Saturday, 23 July 2011

ममता और अल्हड़ता से सराबोर हैं, अहीरवाल के लोकगीत

- रोहित यादव
हरियाणा प्रदेश का अहीरवाल उबड़-खाबड़, शुष्क धरातल एवं रेतीले टीलों वाला क्षेत्र है।
यहां के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि और पशुपालन है तथा रहन-सहन और खान-पान
बड़ा ही सादा है। अपने परम्परागत धंधे के अतिरिक्त इस क्षेत्र के लोग बड़ी संख्या में
भारतीय सेनाओं में सेवारत हैं।
राजनैतिक रूप से भले ही यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है, परन्तु मेंलों, तीज त्यौहारों, लोक
संगीत व लोकगीतों के मामले में यह अपना विशिष्ट स्थान रखता है। प्राचीनकाल से ही
मेले, तीज-त्यौहार, लोक संगीत एवं लोकगीत इस क्षेत्र की लोक संस्कृति तथा
जनजीवन के प्रमुख अंग रहे हैं।
लोकसंगीत और लोकगीत तो यहां के कण-कण में समाहित हैं। लोक संगीत की सरिता
को अपने प्रबल आवेग के साथ बहने से यहां के रेत के टीले भी नहीं रोक पाये। गर्म तेज
लू और आंधियों के थपेड़ों से इन्हीं रेत के टीलों पर रेत की लहरें बनती चली आई है।
सायं जब रेत ठंडी होती है, तब यही लहरें लोकगीतों की पंक्तियां सी नजर आती हैं।
अरावली पर्वतमाला की गोद में बसे अहीरवाल क्षेत्र के लोकगीतों एवं उनकी लोक धुनों
पर यहां के संघर्षमय जीवन की छाप स्पष्ट परिलक्षित होती है।
लोकगीत यहां के सामाजिक जीवन में ऐसे प्रकाशपुंज हैं, जो मानव मन की अथाह अंधेरी
गलियों तक को अलोकित करते रहे हैं। लोकगीतों की धरा यहां सत्त प्रवाह से बहती
आई है, जिसकी बदौलत न केवल मानवीय संवेदनाएं और संबंध ही पुख्ता होते रहे हैं
अपितु दारूण दु:खों के बादलों को भी छितराया हैं और खुशी के पलों को यादगार बनाया
है।
तीज-त्यौहारों एवं शादी-उत्सवों पर यहां औरतों के सामुहिक कंठ कोयल की भांति कूूक
उठते हैं, तब वातावरण की रंगत में एक खास तरह का उन्माद एवं मस्ती छा जाती है।
यहां के जनजीवन में आने वाली विडम्बनाओं एवं घटनाओं का इन गीतों में मार्मिक
चित्रण मिलता है। यहां के आदमी परिश्रमी हैं, तो महिलाएं भी बेहद मेहनती हैं। खेतों में
जाते,पनघट से आते, फसल काटते, क्यारियों को नलाते नारी कंठ हिल-मिलकर जहां-
तहां गाती नजर आती हैं।
यहां के लोकजीवन से अगर लोकगीत निकाल लिए जायें तब जो शेष बचेगा वह या तो
श्मशान की वीरानगी जैसा होगा या फिर पत्थर की भांति खुरदरा व कठोर होगा। यहां के
गीतों में प्रीत है, जीत है और रीत है। यहां का लोक विश्वास और आस्थायें इन गीतों में
हिल मिल गये हैं।
ये लोकगीत यहां के जनजीवन के संस्कारों में रमे हुए हैं। स्मृति रेखाओं पर सुगन्ध की
तरह जमे हुए हैं। इन गीतों की लोकधुनें मन मस्तिष्क पर आसाढ़ की बदलियोंं की भांति
मंडराती हैं। ये गीत और धुनें जहा पति-पत्नी, देवर-भाभी, ननद-भावज आदि-आदि
इन्सानी रिश्तों का अनजाने में ही विश्लेषण करते हैं, वही भाई-बहन और मां-बेटे जैसे
पवित्र रिश्तों को गौरवान्वित भी करते हैं।
ये लोकगीत इस क्षेत्र की सांस्कृतिक उर्जा की एक ऐसी सामाजिक अभिव्यक्ति हैं जो
रसवादी सौन्दर्य शास्त्र से अभिप्रेरित है। यही रसवादी सौन्दर्य बोध हमारे लोकजीवन एवं
संस्कृति का ऐसा उर्जा स्त्रोत, जो जीवन की अनवरत विडम्बनाओं एवं घटनाओं के बीच
भी आत्म-विष्वास रूपी संजीवनी प्रदान करते हैं।
किसी भी समाज तथा जाति को जानने से पूर्व उसके लोकगीतों को जानना जरूरी है।
यहां के लोकगीतों के अध्ययन करने से इस क्षेत्र के रंग-रंगीले, उत्सव-त्यौहारों तथा
सामाजिक रीति-रिवाजों का परिचय आसानी से मिलता है। लोकजीवन का ऐसा कोई
आयाम नहीं जो इन लोकगीतों में मुखरित नहीं होता हो। यहां के लोकगीतों में वीर रस
और श्रृंगार रस की प्रधानता है। जिसमें व्याकरण और भाषा को कोई विशेष संयम देखने
को नहीं मिलता। खड़ी व सरल भाषा में बिना किसी लाग-लपेट के लिखे गये इन गीतो
को हिन्दी भाषा का थोड़ा सा भी जानने वाला आसानी से समझ जाता है। इन गीतो का
रचियता कौन है, कोई नहीं जानता? ऐसा ल्रगता है कि ये लोकगीत समय-समय पर
आवश्यकता के अनुसार स्वयं बनते चले गये और पीढ़ी दर पीढ़ी हमें विरासत के रूप में
मिलते रहे हैं। महिलाएं इन्हीं गीतो में साहस, शील, भक्ति, प्रेम, दया, पतिव्रता,
आज्ञापालन आदि-आदि अनेक आदर्श गुण ग्रहण करती हैं।
अहीरवाल क्षेत्र में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान व अन्य लोक देवी-
देवताओं को याद करने की परम्परा पुरातन समय से चली आ रही है। क्योंकि क्षेत्र के
लोग इन्हीं देवी-देवताओं को अपने सामाजिक जीवन में शुभ-अशुभ की धुरी मानते हैं।
रतजगा, विवाह-शादी तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर भी देवी-देवताओं के गीत व
भजनों के माध्यम से याद करने की प्रथा इस क्षेत्र में भी है। यहां प्रचलित गीतों की
शब्दावली जहंा ठेठ देहाती है, वहीं इनके भावार्थ आरतीनुमा है। इन गीतों में न कल्पना के
पंख हैं और न ही शैलीगत पेंच। इस कड़ी में ग्राम देवता व गौरी पुत्र गणेश को विघ्न
विनाशक देवता के रूप में किसी भी मांगलिक अवसर पर गीतों के माध्यम से सबसे
पहले याद किया जाता है। ग्राम देवता की पूजा-अर्चना के समय गाये जाने वाले गीत की
एक बानगी देखिये-
ऊँचा थारा कोट,नीची थारी खाई जी,
उठों बाबा भोमिया, खोल किवाड़ी जी।
हास-परिहास इस क्षेत्र के जनजीवन का अभिन्न अंग हैं। विवाह के अवसर पर महिलाएं
अनेक प्रकार के मनोरंजन और हास्य-विनोद से परिपूर्ण गीत गाती हैं। इन गीतों में वे
उलाहना भी देना नहीं भूलती। जब बारात पूरी तरह सज-धज कर दुल्हन के द्वार पर
पहुंचती है, तो गांव की महिलाएं बारातियों को गीतों के माध्यम से चिढ़ाती हैं-
हमने बुलवायें मूछंा आले,
ये मूछंकटे कयूं आये जी।
विवाह के अवसर पर वर पक्ष के घर में सुना जा सकता है यह गीत- अनोखा लाडला हो,
रायबर मझला-मझला चाल्य। इसके विपरित वधू पक्ष के घर सुना जा सकता है एक
नसीहत भरा गीत-
 बन्नी का दादा बरजै सै,
 लाडो नीम तलै मत जाय।
भाई बहन के यहंा भात भरने जाता है, तब यह गीत गाया जाता है-
 मेरो भाई आयो, हजार लायो,
हीरबंद लायो, वो तो चुनड़ी।
मैं तो वार ओढूं, त्यौहार ओढूं
ओढूं भतीजा के ब्याह में।
इस अवसर पर एक अन्य गीत भी सुना जा सकता है-
रै बीरा नौकर मत ना जाइये,
मेरा कौन भरेगा भात।
ऐ, जीजी नौकर का कै डर सै,
तेरा आन भरूंगा भात।
भाभी-देवर की नोंक-झोंक जगत प्रसिद्ध है। एक गीत के माध्यम से भाभी अपने देवर
को इस तरह चिढ़ाती है-
जै मेरा देवर राजी बोल्यै,
तो बी.ए.पास करा द्यूंगी।
जै मेरे तै करै लड़ाई,
स्कूल मा तै उठा द्यूंगी।
जब कोई युवक अपनी बहू को लेने ससूराल पहुंचता है, तो गीत गाया जाता है-
कैठा- सी आया प्यारा पावणा जी,
कैठे लियो सै मकान नणदेऊ जी,
लाड जमाई प्यारा पावणा जी।
सैदपुर सी आया प्यारा पावणा जी,
मोहलड़ा लियो सै मकान नणदेऊ जी,
लाड जमाई प्यारा पावणा जी।
इस अवसर पर सालियां अपने जीजा से सींठणे के रूप में हंसी-मजाक भी करती हैं-
बिन बादल, बिन बादली,
यो अम्बर कय्यानी छायो जी, अम्बर
कय्यानी छायो जी।
मैं तुनै पूछंू ऐ सखी, यो रोहताश
कय्यानी आयो जी, यो
जीजो कय्यानी आयो जी।
सावन के महीने में इन्द्र भगवान कृपालु होने लगते हैं, वर्षा की बौछारें तपती धरती की
प्यास बुझाने लगती है। क्षेत्र के ग्राम्यांचलों में एक खुमारी-सी चढऩे लगती है। जिस तरह
मोर मस्ती में कूक उठता है, उसी प्रकार गांव की महिलाएं भी मस्त होकर उच्ची आवाज
में हिन्डौले पर झूलती गीत गाती देखी जा सकती है-
और सखी तो अम्मा मेरी,
सब चली जी.ऐ जी
हमनै भी झूलण भेज,
घल्यों ये हिन्डोला,
चम्पा बाग में जी।
सावनी तीज पर माताएं अपनी विवाहित बेटी के घर, उसके भाई के हाथ कोथली भेजति
हैं। कोथली लेकर भाई जब बहन के घर पहुंचता है। बहन अपनी सास से पीहर भेजने
की गुहार करती है-
आया री सामण मास,
हमनै खन्दा दे म्हारै बाप कै।
इन लोकगीतों में सास- बहू की लड़ाई का भी चित्रण मिलता है। एक बहू अपनी सास से
तंग आकर गाती है-
मैं तो माड़ी होगी हो राम
धंधा करके इस घर का
बखत उठ कै पीसणा पीसूं
सवा पहर का तड़का।
वीर रस के गीत भी सुने जा सकते हैं-
आर्या की लड़की कहियों,
हम तलवार उठावागंा,
हम तलवार अठावागंा, भारत
मां की शान बढ़ावागंा।
इन लोकगीतों में नशीली वस्तुओं के सेवन का भी चित्रण है। एक बहन अपने शराबी भाई
से कहती है-
मेरा बीरा रै जवान, मेरा
कहा जरा मान,
तेरी कह रही है दुखिया भाण,
रै दारू का पीना ठीक नहीं।
और भी न जाने कितने भाव प्रणय,वीर रस से सराबोर हास्य-विनोद, करूणा, उल्लास व
मस्ती से परिपूर्ण लोकगीत हमारे लोक साहित्य को समृद्ध बना रहे हैं। ये गीत इस क्षेत्र
की आत्मा के गीत हैं, जो खुली हवा में बड़ी रोचकता से पिरोये जाते हैं।
पत्रकार- मंडी अटेली- 123021 (हरियाणा)

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री दयाराम जी ठेठवार- रायगढ़

संक्षिप्त जीवन परिचय
श्री दयाराम ठेठवार जी स्वयं द्वारा लिखित-
दोहरी गुलामी में मेरा जन्म रायगढ़ रियासत में 14 अप्रैल 1923 को हुआ। बाल्यकाल बहुत ही सुखद रहा। मैं बचपन में बहुत ही चंचल हाजीर जवाब होने से लोग मुझे काफी चाहते थे। भूपदेव पाठशाला में मुझे शिक्षा मिली और उत्तीर्ण होकर नटवर हाई स्कूल रायगढ़ में प्रवेश लिया। समय दिन व दिन बदलते गए आजादी के दीवाने अन्य प्रांतों तथा शहरों में हल्लाबोल रहे थे। अखबारों में भी समाचार पढऩे को मिलता था। हमें भी ललक
होती थी पर साधन नहीं मिलता था।
सन् 1943 में आखिर लड़कों ने साथ दिया। जूटमिल के कामगारों ने ही सहयोग करने का
वचन दिया। हम सब कागज के तिरंगा बनाकर रेलवे क्रासिंग में इकट्ठे हो गए पर वे
नहीं आए पोलिस का जत्था वहां पहुंच कर हटाने लग गया। बहुत से लड़के डर के मारे
भाग गए, शेष स्व. ब्रजभूषण शर्मा, स्व. शंकर नेगी, स्व. हमीर चंद अग्रवाल जनकराम
और मैं बच गए। हमें गुरुजी ने चमकी धमकी दिया और झंडे ले लिया, हम घर वापस
आ गए। पश्चात बच्चों ने एक जुलूस चालीस पचास की तादाद में निकाला वह भी
पुलिस की डर से तितर-बितर हो गया। हम तीन बच गए। स्व. ब्रजभूषण शर्मा, मैं और
जनकराम हमको पुलिस थाना में बिठाया गया और कई किस्म की बात सुननी पड़ी, परंतु
हम यह कार्य करते ही रहे।
अचानक सन् 1944 में हमारी भेंट स्व. वी.बी. गिरी जो पूर्व राष्ट्रपति थे उनसे हुई वे मेरे
भूमिगत के समय हमारे पड़ोस में कांग्रेसी कार्यकर्ता स्व. श्री सिद्धेश्वर गुरू के मकान में
ठहरे थे उनसे भेंट हुई फिर तो तांता ही लग गया प्रसन्न पंडा, गोविंद मिश्र, मथुरा प्रसाद
दुबे, स्व. छेदीलाल बैरिस्टर, स्व. मगनलाल बागड़ी, स्व. श्यामनारायण कश्मीरी आदि
हमारा हौसला बढ़ते ही गया।
इसी तरह हमें रुचि इस कार्य में हो गई। इसलिए दसवीं कक्षा में मैं तो दो साल फेल हो
गया सबसे बड़ा सहयोग हमें हमारे हेडमास्टर स्व. पी.आर. सालपेकर से मिला। पुलिस
वाले स्कूल से हमेशा दिन में दो तीन बार बुलाकर ले जाते थे।
एक दिन हेडमास्टर ने हमें बुलाया सच-सच कहने को कहा, सच्ची चीज हम खोल कर
रख दिए उनने हमें आगजनी, मारपीट, लूट-खसोट नहीं करने को कहा और जो करते हो
वही करते जाओ कहा। तुम लोगों को संभाल लूंगा कहा इस दरम्यान करो या मरो का
परचे तथा अन्य परचे हमें सुबह डाक से और रात्रि साढ़े छै: बजे मेल से मिलते थे। उसे
बड़ी हिफाजत से हम बांट देते थे अत: रियासती लोगों में जाने आने लगी थी इसी बीच
स्व. अमरदास देशम व स्व. तोड़ाराम जोगी से भी हमें बहुत सीख मिली। वे हमें पोस्टर
लगाने की सलाह देते रहे और हम अखबारों में स्याही के मार्के की जगहों में रात को
चिपका देते थे और मजा लेने को सुबह घूमते थे, हमें बड़ा शकुन मिलता था। दिवान,
कप्तान व अधिकारी सब के खिलाफ राजा, अंग्रेज के खिलाफ पढ़कर लोग बड़े प्रसन्न
होते थे।
अंग्रेज सरकार के प्रशासक श्रीराम जी घुई यहां पदस्थ थे, उनके दो लड़के हमारे साथ
पढ़ते थे उनके बच्चों की पुस्तक में करो या मरो की पर्चा देखकर महोदय को कहा
प्रशासक महोदय दलबल समेत स्कूल पहुंचकर तलाशी श्ुाुर कर दी। इसे देख हेडमास्टर
हड़बड़ाते हुए आए पूछे तुम लोग कौन हो यहां क्या कर रहे हो, किसने आपको स्कूल में
घुसने की अनुमति दी है, बाहर चले जाओ मैं यहां का प्रशासक हूँ। आप लोग नहीं
जाओगे तो ऐसा कहकर गुस्से में उस बूढ़े हेडमास्टर ने स्कूल के चपरासी को बुला
लिया। इसके बाद मुझे उन्नीस सौ छियालिस में कांग्रेस समाजवादी पार्टी का शहरी मंत्री
बनाया गया और मुझे गांव-गांव जाकर अंग्रेज व राजा के खिलाफ आजादी की बात
कहकर लोगों को आकर्षित करते गए। किसी गांव में हमें कष्ट नहीं मिला। कुछ दिनों के
बाद गांवों में रियासती राजाओं ने एलान करवाना शुरु कर दिया कि बाहरी आदमी को
जगह जो भी देगा उसकी जमीन जब्त कर ली जावेगी। गांवों में राजनैतिक चेतना तो थी
नहीं, गांव वाले हमें खाना खिलाकर विदा कर देते थे। हम चिन्हित हो गए थे, हमारे नाम
से वारंट जारी हो गया था।
रायगढ़ से भागकर सारंगढ़ के सरिया, बरमकेला क्षेत्र में आसानी से प्रवेश मिलता था परंतु
वहां के राजा स्व. जवाहर सिंह जहां उतरते थे वहां पहुंच ही जाते थे। बड़े ही क्रूर राजा थे
हमें ढोलगी ढंककर रहना पड़ा था बरबस इस तरह का समय काटना पड़ा। अंतत: स्वराज
मिला, भूमिगत रहने से जो कष्ट मिला था वह मिट गया इसके पश्चात हमें जोरशोर से
रियासती आंदोलन राजाओं के खिलाफ करना पड़ा स्वर्गीय वल्लभ भाई पटेल पूर्व
केन्द्रीय मंत्री के आह्वान पर सक्ती रियासत में हम पड़ाव डाले और गांव-गांव घूमकर
लोगों को समझाने का क्रम चलता रहा। सक्ती से सारंगढ़, रायगढ़ तथा धरमजयगढ़ में
कार्यक्रम प्रारंभ करते हुए हम इसमें भी सफल हुए।
अविस्मरणीय घटनाएं दो, जो जीवन में भुलाया नहीं जा सकता।
1. पहाड़ के ऊपर बड़ा भारी अजगर सांप झूल रहा था मुंह फाड़े वह एक बित्ते की दूरी
सर के ऊपर था मेरे मित्र ने देख लिया, मैं बाल-बाल बचा।
2. राजा, सारंगढ़ के चमड़े का हंटर वह पहले एक, दो हंटर लगाकर बाद में बात करते
थे। भूमिगत रहने से बहुत ही कष्ट मिला और आजाद हुए देशी राज्य खत्म हुए पर हमें
हमारी जनता को कोई फायदा नहीं मिला। इससे उस परतंत्रता में हम सुखी थे। ऐसा
लगता है वर्तमान में गलत कार्य करने वाले ही सुखी हैं। यहाँ कहने में हमें हिचक नहीं है
छोटे राज्य के आंदोलन में रायगढ़ की भूमिका प्रशंसनीय होते हुए इनाम में रायगढ़ को
उद्योग मिला और समस्त खेती की जमीन, जंगल, नदी, नाला, मरघट, गौचर जमीन सब
उद्योगपतियों को देदिया गया। भविष्य में हमें पानी और अनाज के लिए कष्ट होगा।
पर्यावरण तो चरम सीमा पर दूषित हो गया है। यह है आजादी, क्या कहें? सब आर्थिक
पहलू की ओर नजर रखकर देश अपना है कहना भूल बैठे हैं।
                                                                                       भेंटकर्ता
                                                                                     एम.आर. यादव
                                                                                    पूर्व जिला खेल अधिकारी, रायगढ़ (छ.ग.)

एक चलती-फिरती संस्था थे बाबा

-शमशेर कोसलिया 'नरेश'
भारतवर्ष के ऋषि-मुनियों ने सदैव ही मानव कल्याण हेतु कार्य किए हैं। दुनिया के अन्य
देशों के मुकाबले में भारत के ऋषि-मुनि, सन्त-महात्मा ही मानव कल्याण हेतु प्रसिद्ध रहे
हैं। आधुनिक युग में भी एक साधु ऐसे हुए हैं जिन्हें हम एक ऋषि मुनि साधु-सन्त
महात्मा सिद्ध पुरुष सज्जन समाज सेवी स्वतंत्रता सेनानी की संज्ञा दे सकते हैं। साधु
किसी धर्म, जाति परिवार विशेष के न होकर सभी के चहेते रहे हैं। वह दक्षिणी हरियाणा
व उत्तरी, राजस्थान के लोगों के घनिष्ठ प्रिय संतों की अग्रिणी श्रेणी में गिने जाते हैं। उस
सन्त का जन्म कब और कहाँ व किन परिस्थितियों में हुआ तथा उन्होंने अपने जीवन में
लोक कल्याण हेतु ऐसा क्या-क्या काम किया कि वह लोगों का चहेता बन गया। उसके
जीवन पर यहां प्रकाश डालने के प्रयास किए जा रहे हैं। हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जनपद
मुख्यालय नारनौल से कनीना मार्ग पर लगभग 12 मील की दूरी पर नागवंशी यादव
बाहुल्य सीहमा गांव में चुनीलाल यादव रहते थे। उनके बेटे का नाम रामसिंह तथा पुत्र
वधू का नाम मीनीदेवी था। उनका परिवार धर्म परायण तथा जन कल्याणकारी था वह
साधू संतों का आतिथ्य सत्कार करने में अग्रीणी था। एक बार सन्त कुशाल दास से
मिलने जाते समय हुडिंया कलां राजस्थान के संत दामोदर दास गांव से होकर जा रहे थे
तो चुनीलाल उन्हें अपने घर ले आए रामसिंह व उनकी पत्नी ने संत जी की खूब सेवा
की तथा दोपहर का भोजन करवाया। भोजन करने के बाद संतजी ने मीनी देवी को
आशीर्वाद देते हुए कहा कि मांई अबकी बार आपके जो बेटा होगा। खेत पर जन्म लेगा।
वह बड़ा होकर जन-जन का प्रिय संत बनेगा। मीनी देवी ने विनीत भाव से कहा- 'बाबा
गांव में गर्भवती स्त्री को घर से बाहर खेतों में काम करने नहीं जाने दिया जाता है। तब
भला मैं खेतों पर क्यों जाऊंगी और लड़के का जन्म खेतों पर कैसे होगा?Ó
संत जी ने कहा मांई साधुओं की वाणी कभी बेकार सिद्ध नहीं होती है। जो मैंने कहा है
भविष्य में नहीं होने वाला संत जी ने मीनीदेवी के बड़े बेटे व होने वाले बेटे पर कविता
की ये दो पंक्तियां कही 'घर में है वो घड़सों थारो। खेत ेमें होवे वो खेतों म्हारो।।Ó
सिद्ध संतों के वचन प्रामाणिक होते हैं। नियति ने अपना खेल रचा चुनीलाल व उनकी
पत्नी हीरो देवी राम सिंह की ननिहाल के एक विवाह समारोह में शामिल होने हेतु (उस
समय ऊंट पर सवार होकर) चले जाते हैं। रास्ता लम्बा था इसलिए समय से पहले ही
चले थे। उस दिन रामसिंह अकेले ही बैलगाड़ी हांककर अपने खेतों पर जाकर काम में
जुट गए। अचानक उनके पेट में भयंकर पीड़ा हुई, जिससे वह वहीं खेत की मेंढ पर लेट
गए और दर्द की वजह से चिल्लाने लगे।
गांव के किसी राह चलते बालक ने उनके घर उनकी पत्नी को इसकी खबर दी। तो घर
में कोई भी न होने की वजह से मीनीदेवी खुद ही अपने पिया की जान को बचाने के लिए
घर में रखी फांकी चूर्ण आदि साथ में लेकर खेत पर पहुँची। उसने अपने स्वामी को
फांकी चूर्ण आदि थमाया भी न था कि मीनीदेवी को प्रसव पीड़ा आरम्भ हो गई और थोड़ी
ही देर बाद उसने एक बालक को जन्म दिया। उधर रामसिंह के पेट की पीड़ा बिना किसी
दवा दारु के स्वत: ही ठीक हो गई रामसिंह ने ही खेत की मेढ़ (डोले) पर खड़े (उगे)
सरकण्डे की पानी (पत्ती) की धार से नवजात बालक का नाल काटा। नवजात बालक व
अपनी पत्नी को बैलगाड़ी बैठाकर शीघ्र ही अपने घर पहुँचा। कार्तिक सुदी अष्टमी (गोप
अष्टमी) विक्रमी सम्मत् 1973 का वह शुभ दिन था। खेत में जन्म होने की वजह से ही
उस बालक को खेता कहा जाने लगा। खेताराम ने मात्र 3 वर्ष की उम्र में ही चारपाई पर
सोना छोड़ दिया था। वे धरती या बड़े पत्थर पर सोते थे। इसलिए घर वालों ने उसके लिए
एक लकड़ी के तख्त का इन्तजाम कर दिया। उसे एक ब्राह्मण की चटशाला में रह कर
हिन्दी, गणित का ज्ञान प्राप्त किया। 16 वर्ष की आयु में ही मीनीदेवी का आशीर्वाद प्राप्त
कर सन. 1932 में घर छोड़ दिया। अब खेताराम ने 4 वर्षों तक देश में इधर-उधर अच्छे
गुरु की खोज की और बाबा मस्तनाथ मठ अस्थल बोहर जिला रोहतक पहुँचे। वहाँ
पंजाब में जन्मे रह रहे सन्त जयलाल नाथ को अपना गुरु बनाया। उस सन्त ने खेताराम
की चोटी काटने व कानों में मुद्रा डालने की रस्म पूरी की तथा सन्त वाणी देकर दीक्षा दी।
इस प्रक्रिया से अब उसका नाम खेतानाथ हुआ।
अब साधू का चोला पहनकर (सन्त बनकर) खेतानाथ ने हरिद्वार स्थित मायापुर आश्रम
में संस्कृत का गहन अध्ययन किया। संस्कृत के अध्ययन के उपरान्त वह हरिद्वार से
दिल्ली के रास्ते से होकर कई साधू-सन्तों की सेवा करते हुए राजस्थान पहुँचे। राजस्थान
के कई साधुओं से मिलते हुए हरियाणा के स्मारकों  के शह नारनौल के पास खत्रीपुर-
दुबलाना में रह रहे बाबा शान्तिनाथ जी के पास पहँुचकर वस्त्र त्याग की विद्या सीखी और
उनको अपना गुरु बनाया। उन्हीं से वेदान्त योग आदि का ज्ञान अर्जित किया। उनके
सामिप्य में रहकर शास्त्रों का गहन अध्ययन  किया। सन्त शान्ति नाथ जी एक अच्छे वैद्य
भी थे। सन्त जी खेतानाथ को वैद्य का काम सिखाना चाहते थे, किन्तु उन्होंने इस कार्य
को नहीं सीखा और उन्होंने जन जागृति का मार्ग अपनाया।
जब देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय जनआंदोलन चल रहे थे। उस समय उस युवा
संत ने भी सक्रिय रूप से उन सभी आन्दोलनों में विशेष भूमिका निभाई। संत जी ने सन्
1945 में प्रजामण्डलों के कार्य-कलापों को गति दी। उनकी ही देख-रेख में गांव कांटी में
प्रजामण्डल की विशाल बैठक संपन्न हुई। बैठक में मौजूद सभी सेनानियों को अंग्रेजों ने
बौखलाकर बंदी बना लिया। अन्य सेनानियों के साथ संत जी को भी नारनौल, पटियाला,
नाभा, भटिण्डा तथा फरीदकोट की जेलों में बंद रखकर अनेकों यातनाएं दी गई। जेल में
स्वतंत्रता सेनानियों से माफी मंगवाना व भेद उगलवाना था। संत जी ने न माफी मांगी और
न भेद ही उगला।
इसलिए संत जी को एड़ी व पंजों पर मारकर यातनाएं दी गई। अन्त में पूरे देश के सभी
स्वतंत्रता सेनानियों के आगे अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े और भारत को आजाद करना
पड़ा। देश की आजादी के दिन नारनौल चौक पर बाबाजी ने अपने करकमलों द्वारा तिरंगा
झण्डा फहराया तथा विशाल जन समूह को प्रसाद भी वितरण किया। इस तरह उन्होंने देश
के स्वतंत्रता सेनानियों में अपना अग्रणी पंक्ति में नाम लिखवा लिया।
देश को आजादी मिलने के बाद संत जी गूता शाह पुर (राजस्थान में रहने वाले संत
भगवान नाथ के पास उनसे योग क्रियाएं सीखी और उनको अपना तीसरा गुरु बनाया।
यहां तक की उन्होंने कपिल सांख्य दर्शन, पांतजल योगदर्शन का गहन अध्ययन किया।
गीता का अध्ययन किया वहीं बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित गीता रहस्य नामक
पुस्तक का भी अध्ययन किया। भागवत के 18000 श्लोक उनको याद थे। संत जी ने
कनीना के पास पाथेड़ा गांव के बालू रेत के टीले पर तपती दोपहरी में आसन लगाकर
तपस्या की। फिर तो वो जहां भी जाते रेत के टीलों पर बैठकर घोर तपस्या में लीन रहते।
कहा जाता है कि वे जिस भी तपते टीले पर बैठे होते थे वह एकदम ठण्डा होता था। यह
सब उनकी साधना और करामात का ही चमत्कार था। संत जी राजस्थान के गांव
बीजवाड़ा चौहान के टीले पर बैठ साधना कर रहे थे उन्हीं दिनों वृद्ध (बूढ़े) संत बिहारी
दास जी ने कनीना सिहोर नौताना गांवों में विद्यालय भवन बनवाए  थे तथा उस समय
माजरी कलां में विद्यालय भवन का निर्माण करवा रहे थे। बाबा खेता नाथ की संत बिहारी
दास से वहीं मुलाकात हुई जो एक प्रेरणादायक रही तथा इसी प्रेरणा से उन्हें परोपकार के
कार्यों में गहन रुचि लेने की ठान ली।
संत जी की साधना चमत्कार व मीठी वाणी के वशीभूत होकर सेवक जन कुछ न कुछ
अवश्य चढ़ाते थे। चढ़ावे में आने वाले धन से बाबा ने गांव बीजवाड़ा चौहान, गादूवास
अहीर, बासना, लाडपुर, सीहमा, अटेली, डैरोली आदि हरियाणा व राजस्थान में विद्यालय
बनवाए। श्री कृष्ण जी के नाम पर जयपुर, अलवर, नारनौल में छात्रावास बनवाए।
नारनौल में पोलटैक्निक कालेज (तकनीकी महाविद्यालय) भवन का निर्माण किया।
मण्डी, अटेली, कंवाली, सिधरावली, नारनौल के कॉलेजों में व कन्या गुरुकुल, गणियार,
कुण्ड, मनेठी, दाधिया, खानपुर के गुरुकुलों में भरपूर सहयोग दिया। वहीं ढूमरोली,
विजयपुरा, खोडवा, शहबाजपुर, रामबास, कोथल, दुबलाना के स्कूलों में तथा विवेकानंद
कॉलेज नांगल चौधरी के भवनों के निर्माण में सहयोग के साथ-साथ संत जी ने अपने
करकमलों द्वारा आधारशिला भी रखी।
संत जी ने गुताशाहपुर, छापुर, नीमराणा, झुंझनू, बीड़, सीहमा, अटाली, डैरोली, गुलावला,
नारनौल, शाहबाजपुर में आश्रम में भव्य एवं कलात्मक मंदिरों का निर्माण करवाया। बाबा
खेतानाथ द्वारा निर्मित मन्दिराों की कलात्मकता देखते ही बनती है। बाबा द्वारा निर्मित
आश्रमों के साथ-साथ एक-एक गऊशाला का भी निर्माण करवाया। गऊशाला भले ही
छोटी क्यों न हों किन्तु उन्होंने गऊ प्रेमी होने का भी संदेश दिया। संत जी द्वारा निर्मित
विद्यालय आश्रम गऊशाला आदि पर व्यय धन केवल श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ावे के रूप में
चढ़ाए गए धन से ही हुआ। प्रत्येक आश्रम विद्यालय मन्दिर तथा गऊशाला में वृक्षारोपण
भी अधिक से अधिक करवाया। नीमराणा में तो कलात्मक सरोवर का भी निर्माण
करवाया वहीं एक विशाल उपवन का भी निर्माण करवाया। पर्यावरण संरक्षण में बाबा ने
जो भूमिका निभाई वह सदैव याद रहेगी। संत जी ने देश के कोने-कोने का भ्रमण भी
किया था। शायद ही कोई ऐसा संत हो जिसने इतना अधिक भ्रमण किया हो। उन्होंने
भ्रमण से शिक्षा प्रसार गऊ सेवा, समाज सेवा, पर्यावरण संरक्षण करना तथा साधूवचन
धारण करना सिखा था। वे एक अनुभवी महान संत थे उनके अनेकों अनेक शिष्य हुए।
निमराणा के जोशी होडामठ प्रवास के समय संत जी रह रहे थे। आश्रम के समीप
आशावली ढाणी में राह पर बने मकान से मातादीन के लड़के व बहू से अन्तिम भिक्षा
ली। जबकि संत जी के पास ही लोग लाखों रुपए चढ़ावे के रूप में चढ़ा देते थे। मगर
उन्हें अपने जीवन की अन्तिम भिक्षा लेने का लक्ष्य पूरा करने का था जो पूरा कर लिया
था। भिक्षा लेकर वे खेतों में पहुंचे तो वहीं पर प्राण त्याग दिए। बाबा खेतानाथ के जन्म व
मृत्यु का यह संयोग अनोखा था कि उनका जन्म भी खेत पर और मृत्यु भी खेत पर हुई
वह 28 दिसम्बर 1990 का एक मनहूश दिन था। जिसने एक साधू, शिक्षा प्रचारक,
समाज सेवी, स्वतंत्रता सेनानी, गौप्रेमी, पर्यावरण संरक्षक को हमसे छीन लिया था।
मातादीन के बेटे धर्मपाल ने संत जी को खेत पर गिरते देखा तो तुरन्त दौड़कर बाबा के
पास पहुँचा तो संत जी के मृत शरीर को देखकर बच्चों की तरह रो पड़े। रोते-रोते ही मठ
में पहुँचकर बाबा के शिष्य सोमनाथ को खबर दी। रात्रि हो रही थी। किन्तु रातोरात यह
दुखद समाचार समस्त क्षेत्र में ही नहीं अपितु हरियाणा के अस्थल बोहर के मठाधीश संत
चान्दनाथ के कानों तक भी पहुंच चुका था। इस दु:खद समाचार को जिसने भी सुना उन
सभी ने रात का भोजन पकाया ही नहीं। जिसने भोजन पहले से पकाया गया हुआ था
उन्होंने खाया ही नहीं। बाबा के शोक लहर ऐसे दौड़ गई थी कि जैसे भारत के प्रधानमंत्री
की मृत्यु हो गई हो। दूसरे दिन प्रात: ही सन्त चान्दनाथ (वर्तमान विधायक बहरोड़) के
अलावा हजारों साधु संत (नाथ पंथ ही नहीं अपितु सभी पंथों से) तथा देर किए बिना
शीघ्र ही टै्रक्टर-ट्राली, स्कूटर, मोटर बाइक ऊंट-रेहड़ी, मोटर गाड़ी जीप, बस ट्रकों से
दूर-दराज के भक्तजन लाखों की संख्या में उमड़ पड़े। समीप के क्षेत्र से तो भक्तजन पैदल
या साइकिल से ही पहुँचने लग रहे थे।
भक्तजनों में महिलाएं भी बराबर संख्या में थी जो भजन गाकर समूचे परिवेश में गूंज पैदा
कर रही थी। सभी लोग संत जी के अन्तिम दर्शन को आए थे। जिनकी संख्या हजारों
नहीं अपितु लाखों में थी और उन सभी की आँखें नम थी। अलवर जिला प्रशासन ने
भक्तों की संख्या भांपते हुए हजारों पुलिस कर्मी तुरन्त भेजे। इस बहाने हजारों पुलिस
कर्मियों ने भी बाबा के अन्तिम दर्शन किए। वहां से कोई उपद्रव थोड़े होना था सभी ने
शान्ति प्रिय ढंग से अपने प्रिय संत के अन्तिम दर्शन किए।
और संत जी के मृत शरीर को समाधि देकर सब भक्तजनों ने जोर-जोर से रोते हुए अपने-
अपने घरों को प्रस्थान किया।
बाबा खेतानाथ ने एक संस्था की तरह काम किया था। इसीलिए उन्हें एक चलती फिरती
संस्था के नाम से भी जाना जाता है। बाबा खेतानाथ के जीवन में सैकड़ों प्रेरक प्रसंग जुड़े
हुए हैं। जिनका अगर संक्षेप में भी जिकर किया जाता है तो भी एक बहुत बड़ा लेख बन
जाएगा। बाबा जी महाराज ने जीवन भर नशे, मांस, दहेजप्रथा का कड़ा विरोध किया वहीं
वह सेवकों को इनसे दूर रहने के लिए शिक्षा दिया करते थे। उनके सम्पर्क में आने वाले
बहुत से सेवकों ने उनकी शिक्षाओं का लाभ भी उठाया। वे अक्सर बच्चों को बलवान
देखना चाहते थे। इसीलिए बच्चों से सदा कहा करते थे।
माड़ा को ही जाड़ा मारै, माड़ा को ही घाम-
माड़ा को मारे राजा, माड़ा को ही राम
वह संत आज भले ही हमारे बीच नहीं है किन्तु उनके द्वारा दिखाए गए रास्तों को हम व
हमारी आने वाली पीढिय़ाँ सदैव उनके बताए रास्ते पर चलकर अपनाएंगे। उन्होंने हमें
कुमार्ग से हटकर सुमार्ग पर चलने का संदेश दिया है। ऐसे महान संत को भूलना हमारे
लिए एक शर्मकारी भूल होगी। हम परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उस महान
संत को पुन: इस पिछड़े क्षेत्र में भेजे ताकि वहां का अंधियारा छट कर उजाला मिल
सके। संत खेतानाथ ने तो ऐसे-ऐसे कार्य करके दिखाए जिन्हें सरकार भी आसानी से नहीं
कर सकती।
उन्होंने उस क्षेत्र को अपना कर्मस्थल बनाया था जहां प्रशासनिक रूप से विषमता थी और
प्राकृतिक रूप से भी पिछड़ा हुआ था। उसने मां मीनीदेवी की मृत्यु पर भी अचानक
आकर सभी को हैरत में डाल दिया था। पारा जमा देने वाली ठंड में भी अपने शरीर से
उनमें पसीना निकालने की अपार क्षमता थी। यह बाबा शान्तिनाथ द्वारा सिखाई गई विद्या
का ही चमत्कार था। उन्होंने वैद्य का काम न सीखकर केवल रोगियों को ही नहीं अपितु
समस्त मानव धर्म की सेवा में अपना जीवन लगाया था। उस महान संत को कोटि-कोटि
प्रणाम। (साभार रौताही 2011  )
                                                                          मु.पो.स्याणा, तह व जिला-महेन्द्रगढ़
                                                                          हरियाणा 123027, मो. 09466666118

यादवों से अपेक्षा

- आर.डी. यादव
हमारा यादव वंश बहुत महान वंश रहा है। हम यादव भगवान श्री कृष्ण के वंशज है और
यदुवंशी, कृष्णवंशी के नाम से जाने जाते हैं। हमारी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर दृष्टिपात किया
जाए तो यादवी वीरता का बखान हर युग में मिलता है। हमारी उत्पत्ति ही वीरता, शौर्यता
प्रदर्शन करने के लिए हुई है। सर्वधर्म, समभाव, प्रेम और शांति के लिए ही श्रीकृष्ण ने
यदुवंश में अवतार लिया और बांसुरी के माध्यम से पूरे विश्व को सद्भावना और प्रेम का
संदेश दिया, उन्होंने अन्याय और उत्पीडऩ से समाज को मुक्ति दिलाए हंै। यदि श्री कृष्ण
के आदर्शों का पालन यादव नहीं करेंगे तो कौन करेगा। दूसरों के उपदेश से यादव कैसे
प्रभावित होंगे। हमें उनके विचारों तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों को जाति  तथा समाज,
देशहित में अनुकरण करना चाहिए। यदि हम सबकी उनकी नीति के अनुसार आचरण
करने का निश्चय कर ले तों पुन: यादव जाति का सम्मान बढ़ेगा।
यदुवंशियों के विकास के मार्ग पर अनेक कुरीतियां, बाधाओं के रूप में आड़े आती हैं।
अशिक्षा, आर्थिक पिछड़ापन, वैचारिक एकाग्रता का अभाव, सुदृढ़ एकता में कमी,
संगठनों का विकासोन्मुख न होना, महिलाओं का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सहयोग प्राप्त न
होना, युवाओं की निष्क्रियता, विकास की ओर अग्रसर न होने की चाह सशक्त नेतृत्व का
अभाव तथा अन्य सामाजिक एवं गैर सामाजिक कुरीतियों की अधिकता का होना आदि
कारण प्रमुख हैं। इन मूलभूत  समस्याओं के रहते हुए यदुवंशी क्या कोई भी जाति विकास
रूपी चरम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता।
आज समाज में जो अशांति, असंतोष या विकृतियां देख रहे हैं वह सब हमारी गलत सोच
का परिणाम है। आज हर व्यक्ति स्वहित को प्राथमिकता देने लगा है। लोग कत्र्तव्यों के
प्रति उदासीन है, परन्तु अधिकारों  के प्रति अत्यधिक सचेत । लोगों को दूसरे के दुख दर्द
की कोई चिंता नहीं है लेकिन लोग भूलते हैं कि असली सुख तो दूसरों को सुखी देखने में
ही है। समाज से बुराइयों को दूर करने के लिए हर व्यक्ति को अपने नैतिक मूल्यों को
अहमियत देनी होगी।  दूसरों के सुख सुविधा का ध्यान रखना होगा। हम जो कार्य करें
उसके परिणाम के बारे में अवश्य सोंचे हमें कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे
हमारे समाज के नाम कोई धब्बा लगे।
समाज को गतिशील बनाएं रखने के लिए आज आवश्यकता है दृढ़ इच्छा शक्ति की,
आत्म विश्वास से भरे लोगों की जिन्हें केवल सामाजिक हित व जातीय प्रतिष्ठा को पुन:
स्थापित करने का लक्ष्य हो, बुजुर्ग समाज सेवकों को अपनी कुर्सी सस्नेह युवाओं को
देकर स्नेहिल मार्गदर्शन प्रदान करें, उन्हें अपने अनुभवों से समाज निर्माण व यादवोत्थान
का मार्ग प्रशस्त करें।
मनुष्य साहसी प्रवृत्ति का है इसलिये अनेक कार्य करने में वह सफल हो जाता है, जो
आमतौर पर असंभव लगता है। सफलता एवं उन्नति अपने हाथ-पैरों के बल और
आत्मविश्वास से मिलता है। हम अपनी शक्ति को पहचानें और पूरी तन्मयता से गन्तव्य
की ओर बढ़ चलें। अपने को ठीक कर लेने से चारों ओर का वातावरण बनने में देर नहीं
लगती। आज इस बात की आवश्यकता है कि हमारा समाज जो कि अभावग्रस्त है,
उसकी दुर्बलता को मिल जुलकर दूर करना होगा। कठिनाई और कष्ट का व्यवधान
उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहना है। ऐसी कोई भी सफलता नहीं है जो कठिनाईयों से
संघर्ष किए बिना ही प्राप्त हो जाती है।
इस हेतु समाज के गरीब, अपाहिजों, अशिक्षितों बेरोजगारों एवं शिक्षा से वंचित होनहार
छात्रों को योग्यतानुरुप सहयोग प्रदान करें। आकांक्षा, जागरुकता और परिश्रमशीलता से
बड़े से बड़े काम पूरे हो जाते हैं। हमारा समाज है तो ही हम हैं। समाज की शक्ति का
सहारा पाकर ही हमारी व्यक्तिगत क्षमताएं एवं योग्यताएं प्रस्फुटित होकर उपयोगी बन
जाती हंै। यदि हमारे गुणों और शक्तियों को समाज का सहारा न मिले तो वे निष्क्रिय होकर
बेकार चली जायेंगी। उनका लाभ न तो स्वयं हमकों ही होगा न समाज को।
आज समय की मांग है कि आप अपने शक्ति का, श्रम का, समय का बड़े से बड़ा हिस्सा
समाज के उत्थान में लगाएं। अंत में यही कहूंगा कि आप अपने कत्र्तव्यों और ज्ञान को
समाज के विकास के लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसित रहें।
                                                                             भारतीय नगर, बिलासपुर (छ.ग.)

Friday, 22 July 2011

एक भूली बिसरी लोकगाथा : पराक्रमी परसू

प्रा. आनंद यादव -
लोक साहित्य के अन्र्तगत लोकगाथाओं या कथाओं को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सदियों से गेय-गाथाओं या दन्त कथाओं के रूप में चली आ रही  ये लोक कथाएं हमारीसांस्कृतिक धरोहर ही नहीं अपितु एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। क्षेत्र-विशेष की उथल-पुथल व सांस्कृतिक विविधताओं की जानकारी हेतु लोकगाथाओं का विशद अध्ययन आवश्यक है, जिनमें तात्कालिक समाज के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्वरूप की स्पष्ट झलक मिलती है। इन लोक-कथाओं ने क्षेत्र-
विशेष के बाहर भी अपने पाँव पसार कर आंचलिक साहित्य व संस्कृति के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
परसू-पँवारा भी एक ऐसा ही लोक-काव्य है जो उत्तरी-भारत के अनेक अंचलों में बड़ी ही श्रद्धा व सम्मान के साथ गाया जाता है। पूर्वांचल में लोरिकी-गायन के अनुरूप ही
पश्चिमांचल मुख्यत: रूहेलखण्ड  मण्डल व उस से सटे जनपदों में पंवारा गायन की यह
लोकविधा शताब्दियों से जन-मानस को अनुप्रेरित करती आ रही है। रुहेलखण्ड में
'कन्नाईÓ या 'छिलडिय़ाÓ तो बुन्देलखण्ड क्षेत्र में धर्मा सांवरी व परसा की गाथा-रूप में
यह काफी लोकप्रिय है। जख, चोखली, वंश, ढोला व भाका आदि में 'कन्नाईÓ को
अपना विशेष स्थान प्राप्त है।
सूप, कोरों का पत्ता, घोंघी या मँूज आदि वाद्य यंत्रों की मदद से सात दिन, सात रातों तक
चलने वाली 'हरि अनंत हरि कथा अनन्ताÓ सदृश्य परसू-पंवाड़ा के मनोयोग पूर्वक गायन
से युगल सर्प फन उठा कर झूमने लगते हैं व रिमझिम पानी भी बरसने लगता है। ऐसी
लोक मान्यता है कि एक हाथ कान पर रखकर व दूसरा हवा में लहराते परसू-पंवाड़ा का
गायक कभी विजना घोड़ी पर सवार हाथ में कुररा लिये परसू की तरह मूंछों पर ताव देता
फड़कने लगता है तो कभी परसू की विजय श्री का वर्णन करते अपार खुशी से झूम उठता
है।
एक किंवदन्ती के अनुसार उ.प्रदेश के पीलीभीत जनपद में स्थित बिलई-खेड़ा के राजा
बलि के पास भारी मात्रा में पशुधन था, परसू सरदार उन का प्रधान ग्वाल था, नांद
पसियापुर से बिलई पसियापुर तक अनेक गौशालाएं बनी हुईं थीं, मार्ग में स्थित डण्डिया
भुसौड़ी से पशुओं का चारा-भूसा आदि रखा जाता था, कभी इस क्षेत्र में छड़ा, रसुईया,
बरा आदि विशाल गौड़ी ( गायों के चारागाह) व निजाम, अजीत, गूलर, भॉड़, भगा आदि
बारह डाण्डियाँ (गायों के बैठने के स्थान) आज भी है, परसुआ अटास्थित गौशाला से
दूध दूह कर प्रस्तर नालियों व सुरंगों द्वारा चक्र-सरोवर में लाया जाता था जहां उसका
मंथन होता था लगभग आधा क्विंटल भारी मथानी चक्र सरोवर के पास पड़ी है जिसकी
लोग पूजा करते हैं।
अंग्रेज पुरातत्वविद जनरल कनिंघम जो वर्षो पूर्व परसू ग्वाल का महल या अटारी कहे
जाने वाले परसुआ-अटा स्थल पर पहुंचे थे ने लिखा है 'परसुआ कोट राजा बलि द्वारा
अपने अहीर सेवक परसुआ के लिये बनाए गए भवनों का मंदिर के प्राचीन अवशेष है.Ó
धरातल पर 450 वर्ग मीटर लम्बे, 100 वर्ग मीटर चौड़े व 62 मीटर ऊंचे परसुआ कोट या
टीले का सावधानीपूर्ण उत्खनन किये जाने की आवश्यकता है।
परसू वीर तथा साहसी राजकुमार थे, अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद बांगर-बिलई
(बिलई-खेड़ा) अपने मामा राले सरदार की शरण में अनुज थोंदू व बहिन राजकुमारी
मिंगनी को लेकर पहुंचे, राले की पत्नी मामी साँवरी ने उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया,
राले सरदार ने दोनों राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्रऋ चलाने, मल्ल-युद्ध व गोपालन की उत्तम
शिक्षा-दीक्षा दी, परसू-थोंदू दोनों भाई 12 बहंगी दूध प्रतिदिन चकर तीर्थ के शिव मंदिर
में चढ़ाते थे, बैरी-विद्रोह गुरैना व बिल्हैना सांड़ सदा उन के साथ रहते थे।
बड़े भाई परसू का विवाह राजा सूरज मल की कन्या सनरिया देवी या शीला भवानी के
साथ व अनुज थेंदिया का विवाह नींबागढ़ रियासत में रानी द्विलरिया से हुआ था,
लोकगाथा की उक्ति :-
'आठ ब्याहीं, नौं धरी, सोलह गौने यार ददा परसू केÓ के अनुसार परसू के आठ विवाहित
रानियों के अतिरिक्त रणक्षेत्र में विजय प्राप्त कर व डोला स्वीकार कर लायी गई कई
रानियाँ थी।
दोनों भाइयों ने अपने मामा राले के कुशल निर्देशन में बाँगर-बिलई राज्य की रक्षा करते
हुए बर्द गुरहैना व मित्र र्दुजना गूजर की मदद से अनेक साहसिक कार्य किए, काली-
कीच, भूरा दानव, धीरा-विजयी व लच्छा बाघिन का अन्त, लखमा घोषित के 12 बेटों से
युद्ध, तेली राठौर से लड़ाई, लोहागढ़ की विजय, रानी मैनरा से विवाह, राजकुमारी फूल-
बघौरी से प्रेम-प्रसंग, कामरूप देश की विजय आदि अन्यानेक कार्य इस लोक-गाथा के
मुख्य विषय हंै, परसू की रानी शीला भवानी द्वारा अपने सतीत्व के बल पर साठ कोस दूर
गंगा-घाट तक सूखे में घन्नई ले जाना आश्चर्य चकित करता है तो धीरा-बाड़ी के
सरदारों, करौनिया दानव का अंत व कामरूप देश की मनसा व तमनसा जादूगरनियों के
मोह पाश से बच निकलने के प्रसंग रोमांचित भी करते हैं।
पराक्रमी परसू ग्वाल जगनिक कवि द्वारा रचित आल्हा खण्ड में वर्णित महोबा के वीर
सरदार, आल्हा-उदल, मलखान, ढेबा व ब्रह्मा के समकालीन बताए जाते हैं। सम्भल
(मुरादाबाद) के निकट मनोकामना तीर्थ पर पृथ्वीराज चौहान न नागाओं के साथ हुई
तीनों लड़ाइयों में परसू ग्वाल ने अपने मित्र मन्ना गूजर के साथ मिलकर डट कर
मुकाबला किया व सिरसागढ़ की अंतिम लड़ाई व बांदोगढ़ की लड़ाई में जहां राजकुमारी
सुरजा का अपहरण हुआ था अटूट शौर्य व पराक्रम प्रदर्शित करते हुए वीर गति प्राप्त की
थी, बांगर-बिलई (पीलीभीत) क्षेत्र में चकर तीर्थ के निकट भारी मथानी, परसुआ कोट,
पसियापुर व ध्यानपुर ग्रामों में गाय-बैलों की प्रस्तर प्रतिमाएं, कन्नापुर व गझनेरा में 4
मीटर व्यास के ऊंचे बुर्ज व बैठकें ओढ़ाकर का टीला, सांवरी, ताल सहित अनेक ताल
गौड़ी, डांडी आदि परसू से संबंधित  स्थलसे लोक गाथा की सत्यता के स्पष्ट प्रमाण हंै
किन्तु समय के अन्तराल से ये सभी प्रतीक व प्रमाण ध्वस्त व विलुप्त से होते जा रहे हैं।
भगवान श्री कृष्ण के वंशज विशाल गो-धन की सेवा-सुश्रुषा कर दूर-दूर तक अपनी
विजय-पताका लहलहाने वाले परसू ग्वाल की यह लोक गाथा उत्तर-भारत ही नहीं,
यादव समाज के गौरवमय अतीत की अमूल्य थाती है, खेद तो इस बात का है कि परसू
पंवाड़ा जैसी लोकप्रिय गाथा के मंचन, प्रदर्शन, लेखन व प्रस्तुतीकरण की दिशा में आज
तक कोई संगठित प्रयास ही नहीं किया गया है। न ही कोई आडियो, वीडियो, सीडी
कैसेट्स आदि का निर्माण ही किया गया है। परसू-थोंदू की अनेकानेक रोचक गाथाओं से
जुड़े परसू-पंवाड़ा पर तो पूरी एक फिल्म या सीरियल भी बनाया जा सकता है व इस
धारावाहिक के प्रसारण से जनमानस में इसकी लोकप्रियता को बनाए रख जीवन दान
दिया जा सकता है।
पूर्वांचल में लोरिकी-गायन के अनुरूप ही पश्चिमांचल व उत्तरी भारत में परसू-पराक्रम
की यह लोकगाथा जन मानस में अपार ख्याति व श्रद्धा अर्जित कर श्रुति व स्मृति के बल
पर जीवित है।
अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ पंवाड़ा गायक ही इस लोकगाथा के प्रमुख रक्षक कहे जा सकते हैं
जिन्होंने शताब्दियों से इसे अपने कण्ठों व स्मृतियों में अक्षुण्य बनाए रखा है। इस पीढ़ी के
समाप्त होते ही लोकविधा की इस अनूठी परम्परा की पहिचान व नामोनिशान भविष्य में
विलुप्त होने की पूरी आशंका है। राजप्रसादों व ऊंची अट्टालिकाओं में बैठ कर लेखनरत
इतिहासवेत्ताओं द्वारा उपेक्षा व विस्मृति के बाद भी बांगर-बिलई की माटी में यह
लोककाव्य आज भी महक रहा है व पँवाड़ा का नायक परसू ग्वाल जनमानस के मन-
मस्तिष्क में अपनी अमिट छाप बनाए हैं।
44 नेहरु मार्ग, पो. टनकपुर 'नैनीतालÓ
(उत्तरप्रदेश), पिन- २६२३०९
(साभार रऊताही-2011  )


Monday, 18 July 2011

जन्माष्टमी पर यदुवंशी बच्चों का होगा सम्मान

बिलासपुर. बिलासपुर जिला सर्व यादव समाज के तत्वावधान में गत 26 वर्षों से लगातार
आयोजित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव इस बार 21 व 22 अगस्त को आयोजित किया
जाएगा. जानकारी देते हुए बिलासपुर सर्व यादव समाज के अध्यक्ष उमाशंकर यादव ने बताया कि
दो दिवसीय इस आयोजन में 21 अगस्त को बच्चों एवं महिलाओं की विभिन स्पर्धा होगी
जिनमें रंगोली, राधा कृष्ण सज्जा, एकल भज एवं एकल नृत्य और पेंटिंग प्रतियोगिता 15
वर्ष तक के बच्चों के लिए तथा कुर्सी दौड़ महिलाओं के लिये आयोजित होगा. वहीं 22
अगस्त जन्माष्टमी के दिन राघवेन्द्रराव सभा भवन से भवय शोभयात्रा निकाली जायेगी जो
सदर बाजार गोल बाजार तेलीपारा बस स्टैड होते हुए श्रीकृष्णधाम यादव भवन में समापन
होगा. यही विभिन्न प्रतियोगिताओं का पुरस्कार वितरण तथा प्रतिवर्ष किया जाने वाला
समाज के बड़े बुजुर्गों का अभिनंदन तथा प्रतिभा सम्मन में 5 वी, 8 वीं, 10वीं 12वीं
स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण समाज के छात्र-छात्राओं का
सम्मान आदि कार्यक्रम होंगे. प्रतिभा सम्मान के लिए 10 अगस्त तक मार्कशीट की
फोटोकापी रामचरण यादव रामकुमार यादव तेरस यादव शैलेन्द्र यादव रामपुरी यादव
कुलदीप यदुराज विजय यादव तिजेन्द्र यादव जवाहर यादव भागवत यादव श्रीमती
अहिल्या यादव मुन्नी यादव पूर्णिमा यादव के पास अथवा जिला के अन्य पदाधिकारियों
के पास जमा कर सकते हैं. श्री यादव ने बताया कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शोभयात्रा मेंसभी
अन्य हिन्दू समाज को भी शामिल होने हेतु आमंत्रित किया जायेगा.

Friday, 1 July 2011

भ्रष्टाचार की परिभाषा

जो चीज़ अत्यधिक व्यापक हो जाती है उसकी परिभाषा देना उतना ही मुश्किल होता है। परंतु तर्कशास्त्र के आधार पर इसे सिद्ध किया जा सकता है। जैसे ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है परंतु किसी को दिखाई नहीं देता है। लेकिन है। इसी तर्क पर भ्रष्टाचार को भी सिद्ध किया जा सकता है कि वह है। कहाँ है? कैसा दिखता है? उसका स्वरूप क्या है? आइए इसी आधार पर कुछ कोशिश की जाए कि भ्रष्टाचार किसे कहते हैं? जब एक बार रोग के लक्षणों के आधार पर इसका निदान हो जाए तो इलाज भी किया जा सकेगा।
भ्रष्टाचार के लक्षणों की पहचान करने के लिए अपने कुछ हम सोच वाले साथियों के साथ चर्चा की और यह तय किया गया कि हर व्यक्ति भ्रष्टाचार के एक लक्षण की पहचान करेगा और फिर समूह चर्चा के दौरान उसे बताएगा। इस निर्णय के बाद हम सब इस असाध्य काम में लग गए।
अपने-अपने असाइनमेंट को पूरा करने के बाद हम सब जब इकट्ठा हुए तो एक-एक करके अपने शोध परक विचार प्रस्तुत करने के लिए अपने बीच से ही एक संयोजक मनोनीत किए। फिर उसके समक्ष प्रस्तुतीकरण का सत्र शुरू हुआ। पहले शोधकर्ता ने संयोजक को संबोधित करते हुए आभार व्यक्त किया कि मुझे इस गुरुतर कार्य में योगदान करने का अवसर दिया गया और उसके बाद उन्होंने दार्शनिक की मुद्रा में कहा कि जहाँ तक हमारी दृष्टि गई हमें भ्रष्टाचार नज़र आया। संयोजक ने तुरंत टोका कि हमें तो भ्रष्टाचार को पहले परिभाषित करना है। हमें तो यही नहीं मालूम कि भ्रष्टाचार है क्या? अतः पहले भ्रष्टाचार के लक्षण तो बताएँ। उन लक्षणों में से निचोड़कर परिभाषा देना तो संयोजक का काम है। इसलिए आप भ्रष्टाचार के लक्षण गिनाएँ।
इसके बाद प्रथम पुरुष ने अपनी दूर और व्यापक दृष्टि को थोड़ा संकुचित किया तथा छोटे दायरे में भ्रष्टाचार के लक्षण खोजने की कोशिश की एवं बहुत कोशिश करके नेताओं के अंदाज़ में कहा कि भ्रष्टाचार समाज में लगा दीमक है जो समाज की जड़ को खोखला कर रहा है। संयोजक ने फिर टोका कि भ्रष्टाचार क्या है? इस बार कुछ और संकुचित हुए और किसी बुद्धिजीवी के रूप में थोड़ा संयत हुए और बोले कि भ्रष्टाचार को परिभाषित करने के लिए हमें कार्ल मार्क्स, लेनिन, नेहरू, लोहिया आदि के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए और भ्रष्टाचार की परिभाषा वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के संदर्भ में संशोधित करके नियत करना चाहिए। अब संयोजक को लगने लगा कि ये सज्जन हमें भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। अतः उनसे कहा कि यह आपके लिए अंतिम अवसर है। यदि इस बार भ्रष्टाचार के लक्षण नहीं बताएँगे तो हम समय नष्ट नहीं करेंगे और अगले शोधकर्ता को आमंत्रित करेंगे। अब उस सज्जन ने अपने अंतिम प्रयास में आम आदमा की तरह भ्रष्टाचार के लक्षण को परिभाषित करने का प्रयास किया और बताया कि "ईमानदारी, सदाचार, नैतिक सिद्धांतों का ह्रास होना भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि वाह क्या मौलिक परिभाषा दी है भ्रष्टाचार की।
इसके बाद संयोजक ने द्वितीय पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन के दिमाग़ में, विषयांतर होने पर संयोजक के टोकने की बात ताज़ा थी अतः बोले कि मैं सीधे ही परिभाषा पर आता हूँ। एक दूसरे शोधकर्ता ने टिप्पणी की कि यह कहने की क्या आवश्यकता है? सीधे ही परिभाषा पर आइए न। सज्जन ने कहा कि ठीक है ठीक है परिभाषा पर ही आता हूँ। अतः उन्होंने कहा कि "शुद्धता या ईमानदारी की हानि, दुष्टता की ओर झुकाव और अशुद्धता एवं रिश्वतखोरी ही भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि परिभाषा में नए आयाम जोड़े हैं।
इसके बाद संयोजक ने तृतीय पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन ने कोई भूमिका नहीं बाँधी और सीधे ही कहा कि "शुद्ध, सरल या सही से च्युत होना, अच्छे से बदलकर बुरा बनना ही भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि आम आदमी की समझ में आने वाली परिभाषा दी है भ्रष्टाचार की। संयोजक को समझ में नहीं आया कि लोग किस बात की तारीफ़ कर रहे हैं? इन परिभाषाओं से तो मुझे ही नहीं समझ में आया कि भ्रष्टाचार क्या है तो आम आदमी को क्या समझ में आएगा कि भ्रष्टाचार क्या है?
इसके बाद संयोजक ने चतुर्थ पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन ने भ्रष्टाचार की परिभाषा इस प्रकार की - "अनुचित साधन (रिश्वत के रूप में) द्वारा प्रलोभन देकर, लोक सेवक को कर्तव्य का उल्लंघन करने (घोर अपराध करने) के लिए प्रेरित करना भ्रष्टाचार है।" इस बार संयोजक कुछ संतुष्ट नज़र आए। लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी।
इसके बाद संयोजक ने पंचम पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। पंचम पुरुष से कहा कि "किसी साधन या कृत्य द्वारा, किसी किन्हीं लोगों की ईमानदारी या निष्ठा को कम करना, ग्रामीण भोलेपन की प्रवृत्ति को समाप्त करने का प्रयास करना ही भ्रष्टाचार है।" इस बार भी संयोजक को लगा कि भ्रष्टाचार की परिभाषा कुछ समझ में आने वाली नहीं है और असंतुष्ट नज़र आए। फिर भी इस बार उन्होंने भी ताली बजाई और बधाई दी क्योंकि यह अंतिम शोधकर्ता था। इसके बाद उन्होंने कहा कि इन सब लक्षणों का समावेश करते हुए आसान, सर्व समावेशी और तर्क संगत परिभाषा बाद में घोषित करूंगा और बैठक बर्ख़ास्त कर दी।
चारों ओर भ्रष्टाचार का शोर है। सदाचार और नैतिकता का ज़ोर है। फिर भी बरकत नहीं है क्योंकि नीयत की खराबी है। अब इन लक्षणों से भ्रष्टाचार की परिभाषा आप कर सकते हों तो इसे सिविल सोसायटी के पास भेज दिया जाए ताकि लोकपाल विधेयक में संशोधन किया जा सके।
-डॉ दलसिंगार यादव