Thursday, 21 February 2019

मालवा की खास लोकगीत शैलीहुण

मालवा भारत का हिरदा का माया बस्यो हे। उकी खास लोकगीत शैलीहुण के ओलखने-परखणे का पेलाँ हमारे एका आड़े-छोड़े का वातावरण के पेचाणनों घणो अच्छो रेगा।
मालवा का आड़े-छोड़े को वातावरण घणो अच्छो, धनी आने तरे-तरे को हे। भारत की धरऊ आड़ी से दखणऊ आने उगणु आड़ी से आथणु तक की आणे जाने की बातहुण को चौरायो मालवा की जुन्नी राजधानी उज्जण हे। इणी बात की मालम नरा जुग हुण का सिक्का पे उज्जण निसाण दिखणे से पड़ती अइरी हे। धन (+) जेसा बण्यो इणा निसाण चारीमेर से आणे वाली जात्राबाट का रुप में इणी जगा के बतई है। आज को मालवो आखा अथणऊ मध्यप्रदेश आने एका साँतेज उगणऊ राजेस्थान का डाक जिलाहुण तक फेल्यो हे। ईका बारा में दुहो सुणने में आयो हे।
इत चम्बल उत बेतवा मालव सीम सुजान।
दक्षिण दिसि हे नर्मदा, यह पुरी पहचान।।
एका बले यो केणो फाँकणो नी हे के  मालवा की संस्कृति को रंग धनकताण जसो हे ने साहित्य से भर्यो-पुर्यो भी हे। मालवो कलाहुण को घर हे। एमे लोकगायन-लोकनृत्य-लोकनाट्य-लोकचित्र-तेवार मेला-ठेला, की पेलाँ सेज परथा चली अईरी हे। जदे हम लोक शैलीहुण की बात कराँ तो हमारा मन में लोक सबद जाणनें की हरस आये हे। लोक सबद को अरथ हे चल्यो अरइ्यो या फेर जीवन को हिस्सो। 'भारती नजर मेंÓ 'लोकÓ महज अथणऊ आड़ी से आयो सबद 'फोकÓ को दूसरो नी हे। फोक का माय अथणऊ ज्ञानी ध्यानीहुण उणा लोगहुण की बोलने (गाने) की परथा ने राखे हे जिवाकी लिखी हुई परना हेज कोनी/ फेर भारत में लोकपरथा की बड़ी हुई सभ्यताहुण की जसी भूली जईरी, घणी जुन्नी या पुरानी भी नी हे। उतो जवीन को हिस्सो है। मालवा की लोक शैली लोकहुण के गाणे की नरी शैलीहुण पेलासेज चली आईरी हे। तीज-तेवार, पूजा-पाठ-अनुष्ठान-रितु-आने संस्कार से जुड्या लोकगीत गाणे की परम्परा या परथा सगलीज जगे मले हे। आदमीहुण आने बैराहुण दोई सेज जुड़ी   गाणे की शैली हुण जागे जाग पाय हे। आबे यां बस मालवा ठाम की गाणे की शैलीहुण की बात करनो घणो अच्छो रेगा
मालवी लोकगीत- मालवा में पुसंवन, जनम, मुंडन, जणेऊ, सगई-ब्याव का टेम पे पेलां से चल्या अइर्या लोकगीत गाणे का नेम हे। तीज-तेवार रितु, किरावर से, जुड्या, गीतहुण गाणे का रिवाज मालवा में हे। मालवी लोकगायन में एकतरे से बोली के रस के गेले-गेल वा को प्रकृति धरती आने संस्कृति की उन्नति अच्छी लागे हे। लाड़ा-लाड़ी के नव्हाण्ने का बाद ग्राम की बैराहुण जसी के काकी-भाभी, भुआ-मासी, हुण लाड़ा-लाड़ी का मुण्डा में पतासा दई के गीतहुण गाय है। एक एसोज गीत देखो-
म्हारा नाना सो लाड़ो कोल्या जीमे रे
ओकी काकी भाभी आड़े छेड़े ढुकी रई रे
एक पतासा का दोई चार बटका दोई चार बटका
लाड़ा सी काकी भाभी करे दूणा लटका। योज गीत लाड़ी बेले भी गाय है।
भरथरी गायन- मालवा का माय नाथपंथ से जुड्या लोगहुण चिंकारा (वाद्ययंत्र) की धून पे भरथरी कथा गाता रेहे। चिंकारो नायल की नट्टी, बस आने घोड़ा की पूंछ का बाल से बण्यो जुन्ना आने पेलासेज चल्यो अइर्यो बजाणे को समान है। चिंकारो घोड़ा की पूंछ का बाल से बण्या धनुष से बजे हे जेमे से रुँ-रुँ को मीठो-मीठो राग हिटे हे। राजा भरथरी राणी पिंगला से घणो हेत राखता था पिंगला के मरीजाणे का बाद में राजा भरथरी एकेज रट्टो लगाता र्या। यो गीत म्हने गॉम में एक जोगी बाबा से बालपणा में सुण्यों यो
हाय पिंगला हाय पिंगला
इणी बात पे स्माईल जोगी केणे लम्यो-
हाय! पिंगल!  हाय पिंगला! कई करेरे
पिंगला बणइदू नो लाख
म्हरी डिबिया सर की डिबिया नी मले जी।
फेर राजा भरथरी केणे लग्या- हाय! डिबीया, हाय! डिबिया कंई करे र डिबीया बणई दू नो लाख म्हारी पिगलां सरकी पिगलां नी मले जी।
स्माईल जोगी ने तो नो लाख पिंगला बणईदी या पण राजा भरथरी से एक डब्बी भी नी बणी
निरगुणिया भजनगायन - मालवा में निर्गुणी भजन गाणे की परथा भोत जुन्नी हे। इणा भजणहुण माय परमात्मा की आस्था की छाप रे हे जेमे काया का नास ने आत्मा के अमर होने की बात करी हे। निरगुणिया भजणहुण में इकतार या फेर तंबुरा ने मजीराहुण की धुन का गेल-गेल मालवा की लोकधुन ने मालवी बोली की मीठास दिखे हे। आज भी मालवा में नरी निरगुणिया भजनमंडली हे उणमें से श्री पेलादसिंग ठीपाण्या की मण्डली सबसे अच्छी बतई हे। इन्ने निरगुणिया भजन गाणे में खाली देस मेज नी परदेश में भी अपणी अलग पेचाण बणई। एक निरगुणिया भजन का चरण देखो-
थारा भर्या समंद माय हीरा मरजीवाल लावीया
थारा घटमाय ज्ञान का जंजीरा मालिक सुलझावीया
यो मन लोभी लालची रे यो मन कालूकीट कुबुद्धि की जाला चलावे
यो मन लोभी लालची रे यो मन कालूकीट भरम की जाल चलावे रे हाँ
संजागीत- दख्यो जाय तो संजागीत खास रुप से मालवा की मोट्यार छोरीहुण को पेला स चली अईरी गाणे की शैली हे इ गीतहुण में बजाणे की कोई समान नी रे। सीलेसराद में छोरीहुण संजा को तेवार मनाय हे। गोबर ने फूल-पत्ति हुण से संजा की तरे-तरे की मन में भाव जसी चित्रावण बणय हे, सांजे उनकी पूजा ने आरती करे ने संजा का गीत भी गाती जाया। रोज तरे-तरे की संजा बणाय ने अम्मास का दन की राते राज बणई हुई संजा बणाय हे ने उणा दन छोरीहुण गोयण संजा के मोज मनाती हुई गीत गई के बिदा कर हे। संजा एक गीत तेवार के एक संजा गीत दिखी र्यो हे-
एतल बेतला को तोर्यो बेतल की तलवार
प्रदीप बीरो भाग लगावे सोना बेन्या छींछे रे।
हीड़ गायन- मालवा में हीड़ गाणे की नेम खाली सावण मइनामेज हे। अँयड़ी बाग-बगीचा हुण में झूला पडय़ा हे गाम हुण में हीड़ गाणे सी होड़ पड़ी हे। हीड़ की खास रुप में तो अहीर हुण से जुड्यो गीत हे जेमे खेती संस्कृति के भीतर की परता हुण को भोत नाना सो बखान मिले हे। ग्यारस माता की कथा चालर माता की छोला बैला की कथा हुण के गणे को भी योज ओसर हे। हीड़ ने बड़ा आलाप भी ले हे। इणा तेवार पे पड़वा का दन भेंस का मर्या होया पड़ा-पाड़ी (बछड़ा) हुण की छाल सुखई के ओड़को (छोड़ो) बाणइ के ओसे गायहुण के छोड़ो खलाय भड़काय गाय जदे छोड़ा में माया से मारे उणी बखत गाँम का लोग-लुगाया छोरा-छोरीहुण के घणा मजा आया। चालर की हिड़ को एक उधारण तो देखा-
'हे हीड़ बरस दना में नापो आयो पामणो जी।
भाई रे जेकी कई हे रे मखार हे हे होय।।Ó
पर्व तेवार से जुड्या गीतहुण- होली पे फागण दिवाली पे जनमअठमी पे कृष्णलीला गीत नोमीनोड़ता में देवी गीत की परम्परा आखा मालवा में हे। भाभी-देवर में मजाक को एक गीत (फाग) -हाँरे देवर म्हारा
रे यो केशरिया रुमाल वालो रे देवर म्हारो रे
भम्मर्यो घड़य्दे देवर घर में थारो तारो रे।
बरसाती बारता : मालवा में बरसात में बारता गई-गई ने के हे इकाबेल इको नाम बरसाती बारता पडि़ग्यो। मालवा का गाँमहुण में घर में बैठी के बारता रात-रात भरलोग हुणे हे। इणी बारता की शैली चम्पूकाव्य जसी हे इने मालवी गद्य आने पद्य दोई की बड़ा ऊँचो स्थान है। बारहमासा गीत भी बरसात मेज गायो जाय है।
सार : सार बात तो या हे के मालवो साहित्य का हिसाब से घणोज घनी हे। यॉ का लोगहुण सो-सो साल से कथा बार्ता गाथा, गीत नाटक पारसी केवात असा नरा ठंग बात विचार आने समझता बुझाता अईर्या हे।  जिनगी को असो कई को भी टेम नी हे के जदे मालवा का लोग लुगाया हुण हॉसी खुशी सुख दुख के बताणे बले लोकसाहित्य का सामरो नपी ले हे। इणा सगलाज ढंग हुण में लोकगीत लोकगायन शैली हुण को अपनी एक बगतेज घणी हव जागा है।
एक खास बात- इणा लिख्या हाया बिचार में यो बात खास हे के म्हने जो गरंथ हुण के बाची ने एक सरमाण द्या के वी सब हिन्दी में था पण म्हने मालवी में करल्या हे म्हार माफ करजो! जे मालवी जीवे मालवी।
साभार रऊताही 2015

मालवा विवाह गीतों में प्रकृति वर्णन

प्रकृति अने पर्यावरण का बिना संस्कृति अने संस्कार की बात करनो असो लागे जाणे झाड़-झडूकल्या हुण के भूली ने फूल-फल अने पत्ता होण की बात करणो।लोक परम्परा, संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा बोली अने लोक-जीवन के समझवा सार वां की प्रकृति अने मोसम का मिजाज के समझणों जरुरी हे। इनी बात के जमाना भर में ठावी, अणी केवात से बी समझी सकां, 'जसो देस वसो भेसÓ जणी देस की जसी प्रकृति के हे वां की वसीज परम्परा, लोकभाषा, बोली, रेण-सेण, अने वेवार देखवा में आय हे। लोक में बिखरी थकी परम्परा हुण प्रकृति से अछूती नी रई सके, अने वा प्रकृति कणी ने कणी भायना ती हमारे पारम्परिक गीत में नगे आय हे। प्रकृति का माय रई ने ज् हम अपणी परम्परा हुण, संस्कार अने रीति-रिवाज हुण के निभावां हां। या यूँ कई सकां के हम अपणी परम्परा के निभावा सारु जो बी चीज (वस्तु) लेणो चावां वा वांकी प्रकृति हमारे दई सके। प्रकृति से लई न जद्-जद् बी हम परम्परा के निभावां हां तो वणी परम्परा से जुडया गीत में प्रकृति के आणो ते हे। उदाहरण का लेण-ब्वाय मे या कणी सुब काम में हमारे कोय चीज चई पड़े तो वी हे-केल का पत्ता, अम्बा की डाली, आम्बा की लकड़ी अने पत्ता, नारेल, अम्मरबेल, खेजड़ी, खांखरा की लाकड़ी, फूल-फल, पाणी, मिट्टी अने मंडप सजावा सारु बाँस आदि अणी चीज होण सारु हमारे प्रकृति में जाणो पड़े, प्रकृति के मनाणो पड़े अने प्रकृति मनावा मारु गीत गाणो पड़े।
लोक परम्परा में अने लोक जीवन में असा हजारों हजार गीत हे, जो नदी, तलाब, पनघट, समदर, झाड़-झडूकल्या, जिन-जिनावर, अने पहाड़ होण की वंदना, अर्चना में युगा-युगा ती मंत्र की तरे मनख्या गाता चल्या अईर्या हे।
मालवा में गाया जाणे वाला ब्वाय गीत हुण में प्रकृति को बखाण ब्वाय संस्कार की नी-नी करता सगली, रीत में नगे आय हे, चाये वे बधावा हो, परबात्या हो कामण हो, सातंगवरत, हल्दी-मेंदी, उकल्डी, मायमाता ती लगई ने गाल गीत तक भारतीय परम्परा अने संस्कृति में कोन सी बी सुभ काम होय विकी सरुआत गणपति पूजन से ज् होय हे। गणपति खुद माँ परवती अने शंकर भगवान का छोरा हे या यूं कई संका के खुद प्रकृति अने पुरुष/आकाश का छोरा हे। बईरा सब ती पेला ब्वाय में गणपति जी के आपणा गीत का भायने  पाती भेजे अने अरज करे-
तम तो वेगा वेगा आओ हो गणेश/तम बिन घड़ी नी सरे
तमने सूरज, मनावे, तमने चन्दरमा मनावे
तमने रामचन्दर मनावे हो गणेश....
मालवा में एक केवात हे 'चार कोस पे पाणी बदले बारा कोस पे वाणी।Ó पाणी को मायनो होय-प्रकृति अने वाणी याने बायरो (हवा) ई दोई नी होय तो अणी धरती पे जीवन बी नी वई सके। वाणी अने पाणी पेज् भौगोलिक, आर्थिक, राजनेतिक, सामाजिक, अने पारिवारिक बणवट, रेण-सेण, रीति-रिवाज, आचार-विचार अने खान-पान, तक को खाको ते होय तो फेर मनक अपणा गीत हुण में प्रकृति के कसे भूली सके? ब्याव संस्कार का माय कई तरे का छोटा-मोटा रिवाज निभाणा पड़े जो अपणी-अपणी जात-बिरादरी में थोड़ा भोत अलग वई सके पण खास-खास रीत के सब में एक जसीज रेवेकणी समाज में कोय सी बी परम्परा असी नी हे, जो बिना गीत के पुरी वई सके। जिस्तन बिना मत्रं के कोय बी वैदिक परम्परा पुरी नी वई सके, विस्तन बिना गीत के कोई बी लोकिक परम्परा पुरी नी वई सके। स्वराघात अणे सप्रंसारण से भर्या-पूर्या अणी गीत हुण में वेदिक संहितापाठ जसी एकरुपता देखवा में आय हे।
अणी परम्परागत श्रुतिगीत हुण में जो कि लोकमन की भावना से जनम लई अने शिव रुप आकाश में सतत् प्रवाहमान वई ने नद्दी की तरे बईर्या याने (अर्थात्) गाया जईर्या हे, वी प्रकृति का बखान के अछूता किस तन रई सके? ब्याव गीत की सुरुआत में गणपति गावा का बाद सबती पेली रीत हे, खानागार-खरमाटी, लावा की अणे कुम्हार का चाक के बदावा की। अपणी मिट्टी से लगाव, जुड़ाव, अणे सृष्टि का प्रतीक रुप में चाक को पूजणो एक तरे ती सम्पूर्ण सृष्टि को पूजन मान्यो जाय हे। चाक बदाती बखत बईरा हुण जो गीत गावे विन में प्रकृति का जो खास रुपक हे उनके लेवा की कोसिस करी हे।-
भवंरा, पेलो बदावो म्हारे आवीयो
भवंरा मोकल्यो म्हारो ससुराजी री पोल
वाड़ी रा भवंरा दाख मीठी ने रस सेवर्यो।
ब्याव को पेलोज बदावो प्रकृति में बसंत ऋतु की अगवानी को संदशो देतो प्रतीत होय हे। छ: ऋतु में खास अने जिके सगली ऋतु होण को राजो मान्यो जाय वणी  ऋतु से ज् ब्याव गीत हुण की सुरुआत अने लगनसरा हुण की सुरुआत, अणी संस्कार को प्रकृति से कितरो जुड़ाव हे, यो बतलाय हे। बसंत ऋतु की अगवानी को प्रतीक भवंरा अने फूल ती अणी बदावा की सरुआत ब्याव संस्कार का भायने मनख जिन्दगी की गृहस्थ जीवन में जावा की (प्रवेश) सुचना देणो हे। अणी सुन्दर बाड़ी (बगीचा) रुपी गृहस्थ आश्रम में बसंतरुप रुपी ब्याव संस्कार का भायने छोरा-छोरी, कली-भंवरा का रुप में लाड़ा-लाड़ी बणी ने अपणो पेलो पांव आगे धरे तो अणी ती अच्छो गीत कंई वई सके 'दाख मीठी अने रस सेवर्योÓ प्रेम का अणी मीठा सा बंधन का गठजोड़ में बंधी प्रेम रुपी दाख को मीठो रस चारी मोर बिखेर्यो जाय हे। अतरो चोखो प्रकृति परक भाव, मधुर लोकधुन अणे अतरी सरल भाषा शैली के बस... गाया जावा अणे सुण्या जाव, देख्यो जाय तो ब्याव की सगली रीति, परम्परागत प्रकृति ती जुड़ी थकी हे। ब्याव में अपणा कुल का देवी-देवता को बी पूजन होय, कलश स्थापना होय, जवारा थेपाय अणे गीत गाया जाय वणी की एक बानगी-
रमा-झमा हो करती वरद आई, आय आँगणे पग दियो
सुता के जागो राज सूरज जी, तम घर वरद उतावली
सुता के जागो राज चंदरमाजी तम घर वरद उतावली।।
अणी तरे ती बईरा हुण अधिकतर गीत हुण में सूरज अणे चंदरमा के मनाय हे, बिना चंदरमा अणे सूरज के प्रकृति का बारा मे सोचणो बी बेकार हे। गीत हुण का भायने प्रकृति में रच्या-बस्या मनख हुण अपणी भावना के अणी वरत-तेवार अने परम्परा हुण में पुरी आस्था, अणे श्रद्धा की सांते उकेरवा की कोसिस करे हे। ब्याव जसा आयोजन में तो घणों ती घणों बखान प्रकृति को वयो हे। भारतीय संस्कृति में ब्याव संस्कार की सरुवातज् बसंत ऋतु से होय जो प्रकृति में बदलाव की बखत (समय) हे। या ऋतु ब्याव संस्कार में परणवा वाला लाड़ा-लाड़ी बण्या जुवान छोरा-छोरी हुण के यो संदेश देवे हे के अबे अणी मनख जिन्दगी में नरा-नरा बदलाव आणा हे जो अणी जिन्दगी की दशा अणे दिशा ते करेगा।
यो बदलाव अणे यो संस्कार खाली लोक जीवन मेज निभायो जाय असो नी हे बल्कि बसंत ऋतु में प्रकृति बी इनी बदलाव अणे संस्कार में पुरी तरे ती लीन रे हे असो लागे। म्हने अपणी मालवी लोकभाषा में लिखी थकी खण्डकाव्य कृति 'आँबा को ब्याव में अणी बात के पुरी तरे ती मेहसुस करी हे। बसंत पंचमी तो लोक जीवन में लाड़ा के मोड़ बंधे, लाड़ी के मेंदी लगे अणे सगला घराती अणे बराती सजी धजी ने तैयार हुई जाय। असोज प्रकृति में आबां (आम) का झाड़ में मोड़ बंधी जाय (फुल आना)Ó आमली (इमली) का झाड़ में लग्या फल में मेंदी को रंग उतरवा लागी जाये अने सगला झाड़-झड़ूकल्या, फूल-फल ती सजी-धजी ने महकवा लगी जाये। म्हने अपनी पोथी 'आँबा को ब्यावÓ में आम्बा के लाड़ो अणे आमली के लाड़ी बणई ने मालवा का सवा सो झाड़-झंकार के घराती अणे बराती बणई के अणी में प्रस्तुत कर्या हे। म्हारो केवा को मतलब यो हे के हमारा कोई बी रीति-रिवाज प्रकृति से अछूता नी हे। लोक परम्परा में ब्याव की जितरी खूबी अणे रीति-रिवाज वई सके वी सगली रीति म्हने प्रकृति में ढूंढवा की कोसिस करी हे। खेर यो एक अलग विषय हे, फेर भी म्हारा हिसाब ती अणे ब्याव संस्कार को जीतरो गेरो संबंध प्रकृति ती हे, अतरो कणी ओर संस्कार अणे रीत को नी वई सके।
लगन, बदावा, गणेश, खानागार-खरमाटी लावा अणे चाक बदावा की सांते-सांते ब्याव में जो पेली रीत हे, वा हे उकल्ड़ी। उकल्ड़ी पूजवा को मतलब प्रकृति अणे पर्यावरण के बचावा को संकल्प लेणो होय हे। अपणा घर की रोज साफ-सफाई करी ने गांव ती बायर उन कचरा के इकट्ठो कर्यो जाय हे, उन कचरा का ढेर के उकल्डो केवे हे। मनख जिनगी में अणी छोटी-छोटी बात हुण को ध्यान रखणा अणे अपणा से छोटा  मनख के बी वितरोज सम्मान देणो यो अणी रीत को खास संदेश हे। प्रकृति अणे पर्यावरण का प्रति समर्पित अणी रीति को गीत बी सबके जगावा  को काम करे हे। बईरा हुण अपणी शैली में सबको नाम लई-लई ने केवे के फलां-फलां जागी ग्या हे, तम बी जागो-ई तो इन्द्रासन से सूरज जी जागीया/ई तो तारा हुण में चन्दरमा जी जागीया। ई तो जाग्या-जाग्या चारु ई देव/ के कजली बन (वन) रो कुंकडो (मुर्गा)
लोक जीवन अणे प्रकृति से जुडय़ा हजारों गीत अणी संस्कृति से जुडय़ा हे। जरोत हे तो इनके समेटवा की। हल्दी, मेंदी, आम्बो, अमरबेल, अशोक, चम्पा, चमेली, गुलाब, गेंदा, बांस, खेजड़ी, खाखरा, कपास, पान, सुपारी, केल, अने, खजुर, जसा नरा-नरा झाड़ हुण को अणी ब्याव संस्कार में वपराव होणो कंई ने कंई हमारे प्रकृति से जोड़े हे। इन सबका न्यारा-न्यारा सैकड़ों गीत हे। नरी-नरी रीत तो खाली प्रकृति से ज् जुड़ी हे। ब्याव में सवेरा-सवेरी उठी के घट्टी-फेरती लुगायां द्वारा गाया जाये उणके परबात्या केवे। परबात्या में सबेरा-सबेरी की जो लोक लुभावणी झांकी अपणा गीत में बईरा हुण प्रस्तुत करे वी की कंई केणी। तम बी सुणो-
म्हारा बालाजी वायण जागो, परभात्यो तारो उगीयो।
तारो उगो माताबई री कूंख, जणे सूरज जी सरका जनमिया
तारो उगो माताबाई री कूंख, जणे चंद्ररमा जी सरका जनमिया
अणी तरे दूसरा परबत्या की बानगी रखणो चऊँ-
अणी लिम्बड़ली रा लांबा-लांबा पान
छलंग्या पे सूरज उगीयो!
अणी तरे घणा-घणा गीत हुंण में प्रकृति को घेणो चोखो अने जस को तस बखाण अणी ब्याव गीत हूण में कर्यो हे। चंवरी फेरा, सातंग-वरत, बान-मामेरा, सिचावणी, परबात्या, बधावा, कामण अने गाल गीत में प्रकृति को बखाण हुओ हे ओर तो ओर बनड़ा-बनड़ी का ज्यादा तर गीत हुण में 'हरियाली बनड़ीÓ अणे 'हरियाला बनड़ाÓ सबद को आणो हमारे कंई ने कंई प्रकृति ती जोड़े हे। लोकगीत हुण हमारो इतिहास हे, वर्तमान हे अणे भविष्य बी हे। एक असी पगडंडी हे जिके बणावा वालो कोय एक मनख नी हे, बल्कि आखी की आंखी संस्कृति अणे आखो समाज हे जो युगां-युगां ती उणी गीत परम्परा के वेद पुराण की तेरे संजोतो चल्यो अईर्यो हे। प्रकृति अणे लोक में रच्या-बस्या अणी गीत हुण में हमारी परंपरा हमारी प्रकृति अणे हमारी सभ्यताज् नी हे बल्कि हमारी श्रद्धा अणे आस्था मूल भावना भी अणे में ज् समई थकी हे।
साभार रऊताही 2015

विवाह संस्कार और बन्ना-बन्नी के गीत

मानव की मूल प्रवृत्ति ही उत्सवधर्र्मी है. पाषाणयुग से बात शुरु करें, वह अपने समूह में आखेट के लिए निकलता था और किसी पशु को अपना शिकार बनाने के बाद उसके इर्द-गिर्द झूम-झम कर नाचता-गाता-खुशी मनाता था. $फुर्सद के समय में वह कन्दराओं में इसके चित्र भी उकेरता था. क्रमश: वह सभ्य होता गया. उसकी उत्सवधर्मिता परवान चढऩे लगी. उसने जाना कि छह ऋतुएं होती है। उसमें शरद ऋतु के आगमन के ठीक पहले वर्षा का अवसान हो रहा है. वर्षा ऋतु में जैसे ही पहली बौझार पडती है,पृथ्वी के अंग-अंग में नवजीवन लहलहा उठता है. धरती पर सब तरफ  हरियाली का गलीचा बिछ जाता है. मोर के पावों में थिरकन आ जाती है. पपिहा पी..आ...पी..आ गाने लग जाता है. नदियां तरुणाई से भर उठती हंै.. बरसते पानी की रसधार में भींगते हुए उसने हल चलाते हुए गीत गाए. खेतों में लहलाती $फसलें और अपने श्रमसा$फ्ल्य को अनाज के रुप में $फलता-$फूलता देख वह प्रसन्नता से भर उठता है और कटाई के बाद पूरा परिवार ढोलक की थाप पर थिरक उठता है. इस तरह उसने अपने आप को ईश्वर की लीलाओं से  पर्वों-त्योहारों को जोडते हुए अपनी उत्सवधर्मिता को नए-नए आयाम दिए. दस कोस पर पानी और बीस कोस पर वाणी के बावजूद भारतीय समाज ने सांस्कृतिकता को विशिष्ट स्थान दिलाया. लोक-अंचल में ही संस्कृति की असली विरासत सुरक्षित है. यद्दपि अधुनिकता ने का$फी हद तक सांस्कृतिकता को प्रभावित किया है, इसके बाद भी हमारे लोक क्षेत्रों से जुड़े लोग, ग्रामीण समुदाय संस्कृति के सजक-प्रहरी के रुप में  नजर आते हैं. संस्कृति का यह कार्य लोक-अंचल में आसानी से ²ष्टिगत होता है. चाहे वह छत्तीसगढ़ हो, असम हो, या फिर, त्रिपुरा, कुंमायू ,पूर्वांचल, बुंदेलखंड आदि कोई भी हो, कोई भी राज्य हो, सभी जगहों पर सांस्कृतिक विशिष्टता को संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. बुंदेलखण्ड क्षेत्र हमेशा से ही लोक के प्रति सचेत रहा है.शौर्य गाथाओं, लोक-गाथाओं या $िफर लोक-देवताओं के सहारे उसने अपनी संस्कृति को जीवित रखा है. पर्वों-त्योहारों, उत्सवों के साथ-साथ वैवाहिक कार्यक्रमों का उत्साह भी यहां देखने को मिलता है. यह एक ऐसा संस्कार है जहाँ अनेक प्रकार के रस्मों के साथ सम्पन्न किया जाता है. लडका-लडकी की बात पक्की हो जाने के बाद लगुन लिखाई, तिलक, मगरमाटी, मंडपाच्छादन, देवपूजन, तेलपूजन, चीकट ,बारात निकासी, द्वारचार, पांव पखराई, कुंवर कलेवा, भांवर, कन्यादान, बिदाई,, मुँह दिखाई,,आदि-आदि. अनेकानेक रस्मों के यह संस्कार पूरा होता है.
इन रस्मों को संपन्न करते समय घर की महिलाएं बन्ना-बन्नी के गीत गाती हैं. इनकी स्वर-लहरी सुनकर सभी लोग आनन्दित हो उठते हैं. हम यहाँ पर कुछ रस्मों पर गाए जाने वाले गीतों पर चर्चा करते चलें. यथा-
 लगुन लिखाई जा चुकी है. मगरमाटी भी लाई जा चुकी है और लडकी जिसे अब बन्नी के रुप में जाना जाता है, हल्दी चढाई जा रही है. इस अवसर पर घर तथा पास-पडौस की महिलाएँ सामुहिक रुप से बन्नी को आधार बनाकर गीत गाती हैं.जिसके बोल सीधे हृदय को पिघला देने वाले होते हैं. यथा-
बाबुल उडन चिरैया, तुमने काहे पोसे
वो तो उड चली देस-बिदेस
अम्मा की कोयल उड चली
 (२) दिहरी बिरानी बाबुल बिटिया बिरानी
बिटिया की इक जनमी पाती रे
मोरे बाबुल बिटिया बिरानी
वधु के यहाँ लगुन-लिखाई होती है,जिसका विधिवत पूजन किया जाता है. पूजा के बाद लगुन के साथ नेग के रुप में कुछ रुपये भी रखे जाते हैं. $िफर घर के कुछ सदस्य जिसमें वधू का भाई, मुहल्ले-पडौस के कुछ युवा तुर्कों के साथ लगुन वर के घर पहुंचाई जाती है. लगुन के वहां पहुंच जाने के बाद उसको किसी पंडित से पूजा करवाने के बाद पढ़ा जाता है. इसके करने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि वर-पक्ष को इस बात की जानकारी से अवगत करवाना होता है कि फला दिन आपको बारात लेकर आना होगा. लगुन के आने पर स्त्रियां इस गीत को गाती हैं
लगुन आने पर
रघुननदन फूले ना समाये, लगुन आई अरे...अरे
लगुन आई मोरे अंगना
रंग बरसत है, रस बरसत है
मोरे बन्ना की लगुन चढत है
कानों में कुण्डल पहनो राजा बनड़े?
गले मुतियन की माल बिरसत है
मोरे बन्ना की लगुन चढ़त है
आज मोरे रामजू की लगुन चढत है.
वर पक्ष के यहाँ भी वे सारी रस्में संपन्न होती है, जो वधु के यहाँ की जा रही होती है. इधर वर पक्ष में बन्ना को मण्ढे के नीचे खांब के पास बिठाया जाता है और फिर तेल चढ़ावे की रस्म शुरु की जाती है. महिलाएं सामुहिक रुप से गाती हैं. यथा-
तेल मायना
आज मोरे बन्ना(बन्नी) को तेल चढत है
तो तेल चढ़त है फुले चढ़त है
चढ गओ तेल $फूल की पाँखुरिया
जीजी चढ़ावे तेल ,बन्ना की बाहुलिया
भौजी चढ़ावे $फूल की पाँखुरिया
तेलन लाई तेल, मालन लाई पाँखुरिया
(२)   
चढ गओ तेल फुले चंपो तेरी दोई कलिया कौन बाई तेल चढ़ावे, कौन राय की बेन्दुलिया (बहन का नाम)बाई तेल चढ़ाये (भाई का नाम) राय की बेन्दुलिया
विवाह के अवसर पर गौरी-गणेश के आव्हान पूजन के पश्चात पितरों को एवं प्रकृति प्रदत्त भौतिक वस्तुओं का भी आव्हान किया जाता है. इस अवसर पर बन्ना या बन्नी की माता एवं चाची चक्की पर गेहूँ पीसती जाती है एवं एक-एक पितरों का नाम लेती जाती है. साथ ही बन्ना या बन्नी नाम के साथ ही चक्की पर चांवल के दाने निमंत्रण स्वरुप $फेंकते जाते हैं. इस अवसर पर कुटुंब के सभी सदस्य उपस्थित रहते हैं. इस अवसर पर गाए जाने वाला गीत-यथा
काज करो कजमन करो, आज को नेवतो पाइयो
(पितर का नाम) बाबा नेवतियो
आज को नेवतो पाइयो ( एक-एक व्यक्ति के नाम का उच्चारण करते हुए इसे दोहराया जाता है)
(पितरों को नेवतने के बाद आग-पानी, बदरा-पानी, लठ्ठा-भोंगा, हवा-आँधी सबको नेवतने के बाद बन्ना के हाथों से गोबर के द्वारा चक्की का मुँह बंद कर दिया जाता है ताकि मंगल कार्य में कोई विघ्न न आने पावे.
इसके बाद बारात निकासी होती है. सभी आमंत्रित सदस्यों-रिश्तेदारों तथा परिवार और कुटुंब के सन्मानित सदस्यों को साथ लेकर बारात घर से निकलती है. इस बीच कई प्रकार की रस्में होती है.
 माँ अपने बेटा की नजर उतारती है. नारियल की गिरि तथा गुड़ से मुँह मीठा कराती है. अपना दूध पिलाकर बेटे से वचन लेना नहीं भूलती कि शादी के बाद उसकी अच्छे से देखरेख करेगा. इस अवसर पर महिलाएं गीत गाती हैं.यथा-
(दुल्हा की निकासी पर गाए जाने वाला गीत)
मझोल- मझोल चलो जइयो रे हजारी दुल्हा
तुने को के भरोसे घर छोड़े रे हजारी दुल्हा
मैंने मइया के भरोसे घर छोड़ों रे हजारी बन्ना
तेरी मैया को नइया पतियारों रे हजारी दुल्हा
तू तो ताला लगाये कुँजी ले जैयो रे हजारी दुल्हा
(२)
बन्ना के आँगन गेंदा फूल, कुसुम रंग फीका पड़ गओ रे
बन्ना पापा(दादा-चाचा-मामा-फूफा भैया,जीजा)
सजे बरात, सजन घर खलबल मच गई रे
सजन घर खलबल मच गई रे
बन्ना के आगे तबल निशान, पतुरिया छम-छम नाचे रे
पतुरिया छम-छम नाचे रे
रुपइया खन-खन बाजे रे
(३)
ऐसो सजीलो मेरो बन्ना रे, शोभा सजी सीस चांदनी बनके
कोई तो नजर उतारो, ऐसो सजीलो मेरो बन्ना रे
सीस बन्ना के सेहरा, सोहे कलगी पे जाऊँ बलिहारी रे
दिल मे कब से था अरमान, बन्ना मेरा दूल्हा बने
चन्दन के मण्डवा रुच रुच के लाओ रे.....बन्ना मेरा
वधु के यहाँ बारात पहुँच चुकी है. बारात की अगवानी की जाती है. सजन-समधियों की भेंट होती है.इस अवसर भी गीत गाए जाते हैं.
ठाड़े-ठाड़े जनक जी के द्वार हो
रामचन्द्र दुल्हा बने
मंगल साज सजे अंगना में
कम्मर में सोहे कटार हो...रामचन्द्र.....
मुतियन चौक सुनयना पूरे
मन में हरष अपार हो.......रामचन्द्र......
बंदी बिरुदावली उच्चारे
हो रही जय जयकार.......  रामचन्द्र.....
चन्दन पीढा विराजो राजा बनड़े
पहरो नौ लख हार हो...रामचन्द्र.....
महिलाएँ गारी गाती हैं इस अवसार पर
आए मोरे सजना,सुहानो लागे अंगना
सजना के लाने मैंने पुडिया पकाई
आवे री खावे सजना(समधी)
पीछे री खावे बलमा...आए मोरे सजना...
पाँव पखराई के समय का गीत
बिच गंगा बिच जमना,तीरथ बड़े हैं प्रयाग
बिच बिच बैठे बाबुल उनके, लेत कुमारन दान
दैयो रुप-रुपैया, छिनरिया को खनकत जाये
दैयो उजरी सी गैया, छिनरिया को खोवा खाये
चढाव चढाई के अवसर पर गीत
सिया सुकुमारी को चढ रौव चढाव, हरे मंडप के नीचे
बेटी मैके की बेंदी उतार धरो
ससुरे की बेंदी को कर लेव सिंगार, हरे मंडप के नीचे
सिया सुकुमारी को चढ रओ चढाव, हरे मंडप के नीचेह्व
चढाव के बाद भावरें पडती है. इसके बाद जेवनार होता है. जेवनार के अवसर पर गाए जाने वाला गारी गीत. इसमे समधी-समधन को ताना मारा जाता है.
बन में बघनी बियानी, सुनो भौंरा रे
ओको दूध दुहा लई, सुनो भौंरा रे
समधी नेवत बुला लई,सुनो भौंरा रे
ओकी खीर बना लई,सुनो भौंरा रे
उनने आतर चाटे,पातर चाटे,ले ले दोना नाचे
जेवनार के बाद दुल्हा दुल्हन को लेहकोर के लिए लेकर जाते हैं. इस अवसर पर महिलाएं समधी को ताना मारते हुए गाती हैं क्योंकि समधी की ओर से पान-बताशे बंटवाने का रिवाज है.
पानो की बिडिया कलेजे में लग गई
कलेजे में लग गई, मेरे हियरे में लग गई
डलिया में तेरी समधन पान भी नइया
तो समधी को जियरा ठिकाने में नइया
बिदाई के अवसर पर गाए जाने वाला गीत
इस समय बिटिया को आशीष दिया जाता है
जाओ ललि तुम फलियो फुलियो
 सदा सुहागन रैयो मोरे लाल
 सास ससुर की सेवा करिओ
 पति आज्ञा में रहियो.
( बिदाई के बाद बेटी का अपने ससुराल आना, वहाँ पर भी अनेकानेक रस्में करवाई जाती है. )
लोकगीतों की महत्ता लोक जीवन में हमेशा बनी रही है. विवाह संस्कार में गाए जाने वाले गीतों में संदेश सम्प्रेषित होते हैं. लोकगीतों द्वारा विवाह संस्कार की गरीमा बढ जाती है. लोकगीतों के मध्यम से हमारी लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा, विरासत पल्लवित,पोषित और संरक्षित होती रहेगी. ऐसा विश्वास है.
नोट;- विवाह संस्कार में अनेक स्थानों पर छोटे-छोटे रस्मों को निभाए जाने का वर्णन मिलता है. उसे विस्तारित न करते हुए कम से कम शब्दों में पूरा किया गया है.ताकि आलेख बोझिल न होने पाए. साभार रऊताही 2015

छत्तीसगढ़ मा गीत परम्परा

गीत के जनम कोनो अज्ञात कवि के  मुंह ले लोक जीवन मा होय हे। इही कारण ए कि लोक गीत लोकजीवन के श्रृंगार नोहे बल्कि वोकर आत्मा आय।  ए लोक गीत हमर खेतिहर समाज के जीवन पद्धति अऊ संस्कृति के दरपन आय। बरसो ले प्रचलित लोकगीत वाचिक परम्परा के अइसे बहाव आय जमा वोकर अन्तर्मन के व्यथा कथा छलकथे।
लोकगीत अपन संस्कृति के मुंह बोलत चित्र आय। लोक के भाऊक अउ निरमल मन जनम ले मरन तक लोक गीत मन के सहारा खोजथे। जनम के मरन तक ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ मा तो नारी मन के महतारी बने के साध पूरी होय के खुसी मा अम्मल मा सात महीना के रथे तभे सधौरी गीत गाए के परम्परा  हे- महल मा खड़े बालम, अपन रानी ला मधु पीपर पीये बर मनावत हे-
महला मा ठाढि़ बलम जी, अपन रनिया मनावत हो
रानी पीलो मधुर पीपर, होरिल बर दूध आहै हो-
रानी कथे-
करु कसैल पीपर ला कइसे पीयवं ? मोर दांत तो कपूर कस उज्जवल हे-
कइसे के पियऊँ करुरायर, अउ झर कायर हो
कपूर बरन मोर दाँत पीपर कइसे पियब हो-
बालम कथे-
मधुर पीपर नी पीबे ते मैं दूसर बिहाव
कर लुहूं। पीपर के झार पहर भर रथे, अउ मधु के झार हा दुपहर फेर सउत के झार हर जनम भर रही
मधुर पीपर नइ पीबे
त कर लेहूं दूसर बिहाव
पीपर के झार पहर  भर
मधु के दुई पहर हो
सउती के झार जनम भर
सेजरी बंटोतिन हो...
सउत के झार जनम भर ला सुन के रानी कटोरा ला उठाके मधु पीपर पी लेथे
कंचर कटोरा उठावव
पीलेहूं मधु पीपर हो...
छट्ठी सांवर अउ सोहर
लइका जनम के छै दिन मां छट्ठी होथे। परिवार अउ कुटुम्ब के मनखे मन इही दिन 'सांवरÓ बनाथे। छट्ठी के दिन जच्चा अउ बच्चा ला नहवा खोरा के पवित्र करथे लइका जनम के खुशी मा संझा कना रामायण के पवित्र कार्यक्रम होथे जेमा लइका के नाम धरे के संगे संग सोहर गीत घलो गाए के परम्परा है-
पहिली गनेस पद गावौं मैं चरन मनावौं
हो ललना बिघन हरन जन नायक हो
ललना सोहर पद गावौं हो...
लोरी गीत
लइका हा जब पदोथे नी ते पेट सेंके के बखत रोथे ता एदे गीत ला गावत गावत भुलवारथे-
तरी नरी नाना रे बेटा
तरी नरी नाना गा
तरी नरी नाना रे बेटा
तरी नरी नाना ये गा
सुति जबे सुति जबे बेटा
सुति जबे सुति जबे गा
सुति जबे सुति जबे बेटा
सुति जबे सुति जबे गा
लोक खेल गीत
छत्तीसगढ़ मा लगभग एक सौ पचास से जादा लोक खेले जाथे। चन्द्रमोहन चकोर हा अपन किताब 'छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक खेलÓ मा लोक खेल मन के संकलन करे हे। गीत प्रधान लोक खेल मा अजला, बजला, चुनचुन मलिया, अटकन, बटकन, गोल गोल रानी, घान्दी मुन्दी घोर दे, पोसम पा, खुड़वा नख्खी, कोबी, चिकि-चिकि बाम्बे, फुगड़ी, डांडी पौहा, इल्लर-डिल्लर, जांवर-जीयर, दार भात, झूलना, अउ भौरा आंथ। कुछ लोक खेल गीत मन के बानगी प्रस्तुत हे-
अटकन भटकन खेल गीत
अटकन भटकन के शुरुआत एदे गीत ले होथे...
अटकन-भटकन, दही चटाकन,
लउआ लाटा बन मा कांटा
चिहुरी-चिहुरी पानी गिरे, सावन मा करेला फूले
चल-चल बेटी गंगा जाबो न
गंगा ले गोदावरी जाबोन
बेल के डारा टूटगे
भरे कटोरा फूटगे
खुडुवा खेल गीत
खुडुवा शब्द छत्तीसगढ़ मा लोक प्रिय है। दुसर जघा खुड़ुवा ला कबड्डी के नाव ले जाने जाथे
वर्तमान समे मा खुडुवा ला अन्तरराष्ट्रीय चिन्हारी मिलगे हे। खुडुवा मा खुडवाये बर खु डु डु डु के संगे सगे एके हास्य गीत घलो प्रचलन मा हे...
खुमरी के आल-पाल-खाले बेटा बीरा पान
मैं चलवंव गोंटी, तोर दाई पोवय रोटी
मै मारंव मुटका, तोर ददा करे कुटका।
आमा लगे अमली, बगईचा लागे झोर
उतरत बेंदरा, खोंधरा ला टोर
राहेर के तीन पान, देखे जाही दिन मान
तुआ के तूत के, झपट भूर के
बिच्छी के रेंगना, बूक बाय टेंगना
तुआ लगे कुकरी, बहरा ला झोर
उतरा बेंदरा, खोंधरा ला टोर
चल कबड्डी ताले ताल, मोर मेछा लाले लाल।
फुगड़ी खेल गीत
फुगड़ी हा छत्तीसगढ़ मा नोनी मन के मनभावन खेल आय। नोनी मन फुगड़ी खेले के शुरुआत एदे गीत ले होथे
गोबर दे बछरु गोबर दे
चारो खूंट ला लीपन दे
चारो देरानी ला बइठन दे
अपन खाये गुदा-गुदा
हमला देथे बीजा
ये बीजा ला काय करबो
रहि जाबो तीजा
तीजा के बिहान दिन घरी-घरी लुगरा
चींव-चींव करे मंजूर के पिला
हेर दे भउजी कपाट के खीला
एक गोड़ मा लाल भाजी
एक गोड़ मा कपूर
कतेक लाल मानंव मैं
देवर ससुर
फुगड़ी रे फूं-फूं...
फुगड़ी रे फूं...
भौंरा ले जुड़े खेल गीत
भौंरा पुरुष प्रधान खेल आय। छत्तीसगढ़ मा भौंरा के तीन रुप चांदा, नौगोदिया अउ रट्ठ प्रचलित है। भौंरा गीत वोमा निकलइया ध्वनि ऊपर केन्द्रित है जइसे-
लॉवर मा लोर-लोर, तिखुर मा झोर-झोर
राय झुम-झुम बाँस पान, हंसा करेला पान
सुपली मा बेलपान
लट्ठर जा रे भौंरा
भुन्नर जा रहे...
बिहाव गीत
वंश परम्परा ला बढ़ाये बर पुरुष अउ माई लोगन के एक दूसर के संबंध ला पति अऊ पत्नी के रुप मा सामाजिक मान्यता मिले हे। बिहाव दु तन के मिलन के संगे संग दु आत्मा के मिलन आय। दुनो आत्मा ला मिलाए बर बिहाव संस्कार होथे, बिहाव संस्कार के अंतर्गत मंगनी, लगिन, सिकसा, मड़वा, चुलमाटी, मड़वा पूजा, मंडपाच्छादन, देवतला,  चिकट, लाईलावा, हरदाही, माय-मौरी, नहडोरी, मौर सौंपी, नकटा नाच, परघऊनी बरात स्वागत, मड़वा छुवउनी, भाजी खवउनी, कुवर कलेवा, कुंआरी पूजा, पाणिग्रहण, टिकावन, भांवर, पंगत, जेवनार, बिदाई, डोला परछन, धरमटीका, चौथिया आगमन अउ मउर विसर्जन आये।
विवाह संस्कार के गीत मन ला डॉ. पीसी लाल यादव हा छत्तीसगढ़ी संस्कार गीत मा अउ जमुना प्रसाद कसार हा छत्तीसगढ़ी गीत लोक कंठ का कलकल निनाद मा संकलित करे हे। उदाहरण स्वरुप कुछ बिहाव संस्कार गीत प्रस्तुत हे-
मंगनी गीत
ऊंचे चौंरा बबा ओ चोंपलिया
धन तुलसी के पेड़ हो
जेहि तरि बैठि बेटिया
वाही तरी हिंगुन सोना हो
मड़पाच्छादन गीत
सरई सरगोना के दाई
मड़वा छवई ले
बरे बिहई के रहि जाय
कि ये मोर दाई
सीता ला बिहावे राजा राम
चुलमाटी गीत
तोला माटी कोड़े ला, तोला माटी कोड़े ला
नई आवय मीत धीरे-धीरे
तोर बहिनी के कनिहा ला तीर धीरे-धीरे
तेलचघनी गीत
एक तेल चढिग़े
एक तेल चढिग़े
दाई हरियर-हरियर
वो हरियर-हरियर
मड़वा मा दुलरु
तोर बदन कुम्हलाय
नहडोरी गीत
तोला झूलना झूले ला
नई आवे हो दुलरु बाबू
तोर भाई ले के खोर गिंजरा
खा ले खा ले मिठई पेड़ा
तोर बहिनी ला लेगे साहेब डेरा
मौर सौंपनी गीत
दे तो दाई दे तो दाई
अस्सी वो रुपेया
के सुन्दरी ला लातेव बिहाय
सुंदरि सुंदरि बाबू
तुम झन रटिहौ
के सुंदरि देश बड़ दूर
बारात गीत
गांव अवधपुर ले चले बरतिया
गांव जनकपुरी जाये
ये हो राम गांवे जनकपुरी जाये
राजा जनक के पटपर भांठा
तंबू ला देवय तनाये
ये हो राम तंबू ले देवय तनाये...
नकटा नाच गीत
पांच रुपैया के भेड़वा बिसायेन
भेड़वन दारी रे तोरे लगवार भेड़वा...
खाल्हेच खाल्हे लेई चलो देवरा
ऊपरे हो देवरा परथे गोहारे ऊपरे...
धमसा नाच गीत
ये पार नंदी वो पार नंदी
बीच में भांठा कछार
हमर भईया के बिहाव होवत हे
लगे हे रुपिया हजार
वो भईया लगे हे रुपिया हजार
बारात स्वागत गीत
कै दल आवथे
हथियन घोड़वा
के कै दल आवथे बराते
के अब देखो हो ललना
दस दल आवथे हथियन घोड़वा
के बीस दल आवथे बराते...
परघनी गीत
हाथ धरे लोटिया
खांधे मा धरे पोतिया
सगरी नहाय चले जाबो
पनिया हिलोरे
गौरी नहावय
परगे महादेव के छांही
साते समुंदर ला तैं धोये महादेव
परगे महादेव के छाहीं...
भड़वनी गीत
नदिया तीर के पटुवा भाजी
उल्हवा-उल्हवा दिखथे रे
आये हे बरतिया ते मन
बुढ़वा-बुढ़वा दिखथे रे...
2
बाजा रे बाजे
दमऊ नइहे रे दमऊ नइहे
तोर घर के दुवारी में
समझ नई हे हो रे हो रे...
3
अइसन समधी
खोलाये-खोलाये, खोलाये-खोलाये
के लानव माटी छाबी देबो समधी ला
के लानब माटी छाबी देबो रे भाई...
भाँवर गीत
मधुरि-मधुरि पग धारव हो
दुल्हिन नोनी
तुहंर रजवा के
अंग झन डोलय हो
मधुरि-मधुरि पग धारव हो
दुल्हा बाबू
तुहंर रनिया के
अंग झन डोलय हो...
लगिन गीत
दे तो बाम्हन लगिन-चांउर हो
परे लखन के फेर बाम्हन हो
परे लखन के फेर
बाम्हन बोले गुरतुर बोली हो
परे लखन के फेर
बाम्हन बोले गुरतुर बोली हो
परे लखन के फेर
टिकावन गीत
कोन तोरे टिके नोनी
अचहर-पचहर
कोन तोर टिके धेनु गाय
के अवो नोनी कोन तोर टिके धेनु गाय
दाई तोर टिके नोनी अचहर-पचहर वो
ददा तो टिके धेनु गाय
सोहाग गीत
बांस लागे पोंगरी, पुरावन लागे कलगी
नोनी के मांग म सुहाग भरव ना
सबके सुहाग बहिनी अइसन-तइसन
नानी दाई के सुहाग मा सुहाग बाढ़े ना...
बिदा गीत
दाई-ददा बेटी ला ननपन ले पाले पोसे रथे बिहाव
के बिदा के दुख ला महतारी बाप जानथे-
आजि के  चंदा नियरे वो नियरे
दाई मैं काली जाहूं बड़ दूरे
वो दाई मैं
काली जाहूं बड़ दूरे...
डोला परछन गीत
काहन ला मारे
काहन लाल झोरे, काहन लाल झोरे
तैं काहन के कैना ला लाने
मालूद ला मारेंव दाई
बेलौदी ला झोरेंव वो
बेलौदी ला झोरेंव
परसोदा के कैना ला लानेंव दाई मोर
परसोदा के कैना ला लानेव दाई मोर...
मड़वा विसर्जन गीत
धन-धन बैंहा तुम्हरे ए राजा
हरिना मारन नई आवै ए राजा
हरिना तो मारथे उचाटे ए राजा
ओली-ओली खाए गुर चिंउरा ए राजा...
मृत्यु संस्कार गीत
छत्तीसगढ़ मा मृत्यु संस्कार गीत कबीर पंथी समाज मा मिलथे कबीर साहेब अउधनी धर्मदास के रचे साखी के माध्यम ले चौंका मा जीव उद्धार के कामना करथे-
बंगला अजब बने रे भाई
बंगला अजब बने रे भाई
ए बंगला के दस दरवाजा, पवन चलाव हंसा
जावत-जावत कोनो नई देखय, करे इसवर मनसा।।
गंगोरिया मन के स्वागत गीत
इंतकाल के बाद अस ला गंगा लेगथे अब अस ला छत्तीसगढ़ के प्रयाग राजिम मा घलो अस्थि विसर्जन करथे। गंगोरिया मन के स्वागत मा जउन गीत गाथे वो प्रस्तुत हे...
गंगा बड़े गोदावरी
तीरथ बड़े केदार
सबले बड़े अजोधिया हो
जिंहे राम लिये अवतार हो
रंगमहल मा उड़त हे गुलाल हो
हो मुरली वाले बजइया
यशोदा मइया के लाल हो
तोर चरण के लागत हे मोला आस हो
मुरली वाला बजइया
साभार रऊताही 2015

आदिवासियों की अनोखी विवाह पद्धतियाँ

विवाह शब्द मानव जीवन में विशिष्ट महत्व रखता हैं। इसका अपना रोमांच है, अपना आकर्षण है। आदिवासी जनजाति आदिवासी संसकृति सदियों से शादी-विवाह को लेकर पुरानी विभिन्न रोचक परम्पराओं को लेकर आकर्षण का केन्द्र रही है। आदिवासी जातियां अभी भी विवाह के मामलों में लोक परम्पराओं का निर्वहन कर रही है।
प्रदेश के रायगढ़, सरगुजा, बस्तर आदि जिलों में रहने वाली आदिवासी प्रजातियां, कोईनुर, दडामी, खालीपाटी, सानभवरा या पीव भतरा आदि ने समान रुप से विवाह पद्धतियां रीतिरिवाजों के दृष्टिकोण से पहचान नहीं खोई है।
रायगढ़, सरगुजा जिलों में निवास करने वाली जनजाति 'उरांवÓ में वर का पिता या अभिभावक ही योग्य कन्या की तलाश करते हैं। योग्य कन्या मिलते ही उससे विवाह का प्रस्ताव किया जाता है। विवाह तय होने पर बूंदे (दहेज) की रकम तय की जाती है। बूंदे में नगद राशि के अलावा, चांवल, दाल, तेल इत्यादि चीजों का समावेश होता है। नगद राशि पांच सौ रुपयों से लेकर दो हजार तक हो सकती है। यह राशि वर का पिता वधु के पिता को देता है।
इस जनजाति में 'वन्दवाÓ विवाह की प्रथा भी प्रचलित है, जिसमें युवक मनपसंद युवती को चूड़ी, वस्त्र आदि देकर उसे अपनी पत्नी बनाता है। इसके अतिरिक्त इस उरांव जाति में 'ढूंकूÓ परम्परा भी देखने को मिलती है। जिसमें युवती पसंदीदा युवक के साथ रहने लगती है।
इन आदिवासियों में विवाह योग्य पुत्र का पिता यह जानकारी मिलते ही कि गांव के अमुक घर में विवाह योग्य कन्या है अन्न, वस्त्र, मांस और मदिरा (शराब) लेकर गांव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों सहित कन्या पक्ष के यहां जाता है और गांव की बाहरी सीमा पर रुक कर अपने आने व आशय की सूचना देता है। कन्या पक्ष वाले उसे सम्मानपूर्वक अपने घर ले जाते हैं।
प्रस्ताव शादी का वर पक्ष का पिता रखता है, प्रस्ताव के स्वीकृति के साथ वर पक्ष द्वारा लाई गई सामग्री (मांस-मदिरा) आदि से कन्यापक्ष भोज आयोजित करते हैं।
गोड़ आदिवासियों में विवाह की अलग परम्परा है। इनमें दादा व नाना के परिवारों में विवाह करना अच्छा समझा जाता है। समयोगी विवाह इनमें नहीं होते। इस विवाह में लड़के के यहां लड़की वाले बारात लेकर जाते हैं। लड़के के मंडप में ही विवाह की रस्म पूरी होती है। परन्तु अब ये चढ़ विवाह को ज्यादा अपनाते हैं। इस विवाह में दूल्हा बारात लेकर आता है। विवाह की रस्म पूरे विधि विधान के साथ संपन्न होती है। इनमें कभी कभी 'भीली विवाहÓ तथा 'बालात विवाहÓ देखने को मिलता है। भीली विवाह (प्रेम विवाह) लड़का लड़की के बीच प्रेम हो जाने के बाद होता है। यदि दोनों में से कोई पक्ष इस पर राजी नहीं होता तो बालात विवाह को जन्म देता है।
बैगा जनजाति में विवाह के कई तरीके हैं- एक तरीका विवाह का है, जिसमें पूरा वैवाहिक कार्य दोशी (पुजारी) संपन्न कराता है शादी पक्की करने के लिए दोशी के साथ लड़के के माता-पिता व गांव का प्रमुख जाता है। दोशी इस दौरान अपने साथ दो बोतल महुआ की शराब दोनों कंधों में लटका कर ले जाता है। तत्पश्चात दोशी इस शराब को लड़की वालों को देता है जब शादी पक्की हो जाती है, तो परिवार के लोग बैठकर लड़के व लड़की के पैर धोते हैं। फिर इसी शराब को पी जाते हैं। किन्तु अगर शादी की बात पक्की नहीं होती है, तो दोशी उन शराब की बोतल को अपने घर ले जाता है।
तीन चार दिन के अंतराल के बाद लड़के वाले फिर से लड़की वालों के यहां शादी कब है, मालूम करने जाते हैं। उस समय भी वे अपने साथ शराब की दो बोतल ले जाते हैं। शादी का दिन निश्चित होने पर लड़के वाले अपने गांव के सभी युवक-युवतियों को विशेष श्रृंगार करके ले जाते हैं। इसके मौके पर वे शराब पीकर नाचते गाते हैं। शादी में मंडप, सात भंवरे होती है। दहेज प्रथा बिल्कुल नहीं है।
इस जनजाति में 'ले भगा-ले भगाÓ विवाह (पे्रम विवाह) भी होता है। यदि किसी बैगा नवयुवक को किसी नवयुवती से प्रेम हो जाता है, तो वे दोनों उस गांव से भाग जाते हैं। तब लड़के व लड़की वाले उनका पता लगाकर उन्हें वापस लेकर आ जाते हैं। फिर दोनों परिवार के लोग मिलकर गांव के लोगों को मदिरा शराब पिलाते हैं। तत्पश्चात लड़के वाले सहर्ष लड़की को अपने घर रख लेते हैं। घर आने के बाद पूरी रीति-रिवाज के साथ उनका विवाह संपन्न होता है। इस विवाह में लड़की पक्ष के पास कहीं से विवाह का प्रस्ताव आता है और उन्हें वह युवक पसंद आ गया तो वे विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं।
कोरवा जनजाति में विवाह की अलग ही पद्धति है। हालांकि सगौत्र विवाह की परिपाटी नहीं है। पहाड़ी कोरवा, डिहरिया कोरवा में रोटी व बेटी व्यवहार नहीं होता। बाल विवाह का प्रचलन इनमें आज भी है। इनमें हालांकि एक पत्नी विवाह प्रचलित है। लेकिन सक्षम कोरवा एक से अधिक विवाह भी कर लेते हैं। इनमें तलाक प्रथा है। कोरवाओं में ज्यादातर मंगी शादी होती है। अधिकांश संबंध बड़े-बूढ़ों की सलाह से तय होते हैं। अंतिम निर्णय मुखिया को करना होता है। मंडप का निर्माण पूरा गांव मिलकर करता है। जिसमें लड़के-लड़की के लगन होते हैं। मंडप में पित्तर देवता की पूजा होती है। लगन के बाद सभी कोरवा सम्मिलित होकर भोजन करते हैं फिर लड़की की विदाई होती है और महिलाएं कोरवा परम्परा के गीत गाती व नाचती हैं।
आम्पर जाति में आज भी भाई के लड़के से बहन की लड़की ब्याह दी जाती है। इस परम्परा का निर्वाह करने में आम्पर जाति के आदिवासी अपनी शान समझते हैं। छत्तीसगढ़ के देवार जाति में विवाह के समय सूअर काटने की प्रथा है। इसके पीछे मान्यता है कि विवाह के समय सूअर का मांस परोसा जाना सम्पन्नता का द्योतक है। इसमें दहेज देने की प्रथा है। लड़की का मोल होता है।
आदिवासी समुदाय में तीज त्यौहार की अनोखी रस्में, उनकी वैवाहिक परम्पराएं अत्यधिक रोचक होती हैं। इन्हीं परम्पराओं में आदिवासी समाज का वजूद टिका है।
लड़के वाले एक दो हजार रुपये तक लड़की वालों को देते हैं। जब भी लड़की अपने पिता के घर जाती है, तो उसके माता-पिता भोजन नहीं बनवाते हैं। लड़की अपना भोजन स्वयं बनाती है। यदि लड़का पक्ष के लोग लड़की पक्ष वालों के घर जाते हैं, तो अपना भोजन स्वयं अपने हाथों से बनाकर खाते हैं।
देवारों में विधवा विवाह भी प्रचलित है। इसे चूड़ी पहिनाना कहा जाता है। पुन: फेरे नहीं पड़ते अगर कोई देवार आदिवासी किसी बाहरी औरत को अपने डेरे में भगाकर ले आता है तो अन्य देवार उससे रुपये वसूल करते हैं। उसे सहभोज देने के लिए मजबूर किया जाता है। यदि किसी युवती को देवार पुरुष द्वारा पकड़ लिया जाता है तो उसे दंड के रुप में मांस का भोजन लिया जाता है। इस जाति में बिहाना (सहमति से) पेठू (लड़की को भगाकर) व बेधोनी (पंचों के आदेश व परामर्श से) इस तीन विवाह प्रचलित है। अगर कोई देवार आदिवासी लड़की अन्य घर में चली जाएं तो लड़की का पिता लड़के वालों से पांच-छ: सौ रुपये अर्थदंड के रुप में वसूल कर लेता है।
साभार रऊताही 2015

लोक संगीत

साहित्य संगीत, कला विहन:
साक्षात पशु पुच्छ विवान हीन:।
तृण न खादन्नपति जीव मान:
स्तद भाज धेयं परमं पशु नाम:।।
साहित्य संगीत और कला में से यदि कोई भी एक को चुनकर उस पर जो अमल करता है। वही एक जीवंत मनुष्य है। वही एक समाज का सही चित्रकार है। कलाकार है। कला क्या है वही जो समाज या देश में दिनरात घटित होता है जिसकी छाप कलाकार समाज के सामने नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करता है।
प्रबुद्ध मनुष्य बीते दिनों के अनुभव को स्वांग रचाकार प्रस्तुत करना ही लोक कला है। लोक कला वह कला है जो किसी खास स्थान, देश एवं वातावरण की उपज है। यानी किसी खास स्थान पर मनुष्य जो मनोरंजन के लिए अपनाता है जो खास-तीज त्यौहारों में जो वस्तुएं अपनाता है। व्यवहार में लाता है उसे यथावत करने के लिए जो उपक्रम किया, करके प्रस्तुत करने के तरीका को ही लोक कला कहते हैं।
देश प्रांत विभिन्न स्थानों में बटा हुआ है। वे अपनी-अपनी संस्कृति की अलग-अलग पहचान बना चुके हैं। उन्ही संस्कृति वालों ने अलग-अलग कथा का नाम दिया है जैसे कि अहीर नृत्य, राउत नाचा, पंथी नृत्य, भरथरी गायन,  पंडवानी, पंथी, सुआ गीत, ददरिया, गीत, लोरिक चंदा आदि। बल्कि यों कहें कि लोक गीतों को दो भागों में बांटा जा सकता है नारी वर्ग में और पुरुष वर्ग में।
नारी वर्ग के हिस्से में जन्म और विवाह नृत्य गीत में सुआ, भोजली गीत में और गौरा अन्य गीतों में ददरिया लोरी इसी तरह पुरुष वर्ग के लिए भी गीतों का वर्गीकरण है जैसे कि नृत्य गीत में डंडा, कर्मा, मड़ई, फडी और रास। जातिय गीत भी एक वर्गीकरण की देन है वह बांस गीत, डंडागीत, देवार कहलाता है। धार्मिक गीतों की तो कमी नहीं है। भजन जवारा, पंडवानी, भरथरी आदि सामाजिक गीत में बारह मासा जो बारहों महीनों में अलग-अलग गाये जाते हैं।
गीत हृदय की आवाज है। वह कभी भी किसी रुप में हृदय से फूट पड़ता है यह परिस्थिति एवं वातावरण के ऊपर निर्भर करता है। गीतों में बीतते जीवन की मौलिकता झलकती है। इसमें सामाजिक, पारिवारिक एवं स्वयं के जीवन दर्शन झलकता है इसे ही लोक रंग, लोककला एवं लोक साहित्य में प्रस्तुत करते हुए देखते है। लोक गीतों में हमारे समय में जीवन कैसे बिता किस अभाव में बिता किन-किन अन्यायी, वीर एवं दानी राजाओं ने क्या किया झलक मिलती है जैसे कि श्रीराम थे जिन्होंने अपना जीवन एवं मां सीता का जीवन कैसे आपातकालीन समय में बिताया पढऩे को मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण अपनी पौरुषता से कैसे-कैसे दुर्दान्त राक्षसों का संहार किये पंडवानी गायन से साफ झलक मिलती है।
एक तरफ जब मां सीता को रावण अपहरण कर ले चलता है तो जटायु रावण से भिड़ जाता है और घायल होकर कराहता रहता है उसी क्षण श्रीराम लक्ष्मण खोजते-खोजते मिलते हैं जो सारा वृतांत जटायु सुना डालता है, श्री राम बहुत दुखी होते हैं तभी उनकी हालत विचलित करने वाली हो जाती है और वातावरण रो उठता है और हाय सामने उभर उठता है। भावनाएं मां सीता के प्रेम में कारुणिक हो उठता है और इनकी आंखों से आंसू झलक कर सीता के प्रति दर्द निकलने लगता है और उसी के प्रति ये गीत निकल पड़ता है।
खोजते चहूं दिशि धाय, राम लक्ष्मण सिया को।
कोई बता दे कौन छुपाये, सुकुमारी सिया को।।
क्या तुमने देखा है लताओं, हे तरुवर वृंद बताओ।
है निशानी कोई तो बताओ आए शांति जिया को।।
सुनो सुनो हे तोता मैना सुना है किसी का बिलखना।
तू क्यों नयनों से नीर बहाये जो देखा जनक सुता को।।
कैसे पुरुष हूं अपने युग का रक्षा कर न सका भार्या की
क्या भालू, शेर गए खाये मृग नयनी सिया को।
हे लक्ष्मण जा ढूंढ के लाओ आग विरह में मत पड़पाओ
क्या दूंगा अब तुम ही बताओ जब पूछेंगी मैया को।
जब रोते-रोते हो गये व्याकुल तो ये चराचर भी भये आकुल
दिये लक्ष्मण ने ढांढस बंधाये लाउंगा खोज माता को
रोते देख विरह वनवासी पक्षी वानर रीक्ष और न्यासी
बोले नीचे शीश नवाये न रहेंगे दुख ये सदा को
सोचे गुमानी जग की माता को भी रो रहे हैं संग में भ्राता
जैसे गंगा नीर बहाये कर याद अपनी प्रिया को।।
इनके दुख दर्द को देख आज भी इस छत्तीसगढ़ में एक ऐसा समाज है जो इनकी याद में पूरे शरीर पर गोदन लिखवाते हैं जिन्हें रामनामी समाज कहा जाता है ये आज भी रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, बलौदाबाजार, के तीन सौ गांवों में निवास करते हैं। इसी तरह श्री कृष्ण भगवान की भी कथा है जो चारों तरफ बिखरी पड़ी है। पूरा भारत उनके रंग में डूबा हुआ है। जहां भी जाये मथुरा, वृंदावन, गोकुल, द्वारिका आपको कृष्ण ही कृष्ण दिखेंगे। जब वे मथुरा में थे जरासंध कुछ न कुछ दिनों पर चढ़ाई किया करता था जरासंध को मथुरा के जनता से बैर नहीं था बल्कि श्री कृष्ण से था क्योंकि अपराधी, पापी कंस, जरासंध के दामाद को मारे थे।  इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा छोड़ देना ही उचित समझा जिससे वहां की जनता सुखी रहे। परन्तु वहां से जाने के बाद उनका नाम रणछोड़ भगवान पड़ गया। जब कृष्ण भगवान का जन्म हुआ तो उनको देखने आने को देवी-देवताओं आने लगे भगवान शंकर से भी नहीं रहा गया और योगी के वेश में माता यशोदा के घर पहुंच गए। जिन्हें देखकर माता यशोदा बड़ी खुश होकर दान दिया करती थी-
भोले-भोले बाबा नाचे हमार अंगना।
मोतियन थाल लाई मैया यशोदा
लेलो भिक्षा योगी चाहे मन का सोना
या चाहो सो मांगो कंगना ही कंगना
भोले भाले बाबा नाचे हमार अंगना।।
नंद का छौना बड़ मन मोहना
जरा दरस दिखाई दो लगाई के डिठौना
प्रभु दरस दिखाई देख दरस भी लीना
भोले भाले बाबा नाचे हमार अंगना।
राई नमक डारे यशोदा बारम्बार
एवं सब देवता को गुहारे हर बार
सब देवता आगे यशोदा अंगना।
इसी तरह लोकगीत परम्परा चले आ रहा है। लोकगीत अधिकतर जन बोली में हुआ करता है। आज वही लोकगीत भाषायी गीतों में परिवर्तित हो रहा है जो परम्परा को तोड़ते हुए छोड़ते हुए आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है और बढ़ेगा ही और बढऩा भी चाहिए। पहले लोगों का धोती-कुर्ता ही पहनना एक सर्वोत्तम परिधान माना जाता था परन्तु आज सर्वोत्तम परिधान कोट, पैन्ट एवं शूट माना जाता है। पहले शादी-विवाह में शेरवानी, अचकन टोपी पहनी जाती थी आज सब भूल रहे हैं यहां तक कि बच्चे-बच्चियां जींस, पैंट शर्ट ही पहनना बेहतर समझते है और पहनते भी हैं तो क्यों न लोक गीत छोड़कर खड़ी हिन्दी के गीत गायें। आधुनिकता अपनाना किस बात की बुराई है। यहां पर दूसरे को उपदेश तो दे डालते हैं पर स्वयं चलकर तो बतायें। कहते हैं-
कथनी मीठी खाड़ यी करनी विष को लोये।
कथनी तज करनी करे विष से अमृत होय।
दूसरों को शिक्षा देना आसान है क्योंकि वह दूसरों के लिए है वही शिक्षा अपने पर लागू करे तब जाने। वैसे ही लोक गीत, लोक कला जो समय की मांग थी उस समय के लिए ठीक था और अभी भी है कि हम क्या थे और क्या हैं? और आगे चलकर हम क्या होंगे हमारी कथा कलाओं में गीतों में क्या-क्या परिवर्तन होंगे? जो समय की मांग ही दर्शाएगा। क्योंकि
चलं चितं चलं वितं चले जीवित यौवने।
चला चले ही संसारे धर्म एको निश्चल
परिवर्तन ही उन्नति का कारण होता है और वह इसी बातों से पता चलता है जैसे कि, लुगड़ा मा लागे हवा बलम
बोल बॉटम सिला देवे।
साभार रऊताही 2015
लोकगीत  एक मीमांसा
लोकगीत वस्तुत: एक शब्द है,लेकिन अपने में दो भावों को समेटे हुए है, लोक और गीत. दोनो एक दूसरे में संशलिष्ट....एक दूसरे में संपूरक. लोकगीत पर चर्चा करने से पहले हम लोक और गीत पर भी संक्षिप्त में चर्चा करते चलें, तो उत्तम होगा.
लोक शब्द संस्कृत के  'लोकधुनÓ धातु में  'घÓ प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है-देखने वाला. साधारण जन के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर हुआ है.
डा. हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने  'लोकÓ शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम से न लेकर नगरों व गांव में फैली उस समूची जनता से लिया है।  परिष्कृत रुचिसंपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त होती है.
डा. वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में  'लोक Ó हमारे जीवन का महासमुद्र है, जिसमें भूत, भविष्य और वतर्मान संचित है. आर्वाचीन मानव के लिए लोक सर्वोच्च प्रजापति है.
उपरोक्त कथन के अनुसार लोक विश्वव्यापी है. इसे छोटा करके नहीं देखा जा सकता. तभी तो हमारे यहाँ लोकरंग, लोकजीवन, लोकप्रसंग, लोकसंस्कृति,, लोककला, लोककथा, लोकगाथा, लोकगीत, लोकधारणा, लोकसाहित्य, लोकतत्व, लोकजागरण, लोकरा,,लोकराग, लोकमूल्य, लोकचित्र, लोकावस्था, लोकचित्त, लोकनाटक, लोकसमुदाय आदि विस्तार लेते हुए दिखाई देता है. 
डॉ कुंजबिहारी दास ने लोकगीतों की परिभाषा देते हुए कहा है,  'लोकसंगीत उन लोगों के जीवन की अनायास प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति है, जो सुसंस्कृत तथा सुसभ्य प्रभावों से बाहर कम या अधिक आदिम अवस्था में निवास करते हैं। यह साहित्य प्राय: मौखिक होता है और परम्परागत रूप से चला आ रहा है।Ó
 'युगतेवरÓ पत्रिका के संपादक श्री कमलनयन पांडेय लोकगीत विधा को लेकर कहते हैं— 'लोकगीत Ó मानवीय वृत्तियों का अक्षय भंडार है. लोक संस्कृति का अमरकोष है. चरणबद्ध मानव-विकास का सजग साक्षी है. सामूहिकता का सहज गान है. करुणा का लहलहाता महासागर है. मानवीय-संवेगों का दस्तावेज है. इतिहासवेत्ता मानव-विकास की कहानी के किसी कोने को दर्ज करने से चूक सकता है, पर  'लोकÓ की पारखी नजर से कुछ भी नहीं चूकता. इसीलिए मेरा मानना है कि परम्परा की पड़ताल का सबसे बड़ा धरातल हमारे  'लोकगीतÓ हैं, जिसमें हर कालखण्ड, हर भूखण्ड के मानव-समुदाय की सांस-सांस टांकी गई है. रेशा-रेशा उपस्थित है. मन के कोने-अंतरे के भाव-प्रभाव दर्ज हैं. सचेत इतिहासवेत्ताओं का मानना है कि इतिहास का यथार्थ लेखन सि$र्फ गजेटियरों और रियासतों के दस्तावेजों को आधार मानकर नहीं लिखा जा सकता. यथार्थ इतिहास के लिए हमें लोक-सृजन की विविध विधाओं को भी आधार बनाना पड़ेगा.
उपरोक्त विद्वानों के मतों के आधार पर कहा जा सकता है  'लोकगीतÓ लोक के गीत हैं,जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा लोक समाज अपनाता है. सामान्यत: लोक में प्रचलित, लोक द्वारा रचित एवं लोक के लिए लिखे गए गीतों को  'लोकगीतÓ कहा जा सकता है. लोकगीतों का रचनाकार अपने व्यक्तित्व को लोक को समर्पित कर देता है. इनमें शास्त्रीय नियमों की विशेष परवाह न करके सामान्य लोकव्यवहार के उपयोग में लाने के लिए मानव अपने आनन्द की तरंग में जो छन्दोबद्ध वाणी सहज उद्भूत करता है, वही  'लोकगीतÓ है.
लोकगीत को तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है- लोक में प्रचलित गीत(२) लोक-रचित गीत-(३) लोक-विषयक गीत. यहाँ यह बात स्मरण में जरुर रखी जानी चाहिए कि लोकगीत भारत की सभी भाषाओं मे लिखे गए है. जिन्हें आज भी गाया जाता है. इनमे से कई लोकगीत या तो विस्मृत कर दिए गए, या $िफर इस बदलते परिवेश में जिन्हें गाना, शान के विरुद्ध माना जाने लगा है और उन्हें तिरस्कृत किया जा रहा है जबकि इस अनमोल खजाने को संरक्षित करने की जरुरत है.. इन्हीं बातों को लेकर देवेन्द्र सत्यार्थी ने उन्नीस बरस की अवस्था में कालेज की पढाई को अधबीच में छोड़ा और घर से निकल पड़े?.. इस घुम्मकड़ विद्वान ने गांवों की धूलभरी पगडंडियों पर भटकते हुए, धरती के भीतर से फूटे किस्म-किस्म के रंगों और भाव-भूमियों के लोकगीतों को देखा,महसूस किया और उन्हें अपनी कापी में उतार लिया. जब भी उन्हें कोई अच्छा सा लोकगीत सुनने को मिलता, लेकिन उसका अर्थ समझ में नहीं आता, या फिर भाषा की कठिनाई महसूस करते तो पूछ-पूछ कर उसका अर्थ भी लिख लिया करते थे. इस तरह उन्होंने काल-कवलित होते लोकगीतों का संरक्षण किया. जब भी लोकगीतों की बात होगी, इस महामना को विस्मृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने लोकगीतों के संरक्षण के लिए पहला कदम बढ़ाया था.
कजरी, सोहर, चैती संस्कारगीत, पर्वगीत, ऋतुगीत, आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियाँ मानी गई हैं। इनके अलावा संस्कार गीत= (बालक-बालिका के जन्मोत्सव, मुण्डन,जनेऊ, विवाह आदि अवसरों पर गाए जाने वाले गीत)गाथागीत- (विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित विविध लोकगाथाओं पर आधारित गीत. इसमें आल्हा, ठोला, भरथरी, नरसी भगत, घन्नैया को शामिल किया जा सकता है)
पर्वगीत=(राज्य के विशेष पर्वों एवं त्योहारों पर गाए जाने वाले गीत) को भी शामिल किया जा सकता है.ऋतुगीत=(कजरी, बारहमासा, चैता, हिंडोला आदि)
.कजरी= हमारे यहाँ वर्षा ऋतु का अपना विशिष्ट स्थान है. आषाढ से लेकर भादों तक प्रकृति के लहराते हरित अंचल की छटा एक ओर हमें मंत्रमुग्ध कर देती है, वहीं दूसरी ओर हमारे अंतर्मन में एक संगीतमय गुदगुदी पैदा कर एक सुखद व्यथा को भी उत्पन्न करती है और यही सुखद पीडा जन्म देती है संगीत को. वर्षा की रिमझिम $फुहारों के साथ कजरी के बोल सर्वत्र गूँज उठते हैं माटी की सोंधी सुगंध के साथ. झूले पर पेंगें मारती यौवनाएं हो या घर की गृहनियां हर किसी के अंतर्मन से कजरी के बोल $फूट पडते  हैं. बूढा हो या फिर जवान हर कोई कजरी की लय अमें खोकर रह जाता है। होंठ थिरक उठते हंै और बोल स्वत: $फूट पड़ते हैं- कइसे खेले जयबू सावन में कजरिया, बदरिया घिरी आईस सजनी।
वतर्मान हिन्दीभाषी क्षेत्र प्राचीन भारत का 'मध्य देशÓ है इस क्षेत्र में बोली जाने वाली बोलियों को भाषा वैज्ञानिकों ने चार भागों में विभक्त किया है.  'पश्चिमी हिन्दीÓ जिसके अंतरगत खडी बोली, ब्रज, कन्नौजी, राजस्थानी तथा बुंदेलखडी भाषाएं आती हैं. अवधी, बघेली, तथा छत्तीसगढी मध्य की भाषाएं हैं और इसके पूर्व में बिहारी भाषा समुदाय की भोजपुरी, मैथिली,तथा मगही है. उत्तर में कुमाऊँनी,भाषा है जो नैनीताल, अल्मोडा,टेहरी-गढवाल, पिथौरागढ, चमौली, तथा उत्तर काशी में बोली जाती है. बोलियों में भी अनेक उपबोलियां हैं,जिनमें लोकगीत गाए जाते हैं.
लोकगीत चाहे जहाँ के हों वे प्राचीन परम्पराओं, रीतिरिवाजों एवं धार्मिक तथा सामाजिक जीवन को अपने में समेटे हुए हैं.इनमें भाषा अथवा बोली की अनेकताएं भले ही हों पर भावों की एकता एवं उसे व्यक्त करने तथा पात्रों का चयन लगभग एक जैसा ही होता है.
डोगरी लोकगीत= चन्न म्हाडा चढ़ेया ते बैरिया दे ओहले बैर पटाओ म्हाडा चन्न मुहा बोले मिलना जरुर मेरी जान ( मेरा चांद बेर के दराख्त की ओट में चढा है. दरख्त कटवा दो ताकि मेरा चांद मुंह से बोल सके.मेरी जान मिलना तो जरुर है)
पंजाबी लोकगीत=निक्की निक्की बूँदी निक्कियाँ मीं वरे, वे वीरा नदियाँ किनारे घोडी घारु चरे, वे वीरा दादी सुहागण बूहे ढोल धरे, वे वीरा भूआ सुहागण सोहणें नाऊ धरे(दूल्हे का घोडी पर सवार होकर विवाह रचाने जाते समय गाया जाता है)
कश्मीर=आव बहार वलो बुलबुलो/सोन वलो बरवों शादी/द्राव कठकोश ग्रोअज पान छलो/जरा छलनय वन्दकिय दादी/बुजू न्येन्द्रि बुनि छासुलो(वसंतकालीन पर्व पर गाए जाने वाला लोकगीत)
(२) पोशपोजाये वेल हे वोत/कर्मपम्पोश सोन लबिमन्ज आवा/स्वर्गच पूजाये वेल है वोत( वर्षागीत)
ब्रज लोकगीत= भतइया आयौ आंगन में बैठों दिल खोल/हुहर लायो अशर$फी लायौ रुपया लायौ भौत/सास हमारी यों उठ बोली देखौ थैलीखोल/ खोटे तौ नाय ओहो रे नकली तो नाय...(आंगन में )हरवा लायो निकलस लायो, चूडी लायौ मोल/जिठनी हमारी यों उठ बोली, देखो डिब्बा खोल/नकली तो नांय फो रे,पालिश तो नांय(आंगन में)
भीलों का भारथ=ए गाडु सोरीन ऊपो रयो (२)/गाडु सोरीन ऊपो रयो हो....रा....झी/गुरु भेंमा रे पांडवन साआआर नोखें(२)/ए सारनो पूळो रे नोखवा लागा हो....रा...झी
हरियाणा=नाच-नाच मेरा दामण पाट्या/ हे री ताई तूं के और सिमा देगी/मैं तेरे घर नाचण आई
मराठी(राम जन्म का प्रसंग)=सात समिंद्राचं पानी/दसरथाच्या रांजनी/रामराय झाले तान्हे/कौसल्या बाळंतिनी
(२) सीता स्वयंबर का प्रसंग=शिवाच धनुष्य/सीतेनं केलं घोडं/रावणं आळा पुढं/देवाला पडलं कोड/रावनानं कोधंड/उचललं घाई घाई/रामाची सीता नार/याळा मिळायची नाही.
निमाडी लोकगीत =संजा बाई, संजा बाई सांझ हुई/जाओ संझा ! थारा घर जा/थारी माय मारेगी, कूटेगी, चांद गयो गुजरात/ हिरणी उगेगी,डुबेगी, हथनी का बडा-बडा दांत/थारी बईण डरेगी, कांपगी, कुतरा भुकड गली म र/ थारी माय दचदेगी, पटकेगी.(२) राखो राखो रे पाणी, बोलो असी वाणी/जे कामर मिसरी घुली,वाणी मिसरी वाली
बुदेली लोकगीत= गिर्री पे डोरी डार मोरी गुंइयाँ/ डार नोरी गुइयां डराव मोरी गुइयां/गिर्री पे डोरी त्रबहिं नीकी लागै/सोनन के घडेलना होय मोरी गुइयां.(प्रसव बाद कुएं पर पानी भरने जाते समय गाए जाने वाला गीत)
मिथिला (नागपूजा के समय) =पुरैनिक पत्ता, झिलमिल लत्ता/नागदह नागदह पसरल पुरनि/जल उतपन मेल पांचो बहिन/पांचों बहिन पांचों कुमारि/छोट देवी विषहरि बड उतफालि।
छत्तीसगढी लोकगीत=देखो $फुलगे चंदैनी गोंदा $फुलगे/एखर रुप रंग हा जिव मां,मिसरी साही घुरगे/एक $फूल मय तुमला देथंव/बबा ददा औ भाई/नानुक बाबू नोनी दुलौरिन/बहिनी अउ मोर दाई/ तुंहर दरस ला पाके, हमर सबके भाग हा खुलगे.(२) लउडी के चक लउडी भइया, लउडी म बांधे $फुँदरवा/हम तो जाथंन गोवर्धन खुंदाय बर,माता-पिता के दुलरवा.
बस्तर का लोकगीत=देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा/ हमरों भोजली रानी के आठौ अंग है (अहो देवी गंगा) पानी बिन बिजली, पवन बिन बारी/ सेवा बिन भोजली के हरषे हो रानी.
भोजपुरी=राति अँधियरिया, बाटी सूनि मोर सेजरिया/मोरे दिलवा में उठेला तू$फान/बोलैले सियार कुचकुचवा बहरवाँ/ रेउवाँ चिल्लात बाट?ं तालके किरनवाँ (२)धीरे बहा मोरी हे माता टँवसिया/लेइकै मोरी अँखियन के आँसू/जइसे मोरी माता $फुलवन के बहवावा/वैसे मोरे दिल के जलनिया मिटावा.
राजस्थान के लोकगीत=गाम गाम खेजडी नै गामेगाम गोगो/घोट पीवो अंतर छाल कालो हणे नी बोगो.
खेजडी=शमी वृक्ष/ घोट=पीसकर/कालो-सर्प/हणे=डसता है/बोगो=दो ओर मुंह वाला.
(२)समरुं माता शारदा, गवरी पुत्र गणेश/मणिधर $फणिधर गरलधर पन्नगनाथ महेश/करुं प्राथर्ना प्रेम थी, स$फल करो मुझ काज....(३) जय जयकार करई जोड/ऊभी मैदिनी ओलाओल/करे परिकम्मा देवे धोक/चढे नालेर,लगावे भोग...(३) गौर से गणगौर माता, खोल से किवाडी/बाहर ठाडी, थारी,पूजन वारी..
मेवाती(राज)=बन्ना है बन्नी को बडो चाव/चल दियो सिखर दुपहरी में/बन्ना जूता लायो सईं साज/ मोजा लायो दुपहरी में/बन्ना है, बन्नी को बड़ो चाव
कन्नौज=सुमिर सरसुती जगदम्बा को,औ गनपति के चरन मनाई/धरती माता तुमको ध्यावों, कीरती, सबसे बडी तुम्हार/कीरति ध्यावों उन वीरन की, पलटै प्रबल काल की चाल/धारैं लौंटें तरवारनि की,उनके झुकैं न ऊँचे भाल/अरि पन्नग पर पन्नगारि जस, तूटैं परे पराये काज/ पानी राखैं जनमभूमि का, राखैं जनम भूमि की लाज
डोगरी= नूं पुच्छदी ? सस्सू कोला/बाहर सपाई कीया रौहन्दे न/भंगा पुट्टे सथुरा पान्दे/सूंक सुट्टी सैई रौहन्दे न (बहू सास से पूछती है मां, बाहर सिपाही कैसे रहते हैं. सास कहती है, भांग के पौधे उखाडकार बिस्तर बिछाते हैं और नि:श्वांस लेकार सो जाते हैं.)
आदिवासी चकमा समुदाय का गीत=छोरा छोरी बील हावा जोर/हादो पान खिलक हील हावो(नदी-नाले और ताल-तलाइये भर जाने से जैसे मछलियां खुशी से नाच उठती है.मेरी सजनी ! वैसे ही तेरे हाथों से पान खा कर मेरा दिल नाचने लगता है.)
ओडिया लोकगीत=रंज हेइचि कि सज करुच मो माआमाने/रुष बसिचि कि बोध करुच मो माआमाने/कानिपणतरे बांधि रखिल मो माआमाने/एबे सबु स्स्स्पेह पासोरि देय मो माआमाने(आज तो कोई उत्सव नहीं है कि तुम मेरा सिंगार्कर रही हो, न मैं रूठी हूँ कि तुम मुझे मना रही हो. मुझे आंचल में छिपाकार रखती थी, अब सारा प्यार भूल गई हो.( वर आने से पहले कन्या स्नान करते समय मां से कह रही है.)
अरुणाचल=(नृत्य करते समय गाए जाने वाला लोकगीत)=पचि दोव से अने दने दोह/दुगो दोह से अने दने दोह/पचि साव से अने दने दोह/दुगो दोह अने धने दोह
असम (मजदूर का गीत) कोट मारा जेमन तेमन/पाता तोला टान/हाय यदुराम/$फाकि दिया आनिलि आसाम/चाहेब बले काम काम/बाबू बैले धररे आन/चार्दार बले लिबे पिठेर चाम/रे निठुर श्याम/$फांकि दिया आनिलि आसाम
बिलासपुर=(छ.ग.) जइसन जेकर दाई ददा, तेकर तइसन लइका/जयसन जेकर घर कुरिया, तइसन जेकर घर कुरिया,/तयसन तेकर $फइरका (कोरबा)=जेकर जसन दाई ददा, तेकर तसन लइका/जेकर जसन घर दुवार, तेकर तसन $फइरका.(रायगढ)=जेकर जैसेन घर दुवार, तेकर तैसन $फइरका/ जेकर जैसन दाई-ददा, तेकर तैसन लइका.
साभार रऊताही 2015