समाज के प्रतिनिधियों ने माल्यार्पण कर उन्हें सम्मानित किया. अपने ओजपूर्ण और प्रेरक वक्तव्य के माध्यम से डॉ. यादव ने समाज के लोगों से आह्वान किया भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा के अनुरूप सिर्फ कर्म पर ध्यान दें, फल की चिंता न करें. उन्होंने कहा कि सर्व यादवों को एक साथ संगठित होने की आवश्यकता है. आपस में भेदभाव और क्षुद्र राजनैतिक स्वार्थ के कारण अपने ही समाज का अहित होता है. इससे बचने की जरूरत है.
उन्होंने यादव समाज को आगाह किया कि कुछ असामाजिक तत्वों के कारण पूरे समाज में विखंडन के  प्रयास  को सफल नहीं होने दें. सम्मान समारोह को समाज के कई वरिष्ठ और गणमान्य लोगों ने संबोधित किया. इस अवसर पर जिला यादव समाज के अध्यक्ष उमाशंकर यादव, एस.एल. कोका, हरिचरण यादव, डॉ. आर. जी. यादव, डॉ. मन्तराम यादव, गणेशराम यादव, रेवाराम यादव, रामशरण यादव, भुवनेश्वर यादव, रामकुमार भागवत, कुलदीप यदुराज, तेरस यादव, अहिल्या यादव, अन्नपूर्णा त्रिवेणी यादव सहित बड़ी संख्या में यादव  समाज के महिला-पुरुष बच्चे व जिले के विभिन्न स्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित थे.

Sunday, 18 December 2011

 बिलासपुर (छत्तीसगढ़ ) . मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से प्रेस कर्मचारी संघ के सदस्यों का परिचय करते महासचिव तेरस राम यादव.


Friday, 2 December 2011


डॉ. सोमनाथ यादव के छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बनने के बाद प्रथम बिलासपुर आगमन पर समर्थको ने स्वागत किया.२४.११.२०११
 

Monday, 28 November 2011

पिछड़ों के लिए सरकार की सौ से अधिक योजनाएं- रमन

रायपुर. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में विभिन्न समाजों के बीच अद्भुत एकता, समरसता और तालमेल है. यह तालमेल वर्षों से है और यही छत्तीसगढ़ की ताकत भी है. डॉ. सिंह कल रात यहां अपने निवास पर छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष डॉ. सोमनाथ यादव के नेतृत्व में राज्य के विभिन्न जिलों से आए पिछड़ा वर्ग समाज के लोगों से चर्चा कर रहे थे. समाज के लोगों ने मुख्यमंत्री को साफा पहनाकर आत्मीय स्वागत किया और आयोग गठन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया.
डॉ. सिंह ने कहा कि आयोग में युवा लोगों की अच्छी टीम बनी है. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह आयोग समाज के पिछड़े तबके के लोगों को शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का फायदा दिलाने में सेतु की तरह कार्य करेगा.
उन्होंने बताया कि समाज के पिछड़े और कमजोर लोगों की आर्थिक-सामाजिक तरक्की के लिए राज्य शासन द्वारा एक सौ से अधिक योजनाएं चलाई जाती है. इन योजनाओं की जानकारी और इनके लाभ उठाने के तरीके का जरूरतमंद लोगों के बीच अच्छी तरह प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए. डॉ. सिंह ने आयोग को इस दिशा में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान भी किया. उन्होंने दहेज प्रथा को एक प्रमुख सामाजिक बुराई बताया. मुख्यमंत्री ने कहा कि इस बुराई को दूर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री कन्यादान योजना चलाई जा रही है. योजना के अंतर्गत सभी समाजों के निर्धन परिवार के कन्याओं की सामूहिक रूप से उनके विवाह संपन्न कराई जाती है. यह विवाह उनके सामाजिक विधि-विधान के अनुरूप होता है. राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक कन्या विवाह के लिए दस हजार रुपए तक खर्च किया जाता है. इनमें नये परिवार स्थापित करने के लिए जरूरत की चीजें उपलब्ध कराई जाती हैं.

Friday, 25 November 2011

डॉ. यादव ने संभाली पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष की कुर्सी

रायपुर. छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष डॉ.सोमनाथ यादव ने आज पदभार ग्रहण किया. उन्होंने पिछड़े वर्ग के विकास के लिए बेहतर से बेहतर काम करने की बात कही.  राज्य शासन ने बुधवार को छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति का आदेश जारी किया. आयोग का अध्यक्ष बिलासपुर के डॉ. सोमनाथ यादव को बनाया गया है. इसके अलावा 6 सदस्य भी बनाये गये हैं. सभी का कार्यकाल तीन वर्ष तक रहेगा. नवनियुक्त अध्यक्ष डॉ. यादव गुरूवार को दोपहर ईएसी कॉलोनी स्थित आयोग के दफ्तर पहुंचे और पदभार ग्रहण किया. इस दौरान कुछ सदस्यों के अलावा बड़ी संख्या में उनके समर्थक मौजूद थे. डॉ. यादव ने कहा कि आयोग द्वारा प्रदेश के पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए बेहतर काम किया जाएगा. आयोग में आने वाली समस्याओं व शिकायतों का त्वरित निराकरण किया जाएगा. वहीं पिछड़े वर्ग के लिए कुछ नई योजनाएं शुरू करने पर भी विचार किया जा रहा है. राज्य शासन ने आयोग में छह सदस्यों की नियुक्ति भी की है. इनमें प्रहलाद रजक, भुवनेश्वर सिंह केसर, देवेन्द्र जायसवाल, शिव चन्द्राकर, श्रीमती ममता साहू एवं छतर सिंह नायक शामिल हैं. प्रहलाद व देवेन्द्र पहले भी सदस्य रहे हैं.

Thursday, 24 November 2011

डॉ. सोमनाथ यादव छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष

बिलासपुर. डॉ. सोमनाथ यादव को छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा  वर्ग आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है. वे आज २४ नवम्बर को अपना कार्यभार ग्रहण कर लिए. डॉ. सोमनाथ  यादव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े हुए थे. वे पिछले कार्यकाल में पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य थे. श्री यादव विभिन्न सांस्क्रतिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रुपे से जुड़े रहते है. उनकी सम्पूर्ण  शिक्षा बिलासपुर में हुई.

Saturday, 5 November 2011

बहुरंगी होगा 34वां रावत नाच उत्सव

बिलासपुर (छत्तीसगढ़). प्रदेश का प्रतिष्ठित रावत नाच का 34वां महोत्सव 19 नवंबर को स्थानीय लाल बहादुर शास्त्री शाला प्रांगण में आयोजित किया जा रहा है. गौरतलब है कि विगत 33 वर्षों से संस्कारधानी में नाच महोत्सव का आयोजन होता आ रहा है, जिसमें प्रतिवर्ष छत्तीसगढ़ राज्य के सुदूर इलाकों से हजारों की संख्या में यादव समाज को लोग भाग लेते हैं.  साथ ही कलाकारों द्वारा बहुरंगी नृत्य कला एवं शस्त्र चालन कला का भी प्रदर्शन किया जाएगा.
इस वर्ष आयोजित उत्सव में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले गोलों (दलों) को
पुरस्कृत किया जाएगा. पुरस्कार में 49 रनिंग शील्ड के साथ लगभग 1 लाख 20 हजार से अधिक रुपयों की नगद राशि पुरस्कार स्वरूप दी जाएगी. समारोह के मुख्य आकर्षण हजारों यदुवंशियों की लोक नृत्य प्रस्तुति, स्मारिका-2011का विमोचन, पुरस्कार समारोह, सहित प्रतिभावान समाज के छात्र-छात्राओं की लगभग 50 हजार रुपए की
छात्रवृत्ति आदि होगा. महोत्सव को सफल बनाने में समिति के सभी
पदाधिकारी व सदस्य जुटे हुए हैं. उक्त जानकारी संयोजक डॉ. कालीचरण
यादव ने दी.

Monday, 31 October 2011

आकाश यादव राष्ट्रीय शालेय वाटर पोलो हेतु चयनित

बिलासपुर, (छत्तीसगढ़). राष्ट्रीय शालेय वाटर पोलो का आयोजन 1 से 6 नवंबर तक पणजी गोवा में किया जा रहा है. उक्त प्रतियोगिता हेतु प्रदेश की टीम में नगर के मिशन उच्चतर माध्यमिक  शाला के छात्र आकाश यादव का चयन किया गया है. प्रतियोगिता में भाग लेने हेतु प्रदेश की टीम 28 अक्टूबर को गोवा के लिए रवाना हुई. प्रतियोगिता के पूर्व भिलाई स्विमिंग पूल में पांच दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का भी आयोजन किया गया था. जिसमें आकाश ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर अपने चयन की सार्थकता साबित कर दी. यादव समाज इनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है.

Sunday, 30 October 2011

शिक्षा के प्रति प्रोत्साहन जरुरी- यादव

यादव समाज का दीपावली मिलन सम्पन्न
बिलासपुर. जिला यादव समाज द्वारा आज दीपावली मिलन समारोह का आयोजन किया गया. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में अजय यादव पुलिस अधीक्षक
उपस्थित थे. विशिष्ट अतिथि पी.आर. यादव प्रदेशाध्यक्ष तृतीय वर्ग शासकीय  कर्मचारी संघ डॉ. आर.जी. यादव डॉ. मन्तराम यादव भुवनेश्वर  यादव रेवाराम यादव कार्यक्रम की अध्यक्षता समाज के अध्यक्ष उमाशंकर  यादव ने की. इस अवसर पर मुख्य अतिथि की आसंदी से अजय यादव ने कहा कि समाज के द्वारा
आयोजित इस प्रकार के आयोजन परिवार के सदस्यों को अन्य शैक्षणिक एवं
सामाजिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए प्रेरित करते हैं. उन्होंने कहा
कि समाज के जो शिक्षित एवं युवा वर्ग हैं वे उन लोगों को प्रोत्साहित करते रहें
जो किसी कारणवश शिक्षा से वंचित हो जाते हैं साथ ही उन्होंने कहा कि एेसे
आयोजन होते रहने चाहिए, जिससे समाज के लोग एक दूसरे से मिलते हैं तथा
उनके सुख दुख की जानकारी लोगों तक पहुंचती है, जिससे मिलकर निराकरण
किया जा सके. उन्होंने कहा कि समाज के इस भवन में एक हॉस्टल का निर्माण
कर जो बच्चे बाहर से आकर पढ़ाई के साथ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की
तैयारी करते हैं उनके लिए यह हॉस्टल मील का पत्थर साबित होगा. कार्यक्रम में
रामकुमार यादव रामफल यादव जितेंद्र यादव सुशील यादव विकास यादव प्रकाश
यादव शैलेंद्र यादव विजय यादव नान्हू यादव गोपाल यादव अशोक यादव भैय्या
राम यादव नंदू यादव एल.पी. यादव सुरेश यादव श्रीमती अहिल्या यादव श्रीमती
पूर्णिमा यादव श्रीमती हीरामणी यादव श्रीमती मीना यादव श्रीमती इंदू यादव
श्रीमती अन्नपूर्णा यादव सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित थे. इस
अवसर पर स्वागत भाषण रामशरण यादव ने दिया एवं आभार प्रदर्शन डॉ.
सोमनाथ यादव ने तथा संचालन तेरस यादव ने किया.

Saturday, 29 October 2011

तीन सूत्रीय मांग के लिए प्रदर्शन करेगा यादव समाज

टेंगनमाड़ा. (छत्तीसगढ़) ग्राम डांड बछाली में यादव समाज छत्तीसगढ़
बेलगहना इकाई सम्मेलन डॉ. राय सिंह यादव की अध्यक्षता में मुख्य अतिथि
प्रांताध्यक्ष रमेश यदु गौ सेवा आयोग सदस्य छ.ग. शासन कन्हैया यादव प्रदेश
कार्यकारिणी सदस्य डॉ. डी.सी. यादव संतोष यादव रतनपुर विशेष अतिथि डॉ.
रेणु जोगी विधायक विधायक प्रतिनिधि डॉ. अरूण सिंह चौहान संदीप शुक्ला
जनपद अध्यक्ष विधि राम सिदार ब्लाक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष कोटा भरत
यादव धनपाल यादव तथा आसपास के समस्त ग्रामों से 200 प्रतिनिधि
उपस्थिति थे.
इस दौरान निर्णय लिया गया कि यादव समाज अपनी प्रमुख तीन मांगों को
लेकर आगामी माह में एक साथ सभी जिलों मुख्यालयों में हजारों की तादाद में
इक्ट्ठा होकर धरना प्रदर्शन करेगा. प्रमुख तीन मांगों में यादवों के लिये डेयरी
व्यवसाय हेतु शत प्रतिशत अनुदान वनग्राम क्षेत्रों में अन्य वर्ग की भांति यादवों
को पटटा वितरण तथा यादव चरवाहों को कोटवार की भांति दर्जा प्रदान कर
मानदेय निर्धारित किये जाने की मांग शामिल है. उक्त मांगों के समर्थन में
उपस्थित लोगों ने हाथ उठाकर 23 दिसंबर को हजारों की संख्या में सम्मिलित
होने के सहमति दी. कार्यक्रम का संचालन भरत यादव कार्तिक यादव ने किया.
राधेश्याम नंद राम लगुन सिंह रामायण सिंह लल्ला यादव धनपाल यादव
कवल सिंह मंगलू शंकर लखन यादव दुलरूवा जोहित फूल सिंह शिव लाल
शिव सिंह मालिक यादव अमरनाथ दिलीप बीरबल राजेश यादव बुधराम गीता
राम सीताराम पे्रम लाल अमर लाल राजा राम अशोक ताराचंद मोहित राम
लाल प्रहलाद महेतरू नामदेव काशी राम सेवक राम संत राम सालिक राम
घासी राम दशरथ शिवचरण मकुंद धनुष संजय तुलसी राम सुरेश एवं डी.पी.
यादव ने आभार व्यक्त किया.

Friday, 28 October 2011

प्रतिभावान यादव विद्यार्थियों का हुआ सम्मान

कोरबा. यादव समाज छग जिला कोरबा का स्नेह का सम्मेलन 23 अक्टूबर को जूनियर
क्लब एचटीपीएस कालोनी दर्री में संपन्न हुआ. जिसके मुख्य अतिथि प्रांतीय अध्यक्ष
रमेश यदु विशिष्ट  अतिथि प्रांतीय संरक्षक रेशम लाल यादव कमलेश यादव प्रांतीय
महामंत्री संतोष यादव जिला संरक्षक जगदीश यादव की उपस्थिति में युवक - युवती
परिचय प्रतिभावान छात्र, छात्राओं एवं समाज सेवा सम्मान किया गया है. जिसमें सर्व
सम्मति से जिला संगठन प्रमुखों का गठन किया गया.
नत्थू लाल यादव जिलाध्यक्ष (शहर),केदार नाथ यादव जिलाध्क्ष(ग्रामीण), रिखीराम
यादव कार्यालय जिलाध्यक्ष चन्द्रमणी यादव युवा जिलाध्यक्ष (शहर), सत्यनारायण यादव
युवा जिलाध्यक्ष (ग्रामीण),श्रीमती शुभद्रा यादव, महिला जिलाध्यक्ष (शहर),
सत्यनारायण यादव महामंत्री चयनित किया गया है. जिसमें महिला पुरूष बगाों लगभग 4
सौ लोग उपस्थित रहे. दर्री से सियाराम, आत्माराम, नाथूराम , राम आश्रय, कृष्णा, कमल
नारायण, छबली राम, शंभू लाल, चन्द्रिका प्रसाद, पक्षीराम, ताकिका प्रसाद, उमादयाल,
रामचरण, सुखीराम, बैजनाथ, जग्गू राम, बालको से साधराम, एल.पी.आहिर, मंगल सिंह,
रामरतन, बंशीलाल, एनटीपीसी से शिव प्रसाद , श्री चन्द कोरबा से सुखीराम, चोवाराम,
हारबाई, संतोषी यादव, दीपका से कालीचरण, एस.एन.सिंह, नीलकंठ, सालिकराम,
बलगी से रामरतन, चैतराम, फेंकूराम राम प्रसाद सिंचाई कालोनी से रामनाथ, कगु यादव,
कुसमुण्डा से एन.पी.यादव, रजगामार से पुनाराम, छतराम, सम्पत राम, चिनी लाल,
दादूराम, रूमगरा से कृष्ण कुमार, रवि यादव, डूडगा से राजेश यादव, नारायण प्रसाद,
रामचन्द, रामनगर से मीलन, संतराम, लोत लोता से वैशाखू राम, बरेज, सुदीय यादव,
म.मै.राम लाल संडौक से जगत राम, लाला राम कलमी डूग्गू से राम भरोस, मनोज
कुमार, परसाभाठा से आनंदराम, रोहन, लाटा से गाजाधर जितेन्द्र, अगारखार से बाबू लाल
कुमगरी से जगत राम, चन्द्रकांत, सोहागपुर से नवरतन लाल, दरश राम, भुजबल परसा
पाली से शिव प्रसाद विष्णु प्रसाद कोरबा पूर्व तिहारू राम रघुनंदन आदि एवं अन्य बंधुआें
बड़ी संख्या में उपस्थित थे.

Saturday, 8 October 2011

यादव समाज के प्रतिभावान छात्र सम्मानित होंगे

बिलासपुर. रावत नाच महोत्सव समिति द्वारा आगामी 19 नवम्बर को रावत नाच महोत्सव
के अवसर पर इस वर्ष कुल 24 छात्र-छात्राओं को 50 हजार रुपए की राशि छात्रवृत्ति
स्वरूप प्रदान की जायेगी. इस निमित्त रावत नाच महोत्सव छात्रवृत्ति हेतु चयनित
प्रतिभवान छात्रों के नामों की घोषणा क र दी गई है. डॉ. आर.जी. यादव के अध्यक्षता में
गठित समिति द्वारा अंतिम तिथि 31 जुलाई तक प्राप्त आवेदन पत्रों में से सर्वाधिक अंक
अर्जित करने वाले निम्नलिखिल छात्र-छात्राओं का चयन छात्रवृत्ति हेतु किया गया है.
चयनित छात्रों को सूचित किया गया है कि वे सत्यापन हेतु अपनी मूल अंकसूची एवं
एक पासपोर्ट साई ताजा फोटो शीघ्र जमा करें.
सामान्य यादव परिवार वर्ग से चयनित छात्र-छात्राएं है.- प्राथमिक प्रमाण पत्र परीक्षा 5वीं
में दुर्गेश, लक्ष्मण यादव कुदुदण्ड 94 प्रतिशत, छात्रा कु. सपना, ईश्वरलाल यादव
चांडीडीह 96.6 प्रतिशत, पूर्व माध्यमिक प्रमाण पत्र परीक्षा 8वीं- में छा नीरज कुमार,
सुरेश यादव लिमतरा बिलासपुर, 83.2 प्रतिशत छात्रा कु. शालिनी, रामायण यादव बिजौर
बिलासपुर 86.6 प्रतिशत, हाईस्कूल परीक्षा 10वीं- में छात्र सौरभ, दुर्गा प्रसाद यादव
मोपका 90 प्रतिशत, छात्रा कु. रूपाली, सहेतरु यादव मंगला बिलासपुर 93.5 प्रतिशत
हायर सेकेण्डरी परीक्षा 12वीं  में छात्र सोनल, एस.के. यादव बिलासपुर 89 प्रतिशत, छात्रा
कु. अनिता, भरतलाल यादव देवरी-करही मुंगेी 86 प्रतिशत अंक अर्जित करने पर इन्हें
कक्षावार क्रमश: एक हजार, दो, एवं पांच हजार रुपयों की राशि छात्रवृत्ति के रूप में नकद
एवं प्रमाण पत्र के साथसम्मानित किया जायेगा. यह इस छात्रवृत्ति योजना का 14वाँ वर्ष है.
इसी तरह रावत नाच गोल दल से सम्बद्ध परिवार के प्रतिभावान छात्रों को दी जाने वाली
छात्रवृत्ति के लिए निम्नलिखित छात्र-छात्राओं का चयन किया गया. प्राथमिक प्रमाण पत्र
परीक्षा 5वीं- में तीन छात्र एवं तीन छात्राओं को प्रमाण पत्र के साथ एक-एक हजार रुपए
की नगद राशि प्रदान की जायेगी. ये छात्र हैं. अनीश, करण यादव मोपका बिलासपुर 82
प्रतिशत, रूपेश यादव, गणेशराम राउत, गबोद रायपुर 80 प्रतिशत, ओमप्रकाश,
रामनारायण यादव मोपका बिलासपुर 73 प्रतिशत, बालिका वर्ग से कु. सतरुपा, जग्गू
यादव मोपका 91.33 प्रतिशत, कु. तृप्ति, घनश्याम यादव सुहेला-सिमगा 86.6 प्रतिशत,
कु. ममता, फेकू यादव डोगरिया, रायपुर 79.33 प्रतिशत, पूर्व माध्यमिक प्रमाण पत्र 8वीं में
महेन्द्र चैतराम यादव बसिया 87.6 प्रतिशत, नरसिंह, रामजी यादव गबोद रायपुर 82.2
प्रतिशत, छात्रा वर्ग से कु. पुष्पा, ब्रम्ह यादव गाबोद रायपुर 83.6 प्रतिशत, कु. भारती,
नकुल यादव मोहदा 75 प्रतिशत अंक इन्हें भी एक-एक हजार रुपए की राशि प्रमाण पत्र
के साथ प्रदान की जायेगी.
हाईस्कूल प्रमाण पत्र परीक्षा 10वीं में छात्र हेम प्रकाश, छन्नूलाल यदु 51.5 प्रतिशत
सिनोधा भाटापारा, छात्रा कु. अंमिता, कृष्ण कुमार यादव भाटापारा 90.16 प्रतिशत, कु.
मिरण, रामखिलावल यादव सिरगिट्टी, तारबाहर 49.66 प्रतिशत कु. तृप्ति, लीलाधर यादव
सिरगिट्टी, तारबाहर 40.50 इन्हें भी दो-दो हजार रुपए की राशि प्रमाण पत्र के साथ
प्रदान की जायेगी.
हायर सेकेण्डरी परीक्षा प्रमाणपत्र 12वीं में रजत रंजन, संतोष कुमार यादव भाटापारा 88.4
प्रतिशत छात्रा कु. अनूपा, श्री सौखीलाल यादव बसिया बिलासपुर 72 प्रतिशत इन्हें भी
दो-दो हजार रुपए की राशि प्रमाण पत्रों के साथ प्रदान की जायेगी. डॉ. कालीचरण यादव,
डॉ. आर.जी. यादव, आर.एन. यादव, माखन लाल यादव, विजय यादव, मनीराम यादव,
संतोष यादव, उमेश यादव, रामचरण यादव, योगेश सीरिया छात्रवृत्ति परीक्षण समिति
बैठक में उपस्थित थे.

Tuesday, 27 September 2011

यादव समाज में फूट डालने से रोकने सलवा जुडूम अभियान-यदु

मुंगेली. गौ हत्या बंद होना चाहिए अभी प्रतिमाह लगभग 1$50 गायें छत्तीसगढ़ से बूचड़ खाना चोरी छिपे ले जायी जा रही है.  यादवों की पारंपरिक कला रावत नाच एवं बांस गीत के लिए छ$ग$ शासन की आेर से पुरस्कारों की घोषणा कर इन कलाआें को विलुप्त होने से रोका जा सकता है.  ये बातें पत्रकारों से बातचीत में गौसेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं यादव समाज के प्राताध्यक्ष रमेश यदु ने कही.
यदु ने अपने एक दिवसीय मुंगेली प्रवास के दरम्यान एक पत्रकार वार्ता में यादव समाज छत्तीसगढ़ संगठन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यादव समाज का यही ध्येय है कि छत्तीसगढ़ के समस्त यादवों का चहुमखी विकास को परिभाषित करते हुए श्री यदु ने कहा कि जनसंख्या के अनुपात में यादवों को एक बहुत बड़ा वोट बैंक माना जाता है किंतु उन्हें मूलभूत उनकी
आवश्यकताआें के अनुसार शासन द्वारा प्राथमिकता नहीं दी जा रही है जिसमें
यादव जाति अपने पैतृक व्यवसाय पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में
पिछड़ गया है जिसमें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता में कमजोरी देखी जा रही
है.
श्री युद ने कहा कि यादव समाज का यह मानना है कि जैसे अन्य जातियों में
जिसमें प्रमुख रूप से केंवट, बुनकर, धोबी, नाई, मरार, बसोंड़, आदि अन्य
जाति है. जिन्हें राज्य सरकार ने आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए
प्राथमिकता पूर्ण व्यवसाय में रियायत एवं उनकी सुविधाएं विशेष तौर पर प्रदान
की है.  श्री यदु ने पत्रकारों के यह पूछे जाने पर कि यादवों के लिए शासन से
वे किस तरह की सुविधएं चाहते हैं.  इस पर श्री यदु ने कहा कि यादव समाज
के उत्थान के लिए तीन सूत्रीय मांग राज्य सरकार के समक्ष रखी गई है जिसमें
मुख्य रूप से वनांचल क्षेत्र वर्षों से निवासरत् यादवों को उनके कब्जा भूमि का
पट्टा, डेयरी उद्योग को प्राथमिकता के आधार पर यादव समाज को प्रदान करते
हुए दिए गए ऋण पर 50 प्रतिशत की छूट तथा चरवाहों को कोटवारों के
समकक्ष सुविधा शामिल है.  शासन से मांग की गई है अगर शासन उपरोक्त
मांगों को पूर्ण नहीं करती है तो उस स्थिति में आगामी 23 दिसंबर 2011 को
छ$ ग. के सभी जिला मुख्यालयों पर यादव संघटन द्वारा सांकेतिक  रूप से एक
दिवसीय धरना माध्यम से छ$ ग$ शासन के मुख्यमंत्री जी के नाम ज्ञापन संबंधित
जिल के जिला कलेक्टरों को सौंपा जावेगा.
पत्रकारों ने पूछा कि समाज के द्वारा शासन से मांगी गई मांगें का क्या पर्याप्त
है? के जवाब में श्री यदु ने कहा कि यादव जाति की 70 प्रतिशत आबादी
वनांचल क्षेत्र में निवास करती है जिनके समक्ष भू अधिकार की भयावह
समस्या है.  दूसरा दुग्ध एवं पशुपालन व्यवसाय में दिए जाने वाले ऋण की
प्रक्रिया कठिन होने के साथ रियायत में भी बहुत कम है.  हम चाहते है कि
यादवों को हम से कम इस व्यवसाय में पूर्ण प्राथमिकता देने के साथ ही उनके
लिए नई योजना का निर्माण किया जाना चाहिए.
समाज में व्याप्त अशिक्षा के प्रश्न में कहा कि पहले की अपेक्षा समाज में
जागृति आई है लोगो में अपने बच्चों को शिक्षित करने रूचि देखी जा रही है.
राजनीतिक क्षेत्र में अपेक्षा से कम यादवों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर श्री यदु
ने कहा कि हमारा प्रतिनिधित्व नि:संदेह जनसंख्या के अनुपात में बहुत कम है
किन्तु नेतृत्व क्षमता का अभाव यादवों में नही है.  सभी राजनीतिक दलों में
प्रतिभाशाली, योग्य यादव नेता है किन्तु उनका स्तेमाल राजनेता अपनी रोटी
सेंकने के लिए करते है.  वहीं यादवों की एकजुटता में फूट डालकर उन्हें
राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने से रोकते है.
श्री यदु ने कहा कि इसी विसंगति को समाप्त करने के लिए यादव में भी
सलवा जुडूम अभियान चलाया जा रहा है जिसका आने वाले समय मेें एक
अच्छा परिणाम देखने को मिलेगा. अंत में यदु ने बताया कि यादव समाज के
संरक्षक के रूप में हमें अनुभवी व्यक्ति बिसरा राम यादव प्रांत संघ चालक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का पूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा हैै. वहीं साथ-साथ छ$
ग$ शासन के जल संसाधन मंत्री हेमचंद यादव व राजनांदगांव लोकसभा के
युवा विधायक मधूसूदन यादव का भी यादव समाज छ$ ग. को महती योगदान
मिल रहा है.

Thursday, 22 September 2011

Aashish Kumar Yadav
ImliBhata Bandhwapara Sarkanda Bilaspur (C.G.)
Mob. +9108085388489
Worked At- Student- Higher Secoandary




Tuesday, 13 September 2011

जन्माष्टमी पर सर्व यादव समाज की शोभायात्रा एवं आमसभा

बिलासपुर. सर्व यादव समाज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव समिति ने पुन:
हजारों युदवंशियों की उपस्थिति में नयनाभिराम झांकी सहित शोभायात्रा गांधी पुतला, दयालबंद से निकाली. इस अवसर पर समिति के संरक्षक एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष समाज के शिखर पुरूष बी.आर. यादव ने गरुड़ ध्वज लहराकर
शोभायात्रा की बाईक रैली को प्रारंभ किया. शोभायात्रा में सबसे पहले रथ पर
बैठकर कृष्ण-अर्जुन की जीवंत झांकी पश्चात् अम्बे लहरी बाल अखाड़ा,
उसके पीछे गरुड़ ध्वज लहराते हजारों की संख्या में शौर्य प्रदर्शन करते हुए
यदुवंशियों का कवर्धा, पण्डरिया, लोरमी, सीपत, बिल्हा, तखतपुर आदि से
पधारे समूह अपने रंग में बाजे गाजे सहित नृत्य करते हुए चल रहे थे. जूना
बिलासपुर हटरी चौक, शनिचरी चौक से गोल बाजार का भ्रमण करके
शोभायात्रा दीक्षित सभा भवन पहुंची जहां स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के
मुख्य आतिथ्य में बी.आर. यादव की अध्यक्षता, राजू सिंह क्षत्री विधायक
तखतपुर एवं संतोष कौशिक जिला पंचायत सदस्य के विशिष्ट आतिथ्य में
आमसभा का आयोजन हुआ. भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर दीप प्रज्जवलन
सहित पूजा-अर्चना पश्चात अतिथियों का स्वागत समिति एवं समाज के
विशिष्टजनों द्वारा किया गया. अपने स्वागत संबोधन में समिति के अध्यक्ष
बुधराम यादव ने इस जन्मोत्सव आयोजन के निहितार्थ पर कहा कि समता,
स्नेह, समर्पण सहित अपनी परम्परा और मूल से जुड़े रहने का एक समर्थ और
प्रेरक प्रदर्शन है. मुख्य अतिथि श्री अग्रवाल ने कहा कि जहां ज्ञान और विज्ञान की पहुंच
समाधान पाने असमर्थ होती है वहीं परम शक्ति की उपस्थिति दर्ज होती है.
श्रीकृष्ण, राम, शिव, दुर्गा आदि इसी का प्रतिकात्मक स्वरूप है.
अध्यक्ष बी.आर. यादव ने कहा कि यादव समाज समय के अनुकूल विकास
की गति में ढलने प्रयासरत है. यह आयोजन उसका प्रेरक स्वरूप है. विशिष्ट
अतिथि श्री क्षत्री ने कहा कि यादव समाज प्रारंभ से एक शक्तिशाली समाज है
आज भी निरंतर बेहतर कुछ करने के लिये संकल्पबद्ध है. मैं इस समाज के
बीच अपने को पाकर हमेशा गर्व महसूस करता हूं. जिला पंचायत सदस्य
संतोष कौशिक ने कहा कि यादव समाज धन्य है जिस वंश में भगवान श्रीकृष्ण
अवतरित हुए यह आयोजन उस युगबोध का संदेश है. इस अवसर पर समाज
के विशिष्ट और वरिष्ठजनों का समिति ने अतिथियों के हाथों शाल, श्रीफल
और प्रतीक चिन्ह भेंटकर अभिनंदन किया. जिनमें सर्वप्रथम रमाशंकर यादव
से.नि. तहसीलदार, तुलाराम यादव, तिजऊराम यादव, गणेशराम यादव,
फेकूराम यादव, भंजन यादव, सिद्धाम यादव, लोरमी परिक्षेत्र नाथूराम यादव,
कुण्डा, कवर्धा, श्रीमती सरिता प्रकाश यादव पार्षद बिलासपुर थे.
आयोजन को सफल बनाने में समिति के चंद्रिका यादव, नंदकुमार यादव,
मनीराम यादव, श्रीराम यादव, दिनेश यादव, कृष्ण कुमार यादव, इं. रामलाल
यादव, अभिमन्यु यादव, सतीश यादव, परसादी यादव, भागीरथी यादव,
किशोर यादव, गिरीश यादव, विनोद यादव एवं सभी पदाधिकारीगण और
सदस्य लेग रहे.

Sunday, 11 September 2011

डॉ. यादव को प्रतिभा सम्मान

बिलासपुर. पथ शिक्षण समिति के तत्वावधान में बिलासा कला मंच के संस्थापक डॉ. सोमनाथ यादव को उनके उल्लेखनीय कार्यो पर विशिष्ट प्रतिभा सम्मान देकर अभिनंदन किया गया. डॉ. यादव का अभिनंदन विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह व अभिनंदन पत्र भेंट कर किया. श्री कौशिक ने डॉ. यादव द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों की प्रशंसा की.

Friday, 9 September 2011

छत्तीसगढ़ की लोकगाथा-लोरिक चंदा - डा. सोमनाथ यादव


छत्तीसगढ़ी लोक-साहित्य की विधाओं में लोकगाथाओं का प्रमुख स्थान है, गाथाओं का रचना काल 1100 से 1500 तक माना गया है, अतः छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं में मध्य युगीन स्थितियों का ही चित्रण मिलता है, इससे वर्णित घटनाओं के आधार पर ही इतिहासकारों ने छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं का निर्माण काल मध्ययुग माना है, इसी काल में अनेक छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं की रचना हुई तथा आज भी ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चली आ रही है,
       छत्तीसगढ़ की लोकगाथाओं के पात्र-प्रायः आदर्श के प्रतीक और लोकार्थ ’’सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ को निनादित करते हैं। आंचलिक चरित्र-सृष्टि-रंजित पात्र प्रायः जातीय गौरव और अंचल को महिमा मंडित करते हैं। अन्य लोकगाथाओं को छत्तीसगढ़ी लोकगाथाकार तभी अपनाता है, जब वह उसे अपने परिवेश व मानसिकता के अनुरूप उचित प्रतीत पाता है। लोकगाथाकार अपनी रूचित और युग के अनुसार उसमें परिवर्तन-परिवर्धन करता चला जाता है जिसमें संगीत की विविधता, नृत्य की आंशिक छटा और भाव-प्रणवता का त्रिकोणात्मक रूप उपलब्ध होता है। ’’छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं में अलौकिकता, आंचलिक देवी-देवता, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, टोटका आदि विविध रूप मिलते हैं। लोक गाथाओं की प्रवृत्ति एवं विषय की दृष्टि से डा. नरेन्द्र देव वर्मा ने छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं का 3 भागों में वर्गीकारण किया है- प्रेम प्रधान गाथाएं, धार्मिक एवं पौराणिक गाथाएं तथा वीरगाथाएं। छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं के अंतर्गत लोरिक चनैनी की गाथा अधिक प्रचलित है। छत्तीसगढ़ी गद्य में इसकी कथा को सर्वप्रथम सन् 1890 में श्री हीरालाल काव्योपध्याय ने चंदा के कहानी के नाम से प्रकाशित किया था। वही बेरियर एल्विन ने सन् 1946 में लोेकगाथा के छत्तीसगढ़ी रूप को अंग्रेजी में अनुवाद करके अपने ग्रंथ फोक सांग्स आफ छत्तीसगढ़ में उद्भूत किया है।
       लोरिक चंदा निश्चित रूप से ऐतिहासिक पात्र है। इस तथ्य के प्रमाण में यह तर्क दिया जा सकता है कि लोक में रचे-बसे होने के कारण और छत्तीसगढ़ में इसकी गाथा और स्थान नामों के संदर्भ में लोकमानस आस्थावान है। ऐसा लगता है इसकी मूलकथा और घटना-प्रसंग छत्तीसगढ़ की ही है। मैं जब इस लोकगाथा के संकलन-संपादन के मध्य अन्वेषण-यात्रा में संलग्न था, तब लोकगाथा गायकों के अतिरिक्त अनेक लोकसाहित्य-मर्मज्ञों, लोककलाकारों ने यह राय दी कि रायपुर जिलांतर्गत आरंग एवं रींवा और उसके मध्य की लीलाभूमि ’’लोरिक चंदा’’ के प्रेम प्रसंग की साक्षी है। वास्तव में स्थान-नाम में निहित घटना-कथा ही जनश्रुति और लोककथा बनकर लोकमानस में प्रचलित और प्रतिष्ठित होती है। इसे इतिहास ना मानकर केवल कल्पना की सामग्री समझना गलत है। जिस तथ्य को लोग अनेक पीढ़ियों से मान रहे है और युग उसे गाथा-रूप में स्वीकृत कर रहे हैं। वह लोकगाथा अथवा साहित्य कदापि भ्रामक नहीं हो सकता। वास्तव में लोरिक चंदा की गाथा छत्तीसगढ़ी लोकमानस के लिए वह प्रेरक प्रसंग है जिसे चमत्कार बुद्धि का पुट देकर अलौकिक बनाया गया है।
       लोरिक और चंदा की कहानी लोकगीत के मादक स्वरों में गूंथी हुई है जिसे अंचल के लोग ’’चंदैनी’’ कहते है। चंदैनी से पता चलता है कि रींवा लोरिक का मूल गांव था या कम से कम इस गांव से उसका गहरा संबंध था। चंदैनी का एक टुकड़ा ही प्रमाण स्वरूप है-
बारह पाली गढ़ गौरा, सोलह पाली दीवना के खोर
अस्सीपाली पाटन, चार पाली गढ़ पिपही के खोर
चंदैनी लोकगीत नाट्य ही लोरिक चंदा और रींवा के गहरे संबंध का पुखता ऐतिहासिक प्रमाण है। अगर गहरी पुरातात्वीय पड़ताल हो तो संभव है और प्रमाण मिले। अस्तु यह निश्चिित है रींवा लोरिक नगर था। लोकगीतात्मकता प्रणय गाथा चंदैनी तथा कुछ और माध्यमों से इतिहास के जो पन्ने खुलते है, उनके अनुसार-वर्तमान मे आरंग विकासखंड मुख्यालय है। यह रायपुर जिले के तहत है और राजमार्ग क्रमांक छह पर स्थित है। इसके नामकरण के संबंध में यह जनयुक्ति प्रचलित है कि यह राजा मोरध्वज का नगर था। उनकी भगवान श्रीकृष्ण ने परीक्षा ली थी। इस महादानी राजा ने भगवान और उनके साथ आये भूखे शेर को जो छद्म रूप था- अपना पुत्र ही दान कर दिया गया। राजा ने अतिथियों के मांग पर स्वयं अपनी धर्मपत्नी सहित पुत्र को आरे से चीरकर उसका भोजन बनाया। चूंकि आरे से राजा  मोरध्वज को अपने पुत्र को चीरना पड़ा था, अतएव उसी वक्त इस नगर का नाम ‘‘आरंग’’ पड़ा। मगर लोरिकचंदा की कथा के अनुसार आरंग का पूर्वनाम ‘‘गढ़गौरा’’ था, यहां राजा महर का राज्य था। राजा महर के चार पुत्र क्रमशः इदेचंद्र, बिदेचंद, महादेव और सहदेव थे। राजा की एकमात्र पुत्री चंदा थी जो सबकी लाडली थी। ग्राम रीवां गढ़गोरा के राजा महर के अधीन था। चूंकि रींवा आरंग से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, अतएव यह संभव प्रतीत होता है।
         कथानुसार एक रोज पनागर नामक राज्य से बोड़रसाय अपनी पत्नी बोड़नीन तथा भाई कठावत और उसकी पत्नी खुलना के साथ गढ़गौरा अर्थात् आरंग आयें। उन्होंने राजा महर को एक ‘‘पॅंड़वा’’ (भैंस का बच्चा) जिसका नाम सोनपड़वा रखा गया था, भेंट किया, इस भेंट से राजा महर अति प्रसन्न हुए और बोड़रसाय को बदले में रीवां राज्य दे दिया। बोड़रसाय राऊत अपने परिवार सहित रींवा राज्य में राज करने लगा। इसी बोड़रसाय का एक पुत्र था- बावन और सहोदर का पुत्र था-लोरिक। संयोग की बात है कि राजा महर की लाडली बेटी और बोड़रसाय का पुत्र बावन हम उम्र थे। राजा महर ने बावन की योग्य समझकर चंदा से उसका विवाह कर किया, पर कुछ समय व्यतीत हो पाया था कि बावन किसी कारणवश नदी तट पर तपस्या करने चला गया (संभवतः बावन निकटस्थ महानदी पर तपस्थार्थ गया हो) उधर राजा महर का संदेश आया कि चंदा का गौना करा कर उसे ले जाओ। इस विकट स्थिति में राजा बोड़रसाय को कुछ सूझ नहीं रहा था। अंततः इस विपदा से बचने का उन्हें का ही उपाय नजर आया। लोरिक, जो कि बावन का चचेरा भाई था, दूल्हा बनाकर गौना कराने भेज दिया। लोकगीत नाट्य चंदैनी में लोरिक का रूप बड़ा आकर्षण बताया गया है। लोरिक सांवले बदन का बलिष्ठ शरीर वाला था। उसके केश घुंघराले थे, वह हजारों में अलग ही पहचाना जाता था। लोरिक गढ़गौरा चला गया और सभी रस्मों को निपटाकर वापसी के लिए चंदा के साय डोली में सवार हुआ। डोली के भीतर जब चंदा ने घूंघट हटाकर अपने दूल्हे को निहारा तो उसके रूप में एक अज्ञात व्यक्ति को देखकर वह कांप उठी। चंदा इतनी भयभीत हो गई कि वह तत्क्षण डोली से कूदकर जंगल की ओर भाग गयी। लोरिक भी घबरा गया और चंदा के पीछे भागा। उसने चंदा को रोका और अपना परिचय दिया। अब जब संयत होकर चंदा ने लोरिक को देखा, तब वह उस पर मुग्ध हो गयी। लोरिक सीधे उसके मन में समाता चला गया। लोरिक का भी लगभग यही हाल था। यह चंदा के धवल रूप को एकटक देखता रहा गया। दोनों अपनी समस्या भूलकर एक-दूसरे के रूप-जाल में फंस गये। वही उनके कोमल और अछूतेे मन में प्रणय के बीच पड़े। दोनों ने एक दूसरे से मिलने का और सदा संग रहने का वचन किया।
          लोरिक चंदा में महाकाव्य-सदृश मंगलाचरण से गाथा का प्रारंभ होता है। कवि इस लोकगाथा के माध्यम से सरस्वती और उसकी बहन सैनी का स्मरण करते है। उनके अनुसार सरस्वती को नारियल और गुड़ तथा सती सैनी को काजल की रेख भेंट करेगा-
सारद सैनी दोनों बहिनी ये रागी,
नइते कउन लहुर कउन जेठ
कौन ला देवउ मेहा गुड़ अउ नरियर
कोने काजर के रेख
मइया ल देवंव मेहा गुड़ अउ नरियर
सति काजर के रेख।
गुरू बैताल और चौसठ जोगिनी के साथ ठाकुर देवता, साहड़ा देवता को उनके रूचि के अनुरूप लोकगाथाकार संतृप्त करना चाहता है-
अखरा के गुरू बैताले ला सुमरो,
नइते पल भर सभा म चले आव,
चौसठ जोगिनी जासल ला सुमरव,
नइते भुजा में रहिबे सहाय,
गांव के ठाकुर देवता ला सुमरव
नइते पर्रा भर बोकरा ला चढ़ाव
गांव के साहड़ा देवता ला सुमरव
नइते कच्चा गो-रस चड़ाव,
             इसके बाद लोक गाथाकार आत्मनिवेदन का आश्रय-ग्रहण करता है, वह लोरिक चंदा की सुरम्य प्रणय गाथा को सुखे मीठे गुड़ अथवा गन्ने के रस की तरह अत्यन्त मीठा एवं सरस स्वीकारता है। यह सुन्दर गाथा जो कोई भी श्रोता श्रवण करेगा। वह प्रेम के पावन सरिता में अवगाहन करके जीवन की जटिलता दूर कर सकने में समर्थ होगा-
खावत मीठ गुड़ सुखरी ये रागी
नइते चुहकत मीठ कुसियार,
सुनत मीठ मोर चंदैनी ये रागी,
नइते कभुना लागे उड़ास
लोकगाथाएं मंगलाचरण के पश्चात् प्रबंध-काव्य-सदृश आत्मनिवेदन की शैली में गाथाओं की विशिष्टता को सूत्रपात के रूप में प्रस्तुत करता है। उसके द्वारा प्रयुक्त उपमान आंचलिक और मौलिक ही नहीं, अपितु लोक से रचे-बसे भी हैं। इसके पश्चात् कथा की शुरूआत को लोकगाथाकार बहुत ही सहज, सरल ढंग से प्रस्तुत करता है-
राजा महर के बेटी ये ओ
लोरिक गावत हंवव चंदा
ये चंदा हे तोर
मोर जौने समे के बेटा म ओ
लोरिक गावत हंवव चंदा
ये चंदा हे तोर।
           प्रायः समीक्षक लोरिक चंदा को वीराख्यानक लोकगाथा के अंतर्गत स्वीकार करते हैं। यदि लोरिक केवल वीर चरित्र होता तो इसे राजा या सामंत वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित किया जाता। महाकाव्य अथवा लोकगाथाओं में वीर लोकनायक प्रायः उच्च कुल अथवा नरेशी होते हैं। इस आधार पर लोरिक वीर होते हुए भी सामान्य यदुवंशियों के युद्ध कौशल का प्रतीक है। उसके रूप और गुण से सम्मोहित राजकुमारी चंदा अपने पति और घर को त्यागकर प्रेम की ओर अग्रसित होती है। इस दोनों के मिलन में जो द्वन्द और बंधन है, उसे पुरूषार्थ से काटने का प्रयास इस लोकगाथा का गंतव्य है। इस आधार पर उसे प्रेमाख्यानक लोकगाथा के अंतर्गत सम्मिलित करना समीचीन प्रतीत होता है।
            उपर्युक्त गाथाओं से स्पष्ट है कि लोरिक चंदा की गाथा अत्यंत व्यापक एवं साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यद्यपि इसे अहीरों की जातीय धरोहर माना जाता है तथापि यह संपूर्ण हिन्दी प्रदेश की नहीं वरन् दक्षिण भारत में भी लोकप्रिय एवं प्रचलित है। श्री श्याम मनोहर पांडेय के अनुसार - ‘‘बिहार में मिथिला से लेकर उत्तरप्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसके गायक अभी भी जीवित है’’ वे प्रायः अहीर है जिनका मुख्य धंधा दूध का व्यापार और खेती करना है। लोरिक की कथा लोकसाहित्य की कथा नहीं है, बल्कि इस कथा पर आधारित साहित्यिक कृतियां भी उपलब्ध है। विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित ‘‘लोरिकी’’ लोकगाथा के नाम एवं कथा में अंतर सर्वाधिक व्यापक रूप से ‘‘भोजपुरी’’ में उपलब्ध होता है जहां यह लोकगाथा चार खंडों में गायी जाती है। ‘‘लोरिक’’ की लोकगाथा का दूसरा भाग, ‘‘लोरिक एवं चनवा का विवाह’’ भोजपुरी क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों में भी प्रचलित है। मैथिली और छत्तीसगढ़ी प्रदेशों में तो यह अत्यधिक प्रचलित है। विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित ‘‘लोरिकी’’ की कथा में परिलक्षित साम्य-वैषम्य अधोलिखितानुसार है-
‘‘भोजपुरी रूप में चनवा का सिलहर (बंगाल) से लौटकर अपने पिता के घर गउरा आना वर्णित है। छत्तीसगढ़ी रूप में भी यह समादृत है, परन्तु कुछ विभिन्नताएं है। इसमें चनैनी का अपने पिता के घर से पति वीरबावन के घर लौटना वर्णित है। अन्य रूपों में यह वर्णन अलभ्य है।’’
         भोजपुरी रूप में चनैनी को मार्ग में रोककर बाठवा अपनी पत्नी बनाना चाहता है, परन्तु वह किसी तरह गउरा अपने पिता के घर पहुंच जाती है। बाठवा गउरा में आकर उसको कष्ट देता है, राजा सहदेव भी बाठवा से डरता है। मंजरी के बुलाने पर लोरिक पहुंचता है और बाठवा को मार भगाता है। जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं।
         छत्तीसगढ़ी रूप में यह कथा वर्णित है परन्तु उसमें थोड़ा अंतर है महुआ (बाठवा) मार्ग में चनैनी को छेड़ता है। लोरिक वहां आकर उसे मार भगाता है। लोरिक की वीरता देखकर वह मोहित हो जाती है, लोरिक को वह अपने महल में बुलाती है। शेष अन्य रूपों में वह वर्णन नहीं मिलता।
         भोजपुरी में राजा सहदेव के यहां भोज है, चनवा लोरिक को अपनी ओर आकर्षित करती है, रात्रि में लोरिक रस्सी लेकर चनवा के महल के पीछे पहुंचता है, जहां दोनों का मिलन वर्णित है। छत्तीसगढ़ में भोज का वर्णन नहीं मिलता, परन्तु रात्रि में लोरिक उसी प्रकार रस्सी लेकर जाता है और कोठे पर चढ़ता है तथा दोनों मिलकर एक रात्रि व्यतीत करते है।
        श्री हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी कथायान ‘‘लोरिक’’ में भी इसका वर्णन है परन्तु कुछ भिन्न रूप में इसमें चंदा (चनैनी) का पति वीरबावन महाबली है, जो कुछ महीने सोता और छह महीने जागता है। उसकी स्त्री चंदा, लोरी से प्रेम करने लगती है, वह उसे अपने महल में बुलाती है और स्वयं खिड़की से रस्सी फेंककर ऊपर चढ़ाती है। मैथिली तथा उत्तरप्रदेश की गाथा में यह वर्णन प्राप्त नहीं होता।
       भोजपुरी लोकगाथा में रात्रि व्यतीत कर जब लोरिक चनैनी के महल सें जाने लगता है। तब अपनी पगड़ी के स्थान पर चनैनी का चादर बांधकर चल देता है। धोबिन उसे इस कठिनाई से बचाती है। वेरियर एल्विन द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी रूप में यह वर्णन नहीं है परन्तु काव्योपाध्याय द्वारा प्रस्तुत गाथा में यह अंश उसी प्रकार वर्णित है। शेष अन्य रूपों में यह वर्णन नहीं मिलता।
         चनैनी के बहुत मनाने पर लोरिक का हरदी के लिए पलायन की घटना सभी क्षेत्रों की गाथा में उपलब्ध है।
लोरिक को मार्ग में मंजरी और संवरू रोकते है। छत्तीसगढ़ी रूप में भी यह वर्णित है, परन्तु केवल संवरू का नाम आता है। शेष रूपों में यह नहीं प्राप्त होता है।
        भोजपुरी रूप में लोरिक मार्ग में अनेक विजय प्राप्त करता है तथा महापतिया दुसाध को जुए और युद्ध में भी हराता है, छत्तीसगढ़ी तथा अन्य रूपों में इसका वर्णन नहीं हैं।
       भोजपुरी में लोरिक अनेक छोटे-मोटे दुष्ट राजाओं को मारता है, मार्ग में चनवा को सर्प काटता है, परन्तु वह गर्भवती होने के कारण बच जाती है। बेरियर एल्विन द्वारा संपादित छत्तीसगढ़ी में लोरिक को सर्प काटता है तथा चनैनी शिव पार्वती से प्रार्थना करती है। लोरिक पुनः जीवित हो जाता है। शेष रूपों में यह वर्णन नहीं प्राप्त होता।
भोजपुरी के अनुसार लोरिक की हरदी के राजा महुबल से बनती नहीं थी। महुबल ने अनेक उपाय किया, परन्तु लोरिक मरा नहीं। अंत में महुबल ने पत्र के साथ लोरिक की नेवारपुर ‘‘हरवा-बरवा’’  दुसाध के पास भेजा। लोरिक वहां भी विजयी होता है। अंत में महुबल को अपना आधा राजपाट लोरिक को देना पड़ता है और मैत्री स्थापित करनी पड़ती है।
        मैथिली गाथा के अनुसार हरदी के राजा मलबर (मदुबर) और लोरिक आपस में मित्र है। मलबर अपने दुश्मन हरबा-बरवा के विरूद्ध सहायता चाहता है। लोरिक प्रतिज्ञा करके उन्हें नेवारपुर में मार डालता है।
       एल्विन द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी रूप में यह कथा विशिष्ट है इसमें लोरिक और करिंधा का राजा हारकर लोरिक के विरूद्ध षड़यंत्र करता है और उसे पाटनगढ़ भेजना चाहता है। लोरिक नहीं जाता।
      भोजपुरी रूप में कुछ काल पश्चात् मंजरी से पुनः मिलन वर्णित है। छत्तीसगढ़ी रूप में हरदी में लोरिक के पास मंजरी की दीन-दशा का समाचार आता है। लोरिक और चनैनी दोनों गउरा लौट आते है। उत्तरप्रदेश के बनारसी रूप में भी लोरिक अपनी मां एवं मंजरी की असहाय अवस्था का समाचार सुनकर चनैनी के साथ गउरा लौटता है। शेष रूपों में यह वर्णन नहीं मिलता।
         भोजपुरी रूप सुखांत है, इसमें लोरिक अंत में मंजरी और घनवा के साथ आनंद से जीवन व्यतीत करते है। मैथिली रूप में भी सुखांत है परन्तु उसमें गउरा लौटना वर्णित नहीं है। एल्विन द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी रूप में लोरिक अपनी पत्नी व घर की दशा से दुखित होकर सदा के लिए बाहर चला जाता है। छत्तीसगढ़ में काव्योपाध्याय द्वारा प्रस्तुत रूप का अंत इस प्रकार से होता है-
         लोरी चंदा के साथ भागकर जंगल के किले में रहने लगता है। वहां चंदा का पति वीरबावन पहुंचता है। उससे लोरी का युद्ध होता है। वीरबावन हार जाता है और निराश होकर अकेले गउरा में रहने लगता है।
        लोकगाथा के बंगला रूप में वर्णित ‘‘लोर’’, मयनावती तथा चंद्राली वास्तव में भोजपुरी के लोरिक मंजरी और चनैनी ही है। बावनवीर का वर्णन छत्तीसगढी़ रूप में भी प्राप्त होता है। बंगला रूप में चंद्राली को सर्प काटता है। भोजपुरी रूप में भी गर्भवती चनैनी को सर्प काटता है। दोनों रूप में वह पुनः जीवित हो जाती है। बंगला रूप में मयनावती के सतीत्व का वर्णन है। भोजपुरी में भी मंजरी की सती रूप में वर्णन किया गया है। लोकगाथा का हैदराबादी रूप छत्तीसगढ़ी के काव्योपाध्य के अधिक साम्य रखता है।
          श्री सत्यव्रत सिन्हा द्वारा उल्लेखित उपर्युक्त साम्य वैषम्य के सिवाय भी लोरिक लोकगाथा में कतिपय अन्य साम्य वैषम्य भी परिलक्षित होते है। यथा-गाथा के भोजपुरी रूप में मंजरी द्वारा आत्महत्या करने तथा गंगामाता द्वारा वृद्धा का वेष धारण कर मंजरी को सांत्वना देने, गंगा और भावी (भविष्य) का वार्तालाप, भावी का इन्द्र एवं वशिष्ठ के पास जाना आदि घटनाओं का वर्णन है जो गाथा के अन्य रूपों में प्राप्त नहीं है। इसी प्रकार मंजरी के मामा शिवचंद एवं राजा सहदेव द्वारा मंजरी के बदले चनवा के साथ विवाह करने पर दुगुना दहेज देने का वर्णन अन्य क्षेत्रों के ‘‘लोरिक’’ में अप्राप्त है।
        ‘‘लोरिक’’ लोकगाथा के बंगाली रूप में एक योगी द्वारा चंद्राली के रूप में वर्णन सुनकर उसका चित्र देखकर लोरिक को चंद्राली के प्रति आसक्त चित्रित किया गया है। यहां बावनवीर (चंद्राली का पति) को नपुंसक बताया गया है। मैनावती पर राजकुमार दातन की अनुरक्ति तथा उसे प्राप्त करने के लिए दूतियों को भेजने का वर्णन है तथा मैनावती द्वारा शुक्र और ब्राम्हण द्वारा लोरिक के पास संदेश प्रेषित करने का वर्णन प्राप्त होता है जो कि अन्य लोकगाथाओं में नहीं है। गाथा के हैदराबादी रूप में ही बंगाली रूप की भांति उस देश के राजा का मैना पर मुग्ध होना वर्णित है।
       ‘‘लोरिक’’ गाथा के उत्तरप्रदेश (बनारसी रूप) में प्रचलित चनवा द्वारा लोरिक को छेड़खानी करने पर अपमानित करना तथा बाद में दोनों का प्रेम वर्णित है। इस प्रकार लोरिक द्वारा सोलह सौ कन्याओं के पतियों को बंदी जीवन से मुक्त कराने का वर्णन है, जो अन्य क्षेत्रों के ‘‘लोरिक’’ लोकगाथा में   उपलब्ध नहीं है। गाथा के छत्तीसगढ़ी रूप में चनैनी और मंजरी दोनों सौत के बीच मार-पीट एवं विजयी मंजरी द्वारा लोरिक के स्वागतार्थ पानी लाने तथा पानी के गंदला होने पर लोरिक का विरक्त होकर घर छोड़ चले जाने का वर्णन है, आज के इस प्रगतिशील दौर में भी जब प्रेमी हृदय समाज के कठोर-प्रतिबंध तोड़ते हुए दहल जाते है। तब उस घोर सामंतवादी दौर में लोरिक और चंदा ने सहज और उत्कृष्ट प्रेम पर दृढ़ रहते हुए जाति, समाज, धर्म और स्तर के बंधन काटे थे। लोरिक चंदा छत्तीसगढ़ी लोकमानस का लोकमहाकाव्य है जिसे प्रेम और पुरूषार्थ की प्रतिभा के रूप में छत्तीसगढ़ी जन प्रतिष्ठित किये हुये है। इसलिए वे आज  छत्तीसगढ़ के आदर्श प्रेमी है और गीत बनकर लोगों के हृदय में राज कर रहे हैं।
डा. सोमनाथ यादव
1. प्रेस क्लब भवन,
ईदगाह मार्ग, बिलासपुर (छ.ग.)

Sunday, 28 August 2011

Master - Abhishek Yadav
Bilaspur (chhattisgarh)


बिलासपुर. जन्माष्टमी महोत्सव 22 अगस्त 2011

शोभा यात्रा में उपस्थित युवा साथी.

बिलासपुर. जन्माष्टमी महोत्सव 22 अगस्त 2011

 यादव समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम में युवा साथी और कालिया मर्दन का दृश्य.

बिलासपुर. जन्माष्टमी महोत्सव 22 अगस्त 2011

 यादव समाज द्वारा आयोजित शोभा यात्रा में भगवान श्री कृष्ण और बलराम की वेशभूषा में बालक
 

बिलासपुर. जन्माष्टमी महोत्सव 22 अगस्त 2011

 यादव समर द्वारा आयोजित रैली एवम शोभायात्रा में शामिल यादव  समाज के युवा भाई.

Monday, 22 August 2011

श्री कृष्ण के मार्ग को अपनाने की आवश्यकता-अमर

बिलासपुर जिला यादव समाज द्वारा आयोजित दो दिवसीय श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव व शोभायात्रा का हुआ समापन
बिलासपुर.  श्री कृष्ण ने कर्म का संदेश दिया और विश्व ने उनके चरित्र को अपनाया एेसे भगवान के वंशजों के द्वारा जन्माष्टमी मनाया जाता है. इसके लिये यादव समाज बधाई के पात्र है. उक्त उद्गार जिला यादव समाज द्वारा आयोजित श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव के समापन समारोह में मुख्य अतिथि अमर अग्रवाल ने व्यक्त की.
उन्होंने श्री कृष्ण के चरित्र तथा उनके द्वारा बताए मार्ग अपनाने की आवश्यकता प्रतिपादित की इस अवसर पर श्री अग्रवाल ने यादव भवन के द्वितीय तल पर कमरे निर्माण के लिये आॢथक सहयोग देने की घोषणा की वहीं समाज के पूर्व अध्यक्ष स्व. मटरू लाल यादव पूर्व पार्षद की स्मृति में जूना बिलासपुर स्थित उद्यान को विकसित कर
नामकरण करने की घोषणा की समारोह समारोह में अतिथि के रूप में रामदेव कुमावत
बेदराम यादव, डा. मंतराम यादव रेवाराम यादव डा. आर. यादव उपस्थित थे. स्वागत
भाषण कार्यकारी अध्यक्ष रामशरण यादव व शोभायात्रा प्रमुख शैलेंद्र यादव एवं महिला
विंग अध्यक्ष श्रीमती अहिल्या यादव ने दिया. कार्यक्रम की जानकारी देते हुए संयोजक
डा. सोमनाथ यादव ने बताया कि गत 27 वर्षो से श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव समाज
द्वारा बड़े ही गरिमामय से आयोजित किया जा रहा है.
इसके पूर्व शोभायात्रा का प्रारंभ राघवेंद्र राव सभा भवन से हुआ जो सदर बाजार गोल
बाजार तेलीपारा बस स्टैंड होते हुए श्री कृष्ण धाम यादव भवन पर समापन हुआ.
शोभायात्रा में झांकियों के साथ बिलासपुर सहित लोरमी बिल्हा मुंगेली तखतपुर कोटा
मस्तूरी बेलतरा विधानसभा के महिला पुरूष एवं युवकों की टोली शामिल थी. समारोह
बड़े बुजुर्गों का अभिनंदन किया गया. उनमें सर्वश्री रेवाराम यादव मस्तूरी, भीम यादव घुरू
तिलक यादव केकती श्रीमती उर्मिला यादव सरकंडा, श्रीमती त्रिवेणी यदुराज
कस्तूरबानगर नगर प्रमुख है.
समारोह में प्रतिभावान छात्र-छात्राओं का सम्मान तथा विभिन्न प्रतिस्पर्धा के प्रतिभागियों
को पुरस्कृत किया गया. समारोह का संचालन डा. सोमनाथ यादव ने तथा आभार श्रीमती
अन्नपूर्णा यादव ने किया. इस अवसर पर प्रमुख रूप से रामचरण यादव, रामकुमार यादव,  तेरस यादव,
शरद यादव, विजय यादव, जसवंत यादव, अश्विनी यादव , रामप्रकाश यादव, रामपुरी यादव,  सनत यादव, कुलदीप , यादव सुशील यादव, भैय्याराम यादव, तेजनाथ यादव , सुकुमार यादव , एल.पी. यादव. संतोष, यादव विकास, प्रकाश यादव , विनोद यादव, भागवत यादव , गोपाल यादव ,शिव यादव, सतीश यादव , प्रमोद यादव , बालाराम यादव , नवीन यादव, मयंक यादव , चितरंजन यादव , संजय यादव, नन्हूरामयादव , महेंद्रयादव , दुर्गेश यादव, मनहरण यादव, देवीशंकर यादव , मनोज यादव, अनिल यादव, श्रीमती विद्या, पूणमा, मंजू, त्रिवेणी, सरोज, ललित यादव देवी , यादवमुन्नी, ममता, कविता समस्त यादव बंधु-बांधव सहित समाज के हजारों लोग उपस्थित थे.

Sunday, 21 August 2011

देश की पहली सरकार जिसके मंत्री, सांसद जेल में : यादव

रायपुर. भाजपा के राष्ट्रीय सचिव भूपेन्द्र यादव ने रविवार को यहां कहा कि आजादी के बाद केन्द्र की यूपीए सरकार एेसी पहली सरकार है जिसके मंत्री और सांसद भ्रष्टाचार के आरोप में लगातार जेल भेजे जा रहे हैं. इस भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता लोकतंत्र की लड़ाई लड़ रही है.
बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार एवं विदेशों में जमा कालेधन की वापसी की मांग को लेकर शहर जिला भाजपा द्वारा राजधानी के बूढ़ापारा इंडोर स्टेडियम में आयोजित हॉल मीटिंग
को सम्बोधित करते हुए श्री यादव ने कहा कि देश में पुन: नवनिर्माण का दौर प्रारंभ हो
चुका है. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी कांग्रेस सरकार देश की आम
जनता के आंदोलन से घबराई हुई है. जनता की आवाज को कुचलने पर आमादा है. वहीं
वर्तमान यूपीए सरकार की राजनीतिक अपरिपक्वता तथा अदूरदर्शिता पर मुहर लगी है.
यह आश्चर्य की बात है कि सरकार के सभी मंत्री दिल्ली पुलिस की आड़ में अपना
चेहरा छुपाने लगे हैं. आखिर एेसी सरकार शासन करने में कैसे समर्थ हो सकती है जो
देश में उबाल लाने के घटनाक्रम से मुंह मोड़ती नजर आए. यह सुखद संयोग है कि देश
में आजादी के बाद पुन: नवनिर्माण का दौर प्रारंभ हुआ है.

Saturday, 13 August 2011

मुलायम सिंह यादव का अखाड़ा पूरा देश

सत्तर साल के हो चुके मुलायम सिंह यादव छोटे कद के जरूर है मगर एक जमाने में अच्छे खासे पहलवान हुआ करते थे। अखाड़े में अपने से दुगुने कद के लोगों को धोबी पाट दांव लगा कर चित कर दिया करते थे और कई दंगलों के वे विजेता हैं। राजनीति में तो वे बहुत बाद में आए। इसके पहले एक स्कूल में पढ़ाया करते थे। संयोग की बात यह है कि मेरी खेती और गांव ग्राम नगला सलहदी, ब्लॉक जसवंत नगर, जिला इटावा में ही हैं और अब फाइव स्टार बन चुका भारत का एक मात्र गांव सैफई सिर्फ एक कोस दूर है। उस जमाने में सैफई भी हमारे नगला सलहदी की तरह बीहड़ी गांव था जहां किसी की छत किसी के आंगन के बराबर होती थी और पानी की कमी दूर करने के लिए गंगा नहर बनाई गई थी। मुलायम सिंह उस जमाने में साइकिल पर चलते थे जो अब उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह हैं। राजनीति में उनकी शुरूआत, उनका आधिकारिक जीवन परिचय कुछ भी कहे, सहकारी बैंक की राजनीति से हुई थी। सैफई और नगला सलहदी दोनों का रेलवे स्टेशन बलरई है जहां अभी कुछ साल पहले थाना बना है वरना रपट दर्ज करवाने के लिए जसवंत नगर जाना पड़ता था। बलरई में सहकारी बैंक खुली। ये चालीस साल पुरानी बात है। मास्टर मुलायम सिंह चुनाव में खड़े हुए और इलाके के बहुत सारे अध्यापकों और छात्रों के माता पिताओं को पांच पांच रुपए में सदस्य बना कर चुनाव भी जीत गए। उनके साथ बैंक में निदेशक का चुनाव मेरे स्वर्गीय ताऊ जी ठाकुर ज्ञान सिंह भी जीते थे। चुनाव के बाद जो जलसा हो रहा था उसमें गोली चल गई। मुलायम सिंह यादव और मेरे ताऊ जी बात कर रहे थे और छोटे कद के थे इसलिए गोली चलाई तो मुलायम सिंह पर गई थी मगर पीछे खड़े एक लंबे आदमी को लगी जो वहीं ढेर हो गया। इस घटना का वर्णन मुलायम सिंह यादव की किसी भी जीवनी में नहीं मिलेगा। सहकारी बैंक में उस समय पचास साठ हजार रुपए होंगे। तीन लोगों का स्टाफ था। चपरासी और कैशियर एक ही था। मैनेजर पार्ट टाइम काम करता था और निदेशकों की तरफ से नियुक्त एक साहब लेखाधिकारी बनाए गए थे जो चूंकि बैंक में सोते भी थे इसलिए चौकीदारी का भत्ता भी उन्हें मिलता था। इसके बाद मुलायम सिंह जसवंत नगर और फिर इटावा की सहकारी बैंक के निदेशक चुने गए। विधायक का चुनाव भी सोशलिस्ट पार्टी और फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से लड़ा और एक बार जीते भी। स्कूल से इस्तीफा दे दिया था। पहली बार मंत्री बनने के लिए मुलायम सिंह यादव को 1977 तक इंतजार करना पड़ा जब कांग्रेस विरोधी लहर में उत्तर प्रदेश में भी जनता सरकार बनी थी। 1980 में भी कांग्रेस की सरकार में वे राज्य मंत्री रहे और फिर चौधरी चरण सिंह के लोकदल के अध्यक्ष बने और विधान सभा चुनाव हार गए। चौधरी साहब ने विधान परिषद में मनोनीत करवाया जहां वे प्रतिपक्ष के नेता भी रहे। आज मुलायम सिंह यादव धर्म निरपेक्षता के नाम पर भाजपा को उखाड़ फेकना चाहते हैं। लेकिन पहली बार 1989 में वे भाजपा की मदद से ही मुख्यमंत्री बने थे। उस समय लाल कृष्ण आडवाणी का राम जन्मभूमि की आंदोलन और उनकी रथ यात्रा चल रही थी और मुलायम सिंह ने घोषणा की थी कि वे यात्रा को किसी हाल में अयोध्या नहीं पहुंचने देंगे। लालू यादव ने उत्तर प्रदेश पहुंचने से पहले ही आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई और मुलायम सिंह यादव ने चंद्रशेखर के जनता दल समाजवादी की सदस्यता ग्रहण की और कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने रहे। कांग्रेस ने अप्रैल 1991 में समर्थन वापस ले लिया। उत्तर प्रदेश में मध्याबधी चुनाव हुए और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री नहीं रह पाए। उनकी जगह कल्याण सिंह ने ले ली। सात अक्तूबर 1992 को मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई। कम लोगों को याद होगा कि 1993 में मुलायम सिंह यादव बहुजन समाज पार्टी के साथ मिल कर उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़े थे। हालाकि यह मोर्चा जीता नहीं लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी सरकार बनाने से चूक गई। मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस और जनता दल दोनों का साथ लिया और फिर मुख्यमंत्री बन गए। उस समय उत्तराखंड का आंदोलन शिखर पर था और आंदोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर में गोलियां चलाई गई जिसमें सैकड़ों मौते हुई। उत्तराखंड में आज तक मुलायम सिंह को खलनायक माना जाता है। जून 1995 तक वे मुख्यमंत्री रहे और उसके बाद कांग्रेस ने फिर समर्थन वापस ले लिया। 1996 में मुलायम सिंह यादव ग्यारहवी लोकसभा के लिए मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुने गए थे और उस समय जो संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी उसमें मुलायम सिंह भी शामिल थे और देश के रक्षा मंत्री बने थे। यह सरकार बहुत लंबे समय तक चली नहीं और सच यह है कि मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने की भी बात चली थी मगर लालू यादव ने इस इरादे पर पानी फेर दिया। इसके बाद चुनाव हुए तो मुलायम सिंह संभल से लोकसभा में लौटे। असल में वे कन्नौज भी जीते थे मगर वहां से उन्होंने अपने बेटे अखिलेश को सांसद बना दिया। अब तक मायावती मुलायम सिंह यादव की घोषित दुश्मन बन चुकी थी। 2002 में भाजपा और बहुजन समाज पार्टी ने मायावती के साथ मिल कर सरकार बनाई जो डेढ़ साल चली और फिर भाजपा इससे अलग हो गई। मुलायम सिंह यादव तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और विधायक बनने के लिए उन्होंने 2004 की जनवरी में गुन्नौर सीट से चुनाव लड़ा जहां वे रिकॉर्ड बहुमत से जीते। कुल डाले गए वोटों में से 92 प्रतिशत उन्हें मिले थे जो आज तक विधानसभा चुनाव का रिकॉर्ड है। मुलायम सिंह यादव ने लंबा सफर किया है, बार बार साथी बदले हैं, बार बार साथियों को धोबी पाट लगाया है मगर राजनीति वे दंगल की शैली में ही करते हैं। अब उनका अखाड़ा पूरा देश है और इस अखाड़े में उनका उत्तराधिकारी बनने की प्रतियोगिता भी शुरू हो गई है। उत्तराधिकारियों की कमी नहीं हैं क्योंकि मुलायम सिंह यादव परिवार का हर वह सदस्य जो चुनाव लड़ सकता है, राजनीति में हैं और उत्तराधिकारी होने का दावेदार है।
आलोक तोमर

स्पोर्ट्स-एडवेंचर में नाम कमाते यदुवंशी


खेल एवं एडवेंचर की दुनिया में भी यदुवंश के तमाम खिलाड़ी अपना डंका बजा रहे हैं। क्रिकेट के क्षेत्र में एन० शिवलाल यादव, हेमू लाल यादव, विजय यादव, ज्योति यादव, जे0पी0 यादव और उमेश यादव ने देश को गौरवान्वित किया तो आज हरियाणा की अण्डर-19 किक्रेट टीम के कोच विजय यादव, उ0प्र0 की अण्डर-16 किक्रेट टीम के कोच विकास यादव जैसे तमाम नए नाम उभर रहे हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष एन० शिव लाल यादव, दक्षिण ज़ोन का प्रतिनिधित्व करते हैं और सीनियर टूर्नामेंट कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। दक्षिण ज़ोन की महिला समिति में विद्या यादव भी शामिल हंै ज़ो कि आई०सी०सी० महिला टी-20 विश्व कप क्रिकेट की टीम मैनेजर भी रहीं। भारत की टेस्ट और वन डे टीम में खेल चुके विजय यादव 1996 से क्रिकेट कोचिंग दे रहे हैं। उन्हें बीसीसीआई की तरफ से विकेट कीपिंग एकेडमी का कोच भी नियुक्त किया गया है। आई0पी0एल0 के विभिन्न सत्रों में भी विभिन्न यादव क्रिकेट हेतु चयनित हुए। लालू यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव का चयन अण्डर-19 किक्रेट टीम हेतु किया गया एवं आई0पी0एल0-20 कप के प्रथम सत्र में डेयर डेविल्स (दिल्ली) टीम में चयनित किया गया, दुर्भाग्यवश उन्हें खेलने का मौका नहीं मिला। इसी प्रकार पूर्व टेस्ट खिलाड़ी एन० शिव लाल यादव के पुत्र एवं हैदराबाद रणजी कप्तान अर्जुन यादव का चयन डेक्कन चार्जस (हैदराबाद) में किया गया। आई0पी0एल0 के तीसरे सत्र में केदार जाधव व उमेश यादव (दिल्ली डेयरडेविल्स) एवं अर्जुन यादव (हैदराबाद डेक्कन चार्जर्स) का चयन किया गया। आई0पी0एल0 मैचों के दौरान ही नागपुर (महाराष्ट्र) के नजदीक खापरखेड़ा की कोयला खदान के मजदूर के बेटे उमेश यादव (दिल्ली डेयरडेविल्स) एक शानदार गेंदबाज के रूप में उभरे एवं उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम में भी खेलने का मौका मिला। उत्तर प्रदेश रणजी क्रिकेट टीम में आशीष यादव नया चेहरा है। बॉलीवुड के जाने माने-हास्य कलाकार राजपाल यादव टी-10 गली क्रिकेट सीजन-2 के लिए कानपुर गली क्रिकेट टीम के मालिक बन गए हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश क्रिकेट की अण्डर-19 महिला टीम में आगरा की पूनम यादव को कप्तानी सौंपी गई है। नेशनल क्रिकेट अकादमी बंगलौर में इंडिया क्रिकेट टीम के फिजिकल ट्रेनर के रूप में किशन सिंह यादव बखूबी दायित्वों का निर्वाह करते रहे हैं।

भारत के प्रथम व्यक्तिगत ओलंपिक मेडलिस्ट खाशबा दादा साहब जाधव एवं बीजिंग ओलंपिक (2008) में कुश्ती में कांस्य पदक विजेता सुशील कुमार यदुकुल की ही परम्परा के वारिस हैं। वर्ष 2010 में कुश्ती का विश्व चैंपियन खिताब अपने नाम करके सुशील कुमार ऐसा करने वाले प्रथम भारतीय पहलवान बन गए। वर्ष 2009 मंे सुशील कुमार को देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांँधी खेल रत्न से नवाजा गया तो गिरधारी लाल यादव (पाल नौकायन) को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी परंपरा में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में जहाँ सुशील कुमार ने कुश्ती में स्वर्ण पदक जीता, वहीं 74 किलोग्राम फ्री स्टाइल कुश्ती स्पर्धा में नरसिंह यादव पंचम (मूलतः चोलापुर, बनारस के, अब मुंबई में) ने भी स्वर्ण पदक जीता। गौरतलब है कि इससे पूर्व सीनियर एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता में नरसिंह यादव ने देश को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर पूरे देश का नाम रोशन किया था। राष्ट्रमंडल खेलों की निशानेबाजी स्पर्धा में कविता यादव ने सुमा शिरूर के साथ कांस्य पदक जीतकर नाम गौरवान्वित किया। विश्व मुक्केबाजी (1994) में कांस्य पदक विजेता, ब्रिटेन में पाकेट डायनामो के नाम से मशहूर भारतीय फ्लाईवेट मुक्केबाज धर्मेन्द्र सिंह यादव ने देश में सबसे कम उम्र में ‘अर्जुन पुरस्कार’ प्राप्त कर कीर्तिमान बनाया। विकास यादव, मुक्केबाजी का चर्चित चेहरा है। आन्ध्र प्रदेश के बिलियर्डस व स्नूकर खिलाड़ी सिंहाचलम जो कि बिलियर्ड्स के अन्तर्राष्ट्रीय रेफरी भी हैं, बीजिंग ओलंपिक में निशानेबाजी के राष्ट्रीय प्रशिक्षक रहे श्याम सिंह यादव, कुश्ती में पन्ने लाल यादव, श्यामलाल यादव, गंगू यादव जैसे तमाम खिलाड़ी यादवों का नाम रोशन कर रहे हैं। बनारसी मुक्केबाज छोटेलाल यादव ने सैफ खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया। जानी-मानी पर्वतारोही संतोष यादव जिन्दगी में मुश्किलों के अनगिनत थपेड़ों की मार से भी विचलित नहीं हुईं और अपनी इस हिम्मत की बदौलत वह माउंट एवरेस्ट की दो बार चढाई करने वाली विश्व की पहली महिला बनीं। इसके अलावा वे कांगसुंग ;ज्ञंदहेीनदहद्ध की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला भी हैं। उन्हांेने पहले मई 1992 में और तत्पश्चात मई सन् 1993 में एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में सफलता प्राप्त कीे। इण्डियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश कालमाड़ी यदुवंश से ही हैं। अर्जुन पुरस्कार विजेता व महिला हाॅकी टीम की पूर्व कप्तान मधु यादव राष्ट्रीय महिला हाकी टीम की मैनेजर हैं। भारतीय भारोत्तोलन संघ के सचिव सहदेव यादव हंै।
महिला मुक्केबाजी में सोनम यादव (75 कि०ग्रा०) का नाम अपरिचित नहीं रहा। बैंकाक में एशियाई ग्रा0प्रि0 में युवा धावक नरेश यादव ने 1500 मीटर की दौड़ 3।51 सेकण्ड में पूरा कर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता। 27वीं राष्ट्रीय ताइक्वाण्डो प्रतियोगिता में हरियाणा की सरिता यादव ने रजत व पूनम यादव ने कांस्य पदक प्राप्त किया। बैंकाक में एशियाई गंापी तीरंदाजी चैम्पियनशिप में महिला रिवर्स स्पर्धा में नमिता यादव (झारखण्ड) ने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत कर देश का गौरव बढ़ाया। स्वप्नावली यादव (मुंबई) ने महज 8 साल की उम्र में यूनान स्थित 30 किमी0 लम्बी मेसिनिकोस की खाड़ी मात्र 11 घण्टे 10 मिनट में पार करने का विश्व रिकार्ड कायम कर लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया। अगस्त 2009 में सम्पन्न उ0प्र0 की सीनियर तैराकी चैम्पियनशिप में कुशीनगर की प्रियंका यादव ने 5 स्वर्ण जीतकर नया कीर्तिमान बनाया। यहीं पर गोताखोरी प्रतियोगिता में डी0एल0डब्ल्यू0 के गोताखोर नवीन यादव व्यक्तिगत चैंपियन बने। रानी यादव (बनारस) एथलेटिक्स में उभरता हुआ नाम है। कहना गलत नहीं होगा कि यदुवंशियों को यदि उचित परिवेश और प्रोत्साहन मिले तो स्पोर्ट्स-गेम और एडवेन्चर के क्षेत्र में वे भारत का नाम वैश्विक स्तर पर रोशन कर सकते हैं। (साभार यदुकुल ब्लागस्पाट.कॉम )

Friday, 12 August 2011

जन्माष्टमी पर निकलेगी भव्य झांकी

दो दिवसीय आयोजन में होंगे कई आकर्षण

बिलासपुर. जिला सर्व यादव समाज इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दो दिवसीय आयोजन
करेगा. इसके अंतर्गत  21 अगस्त को विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन होगा जबकि
22 अगस्त को भव्य झांकी आकर्षण का केन्द्र होगी.
बिलासपुर सर्व यादव स...माज द्वारा गत 27 वर्षों से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव का आयोजन
किया जा रहा है. इसी तारतम्य में इस वर्ष भी इस पावन अवसर पर 21 अगस्त को दोपहर
1 बजे से श्रीकृष्ण धाम यादव भवन, इमलीपारा में 16 वर्ष तक के बच्चों के लिए पेंटिंग,
रंगोली, एकल गीत व एकल नृत्य प्रतियोगिता होगी, वहीं 10 वर्ष तक के बच्चों के लिए
राधा-कृष्ण बनो प्रतियोगिता का आयोजन होगा.  महिलाओं के लिए कुर्सी दौड़
प्रतियोगिता भी होगी. सभी कार्यक्रम दोपहर 1 बजे से 4 बजे तक होंगे.
इसके एक दिन बाद यानी 22 अगस्त को भव्य झांकी निकाली जाएगी, जिसमें श्रीकृष्ण
की लीलाओं की झांकी के साथ भजन-मंडली, राउत नाच, पंथी नृत्य, करमा नृत्य दल
शामिल रहेंगे. झांकी के साथ-साथ चल रही समाज के लगभग 300 युवाओं की बाईक
रैली आकर्षण का केन्द्र होगी. यह शोभायात्रा दोपहर साढ़े 12 बजे  राघवेन्द्र राव सभा
भवन परिसर से प्रारंभ होकर सदर बाजार, गोल बाजार, सिटी कोतवाली, तेलीपारा, बस
स्टैंड होते हुए इमलीपारा स्थित यादव भवन जाकर सभा के रूप में परिवर्तित हो जाएगी.
यहां समापन कार्यक्रम में समाज के  बड़े-बुजुर्गों का अभिनंदन, प्रतिभावान छात्र-छात्राओं
को सम्मान तथा पुरस्कार वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन होगा.

Monday, 8 August 2011

यादव समाज की बैठक में जिला महिला संघ गठित

कांकेर. यादव भवन टिकरापारा कांकेर में जिला यादव संगठन कर्मचारी संगठन प्रबंंधक कार्यकारिणी समिति के संयुक्त तत्वाधान में जिला महिला संगठन का गठन संरक्षक लतेल यादव, नन्दलाल यादव, मुख्य सलाहकार देवेन्द्र यादव जिला अध्यक्ष सूरज यादव उपाध्यक्ष मधुयादव सचिव महेन्द्र यादव कोषाध्यक्ष लगनू यादव उपाध्यक्ष कर्मचारी
संगठन संरक्षक पी.आर.यादव, अध्यक्ष जीवन यादव उपाध्यक्ष रामचंद यादव सचिव
ईश्वरी यादव को कोषाध्यक्ष राजू दिनेश यादव पार्षद विजय यादव राकेश यादव की
उपस्थिति में सर्वसम्मति से र्निविरोध अध्यक्ष आरती यादव पूर्व पार्षद भंडारीपारा यादव
संबलपुर सचिव विमला यादव टिकरापारा कांकेर पदमनी यादव संबलपुर सचिव सुरेखा
यादव टिकरापारा कोषाध्यक्ष ममता यादव पंडरीपानी जिला संगठक सचिव अनुसुईया
यादव पूर्व पार्षद अन्नपूर्णापारा ललेशवरी यादव बांगाबारी प्रमुख सलाहकार दुलमत यादव
सिदेसर निर्मला यादव टिकरापारा जीवन यादव आमापारा देवेन्द्र यादव पंडरीपानी को
नियुक्त किया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ श्री कृष्ण की छाया चित्र पर पूजा अर्चना एवं
माल्या अर्पण कर किया गया कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यादव समाज संरक्षक
लतेल यादव ने सामाजिक एकता पर प्रकाश डालते हुए कहा संगठित समाज ही विकास
कर सकती है संगठन में बड़ी ताकत होती है. प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा से वंचित न करे
समाज की आेर से 10 वीं व 12वीं कक्षा पढऩे वाले छात्र-छात्राआें के लिए यादव भवन
में कोचिंग प्रारंभ करने की घोषणा की विनीता यादव ने सामाजिक संगठन में महिलाआें
की भागीदारी पर कहा जितनी जिम्मेदारी पुरूष की है. उससे बड़ी जिम्मेदारी महिलाआें
की है महिलाएं जो कर सकती है वो कार्य पुरूष नहीं कर पायेगें. कार्यक्रम में भागवत
यादव, रमाशंकर धिरपाल यादव, दशरू यादव, धनेश यादव, देवेन्द्र यादव, विजय यादव,
सुखुराम यादव, नरेश यादव, तरूण यादव प्रीराम यादव, बीरसिंह यादव, धरमसिंह यादव,
उमेश यादव, कमलेश यादव, प्रमिला यादव, अनिता यादव, रामोबाई यादव, राजेशवरी
यादव, रूकमणी यादव सहित तहसील क्षेत्र से सैकड़ो महलाएं व पुरूष उपस्थित थे.

Monday, 1 August 2011

यात्रा-संस्मरण

-डॉ. मन्तराम यादव
लौकिक एवं भौतिक सुख में फंसे मनुष्य असली पारलौकिक सुख से सदैव वंचित रहते
है, परिणाम मकडज़ाल की तरह उसी में फंसकर नरदेह समाप्त कर देता है किन्तु ईश्वर
कृपा एवं गुरु माता-पिता की कृपा दृष्टि से  मनुष्य की ज्ञानचक्षु खुल जाती है, तो इस
सुख से उबकर पारलौकिक सुख खोजने लगता है तब गुरु माता-पिता के बताए मार्ग,
बनाए संस्कार का सहारा लेकर, यात्रा में निकल पड़ता है, यह अवसर भाग्योदय से तथा
अनेक जन्मों के सुकर्मों के फलस्वरूप मिल पाता है। ''हानि कुसंग, सुसंगति लाहुÓÓ,
उक्ति को चरितार्थ करते हुए मुझे भी पश्चिम बंगाल की यात्रा में जाने का सुअवसर श्री
आर.एस. यदु सहा. महाप्रबंधक लाफार्ज एवं श्री आर.आर. सिंह जी दुर्गापुर के प्रेरणा से
प्राप्त हुआ। अनजान जगह के दर्शन की चाह बालमन सा होता है, तीव्र जिज्ञासा बनी रहती
है। दिनांक 13.11.09 शनिवार शाम 4 बजे पूणे-हावड़ा सुपरफास्ट एक्सप्रेस से बिलासपुर
से यात्रा में निकल पड़ा साथ में श्री भागीरथी यादव (चोरभट्ठी)  थे। मार्ग के अनुपम
दृश्य का आनंद लेते हुए सुबह 5 बजे हावड़ा स्टेशन पहुंच गए, हावड़ा से ब्लैक डायमण्ड
सुपरफास्ट ट्रेन से प्रात: 9.30 बजे  स्टील कारखाना दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) पहुंचे।
अगुवानी हेतु स्टेशन में मौजूद श्री आर.आर. सिंह जी से मुलाकात हुई, प्रत्यक्ष साक्षात्कार
एवं दर्शन पहली बार हुई यद्यपि फोन पर बातें होती रहती थी। बड़े ललक एवं आवभगत
के साथ अपनी गाड़ी में लेकर श्री बाबूराम यादव जो लाफार्ज में अधिकारी हैं, उनके घर
ले गये वे मेरे नजदीकी रिश्तेदार हैं। स्टेशन से रास्ते में पडऩे वाले अनेक कारखाना व
शहर के बसाहट को आर.आर. सिंह जी बताते हुए आ रहे थे, उनके साथ श्री सीताराम
यादव जी थे। दुर्गापुर के बसाहट एवं कारखाना की झांकी देखकर, तन-मन की थकावट
दूर हो गई। इधर अंदर-ही-अंदर मन सोचने लगा कहाँ ये उद्योगपति लोग और हम कहां
साधारण लोग इनके मन में कितना आदर, क्या सेवाभाव, मनभावन मीठी बाते इन्हें पाकर
हम अभिभूत हो गये, साथ ही गौरवान्वित भी। गुरु माता-पिता के दिए संस्कार एवं प्रेरणा
सहसा याद आ गया। इन्हीं संस्कारों की फलस्वरूप इन महान लोगों का साक्षात्कार  हो
सका इनके हृदय में स्थान मिल सका।
पूर्वज से संस्कार प्राप्त, व्यवहार, कुशल, प्रसन्नचित्त, मृदुभाषी रायपुर निवासी लाफार्ज में
सहायक महाप्रबंधक जैसे महत्वपूर्ण पद में आसीन श्री आर.एस. यदु के कारण यह
सौभाग्य हमें प्राप्त हो सका। अन्र्तहृदय श्री आर.एस. यदु का मन ही मन धन्यवाद दे रहा
था। प्रेम से आंखे नम किन्तु मन प्रफुल्लित था। कुछ विश्राम के बाद  40 वें वर्ष आयोजित
भगवान श्री कृष्ण लोक सांस्कृति-महोत्सव ''आसनसोलÓÓ के लिए प्रस्थान किए,
कार्यक्रम के संस्थापक श्री नन्दबिहारी यादव, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं नेता राजद आसनसोल
थे, पहुंचते ही जो स्वागत वहां वकील साहब और उनके महोत्सव के सदस्यों ने किया
अविस्मरणीय है। कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य कृपालु महाराज के शिष्यों द्वारा भगवान श्री
कृष्ण की आरती से किया गया। तत्पश्चात माता रासेश्वरी देवी के शिष्यों द्वारा भजन
प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के अतिथियों द्वारा उद्बोधन हुआ मुझे भी विशिष्ट अतिथि
बनने एवं उद्बोधन का सौभाग्य मिला, भोजन प्रसाद पश्चात रात भर बिरहा गायकी श्री-
--- एवं बिरहा गायिका श्रीमती--- की बिरहा गायन चला, वाद-विवाद प्रतियोगिता
की तरह बिरहा गायन के माध्यम से, राम कथा, महाभारत कथा का गायन करते रहे,
वाहवाही बिना शोर शराबा के दोनों गायक दक्षिणा पाते रहे, हजारों श्रोता किन्तु शांत सभा
मण्डप क्या अलौकिक दृश्य वर्णन के लिए शब्द नहीं है, भाव जरूर है। सदस्यों के
उत्साह देखते बनता था। फूहड़ क्रिया कलाप का नामोनिशान नहीं।  सभी एकटक चित्त
मन से देख सुन रहे थे। छत्तीसगढ़ के पण्डवानी जैसा ही बिरहा गायन है।
उस क्षेत्र की प्रथम यात्रा थी दर्शनीय स्थानों की जानकारी नहीं थी। 15.12.09 को वापस
बिलासपुर आने का रिजर्वेशन था। पर श्री आर.आर. सिंह का आकर्षक व्यक्तित्व उनका
संग छोडऩा नामुमकिन। 15.12.09 को दुर्गापुर से चैतन्य महाप्रभु के जन्म स्थली नवदीप
जहां गंगा मैय्या बहती है, दर्शन हेतु श्री आर.आर. सिंह, आर.एस. यदु, भागीरती यादव
सभी प्रात: 8 बजे निकल पड़े। रास्ते में, आयल डिपो, सैनिक कैम्प, हराभरा क्षेत्र,
लहलहाती धान की फसल,  क्या मनोरम दृश्य शुद्ध जलवायु देखकर मन प्रसन्न हो गया।
चैतन्य महाप्रभु के सिर घुटन का केश आज भी सुरक्षित रखे है वह स्थान भी रास्ता में
पड़ा, वर्धमान शहर देखने लायक है सीता भोग वहां का प्रसिद्ध व्यंजन उसको ग्रहण कर
जी भर गया। नवदीप में गंगा के किनारे लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा मंदिरें है दीपावली के
समय एक माह का लीला होता है। गंगा मैय्या पारकर श्री कृष्णानगर होते हुए इस्कान
मंदिर का दर्शन करने मायापुरी पहुंचे।
स्वामी प्रभुपाद जी द्वारा स्थापित भव्य इस्कान मंदिर जहां बारहो महिना दर्शनार्थी पहुंचते
रहते है। ठहरने के लिए कई धर्मशाला 5-6 कि.मी. क्षेत्र में फैला है। बाहर भी कई मंदिर
एवं धर्मशाला है। यथा नाम तथा गुण मायापुरी में पहुंचकर केवल भगवान श्री कृष्ण के
माया ही माया है। सभी मंदिरों में भगवान श्री कृष्ण कई भाव मुद्रा में विराजमान हैं। स्वामी
प्रभुपाद जी के बचपन से लेकर संन्यासी बनने तथा देह छोडऩे तक के विभिन्न झांकियों
से युक्त मंदिर  है जिसमें म्युजियम भी है बीस रु. के टिकिट ने  भक्तों सहित स्वामी
प्रभुपाद एवं उनके भक्तों की झांकी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस्कान मंदिर भव्य है
जिसे स्वामी प्रभुपाद जी ने बनवाया था। अंदर गर्भगृह दो भागों में है, एक तरफ  भगवान
श्री कृष्ण के साथ दाएं तरफ भी तुंग विद्या श्री चित्रा, श्री चम्पकलता, श्री ललिता बीच में
श्री कृष्ण श्री राधारानी  बायें में श्री विशाखा, श्री इन्दुलेखा, श्री रंङदेवी, श्री सुदेवी,
विराजमान है। ऊपर चांद के छात्र, सामने तुलसी रानी, राधाकृष्ण की छोटी मूर्ति,
विराजमान है। सभी मुकुट सोने चांदी तथा हीरा मोती से जुड़े हुए हैं। माधव जी के सामने
श्री गणेशमूर्ति ऐसा लग रहा है मानो द्वारपाल है। दूसरे कोने में बीचो-बीच स्वामी प्रभुपाद
जी का विग्रह है जो राधाकृष्ण को अपलक दर्शन कर रहे है। बाये नरसिंह भगवान के
मंदिर है।
गर्भगृह के दूसरे भाग में कृष्णावतार चैतन्य महाप्रभु बीच में है नित्यानंद स्वामी और देव्य
जी है बाएं गदाधर एवं श्रीवास स्वामी जी विराजमान है, मन मोहक झांकी देखते ही बनता
है।
आरती अलग-अलग समय कई बार होती है पर शाम के छै बजे और प्रात: चार बजे के
आरती में भाग लेना अहोभाग्य है। शाम को तुलसी की आरती पहले फिर चैतन्य महाप्रभु
की आरती, इधर राधाकृष्ण की आरती मधुर शंख ध्वनि मन के मैल को धो देता है।
प्रात: भगवान श्री कृष्ण की आरती पहले तत्पश्चात् नरसिंह भगवान की फिर तुलसी रानी
की होती है। आरती पश्चात प्रतिदिन सत्संग  होता है। प्रसाद स्वरूप तुलसी माला भेंट में
दी जाती है।
परिसर में पूजा के सभी प्रकार के प्रसाद एवं सामग्रियां मिलतीहै। मायपुरी वर्धमान से ट्रेन
जाती है तथा बस भी। दर्शन सौभाग्य से मिला जो गुरु माता-पिता के द्वारा दिए संस्कार
एवं प्रेरणा संभव हो सका।
मायापुरी से सिद्धपीठ मां महाकाली के दर्शन हेतु कलकत्ता आ गए, श्री आर.एस. यदु,
आर.आर. सिंह वर्धमान से रेल बैठाकर बिदा हो लिए पर हृदय में सदैव के लिए बस
गए। मां काली की मूर्ति भव्य, भयावह, दर्शनीय है मंदिर में आज भी बलि प्रथा लागू है,
दर्शनकर 16 जनवरी 09 को ग्वालियर एक्सप्रेस से बिलासपुर आ गये। यहां कहूंगा जा
पर कृपा राम के होईता पर कृपा करे सब कोई। बिनु सत्संग विवेक न होई, रामकृपा बिनु
सुल मन न सोई ।
वन्देकृष्ण जगत गुरुम
  संपादक, रऊताही 

चार यादव विभूतियों पर जारी हुए डाक टिकट

-राम शिव मूर्ति यादव
राष्ट्र को अप्रतिम योगदान के मद्देनजर डाक विभाग विभिन्न विभूतियों पर स्मारक डाक टिकट जारी करता है। अब तक चार यादव विभूतियों को यह गौरव प्राप्त हुआ है। इनमें राम सेवक यादव ( 2जुलाई 1997) बी.पी. मण्डल (1 जून 2001) चौ. ब्रह्मा प्रकाश (11 अगस्त 2001) एवं राव तुलाराम (23 सितम्बर 2001) शामिल हैं। जिस प्रथम यदुवंशी के ऊपर सर्वप्रथम डाक टिकट जारी हुआ  वे हैं राम सेवक यादव। उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जनपद में जन्मे राम सेवक यादव ने छोटी आयु में ही राजनैतिक-सामाजिक मामलों में रुचि लेनी आरम्भ कर दी थी। लगातार दूसरी, तीसरी और चौथी लोकसभा के सदस्य रहे राम सेवक यादव लोक लेखा समिति के अध्यक्ष, विपक्ष के नेता एवं उत्तरप्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे। समाज के पिछड़े वर्ग के उद्धार के लिए
प्रतिबद्ध राम सेवक यादव का मानना था कि कोई भी आर्थिक सुधार यथार्थ रूप तभी ले सकता है जब उससे भारत के गाँवों के खेतिहर मजदूरों की जीवन दशा में सुधार परिलक्षित हो। इस समाजवादी राजनेता के अप्रतिम योगदान के मद़देनजर उनके सम्मान में 2 जुलाई 1997 को स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
वर्ष 2001 में तीन यादव विभूतियों पर डाक टिकट जारी किये गये। इनमें बिहार के पूर्व
मुख्यमंत्री एवं मण्डल कमीशन के अध्यक्ष बी.पी. मण्डल का नाम सर्वप्रमुख है। स्वतंत्रता
पश्चात यादव कुल के जिन लोगों ने प्रतिष्ठित कार्य किये, उनमें बी.पी. मंडल का नाम
प्रमुख है। बिहार के मधेपुरा जिले के मुरहो गाँव में पैदा हुए बी.पी. मंडल 1968 में बिहार
के मुख्यमंत्री बने। 1978 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप में 31 दिसम्बर
1980 को मंडल कमीशन के अध्यक्ष के रूप में इसके प्रस्तावों को राष्ट्र के समक्ष उन्होंने
पेश किया। यद्यपि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने में एक दशक का समय
लग गया पर इसकी सिफारिशों ने देश के सामाजिक व राजनैतिक वातावरण में काफी
दूरगामी परिवर्तन किए। कहना गलत न होगा कि मंडल कमीशन ने देश की भावी
राजनीति के समीकरणों की नींव रख दी। बहुत कम ही लोगों को पता होगा कि
बी.पी.मंडल के पिता रास बिहारी मंडल जो कि मुरहो एस्टेट के जमींदार व कांग्रेसी थे, ने
'अखिल भारतीय गोप जाति महासभाÓ की स्थापना की और सर्वप्रथम माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड
समिति के सामने 1917 में यादवों को प्रशासनिक सेवा में आरक्षण देने की मांग की।
यद्यपि मंडल परिवार रईस किस्म का था और जब बी.पी.मंडल का प्रवेश दरभंगा महाराज
(उस वक्त दरभंगा महाराज देश के सबसे बड़े जमींदार माने जाते थे) हाईस्कूल में कराया
गया तो उनके साथ हॉस्टल में दो रसोईये व एक खवास (नौकर) को भी भेजा गया। पर
इसके बावजूद मंडल परिवार ने सदैव सामाजिक न्याय की पैरोकारी की, जिसके चलते
अपने हलवाहे किराय मुसहर को इस परिवार ने पचास के दशक के उत्तराद्र्ध में यादव
बहुल मधेपुरा से सांसद बनाकर भेजा। राष्ट्र के प्रति बी.पी. मंडल के अप्रतिम योगदान पर
1 जून 2001 को उनके सम्मान में स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
एक अन्य प्रमुख यादव विभूति, जिन पर डाक टिकट जारी किया गया, वे हैं दिल्ली के
प्रथम मुख्यमंत्री चौ. ब्रह्मा प्रकाश। 1952 में मात्र 34 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री पद पर
पदस्थ चौधरी ब्रह्मा प्रकाश 1955 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। बाद में वे संसद हेतु
निर्वाचित हुए एवं खाद्य एवं केन्द्रीय खाद्य, कृषि सिंचाई और सहकारिता मंत्री के रूप में
उल्लेखनीय कार्य किये। 1977 में उन्होंने पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों एवं
जनजातियों व अल्पसंख्यकों का एक राष्ट्रीय संघ बनाया ताकि समाज के इन कमजोर
वर्गों की भलाई के लिए कार्य किया जा सके। राष्ट्र को अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 11
अगस्त 2001 को चौधरी ब्रह्मा प्रकाश के सम्मान में स्मारक डाक टिकट भी जारी किया
गया।
1857 की क्रान्ति में हरियाणा का नेतृत्व करने वाले रेवाड़ी के शासक यदुवंशी राव
तुलाराव के नाम से भला कौन वाकिफ नहीं होगा। 1857 की क्रान्ति के दौरान राव
तुलाराम ने कालपी में नाना साहब, तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई के साथ मंत्रण की
और फैसला हुआ कि अंग्रेजों को पराजित करने के लिए विदेशों से भी मदद ली जाये।
एतदर्थ सबकी राय हुई कि राव तुलाराम विदेशी सहायता का प्रबंध करने ईरान जायें। राव
साहब अपने मित्रों के साथ अहमदाबाद होते हुए बम्बई चले गये। वहां से वे लोग
छिपकर ईरान पहुंचे। वहां के शाह ने उनका खुले दिल से स्वागत किया। वहां राव
तुलाराम ने रूस के राजदूत से बातचीत की। वे काबुल के शाह से मिलना चाहते थे।
एतदर्थ वे ईरान से काबुल गये जहां उनका शानदार स्वागत किया गया। काबुल के अमीर
ने उन्हें सम्मान सहित वहां रखा। लेकिन रुस के साथ सम्पर्क कर विदेशी सहायताका
प्रबंध किया जाता तब तक सूचना मिली कि अंगे्रजों ने उस विद्रोह को बुरी तरह से
कुचल दिया है और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को पकड़-पकड़कर फांसी दी जा रही
है। अब राव तुलाराम का स्वास्थ्य भी इस लम्बी भागदौड़ के कारण बुरी तरह प्रभावित
हुआ था। वे अपने प्रयास में सफल होकर कोई दूसरी तैयारी करते तब तक  उनका
स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो गया था। वे काबुल में रहकर ही स्वास्थ्य लाभ कर कुछ
दूसरा उपाय करने की सोचने लगे। उस समय तुरंतभारत लौटना उचित भी नहीं था।
उनका काबुल में रहने का प्रबंध वहां के अमीर ने कर तो दिया पर उनका स्वास्थ्य नहीं
संभला और दिन पर दिन गिरता ही गया। अंतत: 2 सितम्बर 1863 को उस अप्रतिम वीर
का देहांत काबुल में ही हो गया। वीर-शिरोमणी यदुवंशी राव तुलाराम के काबुल में देहान्त
के बाद वहीं उनकी समाधि बनी जिस पर आज भी काबुल जाने वाले भारतीय यात्री बड़ी
श्रद्धा से सिर झुकाते हैं और उनके प्रति आदर व्यक्त करते हैं। राव तुलाराम की वीरता एवं
अप्रतिम योगदान के मद्देनजर 23 सितम्बर 2001 को उनके सम्मान में स्मारक डाक
टिकट जारी किया गया। (साभार रउताही-2011 )
स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी (सेवानिवृत्त)
 तहबरपुर, पोस्ट-टीकापुर, आजमगढ़ (उ.प्र.)

अपनाना होगा श्रेष्ठ पशु गाय को

-समसेर कोसलिया 'नरेश'
      गाय को धरती के पालतू पशुओं में श्रेष्ठ पशु का दर्जा प्राप्त है। इस पशु को छोड़ अन्य किसी भी पशु को धरती माँ के नाम से संबोधित क्यों नहीं किया जाता है ? इस पर चिंतन करना निहायत जरूरी है। इसका दूध भी इंसान की माँ के दूध के समान हल्का, मीठा एवं पौष्टिक होता है तथा बच्चे के शारीरिक विकास के लिए सहायक आहार होता है। गाय को धेनु, गौ, धनेका, धेनुष्ठरी, गैया, गौरी, कामधेनु, मही, माता, मातृ, मातु, पयस्विनी, वृर्षा, रेवती, सुरभि, धेन आदि नामों से जाना जाता है। गाय की अनेक नस्लें होती हैं- हरियाणी,
देसी, चारणारकर एवं साहीवाल, राठी आदि नस्लें अच्छी एवं श्रेष्ठ हैं।
गाय के दूध का उपयोग मरीज दवाओं के साथ करता है। दूध से क्रीम, निकाला जाता है।
दूध को जमाने के पश्चात दही बन जाता है। दही को हिन्दी में दही, संस्कृत में दधि, दध,
पयंसी, मंगल्य, अनेतर, तक्रजन्म, क्षरत, क्षारोदभव, दिग्ध, तक्रजन्य, बंगाली-गुजराती में
दही, कन्नड़ में भसरू, तेलगू में पेरगु, फारसी में दोग नाम से जाना गया है। घी को हिन्दी
में घी, घृत, नवनीतक, नवीनतज, दहिभोग्य, मराठी में तूप, गुजराती में घी, तेलगू में नेई,
फारसी में रोगने जर्द, अरबी में समन दूहनूलक्कर, नामों से जाना जाता है। मक्खन को
स्तन्यतत्व, मखन, माखन, नवनीत, तक्रजनीन नामों से जाना जाता है। तक्रपिंड व तक्र
कपिका नामों की जननी छाछ को मठा, मट्ठा, छाय, लस्सी, शीत, तक्र, मनित, द्रव्य,
तक्रजननी के नामों से जाना जाता है। दूध को हिन्दी में दूध, संस्कृत में दुग्ध, मराठी में
दूध, गुजराती में दूध, कन्नड़ में हालू, तेलगू में पालू, फारसी में शीरे, अरबी में लवनुख,
लेटिन में लक्टस नामों से जाना जाता है। 'पीयूषÓ गाय ब्याहने से सात दिन तक का दूध
है। दूध, दही, मठा, छाछ के इन्द्रिय सुख गोरस कहलाते हैं।
दूध से बनने वाली वस्तुओं में दही, मक्खन, घी, खोवा, पनीर, रसगुल्ला, बर्फी, गुलाब
जामुन, कलाकन्द, गाजरपाक, रसभरी, हिना मुर्गी, रस मलाई, रसपट, क्रीम, रसराज,
टोटरू, रबड़ी और छाछ मुख्य है। फाड़े हुए दूध के छेना से पनीर बनाया जाता है, पनीर
से जलेबी भी बनती है। रबड़ी को वसौंधी राबड़ी कहते हैं। गाय का दूध दूहना
(दोहना)अन्य पशुओं से कठिन होता है। गाय के मूत्र को गौमूत्र, गौमत नाम प्रसिद्धि है।
इसका मूत्र कीट एवं रोगनाशक एवं सब्जियों एवं फसलों में कीटनाशक के स्थान पर
प्रयोग होता है। गौमूत्र के छिड़काव से कीटों का नाश होता है साथ ही सब्जी अन्न को
खाने पर मानव शरीर पर कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ता। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार गौमूत्र
पवित्र है। आजकल अमेरिका जैसे पाश्चात्य संस्कृति के धनी देश ने गौमूत्र का पेटेन्ट कर
दिया है।

गाय के गोबर को गोबर, गोमय, गोपुरीष, गोविष्ठा, गोमल, गोविट्, गोशकृत कहा जाता है।
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के डाक्टर तथा वैज्ञानिक अब कहते हैं कि गाय के गोबर से
लीपने पर ऊर्जा तरंगित होती है। गोबर में गैस शक्ति बहुत होती है। गोबर के विषय में
खोज का श्रेय उत्तरप्रदेश के बरेली जनपद के गांव भूवा के नवोदित पब्लिक स्कूल के
कक्षा सातवीं के छात्र आशुतोष यादव को है। आशुतोष यादव ने सीसे और तांबे की प्लेट
के सिरों में तार जोड़कर एक डिब्बे में रखकर उस डिब्बे में गाय का गोबर भर दिया और
आधे धंटे बाद गाय का गोबर बैटरी की तरह विद्युत ऊर्जा देने लग गया। बाहर निकले
तारों के सिरे स्कूल की घड़ी से जोडऩे पर वह चलने लगी।  'कमल ज्योतिÓ पाक्षिक
लखनऊ के अनुसार 28 अगस्त 2000 की खोज से 16 मार्च 2002 तक स्कूल घड़ी चल
रही है।
      यूनानी मतानुसार महिलाओं के दूध के बाद गाय का दूध सबसे उत्तम है। बच्चा जब तक
40 दिन का न हो जाए तब तक उसे जानवर का दूध देना हानिकारक है। आयुर्वेद में दूध,
मधुर, स्निग्ध, वात-पित्तनाशक, मृददृविरेचक, तत्काल वीर्यजनक, शीतल, सब प्राणियों
की आत्मा, जीवन, वृहण, बलकारक, बुद्धिवर्धक, वाजीकरण, अव्यवस्थापक ओज के
बढ़ाने में विरेचन, वमन और वस्ति के समान गुण करता है। जीर्णज्वर, मानसिक रोग,
क्षयरोग, मूच्र्छा, भ्रम संग्रहणी, पांडुरोग, दाह तृषा, हृदय रोग, शूल उदावर्त गुल्म, गुदांकर,
रक्तपित्त, अतिसार, योनिरोग श्रम और गर्भस्त्राव में निरंतर हितकारी है जो बालक वृद्ध,
क्षतक्षीण भूखे और मैथुन करने से क्षीण हो गए हैं उनको दूध बहुत लाभ पहुंचाता है, मगर
तरुण ज्वर में इसका पीना विष के समान है।

     गाय का दूध रस और पाक मधुर, शीतल, स्तनों में दूध उत्पन्न करने वाला और पित्त को
नष्ट करने वाला, भारी, हमेशा सेवन करने वाले मनुष्यों को बुढ़ापे से बचाने वाला और
सभी रोगों को नष्ट करने वाला है। काली गाय का दूध वातनाशक और अधिक गुणकारी,
पीली गाय का दूध पित्तनाशक और वातनाशक, सफेद गाय का दूध कफकारक लाल
और चितकबरी गाय का दूध वातनाशक और तरुणी गाय का दूध मधुर, रसायन और
त्रिदोषनाशक होता है। वृद्ध गाय का दूध दुर्बलताजनक होता है। जिस गाय को गर्भवती
हुए तीन महीने बीत गए हैं उसका दूध पित्तकारक, खारा मधुर दोष वाला, जिस गाय ने
पहली बार बच्चा दिया है उसका दूध रुखा, दाहकारक, रक्त को कुपित करने वाला और
पित्तनाशक, जिस गाय को बच्चे दिए बहुत दिन बीत गए हो उसका दूध बलवर्धक और
जिन गायों का बछड़ा मर गया हो अथवा छोटा काल का हो उसका दूध भारी, कब्जियत
करने वाला और दुष्पाच्य होता है, अताब्व पथ्य, दीपन और हल्का होता है। (साभार रउताही-2011 )
(धन्वन्तरी कृत- भारतीय, जड़ी-बूटियाँ नामक पुस्तक से)
                                             साहित्य वाचस्पति मुकाम+पोस्ट- स्याणा, 
                                            तहसील व जिला- महेन्द्रगढ़ हरियाणा, पिन 123027

भारतीय सेना की देशभक्ति ने चीनियों को झुकाया था

-राकेश कुमार
च्यांग काई शेक की पार्टी कुओमिनतांग की लिबरेशनवादी ताकतों को परासत कर माओ
त्से तुंग ने 1 अक्टूबर 1949 को चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का ध्वज लहराकर 'चीनी लोक
गणराज्य (चाइनीज पीपुल्स रिपब्लिक) की स्थापना की। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री
पं. जवाहरलाल नेहरु की सरकार ने उसे मान्यता देने में तनिक भी देरी नहीं लगाई। इसमें
लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल और कृष्ण मेनन जैसे विद्वान की सहमति भी रही
लेकिन जब चीन ने अपने नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के कारण 24 अक्टूबर 1950 को
तिब्बत पर अधिकार की घोषणा कर दी और 14 वें दलाईलामा ने वर्ष 1959 के भारत में
शरण लेकर यहां निर्वासित तिब्बती सरकार का गठन कर लिया उसके ठीक बाद चीन-
भारत की तल्खियां उजागर होने लगीं। भारत के महान चिंतक अरबिंदो घोष ने सचेत
किया था कि कम्युनिस्ट चीन का उभरना भारत और एशिया के लिए भयंकर खतरा है।
अपने देहावसान से प्राय: एक सप्ताह पहले ऐसा ही वक्तव्य सरदार पटेल ने जारी किया
था। उन्होंने तिब्बत पर चीनी करतूत से उपजने वाले भविष्य के खतरों के प्रति सेचत
करते हुए प्रधानमंत्री नेहरु को एक पत्र लिखा था। उन्होंने कहा था कि भारत ने तिब्बत के
साथ एक स्वतंत्र संधि कर उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया। इससे पहले इस बात का
ख्याल रखने की जरूरत थी कि उत्तर-पूर्वी भारत की सीमा रेखा अस्पष्ट होने के कारण
कई राज्य जो चीन के प्रति अधिक लगाव रखते हैं, कभी भी समस्या का कारण बन
सकते हैं। पटेल जी के पत्र को तत्कालीन रक्षामंत्री तथा पंडित जी के खास मित्र कृष्ण
मेनन ने तवज्जों नहीं दी। यहां तक कि जब तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल तिमैया
ने रक्षामंत्री को सेना के साजो-सामान खरीदने के लिए 300 करोड़ रुपयों का प्रस्ताव सौंपा
तो मेनन ने उन्हें यह कहकर वापस कर दिया कि उनका 300 शब्दों का भाषण इस
समस्या का हल कर देगा। कुछ समय के लिए नेहरु और मेनन की जोड़ी सही साबित
हुई। जब 29 जून 1954 को भारत व चीन के मध्य आठ वर्षीय व्यापारिक समझौता हुआ
और पंचशील सिद्धांत पर एशिया इन दो सबसे बड़े देशों के बीच सहमति बनी तो लगा
कि सब कुछ सही है। उसके दो वर्ष बाद 1956 में भारत और चीन के द्विपक्षीय विवादों
पर आपसी चर्चा हुई जिसमें दोनों पक्षों ने कुछ बिन्दुओं पर सहमति बनाने में सफलता
हासिल की। इनमें मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर की 1100 किमी लम्बी पूर्वी सीमा और
सिक्यांग- तिब्बत सीमा का विवाद लेन-देन के जरिए हल करना था। चीन 90,000 वर्ग
किमी पर अपना दावा छोड़ देता। संधि से पूर्व चीन ने वर्ष 956 में सड़क बनाकर
पाकिस्तान से स्थल मार्ग द्वारा सीधा संबंध बना लिया। उसके बाद वर्ष 1958 की 'चाइना
विक्टोरियस सभा में चीन ने भारत का एक ऐसा मानचित्र प्रस्तुत किया जिसमें भारत की
50,000 वर्ग किमी अधिकृत भूमि को चीन का हिस्सा बताया गया था। भारत इसका
सीधा विरोध करने से कतराता रहा क्योंकि शक्तिशाली राष्ट्र का कोई शत्रु नहीं बनना चाहता
है। वहीं, चीनी गणराज्य के पहले प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई भारतीय व अन्य एशियाई
नेताओं को गुमराह कर रहा था कि उनका देश मैकमोहन सीमा रेखा को व्यवहारत:
स्वीकार करता है। सच्चाई यह थी कि इसे वह औपनिवेशिक घटना मात्र मानता था और
भारत के साथ सीमा  विवाद का हल निकालने के लिए वह भारत पर हमले की तैयारी
कर रहा था। उसने उचित अवसर पाकर 8 सितम्बर 1962 को मैकमोहन रेखा पार कर
भारत पर हमले की घोषणा कर दी। भारतीय सेना को रक्षा मंत्रालय से हमले का आदेश
मिलते ही 20 अक्टूबर 1962 में दोनों पक्षों के बीच घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। चीनी
सैनिक अपने को अजेय मानकर बढ़ते चले आ रहे थे। उन्होंने लेह के पूर्वी क्षेत्र व नेफा
में मैकमोहन सीमा रेखा की भारतीय सैनिक चौकी पर देखते ही देखते फतह कर ली थी।
चौकी पर भारतीय सेना की कोई पेट्रोल पार्टी गश्त नहीं कर रही थी। लद्दाख की
भयानक सर्दी में जवानों के पास न तो पर्याप्त कपड़े, सर्दी के जूते और न ही हथियार थे
लेकिन दुश्मन का सामना करने का हौसला था।
ऊंचे ग्लेशियरों से घिरे सुनसान पहाड़ी इलाके चुशूल रेजांग ला पोस्ट पर मेजर शैतानसिंह
अपनी 13 वीं कुमाऊं बटालियन की 'सीÓ कम्पनी का नेतृत्व कर रहे थे जिसमें 118
जवान थे। 18 नवम्बर 1962 को बर्फीली हवाओं के तेज झोंके, कुहासे की धुंध से जवानों
के हाथ-पांव ठंडे हो रहे थे कि 1310 चीनी सैनिकों का अचानक हमला हो गया। सुबह
4:35 बजे हुए उस हमले के उत्तर में मेजर शैतान सिंह, हवलदार राजकुमार, हरिराम,
सूरजा, रामचंद्र, गुलाब सिंह, रामकुमार सिंह, फूलसिंह, जयनारायण, निहाल सिंह,
हरफूल सिंह आदि ने अपनी प्लाटूनों सहित मोर्चा संभाल लिया। मैदानी क्षेत्र से आए
जवानों ने पहली बार बर्फ से ढंकी पहाडिय़ों पर मोर्चे का तजुर्बा किया था और उनके पास
मौसम का सामना करने के संसाधन नहीं के बराबर थे। मेजर शैतान सिंह अपने संख्या
बल एवं हथियारों की क्षमता से परिचित थे। उन्होंने अपनी हर प्लाटून के मोर्चे तय कर
निर्देश देना आरम्भ किया कि दुश्मन के हथियारों की रेंज में आते ही गोलियां चलाई
जाएं। कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद राइफल, मशीनगन और मोर्टांर से हमला बोल दिया
गया परन्तु चीनी सैनिकों ने उस समय तक भारतीय सैनिकों को चारों ओर से घेर लिया
था। उनका हमला जानलेवा था। उनके मोर्टारों से उगलते शोलों के गोले भारतीय सेना के
बंकर व मोर्चे तबाह कर रहे थे। इसके बावजूद भारतीय सैनिक पीछे हटने को तैयार नहीं
थे। नवम्बर माह के उस दिन पूरा देश दीपावली मना रहा था और चुशूल घाटी में भारतीय
वीर खून की होली खेल रहे थे। भारतीय लोकसभा में प्रधानमंत्री द्वारा वक्तव्य दिया जा
रहा था कि जिस हिस्से पर चीन ने कब्जा किया है वहां अन्न का एक दाना भी नहीं
उगता। सदन में कांग्रेस के ही सदस्यों ने उठकर अपनी टोपियां उतारीं और कहा नेहरुजी,
हमारे सिरों पर बाल नहीं है और आपके सिर पर भी नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि
सिर कट जाने दिया जाए। उधर, युद्ध मैदान में डटे मेजर शैतान सिंह ने 118 जवानों को
संबोधित करते हुए कहा कि यह हर सैनिक के जीवन का सर्वोत्तम क्षण है कि वे अपनी
मातृभूमि की पवित्रता की रक्षा करें या दुश्मन से लड़ते-लड़ते अपने प्राणों को राष्ट्रहित में
न्यौछावर कर दें। उनके संबोधन ने सैनिकों का जोश दुगुना कर दिया। उसी बीच चीनियों
ने 13 वीं कुमाऊं रेजीमेंट चौकी के पीछे से हमला बोल दिया जिससे तांगात्से छावनी के
जवान सैनिकों के बचने की गुंजाइश भी नहीं बची। फिर भी, भारत के जांबाजों ने शत्रु
सेना को खासा नुकसान पहुंचाया। उसी दौरान चीनी सेना की चलाई गई एक गोली
कम्पनी कमांडर मेजर शैतान सिंह को लगी लेकिन हवलदार हरफूल सिंह के कहने के
बावजूद मेजर शैतानसिंह ने मैदान से हटना कबूल नहीं किया। उन्होंने अपनी कमर से
बेल्ट निकाल कर उनको दी और कहा मैं यहीं लड़ूंगा आप छावनी में जाकर सूचना दो
कि 13 वीं कुमाऊं बटालियन की 'सीÓ कम्पनी का प्रत्येक सैनिक लहू की अंतिम बूंद
और अपनी अंतिम गोली तक दुश्मन से लड़ता रहा। दुश्मन के खिलाफ हमले पर हमले
कर रहे जख्मी मेजर पर शत्रु सैनिकों की मशीनगन से निकली गोली की बौछार आई।
सीने, पेट और जांघ पर गोलियां लगने के बाद मेजर ने मृत्यु को स्वीकार कर भारतीय
वीरता का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। आगे चलकर तांगात्से को रेजांग ला दर्रे की
लड़ाई चुशूल की लड़ाई के नाम से अविस्मरणीय वीरगाथा बन गई। इस वीरगाथा के तीन
माह बाद बर्फ पिघलने पर भारतीय सीमा के अंदर 114 भारतीय व 1100 चीनी सैनिकों
के शव प्राप्त हुए। रक्षा मंत्रालय ने सैनिकों की सुरक्षा में रेडक्रास की एक टीम रेजांगला
दर्रे भेजी। निगरानी दल ने देखा कि शहीद सैनिकों की उंगलियां राइफलों के ट्रिगर पर थी
तो किसी के हाथ में हथगोले थे। मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय सैनिकों के अदम्य
साहस और बलिदान को देख चीनी सैनिकों ने जाते समय सम्मान के रूप में जमीन पर
अपनी राइफलें उल्टी गाडऩे के बाद उन पर अपनी टोपी रख दी थी। भारतीय सैनिकों को
शत्रु सैनिकों से सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ था। आज भी इंडिया गेट दिल्ली में वीर जवान
ज्योति में यह छवि देखने को मिलती है। वहीं 13 वीं कुमाऊं रेजीमेंट के 114 वीरों की
चुशूल से 12किमी दूर एक स्मारक बना है। इस स्मारक में सभी वीर सैनिकों के नाम
अंग्रेजी के अक्षरों में अंकित हैं। इस विजय प्राचीर के समान ही एक छोटी समधि के रूप
में 'अहीर धाम स्मारक का भी निर्माण किया गया है। उल्लेखनीय है कि 13 वीं कुमाऊं
बटालियन की 'सी कम्पनी में शामिल अधिकांश जांबाज जवान अहीर (यादव) ही थे
परंतु 'रेजांग ला के समर में वे सब भारतीय सैनिक थे। (साभार रउताही -2011)
  मो. 09454718786

लोक साहित्य में पर्यावरण चेतना

-गोवर्धन यादव
'लोक साहित्यÓ लिखने-पढऩे में एक शब्द है, पर वस्तुत: यह दो गहरे भावों का गठबंधन
है। 'लोकÓ और 'साहित्यÓ एक दूसरे के संपूरक...... एक दूसरे में संश्लिष्ट। जहाँ लोक
होगा, वहाँ उसकी संस्कृति और साहित्य होगा। विश्व में कोई भी ऐसा स्थान नही है जहाँ
लोक हो और वहाँ उसकी संस्कृति न हो।
मानव मन के उद्गारों व उसकी सूक्ष्मतम अनुभूतियों का सजीव चित्रण यदि कहिं मिलता
है तो वह लोक साहित्य में ही मिलता है। यदि हम लोक साहित्य को जीवन का दर्पण
कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। लोक साहित्य के इस महत्व को समझा जा सकता
है कि लोककथा को लोक साहित्य का जनक माना जाता है और लोकगीत को काव्य की
जननी। लोक साहित्य में कल्पना प्रधान साहित्य की अपेक्षा लोकजीवन का यथार्थ सहज
ही देखने में मिलता है।
लोक साहित्य हम धरतीवासियों का साहित्य हैं क्योंकि हम सदैव ही अपनी मिट्टी,
जलवायु तथा सांस्कृतिक संवेदना से जुड़े रहते हैं। अत: हमें जो भी उपलब्ध होता है, वह
गहन अनुुभूतियों तथा अभावों के कटु सत्यों पर आधारित होता है, जिसकी छाया में वह
पलता और विकसित होता है। इसलिए लोक साहित्य हमारी सभ्यता का संरक्षक भी है।
साहित्य का केन्द्र लोक मंगल है। इसका पूरा ताना-बाना लोकहित के आधार पर खड़ा
है। किसी भी देश अथवा युग का साहित्यकार इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकता। जहाँ
अनिष्ट की कामना है, वहाँ साहित्य नहीं हो सकता। वह तो प्रकृति की तरह ही
सार्वजनहिताय की भावनाओं से आगे बढ़ता है।
प्रकृति साहित्य की आत्मा है। उसका अपनी मिट्टी से, अपनी जमीन से जुड़ा रहना भी
साहित्य की अनिवार्यता है। मिट्टी में सारे रचनाकर्म का 'अमृतÓ वास रहता है। रचनाकार
उसे नए-नए रूप देकर संपादित करता है। गुरू-शिष्य परम्परा हमें प्रकृति के उपादानों के
नजदीक ले आती है। यहाँ कबीर का कथन प्रासंगिक है। 'गुरू कुम्हार सिख कुंभ गढ़ी-
गढ़ी काठै खोट, अन्तर हाथ सहार दे, बाहर वाहे खोट।Ó संस्कारों से दीक्षित व्यक्ति सभी
प्रकार के दोषों-खोटों से विमुख रहता है। इसमें लोकहित की भावना सामाहित है।
मलूकदास भी इन्सानियत की परिभाषा अपने शब्दों में यूं देते हैं- 'मलूका सोई पीर है जो
जाने पर पीर - जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर।Ó दूंसरों की पीड़ा समझने वाला
इन्सान पशु-पक्षी का भी अहित नहीं सोच सकता। उसे वनस्पति की पीड़ा का भी भान
होता है। चराचर जगत के प्रति मैत्री का यह विस्तार साहित्य ही तो है।
लोक साहित्य में लोककथा-लोकनाटक तथा लोकगीतों को रखा जा सकता है, जिसमें
जनपदीय भाषाओं का रसपूर्ण-कोमल भावनाओं से विकसित साहित्य होता है। भारतीय
लोक साहित्य के मर्मज्ञ आर.सी टेम्पुल के मतानुसार लोक साहित्य की साहित्यिक
दृष्टिकोण से विवेचना करना उसी सीमा तक उचित होगा, जिस सीमा तक उसमें निहित
सुन्दरता और आकर्षण को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे। यदि लोक साहित्य की
वैज्ञानिकी विवेचना की जाती है तो मूल विषय नीरस तथा बेजान हो जाएगा।
लोक के हर पहलू में संस्कृति का दिव्य दर्शन होता है। जरूरत है तीक्ष्ण दृष्टि और सरल
सोच की। लोक साहित्य के उद्भट विद्वान देवेन्द्र सत्यार्थी ने साहित्य के अटूट भंडार को
स्पष्ट तौर पर स्वीार करते हुए कहा था- 'मैं तो जिस जनपद में गया, झोलियाँ भर कर
मोती लाया।Ó
पर्व और त्यौहारों के इतिहास में हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास छिपा
है। बहुत सारे त्यौहार ऐसे हैं जो प्रकृत की गोद में और प्रकृत के संरक्षण में मनाए जाते है
जैसे गोवर्धन पूजा, आंवला पूजन, गंगा सप्तमी, माह कार्तिक में तुलसी पूजन आदि। ये
सभी पर्व हमें अपनी प्राकृतिकता से सह संबंधों की परम्पराओं की याद दिलाते हैं। ऐसे
पर्व जो प्रकृति के विभिन्न घटकों को पूजने के दिन के रूप में मनाए जाते हैं। उसी पर्व के
अवसर पर सम्पन्न क्रियाकलाप और समारोह प्रकृति-प्रेम एवं प्रकृति के प्रति
संवेदनशीलता का नया वातावरण हमें प्रदान कर पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए उत्प्रेरित
करते हैं। प्रकृति घटकों के सह संबंध हमें नई भौतिक संस्कृति एवं लोभ मानस-पटल पर
नहीं होंगे तो स्वार्थमय भौतिक संस्कृति जैसे 'प्रदुषण संस्कृतिÓ प्रकट नहीं होगी और
पर्यावरण शुद्ध बना रहेगा।
भारतीय जनजीवन में वृक्षों को देवता की अवधारणा की परम्परा के फलस्वरूप इनकी
पूजा अर्चना की जाती है। पीपल के वृक्ष में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूति बनायी है। ऐसा
माना जाता है कि पीपल के वृक्ष के फूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण,
पत्तों में श्री हरि और फलों में सब देवताओं से युक्त 'अच्युतÓ निवास करते हैं। मान्यता है
कि अशोक वृक्ष लगाने से कभी शोक नहीं होता। बिल्व वृक्ष दीर्घायु प्रदान करने वाला
होता है। वल्बल, मधुक (महुआ) तथा अर्जुन वृक्ष सब प्रकार का अन्न प्रदान करता है।
कदम्ब वृक्ष से सुफल लक्ष्मी प्राप्त होती है। आम का वृक्ष सौभाग्य बर्धक होता है।
आज भी विभिन्न भागों  में पीपल, तुलसी, गूलर, बरगद, और आम की पंच-वृक्षों में
गणना होती है और पूजे जाते है। धार्मिक आस्था के अनुसार सभी हरे वृक्ष पूजनीय और
उनको काटना पाप समझा जाता है।
विभिन्न तथ्यों एवं लोक जीवन की शैली के आधार पर निष्कर्ष रूप मेें कह सकते हैं कि
वृक्ष हमारी संस्कृति अभिन्न अंग रहे हैंं। (साभार अक्षरशिल्पी)
                                                                          कावरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)