Monday, 20 August 2012

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बिलासपुर (छत्तीसगढ)यादव समाज द्वारा 11 अगस्त को कृष्ण् जन्माष्टमी के अवसर पर शहर में शोभायात्रा निकाली गई इसमें यादव समाज के युवाओं द्वारा शौर्य प्रदर्शन के साथ नृत्य पेश किया गया. इस कार्यक्रम में समाज के युवाओं, महिलाओं एवं ​वरिष्ठ नागरिकों ने बढचढकर हिस्सा लिया.

11.08.2012

बिलासपुर (छत्तीसगढ)यादव समाज द्वारा 11 अगस्त को कृष्ण् जन्माष्टमी के अवसर पर शहर में शोभायात्रा निकाली गई इसमें यादव समाज के युवाओं द्वारा शौर्य प्रदर्शन के साथ नृत्य पेश किया गया. इस कार्यक्रम में समाज के युवाओं, महिलाओं एवं ​वरिष्ठ नागरिकों ने बढचढकर हिस्सा लिया.

Sunday, 19 August 2012

11.08.2012

बिलासपुर (छत्तीसगढ)यादव समाज द्वारा 11 अगस्त को कृष्ण् जन्माष्टमी के अवसर पर शहर में शोभायात्रा निकाली गई इसमें यादव समाज के युवाओं द्वारा शौर्य प्रदर्शन के साथ नृत्य पेश किया गया. इस कार्यक्रम में समाज के युवाओं, महिलाओं एवं ​वरिष्ठ नागरिकों ने बढचढकर हिस्सा लिया.

Friday, 17 August 2012

जन्माष्टमी महोत्सव 11 अगस्त 2012

बिलासपुर. छत्तीसगढ. यादव समाज द्वारा आयोजित कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर निकाली गई शोभायात्रा में समाज के युवाओं ने जोर—शोर से हिस्सा लिया.

Thursday, 16 August 2012

यादव समाज द्वारा धूमधाम से मनाया गया जन्माष्टमी महोत्सव


बिलासपुर, (छत्तीसगढ़). प्रदेश के नगरीय प्रशासन, स्वास्थ्य एवं वाणिज्यिककर मंत्री अमर अग्रवाल ने आज इमलीपारा स्थित यादव भवन में यादव समाज द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं शोभायात्रा कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए. उन्होंने यादव सामुदायिक भवन के प्रथम तल कक्ष का शिलान्यास किया.
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री अग्रवाल ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भादों माह के अष्टमी के दिन हुआ. इसलिए हम प्रत्येक वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े धूमधाम से मनाते है. छत्तीसगढ़ के अलावा  पूरे देश में लाखों -करोड़ों भक्तों द्वारा कृष्ण जी के जन्म दिवस पर अनेकों कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है.
उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में यादव समाज ही एक एेसा समाज है जो नृत्य के माध्यम से दूसरों के दीर्घायु जीवन की मंगलकामना करते हैं. यह गौरवशाली परम्परा सिर्फ इसी समाज में देखने को मिलता है. उन्होंने कहा कि बड़ी खुशी की बात है यादव समाज में सामाजिक एकता बहुत मजबूत है. बिलासपुर में रावत नाच महोत्सव में प्रदेश के पूरे यादव बंधुआें द्वारा परंपरागत वेशभुषा में सामुहिक नृत्य प्रस्तुत कर एकता का परिचय दिया जाता है. कार्यक्रम में श्री अग्रवाल द्वारा यादव समाज के राष्ट्रीय  अध्यक्ष माधव यादव सहित समाज के भरत यादव, रामकुमार यदु, राधेश्याम यादव, लल्लु यादव, मोहित यादव, चिन्ताराम यादव आदि का सम्मान श्रीफल, शाल एवं धोती  भेंटकर किया गया. साथ ही समाज के प्रतिभावान छात्र अभिषेक यादव, मनीष यादव का सम्मान किया.
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष डॉ$ सोमनाथ यादव ने कहा कि यादव समाज आगे बढ़े इस हेतु समाज के प्रत्येक लोगों को एकता के सूत्र में बंधना होगा, तभी हम विकास की आेर अग्रसर होंगे. उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक लोगों का कर्तव्य है कि  अपने बच्चों के शिक्षा पर विशेष ध्यान दें. इससे समाज में जागरूकता बढ़ेगी. कार्यक्रम में बिलासपुर यादव समाज के अध्यक्ष रामशरण यादव ने कहा कि सामाजिक विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. उन्होंने शिक्षा एवं संस्कार पर विशेष ध्यान देने की बात कही. कार्यक्रम में स्वागत भाषण शैलेन्द्र यादव ने पढ़ा. कार्यक्रम का संचालन तेरस यादव ने किया. इस अवसर पर भुवनेश्वर यादव, कर्मचारी संघ के अध्यक्ष पी$ आर$ यादव, जनपद पंचायत सदस्य श्रीमती त्रिवेणी यादव, मनहरण यादव, तेरस यादव, चन्द्रिका यादव, मनीष अग्रवाल, राकेश तिवारी, तेजनाथ यादव, शिव यादव, उमाशंकर यादव सहित पूरे जिले से यादव समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे.
बच्चों के लिए विशेष आयोजन जिला यादव समाज द्वारा आज बच्चों के लिये रंगोली पेटिंग एवं फैंसी ड्रेस स्पर्धा का आयोजन किया गया. साथ ही प्रतिभावान विद्यार्थी जो कि बोर्ड परीक्षाओं तथा स्नातक स्नातकोत्तर की परीक्षा में 60 प्रतिशत से अधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुए तथा राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर खेल स्पर्धा में राज्य का प्रतिनिधित्व किये है उनके सहित लगभग सौ छात्र-छात्राओं का यादव समाज के उन बुजुर्गों का जिन्होनें सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया उनका सम्मान किया गया. शोभायात्रा राघवेंद्र राव सभा भवन से सुबह 11 प्रारंभ हुई तथा गोलबाजार तेलीपारा होते हुए श्री कृष्ण यादव भवन में संपन्न हुई. शोभायात्रा का नेतृत्व शैलेंद्र यादव ने किया. जिसमें पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष डा. सोमनाथ यादव, सहित उमाशंकर, रामशरण, रामकुमार, शैलेंद्र, दीपक, रामचरण, विजय, सनत, संतोष, रामपुरी, कुलदीप, प्रकाश, शरद, तेरस, अशोक, भागवत, तुलसी, लक्ष्मण, तेजनाथ, अमित, तरूण, राजकुमार, नान्हूराम, नवीन, नवनीत बरगाह, राजेंद्र, सुखदेव, धरमलाल, फिरतू, राजाराम, गोवर्धन, बालकृष्ण, कमल, लल्लू, पुनीराम, अनिल, आई.पी., चंद्रिका, ललित, भईयाराम, लक्ष्मण, प्रेमलाल, शरद यादव, नन्दू यादव, श्रीमती अहिल्या यादव, श्रीमती पूॢणमा यादव, श्रीमती अन्नपूर्णा यादव, श्रीमती कामिनी, श्रीमती दुर्गा, श्रीमती सावित्री, श्रीमती मंजू, श्रीमती त्रिवेणी यादव सहित सभी यादव समाज के पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित थे.

Sunday, 29 July 2012

देवगिरी यादव वंश

यादव वंश भारतीय इतिहास में बहुत प्राचीन है और यह अपना सम्बन्ध प्राचीन यदुवंशी क्षत्रियों से मानता है। राष्टकूटों और चालुक्यों के उत्कर्ष काल में यादव वंश के राजा अधीनस्थ सामन्त राजाओं की स्थिति रखते थे, लेकिन जब चालुक्यों की शक्ति क्षीण हुई तो वे स्वतंत्र हो गए और वर्त्तमान हैदराबाद के क्षेत्र में स्थित देवगिरि (आधुनिक दौलताबाद) को केन्द्र बनाकर उन्होंने अपने उत्कर्ष का प्रारम्भ किया।

भिल्ल्म तथा बल्लाल का संघर्ष

1187 ई. में यादव राजा 'भिल्लम' ने अन्तिम चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर भी अधिकार कर लिया। इसमें सन्देह नहीं कि भिल्लम एक अत्यन्त प्रतापी राजा था और उसी के कर्त्तृत्व के कारण यादवों के उत्कर्ष का प्रारम्भ हुआ था। पर शीघ्र ही भिल्लम को एक नए शत्रु का सामना करना पड़ा। द्वारसमुद्र (मैसूर) में यादव क्षत्रियों के एक अन्य वंश का शासन था, जो होयसाल कहलाते थे। चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर दक्षिणापथ में जो स्थिति उत्पन्न हो गई थी, होयसालों ने भी उससे लाभ उठाया और उनके राजा वीर बल्लाल द्वितीय ने उत्तर की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए भिल्लम के राज्य पर भी आक्रमण किया। इस प्रकार बल्लाल और भिल्लम के मध्य एक ज़ोरदार संघर्ष हुआ। वीर बल्लाल के साथ युद्ध करते हुए भिल्लम ने वीरगति प्राप्त की और उसके राज्य पर, जिसमें कल्याणी का प्रदेश भी शामिल था, होयसालों का अधिकार हो गया। इस प्रकार 1191 ई. में भिल्लम द्वारा स्थापित यादव राज्य का अन्त हुआ।

जैत्रपाल की वीरता

भिल्लम की इस पराजय से यादव वंश की शक्ति का मूलोच्छेद नहीं हो सका। भिल्लम का उत्तराधिकारी 'जैत्रपाल प्रथम' था, जिसने अनेक युद्धों के द्वारा अपने वंश के गौरव का पुनरुद्धार किया। होयसालों ने कल्याणी और देवगिरि पर स्थायी रूप से शासन का प्रयत्न नहीं किया था, इसलिए जैत्रपाल को फिर से अपने राज्य के उत्कर्ष का अवसर मिल गया। उसका शासन काल 1191 से 1210 तक था। अपने पड़ोसी राज्यों से निरन्तर युद्ध करते हुए जैत्रपाल प्रथम ने यादव राज्य की शक्ति को भली-भाँति स्थापित कर लिया।

सिंघण द्वारा राज्य विस्तार

जैत्रपाल प्रथम का पुत्र 'सिंघण' (1210-1247 ई.) था। वह इस वंश का सबसे शक्तिशाली प्रतापी राजा हुआ। 37 वर्ष के अपने शासन काल में उसने चारों दिशाओं में बहुत से युद्ध किए और देवगिरि के यादव राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दिया। होयसल राजा वीर बल्लाल ने उसके पितामह भिल्लम को युद्ध में मारा था और यादव राज्य को बुरी तरह से आक्रान्त किया था। अपने कुल के इस अपमान का प्रतिशोध करने के लिए सिंघण ने द्वारसमुद्र के होयसाल राज्य पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा वीर बल्लाल द्वितीय को परास्त कर उसके अनेक प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। होयसल राजा कि विजय के बाद सिंघण ने उत्तर दिशा में विजय यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गुजरात पर उसने कई बार आक्रमण किए और मालवा को अपने अधिकार में लाकर काशी और मथुरा तक विजय यात्रा की। इतना ही नहीं, उसने कलचुरी राज्य को परास्त कर अफ़ग़ान शासकों के साथ भी युद्ध किए, जो उस समय उत्तर भारत के बड़े भाग को अपने स्वामीत्व में ला चुके थे।
कोल्हापुर के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब और पांड्य देश के राजाओं को भी सिंघण ने आक्रान्त किया और अपनी इन दिग्विजयों के उपलक्ष्य में कावेरी नदी के तट पर एक विजय स्तम्भ की स्थापना की। इसमें सन्देह नहीं कि यादव राज सिंघण एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करने में सफल हुआ था और न केवल सम्पूर्ण दक्षिणापथ अपितु कावेरी तक का दक्षिणी भारत और विंध्याचल के उत्तर के भी कतिपय प्रदेश उसकी अधीनता में आ गए थे। सिंघण न केवल अनुपम विजेता था, अपितु साथ ही विद्वानों का आश्रयदाता और विद्याप्रेमी भी था। 'संगीतरत्नाकर' का रचयिता सारंगधर उसी के आश्रय में रहता था। प्रसिद्ध ज्योतिषी चांगदेव भी उसकी राजसभा का एक उज्ज्वल रत्न था। भास्कराचार्य द्वारा रचित 'सिद्धांतशिरोमणि' तथा ज्योतिष सम्बन्धी अन्य ग्रंथों के अध्ययन के लिए उसने एक शिक्षाकेन्द्र की स्थापना भी की थी।

सिंघण के उत्तराधिकारी

सिंघण के बाद उसके पोते 'कृष्ण' (1247-1260) ने और फिर कृष्ण के भाई 'महादेव' (1260-1271) ने देवगिरि के राजसिंहासन को सुशोभित किया। इन राजाओं के समय में भी गुजरात और शिलाहार राज्य के साथ यादवों के युद्ध जारी रहे। महादेव के बाद 'रामचन्द्र' (1271-1309) यादवों का राजा बना। उसके समय में 1294 ई. में दिल्ली के प्रसिद्ध अफ़ग़ान विजेता अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी भारत में विजय यात्रा की। इस समय देवगिरि का यादव राज्य दक्षिणापथ की प्रधान शक्ति था। अतः स्वाभाविक रूप से अलाउद्दीन ख़िलज़ी का मुख्य संघर्ष यादव राजा रामचन्द्र के साथ ही हुआ। अलाउद्दीन जानता था कि सम्मुख युद्ध में रामचन्द्र को परास्त कर सकना सुगम नहीं है। अतः उसने छल का प्रयोग किया और यादव राज के प्रति मैत्रीभाव प्रदर्शित कर उसका आतिथ्य ग्रहण किया। इस प्रकार जब रामचन्द्र असावधान हो गया तो अलाउद्दीन ने उस पर अचानक हमला कर दिया। इस स्थिति में यादवों के लिए अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखना असम्भव हो गया और रामचन्द्र ने विवश होकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी के साथ सन्धि कर ली।

अलाउद्दीन द्वारा रामचन्द्र का स्वागत

इस सन्धि के परिणामस्वरूप जो अपार सम्पत्ति अफ़ग़ान विजेता ने प्राप्त की, उसमें 600 मन मोती, 200 मन रत्न, 1000 मन चाँदी, 4000 रेशमी वस्त्र और उसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य उपहार सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त रामचन्द्र ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी को वार्षिक कर भी देना स्वीकृत किया। यद्यपि रामचन्द्र परास्त हो गया था, फिर भी उसमें अभी स्वतंत्रता की भावना अवशिष्ट थी। उसने ख़िलज़ी के आधिपत्य का जुआ उतार फैंकने के विचार से वार्षिक कर देना बन्द कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को उस पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफ़ूर का सामना करने में रामचन्द्र असमर्थ रहा और उसे गिरफ़्तार करके दिल्ली भेज दिया गया। वहाँ पर ख़िलज़ी सुल्तान ने उसका स्वागत किया और उसे 'रायरायाओ' की उपाधि से विभूषित किया। अलाउद्दीन रामचन्द्र की शक्ति से भली-भाँति परिचित था और इसीलिए उसे अपना अधीनस्थ राजा बनाकर ही संतुष्ट हो गया। पर यादवों में अपनी स्वतंत्रता की भावना अभी तक भी विद्यमान थी।

अंत

रामचन्द्र के बाद उसके पुत्र 'शंकर' ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी के विरुद्ध विद्रोह किया। एक बार फिर मलिक काफ़ूर देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए गया और उससे लड़ते-लड़ते शंकर ने 1312 ई. में वीरगति प्राप्त की। 1316 में जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई तो रामचन्द्र के जामाता 'हरपाल' के नेतृत्व में यादवों ने एक बार फिर स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। हरपाल को गिरफ़्तार कर लिया गया और अपना रोष प्रकट करने के लिए सुल्तान मुबारक ख़ाँ ने उसकी जीते-जी उसकी ख़ाल खिंचवा दी। इस प्रकार देवगिरि के यादव वंश की सत्ता का अन्त हुआ और उनका प्रदेश दिल्ली के अफ़ग़ान साम्राज्य के अंतर्गत आ गया।

Friday, 18 May 2012

यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री -अखिलेश यादव

      
       यादव इतिहास बड़ा गौरवशाली है. इस कुल में समय-समय पर, जीवन के हर क्षेत्र में,  ऐसी अनेक विभूतियों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने सामर्थ्य,  योग्यता एवं कुशलता  के बल से न केवल विश्व के इतिहास पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी, बल्कि यदुकुल का भी नाम रोशन किया. राजनैतिक  क्षेत्र में भी ऐसे ही  अनेक  यदुवंशियों  ने समाज व देश  की सेवा करते  हुए उच्च पदों पर आसीन हुए. विभिन्न गौरवशाली पदों पर काम कर चुके  ऐसे अनेकों  महानुभाव  हैं  उन सबका  नाम लिखना यहाँ असंगत होगा.

 स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  विभिन्न प्रदेशों में अब तक तीन  यदुवंशियों  को  राज्यपाल , दस को  मुख्यमंत्री  और एक को  लोकसभा स्पीकर  के रूप में पदासीन  होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है.  उनका विवरण नीचे दिया गया है:-

 मुख्यमंत्री-दिल्ली में :
1 . चौधरी ब्रह्मप्रकाश, दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री (1952 से 1955 तक) 

मुख्यमंत्री-उत्तर प्रदेश में :
1 .राम नरेश यादव -----------(23 .6 .1977   से 27 .2 . 1979   तक ) 
2 .  मुलायम सिंह यादव -----(2 .12 .1989 से 24 .6 .1991 तक )
      मुलायम सिंह यादव----(4 .12 .1993 से 2 .6 .1995 तक   ) 
      मुलायम सिंह यादव-----(29 .8 .2003 से 12 .5 .2007 तक )
3    अखिलेश यादव...........(15.3.2012 

मुख्यमंत्री-बिहार में :
1 . वी.पी. मंडल ----------------1968
2 . दरोगाप्रसाद राय ----------(16 .2 .1970 से 22 .12 .1970 तक )
3 . लालू प्रसाद यादव--------(11 .3 .1990 से 24 .7 .1997 तक )
4. राबडी देवी -----------------(24 .7 . 1997 से 3 .3 .2000 तक ) 
    राबडी देवी----------------(11 .3 .2000  से 7 .3 .2005 तक  )

मुख्यमंत्री-मध्य प्रदेश में :
1 . बाबूलाल गौर --------2007

मुख्यमंत्री-हरियाणा में :
1 . राव वीरेन्द्र  सिंह 1967  


राज्यपाल -राजस्थान में
1.बलिराम भगत
 
राज्यपाल-गुजरात में
1.महीपाल शास्त्री 
 
राज्यपाल-मध्य प्रदेश में
1. राम नरेश यादव  

 लोकसभा स्पीकर:
1. बलिराम भगत 

 वर्तमान समय में मुलायम  सिंह यादव और उनके सुपुत्र अखिलेश यादव  ऐसे दो  महान व्यक्ति  हैं जिनका जिक्र आते ही यदुवंशियों का सीना  गर्व से फूल जता है. मुलायम सिंह यादव एक जाने माने सफल समाजवादी नेता है. उन्हें लोग प्यार से "नेताजी'"  कहते हैं. वे तीन बार उत्तर-प्रदेश के  मुख्यमंत्री तथा एक बार केंद्र में रक्षामंत्री रह चुके हैं. अपने पिताश्री के  पद-चिन्हों पर चलते हुए  अखिलेश यादव ने हाल ही  में हुए  उत्तर प्रदेश की विधान-सभा चुनाव में, युवा वर्ग के सहयोग से , अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया. विधान -सभा की 403  में 224 सीटें जीत कर उन्होंने सबको आश्चर्यचकित कर दिया.  15 मार्च, 2012  वे यदुकुल के दसवें मुख्यमंत्री बने. वे उत्तर प्रदेश के सबसे कम आयु वाले मुख्यमंत्री है. 

अखिलेश यादव बेदाग छबि, मृदुभाषी तथा प्रगतिशील विचारों वाले युवा नेता है. उनका जन्म 1 जुलाई, 1973 को उत्तर प्रदेश में  इटावा जिले के सैफई गाँव  में हुआ.  इनके पिता  का नाम मुलायम सिंह यादव  और माता का नाम मालती देवी है. इनका विवाह  1999  में डिम्पल यादव से हुआ. इनके  अदिति,   टीना और अर्जुन नाम वाले  तीन बच्चे  हैं.  इनके पिता एक जाने-माने  समाजवादी नेता हैं. भारतीय राजनीति  में उनका विशिष्ट स्थान है.   अखिलेश यादव की  प्रारंभिक शिक्षा  इटावा में तथा उच्च स्कूली शिक्षा मिलिटरी स्कूल धौलपुर राजस्थान से हुई.   इंजीनियरी में  स्नातक स्तर की पढाई मैसूर यूनिवर्सिटी  से  और आर्ट्स में  मास्टर डिग्री सिडनी यूनिवर्सिटी से उत्तीर्ण  किया.

अखिलेश यादव ने  वर्ष 2000 में   कन्नौज संसदीय क्षेत्र से मध्यावधि चुनाव जीत कर पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया. तब से अब तक वे तीन बार लोक सभा के सदस्य चुने जा चुके हैं. वर्ष 2009 में अखिलेश जी ने कन्नौज और फिरोजाबाद दो संसदीय क्षेत्रो से जीत हासिल किया  परन्तु बाद मेंफिरोजाबाद  सीट से त्यागपत्र दे दिया और  कन्नौज लोकसभा सीट को कायम रखा.

अखिलेश जी  उत्साहित ,तेजस्वी और सही सोच-वाले युवा नेता हैं. उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन को दूर करके  विकास के उच्च शिखर पर ले जाने की उनकी  तीव्र  इच्छा भी  हैं. धार्मिक एवं जातिगत भावनाओं  से दूर रहकर वे सभी युवक-युवातियों को उन्नति के शिखर पर ले जाना चाहते है. उन्हें भली-भाँति मालुम है  कि  यह शुभ कार्य समाज के हर वर्ग को समान दृष्टि से देखते हुए तथा  न्याय के मार्ग पर  चलकर ही संभव है. मुख्यमंत्री   प्रदेश के  सभी नागरिकों का नेता होता है न कि किसी वर्ग विशेष का.  अतः उनके इस महान कार्य  को  सफल  बनने के लिए समाज के हर वर्ग से सहयोग की आवश्यकता है.