Thursday, 14 February 2013

आपसी सद्भावना का प्रतीक यादव शौर्य प्रदर्शन महोत्सव

भारत त्यौहारों का देश है, जहाँ विभिन्न जाति, धर्म को मानने वाले एवं भाषा बोलने वाले लोग निवास करते हैं, एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होकर खुशी और दुख का इजहार करते हैं वर्ष भर बारी-बारी पडऩे वाले पर्व त्यौहार को मिल जुलकर मनाते हैं। निस्वार्थ भाव से हमारे हृदय में अनवरत पनप रहा ये आपसी प्रेम सद्भाव निश्चय ही हमारी भारतीय संस्कृति की देन है, हमारी परंपरा है और शायद यही वजह है कि पूरे विश्व में एक अकेला अखण्ड भारत ही 'धर्म निरपेक्षÓ राष्ट्र है। ये समूचा राष्ट्र एक गुलदस्ते के समान है जिसमें तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल सजे हुए हैं और हर फूल गुलदस्ते की शोभा बढ़ाने में सहायक है, किसी की महत्ता को कम करके आंका नहीं जा सकता, ठीक ऐसे ही यहां का जनजीवन है जिसमें विविधता है। यह देश विशाल है यहां की जनसंख्या विशाल है इसलिए विविधता स्वाभाविक है, किन्तु यह विविधता ही गुलदस्ते की भांति जनजीवन को सुंदर बनाने में सहायक है। खान-पान, रहन-सहन, नृत्य-संगीत में विधिता ही हमारी पहचान है, हमारा परिचायक है वहीं नृत्य संगीत खुशियों के इजहार का एक सशक्त माध्यम भी है।
हमारे देश में सैकड़ों प्रकार के नृत्य का चलन है, मसलन राजस्थान में 'घूमरÓ पंजाब का 'भांगड़ाÓ असम में 'बीहूÓ हिमाचल प्रदेश में नटी, इसी प्रकार अलग-अलग राज्यों में नृत्य प्रसिद्ध है। मध्यप्रदेश में भी तरह-तरह के लोकनृत्य प्रचलित है जिसमें 'सुआनाचÓ, 'डंडा नाचÓ  'करमाÓ 'पंथीÓ 'रावतनाचÓ आदि समूह नृत्य प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ के लोक नृत्यों में पंथी नृत्य आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुका है, वहीं रावत नाच महोत्सव आज जिला स्तर (बिलासपुर) से बढ़कर प्रादेशिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो चुका है, छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहते हैं जहां इसकी पहचान आज पंडवानी एवं पंथीनृत्य के माध्यम से होने लगी है वहीं 'रावतनाचÓ का नाम आते ही छत्तीसगढ़ का ध्यान बरबस ही हो आता है।
'रावत नाचाÓ एक समूह नृत्य है जिसे यादव भाई गोलबन्द होकर लय-ताल के साथ करते हैं। इस अवसर पर सभी पारंपरिक वेशभूषा धारण किये रहते हैं जिसकी शोभा देखते ही बनती है। सिर में कागज के फूलों की पगड़ी जिसमें मयूर पंख के साथ रंग-बिरंगी कलगी खोंसे, चेहरे पर पीतराम रस पोते कमर से घुटने तक चुस्त धारीदार धोती, पीले कमीज के ऊपर काला मखमली जैकेट, भुजा और कलाई में कौड़ी से गुंथे पट्टा पांव में घुंघरु एक हाथ में लाठी तथा एक हाथ में फरी (कवच) बांधे जब इनकी टोली निकलती है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे अपने सेनापति के निर्देशन में वीरों की टुकड़ी (टोली) रणक्षेत्र के लिए कूच कर रही है। शौर्य, उत्साह और सद्भावना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, इस समूह में इस नृत्य के इतिहास पर यदि नजर डालें तो यह उतना ही पुराना लगता है जितनी यादव जाति। लोककथा एवं जनश्रुति के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पहाड़ उठाकर मेघराज इन्द्रदेव की नाराजगी से गोप ग्वालों की रक्षा की थी, इसी खुशी में यादव भाई जो अपने को यदुवंशी श्रीकृष्ण के वंशज मानते हैं, ये त्यौहार मनाते जा आ रहे हैं। ये पर्व गोवर्धन पूजा से प्रारंभ होकर करीब एक माह भर तक क्षेत्र अनुसार चलते रहता है। दीपावली पर्व के अवसर पर मनाये जाने के कारण इसे 'देवारीÓ भी कहते हैं।
अखरा, सुहई, काछन, मातर जागरण, बाजार बिहाना और मड़ई, 'रावत नाचÓ के महत्वपूर्ण अंग है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में यह पर्व देवउठनी एकादशी से प्रारंभ होता है। प्रारंभिक चरण में पशु पूजा के साथ ही सुहई बांधने का कार्य तथा आसपास के साप्ताहिक हाट बाजार में नृत्य कौशल का प्रदर्शन जिसे बाजार बिहाना कहते हैं, होता है। गड़वा बाजा जो आज बहुत महंगा हो चुका है। उनके भुगतान के लिए  पशुमालिकों (किसान) के यहां अपना नृत्य कौशल प्रदर्शन कर बदले में उपहार स्वरूप धन प्राप्त करते हैं। पशु मालिकों द्वारा उदारतापूर्वक मुक्त हस्त से उपहार प्रदान करना, इनके आपसी सौहाद्र्र का परिचायक है।
'रावत नाचÓ का एक महत्वपूर्ण अंग मातर जागरण, अर्थात माता की आराधना है इसमें यादव भाई जिनकी मूल सम्पत्ति पशुधन ही है इनकी सेवा देखरेख ही इनका व्यवसाय है, इनकी सलामती के लिए दैहान में ये कार्यक्रम संपन्न होता है। इस कार्यक्रम में गौ मांस की पूजा, हल के टुकड़े (जो गड़ाया जाता है) की पूजा, पशु को रोगमुक्त रखने होम हवन तथा पशुमालिकों को ससम्मान आमंत्रित कर उन्हें दूध, खीर, मिष्ठान आदि खिलाना शामिल होता है और शाम को बाजार भरता है जहां आसपास के यादव दल जो कि इस पर्व के आमंत्रित टोली रहते हैं अपने नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। नृत्य टोली में मड़ई भी रखा जाता है जो बांस का बना होता है तथा बिजली के टावर की भांति होता है। मड़ई को रंगीन कागज, फूलों, मयूर पंख, मुर्गी के पंख आदि से सजाया जाता है जिसे एक व्यक्ति सम्हाले नृत्य टोली के साथ घूमता है।
इस पूरे कार्यक्रम में महोत्सव में आसपास के गांवों के यादवों को टोली सहित आमंत्रित करना, पशु मालिकों को ससम्मान आमंत्रित कर दैहान में उनका स्वागत करना, नृत्य प्रदर्शन तथा पशुमालिकों द्वारा मुक्त हाथों से उपहार प्रदान करना आपसी सद्भाव और प्रेम को बढ़ाता ही है साथ ही प्राचीन परम्परा को जीवित रखने, स्वस्थ मनोरंजन करने में यह महोत्सव सहायक है, जरुरत है इसे और आगे बढ़ाने के लिए सार्थक पहल की यादव भाइयों के चहुंमुखी विकास एवं उन्नति के लिए योजना बनाने की ताकि देश एवं समाज में इसकी प्रतिष्ठा बने रहे।
इस दिशा में डॉ.एम.आर. यादव तथा अहीर नृत्य कला परिषद देवरहट के सदस्यों का प्रयास सराहनीय है, यह उनके प्रयासों का ही प्रतिफल है जो 'रऊताहीÓ स्मारिका का चतुर्थ पुष्प आपके हाथों में है। यह 'स्मारिकाÓ छत्तीसगढ़ के इस पर्व के तमाम अछूते पहलुओं से लोगों को रुबरु कराने मददगार साबित होगी जिससे हम, आप अब तक अनभिज्ञ थे।
शुभकामनाओं सहित !
साभार - रऊताही 1996

रौताही बाजार (राउत नाचा)

शब्द कहने में अटपटा लगता है पर यह राउत नाचा महोत्सव बहुत पुराने काल लगभग साढ़े पांच हजार वर्ष पुराने अट्ठाइसवें द्वापर काल से जब परमात्मा के सोलहवें कला ईश्वर  अवतार भगवान कृष्ण का अवतार हुआ था जिसके विषय में ईश्वर अवतार महर्षि व्यास (तत: सप्तदशे जात: सत्यवत्यां पराशरात्।। च के वेद तरो शाखा दृष्टवा पुन्सोस्त्य मेघ स:।। 21 भा.प्र. स्कंध) अपने अपूर्व ग्रंथ श्रीमद्भागवत में प्रथम स्कंध में एते चां श कला: पुन्स: कृष्णास्तु भगवान वयम्।। इन्द्राणीव्याकलं लोकं ऋष्यंति युगे-युगे। श्रीमद् नाचा महोत्सव जो कि अपने मुखिया (राजा) के प्रथम पुत्र जन्मोत्सव के समय अपने गोधन गायों और बछड़ों के सहित अनेक परिधानों में (गायों नृषा वत्सतरा हरिद्रातैत सषिता: 22 निमित्त धातु बर्हस्त्रग्वस्त्र कांच न मालिन:।। महादेवस्त्रानातरणं कंज्त्रु कोंष्णीय भूषिता:।। गोपा: समाययु राजान्नानों पायन पाणय:। दशम स्कँध 15।
नाचते-कूदते नन्दराम को बधाई दिया गया तथा उसी रुप में दूसरा महोत्सव गोवर्धन पूजा के समय इन्द्र का मानमर्दन हेतु दिखाया गया इसी तरह यह महोत्सव अन्याय अत्याचार कंस के द्वारा गरीब गायों के शोषण के विरोध में किया गया शुद्ध अहिंसक एकता का प्रतीक के रुप में पुराणों में लिखा गया है। उक्त महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य उस समय अन्याय, अत्याचार के विरोध में ग्वाल बाल जो कि यदुवंशी क्षत्री थे पर गौ ब्राह्मण के ऊपर बढ़ते हुए अत्याचार को देखकर भगवान कृष्ण ने बलिष्ठ यादवों जिन्हें गाय गोधन सेवा के कारण ग्वाल बाल कहा जाने लगा जहां पर मांस मदिरा का बिलकुल निषेध था और बड़े-बड़े असुरों (असुरी प्रवृत्ति के धनी) को बिना किसी हथियार के विनष्ट किया गया था। इसी का प्रतीक आज के दिन ग्वालों के द्वारा गायों की बीमारी एवं पशुधन की खुशहाली हेतु गोष्ठान में कुल देवता भगवान कृष्ण का पूजन कर राउत नाचा महोत्सव किया जाता है। इसमें खासकर छत्तीसगढ़ के सभी वर्ग अपना तन मन धन से सहयोग कर उक्त महोत्सव में सम्मिलित होते है। इसमें खासकर छत्तीसगढ़ के सभी वर्ग अपना तन मन धन से सहयोग कर उक्त महोत्सव में सम्मिलित होते है। इसी हेतु गांव में सभी घरों में ग्वालबाल जाकर राउत नाचा कर उनकी उनके बहुमुखी विकास की दुहाई अनेक दोहे के रुप में दिया करते हैं इस ऐतिहासिक पौराणिक परम्परा को समाज के हर वर्ग को प्रोत्साहित करने एवं इस छत्तीसगढ़ी ही नहीं वरन अनेक रुप में हर प्रांत में यादवों के द्वारा मनाये जाने हेतु प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये एवं ग्वाल बालों को सामाजिक उत्थान हेतु अपने को सभी बुराईयों से बचाते हुए सामाजिक संगठन हेतु प्रयासरत रहना चाहिये।
इस महोत्सव को आज भी मातर जगाने के नाम से ग्वालों के द्वारा मनौती के रुप में माना जाता है। जिसमें यदुवंशी अपने कुल देवता की पूजा करने हेतु अपने मुखियों के घरों से खोड़हर को विधि विधान से बाजे गाजे से नाचते कूदते उल्लास के साथ पूजा कर गोठान के बीच में गड़ाकर उनके सम्मान में खूब पूजन भंडारा तथा उस समय हर वर्ग के ग्वाल चाहे कनौजिया, देशहा, झेरिया, तथा वन्य प्रांत में आदिवासी जन भी एकजुट होकर अपने देवता के सम्मान में खूब उत्सव मनाते हुए विविध परिधान में अनेक दूर-दूर के गांवों में झुण्ड के झुण्ड बाजे-गाजे के साथ अपनी वर्ग भेद जाति ऊंच नीच के कुत्सित विचारों से अलग होकर उक्त उत्सव में सम्मिलित होकर अपने गांव ग्राम देवता, कुल देवता ग्राम के मुखिया के चहुंमुखी विकास तथा परम्परा को कायम रखने तथा अपनी मातृभाषा मातृभूमि गोवंश एवं अपने मालिक एवं स्वयं परिवार के मंगलकामना के दोहे बोल बोल कर इतने भाव विभोर हो जाते हैं कि उन्हें तन-मन की सुधि-बुधि भूल जाती है जिसे काछन चढऩा कहा जाता है ये यदुवंशी क्षत्री इस रुप से उस समय कंस के बढ़ते हुए अत्याचार और आज भी गोवंश के विनाश के प्रति अपना रोष प्रकट कर एकता की दुहाई देकर मानो मर मिटने की शपथ लेते हैं। मातर शब्द का अर्थ मातृ शक्ति को जागृत कर माँ गोवंश की रक्षा हेतु समाज को जागृत कर जगाना होता है तथा स्पष्ट है खोंडहर शब्द खंड हर का अपभ्रंश है जो कंस के अत्याचार से घरबार छोड़कर भागे हुए सीधे-साधे यदुवंशी भोज वंशी क्षत्रिय एकत्र होकर अन्याय को चुनौती देकर अपने छोड़े हुए खंडहरों से अपने कुल देवता को मुक्ति दिलाकर बाजे-गाजे के साथ लाया जाता है आज भी आप लोगों ने देखा होगा मातर जगाने वाला ग्वाल को काछन चढ़ता है वह अपने देवता अपने घर को खडंहर तथा इष्ट को गड्ढे तथा अंधेरे में सिसकते हुए उसमें मातृशक्ति का भाव आ जाता है वह उसमें आक्रोश में अपने ही शरीर व घर छप्पर को पीटने लगता है और अपने आप मना करने वाले प्रतिद्वंद्वी को ललकारने लगता है उस समय उसको शासन द्वारा प्रदत्त सुरक्षा बल भी संभालने में असमर्थ हो जाता है यह एक शुद्ध दैविय शक्ति का जागरण एवं अपने मातृभूति राष्ट्र गोवंश के दीन-हीन दशा के प्रति एक आक्रोश प्रकट होना स्वाभाविक है। उसके बाद अपने जो ग्वाले घर-घर में राउत नाचने को जाते हैं अगर हम लोग इसका सही मूल्यांकन करें।
हमें हमारे समाज एवं पूरे देशवासियों को इस वंश का आभार मानना चाहिए यह कि ये यदुवंशी क्षत्रियवंश का ही लक्षण है जो ये लोग लाठी लेकर अपने शौर्य का प्रदर्शन करते है। हर हिंदुओं मुसलमानों एवं सभी छोटे बड़े लोगों के घर जाकर उनकी गुलामी अंग्रेजों के द्वारा गोवंश का विनाश एवं भारतवासियों को हथियार रखने पर पाबंदी के विरोध में केवल लाठी के बल पर ही अपने आन बान गोवंश एवं राष्ट्र के प्रति हर वर्ग के घर-घर जाकर जगाकर सावधान रहकर अपने ऊपर किये जा रहे अत्याचार शोषण के प्रति अलख जगाना ही है। उसमें जो उन्हें पुरस्कार प्राप्ति होता चला आ रहा है वह एक प्रोत्साहन राशि के रुप में ही था जिसे वे बेचारे सदियों से शोषित अपनी गरीबी समाज से उपेक्षित एवं अशिक्षित रहने के कारण उक्त राशि को समाज संगठन के उत्थान में न खर्च कर अपने पेट तथा कपड़ा बाजा आदि में उड़ाते चले आ रहे हैं। आजादी की लड़ाई में जिस तरह स्व. लोकमान्य तिलक जी ने महाराष्ट्र में गणेश सत्यनारायण की कथा आदि में संगठनात्मक विचार गोष्ठी का रुप दिया था। उसी तरह इस समाज के तरफ छत्तीसगढ़ के समाज सेवियों का ध्यान नहीं गया न ही उन्हें बढ़ावा मिला बल्कि उनकी हंसी उड़ाया जाकर उन्हें दबाने हेतु अनेक कार्य किये गये। इस विषय एवं इस समाज के संबंध में जितना भी कहा जाय, लिखा जाय थोड़ा है। इस समाज ने सदियों से अपना परिश्रम अथक सेवा भाव जो दिन भर हमारे कृषि प्रधान भारत वर्ष के महत्वपूर्ण अंग गोधन की सेवा करने बड़े भोर से ही मालिक को जगाकर गाय भैंसों को बरसात, पानी, गिरते एक कंबल खुमरी ओढ़ कर जंगलों में ले जाकर ईमानदारी पूर्वक चराना न उन्हें उक्त कार्य में ठंड की परवाह न गरमी की चिंता। घर में मवेशियों की सेवा में अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर समर्पण भावना से जो इस वर्ग ने सेवा किया है कोई ऐसा मिसाल आज भी जंगलों में जाकर इनके त्याग और तपस्या देखा जा सकता है। जंगलों में आपके पशुधन की सेवा और वे ग्वाल अपना और अपने परिवार को अनेक बीमारी प्रताडऩा के आग में झोंकते चले आ रहे हैं ऊपर से वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा इनका शोषण कर दरिंदों से कम नहीं है फिर भी ये बेचारे आपक गायों भैंसो को इस जंगल से उस जंगल में भगाने पर असहाय होकर समाज सेवकों से अपनी गुहार लगाते फिरते हैं क्या किसी ने कोई ध्यान दिया है? मैं समाज से पूछता हूं आप लोगों में से कोई भी बताये इन्हें इसके बदले क्या मिला। थोड़ा सा अनाज बाढ़ी के टुकड़े मात्र हमारे प्रांत में कांग्रेस शासन में हमारे मुख्यमंत्री माननीय दिग्विजय सिंह जी को मैं साधुवाद प्रेषित करता हूं जिन्होंने हमारे समाज चिन्तक श्री बी.आर. यादव जी को हमारे म.प्र. शासन के वनमंत्री के रुप में नियुक्त किया है वे समाज के प्रति जागरुक एवं संवेदनशील रहे हैं। अवश्य ही इस ओर अपना अमूल्य ध्यान देकर इन गरीब भोले-भाले ग्वाल बाल यादवों की दीनदशा पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेंगे। काफी दिनों से मैं उक्त समाज के प्रति हमेशा ही अपनी आवाज उठाता रहा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया आप अपने अंतरात्मा की आवाज से सोचें अगर इसी तरह समाज की उपेक्षा होती रही तो हमें समाज सेवा का कार्यबंद कर देना चाहिए अन्यथा वह एक ढोंग ही कहा जावेगा। हमारे समाज सेवी संस्थाओं की सच्ची सेवा भी सार्थक होगी। तय है कि अपने बहुमूल्य प्रहरी की उपेक्षा हमारे उत्थान में राष्ट्र के सुचारू संचालन में महान बाधक बनेगा। मैं तो चाहूंगा कि इस वंश के जो कभी समाज का शासक कहा जाता था आज मजदूर अशिक्षित लठैत कहे जाकर ंसी के पात्र बनते जा रहा है। समाज सेवियों से मेरी अपील है कि वे अपने सामाजिक यश प्रलोभन एवं दंभ से ऊपर उठकर सदियों से शोषित उत्पीडि़त समाज को शिक्षा संगठन सांस्कृतिक पहचान को उज्जवल कर उनके अंतर्रात्मा के आंतरिक भावना के अनुरुप सेवा का अवसर प्रदान कर उनकी खोई हुई अस्मिता उनको दिलाते। कंस के अत्याचार से भागकर विविध प्रांतों में बसे हुए श्रीमद्भागवते दशम स्कंधे द्वितीय अध्याये से पीडि़ता निविविध कुरु पांचाल कैकयान। शाल्वान विदनर्भन विषधान् विदेहान को सलानपि।। एके तमनुरुन्धानांज्ञातय: र्युपासते। हतेषु षटसु वालेषु देव क्या आग्रसेनिना। उन यदुवंशियों को एकत्रित कर उनको सामाजिक धारा की ओर मोड़े और इस प्रकार सदियों से चले आ रहे राउत नाचा को एक सामाजिक राष्ट्रीय एकता के रुप में महत्व देकर अपना योगदान देवें साथ साथ देश के सभी यदुवंशी यादवों से भी अनुरोध करुंगा कि आप लोग अपने अस्मिता को पहचानिये गंदे विचार कि वह झेरिया है यह केंवरई है यह कन्नौजिया है। इन सब झगड़ों में न पड़ा वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से समाज में कुछ व्यापत बुराइयों से दूर रहकर शिक्षा को महत्व देकर अपने आगे आने वाली पीढ़ी को साक्षर बनाइये और ग्राम नगर समाज राष्ट्र के उत्थान में सहभागी बन स्वदेश का नाम रौशन करें। संगठन में इतना ताकत है कि किसी राष्ट्र को उठाने सजाने संवारने में वर्तमान युग में महत्वपूर्ण आवश्यकता है। संघे शक्ति कलीयुगे जिस समाज में एकता है वही जागरुक है। यह तो यादव समाज में कुछ जागरुक लोग हुए जिनका सामाजिक उत्थान के तरफ ध्यान गया जो अब कुछ वर्गों के लिए समाज में जो बुराई है कुछ स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर लठैती कर मारपीट तथा अपने ही यादव समाज से वर्ग भेद लगाकर झगड़ा झांसा करने के प्रवृत्ति पर रोक लगाकर समाज को सुसंस्कृत कर संगठित कर पूरे सामाजिक धारा की ओर यदुवंशियों का ध्यान मोड़ा जाये तो मेरे अंदाज से सबसे उत्तम क्षत्रित्व समाज एवं राष्ट्र के सजग प्रहरी के रूप में खुलकर विकसित होगा। शास्त्रों में जो क्षत्रिय गुण वर्णित समाज माना जा सकेगा। श्रीमद्भागवते दशम स्कंधे वर्तत ब्रह्मण विप्रो राजन्यो रक्षया भुव:।। वैश्यस्तुवतिया जलायनम।। दान भीश्वर भावच्श्र क्षात्रं कर्मस्वभाव जान्। मेरे मन में काफी बचपने से ही यादव समाज के इस रौताही राउत नाचा को देखकर संगठन के बारे में लोकमान्य तिलक डॉ. हेडगेवार महात्मा गांधी जी के अहिंसात्मक आंदोलन याद आता रहा है। यह समाज किसी भी तरह आज भी अहिंसक भावना से ओतप्रोत समाज के सभी वर्ग को साथ लेकर यह कार्य प्रारंभ से आतंक अत्याचार शोपण अनाचार गुलामी के प्रति चेतावनी ही था तो इनके गरीबी अशिक्षा एवं समझ के ऐसे बड़े वर्ग जो आज भी इनके माध्यम से अपनी रोटी सेंक रहे हैं पुन: समाज उत्थान के प्रति अपनी शुभकामना प्रेषित करते हुए सबसे अधिक भाई डॉ. मंतराम यादव जिनके ऊपर मेरा पुत्रवत स्नेह हमेशा ही रहा है। लगातार हमें हमेशा ही इन विषयों पर मेरा ध्यान दिलाते रहे तथा इस पर कुछ अपना विचार लिखने हेतु पे्ररित करते रहे।
मैंने जो कुछ भी अपनी टूटी फूटी भाषा एवं अपने अल्प ज्ञान के द्वारा इस लेख में लिपिबद्ध किया है विद्वानों से क्षमा याचना करते हुए आशा करुंगा कि इसमें वर्णित कमजोरी चाहे वह शाब्दिक हो भावनात्मक हो मेरे जिम्मे छोड़कर सार ग्रहण कर यादव समाज की उन्नति संगठन पर अपना ध्यान लगाकर छत्तीसगढ़ के अमूल्य सामाजिक विधि को हर बुराइयों से दूर कर विकसित कर नया रूप लाकर आदर्श प्रस्तुत करेंगे।
 साभार- रऊताही 1995

पारंपरिक राऊत नाच कार्यक्रम में अखरा का योगदान

छत्तीसगढ़ अंचल के राऊत नाच कार्यक्रम के उद्भव के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित किया जावे तो इसके प्रत्युत्तर में यही कहना होगा कि राऊत नाच कार्यक्रम उतना ही प्राचीन है जितना कि राऊत जाति (छत्तीसगढ़ी यदुवंशी) के लोगों का छत्तीसगढ़ के पावन धरा पर अवतरण होना। रायपुर अंचल में मड़ई कार्यक्रम दीपावली के समय हो अथवा बिलासपुर अंचल में प्रबोधनी एकादशी (जेठौनी या देवोत्थानी) राऊत नाच कार्यक्रम हो। दोनों अवसरों के आयोजनों पर छत्तीसगढ़ के ग्रामों की छटा देखते ही बनती है। गोलबद्ध राऊत नर्तकों की नाट्य शैली तथा नाट्यकला तथा गड़वा बाजा के वाद्यकों की वाद्यकला से गांव-गांव शहर-शहर उद्वेलित हो उठता है। छत्तीसगढ़ का राऊत नाच महा उत्सव रुप वास्तव में साकार महोत्सव बनकर ग्राम के वीथिनों में शहर की गलियों में धूम धड़ाका बाजा गाजा तथा साज श्रृंगार के साथ गुंजायमान हो उठता है। राऊत नाच का अनुगूंज एक पखवाड़े तक ग्राम-ग्राम नगर शहर श्रवण गोचर होते रहता है। श्रावकों तथा दर्शकों के मन में भी हर्ष, उल्लास एवं आनन्द की हिलोरे लेने लगती है। उनका मन गद्गद् हो उठता है तथा उनका मन वाद्यों की नाद से निनादित होते हुए पुलकायमान हो उठता है प्रफुल्लित मन के कारण उनके शरीर में रोमहर्ष उत्पन्न हो जाते हैं।
परम्परागत राऊत नाच कार्यक्रम कई सोपानों से गुजरता है। यदि सोपानों को वर्गीकृत किया जावे तो इस कार्यक्रम के मात्र दो सोपान हैं - (1) पूर्व सोपान (2) उत्तर सोपान। पूर्व सोपान राऊत नाच कार्यक्रम में क्रियान्वयन के पूर्व होता है। उत्तर सोपान राऊत नाच कार्यक्रम के समय घटित होते जाता है। राऊत नाच कार्यक्रम के पूर्व सोपान में मात्र अखरा सोपान होता है जो सभी सोपानों का जन्मदाता है जबकि उत्तर सोपानों में क्रमश: (1) देवाला (2) सुहई (3) सुखधना (4) काछन (5) गोवर्धन पूजा (6) राऊत नाच (7)आशीष वचन (8) मड़ई (9) मातर (10) बाजार परिभ्रमण आते हैं। इसमें देवाला स्थायी सोपान है। जो राऊतों के निवास गृह के भीतरी कक्ष (जिसे भीतर कहते हैं) के दीवाल के पास स्थित होता है। प्रस्तुत आलेख में राऊत नाच कार्यक्रम के पूर्व सोपान अखरा का उल्लेख किया जा रहा है। अखरा शब्द से दो भाव प्रकट होते हैं - 1. शक्ति देवी के रुप में अक्षर 2. प्रशिक्षण शाला के रुप में अखाड़ा।
अखरा- यह राऊत कार्यक्रम का प्रारंभिक सोपान है। वास्तव में पूर्व सोपान है। पूर्व सोपान का तात्पर्य कार्यक्रम क्रियान्वयन के पूर्व घटित होने वाला सोपान अखरा वास्तव में उत्तर सोपानों का उद्गम स्थल है। वास्तव में राऊत नाच का क्रियान्वयन अखरा में प्रतिदिन होता है किन्तु यह परोक्ष रुप से होता है तथा इसमें सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं होता है अखरा कार्यक्रम के समापन के पश्चात राऊत नाच कार्यक्रम का सार्वजनिक प्रदर्शन प्रत्यक्ष रुप से होता है।
यदि अखरा को राऊत नाच कार्यक्रम की पाठशाला से संबोधित किया जावे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी यह राऊतों का व्यवहारिक प्रयोगशाला भी है। यह रंगमंच भी है और व्यायाम शाला भी है। वास्तव में यह राऊत नाच कार्यक्रम का प्रशिक्षण केन्द्र ही है। यही यादवों का योगासन की योगस्थली है। यह नाट्य शाला भी है और कृत्रिम युद्ध स्थली है जहां युद्ध कला का व्यवहारिक ज्ञान कराया जाता है।
अखरा की स्थापना- विजयादशमी (दशहरा) के दिन ही अखरा देवी की स्थापना की जाती है विजय के प्रतीक विजयादशमी को ग्राम हो या शहर के सभी लोग उल्लासित होकर इस पावन पर्व को मनाते हैं यादव बंधु भी ग्राम में ग्रामीणों के साथ अथवा नगर में नगरजनों के साथ पर्व मनाने में सहभागी बनते है। अन्य बहादुर जातियों की भांति यादव बन्धु भी अपने घरों में शस्त्र पूजन तथा शक्ति पूजन करते हैं। सर्वप्रथम यादव बन्धु अपने निवास स्थान भीतरी कक्ष (जिसे छत्तीसगढ़ में भीतर कहते हैं) स्थित शक्ति के केन्द्र स्थल देवाला में शस्त्र पूजन करते हैं और ग्राम के इष्ट मित्रों से मिलते है। दशहरा का पर्व मनाने के समापन के पश्चात रात्रि को संभवत नव बजे ग्राम के सभी यादव एक स्थान पर एकत्र होते हैं जहां ग्राम का दैहान (गायों के एकत्र होने का स्थान) होता है इस दैहान में एक स्थान का चयन करते हैं। चयनित स्थान के आसपास की सफाई करते हैं। इस चुने हुए स्थान के एक भाग में लकड़ी का छोटा खम्भा गड़ाते हैं जो सेमल या तेन्दू की लकड़ी होती है। तेन्दू या सेमल की कांटेदार लकड़ी होने की अनिवार्यता नहीं है किन्तु उक्त लकडिय़ों को प्राथमिकता अवश्य प्रदान करते हैं कहीं-कहीं गाय कोठे की लकड़ी को ही गड़ा देते हैं। इस लकड़ी को खोड़हर या खड़हर कहते हैं। इसी लकड़ी पर सिंदूर (बंदन या कुमकुम) लगाते हैं कहीं-कहीं चुडिय़ां  या फुंदरी डालते हैं।
खोड़हर में चूड़ी काले रंग को तथा फुंदरी में लाल रंग को प्राथमिकता प्रदान करते हैं कहीं-कहीं खोड़हर के पास एक परई (मिट्टी के घड़े का एक्कन)में ऊँ (ओम) त्रिशूल एवं स्वास्तिक के चिन्हों को सिंदूर (बंदन) से चित्रांकन करते हैं। इस प्रकार खोड़हर गड़ाकर अखरा देवी की स्थापना की जाती है और धार्मिक विधि विधान से पूजा करते हैं। पूजा के लिए दीप प्रज्जवलन, होम, धूप, नैवेत्र, गुड़ अक्षत अगरबत्ती आदि का उपयोग करते हैं और नारियल फोड़ते हैं। नारियल फोडऩे का काम केवल अखरा देवी की प्रतिष्ठा के समय अथवा विसर्जन के समय करते हैं। अखरा देवी के खोड़हर में कहीं-कहीं सेमल की कंटीली लाठी या तेन्दू लकड़ी भी टांगते हैं। इस लाठी में भी थोड़ा सा बंदन लगाते है।
वास्तव में अखरा देवी की स्थापना के लिए एक लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। इस लकड़ी को खोड़हर या खड़हर कहते हैं। इस लकड़ी को एक स्थान पर गड़ाते हैं। यह लकड़ी तेन्दू की लाठी हो या सेमल की कांटेदार लकड़ी हो अथवा गाय कोठे की लकड़ी का खूंटा हो। इसे एक निर्धारित स्थान पर अवश्य गाड़ा जाता है। जिस प्रकार मंदिर में पत्थर की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा किया जाता है उसी प्रकार लकड़ी के खोड़हर अथवा खड़हर नाम दिया जाता है और लकड़ी को एक स्थान पर गड़ा दिया जाता है। गाडऩे के बाद उस लकड़ी को संस्कारित किया जाता है और अखरा देवी को संस्कारित रूप से प्रतिस्थापित संस्कारित करने के लिए लकड़ी पर बंदन, सिंदूर तथा कुमकुम चूड़ी तथा फूंदरी का प्रयोग करते है। संस्कारित खोड़हर में ही अखरा की स्थापना की जाती है। फिर विधि विधान से पूजा की जाती है। खोड़हर या खड़हर स्थित शक्ति ही अखरा है। अखरा देवी की पूजा के लिए किसी पुरोहित या बैगा की आवश्यकता नहीं पड़ती। यादवों के बीच कोई वरिष्ठ व्यक्ति ही अखरा देवी की पूजा करते है। अखरा पूजा में केवल यादव गण भाग लेते हैं अखरा स्थापना के समय यादव बंधु गण अपने हथियार अखरा के पास रख देते हैं और प्रत्येक व्यक्ति बारी-बारी से पूजा करते हैं। अखरा स्थापित होने के बाद पूजा करने की पद्धति व्यक्ति की भावना पर आधारित होता है। कोई  पूजा केवल हाथ जोड़कर करता है तो कोई होम दीप फूलमाला आदि के द्वारा करता है। प्रथम दिवस ही ओम पद्धति से पूजा किया जाता है अन्य दिन प्राय: हाथ जोड़कर पूजा करते हैं और पूजा करने के पहले अपने हथियार अखरा में रख देते हैं और पूजा करने के पश्चात हथियार उठा लेते हैं।
दूसरे दिन से कोई भी यादव आकर पूजा कर सकता है वरिष्ठ होने की परम्परा नहीं है। प्रशिक्षक अथवा प्रशिक्षार्थी दोनों ही पहले हथियार अखरा में रखते हैं और बाद में सिखने और सिखाने का कार्य करते हैं।
आजकल दैहान में अतिक्रमण की बाढ़ आई हुई है। दैहान स्थल बदल रहे हैं। उसी प्रकार अखरा का स्थान बदल जाता है किसी निरापद स्थान पर ही अखरा की स्थापना की जाती है। आजकल अखरा स्थापना का प्रचलन कम होते जा रहा है और नहीं के बराबर हो गया है। अखरा वास्तव में पांडवों के समान गांवों के बाहर एक सभी वृक्ष पर अस्त्र-शस्त्र टांगने की याद दिलाता है।
खोंड़हर या खड़हर एक स्तंभ है जहां यादव लोग अपने अस्त्र-शस्त्र रखकर पूजा करते हैं और सीखने का प्रयोग पूजा के बाद करते हैं। अन्य जातियों के लिए यहां प्रयोग निषिद्ध है।
अखरा पूजन- अखरा स्थापना के समय खोंड़हर (खड़हर) में यदुवंशी अपने अस्त्र-शस्त्र रखकर शक्ति के केन्द्र अखरा देवी की पूजा करते हैं। यही  अखरा पूजा है। अखरा पूजा करने के कार्य को अखरा पूजन कहलाता है। सर्व प्रथम दशहरा के दिन अखरा देवी की स्थापना कर अखरा पूजन का कार्य संपन्न कराया जाता है और प्रशिक्षण का कार्य प्रारंभ किया जाता है। प्रतिदिन प्रत्येक यादव अखरा पूजा अवश्य करता है। सर्वप्रथम लाठी भाला फरसा गदा आदि अस्त्र-शस्त्र को अखरा में रख देते हैं और अखरा पूजा का कार्य करते हैं। अखरा पूजन के पश्चात प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। योग क्रिया अर्थात योगासन करने वाले मात्र अखरा पूजन का कार्य करते हैं। उसी प्रकार व्यायाम करने वाले मात्र अखरा पूजन करते हैं अस्त्र चालन शस्त्र चालन अथवा लाठी चालन करने प्रारंभ में अखरा पूजा अवश्य करते हैं और बाद में अस्त्र-शस्त्र चालन कार्य करते हैं। अखरा पूजन करना प्रशिक्षार्थी तथा प्रशिक्षक का परम कत्र्तव्य है।
अखरा क्षेत्र का सीमांकन- जिस प्रकार अखरा की स्थापना करना आवश्यक है। इसी प्रकार अखरा क्षेत्र का सीमांकन करना आवश्यक है। अखरा में स्थित स्थान से दूर चारों दिशाओं में चार पत्थर गाड़ देते हैं अथवा चारों दिशाओं के प्रतिनिधित्व करने वाले स्थान में मिट्टी के चार छोटे चौरे बनाते हैं। ये चारों चौरे छोटे होते हैं इनकी आकृति गोलाकार, वर्गाकार या आयताकार हो सकती है। प्रत्येक चौरा या पत्थर अखरा से चारों दिशाओं में समान दूरी पर स्थित होते है। सीमांकन करने में पत्थर अथवा चौरा का वही उपयोग है जो प्राय: पटवारी लोग किसी जमीन का सीमांकन करने में पत्थर अथवा चौरा उतने ही दूर पर स्थित होते हैं जिससे कि प्रशिक्षक तथा प्रशिक्षार्थी के प्रशिक्षण कार्य में अवरोध उत्पन्न न हो। प्रत्येक पत्थर अखरा से चारों दिशाओं में समान दूरी पर स्थित होते हैं। अखरा मध्य बिंदु पर स्थित होता है प्रत्येक पत्थर अखरा क्षेत्र के अंतिम स्थान पर स्थित होते हैं अर्थात् ये पत्थर प्रत्येक दिशा में अखरा सीमा क्षेत्र का अंतिम स्थान होता है। 
    इस चित्र को ध्यान से देखें तो यह प्रतीत होता है कि अखरा मध्य बिंदु पर स्थित है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशा में अखरा से दूर चार बिंदु स्थित है। इन चारों बिंदुओं को आपस में मिलाते नहीं है किन्तु यह मान लिया जाता है कि यही अखरा का सीमा क्षेत्र है। स्पष्ट प्रतीत होता है कि अखरा मध्य बिंदु है तथा चारों दिशाओं स्थित बिंदु दिशाओं के अंतिम सीमा  को प्रकट करते हैं। यही अखरा का सीमांकन क्षेत्र है इन्हीं पत्थरों की स्थिति के अनुसार अखरा क्षेत्र का सीमाबद्ध किया जाता है। तात्पर्य प्रशिक्षक तथा प्रशिक्षार्थी को इतनी सुविधा अवश्य होनी चाहिए जिससे वे अपना अभ्यास कार्य सुचारू रूप से सुगमता पूर्वक कर सके।
आजकल अखरा का सीमांकन करना सरल है किन्तु आज से एक शताब्दी पूर्व अखरा का सीमा क्षेत्र का निर्माण करना कठिन कार्य था। एक शताब्दी पूर्व छत्तीसगढ़ वनों से आच्छादित था। गांव के प्रारंभ से ही वन क्षेत्र स्थित था। वनों में पेड़ पौधे तथा झाडिय़ों को काटकर साफ करना पड़ता था। लोग अखरा स्थापना के पहले ये देखते थे कि अखरा क्षेत्र का स्थान गांव से कितनी दूरी पर स्थित है वह स्थान निरापद है कि नहीं। प्रशिक्षण स्थान पर वन्य जीवों द्वारा आक्रमण तो नहीं किया जाता हो अखरा निर्माण वास्तव में यह बोध कराता है कि पशुपालकों को अथवा चरवाहों को हिंसक वन्य जीवों से अपनी तथा अपने पशुओं की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता था। इसके लिए आवश्यक था कि वह अकेला ही बहादुर बने। हिंसक पशुओं से वह अपने अस्तित्व की रक्षा करे तथा पालतू पशुओं का कोई हानि न पहुंचाये। कोई दूसरे लोग भी उनके पशुओं को चुराये भी नहीं और मार भी न डाले। पशुओं की सुरक्षा तथा अपने अस्तित्व की रक्षा का दायित्व वह स्वयं उठाता था। वास्तव में अस्त्र-शस्त्र चालन की परम्परा उसे विरासत में मिला है अखरा में सामूहिक प्रशिक्षण होता है। समूह में रहने की परम्परा भी उसे विरासत में मिला है।
वास्तव में अखरा का सीमांकन करना अतीत में बहादुरी का परिचायक था। अखरा का सीमा क्षेत्र आवश्यकतानुसार निर्धारित किया जाता है। ग्राम के यादव बन्धुओं के सीखने वाले व्यक्तियों के अनुसार होता है। अखरा से पत्थरों की दूरी 50 फीट हो सकती है, 50 गज भी हो सकती है, 20 फीट हो सकती है वास्तव में स्थान की उपलब्धता तथा यादव प्रशिक्षार्थी की संख्या के आधार पर सीमांकन किया जाता है।
अखरा या अखाड़े के रुप में प्रयुक्त होना- अखरा शब्द अखाड़ा का अशुद्ध रुप है। अखाड़ा शब्द के दो अर्थ होते हैं (1) व्यायाम शाला (2) संतों का समागम स्थल। वास्तव में अखरा में ये दोनों रुप समाहित है। अत: अखरा का सार्थक भाव हुआ वह सम्मेलन स्थल जहां लोगों को ज्ञान उपलब्ध कराये तथा शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाये। यदि राऊत नाच कार्यक्रम से इसकी तारतम्यता जोड़े तो अखरा शब्द का भाव हुआ वह सम्मेलन स्थल जहां राऊत नाच के विविध पक्षों का ज्ञान उपलब्ध कराये तथा उन्हें दक्ष तथा समर्थ बनाये। वस्तुत: अखरा में राऊत नाच के विविध पक्षों का कार्यात्मक ज्ञान उपलब्ध कराया जाता है। अखरा प्रयोगात्मक प्रयोग शाला है। यह व्यवहारिक प्रशिक्षण शाला है।
कोई भी प्रशिक्षण के लिए एक गुरु की आवश्यकता होती है जो अनुभवी हो। यादवों की मान्यता के अनुसार गुरु बैताल अखरा के गुरु हैं। इनके बहुत से दोहों से यह जानकारी प्राप्त होती है कि गुरु बैताल इनके आदि गुरु थे-
जय गुरु रे जय गोर्रेया अखरा के गुरु बैताल।
चौसठ जोगिनी पूरखा के, बैहा म करै सहाय।।
पहले देवी मैं तोला सुमिरों, अखरा के गुरु बैताल।
चौसठ जोगिनी पुरखा के, बैंहा म करे सहाय।
रतनपुर के महामाया सुमिरो, अखरा के गुरु बैताल।
चौसठ जोगिनी पुरखा के, बैहा म होय सहाय।
उपरोक्त दोहे का अवलोकन करें तो अखरा के गुरु बैताल है। गुरु बैताल ये वैदिक ऋषि थे। वेद यथार्थ ज्ञान का बोध कराता है। बैताल ऋग्वेद के अनुयायी थे। ऋग्वेद आदि वेद है। ऋग्वेद में प्राकृतिक शक्तियों का देवतुल्य वर्णन है। गुरु बैताल का वर्णन श्रीमद भागवत तथा विष्णुपराण में मिलता है। विष्णु पुराण के स्कंध 3 अध्याय 4 में उल्लेख मिलता है । इसी प्रकार श्रीमदभागवत के स्कंध 12 अध्याय 6 में बैताल का वर्णन आया है।
अखरा में एक कुशल एवं अनुभवी व्यक्ति सिखाने का कार्य करते है। अखरा में पूर्वाभ्यास भी कराया जाता है और पुनराभ्यास भी कराया जाता है। यहां विविध कलाओं का ज्ञान कराया जाता है। यहां राऊत नाच कार्यक्रम के समस्त जानकारी का बोध कराया जाता है ताकि प्रदर्शन ठीक से किया जा सके इसमें सुहई के दोहे, काछन के दोहे, आशीष वचन के दोहे आदि की जानकारी भी दी जाती है। इसमें योगासन का भी ज्ञान कराया जाता है। शारीरिक शिक्षण भी दिया जाता है। गणवेश धारण भी की शिक्षा दी जाती है अखरा वास्तव में राऊत नाच कार्यक्रम की कर्मशाला है।
1. अखरा व्यायाम शाला के रुप में- यादव लोगों को बहादुर होना आवश्यक है क्योंकि गोचारण में उसे हिंसक पशुओं से अपने स्वयं की तथा अपने पशुओं की सुरक्षा करनी पड़ती है। विघ्न संतोषी लोग भी उसे बैर रखते हैं यद्यपि यादव स्वयं निश्छल होता है किन्तु सामंत प्रवृत्ति के लोग इन्हें परस्पर लड़ाने कीकोशिश करते हैं। अत: अपनी सुरक्षा के लिए इन्हें सचेत होना पड़ता है। यद्यपि आजकल ये संगठित हो रहे हैं जो शुभ सूचक है तथापित इन्हें बहादुर होना आवश्यक है अपनी शारीरिक सौष्ठव बनाने के लिए शारीरिक शिक्षण लेना आवश्यक है। इसके लिए विभिन्न दंड बैठक करते हैं। मल्लयुद्ध  की शिक्षा लेते है। कृत्रिम गदायुद्ध की शिक्षा लेते हैं। गदा चालन, लाठी चालन, तलवार चालन, विद्या गुरु चालन, अस्त्र-शस्त्र चालन भाला फेंक परशु (फरसा) चालन, आदि की शिक्षा अखरा में मिलती है। विभिन्न प्रकार के खेल जैसे कबड्डी , नूनपाल, गुलेलबाजी आदि की शिक्षा दी जाती है। तात्पर्य शारीरिक सुरक्षा संबंधी सभी विद्याओं की जानकारी मिलती है। आक्रमण तथा सुरक्षा दोनों तरह की शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है। इसके लिए कृत्रिम युद्ध द्वारा अभ्यास कराया जाता है।
2. अखरा रंगमंच के रूप में- अखरा में राऊत नाच का प्रत्यक्ष कर्माभ्यास कराया जाता है। विभिन्न भाव भंगिमाओं की जानकारी दी जाती है। श्रृंगार करना तथा गणवेश धारण करना अखरा में सिखाया जाता है इससे मुखौटा बनाकर प्रदर्शन करने की कला का अभ्यास कराया जाता है। चेहरे आंख में लेपन कराने की जानकारी दी जाती है। प्रत्येक कला के प्रदर्शन का अवसर प्रदान किया जाता है। नाटक मंडली अथवा लीला मंडली में जिस प्रकार सजधज कर अभ्यास करना सिखाया  जाता है उसी प्रकार अखरा में भी राऊत नाच प्रदर्शन की जानकारी दी जाती है। अत: अखरा एक रंगमंच भी है।
3. अखरा एक योग शाला के रुप में- इसमें योगासन की जानकारी दी जाती है तथा योगाभ्यास कराया जाता है। इसमें यह सीख दी जाती है कि शरीर को निरोग कैसे बनाया जाये। इसमें कई प्रकार की योग की शिक्षा दी जाती है अत: अखरा एक योगशाला भी है जिसमें विभिन्न प्रकार की शिक्षा दी जाती है।
4. अखरा एक नाट्यशाला के रुप में-चूंकि राऊत नाच कार्यक्रम एक नृत्य का कार्यक्रम है अत: अखरा में यह शिक्षा दी जाती है कि राऊत नाच को कैसे आकर्षक एवं कलात्मक किस प्रकार बनाया जाये। राऊत नाच के विभिन्न शैलियों का इसमें अभ्यास कराया जाता है, इसमें कई प्रकार का स्थानीय नाच भी सिखाया जाता है जैसे राऊत नाच के साथ सुआनाच, डंडानाच आदि भी सिखाया जाता है। अत: नाट्य शाला के रुप में व्यवहरित होता है।
5. अखरा रणक्षेत्र में रुप में- यहां युद्ध कला का अभ्यास कराया जाता है। यहां अस्त्र-शस्त्र संचालन करने की शिक्षा दी जाती है। वास्तव में अखरा का प्रयोग कृत्रिम युद्ध क्षेत्र के रुप में किया जाता है। जहां आक्रमण तथा रक्षा की शिक्षा दी जाती है।
6. अखरा कवि सम्मेलन के रूप में-
चूंकि राऊत नाच कार्यक्रम में बीच-बीच में दोहा पारने की प्रथा है। अत: राऊत नाच सीखने वालों को दोहा पारने का अभ्यास कराया जाता है जो नीति के दोहे, वीरता के दोहे, कबीर के दोहे, रहीम तथा तुलसी के दोहे मलकूदास पद्यमावत आल्हा, महाभारत आदि के दोहे होते है। अखरा में कवि सम्मेलन की तरह कविता की जाती है। कभी-कभी स्वरचित दोहे बोलना सिखाते है। अखरा में आशुकवियों की बाहुलता होती है। चूंकि राऊत नाच में एक साथ नृत्य वाद्य एवं संगीत का स्वर सुनाई देता है अत: नर्तकों को दोहा अभ्यास कराना आवश्यक रुप से सिखया जाता है। अत: अखरा एक छोटा बड़ा कवि सम्मेलन है।
7. प्रशिक्षण शाला के रुप में अखरा- वास्तव में यह व्यवहारिक प्रयोगशाला है जिससे राऊत नाच कार्यक्रम से संबंधित सभी प्रकार की शिक्षा दी जाती है। इसमें अपरिपव व्यक्ति को परिपक्व बनाने की शिक्षा दी जाती है। अखरा के माध्यम से न केवल राऊत नाच सीखता है अपितु विभिन्न प्रकार के व्यायाम योगासन साहित्य नाटक नाच आदि अपने आप सीखता है। यद्यपि छोटा बालक एक ही वर्ष में नहीं सीखता किन्तु दीर्घ अंतराल के बाद धीरे-धीरे जीवन के व्यवहार सीख लेता है।
8. पाठशाला के रुप में- इसमें छोटे-छोटे बच्चों को भी राऊत नाच की शिक्षा दी जाती है। नाच के माध्यम से बालक कई प्रकार की शिक्षा सहज ही सीख लेता है। व्यायाम, योग आदि से निरोग होने की कला तथा आत्म सुरक्षा की भावना बालकों में विकसित होती है। समूह में रहने की भावना भी उनमें विकसित होती है। इसके माध्यम से बच्चों का व्यक्तित्व विकास भी होता है।
9. कर्मशाला के रुप में अखरा- इसमें राऊत नाच का व्यवहारिक ज्ञान कराया जाता है। अखरा में प्रत्यक्ष कर्माभ्यास के माध्यम से कई बातों की जानकारी प्राप्त होती है। कई अनुभवी व्यक्तियों के माध्यम से उनके विचारों में सामंजस्य होता है और कई नई बातों का बोध होता है उनकी कला में निखार आता है। कला को आकर्षक बनाया जाता है। प्रतिवर्ष प्रदर्शन को लोग देखकर नयी बातें सीखते और अखरा में नया प्रयोग करते है ताकि राऊत नाच में कलात्मक सुधार आये। परम्परागत साधन में नवीनता आती है। नवीनता तथा परम्परागत शैली में बदलाव लाकर उसको नया बनाया जाता है। जैसे दुर्ग, राजनांदगांव, रायपुर आदि से आने वाले गोलों को देखकर बिलासपुर वाले भी नए प्रयोग करते है। नए प्रयोग अखरा के माध्यम से होता है।
10. प्रयोगशाला के रुप में अखरा-
अखरा में व्यवहारिक ज्ञान कराया जाता है। इसमें सैद्धांतिक का कोई औचित्य नहीं। जो बात देखते सीखते हैं वह प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित है। अनुभूति के प्रयोग करने के बाद ही राऊत नाच का सार्वजनिक प्रदर्शन होता है।
अखरा का शक्ति देवी के रुप में प्रयुक्त होना
अखरा शब्द  'अक्षराÓ का अपभ्रंश है। अक्षरा  'अक्षर ब्रह्मÓ की शकित है। प्रथम (ú) को अक्षर कहते हैं। अक्षर की शक्ति का नाम अक्षरा है। जो शक्ति अक्षर में स्थित हो उसे अक्षरा कहते हैं। इसे देवी प्रणव (ú) भी कहते हैं।
अखरा शब्द का विन्यास-
अखरा छत्तीसगढ़ शब्द है। अखरा शब्द संस्कृत के अक्षरा शब्द का मूलत: तद्भव रूप है अक्षरा अक्षर शब्द का स्त्रीलिंग तद्धित रुप है अक्षर का स्त्रीलिंग रुप अक्षरा है। ú (ओम) को अक्षर कहते हैं। इसे प्रणव भी कहते हैं। यह प्रत्येक प्राणी के घट-घट में व्याप्त है तथा प्रत्येक वस्तुत के कण-कण में व्याप्त है। अत: अक्षर सर्वव्यापी ब्रह्म है। इसका रूप निराकार है। निराकार होते हुए भी प्रत्येक छोटे कण को पर्वत बना सकता है तथा पर्वत को धूल बना सकता है। अत: सर्वशक्तिमान भी इसे कहा जाता है। अक्षर अव्यक्त ब्रह्मा है क्योंकि नतो उसका उद्भव होता है और न तो इसका विनाश होता है। सर्वज्ञ सर्वव्यापकता तथा सर्वशक्तिशाली होते हुए भी यह शांत रहता है अत: इसे सच्चिदानंद कहा जाता है। उस अक्षर को आंकार कहा जाता है  अ, उ, म ये तीन मात्रा स्थित होते हैं।
अक्षर ब्रह्म की शक्ति का नाम है अक्षरा। अक्षरा दो शब्द से मिलकर बना है अ+क्षरा अ का अर्थ होता है नहीं तथा क्षरा का अर्थ है नाश होने वाली। अत: अक्षरा का शाब्दिक भाव हुआ नाश होने वाली नहीं हो अर्थात अविनाशी शक्ति अक्षरा का पूर्ण भाव हुआ जिस शक्ति का नाश न होवे वही अक्षरा है। दूसरे रुप में अक्षर में स्थित शक्ति अक्षरा है जो गुण अक्षर में है वही गुण अक्षरा में है। अक्षर सर्वव्याप्त तो अक्षरा सर्वव्याप्ता है। अक्षर शक्तिमान है तो अक्षरा शक्तिमती है। अक्षर सर्वज्ञ है तो अक्षरा सर्वज्ञा है। अक्षर निराकार है तो अक्षरा निराकार शक्ति है अक्षर अव्यक्त है तो अक्षरा अव्यक्तता या अव्यक्त शक्ति अक्षर सच्चिदानंद है तो अक्षरा सचिदानन्द स्वरुप शक्ति है। अक्षर सत् है तो अक्षरा सत्ता, अक्षर चित्त है तो अक्षरा चिण्मय शक्ति, अक्षर आनंद है तो अक्षरा आनन्दायिनी शक्ति आनंद स्वरुपा है, यदि अक्षर निराकार ब्रह्म है तो अक्षरा निराकार ब्रह्म की शक्ति। यदि अक्षर ब्रह्म है तो अक्षरा उसकी ब्रह्म शक्ति। यदि अक्षर अविनाशी ब्रह्म है तो अक्षरा अविनाशी शक्ति यदि अक्षर ओंकार है तो अक्षरा ओंकार स्वरुपा शक्ति। यदि अक्षर ú  है तो अक्षरा úस्वरुपा शक्ति है। यदि अक्षर ú में अ उ म स्थित है तो अक्षरा ú में अ उ म शक्ति रूप  में स्थित है।  अक्षरा को देवी शक्ति के रूप में निम्नानुसार उल्लेख किया जा सकता है-
1. देवी प्रणव के रूप में
इसे अक्षरा नाम देवी प्रणव (ú) के रुप में किया जाता है क्योंकि ú (अक्षर या प्रणव) की यह शक्ति रूप है।
2. देवी शक्ति के एकाएक रूप में
यह समस्त देवी शक्ति के निराकार अव्यक्त रूप है। व्यक्त रूप में यह दुर्गा है।
3. ज्ञान शक्ति के रूप में-
अक्षर के बोध कराने वाली शक्ति को ज्ञान अथवा बोध शक्ति कहते है। बोध कराने वाली शक्ति अक्षरा है। अक्षर के देवी अक्षरा है। अक्षरा नाम सरस्वती का है। अक्षरा इसका निराकार है।
दुर्गा सप्तमी के प्रथम अध्याय में अक्षरा का वर्णन श्लोक 74 में  है-
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।
अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषत:।।
तात्पर्य- हे नित्य अक्षरा तुम्हें सुभा अर्थात जीवन दायिनी हो। तुम्हीं (प्रणव में) आकार, उकार, मकार इन तीन मात्राओं के रुप में प्रतिष्ठित हो जो बिन्दुरुपा नित्य अर्धमात्रा है जो विशेषरुप से अनुच्चारणीय है वह भी तुम ही हो।
अक्षर अनादि है तो अक्षरा अनादि शक्ति है अक्षर निर्विकार है तो अक्षरा निर्विकार शक्ति है। अक्षर के प्रत्येक महिमा में अक्षरा का रुप हमें मिलता है। वास्तव में ब्रह्म की सक्रिय अवस्था अर्थात क्रिया की उसकी शक्ति अक्षरा है। जड़ में अक्षर (ब्रह्म) स्थित है तो अक्षरा उसकी जड़ता है। यदि चेतन में ब्रह्म स्थित है तो चेतना ही अक्षरा है यदि विश्व में जड़ और चेतन का अस्तित्व है तो अस्तित्व होने की शक्ति अक्षरा है। यदि अक्षरा अव्यक्त ब्रह्म है तो अक्षरा उसकी अव्यक्त शक्ति है।
गीता में अव्यक्त शक्ति के दो प्रकार है। अपराशक्ति (मूल प्रकृति) तथा पराशक्ति (चेतन शक्ति) है। अक्षर को अज कहते हैं अज ही उसकी शक्ति अक्षरा है। माण्डूवय उपनिषद में अक्षर ú की चार अवस्थाएं हैं। आकार जागरित अवस्था का सूचक है। उकार स्वप्न अवस्था का संकेत देता है मकार सुसुप्त अवस्था का बोधक है अर्धमात्रा तुरीय अवस्था को प्रदर्शित करता है अक्षरा चारों अवस्थाओं की
समन्वित शक्ति हुई।
जब अक्षर ईश्वर है अक्षर ईश्वरी शक्ति है इसे ही माया, महामाया, योगमाया प्रकृति त्रिगुणमयी त्रिगुणी आद्या आदिशक्ति आदि महामाया परमेश्वरी मूल प्रकृति आद्यविद्या पराशक्ति शब्दशक्ति ज्ञानशक्ति, बोधशक्ति, इच्छाशक्ति, सत्ता परमसत्ता इत्यादि नामों से संबोधित किया जाता है।
व्यक्त रुप में इसे दुर्गा कहते हैं- दशहरा के पूर्व नवरात्रि पर्व आता है जिसमें दुर्गा के नवरुपों की पूजा की जाती है ये हैं- 1. शैलपुत्री 2. ब्रह्माचारिणी 3. चंद्रघटा 4. कुष्माण्डा 5.स्कंधमाता 6. कात्यायनी 7. कालरात्रि 8. महागौरी 9. सिद्धिदात्री
दुर्गा इनका एकाकार रूप है। दुर्गा  के नवरुपों को नवदुर्गा कहते हैं। अक्षरा का व्यकत रूप में प्रादुर्भाव होता है तब इसे शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा कहते हैं महादुर्गा भी कहा जाता है इसी को महालक्ष्मी कहते हैं। महालक्ष्मी के तीन रुप हैं 1. महालक्ष्मी 2. महाकाली 3. महारस्वती।
इन तीनों से लक्ष्मी काली और सरस्वती की उत्पत्ति होती है। दुर्गा को अनेकों नाम से संबोधित करते हैं जैसे चण्डिका चामुण्डा महामाया भगवती महाभगवती आदि। दुर्गा के 108 नाम है मातृशक्ति 7 है । तथा दुर्गा की उपशक्ति योगनी कहलाती है ये 64 है इसलिए इसे चौसठ जोगिनी कहते हैं। माता की अनेकों संख्या है। इनके दो रुप है 1. शिवा जो लोगों का हित चाहती है 2. अशिवा जो लोगों के लिए हितकर नहीं है।
नवरात्रि पर्व में अक्षरा को व्यक्त रुप दुर्गा को प्रदर्शित किया जाता है। दशहरा के दिन पुन: अपने मूलरूप में अक्षरा पुन: खोड़हर या खड़हर में प्रतिस्थापित हो जाती है।
खोड़हर शब्द का शब्द विन्यास- खोंड़हर छत्तीसगढ़ी शब्द है। यह वास्तव में संस्कृत के तीन शब्दों के मेल का अशुद्ध उच्चारण रुप है। खोड़हर में संस्कृत के तीन शब्द क्रमश: 'स्वÓ ओम अक्षर स्थित है। अत: खोंड़हर शब्द का विन्यास स्व+ओम+अक्षर हुआ। स्व का अर्थ है आकाश। ओम का अर्थ है ú=प्रणव । अक्षर का अर्थ है निराकार ब्रह्म। अत: खोड़हर का शाब्दिक अर्थ हुआ आकाश रुपी निराकार प्रणव रूप ब्रह्म खोड़हर का सरल अर्थ हुआ आकाश स्वरुप वाले निराकार ú(प्रणव) है।
वास्तव में खोड़हर निराकार प्रणव (ú) रुप अक्षर है। इसी निराकार ब्रह्म में अखरा स्थित है। अखरा अक्षरा का अपभ्रंश है अत: निराकार ब्रह्म ú (प्रणव) अक्षर में निवास करने वाली शक्ति अक्षरा है। वास्तव में छत्तीसगढ़ी यादव जहां बहादुर थे वहीं वे प्रारंभ से ज्ञानवान भी थे उनके पुकारने वाले शब्दों में अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। जहां अक्षर में उसकी अक्षरा स्थित है वहीं छत्तीसगढ़ी शब्द खोड़हर में अखरा देवी स्थित है। वास्तव में इसके विचित्र शब्द संयोग से बुद्धिमता झलकती है।
खड़हर शब्द का शब्द विन्यास-  खड़हर शब्द भी छत्तीसगढ़ी शब्द है। छत्तीसगढ़ी शब्दों में संस्कृत  के शब्दों का अशुद्ध उच्चारण होता है। इसे अपभ्रंश कहते हैं व्याकरण की भाषा में इसे तद्भव रुप कहते हैं। खड़हर शब्द भी संस्कृत के दो शब्द मिलकर बना है ख और अक्षर अत: खड़हर शब्द का विन्यास हुआ। ख+अक्षर ख का अर्थ है आकाश और अक्षर का अर्थ है निराकार ब्रह्म आकाश रुपी निराकार ब्रह्म प्रणव ú है इसे अक्षर भी कहा जाता है। अक्षर में स्थित शक्ति अक्षरा है। अखरा अक्षरा का अपभ्रंश है जहां अक्षर में स्थित शक्ति अक्षरा है। वहीं खड़हर में स्थित शक्ति अखरा है विचित्र संयोग इसमें भी दिखाई दे रहा है। जहां संस्कृत में अक्षर में स्थित शक्ति अक्षरा है वहीं खड़हर में स्थित शक्ति अखरा छत्तीसगढ़ी में दिखाई दे रही है।
खोंड़हर तथा खड़हर में तादात्मय - शब्द विन्यास करने में खोंड़हर और खड़हर के अर्थ में कोई भिन्नता नहीं दिखाई दिया। खोड़हर का शब्द विन्यास ख +ओम+ अक्षर है और खड़हर का शब्द विन्यास ख+अक्षर है। दोनों का समान अर्थ निराकार ब्रह्म प्रणव ú है। यदि खोंड़हर के शब्द विन्यास में ओम हटा ले तो खोंड़हर के अर्थ में कोई अंतर नहीं होता बल्कि खोड़हर खड़हर बन जाता है। खोंड़हर तथा खड़हर में स्थित शक्ति अखरा है।
खोंड़हर तथा खड़हर में विचित्र तादात्मय है। इनमें अखरा के सीमांकन में चार पत्थरों का औचित्य अखरा निर्माण के समय चार पत्थर गाड़े जाते हैं या चार चौरे  बनाये जाते हैं। इन चारों पत्थरों या चार चौरों में चार देवी शक्तियां निवास करती है। उत्तर दिशा में स्थित पत्थर में कौमारी (कुमार अर्थात् स्वामी कार्तिकेय की शक्ति) निवास करती है। दक्षिण दिशा में स्थित पत्थर में बाराही (बाराह की शक्ति) निवास करती है। पूर्व दिशा में स्थित पत्थर में ऐन्द्री (इन्द्र की शक्ति) निवास करती है तथा पश्चिम दिशा में स्थित पत्थर में वारुणि (वरुण शक्ति) निवास करती है।
ú (प्रणव) स्वास्तिक तथा त्रिशूल चिन्हों का औचित्य-
अखरा निर्माण के समय मिट्टी के घड़े के ढक्कन  में ú, स्वास्तिक तथा त्रिशूल के चिन्ह दिखाई देते हैं। (कहीं नहीं दिखाई देते हैं) इसका औचित्य  क्या है ? इसका उच्चारण ओम है अत: इसे ओंकार भी कहते हैं ú शांत है और इसकी शक्ति अक्षरा शांत स्वरुपा है। ú निर्विकार है किन्तु विकार शक्ति के कारण आता है सामावस्था में अक्षरा में तीन गुण विद्यमान होते हैं 1. सतोगुण 2. रजोगुण 3. तमोगुण।
सतोगुण प्रकाश आनन्द तथा अध्यात्म का प्रतीक है यह शांत रहता है। रजोगुण क्रिया का प्रवर्तक है। इसी के कारण गतिशीलता आदि है। स्वास्तिक चिन्ह रजोगुण प्रकट करता है यह गति तथा परिवर्तन प्रकट करता है। तोगुण उदासीन है तथा यह मोह उत्पन्न करता है। अक्षरा अर्थात निराकार देवी को व्यक्त किया जावे इसके तीन रुप प्रकट होते है। महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली जो क्रमश: सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण के प्रतीक हैं जो क्रमश: ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और इच्छाशक्ति का परिचायक है और उत्पत्ति स्थिति तथा लय के प्रतीक हैं।
त्रिशूल का अर्थ तीन प्रकार का कष्ट है। ये कष्ट आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक है। त्रिशूल यह दर्शाता है कि अपनी मर्यादा का उल्लंघन न किया जावे। सीमाओं के अतिक्रमण से शूल (पीड़ा) होगा। स्थिरता को प्रकट करता है त्रिशूल के तीन नोंक होते है। ये क्रमश: अक्षर (ú) के तीन व्यक्त रूप को दर्शाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जोउत्पत्ति स्थिति तथा लय के प्रतीक है। त्रिशूल अक्षरा (ú की शक्ति) के व्यक्त रूप को प्रकट करता है। त्रिशूल के तीनों नोंक महा सरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली को दर्शाते हैं। त्रिशूल के तीनों (नोंक) ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और इच्छाशक्ति को प्रकट करते हैं त्रिशूल के तीनों शूल सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण प्रकट करते है। त्रिशूल के तीनों शूल शक्तियों तथा गुणों के साम्यवस्था को प्रकट करती है वास्तव में ú चिन्ह सतोगुण को प्रकट करता है। स्वास्तिक रजोगुण को दर्शाता है तथा त्रिशूल तमोगुण को प्रकट करता है जो अवरोध अर्थात स्थिरता को दर्शाता है।
अक्षरा... अखरा... अखाड़ा छत्तीसगढ़ी शब्द अखरा शक्ति देवी के रुप अक्षरा तथा अखाड़ा की सार्थकता से प्रतिनिधित्व कर रहा है। अक्षरा से अखरा शब्द बना। अखरा से अखाड़ा बना छत्तीसगढ़ी यदुवंशी दोनों रुपों को एक साथ प्रतिनिधित्व दे रहे हैं। संस्कृत शब्द अक्षरा धीरे-धीरे अखाड़ा इस प्रकार बना अक्षरा अखरा अखाड़ा वस्तुत: अखरा शब्द मूलत: वैदिक शब्द अक्षर (ú) का स्त्रीवाचक शब्द अक्षरा (ú शक्ति प्रणव) का तद्भव रुप है। काछन के अधिकांश दोहों में अखरा आता है अखरा के साथ गुरु बैताल भी काछन के अधिकांश दोहों में आते ही हैं।
गुरु बैताल वैदिक ऋषि थे। ये ऋग्वेद के अनुयायी थे। वेद के अनुसार विश्व के निर्माण में चेतन तत्व का विशेष योगदान है। चेतन तत्व की परिकल्पना देव तत्व अथवा शक्ति के रुप में की गयी है जो जगत का संचालन करते हैं। जड़तत्व में भौतिक परिवर्तन होते हैं किन्तु संचालन शक्ति चेतन तत्व के हाथ में होती है। गुरु बैताल ने अक्षर (ú प्रणव) का प्रयोग देवतत्व के रुप में किया और बाद में अक्षरा (ú शक्ति प्रणव) के रुप में किया।
मातृ शक्ति के प्रयोग के साथ अक्षरा (शक्ति प्रणव) का प्रयोग बाहुल्यता से होने लगा वेदों के प्रचलन के साथ तंत्र का तांत्रिक प्रयोग होने लगा। तांत्रिक प्रयोग के प्रचलन के साथ अक्षरा शब्द अखरा में परिवर्तित हो गया। तंत्र के प्रयोग के साथ योग और व्यायाम का प्रचलन भी हुआ। यादव लोग के पूर्वज बैताल के अनुयायी थे जैसे कि अधिकांश मंत्र (दोहे) में चौसठ योगिनी पुरखा के अखरा के गुरु बैताल का प्रयोग होता है। वास्तव में अक्षरा का शक्ति तत्व के निराकार अव्यक्त रुप का प्रयोग है।
 साभार - रऊताही 1995

राउत नाचा : वीर वेश धारण कर नाचते हैं राउत

भारतीय ऋषि मुनियों ने प्रकृति का सूक्ष्मतम अध्ययन करने के बाद पूरे समाज के लिए बहुत वैज्ञानिक धरातल पर नियम बनाये थे ताकि मनुष्य समुदाय को प्रकृति के अनुकूल चलाते हुए उसे अधिकृत सुख-सुविधा दी जा सके तथा उपयोगी बनाया जा सके।
राजाओं के लिए भी इन नियमों का परिपालन आवश्यक था। युद्ध आदि कार्यों को समाप्त कर देवशयनी एकादशी से सारी शैन्य शक्ति को वापस राजधानी अथवा अपने राज्य सीमा में वापस आना अनिवार्य था आषाढ़ शुक्ल पक्ष की इस एकादशी से ही चतुर्मास आरंभ हो जाता है विवाह -शादी आदि सभी कार्यों में बंदिश लग जाती है युद्ध रूक जाते हैं और साधु सन्यासियों का प्रवास और यात्रा का क्रम भी रूक जाता है अगले चार माह वर्षा के होते हैं अतएव पथ चलने लायक नहीं रहते थे। साधु संत किसी एक ग्राम में रह कर ईश्वर भजन तथा उपदेश देने का कार्य करते थे। देवता और देवियों का यह शयनकाल है।
सेना से वापस आये सैनिक तथा अन्य लोग कृषि कार्यों में जुट जाते हैं। यह चार माह कृषि कार्यों के लिए समर्पित माह है। व्यापारी जो बाहर व्यापार करने गऐ थे वे भी घर वापस आ जाते थे। महिलाओं को अपने पतियों का चार माह भरपूर साथ मिलता। यदि किसी का पति नहीं आ सका तो उसके लिए यह विरह काल माना जाता था। विरह गाया जाता था  'सावन बीता जाये पिया नहीं आये वगैरह-वगैरह।Ó
चार मास बीतने के बाद नवरात्रि में देवी-देवताओं से लगभग पैंतीस चालीस दिन पूर्व अश्विन शुक्ल एक को नवरात्रि आरंभ में जागृत अवस्था में आ जाती है। देवी उपासना पूरे नौ दिन चलती है। दसवें दिन विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है इसदिन समस्त वीरजाति सैनिक आदि फिर अपने सैन्य कार्यों की तैयारी में अपने अस्त्र-शस्त्रों को धार देते हैं और इनकी पूजा करते हैं। अहीर, यादव, ठेठवार, ग्वाला, गोप, ग्वाली, पहटिया, चरवाहा, बरदिहा या रावत कहा जाने वाला वर्ग जो इन बीते चार महीनों में पशु सेवा में लीन रहते हैं, ये आज इस अवसर पर मातर जगाते है। ये दोहा पारते हैं-
चार महीना चराएंव खाएँव दही के मोरा,
आगे मोर दिन देवारी छोड़ेंव तोर निहोरा।
छत्तीसगढ़ में इस समाज को राउत के नाम से सामान्यत: संबोधित किया जाता है मातर जगाने के कार्य में गांव के बाहर दैहान में जहां गायों को प्रतिदिन सुबह मालिकों के घर से ढीलकर एकत्र किया जाता है एक गड्ढा खोदकर पुराने हल के टूटे हुए टुकड़े को गाड़ दिया जाता है या गाय के खूंटे को जिसे खोडहर कहते हैं गड़ा देते हैं यहां मातर याने मातृदेवी की पूजा की जाती है। हल के टुकड़े को गाडऩा याने हल विषयक काम समाप्त करना है मातर कार्य में भी बाजार या मेला सा दृश्य उपस्थित रहता है। इस दिन गाय बैलों का श्रंृगार किया जाता है उन्हें अच्छा भोजन कराया जाता है।
दैहान में पकवान खीर पूरी मिष्ठान आदि बनाया जाता है। कुछ राउत लोग बकरों की बलि भी माता को चढ़ाते है यहां यज्ञ की तरह  अग्नि में गुड़ घी की आहुति दी जाती है और अपने नाता रिश्ता और इष्ट मित्रों को खिलाया पिलाया जाता है। इस मातर कार्यक्रम में कई बार दूसरे गांव के राउत भी सम्मिलित होते है। कभी-कभी इस कार्यक्रम में भी मड़ई ध्वज रखा जाता है। मातर शब्द वास्तव में संस्कृत के मातृ शब्द का अपभ्रंश है।
मड़ई ध्वज- मड़ई एक बड़े बांस में चारों तरफ बांस की खप्पच्चियों द्वारा बनाया जाता है इसे पन्नी रंगीन कागज की झंडिय़ों व झालरों से सजाया जाता है यह आधुनिक बिजली के टावर की आकृति का नीचे तीन फुट बांस छोड़कर मोटा बनाया जाता है जो ऊपर जाकर कुछ सकरा हो जाता है। दीप स्तम्भ की तरह इसकी के ऊंचाई 15-20 फुट से कम नहीं रहती सब के शीर्ष में मयूर की पूंछ से इसे अलंकृत किया जाता है और मुर्गे के पंख भी बांधे जाते हैं। इसे प्राय: गोंड़ जाति का व्यक्ति उठाए रखता है इसके लिए वह अपनी कमर में एक  गमछा मजबूती से लपेटकर रखता है उसी में इसके नीचे के भाग को अटका दिया जाता है ताकि इस भारी भरकम ध्वज को आराम से संभालकर उठाया जा सके।
मातर जगाने के समय राउत जाति के लोग अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा भी करते हैं इसे अखाड़ा कहा जाता है। देवउठनी एकादशी को अन्य सैनिकों की तरह राउत जाति के लोग भी वीर वेशभूषा धारण करते हैं। अपने देवताओं की होम धूप से पूजा करने के बाद कभी-कभी कुछ राउतों पर देवता चढ़ आता है इसे काछन कहा जाता है। इस समय राउत मदोन्नमत स्थिति में रहता है राउत नाच के समय राउत अपने सिर पर पगड़ी बांधता है और उसे रंग-बिरंगी पन्नियों से अथवा गेंदा के फूलों की माला लपेटकर सजाता है।
ऊपर मोर के पंखों के डंठल से बनी फुंदना लगी कलगी खोंसता है। माथे पर लाल सिंदूर से टीका लगाता है मुंह को वृंदावन से लायी पीली मिट्टी से रामरज कहते हैं प्रसाधित करता है कभी-कभी अभ्रक से भी चमकाता है आंखों में काजल आंजता है गालों को भी हल्के लाल रंग से सजाता है या उसमें काजल की छोटी-छोटी बूंदे लगाता है। गले में गेंदा फूल या कागज के रंग-बिरंगी फूलों की माला पहनता है अपने वक्ष स्थल पर कवच की तरह कौडिय़ों से सज्जित वस्त्र पहनता है इसके नीचे चकमकी कपड़े या मखमल का सलूखा, कुरता, बंडी जो छींटादार होता पहनता है। कमर के नीचे चुस्त कसी हुई घुटने तक ऊंची धोती पहनी जाती है। पैरों में जूते मोजे के ऊपर पहने जाते हैं।
वीर वेश धारण करने के क्रम में राउत अपने कमर में कमरपट्टा, हाथ के बाजुओं में बाजू बंध तथा कलाईयों में भी पट्टीनुमा कौडिय़ों का बना पट्टा बांधता है। पीठ पर मयूर पंख से बना झाल बांधता है हाथ में खुली तलवार की तरह लाठी धारण करता है और बाएं हाथ में फरी या ढाल रखता है।
इस शौर्ययुक्त वेशभूषा वाला वीर सैनिक राउत क्योंकि इस अवसर पर नाचने निकलता है। इस लिए पैरों में घुंघरु और कमर में भी बड़ी-बड़ी घंटिया बांधता है। इसका पद चालन भी सिपाही की तरह होता है।
सैनिक वाद्य के स्थान पर गड़वा बाजा होता है जिसमें ढोल, निसान, टिमकी, ढपली, मोहरी, डफला, मांदर, गुरदुम दुतहरी झांझ, मजीरा आदि वाद्य होते है आजकल इसे ज्यादा श्रंृगारिका बनाने के लिए परियां भी नाचते हुए साथ चलती है जो वास्तव में पुरुष भी होते है। नारी वेशभूषा धारण किये रहते हैं। नाचने वाले राउतों का एक समूह चार पांच से लेकर तीस-चालीस तक कुछ भी हो सकता है, इसे गोल कहते है।
देवउठनी एकादशी को ही राउत लोग साप्ताहिक बाजार में जाकर बाजा वालों को ठेके पर लेते है। राउत नाचा का पूरा सरजाम युद्ध जाती सैनिक टोली की ही तरह ही रहता है। राउत जो दोहा नाच के मध्य में पारते हैं वे कबीर, रहीम, तुलसीदास आदि के होते हैं और कभी-कभी स्वरचित  आशु पद भी होते है जो मौके की नजाकत के अनुसार होते हैं। साप्ताहिक बाजार में जाकर राउतों का यह दल पूरे बाजार की परिक्रमा करता है, जिसे बाजार बिहाना कहा जाता है।
आजकल बाजा वाले बहुत महंगे हो गये है अतएव इनके लिए पैसे की व्यवस्था करने राउतों का गोल अपने-अपने किसानों व मालिकों के घर-घर जाकर नाचता है और उनसे धोती तथा नगदी पुरस्कार प्राप्त करता है इसी कारण अब राउत नाच कार्तिक पूर्णिमा के बाद भी बीस-पच्चीस दिन और चलता रहता है। राउत नाचा के दिनों में राउतों का दैनिक कार्य पशुओं को चराना और दुहना इत्यादि बंद रहता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यह सारा दृश्य शौर्यमय रहता है इन्हीं दिनों वे अपने सारे त्यौहार गोवर्धन पूजा इत्यादि मना लेते है।
साभार-बिलासपुर, रऊताही 1995

रउताही

इस छोटे से शब्द 'रउताहीÓ में पीपल बीज के भीतर छिपे विशाल वृक्ष की भांति गंभीर अर्थ छिपा हुआ है। रउताही उसी प्रकार प्रयोग होता जैसे बरवाही, चरवाही, किसी क्रिया को पूरे करने के अर्थ में ऐसे शब्द प्रयुक्त हैं किसी बार (दिन) में दूध दूहने वाला अपनी वारी का दूध ले लेता है उसे बरवाही तथा चराकर अपनी पारिश्रमिक प्राप्त करता है उसे चरवाही कहते हैं।
'राऊÓ  शब्द का अर्थ है राजा जो 'राÓ राक्षणे धातु से बनता है, अर्थात रक्षा करने वाला राजा की अर्थात् वीरता की क्रिया को रउताही कहते हैं। इसी वीरता पुरुषार्थ को निरंतर धारण करने वाले वर्ग को 'राउतÓ  कहते थे। स्पष्ट कर देना उचित होगा कि चोर डकैत, लुटेरे, बलात्कारी यदि वीरता प्रदर्शन करें तो न राजा होंगे न ही राउत होंगे नीति न्यायपूर्वक अन्यायी बलात्कारी हिंसक वर्ग से प्रजा पशु, कृषि, अबला आदि की रक्षा हेतु बीरता का प्रदर्शन और उपयोग करने वाला ही राजा या राउत होगा।
सामाजिक व्यवस्था में मनु याज्ञवल्क पराशर वशिष्ठ आदि स्मृतिकारों ने भारतीय भौगोलिक अन्य परिस्थितियों का आकलन कर पशु धन गोधन को ही सर्वोत्कृष्ट सम्पत्ति, देवता और लक्ष्मी आदि देवी के रुप में गायों को मान्यता दी।
वैदिक काल से आज तक गाय पूजनीया और रक्षणीया रही आई उसका दूध, अमृत घी यज्ञ का साधन सम्पत्ति गोमूत्र, औषधि गोबर ऊर्जा दही पौष्टिकता। आदि  के लिए प्रशंसनीय रहा चमड़े से उपानह जूता तथा बछड़े से कृषि का आधार अवलम्बित रहा। दान में गोदान प्रशंसित रहा वही दण्ड के रुप में भी 'गोधनÓ  का दण्ड निर्धारित था।
अब तक हम देख चुके कि 'गोधनÓ  ही मानव समाज के जीवन से यज्ञ पर्यन्त अपनी उपयोगिता के कारण सर्वोत्कृष्ट रही और है। ऐसे गोधन को लुटेरों और वन के हिंसक आदि प्राणियों से बचाकर उसके वंश के सतत् संरक्षण, संवर्धन का वीरतापूर्वक जिस वर्ग ने भार उठाया उसी वर्ग को राउत कहा गया।
राउत यादव नहीं होता यादव यदु के वंश वालों को यादव कहते हैं वह वंश में क्षत्रीय है जबकि राउत यादव से ऊपर है वह ब्राह्मणों के यज्ञों का सम्पोषक है, क्षत्रियों के दूध का संवर्धक है अन्य समाज की मूल सम्पत्ति गोमाता का रक्षक पालक बहादुर 'राउतÓ  राजा है।
वह साधना में योगी है, शीत धूप और वर्षा में बने गौ को चराता है विश्वास में सम्पूर्ण राष्ट्र के गोधन का धरोहर धारक विश्वासी न्यासी है, भोजन और इन्द्रिय संयम में संन्यासी है।
जब समूचे समाज ने अपनी बहुमूल्य गौ सम्पत्ति किसी को धरोहर में सौंपा तो उसके बाहुबल और सत्यनिष्ठा की परीक्षा समय-समय पर करना उस समाज का कत्र्तव्य ही होता है।
अत: प्रतिवर्ष वर्षा के अंत में शरद ऋतु में समाज के द्वारा उस राऊत वीरपुत्र को सम्मानित कर उसे पुरस्कृत  करने का एक माध्यम ही रउताही है। पवित्र कार्तिक मास में गोवर्धन पूजा, शरदोत्सव के समय जब धान की फसल पक जाती है तथा गेहूं चना, आदि की बोआई पूर्ण हो जाती है तब गौ पूजा एवं गोरक्षक राऊत पूजा का पर्व आता है। सर्वप्रथम अखाड़े का अभ्यास एक मास का होता है जिससे अखरा धावना (अखाड़े दौडऩा) कर्माभ्यास किया जाता था, फिर जड़ावर गाय की पीठ पर वस्त्र चढ़ाकर वस्त्र उसे दिया जाता यह भिक्षा नहीं उपहार नहीं प्रसाद मानकर उसे ग्रहण करता पियाई राजा और राउत दोनों को दाक्षासव अनिवार्य पान की छूट थी (महुए की नहीं) समाज की ओर से द्रव्य उसे दिया जाता उसे पियाई कहते थे। 
साभार - रऊताही 1995

रौताही नाच की भूमिका

व्यक्ति की आवश्यकताएं कभी किसी युग में पूरी नहीं हुई। वह अथक श्रम करता है सुविधाएं जुटाता है परंतु आवश्यकता के संघर्ष उसे विज्ञान के युग में भी थका देते हैं। श्रम की निरंतर मार से व्यक्ति थकता नहीं- पर थकान मिटाने के लिये उसके मन को थाह देता है- गीत नृत्य और संगीत।
संगीत किसी भाषा का मोहताज नहीं होता। पांवों की थिरकन-मन की गुनगुन और थकान की वेदना से राहत पाने के लिए लोकगीतों-लोकनृत्यों की धुन में वह समा जाता है। संघर्षरत समस्त पीड़ा थकान भूलकर वह मचल-मचल उठता है।
छत्तीसगढ़ में नृत्य-गीतों की अटूट परंपरा रही है। यहां के कर्मा नृत्य, पंथी- पंडवानी और रावत नृत्य को राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय महत्व प्राप्त हो चुका है। छत्तीसगढ़ में रावत नाच की परंपरा ने अन्य लोगों में भी अपार उत्साह जगाया है। जिस तरह लोक गीतों में उस क्षेत्र विशेष की संस्कृति की स्पष्ट झलक देखी जा सकती है- उसी प्रकार लोकनृत्यों में भी यह झलक लोगों को एक सूत्रता में आबद्ध करता है।
भारत में यादव जाति के लोगों की संख्या मुख्यत:म.प्र. और उ.प्र. में बहुतायात मात्रा में पाई जाती है। मोटे अनुमान के आधार पर यहां की आबादी क्रमश: 20 और 25 प्रतिशत यादव जातियों की है। म.प्र. में यादव जाति के लोगों की गणना मुख्य प्राचीन आदिवासी हरिजनों के साथ प्राचीनतम जातियों में से होती है। इन जातियों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है।
अशिक्षा के कारण यहाँ की जातियों में विकास की गति धीमी है और इनमें इन्हीं कारणों से आदिम जाति युगीन बर्बरता की झलक देखी जा सकती है। ये आपस में मार काट और शौर्य प्रदर्शन में आज भी तत्पर दिखते हैं। रावत नाच को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
बिलासपुर जिला में रावत नृत्य गीत का विशेष प्रभाव और महत्व है। लोक कला महोत्सव में से छत्तीसगढ़ की जिन लोक गीतों और लोक नृत्यों को स्थान मिलता है- उनमें रावत नृत्य गीत, करमा और पंथी-पंडवानी मुख्य है। क्षेत्र के लिए यह शुभ संकेत है। किसी जाति की चेतना में लोकोत्सवों की संस्कार एक भूमिका रखती है। पहले इन जातियों को घरों-घर, आंगन में जा जाकर गीत-नृत्य करना पड़ता था घरों की मुखिया को आशीष देकर उनसे भेंट उपहार स्वरूप राशि या अनाज पाते थे। इन राशियों का जातिय विकास में उपयोग होने के स्थान पर कुछ लोग मनोरंजन अय्याशी और दारु मुर्गा खा-पीकर उड़ा देते थे। किन्तु यह अधिक दिनों तक नहीं चली और अब रावत नाच महोत्सव, रऊताही स्मारिका आदि के प्रकाशन से इस जाति की चेतना को प्रेरणा व उत्साह मिलने लगा है।
रौताही स्मारिका वर्ष 94 देवरहट (सेमरसल) का प्रकाशन इसी कड़ी में एक अभूतपूर्व प्रयास है। मैं हिन्दी साहित्य समिति की ओर से कार्यक्रम के संरक्षकों एवं आयोजकों डॉ. एम.आर. यादव मुख्य अतिथि महोदय कार्यकर्तागण और समस्त ग्रामवासियों को बधाई और नए वर्ष की शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।
इनकी जातिय प्रगति में- 'रौताहीÓ स्मारिका प्रकाशन का कार्य इन्हें एक जुटता में पिरोये। इन्हें वीरता शौर्य प्रदान करे और राष्ट्रीय एकता की दिशा में मील का पत्थर प्रमाणित होवे।
साभार - मुंगेली रऊताही 1994

मेरी दृष्टि में यदुवंशियों का इतिहास

यादव यह शब्द यदु से उत्पन्न हुआ है। गांवों में यादवों को अधिकतर 'राउतÓ के नाम से पुकारा जाता है। गांवों में अधिकतर राउत निर्धन पाये जाते हैं तथा उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय होती है। इसका मुख्य कारण उनका शिक्षित न होना। शिक्षित न होने की वजह से वे अपने अधिकारों को समझ नहीं पाते हैं।
यादव तथा अहीर क्षत्रीय वर्ण के अंतर्गत आते हैं। महाभारत कालीन में यादव अत्यंत समृद्धशाली ही नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी पर उनका शासन था। यादव कुल के पूर्वज श्री कृष्ण है। इन्होंने गीता में उपदेश दिया है। इन्होंने गीता में मुक्ति के लिए देवी संपदा तथा बंधन के लिए बाँसुरी संपदा की बात कही है। भगवान श्रीकृष्ण के अनेक रुप हैं । वे गोपी, ग्वाल, बालसखा आदि भी हैं।
इनकी एक मुख्य विशेषता यह थी कि वे घर-घर जाकर माखन चुराते तथा खाते  थे। यादव क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुआ है। राजा सुबल की गंधारी नामक कन्या एवं पुत्र शकुनि आदि दस पुत्र थे।
कैकरा- एक राजा थे तथा कुन्ती बहन श्रुति कीर्ति से इनका विवाह हुआ।
शाक्य लिच्छयि- ये क्षत्रिय थे तथा इनका प्रसिद्ध गणराज्य था। इसके शासन काल में सबसे शक्तिशाली राज्य गंगा की घाटी में कोशल, माधव, मगध और वत्स।
बिंबसार- यह मगध का राजा था। इन्होंने अंग राज्य को जीत लिया था।
अजातशत्रु- बिम्बसार के पुत्र थे तथा इन्होंने भी अपने पिता के साम्राज्य को आगे बढ़ाने की अत्यंत कोशिश की।
नंद- चौथी सदी में मगध पर राजा नंद का शासन था वह भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था।
चाणक्य- यह एक ब्राह्मणमंत्री थे। आगे चलकर ये कौटिल्य के नाम से जाने गये।
चंद्रगुप्त- चाणक्य के शिष्य तथा इन्होंने अपनी सेना का संगठन किया।
चालुक्य- इसका केन्द्र वातापी में थे। यहां चालुक्य पुलकेशन द्वितीय का शासन था। उसकी महत्वाकांक्षा समूचे दक्षिण भारत पर शासन करने की थी।
राष्ट्रकुल तथा पल्लव- चालुक्य राजा के दो शत्रु थे राष्ट्रकुल तथा पल्लव । राष्ट्रकुल का शासन उत्तरी दक्षिणी भारत के एक छोटे से राज्य पर था।
हमारे छत्तीसगढ़ गांवों में तथा शहर दोनों में अगर कोई एक व्यक्ति तरक्की कर ले तो उसके मन में अन्य यादवों (व्यक्तियों) के प्रति घृणा की भावना आ जाती है। जबकि उसे भाई चारे की भावना रखना चाहिये तथा यदि वह उच्च पदों पर नियुक्त हो तो यादव कुल को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करना चाहिये।
मैं तो कहती हूं कि छत्तीसगढ़ ही खुद अपनी बरबादी, निर्धनता, गरीबी, अशिक्षा आदि का जिम्मेदार है। वे चाहते तो वे भी खुशी एवं कुशल रूप से जीवन यापन कर सकते हैं, वे चाहे तो वे शिक्षित हो सकते हैं तथा शिक्षा के माध्यम से उच्च पदों पर भी नियुक्त हो सकते हैं। मैंने अधिकतर गांवों में यादव का शोषण होते देखा है। गाँवों में राउत का मुख्य काम गाय चराना कृषि कार्य है। मंै यह नहीं कहती की वे ये काम न करें लेकिन मैं यह जरुर कहूंगी कि उन्हें अपने आने वाली पीढ़ी को समृद्धशाली बनाना चाहिए तथा उनकी आने वाली पीढ़ी शिक्षित हो, जागरुक हो।
छत्तीसगढ़ में खासकर गाँवों में राउत को अपने ढंग सुधारना चाहिये तथा गाँव में यदि मुखिया या जागीरदार कोई गलत कदम उठाए तो यादव भाईयों को उनका साथ न देकर उन्हें सही मार्ग पर लाना चाहिये। सभी को आपस में भाई-चारे की भावना रखनी चाहिये सभी कहते हैं कि बड़ी की बातें हमेशा माननी चाहिये तथा उनका आदर सत्कार करना चाहिये लेकिन मेरा कहना है कि कभी-कभी कुछ कार्यों में छोटों की सलाह भी लेना चाहिये। हो सकता है कि कल वही बालक एक भावी नागरिक बनकर उभरे। अगर यादव भाई-बहन लोग इन सब कार्यों का पालन उचित रूप से करे तो मैं ईश्वर से कामना करती हूं कि भविष्य में यादव कुल प्रतिष्ठित हो इस शब्द का तथा इस जाति का अधिकाधिक विकास हो। यदि इन सब बातों का ठीक ढंग से पालन किया गया तो मैं निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि प्राचीन  समय की तरह आज भी यादव पृथ्वी पति तो नहीं किन्तु समृद्धशाली अवश्य ही हो जाएंगे। यादव में खासतौर से यह भावना होनी चाहिये कि वे बहकावे में आकर आपस में न लड़ें बल्कि संकट का मिलजुलकर सामना करना चाहिए।
 बिलासपुर-रऊताही 1994