Monday, 21 January 2013

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति

छत्तीसगढ़ संस्कृति का विकास अरण्यों-तपोवनों में हुआ है। इसलिये यह ऋषि भूमि है। स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने यहां की संस्कृति को नए आयाम दिये।
आज द्विज तथा अद्विज जातियों का धर्म एक ही है संस्कार एक है, भाव तथा विचार एक है, तथा जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भी एक है। उनका मिश्रण इतनी सघनता से हुआ कि उनके बिलगाव का प्रयत्न कठिन है। अद्विज जातियों ने राजीव लोचन, शिवरीनारायण, सिरपुर, आरंग, खरौद, पाली के भव्य मंदिरों का निर्माण किया।
शैव तथा शाक्त धर्म एवं भक्तिवाद का भी अद्विजों ने विकास किया, जिनमें कबीरपंथ और सतनामी पंथ प्रमुख है। यहां के निर्मल मन जल-छल कपट से दूर हैं। वे परिश्रमी उदारमना और संतोषी स्वभाव के हैं। आदिम जातियों की धर्म-शक्ति उपासना के समीप है। मंत्र शक्ति पर उनका विश्वास है। छत्तीसगढ़ के लोग धर्म के प्रति अडिग एवं अखंडनीय श्रद्धा के अपूरित हैं तो दूसरे धर्मों का समादर करने में उदार हैं।
पर्व और त्यौहार-छत्तीसगढ़ की प्रमुख जाति हिन्दू है पर अन्य जाति और धर्म के लोग भी निवास करते हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है। इनमें मुसलमान और ईसाई अपेक्षाकृत अधिक हैं। कुल जनसंख्या का करीब 40 प्रतिशत अनुसूचित जाति-जनजाति का है। आध्यात्म की भावना यहां की संस्कृति के कण-कण में है। शिवरात्रि, रामनवमी, श्रावणी, होली, दीवाली हिन्दुओं के प्रमुख पर्व हैं तथा मुसलमानों के ईद, मुहर्रम, रमजान, सम्पूर्ण अंचल में भरने वाले उर्स भावनात्मक एकता की सुगंध बिखेरते हैं। सभी लोग मुक्त भाव से एक-दूसरे के त्यौहार में भाग लेते है। धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता छत्तीसगढ़ की अपनी विशेषता है।
पर्व और त्यौहार एक अंचल तथा जाति का सामूहिक आनन्दोल्लास है जो विशेष अवसरों पर ऋतुओं के परिवर्तन पर खेती के उगने, लहलहाने और पकने पर अभिव्यक्त या प्रदर्शित होते है। इनके पीछे धार्मिक आस्था और विश्वास के रंग भी अभिव्यंजित होते हैं। उक्त अवसरों पर इन्द्रधनुषी भारतीय संस्कृति की छटा भी दिखलाई देती है।
छत्तीसगढ़ के त्यौहारों का अपना बांकपन है। यहां कोई त्यौहार अनाहूत की भांति दबे पांव नहीं आता। सामान्य अतिथि होता है जिसका भावभीना स्वागत होता है। विपन्नता उल्लास में कोई कमी नहीं ला पाती। उसके मनाने की विशिष्ट परिपाटी होती है। खास व्यजन बनते है, नृत्य तथा संगीत प्राण फूंकते हंै।
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का अपना- छेर-छेरा छत्तीसगढ़ का अपना लोकपर्व है जो पौष पूर्णिमा को मनाया जाता है। धान की फसल पककर झूमने लगती है और अपने श्रम का एवं त्याग को फलीभूत पाकर मद आल्हादित होता है-
पीस कूट के छेरछेरा मनाबो
नाचे ल डंडा घरोघर जाबो।
परस्पर एकता एवं बंधुत्व, औदार्य, त्याग एवं समाजवादी भावना का सन्निवेश- छेरछेरा का मूल प्राण है। नवयुवक इस अवसर पर डंडा नृत्य करते हैं। यह सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता का संदेशवाहक पर्व है।
एक दूसरा पर्व है भोजली । इसमें कुमारी कन्याएं श्रावण में भोजली की साधना करती है, जो श्रावण शुक्ल 9 से नौ दिनों तक चलती है। कषि के प्रतीक पात्रों में टोकनी में अन्न के पौधे उगाकर गंगा से वर्षा की याचना करती हैं।
नवरात्रि में दुर्गा पूजा, कुमारी कन्याओं की संध्या पूजा भी छत्तीसगढ़ी पर्व है। दुर्गापूजा कर जीवन की संधि बेला  में पत्रों से संध्या की उपासना करती हैं।
नदी पूजा, नाग पूजा, वृक्ष पूजा, गो वृषभ पूजा जीवन की सहयोगी सभी को पूज्य ऐसी समन्वय युक्त जीवन दृष्टि का विकास, जिन्होंने किया वे साधारण मानव नहीं थे।
लोकनृत्य-
छत्तीसगढ़ के लोक नृत्यों में राउत नृत्य, डंडा नृत्य, गेंड़ी नृत्य, देवार नृत्य, सुआ नृत्य, गौरा नृत्य, झूमर नृत्य, आंगनई नृत्य, रीना, सरहुल, करमा, पंथी, बार नृत्य, जात्रा नृत्य आदि उल्लेखनीय हैं। इनकी अपनी विशेषताएं है।
राउत नृत्य अहीर लोगों का है तो खानाबदोश देवार जाति का देवार नृत्य। सैला- सरगुजा की उरांव जाति का। राउत राउत नृत्य कार्तिक अमावस्या से प्रारंभ होकर पौष पूर्णिमा तक अनवरत रूप से चलता है। डंडा या सैला-नृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी से फागुन पूर्णिमा तक। गेंड़ी नृत्य हरियाली अमावस्या के दिन तो कार्तिक मास में- सुआ नृत्य। करमा छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक चर्चित नृत्य है जो सरगुजा के उरांव बड़े उल्लास से मनाते हंै, जिसमें स्त्री पुरुष दोनों भाग लेते हंै। सुग्गी नृत्य मात्र स्त्रियों का है और इसी तरह गौरा भी झूमर नृत्य के लिए समय या त्यौहार की आवश्यकता नहीं। सभी जाति की स्त्रियां इसमें भाग लेती है।
गोवर्धन पूजा राउत नाचा का मूल है। यह एक उत्तेजक वीर नृत्य है जिसमें गीत कम व नृत्य अधिक रहता है। लाठी राउत की सज्जा का एक अंग है। लाठी चलाने की कला में  वे बहुत प्रवीण होते हैं-
तेन्दू सार की लाठी, सेर भर घी खाई।
एक लाठी परगे, टें टे नरियाई।।
रावत नाच में अखरा का पूज्य और महत्वपूर्ण स्थान हैं। वह अस्त्र-शस्त्र विद्यार्जन की पाठशाला है।
रावत नाच में नृत्यकों की वेशभूषा देखते ही बनती है। इस अवसर पर वे भड़कीली रेशमी, सूती, मखमली जरी कारीगरी से युक्त कपड़े, धारण करते हैं। पैरों में मोजे, जूते, घुंघरु, बांधे घुटने तक धोती, कमर में करधन गले में तिलरी या पुतरी, मुंह पीले रंग से पुता हुआ, आंखों में चश्मा, सिर पर कागज के फूलों से बना गजरा दाये, में तेंदू की लाठी, बाये हाथ में ढाल सम्हाले, कौडिय़ों की माला गले से कमर तक।
वीर श्रृंगार रस का इसका मूल स्त्रोत है नाचते समय फटी गदका, पठा बनेठी आदि में अपनी निपुणता दिखाते हैं।
उनके नृत्य का लालित्य व पग संचालन उमंग थिरकन सब में एक लय रहती है। नृत्य के समय गाए जाने वाले गीत दोहा या सोरठा होते हैं जिनमें जीवन के विविध पक्ष की झांकी देखने को मिलती है।
पंथी नृत्य सतनामी समाज का श्रम साध्य नृत्य है। निर्गुन भजन या गुरु घासीदास के गुणानुवाद के गीत गाये जाते हैं। पिरामिड बनाने की कलात्मकता इस नृत्य को विलक्षण बना देती है। कंवर जाति का वार नृत्य हर तीसरे वर्ष आयोजित होता है जो निरंतर बारह दिन या 288 घंटे चलता है। अंतिम दिन बांस से बनाई गाड़ी में शराब पिलाये बैलों को फांदकर बैगा को बैठाकर दौड़ाया जाता है।
नर्तकों की नृत्य के समय अपनी वेशभूषा और साज श्रृंगार रहता है। उसके अपने नियम और तरीके रहते हैं और लोक वाद्य भी नगाड़ा-मांदर, ढोलक, तम्बूरा, डफ, चिकारा, ढिसकी, झांझ, सिगी खंजरी बांसुरी, ढेकी, ढोल, तुड़बड़ी आदि लोक वाद्य हैं जिनका समय और आवश्यकतानुसार उपयोग किया जाता है।
यहां का संगीत-नृत्य प्रदान रहस, गीत गम्मत से पुराजोर नाचा तथा हाव भावयुक्त पंडवानी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के उद्योषक हैं। रहस अर्थात रास याने भगवान कृष्ण का विविध लीलाभिनय। पूरी कथा को मामा-भाँजे की कहानी कहा जाता है। इसे कई लीलाओं में विभाजित कर खेला जाता है। अभिनय नृत्य परक होता है। प्रसंगानुसार मूर्तियों का संयोजन किया जाता है जिनकी अधिकतम संख्या 120 रहती है। इन्हें चितेरे बनाते हैं।
नाचा में गीत और गम्मत दो अंग होते है। गीत नृत्य के साथ होता है और गम्मत अभिनय के रूप में। गम्मत का व्यंग्य बेधने वाला होता है।
पंडवानी छत्तीसगढ़ी लोकशैली में महाभारत गायन है और जिसे 'लोक बैलेÓ की संज्ञा दी जा सकती है। यह छत्तीसगढ़ी की अपनी विशेषता है। उत्तर भारत में महाभारत का पाठ स्त्रियों के लिए वर्जित है। वह मात्र द्विजों तक सीमित है। छत्तीसगढ़ में द्विजेतर स्त्रियां तीजनबाई, प्रभाकुमारी यादव, लक्ष्मी बाई सतनामी, रितु वर्मा ने पंडवानी में ख्याति अर्जित की है। तीजनबाई ने विदेशों में इसे प्रतिष्ठापित किया और राष्ट्रपति द्वारा पद्यमश्री से अलंकृत की गई।
छत्तीसगढ़ी- छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ की लोक बोली है जो करीब एक हजार वर्ष पुरानी है इसकी उत्पत्ति अर्ध मागधी अपभ्रंश से हुई है। अर्ध मागधी तीन बोलियों का समूह है अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। छत्तीसगढ़ी में शौरसेनी की अपेक्षा मागधी की विशेषता प्रमुख है। कालान्तर में छत्तीसगढ़ी, ओडिय़ा और मराठी के प्रभाव में आकर अवधी से दूर होगई और आसपास के परिधान से अलंकृत छत्तीसगढ़ी बन गई। अब इसका मानक रूप बन गया है और इसका अपना व्याकरण है।
छत्तीसगढ़ी एक सरस, प्रवाहमयी और लचीली बोली है और करीब दो करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है।
छत्तीसगढ़ी का लोक साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसका समृद्ध साहित्य लोक गीतों, लोक कथाओं, प्रकीर्ण साहित्य, मुहावरा, कहावत, पहेली आदि से भरा पड़ा है।
देवेन्द्र सत्यार्थी के मत से लोकगीत किसी संस्कृति के मुंह बोलते चित्र होते है। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों का इतिहास चिर प्राचीन हंै। पुरानी पीढ़ी  निरक्षर किन्तु परम्परा के धनी लोगों ने युग युगान्तरों से मौखिक रुप से अधुना युग तक पहुंचा दिया। यह एक बड़ी उपलब्धि है। लोकसाहित्य का एक चिरन्तन स्वरूप हुआ करता है जिसमें मानवीय संवेदना के हर्ष-विषाद का एक व्यवस्थित स्वरूप उत्तरी धु्रव के हिम परतों के समान कालातीत होकर लिपटा हुआ रहता है। लोक साहित्य की विशेष उल्लेखनीय प्रवृत्ति तो यही है कि इसके पावन संगम में मानवीय नैसर्गिक प्रकृति का उन्माद तथा करुणा का अवसाद युगपत से दो समान्तर रेखाओं के समान मिलता है। समीक्षात्मक शिल्प की विधा से भावात्मक अनुभूति की संस्पर्शनीयता और ताल की संगीतात्मकता सरसता की रमणीयता लोकगीत की एक विशिष्ट खूबी है। छत्तीसगढ़ी लोकगीत इन खूबियों से आप्लावित है। इसके सिवाय भी इसकी अन्य विशेषताएं भी दृष्टव्य है। गीतों में संगीतात्मकता सरलता, बोली की मिठास, लघुता, समूहगत सामाजिकता, मानवीय रागों की भावान्विति है।
छत्तीसगढ़ी गीतों में धुनों की विविधता है जो अन्यत्र दुर्लभ है। ताल इसकी लोकप्रियता का कारण है। उदाहरणार्थ- जंवारा गीत पर बजने वाला ताल जवारा पार से गायक या श्रोताओं पर देवी विराजमान हो उठती है।
छत्तीसगढ़ी की शब्दावली वृहद है। आसपास की भाषाओं और बोलियों के शब्दों को अपने में समावेशित कर इसने अपनी सार्वभौमिकता को बढ़ाया है। इसे समझना दुरुह नहीं।
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का चित्रफलक अत्यंत व्यापक है। वह जन्म से लेकर सारे जीवन को परिव्यापत करके चलता है। जनता के जीवन से उसकी एकरसता है। ये लोकगीत प्रकृति के उद्गार हंै। प्रकृति जब तरंग में आती है तब वह गति करती है। संगीत की उत्पत्ति में प्रकृति और मानव की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का बड़ा योगदान है।
नृत्य और संगीत छत्तीसगढ़ी में आदिवासियों का जन्मजात गुण है। संतोषपूर्ण सरल सहज जीवन और चारों और उन्मुक्त नैसर्गिक सौन्दर्य उनको गति प्रदान करता है। उनका लोक संगीत नृत्य को ताल में आत्म विभोर कर देता है। उनका सम्पूर्ण जीवन संगीत में समाहित है। आदिवासी संगीत में सामुदायिक उत्सवों का एक जीवन्त स्वर है। सामूहिक सुख-दुख का दर्पण है। इनका संगीत से ही प्रारंभ होता है और संगीत में समाप्त होता है।
लोक चित्रांकन-छत्तीसगढ़ी के लोक चित्रांकन का इतिहास आदिम जनजातियों द्वारा चित्रित शैलाश्रयों से प्रारंभ होता है, जिसके साक्षी है रायगढ़ के सिखनपुर और कवरा पहाड़ के बहुसंख्यक चित्र। बाद में सभ्यता के विकास के साथ लोक चित्रांकन भी संस्कृति का अंग बन गया और हमारे मानव जीवन में अब प्रत्येक कर्मकाण्ड में निहित है। संस्कारों में लोक संस्कृति और लोक चित्रांकन का संगन है। ये जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते आए हैं। ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था को, विभिन्न संस्कारों को, लोकाचारी को वह विभिन्न अभिप्रायों से चित्रित करते आ रहा है ।
कोई भी मंगल कार्य हो, उत्सव या पर्व हो स्त्रियां चौक पूरती हंै। कहा जा सकता है कि यह उनकी जन्मजात प्रवृति है। चौक पूरने की कला ग्राफिक डिजाइन के अंतर्गत सम्मिलित की जा  सकती है।
छत्तीसगढ़ में हरियाली अमावस्या को सावन की अगवानी के रूप में सवनाही चित्र बनाये जाते हैं। मान्यता है कि इनके बनाने से घर में खर विकार याने बाधाएं नहीं आती। सवनाही के चित्र किशोरियाँ या महिलाएं गोबर के घोल से उंगुलियों द्वारा बनाती हैं। दीवारों को गोबर की दोहरी रेखाओं से घेर दिया जाता है। फिर मनुष्य अनुष्य आकृतियां, शेर तथा अन्य पशु आकृतियां उकेरी जाती हंै। ये प्रागैतिहासिक चित्रों से साम्य रखती हैं।
दीपावली के समय राउत जाति की स्त्रियां मालिकों के घरों पर ज्यामिती के आधार पर विशेष मांगलिक आकृतियां बनाती हैं। ये प्रकृति जन्य रंगों का उंगुलियों के द्वारा उपयोग करती हैं।
केंवट (निषाद) दीवारों पर रामकृष्ण की लीलाओं पर आधारित चित्रों का निर्कांण करते है। वे देवी मान्यताओं का अपनी दृष्टि से लौकीकरण करते हैं और उन्हें अपने बीच का व्यक्ति ही मानते हैं।
देवउठनी के दिन जब धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी होती है महिलाएं आंगन में छुई से घर में प्रवेश करते हुए देवी लक्ष्मी के पैरों का चित्रांकन करती हैं। बर्तन, सिक्कों से भरा हंडा आदि समृद्धि और सम्पन्नता के सूचक प्रतीक भी बनाये जाते हैं।
जन्माष्टमी के दिन दीवारों पर आठे कन्हैया का चित्र बनाया जाता है जिनमें कृष्ण के आठ जन्मों का चित्रण ज्यामिती पर आधारित होता है। उसके साथ ही सांप, बिच्छू,फूल-पत्ती, गाय की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। यह लोक चित्रांकन का एक अनूठा और अपूर्व उदाहरण है। चित्र सीधे-सादे ढंग से कम से कम रेखाओं में बनाये जाते हैं।
अन्य शिल्प-मिट्टी के खिलौने और जीवनोपयोगी पात्र, काष्ठ शिल्प, लोह शिल्प, प्रस्तर शिल्प आदि की अपनी विशेषताएं है। छत्तीसगढ़ अपने काँसे के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है। बांस की बनी वस्तुएं भी मनोहारी होती हैं। यहाँ का नादिया बैल लोक शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है। सांमरी जूतों का अपना अलग स्थान है। यहाँ के कोसा के कपड़े सारे देश में प्रसिद्ध है।
राष्ट्रीय पर्वों पर बनने वाली देवी-देवताओं की मूर्तियां- रहस के आयोजन के समय बनने वाली विशिष्ट विशाल मूर्तियां दर्शनीय होती हंै। रावण की मूर्ति में दस सिर बनाये जाते हैं और विभिन्न मुखों में विभिन्न मुद्राओं को मूत्र्त रूप प्रदान किया जाता है, जो छत्तीसगढ़ी शैली का अद्भुत नमूना है। आरंग के हाथी और डोंगरगढ़ के घोड़े की आकृतियां सहज ही मन मोह लेती है।
धातु शिल्प में सरगुजा की मलार, रायगढ़ की झारा और बस्तर की घड़वा जाति के लोग अपने उत्कृष्ट शिल्प के लिए जाने जाते हैं।
आभूषण शिल्प गजब है। छत्तीसगढ़ में स्त्रियां शताधिक प्रकार के आभूषण करती हैं कुछ आभूषण इस प्रकार है पैरी, गठिया, तोड़ा, घुंघरु, चुटकी, बिंदिया, सांटी, झांझर, लच्छा, नथ बेसर, लौंग फूली, खिनवा, झुमका, बाली, तरकी, बहुटा, बाजूबंद, पहुंची, सूता, हमेल, ढुलरी, तितरी, कौड़ी, मोती और मूंगे की मालाएं, परकोटा, मुंदरी करधनी इत्यादि गुदना उनका स्थायी आभूषण है जो मरने पर भी उनके साथ जाता है। स्त्रियां आभूषण प्रिय है उनमे सौंदर्य बोध है।
प्रकृति प्रेम, कठोर श्रम, अबाध, आनंद छत्तीसगढ़ का जीवन इन्हीं तीन तत्वों से ओतप्रोत है। सादगी ऋतुजा और धर्मभीरुता का पुट वैशिष्टय का परिपाक करता है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति बहुआयामी है कहां तक उसकी विशेषताओं को कहा जाये।-  साभार  रऊताही 1994

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