Thursday, 17 October 2013

युद्ध की पृष्ठ भूमि

यज्ञ के समाप्त हो जाने पर कृष्ण युधिष्ठिर से आज्ञा ले द्वारका लौट गये। इसके कुछ समय उपरांत दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि की सहायता से छल द्वारा जुए में पांडवों को हरा दिया और उन्हें इस शर्त पर तेरह वर्ष के लिए निर्वासित कर दिया कि अंतिम वर्ष उन्हें अज्ञातवास करना पड़ेगा। पांडव द्रौपदी के साथ काम्यकवनकी ओर चले गये। उनके साथ सहानुभूति रखने वाले बहुत से लोग काम्यक वन में पहुँचे, जहाँ पांडव ठहरे थे। भोज, वृष्णि और अंधक-वंशी यादव तथा पंचाल-नरेश द्रुपद भी उनसे मिले। कृष्ण को जब यह सब ज्ञात हुआ तो वह शीघ्र पांडवों से मिलने आये। उनकी दशा देख तथा द्रौपदी की आक्रोशपूर्ण प्रार्थना सुन कृष्ण द्रवित हो उठे। उन्होंने द्रौपदी को वचन दिया कि वे पांडवों की सब प्रकार से सहायता करेगें और उनका राज्य वापस दिलावेंगे।
 इसके बाद कृष्ण सुभद्रा तथा उसके बच्चे अभिमन्यु को लेकर द्वारका वापस गये। पांडवों ने अज्ञातवास का एक साल राजा विराट के यहाँ व्यतीत किया। कौरवों ने विराट पर चढ़ाई कर उनके पशु छीन लिये थे, पर पांडवों की सहायता से विराट ने कौरवों पर विजय पाई और अपने पशुओं को लौटा लिया। विराट को अन्त में यह ज्ञात हुआ कि उनके यहाँ पांडव गुप्त रूप से अब तक निवास करते रहे थे। उन्होंने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के साथ कर दिया। इस विवाह में अभिमन्यु के मामा कृष्ण बलदेव भी सम्मिलित हुए।
इसके उपरांत विराट नगर में सभा हुई और उसमें विचार किया गया कि कौरवों से पांडवों का समझौता किस प्रकार कराया जाय। बलराम ने कहा कि शकुनि का इस झगड़े में कोई दोष नहीं था; युधिष्ठिर उसके साथ जुआ खेलने ही क्यों गये ? हाँ, यदि किसी प्रकार संधि हो जाय तो अच्छा है। सात्यकि और द्रुपद को बलराम की ये बाते अच्छी नहीं लगी। कृष्ण ने द्रुपद के कथन की पुष्टि करते हुए कहा कि कौरव अवश्य दोषी है। अतं में सर्व-सम्मति से यह तय हुआ कि संधि के लिए किसी योग्य व्यक्ति को दुर्योधन के पास भेजा जाय। द्रुपद ने अपने पुरोहित को इस काम के लिए भेजा। कृष्ण इस सभा में सम्मिलित होने के बाद द्वारका चले गये। संधि की बात तब न हो सकी। दुर्धोधन पांडवों को पाँच गाँव तक देने की राजी न हुआ। अब युद्ध अनिवार्य जानकर दुर्योधन और अर्जुन दोनों श्री कृष्ण ने सहायता प्राप्त करने के लिए द्वारका पहुँचे। नीतिज्ञ कृष्ण ने पहले दुर्योधन ने पूछा कि तुम मुझे लोगे या मेरी सेना को ? दुर्योधन ने तत्त्काल सेना मांगी। कृष्ण ने अर्जुन को वचन दिया कि वह उसके सारथी बनेगें और स्वयं शस्त्र न ग्रहण करेगें।
कृष्ण अर्जुन के साथ इन्द्रप्रस्थ आ गये। कृष्ण के आने पर पांडवों ने फिर एक सभा की और निश्चय किया कि एक बार संधि का और प्रयत्न किया जाय। युधिष्ठिर ने अपना मत प्रकट करने हुए कहा- हम पाँच भाइयों को अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणाबत और एक कोई अन्य गांव निर्वाह मात्र के लिए चाहिए। इतने पर ही हम मान जायेगें, अन्यथा युद्ध के लिए प्रस्तुत होना पड़ेगा। उनके इस कथन का समर्थन अन्य लोगों ने लिए प्रस्तुत होना पड़ेगा। उनके इस कथन का समर्थन अन्य लोगों ने भी किया। वह तय हुआ कि इस बार संधि का प्रस्ताव लेकर कृष्ण कौरवों के पास जाये। कृष्ण संधि कराने को बहुत इच्छुक थे। उन्होंने दुर्योधन की सभा में जाकर उसे समझाया और कहा कि केवल पाँच गाँव पांडवों को देकर झगड़ा समाप्त कर दिया जाय। परंतु अभिमानी दुर्योधन स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्ध के वह पांडवों को सुई की नोंक के बराबर भी ज़मीन न देगा।
महाभारत युद्ध
कृष्ण और अर्जुन
इस प्रकार कृष्ण भी संधि कराने में असफल हुए। अब युद्ध अनिवार्य हो गया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी सेनाएँ तैयार करने लगे। इस भंयकर युद्धग्नि में इच्छा या अनिच्छा से आहुति देने को प्राय: सारे भारत के शासक शामिल हुए। पांडवों की ओर मध्स्य, पंचाल, चेदि, कारूश, पश्चिमी मगध, काशी और कंशल के राजा हुए। सौराष्ट्र-गुजरात के वृष्णि यादव भी पांडवो के पक्ष में रहे। कृष्ण, युयंधान और सात्यकि इन यादवों के प्रमुख नेता थे। ब्रजराम अद्यपि कौरवों के पक्षपाती थे, तो भी उन्होंने कौरव-पांडव युद्ध में भाग लेना उचित न समझा और वे तीर्थ-पर्यटन के लिए चले गये। कौरवों की और शूरसेन प्रदेश के यादव तथा महिष्मती, अवंति, विदर्भ और निषद देश के यादव हुए। इनके अतिरिक्त पूर्व में बंगाल, आसाम, उड़ीसा तथा उत्तर-पश्चिम एवं पश्चिम भारत के बारे राजा और वत्स देश के शासक कौरवों की ओर रहे। इस प्रकार मध्यदेश का अधिकांश, गुजरात और सौराष्ट्र का बड़ा भाग पांडवों की ओर था और प्राय: सारा पूर्व, उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी विंध्य कौरवों की तरफ। पांडवों की कुल सेना सात अक्षौहिणी तथा कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी थी।
दोनों ओर की सेनाएं युद्ध के लिए तैयार हुई। कृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा सात्वकि ने पांडव-सैन्य की ब्यूह-रचना की। कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध मैदान में दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ डटीं। अर्जुन के सारथी कृष्ण थे। युद्धस्थल में अपने परिजनों आदि को देखकर अर्जुन के चित्त में विषाद उत्पन्न हुआ और उसने युद्ध करने से इंकार कर दिया। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के निष्काम कर्मयोग का उपदेश दिया और उसकी भ्रांति दूर की। अब अर्जुन के युद्ध के लिए पूर्णतया प्रस्तुत हो गया। महाभारत युद्ध में शंख का भी अत्यधिक महत्त्व था। शंखनाद के साथ युद्ध प्रारंभ होता था। जिस प्रकार प्रत्येक रथी सेनानायक का अपना ध्वज होता था, उसी प्रकार प्रमुख योद्धाओं के पास अलग-अलग शंख भी होते थे। भीष्मपर्वांतर्गत गीता उपपर्व के प्रारंभ में विविध योद्धाओं के नाम दिए गए हैं। कृष्ण के शंख का नाम 'पांचजन्य' था, अर्जुन का 'देवदत्त', युधिष्ठिर का 'अनंतविजय', भीम का 'पौण्ड', नकुल का 'सुघोष' और सहदेव का 'मणिपुष्पक'। अठारह दिन तक यह महाभीषण संग्राम होता रहा। देश का अपार जन-धन इसमें स्वाहा हो गया। कौरवों के शक्तिशाली सेनापति भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य आदि धराशायी हो गये। अठारहवें दिन दुर्योधन मारा गया और महाभारत युद्ध की समाप्ति हुई। यद्यपि पांडव इस युद्ध में विजयी हुए, पर उन्हें शांति न मिल सकी। चारों और उन्हें क्षोभ और निराशा दिखाई पड़ने लगी। श्रीकृष्ण ने शरशय्या पर लेटे हुए भीष्मपितामह से युधिष्ठर को उपदेश दिलवाया। फिर हस्तिनापुर में राज्याभिषेक-उत्सव सम्पन्न करा कर वे द्वारका लौट गये। पांडवों ने कुछ समय बाद एक अश्वमेध यज्ञ किया और इस प्रकार वे भारत के चक्रवर्ती सम्राट् घोषित हुए। कृष्ण भी इस यज्ञ में सम्मिलित हुए और फिर द्वारका वापस चले गये। यह कृष्ण की अंतिम हस्तिनापुर यात्रा थी। अब वे वृद्ध हो चुके थे। महाभारत-संग्राम में उन्हें जो अनवरत परिश्रम करना पड़ा उसका भी उनके स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

पांडवों का राजसूय यज्ञ और जरासंध का वध

कुछ समय बाद युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारियाँ आरंभ कर दी। और आवश्यक परामर्श के लिए कृष्णा को बुलाया। कृष्ण इन्द्रप्रस्थ आये और उन्होंने राजसूय यज्ञ के विचार की पुष्टि की। उन्होंने यह सुझाव दिया कि पहले अत्याचारी शासकों को नष्ट कर दिया जाय और उसके बाद यज्ञ का आयोजन किया जाय। कृष्ण ने युधिष्ठिर को सबसे पहले जरासंध पर चढ़ाई करने की मन्त्रणा दी। तद्नुसार भीम और अर्जुन के साथ कृष्ण रवाना हुए और कुछ समय बाद मगध की राजधानी गिरिब्रज पहुँच गये। कृष्ण की नीति सफल हुई और उन्होंने भीम के द्वारा मल्लयुद्ध में जरासंध को मरवा डाला। जरासंध की मृत्यु के बाद कृष्ण ने उसके पुत्र सहदेव को मगध का राजा बनाया।[26] फिर उन्होंने गिरिब्रज के कारागार में बन्द बहुत से राजाओं को मुक्त किया। इस प्रकार कृष्ण ने जरासंध-जैसे महापराक्रमी और क्रूर शासक का अन्त कर बड़ा यश पाया। जरासंध के पश्चात पांडवों ने भारत के अन्य कितने ही राजाओं को जीता।
अब पांडवों का राजसूय यज्ञ बड़ी धूमधाम से आरम्भ हुआ। कृष्ण ने यज्ञ में आये हुए ब्राह्मणों के पैर आदर-भाव से धोये। ब्रह्मचारी भीष्म ने कृष्ण की प्रशंसा की तथा उनकी `अग्रपूजा` करने का प्रस्ताव किया। सहदेव ने सर्वप्रथम कृष्णको अर्ध्यदान दिया। चेदि-नरेश शिशुपाल कृष्ण के इस सम्मान को सहन न कर सका और उलटी-सीधी बातें करने लगा। उसने युधिष्ठिर से कहा कि 'कृष्ण न तो ऋत्विक् है, न राजा और न आचार्य। केवल चापलूसी के कारण तुमने उसकी पूजा की है।'[27] शिशुपाल दो कारणों से कृष्ण से विशेष द्वेष मानता था-प्रथम तो विदर्भ कन्या रुक्मिणी के कारण, जिसको कृष्ण हर लाये थे और शिशुपाल का मनोरथ अपूर्ण रह गया था। दूसरे जरासंध के वध के कारण, जो शिशुपाल का घनिष्ठ मित्र था। जब शिशुपाल यज्ञ में कृष्ण के अतिरिक्त भीष्म और पांडवों की भी निंदा करने लगा तब कृष्ण से न सहा गया और उन्होंने उसे मुख बंद करने की चेतावनी दी। किंतु वह चुप नहीं रह सका। कृष्ण ने अन्त में शिशुपाल को यज्ञ में ही समाप्त कर दिया। अब पांडवों का राजसूर्य यज्ञ पूरा हुआ। पर इस यज्ञ तथा पांडवों की बढ़ती को देख उनके प्रतिद्वंद्वी कौरवों के मन में विद्वेश की अग्नि प्रज्वलित हो उठी और वे पांडवों को नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे।


वसुदेव उवाच

  • देवर्षे! जो व्यक्ति सुहृद न हो, जो सुहृद तो हो किन्तु पण्डित न हो तथा जो सुहृद और पण्डित तो हो किन्तु अपने मन को वश में न कर सका हो- ये तीनों ही परम गोपनीय मन्त्रणा को सुनने या जानने के अधिकारी नहीं हैं।
  • स्वर्ग विचरनेवाले नारदजी! मैं आपके सौहार्द पर भरोसा रखकर आपसे कुछ निवेदन करूँगा। मनुष्य किसी व्यक्ति बुद्धि-बल की पूर्णता देखकर ही उससे कुछ पूछता या जिज्ञासा प्रकट करता है।
  • मैं अपनी प्रभुता प्रकाशित करके जाति-भाइयों, कुटुम्बी-जनों को अपना दास बनाना नहीं चहता। मुझे जो भोग प्राप्त होते हैं, उनका आधा भाग ही अपने उपभोग में लाता हूँ, शेष आधा भाग कुटुम्बीजनों के लिये ही छोड़ देता हूँ और उनकी कड़वी बातों को सुनकर भी क्षमा कर देता हूँ।
  • देवर्षे! जैसे अग्नि को प्रकट करने की इच्छा वाला पुरुष अरणीकाष्ठ का मन्थन करता है, उसी प्रकार इन कुटुम्बी-जनों का कटुवचन मेरे हृदय को सदा मथता और जलाता रहता है।
  • नारद जी! बड़े भाई बलराम में सदा ही असीम बल है; वे उसी में मस्त रहते हैं। छोटे भाई गद में अत्यन्त सुकुमारता है (अत: वह परिश्रम से दूर भागता है); रह गया बेटा प्रद्युम्न, सो वह अपने रूप-सौन्दर्य के अभिमान से ही मतवाला बना रहता है। इस प्रकार इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हूँ।
  • नारद जी! अन्धक तथा वृष्णि वंश में और भी बहुत से वीर पुरुष हैं, जो महान सौभाग्यशाली, बलवान एवं दु:सह पराक्रमी हैं, वे सब के सब सदा उद्योगशील बने रहते हैं।
  • ये वीर जिसके पक्ष में न हों, उसका जीवित रहना असम्भव है और जिसके पक्ष में ये चले जाएँ, वह सारा का सारा समुदाय ही विजयी हो जाए। परन्तु आहुक और अक्रूर ने आपस में वैमनस्य रखकर मुझे इस तरह अवरुद्ध कर दिया है कि मैं इनमें किसी एक का पक्ष नहीं ले सकता।
  • आपस में लड़ने वाले आहुक और अक्रूर दोनों ही जिसके स्वजन हों, उसके लिये इससे बढ़कर दु:ख की बात और क्या होगी? और वे दोनों ही जिसके सुहृद् न हों, उसके लिये भी इससे बढ़कर और दु:ख क्या हो सकता है? (क्योंकि ऐसे मित्रों का न रहना भी महान् दु:खदायी होता है)
  • महामते! जैसे दो जुआरियों की एक ही माता एक की जीत चाहती है तो दूसरे की भी पराजय नहीं चाहती, उसी प्रकार मैं भी इन दोनों सुहृदों में से एक की विजय कामना करता हूँ तो दूसरे की पराजय नहीं चाहता।
  • नारद जी! इस प्रकार मैं सदा उभय पक्ष का हित चाहने के कारण दोनों ओर से कष्ट पाता रहता हूँ। ऐसी दशा में मेरा अपना तथा इन जाति-भाइयों का भी जिस प्रकार भला हो, वह उपाय आप बताने की कृपा करें।

श्रीकृष्ण का द्वारका का जीवन

द्वारका के विषय में ऊपर लिखा जा चुका है कि यह नगर बिलकुल नवीन नहीं था। वैवस्वत मनु के एक पुत्र शर्याति को शासन में पश्चिमी भारत का भाग मिला था। शर्याति के पुत्र आनर्त के नाम पर कठियावाड़ और समीप के कुछ प्रदेश का नाम आनंत प्रसिद्ध हुआ। उसकी राजधानी कुशस्थली के ध्वंसावशेषों पर कृष्ण कालीन द्वारका की स्थापना हुई।[28] यहाँ आकर कृष्ण ने उग्रसेन को वृष्णिगण का प्रमुख बनाया। द्वारका में कृष्ण के वैयक्तिक जीवन की पहली मुख्य घटना थी-कुंडिनपुर[29] की सुंदरी राजकुमारी रुक्मिणी के साथ विवाह। हरिवंश पुराण में यह कथा विस्तार से दी हुई है। रुक्मिणी का भाई रूक्मी था। वह अपनी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल से करना चाहता था। मगधराज जरासंध भी यही चाहता था। किंतु कुंडिनपुर का राजा कृष्ण को ही अपनी कन्या देना चाहता था। रुक्मिणी स्वयं भी कृष्ण को वरना चाहती थी। उनके सौंदर्य और शौर्य की प्रशंसा सुन रखी थी। रुक्मिणी का स्वयंवर रचा गया और वहाँ से कृष्ण उसे हर ले गये। जिन लोगों ने उनका विरोध किया वे पराजित हुए। इस घटना से शिशुपाल कृष्ण के प्रति गहरा द्वेष मानने लगा। हरिवंश के अनुसार बलराम का विवाह भी द्वारका जाकर हुआ।[30] संभवत: पहले बलराम का विवाह हुआ, फिर कृष्ण का। बाद के पुराणों में बलराम और रेवती की विचित्र कथा मिलती है। कृष्ण की अन्य पत्नियाँ-रुक्मिणी के अतिरिक्त कृष्ण की सात अन्य पत्नियाँ होने का उल्लेख प्राय: सभी पुराणों में मिलता है।[31] इनके नाम सत्यभामा, जांबवती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मण दिये हैं। इनमें से कोई को तो उनके माता-पिता ने विवाह में प्रदान किया और शेष को कृष्ण विजय में प्राप्त कर लाये। सतांन-पुराणों से ज्ञात होता है कि कृष्ण के संतानों की संख्या बड़ी थी ।[32] रुक्मिणी से दस पुत्र और एक कन्या थी इनमें सबसे बड़ा प्रद्युम्न था। भागवतादि पुराणों में कृष्ण के गृहस्थ-जीवन तथा उनकी दैनिक चर्या का हाल विस्तार से मिलता है। प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध का विवाह शोणितपुर[33] के राजा वाणासुर की पुत्री ऊषा के साथ हुआ।

यादवों का अंत

अंधक-वृष्णि यादव बड़ी संख्या में महाभारत युद्ध में काम आये। जो शेष बचे वे आपस में मिल-जुल कर अधिक समय तक न रह सके। श्रीकृष्ण-बलराम अब काफ़ी वृद्ध हो चुके थे और संभवत: यादवों के ऊपर उनका प्रभाव भी कम हो गया था। पौराणिक विवरणों से पता चलता है कि यादवों में विकास की वृद्धि हो चली थी और ये मदिरा-पान अधिक करने लगे थे। कृष्ण-बलराम के समझाने पर भी ऐश्वर्य से मत्त यादव न माने और वे कई दलों में विभक्त हो गये। एक दिन प्रभास के मेले में, जब यादव लोग वारुणी के नशें में चूर थे, वे आपस में लड़ने लगे। वह झगड़ा इतना बढ़ गया कि अंत में वे सामूहिक रूप से कट मरे। इस प्रकार यादवों ने गृह-युद्ध अपना अन्त कर लिया।[34]

अंतिम समय

प्रभास के यादवयुद्ध में चार प्रमुख व्यक्तियों ने भाग नहीं लिया, जिससे वे बच गये। ये थे-कृष्ण, बलराम, दारुक सारथी और बभ्रु। बलराम दु:खी होकर समुद्र की ओर चले गये और वहाँ से फिर उनका पता नहीं चला। कृष्ण बड़े मर्माहत हुए। वे द्वारका गये और दारुक को अर्जुन के पास भेजा कि वह आकर स्त्री-बच्चों को हस्तिनापुर लिवा ले जायें। कुछ स्त्रियों ने जल कर प्राण दे दिये। अर्जुन आये और शेष स्त्री-बच्चों को लिवा कर चले।[35] कहते है मार्ग में पश्चिमी राजपूताना के जंगली आभीरों से अर्जुन को मुक़ाबला करना पड़ा। कुछ स्त्रियों को आभीरों ने लूट लिया।[36] शेष को अर्जुन ने शाल्ब देश और कुरु देश में बसा दिया। कृष्ण शोकाकुल होकर घने वन में चले गये थे। वे चिंतित हो लेटे हुए थे कि जरा नामक एक बहेलियें ने हरिण के भ्रम से तीर मारा। वह वाण श्रीकृष्ण के पैर में लगा, जिससे शीघ्र ही उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया। मृत्यु के समय वे संभवत: 100 वर्ष से कुछ ऊपर थे। कृष्ण के देहांत के बाद द्वापर का अंत और कलियुग का आरंभ हुआ। श्रीकृष्ण के अंत का इतिहास वास्तव में यादव गण-तंत्र के अंत का इतिहास है। कृष्ण के बाद उनके प्रपौत्र बज्र यदुवंश के उत्तराधिकारी हुए। पुराणों के अनुसार वे मथुरा आये और इस नगर को उन्होंने अपना केन्द्र बनाया। कही-कहीं उन्हें इन्द्रप्रस्थ का शासक कहा गया है।

Saturday, 7 September 2013

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

 बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

 बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

  बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

 बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

 बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकिया

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

 बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की झलकियां 28.8.2013

बिलासपुर, छग. यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर आयोजित शोभायात्रा का दृश्य.

Monday, 2 September 2013

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां


 बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां
 

बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

 बिलासपुर, छत्तीसगढ. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 28 अगस्त 2013 की झलकियां

Sunday, 21 July 2013

सम्मान समारोह 21.07.2013

डॉ. खूबचंद बघेल जयंती समारोह समिति बिलासपुर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में युवा सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रेस कर्मचारी संघ के महासचिव तेरस यादव को छत्तीसगढ सपूत सम्मान प्रदान करते छग विधानसभा के अध्यक्ष श्री धरमलाल कौशिक.

Wednesday, 27 March 2013

वृक्ष पहेलियां : -समसेर कोसलिया ‘नरेश’

अनूठी रचना
 प्रिय समसेर कोसलिया ‘नरेश’ हरियाणा का एक एसा उदयमान लेखक-कवि है, जिसमें सृजनात्मक प्रतिभा की उज्जवल संभावनाएं स्पष्ट झलकती हैं तथा साक्षी हैं। ग्रामीण अंचल और लोकजीवन का यह चित्रकार हरियाणवी भाषा के लुप्त लोकसाहित्य की खोज में और उसे प्रकाश में लाने में भी प्रयत्नशील है। वहां कुछ नया कुछ मौलिक सृजन करने में भी प्यास भी है। वृक्ष पहेलियां इसका स्पष्ट उदाहरण है।
‘ वृक्ष पहेलियां’ इसकी अनूठी कृति है जिसमें चार सौ से भी अधिक वृक्षों का संक्षिप्त परिचय दो से चार पंक्तियों में संकेत भाषा द्वारा दिया गया है।  इन संकेतों को छंद की सीमा में बांधने का प्रयास भले ही परिपक्व न रहा हो, परन्तु एक युवा कवि द्वारा इतनी अधिक संख्या में पेड़ों के नामों की जानकारी और पहचान अपने आप में आश्चर्यजनक है। जो सचमुच कल्पनातीत है। मंै इसे ‘नरेश’ की आसाधारण उपलब्धि मानता हंू। इस अविश्वसनीय आशातीत जानकारी का छंदोबद्ध या लयबद्ध करने का प्रथम प्रयास ही इसे संभवत: गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड की सदस्यता का ही नहीं, अवार्ड का पात्र बनाता है क्योंकि इतनी संख्या में पेड़ों की जानकारी रखना और काव्य के रूप में ढालना भी अपने आप में एक विश्व कीर्तिमान है। हरियाणा प्रदेश के अपेक्षाकृत पिछडे़ क्षेत्र की इस प्रतिभा की प्रशंसा जितनी की जाए, वह कम है।
आजकल पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के सरकारी और गैर सरकारी प्रयास बहुत हो रहे हैं जिनमें पौधारोपण भी एक है। समसेर कोसलिया ‘नरेश’ की वृक्ष पहेलियां न केवल बच्चों बल्कि हर आयु और वर्ग के व्यक्तियों के ज्ञानवृद्धि करने के साथ-साथ प्रकृति के इस अनमोल धरोहर को सुरक्षित रखने की प्रेरणा भी देगी। आशा है विद्यालयों में, पुस्तकालयों में , पंचायतों में इस छंदोबद्ध, मनोरंजक एवं उपयोगी पुस्तक का सहर्ष स्वागत होगा।
आशा है समसेर कोसलिया ‘नरेश’ की लेखनी अपनी सृजनात्मक शक्ति को साहित्य की विभिन्न विधाओं में विकसित कर शीघ्र ही अपनी अलग पहचान देने में सक्षम होगी। शुभाशीर्वाद एवं मंगलकामनाओं सहित...
-उदयभानु ‘हंश’
(राज्यकवि हरियाणा), सूर पुरस्कार से सम्मानित, 202, लाजपत नगर,
हिसार-125001(हरियाणा)

मन की बात
मेरे जीवन की पहली पुस्तक ‘वृक्ष पहेलियां’ आपके हाथों में है जिसका अध्ययन करने के बाद ही आप इसे ठीक ठहरायेंगे या गलत यह आप निर्भर होगा।  पुस्तक अच्छी लगे तब भले ही मुझे पत्र न लिखें किंतु पुस्तक में गलतियां अथवा खामियां पाई जांवे तो आलोचानात्मक पत्र अवश्य लिखें, क्योंकि किसी भी कार्य में गलती कमी को उजागर करने वाला पहले भले ही दुश्मन की तरह लगे, मगर वह वास्तव में दुश्मन न होकर सच्चा मित्र वही होता है जो गलतियों के मार्ग से हटाकर अच्छाई की राह पर चलाता है। मैंने स्वयं महसूस किया है कि पुराने जमाने में मुंह पर बड़ाई में करना कम और बुराई को उजागर करके सचेत करना ज्यादा काम आलोचक का रहा है।  किंतु आज के इस युग में सामने बड़ाई करना ज्यादा तथा बुराई करना कम ही देखने को मिलता है। सामने बड़ाई करने की बजाए जो कमी रह गयी हो उसे सामने उजागर करना ज्यादा अच्छा रहता है ताकि मनुष्य भविष्य में अपनी गलतियों अथवा कमियों को दूर कर सके। इसलिए आप मेरी इस पुस्तक की गहराईयों तक पहुंचकर इसकी कमियों को उजागर करने के इस यज्ञ में अपनी आहूति अवश्य डालें।
‘वृक्ष पहेलियां’ नामक शीर्षक से इस पुस्तक में झाड़ीनुमा से लेकर मध्यम, विशालकाय वृक्षों की पहचान, गुण-दोष एवं नाम की जानकारी सहित चार सौ बीस पहेलियां लिखी गयी हैं। इस संख्या का अर्थ चालाक भी होता है इसमें मुझे चालाक अथवा चार सौ बीस न माने क्योंकि मैं एक भोला-भाला अथवा जुनूनी किस्म का इंसान हूंँ। इस जुनून के चलते ही यह पुस्तक वह भी साहित्यकारों के समाज से कुछ हटकर लिखी गयी है।  मेरे कानों में कुछ साहित्यकार भाइयों की आवाज आई है कि यह पुस्तक साहित्य में शामिल कम ही हो पायेगी तो कुछ साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमियों की आवाज यह भी आई कि यह पुस्तक साहित्य में अवश्य गिनी जायेगी क्योंकि इसमें  वह कुछ है जो कि साहित्य में होना चाहिए। कुछ लोगों ने मेरे सामने यहां तक भी कह दिया कि आपकी यह पुस्तक तो थ्री इन वन अर्थात एक चीज से तीन लाभ वाली है।  कहने का तात्पर्य यह है कि इसको साहित्य, बाल साहित्य तथा पर्यावरण साहित्य मान्यता अवश्य मिलेगी। वर्तमान में चाहे पाठक हो साहित्यकार समाज दोनों ही वर्ग साहित्य पर छोटी-छोटी रचनाओं को पढऩे या लिखने में ज्यादा महत्व देते हैं। चाहे उसमें लघु कथा हो या कविताएं हों। मैने वर्तमान काल के अनुरूप चलने का कदम उठाया है। छोटी रचनाओं में ज्यादा जानकारियां सारगर्भित करने का प्रयास किये हैं यह प्रयास कितने खरे उतरते हैं यह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा है।
जहां तक मैने पहेलियां आम आदमी के समझ में आ जाए इसलिए जनभाषा का प्रयोग करने का प्रयास किया है। किसी साहित्यकार का कथन है कि सरल पढऩा आसान है मगर सरल लिखना आसान नहीं है। अगर वृक्ष पहेलियों को कठिन शब्दों के साथ प्रस्तुत किया जाता तो आम आदमी तक मेरे मन की बात पहुंचनी मुश्किल हो जाती। मैं मानता हूं कि पहेलियों में सरल भाषा का प्रयोग करते-करते भूल-चूक से कोई कठिन शब्द उपयोग में आ गया हो तो उसके लिये क्षमा चाहता हूं। यह पुस्तक आप प्रबुद्धजनों के हाथ में है और आप ही मेरा उचित मार्गदर्शन करेंगे। आपकी इजाजत होगी तो मैं इस दिशा में सार्थक प्रयास करूंगा। मंै सूर पुरस्कार से सम्मानित राजकवि श्री उदयभानु हंस के प्रति हृदय से आभारी हूं जिन्होंने इस पुस्तक की भूमिका लिखकर कृतार्थ किया। जिस तरह मुझे में ‘सदैव उपयोगी मिनी कलैण्डर’ नामक कति पर ‘गिनीज वल्र्ड रिकार्ड’ की सदस्यता का मौका मिला है मुझे विश्वास है कि इस तरह ही मुझे मेरी इस कृति पर भी आप लोगों का प्यार जरूर मिलेगा इस आशा के साथ... आपका
-समसेर कोसलिया ‘नरेश’                                                                                                                                  














विषय क्रम

अनूठी रचना
मन की बात
पहेलियां














वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर का राज्य वृक्ष कहलावे। हरे फल का साग सूखा खाया जावे।।
प्रथम कटे तो औषधी कहलाता। मध्य कटता तो एक गांव बन जाता।।
2. एक वृक्ष का तीन अक्षर में नाम। टहनी आवे दातुन के काम ।।
प्रथम काटे हाथ बन जाऊ। कांटा लागे कीक लगवांऊ।।
3. एक वृक्ष दो अक्षर का बताया।  करता यह कीटों का सफाया।।
उल्टा अंग्रेजी का धन कहलाये। यह औषधी, दातुन के काम आये।।
4. तीन अक्षर के इस राज्य वृक्ष को, सभी ने है पवित्र माना।।
प्रथम कटे समय , मध्य कटे फल, अन्त कटे मवाद बन जाना।।
5.साढ़े तीन अक्षर में नाम। लकड़ी आए मणियों के काम।।
इस पर बैठ कृष्ण नेे बंशी बजाई। इसकी उम्र भी हजारों साल बताई।।

उत्तर-1. खेजडी  2. कीकर  3. नीम  4. पीपल  5. कदम्ब





वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षर का नाम बतलाया। शांति का प्रतीक कहलाया।।
दिया राष्ट्रीय वृक्ष का दर्जा इसको। सम्राट ने विदेशों में लगवाया जिसको।।
2. दो अक्षर का यह एक वृक्ष है। पर्यावरण संरक्षण में दक्ष है।।
साल में एक बार फल लगे। सर्दी में गर्म गर्मी में छांव शीतल लग।।
3. तीन अक्षर का वृक्ष का नाम। तीन बार फल लगनें का काम।।
इस पेड की हरी लकडी भी जलती। दूध की मथानी लडकी से बनती।।
4. दो अक्षर मे नाम आता। भूत वृक्ष कहा जाता।।
उल्टे नाम से हत्या हो जाती।  छाल रंग के काम में आती।।
5. दो अक्षर का नाम बताया।  इसका फल सबको भाया।।
सबसे ज्यादा किस्म बताई। फल में गुठली है बताई।।

उत्तर:- 1. बड़  2. पिलू 3. करीर 4. धव 5. आम





वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर के नाम वाला । इसका फल है काला-काला ।।
 मधुमेह रोगी का हितैषी। छाया होती है छत जैसी ।।
2. चार अक्षर के नाम वाला। जाटों में गोत्र कहलाता।।
इस पेड़ की अति गहरी छाया। फर्नीचर इमारत बने लकड़ी की माया।।
3. तीन अक्षर के नाम वाला। हाथ रंगने के काम आऊं।।
मेरी पत्तियां है चमत्कारी। सकल नरियों को है प्यारी।।
4. एक ऐसा वृक्ष होता जिस पर फल लगे सकल वर्ष।।
सब्जी, पानी, सलाद, किसी में भी डालो रस।।
5. दो अक्षर का मेरा नाम। फल आता खाने के काम।।
कहीं लगता मेरा तोल। कहीं गिरकर लागे मोल।।

उत्तर:- 1. जामुन  2. सागवान 3. मेंहदी  4. नींबू  5. केला




वृक्ष पहेलियां
1. सांप के फन जैसा पत्ता मेरा। काटू तब तो देख दम तेरा।।
चार अक्षर का नाम बताऊं। औषध बाड़ के काम आऊं।।
2. तीन अक्षर का होता मेरा नाम। आऊं पागल कुत्ते की दवा के काम।
प्रथम कटे तो महादेव बनता। मेरी करो बाड़, पशु नहीं चरता।।
3. कागज कलम से नाता मेरा। मुझसे छप्पर भी बनता तेरा।
चार अक्षर का नाम बतलाए। चारपाई में भी काम आए।।
4. वह वृक्ष होता फलदार भी। इसक फल दानेदार भी।
इस नाम में तीन अक्षर बताए। इसका शरबत भी बनाया जाए।
5. हिमालय में मेरा निवास। फलदार हूं मैं एकदम खास।
मेरे नाम में दो अक्षर। पहेली बतावें साक्षर।।

उत्तर:- 1. नागफन  2. थूहर 3. सरपत  4. अनार  5. सेब




वृक्ष पहेलियां
1. हिमालय में पाया जाऊं। फल नहीं मेवा कहलाऊं।।
चार अक्षर का है नाम मेरा। फल तोड़े तो रद टूटे मेरा।।
2. तीन अक्षर का नाम। फल खाने के काम।।
नगर बिना नारी है बेकाम। अब तो बताओ मेरा नाम।।
3. तीन अक्षर का सब है नाम बतलाते। मेरे नाम का सम्राट है कहलाते।
मैं होता छायादार भी। एक किस्म हो शोभादार भी।।
4. तरप अक्षर का होता मेरा नाम। मेरा रस आता पूजा के काम।।
मेरा है दवाई से गहरा नाता। मेरा नाम का गौत्र भी कहलाता।।
5. सूखे क्षेत्र का फल सेब कहलाता। हर कोई है फल को चाय से खाता।।
अजा ही पत्ते भूख मिटाते। लागे टेडे नुकीले कांटे।।

उत्तर:- 1. अखरोट  2. पपीता 3. अशोक  4. कपूर  5. बेरी




वृक्ष पहेलियां
1. चार अक्षर का है मेरा नाम। गहरी छाया, फल देनरा काम।।
पत्तों से कीड़े हैं पलते। कीड़ों से हम कपड़ा बुनते।।
2. ख्याति की तुम अंग्रेजी बनाओ। मेरा नाम तुम स्वत: ही पाओ।।
प्लाईवुड लकड़ी से बनती। वृक्ष की हरी लकड़ी चिरती।।
3. हिमालय से चलकर आता। तीन अक्षर में नाम आता।।
दूध में मैं जुड़ता जाता। जब मैं बुद्धी को बढ़ाता।।
4. चार अक्षर का पेड़ कहलाता। फल गरीबों का सेब कहलाता।।
साल में दो बार फल लगता। तोता काटने है भगता।।
5. मैं गहरी छाया का राजा। बेकार होती लकड़ी ताजा।
कुल तीन अक्षर का नाम आता। प्रथम कटे बराबर कहलाता।

उत्तर:- 1. शहतूत  2. पापुलर 3. बादाम  4. अमरूद  5. शीशम




वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर वृक्ष कहलाता। मध्य कटे तो सीर बन जाता।।
अंत कटे तो शीश बन जावे। आदि कटे तो सर कहलावे।।
2. राजपुष्प इसका फूल कहलाता। सुखे इलाके में यह पाया जाता।।
तीन अक्षर का यह बताये नाम। लकड़ी इमारत में आये काम।।
3. पत्ते शिव पूजन में आये काम। केवल दो अक्षर में आये नाम।
नाम अर्थ से बना लता। बने सर्वथ फल से दिया बता।।
4. इसका चार अक्षर का नाम है। फूलों का कविताओं में नाम है।
फूलों की उपमा होवत भारी। कच्ची कलियों की शोभा न्यारी।
5. चार अक्षर के नाम वाला। यह वृक्ष है बड़ा निराला।
जल शुद्ध करे इसका सर्वरस। आज हम गए हैं तरस।।

उत्तर:- 1. सिरस  2. रोहेड़ा 3. बेल 4. कचनार  5. सहिजना
                



वृक्ष पहेलियां
1.साढ़े तीन अक्षर नाम में आये। यह एक बहुत अच्छा वृक्ष कहलाये।।
दवाइयों के यह काम आता । फिर भी यह जंगल कहा जाता।।
2.इसका  तीन अक्षर का है नाम । वृक्ष आता औषधि के काम ।।
आदि कटे जवानी उतर जाती । मध्य कटे हिमालय बन जाती ।।
3.यह अति लघु  वृक्ष है कहलाता। पर्याय एक राजा का गोत्र बतलाता।।
यह दूध का है खजाना अपार । नाम में दो आखर मेरे यार
4.तीन अक्षर का मेरा नाम। पत्तों का नहीं होवे काम ।।
आदि कटे कृष्ण-लीला कहावे। मध्य कट जाय तो बात उलझ जावे।।
5. प्रथम कटे तो हाथ लगादे। मध्य कटे तो नैया पार लगादे।।
अंत कटे तो देश कहावे। तीन अक्षर का नाम बतावे।।

उत्तर:- 1. गम्भारी 2. पाढ़ल 3. आक(सूरी) 4. फरास  5. पाकर.



वृक्ष पहेलियां

1. तीन अक्षर मे नाम आता। औषधी में यह काम आता ।।
प्रथम कटे लावा कहलाता।। मध्य कटे तो नाम बतलाता।।
2. तीन आखर का है नाम। आता अचार के काम।।
ठण्ड से नाता, दूजा नाम रखता। फल रस चिपकाने के काम आता।।
 3. तीन अक्षर का भतेरा नाम। औषध दे करू तेरा काम ।
दूसरा नाम जिला कहलाता। ये सब को वृक्ष है बतलाता।।
5. तीन अक्षर का नाम कहलाता । दूसरा नाम रात बतलाता।।
यह सब पेड़ है बतलाता। दवा छाया के काम आता।।
4.स्वर्ण जैसा है नाम मेरा । छांव, दाव से पडे काम तेरा।।
चार अक्षर मेरे नाम में आते। दूजे में कृष्ण भी कहलाते।।

उत्तर:- 1. भीलावा 2.लसोडा 3. सिहोरा (सिहोर) 4. अरनी  5. सोनापाठा


                             
     वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर में आता है नाम। आए छांव, ईंधन औषध के काम ।।
दूजा नाम बांध कहलाता। यह सकल पड़े है बतलाता।।
2. केरल का राज्य वृक्ष कहलावे। चार अक्षर इसके  नाम में आवे।।
इसके फल का कवच बड़ा कठोर। तोडऩे वाले का दिखे जोर।।
3. तीन अक्षर का नाम बतलाये। फल इसका मेवा कहलावे।।
प्रथम कट जाए यह तो धन कहलाता। मध्य कटे तो भगतों में बोला जाता।।
4. मीठे फूल के नाम वाला। फिर भी होता है फल वाला।।
तीन अक्षर का नाम बतलावे। सब किसी में ख्याति पावे।।
5. खट्टी-खट्टी हो अदा मेरी । चटनी बनती सदा मेरी।।
तीन अक्षर में नाम आये। बीज दवा के काम आये।।

उत्तर:- 1. बरना (सेतु) 2. नारियल 3. बदाम 4.महुआ  5.इमली




                                   वृक्ष पहेलियां
1. चार अक्षर का नाम बतलाये। पर्याय एक गौत्र कहलाये।।
औषधी के है काम आए। भैया अब तो दो बतलाए।।
2. दूर देशों से यहां चलकर आया। यहां आकर अपना वर्चस्व जमाया।।
इसका है दो अक्षर का नाम बताया। अफारा दूर करने के काम आया।।
3. हिमालय में है मेरा वास। बनता हूं मैं तेरा निवास ।।
फर्नीचर के भी काम आता। जो नष्ट करे वो पछताता।।
4. तीन अक्षर का नाम बतलाता। आदी कटे दलदल कहलाता।।
मध्य कटे बिक्री हूं करवाता। अंत कटे दलदल कहलाता।।
5. तीन अक्षर का मेरा नाम। औषध में आता हूं काम।।
यदि का पर्याय है कहलाता। दूजा नाम आयरन बतलाता।।

उत्तर:- 1. मोलसिरी (वसु) 2. हींग 3. देवदार 4. सेमल  5.अगर


वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षर में है नाम आता। दूजा नाम है भांप जाता।।
मदिरा की तरह है रस। ऊंचाई और नही बस।।
2. तीन अक्षर का मेरा नाम। आता त्रिफले के काम ।।
औषध में बड़ा महत्त्वपूर्ण। सब खाते है मेरा चूर्ण।।
3. तीन अक्षर का है मेरा नाम। फल काटे तो तोडू रद तेरा।।
आता है औषध के है काम । दक्षिण भारत मेरा घर आम।।
4. साढ़े तीन अक्षर का नाम। मेरा फूल जगत में सरनाम।।
औषध के है काम आता। नाम कुन्ती नंदन कहलाता।।
5. साढ़े तीन अक्षर का नाम बतलाता। इसमें एक ऋषि का नाम भी कहलाता।।
अंग्रेजी महीनों में भी आता। यह विशाल वृक्ष भी कहा जाता।।

उत्तर:- 1. मोलसिरी (वसु) 2. हींग 3. देवदार 4.सेमल  5.अगर




वृक्ष पहेलियां
1. चार अक्षरों का है मेरा नाम। बच्चों की घूटी में आता काम।।
औषधीय गुण बतलाये। सकल जन के काम आये।।
2. चार अक्षर का है नाम मेरा। मैं दवाइयों का करूं काम।।
फल से वृक्ष नाम कहलाता । हर किसी के हूं काम आता।।
3. मेरा दो अक्षर में नाम आता। पहाड़ी वृक्षों में गिना जाता।।
मैं कंटीला वृक्ष कहलाता। पहाड़ो की शोभा बढ़ाता ।।
4. मेरे नाम से रंग कहा जाता। साढ़े तीन अक्षर का नाम आता।।
मेरा फल खाया है जाता। शरबत मे भी काम आता
5. साढ़े तीन अक्षर का नाम आता। कल्पना से मेरा गहरा नाता।।
वृक्षों में वृक्ष कहा जाता। श्री कृष्ण, अर्जुन को बतलाता।।

उत्तर:- 1. जायफल 2. कायफल 3.खैर 4.नारंगी  5.कल्प




वृक्ष पहेलियां
1. साढ़े तीन अक्षर में नाम आता। रोज को हूं मैं मिटता जाता।।
शिवजी का से प्रिय कहलाता। फल का मणिया बनाया जाता।।
2. एक बात को तू कबूल। मेरे प्रसिद्ध फू ल ।।
दाई का पर्याय कहलाता। दो अक्षर का नाम बतलाता।।
3. पांच अक्षर का नाम बतलाता। पहाड़ी पेड़ यह कहलाता।।
इससे बायोडीजल निकलता। डीजल से यंत्र है चलता।।
4. दो अक्षर का मेरा नाम क हलावे। कच्ची कली मशाला के काम आये।।
दक्षिण भारत मे इसका निवास। औषधीय वृक्ष है यह खास।।
5. एक बढिय़ा गोंद देनें का काम। दूजे नाम से बनता है गाम।।
दो अक्षर इसके नाम में है आते। पहाड़ो वनों में पाये हैं जाते।।



उत्तर:- 1. रूद्राक्ष 2. धाय 3.रतनजोत 4.लौंग  5.खैरी

वृक्ष पहेलियां
1. है यह दो अक्षरों के नाम वाला। पलंग-चारपाई काम वाला।।
ऊंचा अरु होता विशालकाय। यह इमारत में भी काम आय।।
2. यह दो अक्षरों के नाम वाला। लकड़ी देने के काम वाला।
सुराख का पर्याय कहलाता। जंगलों में ही पाया जाता।।
3. औषधीय और किटनाशक। नीम है इस वर्ग का शाषक
चार अक्षरों का नाम कहलाये। यह छांव में भी काम आय।।
4. साढ़े तीन अक्षरों का नाम बतलाया जाता। यह आज भी हरियाणा में पाया जाता।।
छाल रंगने के काम आती। इसकी गहरी छाया काम आती।।
5. तीन अक्षरों का नाम बताये। सूखे क्षेत्र में पनप जाये।।
मध्य कटे हाथ बतलाता। यह फूल वर्ग कहलाता।।

उत्तर:- 1. शाल  2. मोखा  3. बकायन 4. इंदोख  5. कनेर


वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षर इसके नाम में आते। हिमालय पर्वत पर पाये जाते।।
होती विशाल है इनकी ऊंचाई। लकड़ी इमारतों में काम आई।।
2. चार अक्षर का नाम कहलाता। इसका विशाल फल खाया जाता।।
हर फल सब्जी में काम आता। चिपकने से है गहरा नाता।।
3. पीपल वर्ग का यह कहलाता। तीन अक्षर का नाम बतलाता।।
इसका फल खूब खाया जाता। पक्षी बिष्ठा के जरिये बीज उग पाता।।
4. तेंदूलकर नाम में पाया जाता। हर कोई आदमी के काम आता।।
यह एक वृक्ष कहलाया जाता। दो अक्षर का नाम बताया जाता।।
5. इसका फल होता है खट्टा। उंगली जान न लगा सट्टा।।
अचार-सब्जी के काम आता। तीन अक्षर का नाम आता।।

उत्तर:- 1. चीड़  2. कटहल  3. गुलर 4. तेंदू  5. करौंदा



वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षर का नाम है आता। नाम को कचरा कहा जाता।।
यह जंगलों में है खूब पाया जाता। दूसरा नाम ईश्वर कहलाया जाता।।2. होता तीन अक्षरों का मेरा नाम। दूध आवे टायर-ट्यूब के काम।।
आदी कटे तो वह बतलाता। अन्त कटे भगवान कहलाता।।
3. छोटा वृक्ष ही यह कहलाता। अढ़ाई अक्षर का नाम बताता।
सलाद में डाला जाता। यह भूख को है बढ़ाता।।
4. साढ़े तीन अक्षरों का है नाम। इसका फल आये जूस के काम।।
इसके नाम से रंग कहलाये। इस फल में कलियां भी बतलाये।।
5. दूर देशों से यह चलकर आया। यहां आकर अपना पैर जमाया।
छाया का केवल नाम होता। लकड़ी आती इमारत के काम।।

उत्तर:- 1. कूड़ा (प्रभु)  2. रबड़  3. नीम्बू 4. सन्तरा  5. सफेदा



वृक्ष पहेलियां
1. अढ़ाई अक्षरों का होता नाम। जंगलों में पाना मेरा काम।।
मैं वृक्ष होता झाड़ीदार। गुफ बनती बड़ी मजेदार।।
2. सात अक्षरों का है अंग्रेजी नाम। छाया और ईंधन देने का काम।।
सीरस जाती का कहलाता। मगर पत्ते बड़े कहलाता।।
3. दो अक्षरों का नाम मेरा। ईंधन से सारता काम तेरा।।
पक्षियों की मैं रक्षा करता। फल से सिडोरा है भरता।।
4. यह तीन अक्षर का है कहलता। जब यह अपना चरित्र बतलाता।।इसकी कहानी को जाना ना भूल। फल से नौ माह पहले आता फूल।।
5. साढ़े चार अक्षर में नाम आता। ऊंचा वृक्ष भी यह कहा जाता।।
यह सुन्दरता तब लिए हुए। जब सुन्दर पुष्प खिले हुए।।


उत्तर:- 1. हींग  2. अकेशियाशामिया  3. जाल  4. कीकर  5. मुचकुन्द


वृक्ष पहेलियां
1. सदाबहार वृक्ष यह कहलाता। चार अक्षर का नाम बतलाता।।
साग, चटनी, अचार, शरबत बनाया जाता। अब तो कुछ विचार करो भ्राता।।
2. हर्बल में यह काम आता। पांच अक्षर में नाम आता।।
फल आते और आते फल। अब क्या भाई बतायेगा कल।।
3. तीन व दो अक्षरों में नाम आता। औषधियों में बि सरेआम जाता।।
इसके फल का रस रेशमी और सूती कपड़े धोने के खूब काम आता।।
4. पांच अक्षरों का नाम कहलाये। श्रृंगार से नाता नाम बतावे।।
इसके रात्री को खिलते फूल। भाई इसे ना जाना भूल।।
5. तीन अक्षर में नाम आता। औषध में यह काम आता।।
और यह फूला हुआ सुहावना। देखने में लगे सा लुभावना।।


उत्तर:- 1. कमरख 2. अमलतास  3. अरीठा (रीठा)  4. हरसिंगार  5. कुचला


वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर में नाम बतलाता। सदबहार है यह कहलाता।।
 औषधियों में काम आता। अब तो समझो भ्राता।।
2. दो अक्षर का नाम बताया। यह एक वृक्ष है कहलाता।।
इसके पत्ते-फल-गोंद काम आते। इसको मध्यम वृक्ष है बतलाये।।
3. होता है तीन अक्षरों का नाम। पानी के पास पाना है काम।।
छोटा-सा वृक्ष यह कहलाता। फूल में अति सुगंध बतलाता।।
4. चार अक्षर नाम में बताए। खट्टे-मीठे फल काम में आए।
प्रथम दो कटने पर समाधान बने। अन्त में दो कटे बरगद महान बने।।
5. साढ़े तीन अक्षर में मेरा नाम। छाया देना होता मेरा काम।।
मैं हूं बड़ा सुन्दर सुघट। मैया ज्ञान के खोल पट।।


उत्तर:- 1. अडूसा 2. कैथ  3. केवड़ा  4. बड़हल  5. कोशाम्र


वृक्ष पहेलियां
1. झाड़ीदार यह वृक्ष बतलाता। सुन्दर फूल इसके है आता।।
एक दूसरा नाम एक पड़ौसी देश नागरिक है कहलाता।।
2. चार अक्षर का है इसका नाम। छाल पता आता इसका काम।।
आदी कटने पर गिरी हुई। अन्त कटे तो अपराध वाला।।
3. दो अक्षर में बनता नाम। मेवा देना इसका काम।।
इसमें मेवे से बफी बनती। खाने में है खूब ठनती।।
4. यह वृक्ष होता है छायादार। लोग कहते औषधीय फलदार।।
तीन अक्षरों में आता नाम। मुंह के छालों में आता काम।।
5. मौसम का स्त्री लिंग कहलाता। तीन अक्षरों का नाम बतलाता।।
जूस महत्वपूर्ण बड़ा होता। यह नींबू से बड़ा होता।।


उत्तर:- 1. नीम  2. पापड़ी  3. काजू  4. गोंदनी  5. मौसमी


वृक्ष पहेलियां
1. कर्नाटक का राजकीय वृक्ष कहलाता। साढ़े तीन अक्षरों का नाम बतलाता।
यह वृक्ष सदाबहार होता। यह सुगंधी का भण्डार होता।।
2. दो अक्षरों का नाम बतलाता। यह भी है वृक्ष कहलाता।।
औषध देना है काम। पाण्डु-पुत्र दूजा इसका नाम।।3. सदा तीज त्यौहारों में आता काम। साढ़े तीन अक्षर में है आता नाम।
इसके पत्ते विवाह-शादियों में भी उपयोग होते हैं। यह बड़ा सरनाम।।
4. तीन अक्षरों में नाम आता। शरबत बनाने के काम आता।।
शरबत गर्मी में पीया जाता। तब खुशी से जिया जाता।।
5. तीन अक्षरों में नाम आता। त्रिफला में यह काम आता।।
दावा से इसका गहरा नाता। अब तो बताओ मेरे भ्राता।।

उत्तर:- 1. चंदन  2. कोह (अर्जून)  3. मेंहदी  4. फालसा  5. हरड (हरितकी)



वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षरों का यह वृक्ष कहलाता। त्रिफला में यह डाला जाता।।
मुरब्बे में भी आता काम। अब तो बतलाओ इसका नाम।।
2. दो अक्षरों में नाम आता। औषध के काम आता।।
सबसे ज्यादा जल्दी बढऩे का नाता। हर किसी के यह काम आता।।
3. इसके पत्तो से बनता हरा चारा। मरुभुमि में है महत्व बड़ा भारा।।
दो अक्षर में है नाम कहलाया। फल का भी खूब नाम बतलाया।।
4. तीन अक्षरों का इसका नाम। औषध में भी खूब आता काम।।
इसका पर्याय दल कहलाता। यह है अपने गुण बतलाता।।
5. तीन अक्षर का है नाम मेरा। औषध का है करता काम तेरा।।
अंत कटे तो नशा कहलाता। यह नाम कामदेव बतलाता।।


उत्तर:- 1. आंवला  2. बांस  3. बेरी  4. कबीला  5. मदन


वृक्ष पहेलियां
 1.साढ़े तीन अक्षरों का मेरा नाम। निज नाम वाले को नभ में उड़ाना बच्चों का काम।।
मैं आप को सही हूं बतलाता। फिर भी मैं वृक्ष हूं कहलाता।।
2.मेरा पर्याय त्याग कहलाता। यह सारा वृक्ष है कहलाता।।
दो अक्षर में नाम आता। औषधीय में काम आता।।
3.दलहन व मीठे का साझा नाम। औषधी देना है मेरा काम।।
मैं हूं पूर्ण वृक्ष कहलाता। चार अक्षर में नाम बतलाता।।
4. नाम का गहरे पत्र से नाता। यही सारा वृक्ष है सुनाता।।
चार अक्षरों में नाम आता। औषधीय में काम आता।।
5.नाम में सांप का ताज आता। मैं हंू वृक्ष कहलाया जाता ।।
पांच अक्षरों में मेरा नाम । दवाई देना मेरा काम।।


उत्तर:- 1. पतंग  2. तज  3. दालचीनी  4.तेजपात 5. नागकेसर

वृक्ष पहेलियां
1.तीन अक्षरों में आता नाम। मीठा फल खाने के आता काम।।
फल मीठा वृक्ष होता छोटा। रोपण करने में नहीं टोटा।।
2.यह बलवाला वृक्ष कहलाता। चार अक्षर में नाम बतलाता।।
इसकी लकड़ी होती मजबूत। लकड़ी समझ नही चाहे सबूत।।
3. तीन अक्षर में आता नाम। फल अचार के आता काम।।
सुन्दर लगते है इसके फूल। इसके  विनाश में ना करें भूल।।
4.यह वृक्ष होता मध्यमाकार। दवा से होता काम सकार ।।
छाल लकड़ी आती है काम । इसका दो अक्षर में है नाम।।
5.साढ़े तीन अक्षर का नाम । कम पानी में पनपना काम।।
इसका तेल है खूब काम आता। औषधी में पत्तों का नाम आता।।


उत्तर:- 1. सरीफा 2. वीरतरू  3.करील  4.लोभ  5.एरण्ड


वृक्ष पहेलियां
1.पांच अक्षर में है मेरा नाम। औषधी में करता तेरा काम।।
मुझसे बढिय़ा है बनती  धूप। सबके मन भाए रंक से भूप।।
2.मेरा तीन अक्षर का है नाम। सुगंधित गोंद देने का है काम।।
छोटा कंटीला वृक्ष बतलाते। यह औषधी में खूब काम आते।।
3.नाम के साथ पत्ते का नाम जुड़ा। पत्तों का औषध के साथ काम जुड़ा।।
यह वृक्ष होता बड़ा खास । वृक्ष पालों तो मानव का विकास।।
4. तीन अक्षर का है नाम आता है दवा के काम।।
दूध का रंग है पीला। वृक्ष होता बड़ा हठीला।।
5. है तीन अक्षरों का नाम। आता है दवा के काम।।
अंत कटे तो संख्या बनता । मध्य कटे तो नाता बनता।।


उत्तर:- 1. धूपसरल 2. गूगल  3.तालिसपत्र  4.सातला  5.सातला


वृक्ष पहेलियां
1.अढ़ाई अक्षरों में नाम आता। यह फूला के है काम आता।।
यह एक प्रसिद्ध वृक्ष कहलाता। इसका नारी पर नाम बतलाता।।
2.चार अक्षरों का एेसा मेल। औषधी देना इसका खेल।।
फूलों में इसकी होती गिनती। नाम बताने की कोरी विनती।।
3. तीन अक्षरों का नाम आता। औषध में भी काम आता।।
इसका बढिय़ा पुष्प कहलाता। सारा यह है वृक्ष बतलाता।।
4.डग-डग से जुड़ता मेल। बच्चे इस पर खेले खेल।।
तीन अक्षर में इसका नाम आता। श्रीकृष्ण से जुड़ता नाता।।
इस वृक्ष की दो किस्म बतलाते। असली फूलों वाले कहलाते।।
तीन अक्षरों में है इसका नाम। बागों की शोभा बढ़ाना काम।।


उत्तर:- 1. चम्पा 2. मौलसिरी  3.नेवारी  4.कदम  5.असली अशोक


वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षरों का है मेरा नाम। आदी कटे हिम्मत बनना काम।।
अन्त कटे तो ऊंचाई बनती। मध्य कटने पर घटाई बनती।।
2. यह नकली किस्म का कहलाता। फिर भी इसको पूछा जाता।।
इसकी भी दो जाति हैं बताई। एक छाया दूजे शोभा बढ़ाए।।
3. साढ़े चार अक्षरों का नाम। मै दुनियां में हूं सरनाम।।
औषध देना मेरा काम। अब फूलों में भी मेरा नाम।।
4. मेरा पर्याय टीका कहलाता। तीन अक्षरों में नाम बतलाता।।
पुष्पों में गिना जाता। अब तो बताओ भ्राता।।
5. साढ़े चार अक्षर में नाम आये। औषधी देने के काम आवे।।
पुष्पों में मेरी गिनती होती। रंग से रब की विनती होती।।


उत्तर:- 1. कदम 2. अशोक  3. मूचकुन्द 4.तिलक  5. सिन्दुरिया


वृक्ष पहेलियां
1. गेंदाकार फूलों से इसका नाता। फूलों से है मानव का इत्र बनाता।।
यह वृक्ष होता है विशाल। आयु होती हजारों साल।।
2. साढ़े तीन आखर का नाम। नाम का यह था ऋषि सरनाम।।
यह आजादी का महीना आता। यह पुष्पों में खूब गिना जाता।।
3. पांच अक्षर का वृक्ष कहलाता। यह दवा में खूब काम आता।।
बड़े से बड़े बंध को तोड़ भगाता। जब यह मानव को खूब दस्त लगाता।।
4. तीन अक्षर का नाम बतलाता। उल्टा यह सतवे कहलाता।।
रस्सी बेंत के काम आता। मध्यम वृक्ष कहा जाता।।
5. दो अक्षर में है मेरा नाम आता। पत्ता पत्तल दोनों के काम आता।।
राष्ट्रीय वृक्ष हूं बतलाता। पक्षियों की शरण कहलाता।।


उत्तर:- 1. कदम  2. अगस्त  3. जमालगोटा  4.बेतस  5. बड़


वृक्ष पहेलियां
1. झाड़ीनुमा वृक्ष कहलाया। यह औषधीय है बतलाया।।
पांच आखर में आता नाम। यह पेड़ है जग में सरनाम।।
2. चार अक्षर में है नाम। आता दवा के है काम।।
तीन फल से जुड़ता नाता। यह वृक्ष अपने गुण सुनाता।।
3. पांच अक्षरों के नाम वाला। दवाइयों के काम वाला।।
डंठल, जड़ दवा के आते काम। मद्य व हरिद्रा से जुड़े नाम।।
4. एक झाड़ीनुमा वृक्ष कहलाता। चार अक्षरों में नाम बतलाता।।
तेज और फल से जुड़े नाम। आता है औषधी के काम।।
5. एक छोटा-सा वृक्ष कहलाता। तीन अक्षर में नाम बतलाता।।
उल्टा रनेथु बतलाया। यह एक वृक्ष कहलाया।।


उत्तर:- 1. बावविडंग 2. तिरफल 3. दारू हल्दी 4. तेज फल 5. थुनेर


वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर के नाम वाला। है औषधीय काम वाला।।
झाड़ीनुमा है यह बतलाया। औषधीय वृक्ष है कहलाया।।
2. झाड़ीनुमा वृक्ष का धमाल। यह दवाई में करे कमाल।।
चार अक्षर में नाम बतलाया। यह भारतीय वृक्ष कहलाया।।
3. चार अक्षरों में नाम कहलाया। औषधियों में काम बतलाया।।
महिमा रस तरवर की। सयह लीला है रघुवर की।।
4. चार अक्षर में नाम। पुष्प हेतु सरनाम।।
फतह से जुड़ता नाता। अब तो बताओ भ्राता।।
5. दो अक्षरों में मेरा नाम। इसका सुन्दरता देना काम।।
है फूलों के लिए अनोखा। आक जान मत खाये धोखा।।


उत्तर:- 1. माचिका 2. नाड़ी हिंगु  3. हाउवेर  4. विजैसार  5. ढ़ाक


वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षरों का है नाम। कोम रूई देना काम।।
सुन्दर बड़े फूल सुहावने। तोते को लागे लुभावने।।
2. नाम है तीन अक्षरों में आता। रंग जुडऩे पर पांच हो जाता।।
फूलों में भी गिना जाता। यह ऊंचा वृक्ष कहलाता।।
3. साढ़े चार अक्षरों में नाम। एक था महाराजा सरनाम।।
चिट्ठी से भी नाता खाता। यह एक वृक्ष कहा जाता।।
4. तीन अक्षर का नारी नाम। यह पुष्प के लिए सरनाम।।
यह जंगलों में पाया जाता। औषधीय गुण बताया जाता।।
5. यह फलों का राजा। इसका रस पीओ ताजा।।
है दो अक्षर में नाम। किस्मों में है सरनाम।।


उत्तर:- 1. सेमर  2. काला सेमर 3. भोजपत्र 4. धामिन 5. आम


वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षर का है नाम। फल देना है काम।।
क्रिकेट खिलाड़ी के नाम में आता। औषधीय भी है कहलाया जाता।।
2. तीन अक्षर के नाम वाला। यह औषध के काम वाला।।
फलों में खूब है इसका नाम। पंखा, झाड़ू देना है काम।।
3. फल कठोर फोड़ा नही जाता। फिर भी यह छोड़ा नही जाता।।
यह पूर्वी भारत में पाया जाता। चार अक्षर में नाम बताया जाता।।
4. फल कठिनाई से फोड़ा जाता। चार अक्षर से नाम जोड़ा जाता।।
हिमालय में है पाया जाता। इसे नहीं कभी भुलाया जाता।।
5. दो अक्षर के नाम वाली। फल देने के काम वाली।।
उल्टा पढ़े तो बनती चिली। छाया इसकी कभी नाम हिली।।

उत्तर:- 1. तेंदू  2. खजूर 3. नाशपाती 4. अखरोट 5. लिची


वृक्ष पहेलियां
1. चार अक्षर में इसका नाम। फल देनरा है जिसका काम।।
इसका फल है पिस्ता का जन्मदाता। हलवाइयों के खूब काम आता।।
2. हिमाचल में मिलते जाता। एक किस्म है महाराजा।।
किस्म डिलीसन भी कहलाता। दो अक्षर में नाम बतलाता।।
3. तीन अक्षर में नाम बताया। फल देने का काम बताया।।
जापान से चलकर यहां आया। भारत में आकर पैर जमाया।।
4. साढ़े तीन अक्षर में नाम। फल देना है इसका काम।।
कच्चे फल के दूध की दवाई। सूखे फल से माला बनाई।।
5. साढ़े तीन अक्षर का नाम। आवत फल देने के काम।।
फल में है विटामिन-सी बेशुमार। रक्त बढ़ावे साफ करे इसका सार।।


उत्तर:- 1. मुकुलक  2. सेब   3. लोकाट  4.  अंजीर 5. मौसम्बी


वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षरों में नाम आवत। छाया के भी काम आवत।।
वृक्ष होता बढ़ा ही सुघट। पुष्प देख खुले मन के पट।।2. शायरों ने इसकी महिमा पाई। ये बात मेरे दादा ने बताई।।
होवत चार अक्षरों में नाम। इसका फूल जग में सरनाम।।
3. दो अक्षर का है नाम बतलाता। अंधेरे का पर्याय कहलाता।।
पर्यावरण का प्रहरी। क्या जाने इसे शहरी।।
4. औषध में बहुत बड़ी। न आटा है, न लकड़ी।।
पांच अक्षर में नाम आता। फिर भी यह वृक्ष कहलाता।।
5. चार अक्षरों में नाम आता। पौधा नहीं वृक्ष कहलाता।।
साग-सब्जी वाला यह नहीं। विदेशी अब भारत में यहीं।।


उत्तर:- 1. टेसू 2. नरगिस  3. विना (तिमिर) 4. मैदालकड़ी 5. टमाटर वृक्ष


वृक्ष पहेलियां
1. परशुराम की माता कहलाये। जमदग्नि की भार्या बतलाये।।
तीन अक्षरों में है नाम बतलाये। विदेशी व भारतीय वृक्ष कहलाये।।
2. तीन अक्षरों का होता नाम। नाम में होता विचित्र काम।।
प्रथम कटे तो अनेक बनता। मध्य कटे तो भी इस पर ठनता।।
3. एक वृक्ष रंग के नाम वाला। यह होता फल के काम वाला।।
इसकी यह देशी किस्म भी कहलाये। तीन अरू दो पांच के नाम बतलाये।।
4. नीम जाति का है यह कहलाता। सब्जी के स्वाद में काम आता।।
इसके पत्रों की ये सब माया। चार अक्षर में नाम बतलाया।।
5. दो अक्षरों में नाम आता। फल खाने के काम आता।।
फल को आलूबुखारा कहा जाता। यह आडू भी सुनने में है आता।।


उत्तर:- 1. रेणुका 2. ककई 3. नीला बादाम 4. करीपत्ता  5. पीच


वृक्ष पहेलियां
1. पत्थर सार पर्याय बतलाया। यह विदेशी भी है कहलाता।।
अब भारत में भी लगाया जाता। यह एक वृक्ष बताया है जाता।।
2. साढ़े चार अक्षर के नाम वाला। खूब महक देने के काम वाला।।
महक से भी जुड़ता नाता। तेल को नहीं भूल भ्राता।।
3. यह अफ्रीकी वृक्ष कहलाता। यह फल वाला है बतलाता।।
तीन अक्षरों में इसका नाम आता। आदी कटे रोकने के काम आता।।
4. तीन अक्षरों के नाम वाला। फल देने के काम वाला।
फल से उत्तम शाक बनता। फल अचार हेतु भी ठनता।।
5. पांच अक्षर के नाम वाला। फल देने के काम वाला।।गोंद भी औषधी में काम आता। शीतलता के काम-तमाम आता।।


उत्तर:- 1. शिलारस  2. तेलपत्र 3. बेरूक 4. करौंदा 5. कतीरा गोंद


वृक्ष पहेलियां
 1. तीन अक्षर का मेरा नाम। करता सारा तेरा काम।।आदी हटे तो माल बन जाता। मध्य कटे तो पेंदा ठन जाता।।
2. मेरा वृक्ष होता झाड़ीदार। होता मोटे-मोटे कांटेदार।।
विलायती कहलाया जाता। खवडहरों में पाया जाता।।
3. साढ़े तीन अक्षरों में नाम आता। अन्त अक्षर कटे तो हाथ बन जाता।।
आदी हटे तो दु:ख बतलाता। एेसा कौन-सा वृक्ष कहलाता।।
4. यह वृक्ष होता फलदार है। इसका फल शीतलदार है।।
चार अक्षर में नाम आता। यह औषधीय कहलाता।।
5. लकड़ी इमारत नाव के काम आती। इसकी छाल रंगने में काम आती।।
लकड़ी होती श्वेत व श्याम। दो अक्षरों में आता नाम।।


उत्तर:- 1. तमाल 2. विलायती कीकर  3. करर्ज 4. सीताफल 5. ऐन


वृक्ष पहेलियां
1. इसकी दो जाति श्वेत-श्याम। साढ़े तीन अक्षर में नाम।।
फूल, वृक्ष सुहावना होता। सुगन्धी से खूब लुभावना होता।।
2. यह वृक्ष बादाम जाति का, हिमालय में है निवास।।
चार अक्षर के इस वृक्ष में औषधीय है विश्वास।।
3. इस वृक्ष से खूब एक रस झरता है। इन्द्रदेव जिसको पसन्द करता है।।
उत्तम सुगन्ध और औषध से नाता। साढ़े तीन अक्षरों में नाम आता।।
4. गडरी, ठण्डी छाया वाला। फली तेल की माया वाला।।
इसके पुष्प मोती जैसे लगते हैं। माला रजनी काल में पहनते हैं।।
5. इसके स भी भागों का चिकित्सा में उपयोग। फल चुर्ण से मछली मरने का संयोग।।
वैसे फल चूर्ण औषधीय बतलाया। अढ़ाई अक्षर का है नाम कहलाया।।

उत्तर:- 1. अनन्त 2. पद्माख   3. सम्हालू 4. करजं 5. चिल्ला


वृक्ष पहेलियां
1. इससे रस्सी और बेंत है बनती। व्यवहार में पचांग की है ठनती।।
अर्क का भी उपयोग बतलाया। तीन अक्षरों का नाम कहलाया।।
2. यह वृक्ष सदाबहार कहलाता। साढ़े तीन अक्षर में नाम आता।।
फल से बनती चिकित्सा शैली। छाल मछली के लिए विषैली।।3. यह वृक्ष होता कंटीला। सघन सुन्दर होत छबीला।।
छाल, पत्र, बीज, तेल का उपयोग। साढ़े तीन अक्षरों का संयोग।।
4. नली से बांसुरी है बनती। जो मधुर स्वर में है बजती।।चार अक्षरों में है नाम आता। बंशी से कन्हैया याद आता।।
5. साढ़े चार अक्षरों का नाम। देखने में जैसे हो आम।।
पत्र, बीज चिकित्सा में उपयोग। यह कौन से वृक्ष का संयोग।।


उत्तर:- 1. वेतस 2. इज्जल  3. अकोंट  4. नरसल  5. नागदन्ती



वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षरों का नाम में संयोग। छाल, पुष्प का दवा में उपयोग।।
लकड़ी से फर्नीचर बनता। सुगन्धित वायु पुष्प करता।।
2. समुद्र तट र यह पनपता। छाल व फल का दवा बनता।।
यह वृक्ष सदाबहार कहलाये। छह  अक्षरों में नाम है बतलाये।।
3. वृक्ष सदाबहार लुभावना। यह होता बड़ा सुहावना।।
साढ़े तीन अक्षर में नाम बताये। यह रहे सदा हरा भरा कहलाये।।
4. नाम से बेल और वृक्ष कहलाता। छह अक्षरों में अपना नाम बतलाता।।
पीपल जाति में यह गिना जाता। पत्ते व छाल उपयोग में आता।।
5. फल पर होती तीन धार। पकने पर बनते आधार।।
इसके फल का दवा में उपयोग। तीन अक्षर का नाम में सहयोग।।


उत्तर:- 1. तून 2. पारीष पीपल 3. सर्जक 4. बेलिया पीपल 5. सालई


वृक्ष पहेलियां
1. चार अक्षर के नाम वाला। फल गुठली की बने माला।।
यह सदा हरा-भरा रहता है। यह बड़ा सुहावना लगता है।।2. तेल का क्रीमों में होता उपयोग। नाम में तीन अक्षर का संयोग।।
पुष्प खुशबू लिए होता है। गूद्दा शिल्क को धोता है।।
3. बलराम की मां का नाम आता। पेड़ है मीट का नाम आता।।
यह एेसा वृक्ष है भाई। बने छाल की है दवाई।।4. कोवा व जांघ का कौसा मेल। यह सारा प्रकृति का है खेल।।
चार अक्षरों में है नाम आता। पत्तों का दवा में व्यवहार किया जाता।।
5. तीन अक्षरों के है नाम वाला। औषधीय गुणों की छाल वाला।।
गोंद भी औषधी में काम आता। जल्दी बताओ इसका नाम भ्राता।।


उत्तर:- 1. पितौजिया 2. हिगोंट   3. मांसरोहिनी  4. काकजंघा  5. जिंगिनी



वृक्ष पहेलियां
1. पीले फूल और फल लगता है। लकड़ी से अच्छा धनुष बनता है।।
त्वचार चोट आये काम। तीन अक्षर में बताये नाम।।2. तीन अक्षर का होता है नाम। छाल आये औषधी में काम।।मध्य कटे, कभी आता। अन्त कटे तो कट जाता।।
3. तीन अक्षर के नाम वाला। सदाबहार दूध वाला।।
छाल, पात, पुष्प, दूध आते काम। इसका तू जल्दी से बता दे नाम।।4. पक्का फल आता खाने के काम। तीन अक्षरों में है आता नाम।।
इसके कच्चे फल का बनता शाक। अब तो समझ गये होंगे आप।।
5. फल इसका फलों का राजा। रस पियो, खाओ फल ताजा।।
इसे फल-गूद्दा के साथ खाते रोटी। दो अक्षर के वृक्ष की पेड़ी हो मोटी।।


उत्तर:- 1. धामिन 2. कटभी  3. सतौना  4. कदली (केला)  5. आम



वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षरों का एेसा नाम। मध्य कटे तो फसाने का काम।।
आदी कटे तो नियम बताता। सुन्दर पुष्प है इस पर आता।।
2. तीन अक्षरों में है आता नाम। गोंद भी औषध में आता काम।।
लकड़ी से गाड़ी के धूरे बनते। ये मजबूत धूरे, रथो में डलते।।
3. साढ़े तीन अक्षर में नाम आता। फल अचार के काम आता।।
इसका है फल कच्चा खट्ठा-मीठा। खूब सुगन्ध रखे इसकी त्वचा।।
4. साढ़े तीन अक्षर में है नाम आता। कोल्हू तेल पेरने के काम आता।।
बड़ा सुन्दर है छायादार होता। इसका फल भी दानेदार होता।।
5. यह वृक्ष है बड़ा महत्वपूर्ण। इसके काष्ठ का बनता चूर्ण।।
इसका तीन अक्षर में है नाम आता। बीज छाल पत्ता दवा में काम आता।।


उत्तर:- 1. जारूल  2. तिनिश  3. अम्वाड़ा  4. कोशाम्र 5. कुचला


वृक्ष पहेलियां
1. पांच अक्षरों में आता नाम। यह आता औषध के काम।।
इसके बीजों से तेल। फल का सुगन्धि से मेल।।
2. छह अक्षर का है वृक्ष कहलाता। अपने गुणों को है बतलाता।।
फल का मुरब्बा आचार बनाया जाता। पत्तों का शाक खूब बनाया जाता।।
3. तीन अक्षर का आता नाम। फल खाने के आता काम।।
फल सूखा है मेवा कहलाता।। गोंद भी महत्वपूर्ण बतलाता।।
4. तीन अक्षरों में नाम बतलाता। यह फलदार वृक्ष कहलाता।।
औषधीय गुण बताये जाते है7 वृक्ष के फल खाये जाते हैं।।
5. तीन अक्षरों में नाम कहलाता। फल में है अच्छी गन्ध बतलाता।।
इसका फल खाने के आता काम। अब तो बताओं भ्राता नाम।।


उत्तर:- 1. पानी आमला 2. हरफारेबड़ी  3. चिरौंजी  4. खिरनी  5. कंटाई


वृक्ष पहेलियां
1. दो अक्षरों का नाम बताये। इसका फल भी खाया जावे।।
इस पर गोंद भी मिलत है। फल से चटनी-शरबत है।।
2. महुवे के समान गुण फल में। यह होता तो है जल थल में।।
पांच अक्षर में बतावे नाम। फल औषधी में आये काम।।
3. साढ़े तीन अक्षर में एक पवित्र आवत नाम।।बीज इसका जल साफ करने में आवत काम।।4. चार अक्षर में नाम बतलाता। यह सदा बहार है कहलाता।।
फल का आधार और बनता शाक। फल शरबत पिए तो हो ताजा आप।।
5. तीन अक्षर का यह वृक्ष कहलाता। फलों का स्वाद है खट्टा बतलाता।।
इसके फल से ते-घी भी खूब बनाया जाता। आदी कटे तो थोड़ा मध्य कटे जाति बन जाता।।


उत्तर:- 1. कैंथ 2. जलमहुआ  3. निर्मली  4. कमरख  5. कोकम


वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर के नाम वाला। यह औषधीय काम वाला।।
यह शाक वर्ग में बताया जाता। कच्चे फल का शाक बनाया जाता।।
2. अढ़ाई अक्षर का नाम विशाल। फूल खुशबू में करे कमाल।।खट्टाई के लिए काम आता। सुन्दर पत्तों से इसका नाता।।
3. अफ्रीका से चल भारत आया। जग का सबसे बड़ा कहलाया।।
अधिक उम्र इसकी बताते है। तीन अक्षर में नाम जताते हे।।
4. यह वृक्ष एक विदेशी है। इस पर यह जिद्द कैसी।।इसका फल है कटहल जैसा। स्वादिष्ट फल रहा हमेशा।।
5. दो अक्षरों का है इसका नाम। उल्टा-सीधा एक जैसा काम।।
अफ्रीका से बगीचों में आया। यह वृक्ष सदाबहार कहलाया।।


उत्तर:- 1. पिडार 2. भव्य  3. गोरक्षी  4. दुरियान  5. कोको



वृक्ष पहेलियां
1. छह अक्षर में है आता नाम। मूल, त्वचा, पत्र का काम।।
 लकड़ी हल्की मीठी बताते। त्वचा में रेशे बतलाये।।
2. नीम जाति का फिर भी कड़वा नही। पाचकता में कोई शिकवा नहीं।।
मजबूत लकड़ी से बनते कृषि यंत्र। कढ़ी-सब्जी के स्वाद का है मूल-मंत्र।।3. तीन अक्षर के नाम वाला। यह औषध के काम वाला।।
छाल, पत्र, काष्ठ का भोग। कृमि नाशक का संजोग।।4. आवाज से है मेल खाता। दो अक्षर में है नाम आता।।
खूब है इसके रस में सुगन्धी। बनती महत्वपूर्ण औषधी।।
5. तीन अक्षरों में है नाम आये। पत्तों से पशुओं को नशा छाए।।
रथ की धूरी बनाई जाए। यह बड़ा वृक्ष कहा जाए।।


उत्तर:- 1. उलट कंबल 2. मीठा नीम  3. भारंगी  4. बोल  5. तिनिश



वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर के नाम बिन्दी। रस में आती है सुगन्धी।।
औषध में यह काम आता। यह सदाबहार कहलाता।।
2. चार अक्षर में नाम आये। पत्तों से बै बीड़ी बनावे।।
मूल, त्वचा, पत्र, पुष्प की दवा। मुख की शुध्द होती इससे हवा।।
3. औषध में त्वचा आवे काम। चार अक्षर में है आवे नाम।।
नही घर में यह लगाया जावे। यह जंगल में ही पाया जावे।।
4. यह वृक्ष सदाबहार कहलावे। तीन अक्षरों में नाम बतलावे।।
औषधियों में यह खूब काम आवे। छाल, तेल, गोंद, फल, मूल, राख बतावे।।
5. यह वृक्ष एक झाड़दार है। यह भी एक सदाबहार है।।
बगीचों में बाड़ का काम लिया जाता। ज्यादातर समुद्र तट पर पाया जाता।।


उत्तर:- 1. अंजन 2. सिरहटा  3. इरिभेद  4. जैतून  5. संगकूपी


वृक्ष पहेलियां
1. त्वचा का औषध में काम। इसका पांच अक्षर में नाम।।
यह भी सदाबहार है कहलाता। अस्थि संधानक में लेप बताता।।
2. यह एक विदेशी वृक्ष कहलाता। चार अक्षर में नाम बतलाता।।
गोल्स मायफल का इससे उपयोग बताया। मायफल का जादूगरी में संयोग बताता।।
3. औषध में तेल उपयोगी। फल सज्जा भी है सहयोगी।।
हिमालय में है इसका घर। नाम में आते चार अक्षर।।
4. नाम में जहरी किन्तु होता नही। यह है विदेशी यहां होता नही।।
इससे कमण्डल बनने का संयोग। औषधी में होता फल का उपयोग।।
5. यह वृक्ष सदाबहार कहलाता। खुद में औषधीय गुण बतलाता।।
फल मसाले में काम आता। चार अक्षर में नाम आता।।


उत्तर:- 1. मैदालकड़ी 2. माजुफल  3. चिलगोला  4. जहरी नारियल  5. इलायची

वृक्ष पहेलियां
1. नाम में अक्षर पांच बतलाये। एेसा है एक वृक्ष कहलाये।।तेल औषधी में काम आवे। यह कौन वृक्ष धरा पर पावे।।
2. तेल डाले तो नरम बनता। तेल औषध में काम करता।।स्वादिष्ट तेल शाक में काम आवे। इसका चार अक्षरों में नाम आवे।।3. फूल से निकसे सुगन्धित तेल। पत्तों से शाक व सुगन्धित मेल।।पत्तों पर कांटे हैं पाये जाते। नाम में तीन अक्षर बताये जाते।।
4. चार अक्षरों का वृक्ष कहलावे। यह अपना गुण है बतलावे।।फली सिर व तन शुद्धी के काम आवे। ज्ञानी वही जो इसका नाम पावे।।
5. इसका छांव में कूप जल गुणकारी। दवा में काम आवे फल तरकारी।।
लकड़ी चिकनी मजबूत बतावै। छाया, तीन में नराम कहलावे।।


उत्तर:- 1. चाल मोगरा 2. विषा बिल  3. केवड़ा  4. शिका काई  5. गूलर



वृक्ष पहेलियां
1. फल का बीच भाग खाने की मनाही है। बात टके की सबने बताई है।।
गर्भ काल और व्रत में फल ना खावे। पूर्वाई फल का मुरब्बा बनाया जावे।।
2. लकड़ी को कीड़े नही खाते है। नीम जाति का इसको बताते हैं।।
चार अक्षरों का है इसका नाम। लकड़ी इमारती दवा में काम।।
3. ताजा फल से आचार बनता है। पुराना फल बेकार रहता है।।
यह भी एक वृक्ष कहलाता है। साढ़े तीन में नाम आता है।।4. देव व समाज नाम में आते हैं। मध्यम ऊंचाई का बताते हैं।।
फूल-फली का बने अचार, शाक। अब तो समझ गये होंगे न आप।।
5. चिकित्सालय के पास रोपा आवे। फली पुष्प से साग कढ़ी बनावे।।
अढ़ाई अक्षरों में नाम आवे। रस पानी शुद्धी में काम आवे।।


उत्तर:- 1. अनन्नास 2. बकाइन  3. कांकड़  4. इन्द्रजव  5. शिग्रु


वृक्ष पहेलियां
1. तीन अक्षर में नाम आता। यह औषध के काम आता।।
यह होते है बिलकुल आक जैसे। फूल व वृक्ष रंग नही हो वैसे।।
2. इनका फल कार्तिक में पके। छूने पर खूब ठण्डा लगे।।
चार अक्षरों में है नाम आता। भारत भर में यह पाया जाता।।
3. तेल होती दवा महा। चर्म रोग होता जहां।।
पांच अक्षरों में है नाम आता। विष्णु वाहन से नाम जुड़ जाता।।
4. यह वृक्ष होता मध्यकर। इसका हिमालय में है घर।।
यह औषध के काम आता। तीन अक्षर में नाम आता।।5. पत्ते बड़े, सुन्दर, छायादार होते। वृक्ष भी तो खूब झाड़ीदार होते।।
इसकी छाल चिकनी और मुलायम, पिण्ड पर लिखा कभी ना गायब।।

उत्तर:- 1. मदार 2. सिताफल 3. कड़वी कोड (गरूड फल)  4. खुबानी     5. गुलू (खडिया)


वृक्ष पहेलियां
1. बीजों का रंग सीसे जैसा। यह बीज इसका फिसले एेसा।।
पत्ते लखे बछीं के आकार। तीन अक्षर में औषधीयकार।।
2. हिमालय में इसका निवास। होता इसका वृक्ष है खास।।
तीन अक्षर के नाम वाला। छाल-पत्ता फिसलने वाला।।3. फूल छोटा है, फली लगती है। जड़ चर्म रोग का नाश करती है।।इसका यह वृक्ष झाड़दार होता। नाम रोग नाशक कार होता है।।
4. चार अक्षर में नाम आवे। यह औषध के काम आवे।।
एक डाली पर एक ही फल आवे। मध्यम वृक्ष पर पुष्प महकावे।।
5. चार अक्षरों में आता नाम। औषध में खूब आता काम।।
पत्ते होते इमली से। फूल होते मधुमक्खी से।।


उत्तर:- 1. कंजुरा (कना) 2. कंझल (कंजल)  3. दादमर्दन  4. जावसीर 
5. तरबड़


वृक्ष पहेलियां
1. छाल और पत्र का उपयोग। नराम में तीन अक्षर का योग।।
ताशु नाम जो हनुमत मात री। फूल एेसा जैसे हो छतरी।।
2. पत्ते होते कटी किनारी के। काम आवे दवा बीमारी में।।
तीन आखर में नाम बतलाया। यह झाड़ीनुमा वृक्ष कहलाता।।
3. इसकी दक्षिण अमेरिका में जन्म स्थान बतलाया।।
पांच अक्षरों में है इस वृक्ष का नाम कहलाया।।
4. वृक्ष का पर्याय कहलाये मार्फत। इसके फल का लोग बनाये शरबत।।
केवल दो अक्षरों में नाम कहलाये। यह अपने औषधीय काम बतलाये।।
5. यह साढ़े पांच अक्षर के नाम वाला। चिकना छिलका दवा के काम वाला।।
यह वृक्ष ऊंचाई लिए हुए। इसका फूल सुगन्ध हो पिए हुए।।


उत्तर:- 1. अंजनी (अंजनी वृक्ष) 2. अंजीरी (बेरू)  3. इपिकेकोना  4. ओट  5. कनकचम्पा

वृक्ष पहेलियां
1. इसके पत्ते होते है विशेष। होते सींग जैसे अवशेष।।
यह वृक्ष होता एकदम नकली। पांच वाले को समझे अस..

Monday, 4 March 2013

प्रतिभावान सम्मान 03-02-2013

प्रेस कर्मचारी संघ द्वारा आयोजित प्रतिभावान सम्मान समारोह में उपस्थित अतिथि 

प्रतिभावान सम्मान 03-02-13

प्रेस कर्मचारी संघ द्वारा आयोजित प्रतिभावान सम्मान में उपस्थित अतिथि 

प्रतिभावान सम्मान समारोह 03-02-2013

प्रेस कर्मचारी संघ द्वारा आयोजित प्रतिभावान सम्मान समारोह में क्रायक्रम प्रस्तुत करते कलाकार 

प्रतिभावान सम्मान समारोह 03-02-2013

प्रेस कर्मचारी संघ द्वारा आयोजित प्रतिभावान सम्मान समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते कलाकर 

Tuesday, 19 February 2013

लोक साहित्य : परम्परा और प्रयोग

लोक साहित्य ऐसी संश्लिष्ट रचना है जिसमें शिष्ट साहित्य-सदृश समग्र विधाओं को परिभाषित कर निरखना-परखना बाह्य दृष्टि से भले उचित हो, आंतरिक दृष्टि से कदापि संभव नहीं। यह जन-मन-जीवन-अनुभव का प्रारूप ही लोक द्वारा प्रदत्त एक सूत्र है जो प्रगीत-तत्वों से मिलकर लोकगीत तथा कथा से जुड़कर लोकगाथा बनती है। इसी तरह संवादों में ढलकर लोकनाट्य और किस्सा-गोई का वैशिष्ट्य लेकर लोककथा बनती है। इसके बावजूद वह भावनाओं व विचारों के प्रवाह में एक-दूसरी लोकविधाओं को स्पर्श करती है। यही कारण है कि लोककथा, लोकगाथा या लोकनाट्य मे विवाह का संदर्भ आने पर विवाह-गीत, प्रणय संपादन में ददरिया, विप्रलम्भ की स्थिति में सुवा-गीत, युद्ध के गीतों में पंडवानी आदि अन्यान्य गीतों व लोक छंदों का आगमन होता है। लोकसाहित्य का लोक अभिप्राय ही उसे शिष्ट साहित्य से पृथक करता है जो आंतरिक दृष्टि से एक होकर सार्वदेशिक तथा आंचलिक रंगों के प्रभाव से क्षेत्रिय बन जाता है। यही लोक अभिप्राय किसी लोकसाहित्य की आत्मा है जिनका तुलनात्मक अध्ययन लोक साहित्य के मूल स्वरूप को उद्घाटित करने के साथ उनके युगानुरूप परिवर्तन के इतिहास को प्रस्तुत करती है।
लोकसाहित्य परंपरा पोषक और संस्कृति-संवाहक होता है। इसमें युगानुरूप परिवर्तन बहुत धीमी गति से और आंशिक ही होता है। इसकी आत्मा को अक्षुण्ण रखकर यदि प्रयोग किए गए तो वे लोक-स्वीकृत और शिष्ट-समाहत हो सकतें हैं। कुछ समीक्षक लोक साहित्य को मूलरूप में विद्यमान होने के पक्षधर है। इसके अनुसार इनमें परिवर्तन या प्रयोग उसकी विकृति के परिचायक हैं लेकिन युगाग्रह और विकास को महत्व देने वाले परिवर्तन एवं प्रयोग के प्रतिष्ठापक हैं।
लोकसाहित्य लोक अर्जित भावनाओं के सरल-सहज उदगार हैं अत: उनमें परंपरा स्वत: संपृक्त हैं। शिष्ट साहित्य में परंपरा कृत्रिम और अपेक्षाकृत आरोपित होती है। जबकि लोक साहित्य में यही इसका प्राण है। यही कारण है कि इसमें कवि का श्रेय एक व्यक्ति न लेकर सभी लोकगायक ग्रहण करते हैं और इसका प्रत्येक गायक कवि नहीं, लोकगायक या लोकगीतकार कहलाता है। इसी आधार पर यह भाषा, बोली, जाति, वर्ण,पद के भेद को दूर करने में सक्षम और लोक को लोक बनाये रखने तथा समाज के प्रत्येक मनुज को समरस का सिद्धान्त संस्कार के रूप में प्रदान करने का संयोजन करता है। ये लोकगीत ही हमारे जीवन के अलिखित, व्यावहारिक शास्त्र हैं जो परंपरा से प्रचलित प्रतिष्ठित हैं। आज इसकी उपेक्षा के कारण ही मनुज लोक या समाज से हटा है, संस्कृति और भूमि से कटा है। ऐसे संक्रमणकाल में लोकसाहित्य की वापसी किसी न किसी बहाने लोग स्वीकार रहे हैं और प्रयोग के आधार पर ही सही, इसकी उपयोगिता का ग्रहण कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य के आधार पर समय-सीमा को निरखते हुए सूत्र रूप में यहाँ अपनी बात प्रस्तुत कर रहा हूं।
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों ने परंपरा, मर्यादा, नियम-अनुशासन के जो संस्कार दिए हैं वे अद्वितीय हैं। बेटी-बिदा-प्रसंग में पुत्री की मां, पिता,भाई और भाभी की वेदना को माप लिया गया है। माता की ममता असीम हैं अत: उसके रूदन से नदी बहने लगी। पिता की पीडा अपेक्षाकृत अल्प है, अत: उनके अश्रु से तडाग का निर्माण हुआ। भाई की भारवाहक व्यथा से डबरे भर गये लेकिन परायी घर से आयी भौजी के नेत्र सजल भी नहीं हो सके-
दाई के रोये नदिया बहत हे, ददा के रोये तलाव।
भाई के रोये डबरा भरत हे,  भौजी के नयन कठोर।।
शिष्ट काव्य में पीड़ा को मायने और मर्यादा को मथकर संस्कार देने की ऐसी लोकोपयोगी शिक्षा अलभ्य है। अधोलिखित पंक्तियों में द्रष्टव्य है कि बहन कटि को कसकर रो रही है जबकि भाई ग्रीवा को ग्रहण कर विलाप कर रहे हैं। यदि पिता मुख को ढाँपकर रूदनकर रहे हैं तो माँ गाय की तरह रंभाकर अर्थात् ''बोम-फारकरÓÓ रो रही है-
कनिहा पोटार के बहिनी रोवय, गर पोटार के भाई।
ददा बपुरा मुंह छपक के। बोम फार के दाई।।
यहाँ लोकगीतकार ने भाभी को हाशिये पर भी नहीं रखा है। रूदन की माप के आधार पर पीडा को प्रस्तुत करना लोकगीतकार को जितना अभीष्ट है, उतना ही वह वाणी के आधार पर भी व्यथा को व्यक्त करने और मापने का आग्रही है। अधोलिखित पंक्तियों में वह उद्घाटित करता है कि माँ बेटी को रोज आने, पिता छह माह में तथा भैया वर्ष में एक बार तीज-पर्व के अवसर पर लेने आने का तथ्य निवेदित करते हैं जबकि भौजी ननद को परायी होने का एहसास दिलाती हुई कहती है कि अब उसका इस घर में क्या काम है-
दाई कहे रोज आबे बेटी, ददा कहै छयमास हो।
भइया कहै तीजा-पोरा म, भौजी कहे कौन काम हो।
परम्परा- ग्रथित लोकगीत प्रकृति से प्रसूत और भूमि से उद्भूत हैं। यही कारण हैं कि इनके उपमान ओर प्रतीक अत्यन्त प्रभावी तथा समरस होते हैं। अधोलिखित छत्तीसगढ़ी सुवा-गीत में लोक गीतकार की उद्भावना हैं कि सुग्गे की चोंच टेढ़ी लाल कुंदरू फल सदृश है जिस पर मसूर की दो दालों की दो आँखे हैं। तन हरे भुट्टे की तरह है-
चोंच तोर दिखत हे, लाली-लाली कुंदरू,
रे मोरे सुवा, आँखी दिखे मसूरी के दार।
जोंधरी के पाना साँही,डेना-संवारें,
रे मोरे सुवा, सुन लेंबे बिनती हमार।।
नये उपमानों व प्रतीकों की शक्ल में कहीं एक प्रयोगवादी कविता पढ़ी थी। काली-कलूठी स्त्री की मोटी होंठ पर लिपिस्टिक को निरखकर कवि ने लिखा है--
तेरी काली-काली मोटी-मोटी
सुघर होंठ पर लिपिस्टिक ऐसी शोभा देती है
जैसे कोयले की खान में आग की ज्वाला सुलग गई हो।
उल्लेखनीय है कि कोयले की खान में ज्वाला सुुलगती देखकर एक काली महिला की मोटी होंठ पर लिपिस्टिक के लेप का बिम्ब नहीं उभरता जबकि उपर्युक्त छत्तीसगढ़ी, लोकगीत के उद्धरण में लाल कुंदरू फल, मसूर की दाल और भुट्टे के संयोजन से सुग्गा तैयार हो जाता है। प्रयोगवाद के नाम पर प्रस्थापित आज कितने उपमान व प्रतीक समरस हैं इसके विपरित नाम व यश लिप्सा से परे ये लोकगीतकार अर्थात् निरक्षर भट्टाचार्य अनेक आंचलिक उपमान व प्रतीक देकर लोकमानस में प्रतिष्ठित हैं। लोकगीतों में संस्कार रचे-बसे हैं जबकि शिष्ट साहित्य में यही संस्कृति से जुड़कर स्थायित्व प्राप्त करते हैं। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में व्यवहृत दो संस्कार-संपन्न लोकोक्तियों के उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट करना चाहूंगा। हिन्दी में प्रचलित लोकोक्ति ''अंधा कानूनÓÓ यदि सचमुच अंधा होता तो ''अंधा पीसे कुत्ता खायेÓÓ की तरह धनी और गरीब दोनों के लिये सहायक होता। छत्तीसगढ़ी मड़ई गीत में मुझे एक मुहावरा मिला-''कनवा हे कानून अउ भैरा हे सरकार ग।ÓÓ  इसमें काना-कानून मुहावरा प्रयुक्त है जो सार्थक है। पूजीपतियों के लिए कानून का एक नेत्र खुला और गरीबों के लिये इसकी एक आंख बंद है। इसी तरह ''काला अक्षर भैंस बराबरÓÓ लोकोक्ति भी उचित जान नहीं पड़ती क्योंकि भैंस और अक्षर रंग साम्य ही रखते हैं जबकि भैंस का हितैषी निरक्षर है। छत्तीसगढ़ी में समाहत ''काला अक्षर साँप बरोबरÓÓ अधिक उपयुक्त है। अक्षर और सर्प दोनों टेढ़े-मेढ़े है। अशिक्षित सर्प की तरह प्रतीत होने वाले अक्षरों से बिदकते हैं। समाचार पत्रों में हम सब छोटे अक्षर से लोकर मोटे अक्षर तक रोज देखते-पढ़ते हैं। छोटे अक्षर सबसे लघु सर्प ''अंधा साँपÓÓ की मोटाई वाले तथा सबसे बड़े अक्षर अजगर सर्प की मोटाई वाले ही दृष्टिगत होते हैं। अक्षर और सर्प में जो साम्य है, उसे छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में संरक्षित लोकोक्ति अक्षुण्ण रखती है जबकि ''आंख के अधूरे और गांठ के पूरेÓÓ हम शिष्ट साहित्य सर्जक और तथाकथित समीक्षक होकर भी संस्कार विपन्न भ्रम के भंवर में फंसे है। ऐसे अनेक उदाहरण है जिससे यह प्रमाणित होता है कि परंपरा पर आधारित लोकगीत अथवा लोकवार्ता की समग्र लोकविधाएं, जिजीविषा की उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है क्योंकि उन्हें मालूम है कि जब तक लोक रहेगा, लोक साहित्य जीवित रहेगा।
लोककलाएं प्रदर्शनकारी नहीं होती वे लोक के लिये अर्पित-समर्पित और सहज निर्मित स्फुरित लोकरचना होती है जो संस्कार व वातावरण के अनुरूप सहज-अभिव्यक्त होती है। इधर लोक कलाओं को प्रदर्शन और विचित्रता-निदर्शन का पर्याय मानकर उसे धिकृत-विकृत करने का जो उपक्रम किया जा रहा है, वह क्षम्य नहीं कहा जा सकता। यहां प्रदर्शनकारी लोककलाओं से आशय उसके जन-मन के मध्य लोकप्रिय होने और व्यवसाय के रूप में इसी पीढ़ी दर पीढ़ी संचालित रखने से है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि व्यवसाय समझकर कलाकार इस क्षेत्र में अग्रसित हों और लोकलाओं को प्रदर्शनकारी बना दें। लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण संयोजन प्रदर्शन से संपृक्त होकर प्रकारान्तर में लोकनाट्य के प्रभाव  दबाव को ही व्यक्त करता है। उदाहरणार्थ नाचा या गम्मत लोकनाट्य है लेकिन लोककीर्तन की परंपरा में अवस्थित लोकगाथा पंडवानी भव्य मंचों में जाकर लोकनाट्य से संपृक्त हुआ तद्नुरुप पंडवानी-गायक (गायक और गायिका भी) अभिनय के द्वारा हाव-भाव की विविध अभिव्यक्ति करने लगे। इस तरह लोकगाथाओं पर अभिनेयता का आकर्षण बढ़ा। इसी भांति छत्तीसगढ़ी लोक गाथा लोरिक चंदा में एक अभिनय अथवा विविध पात्रों के द्वारा लोकगाथा के साथ नाट्य प्रस्तुति का प्रभाव उसकी प्रदर्शनीयता की ही प्रतीति है। इसके विपरीत ढोला मारू, सरवन, गोपी-चंदा आदि लोकगाथा के रूप में अक्षुण्ण है लेकिन निकट भविष्य में लोकनाट्य से ओतप्रोत होकर ये भी प्रदर्शनकारी होंगी, ऐसा विश्वास बनता है। लोरिक चंदा को जहां प्रदर्शनकारी लोकनाट्य का स्वरूप देते हुए श्री लक्ष्मण चंद्राकर ने नव्य प्रयोग किया, वहीं उसकी प्रारंभिक प्रस्तुति को अक्षुण्ण रखते हुए श्रीमती रेखा निषाद व सोनसागर चनैनी पाटी कचांटुर ने साभिनय प्रस्तुति के द्वारा इसका मनमोहक प्रदर्शन किया है। पंडवानी की ''बेदमती शाखाÓÓ जहां प्रदर्शनकारी लोककला की श्रेणी में आकर भी लोककीर्तन व लोकगाथा के सन्निकट है, वहीं इसकी कापालिक शाखा लोकनाट्य के अधिक समीप है। प्रथम शैली के प्रमुख लोककलाकारों में श्री झाड़ूराम देवांगन, पूनाराम निषाद आदि है, जबकि दूसरी शैली में पद्मश्री तीजनबाई प्रसिद्ध है। भरथरी व ढोला की लोककथात्मक प्रस्तुति जहां श्रीमती सूरूज बाई की विशिष्टता है, वहीं उसकी लोकनाट्य प्रस्तुति श्रीमती रेखा निषाद की निजता है।
लोकनाट्य की भाव-भूमि पर छत्तीसगढ़ी लोककलाएं प्रदर्शनकारी ही सिद्ध हुई है। यदि श्री हबीब तनवीर के इस प्रयास ने उन्हें अंतराष्ट्रीय ख्याति प्रदान की तो श्रीरामचंद्र देशमुख को ''चंदैनी गोंदाÓÓ कारी, से देशव्यापी प्रसिद्धि मिली। ''एक रात का स्त्री राजÓÓ लोकनाट्य ''डिंडबा नाचÓÓ का प्रयोगजन्य लोककला- रूप है जिसे श्री रामचंद्र देशमुख ने प्रस्तुत किया। यह लोकनाट्य महिलाओं तक सीमित था। इसे जन-जन तक प्रदर्शित करने का उपक्रम अभिनंदनीय है। ''अरे मायावी सरोवरÓÓ में डॉ. शंकर शेष ने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का प्रयोग किया है लेकिन उसका पर्यावरण प्रस्तुत करके उसे प्रस्तुत किया है। यही प्रयोग ग्राह्य है, जैसे कि ''भारत : एक खोजÓÓ दूरदर्शन धारावाहिक में पद्म श्री तीजन बाई के पंडवानी का प्रयोग अत्यंत प्रभावी है। श्री हबीब तनवीर के ''चरणदास चोरÓÓ और ''आगरा बाजारÓÓ को लोकसाहित्य का समावेश अर्थात् लोककथा और लोकगीत के अनुरूप परंपरा और परिवेश के परिपालन के कारण ही सफलता मिली है लेकिन यदि गांव के नाम ससुराल, मोर नाम दामाद में वे पिता द्वारा पुत्री- विक्रय की प्रथा की चर्चा करते हैं तो  जन-मन इसे अंगीकार नहीं करता।
इसी भांति सुवा गीत में बाह्य प्रयोग एक बार स्वीकृत है लेकिन उसे दु्रत गति से गाकर और शास्त्रीयता का पुट देकर आकर्षक ढंग की प्रस्तुति का दावा करने वालों को यह कहने में संकोच नहीं है कि लोकगीत में लोकसंगीत का रहना और लोकधुन विशेष के कारण उसकी पहचान है। प्रत्येक लोकगीत लोकछंद है जिन पर कविता लिखकर आंचलिक कवि लोकप्रिय हो सकता है। देश की अनेक भाषा बोलियों के कवि गायक लोकगीत-शिल्प विधि को आधार मानकर अपनी पहचान बना चुके हैं लेकिन इसका परिष्कार और ताम-झाम के हिसाब से आधुनिक रूप में प्रस्तुति का प्रवास उचित नहीं होगा।
साभार- रौताही 

यादवी संस्कृति की अनूठी कृति है : सोहई

मनुष्य अपने रहन-सहन, खान-पान, साज-श्रृंगार के साथ ही पशु-पक्षियों को अपना सहयोगी बनाना, उसकी बोली, आदतों को समझने की कला भी आती है। यहाँ गाय, बैल, भैंस, भैंसा, बकरी को पशुधन व लक्ष्मी की संज्ञा दी गई है। इसी के अनुरुप गोधन की देखभाल करने वाले राऊत जाति के लोग सुरक्षा के साथ श्रृंगार का भी विशेष ध्यान रखते हैं। छत्तीसगढ़ में कृषकों के साथ बड़ी संख्या में राऊत जाति के लोग निवास करते हैं, वे अपने को कृष्ण के वंशज मानने के साथ यदुवंशी होने पर गर्व करते हैं। साथ ही गोचारण करना पवित्र कार्य मानते हैं। भले ही गोधन उनका न हो पर ग्राम के किसानों के पशुधन को ही अपनी पूंजी मानते हैं। इनका देखभाल, साज-श्रृंगार व वृद्धि होने की कामना सतत् रूप से करते रहते हैं। दीपावली के अवसर पर जब कृषकों की फसलें पकने लगती हैं तब वे अपनी संपन्नता से खुश होकर घर में लक्ष्मी आने व उसके स्वागत की कई तरह से जो पशुधन चराते हैं वे लोग गोधन के श्रृंगार के लिए सोहई बनाते हैं और विशेष परंपरा के साथ मालिकों के गाय, भैंस को पहनाते हैं।
परंपरा- द्वापर युग से प्रचलित परंपरा आज भी अपने मौलिक स्वरूप में लोगों द्वारा स्वीकार्य है। माना जाता है कि ग्वाल-बाल पशुओं को जंगल में चराने ले जाते थे। इस समय वे घास-फूस व वानस्पतिक सामग्रियों से गोधन के लिए श्रृंगार सामग्रियां बनाए होंगे। इसकी सुंदरता बढ़ाने के लिए मोर पंखों को भी लगाया गया होगा क्योंकि श्रीकृष्ण को मोर पंख बहुत पसंद था। मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में मोर बहुतायत से पाए जाते हैं। इस तरह सोहई बनाने व पहनाने की शुरुआत हुई। सोहई का शाब्दिक अर्थ 'सुंदर दिखने वालाÓ है। छत्तीसगढ़ में इसे सोहई ही कहा जाता है।
निर्माण- सोहई बनाने के लिए पलाश की जड़ों को खोदकर सुखाई जाती है। फिर लकड़ी के कुटेले से कूटकर ढेरे से आंटकर या अंगुलियों के सहारे बल देकर लपेटा जाता है। इसे चिट्ठा में एकत्र कर जरूरत के अनुसार उपयोग किया जाता है। यह सफेद रंग का काम करता है। दूसरा रंग काला की रस्सी बनाने के लिए पटुआ या लटकना के रेशों को एक सप्ताह तक पानी में सड़ा कर छिला जाता है फिर हीराकसी व पैरी के छिलके को भीगो कर उबाला जाता है। सूखने पर ढेरे से ऐंठकर सोहई बनाने में उपयोग करते हैं। सुंदरता बढ़ाने के लिए मयूर पंख, रेशमी धागे, रंग-बिरंगे कपड़े व रंगों का उपयोग करते हैं। इसे राऊत जाति के लोग स्वयं पशु चराते समय कर लेते हैं या गाँव में जो कुशल लोग रहते हैं वे भी सोहई बना देते हैं। इसे गोधन के डील-डौल के हिसाब से पहनाई जाती है। सोहई हमारे प्रदेश का विशिष्ट लोक-शिल्प है। इसमें प्रयुक्त की गई सामग्रियाँ मोर पंख, पलाश, पटसन, रेशमी धागे यहां पवित्रता व मंगल के सूचक हैं। यह पूरी तरह से हस्त-निर्मित होता है।
प्रकार-सोहई मुख्य रूप से दो प्रकार की बनाई जाती है। पहली मोर पंख व रस्सियों के उपयोग से दो से लेकर सोलह लडिय़ों की बनाई जाती है। सजावट के लिए बीच-बीच में रंगीन कपड़े, ऊन के झालर लगाए जाते हैं। इसे भागड़ सोहई कहते हैं। दूसरे में बांख, पलाश की जड़ और पटसन के उपयोग से बनाई जाती है। यह सफेद रंग की होती है। सुंदरता के लिए काले रस्सियों का उपयोग किया जाता है। इसे पचेड़ी सोहई कहते हैं। इसके अलावा पलाश की जड़ों व पटसन को काले रंग से रंगकर करेलिया नाम से सोहई बनाते हैं। इसे भैंस व छोटे आकार की सोहई बकरियों को पहनाते हैं।
अवसर- राऊत लोग दशहरा मनाने के पूर्व पलाश की जड़ों की खोज व सामग्री तलाशते हैं। दीपावली के दूसरे दिन देवारी व गोवर्धन पूजा के दिन से गोधन को सोहई पहनाना प्रारंभ करते हैं। इसके बाद देवारी के दिन ही कुछ ग्वाले मालिक के घर गाजे-बाजे के साथ जाकर गाय-भैंस को सोहई बांधते व सुखधना थाप कर मालिक की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। परंपरानुसार देवारी, देवउठनी व पुन्नी पूर्णिमा के दिन सोहई बांधते हैं। राऊत लोग अपने आस्था के प्रतीक खोड़हर पर भी सोहई चढ़ाकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
आशीष परंपरा- सोहई केवल गोधनों के लिए श्रृंगार सामग्री ही नहीं है अपितु यह राऊत समुदाय की संवेदनशीलता व दूसरों के सुखों की चाह का प्रतीक है। इसी बहाने वे अपने पशुधन मालिकों के सुख-समृद्धि की मंगल कामनाएं करते हैं। संध्या होते-होते वे क्रमश: अपने मालिकों के घर व गौशाला जाकर गोधन को सोहई पहनाकर आशीष देते हैं।
अनधन भंडार भरे, तुम जियो लाख बरिसा।
जइसन जइसन के लिये दिये, वइसन देबा आसीसा।
इस तरह सोहई यादवी शिल्प की अनूठी कृति होने के साथ ही लोक मानस को आशीर्वाद देने का पवित्र माध्यम है।
शिल्प समृद्धि- सोहई प्रतिवर्ष राऊत समुदाय द्वारा परंपरा से बनाई जाती है। बढ़ते भौतिकवाद, गोधन की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में चारागन सीमाओं की कमी, मालिकों के कम उत्साह के बावजूद गोचारकों द्वारा परंपरा व शिल्प समृद्धि के दृष्टि से सोहई बनाई जाती है। ग्राम डोंगीतराई के रिखी राम यादव ने बताया कि उनके पिता के जमाने में आसपास के राऊत अपनी-अपनी सोहई को उन्हें लाकर दिखाते थे जिसकी सोहई बुनावट सबसे सघन व एक समान होता था उसे काफी प्रशंसा मिलती थी। साथ ही अन्य लोगों को भी उसी तरह से बनाने के लिए कहा जाता था। दोनों भाइयों में भी एक तरह से प्रतियोगिता होती थी कि कौन अच्छी सोहई बनाता है। बेटों को अपनी जातिगत शिल्प-कला को समृद्ध करने के लिए ऐसी प्रतिस्पर्धा करना बड़ा सुखद लगता था। आज भी यादवों द्वारा सोहई को शिल्प के रूप में सतत रूप से समृद्ध किया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ के मांगलिक प्रतीकों की तरह प्रयुक्त होने लगा है। प्रदेश की कला-शिल्पों में अभिरुचि रखने वाले लोग अपने घरों में सजावट की वस्तु की तरह सहेज कर रखने लगे हैं। सोहई की कच्ची सामग्रियाँ काफी महंगी होती जा रही है पर इसमें रुचि रखने वाले इस समुदाय के लोग अभावों के बावजूद प्राथमिकता से गोधन के श्रृंगार व मालिक की सुख समृद्धि की पवित्र कामना को ध्यान रखते हुए सोहई का निर्माण करते हैं, जो इनकी शिल्प समृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। इस शिल्प को समृद्ध करने की दृष्टि से जनसमुदाय में प्रादेशिक शिल्प के रूप में प्रचारित करने की आवश्यकता है।
 साभार-, रऊताही 2012