Sunday, 24 February 2019

छत्तीसगढ़ी संस्कार गीत

संस्कार हमारे जीवन को सुसंस्कृत बनाते हैं। सुसंस्कारों के अभाव में मनुष्य जीवन पशुतुल्य हो जाता है। मनुष्य मात्र के आचारों, व्यवहारों व क्रियाओं से उसके संस्कारों का सहज ज्ञान, उसकी श्रेष्ठता या निकृष्टता का अनुमान लगाया जा सकता है। संस्कार, संस्कृति का द्योतक है। संस्कार मनुष्य की पहचान है, जो जीवन की मूल संक्रियाओं से उत्पन्न होते हैं और जीवन को संस्कारित करते हैं। संस्कार जीवन परिष्कार के आधार हैं। सौजन्य, सौहाद्र्र और समन्वय के स्त्रोत  भी।
विश्व में भारतीय संस्कृति का बड़ा सम्मान है। भारतीय जीवन संस्कारों से सराबोर है। भारतीय जीवन का शिष्ट पक्ष हो या लोक पक्ष, इनमें संस्कारों की संप्रभुता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक भारतीय जन जीवन में संस्कारों का विशेष महत्व है। प्रत्येक कार्य में संस्कारों का विधान है। ये विधान हमें परम्परा से प्राप्त हुए हैं। हमारे धर्म शास्त्रों में सोलह संस्कारों का विधान है। इनमें गर्भाधान, सधौरी (पुंसवन) जन्म, मुण्डन, कर्ण छेदन, यज्ञोपवित, विवाह, मृत्यु संस्कार आदि प्रमुख हैं। ये संस्कार हमारे जीवन को आत्मोन्नमुखी और समाजोन्मुखी बनाते हैं और जीवन में नए अध्याय की शुरुआत करते हैं। छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में जन्म संस्कार, विवाह संस्कार और मृत्यु संस्कार ही प्रमुख है।
जन्म संस्कार :
लौकिक व परलौकि दोनों ही दृष्टि से संतान प्राप्ति महान व पुण्य कार्य है। मनुष्य के पास कितनी ही अकूत चल-अचल संपत्ति क्यों न हो?  मान-सम्मान क्यों न हो? अगर वह संतानहीन है, तो सारी संपत्ति सारा मान-सम्मान वृथा है। संतान प्राप्ति मनुष्यमात्र की सबसे बड़ी इच्छा होती है। ऐसी मान्यता है कि संतानहीन व्यक्ति अपने पितृ ऋण से उऋण नहीं होता। उसका उद्धार नहीं होता। समाज में नि:संतान स्त्री हो या पुरुष  उसकी उपेक्षा और अवहेलना की जाती है। ऐसे लोग संतानहीनता के कारण दु:खी रहते हैं। संतान-सुख के सामने संसार के अन्य सारे सुख और आनंद निरर्थक लगते हैं। संतान प्राप्ति सौभाग्य का सूचक, आनंद और हर्ष का विषय है। संतान प्राप्ति के अवसर पर मनाया जाने वाला उत्सव इस बात का साक्ष्य है।
छत्तीसगढ़ में जन्म संस्कार की अपनी लोकव्यापी परम्परा है। यहां गर्भाधान से लेकर संतानोत्पत्ति तक आनंद और मंगल की बेला होती है।
सधौरी :
सधौरी संस्कार प्रथम गर्भाधान के सातवें माह में सम्पन्न होता है। इस समय मायके वालों को आमंत्रित किया जाता है। मायके  पक्ष के लोक सधौरी लेकर आते हैं। जिसमें वस्त्राभूषण व सात प्रकार के व्यंजन होते हैं। इन व्यंजनों में ठेठरी, खुरमी, पपची, लाडू, कुसली, सोहारी, करी होते हैं। गर्भवती स्त्री की ओली भरी जाती है और सात प्रकार के पकवान खिलाकर अन्य स्त्रियाँ भी पकवान खाकर साध पूर्ण करने की कामना करती हैं। स्त्रियाँ आनंद के इस क्षण में सधौरीगीत गाकर अपनी खुशियों का इजहार करती हैं-
महल म ठाढ़े बलम जी
अपन रनिया मनावत हो
रानी पी लो मधु पीपर
होरिल बर दूध आवे हो
कइसे के पियंव करु कासर
अउ करु कासर हो
कपूर बरन मोर दाँत
पीपर कइसे पियंव हो
मधु पीपर नई पीबे
त कर लेहूँ दूसर बिहाव
ओहिच पी ही पीपर हो
पीपर के झार पहर भर
सउत के झार जनम भर
सेजिया बंटाथे हो
कंचन कटोरा उठावव
पी लेहँ मधु पीपर हो
छट्ठी :
शिशु जन्म के पश्चात शिशु की रोदन किलकारी के साथ घरवालों के चेहरों पर हँसी-खुशी नाचने लगती हैं। नवजात शिशु के आगमन से सारा घर आलोकित हो उठता है। शिशु जन्म से लेकर कांके विसर्जन तक स्त्रियों द्वारा गीत गाए जाते हैं। इस बीच काँके पानी व छट्ठी (जन्मोत्सव) का नेंग सम्पन्न होता है। छट्ठी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। इस समय गाए जाने वाले गीत ''सोहरÓÓ  गीत कहलाते हैं। छत्तीसगढ़ी जन्म गीतों में सोहर गीत ही प्रधान हैं। इन गीतों में महिलाओं के मनोभाव, ननंद भौजी के हास-परिहास, सास-ससुर, जेठ-जेठानी का सहयोग या उपेक्षा, उनकी हंसी खुशी, नोंक-झोंक ताने आदि समाहित हैं। रामकृष्ण जन्म से संबंधित गीतों की प्रमुखता है। यह लोक की ही उदारता है कि सामान्य परिवार में जन्म लेने वाले शिशु की तुलना राम और कृष्ण से की जाती है। सामान्य माता-पिता को कौशिल्या व दशरथ की संज्ञा दी जाती है। झोपड़ी या मिट्टी का घर भी महल का मान पाते हैं। यह छत्तीसगढ़ी सोहर गीतों का वैशिष्ट है-
काखर भए सिरिरामे
काखर भए लछमन हो
ललना काखर भरत भुवाल
सोहर पद गावँव हो।
कौसिल्या के भए सिरिरामे
सुमित्रा के लछमन हो
ललना केकई के भरत भुवाल
सोहर पद गावँव हो।
कोन घड़ी भए सिरिरामे
कोन घड़ी लछमन हो
ललना कोन घड़ी भरत भुवाल
सोहर पद गावँव हो-
सुभ घड़ी भए सिरिरामे
सुभ घड़ी लछमन हो
ललना सुभ घड़ी भरत भुवाल
सोहर पद गावँव हो-
छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में मुंह जुठारना (अन्न प्रासन), झालर उतारना (मुंडन संस्कार) कान छेदना (कर्ण छेदन) के भी संस्कार होते हैं।  केवल सवर्णों में ही बरुआ (यज्ञोपवीत) संस्कार संपन्न होते हैं। कुछ पिछड़ी जातियों में विवाह के समय प्रतीक रुप में बरुआ संस्कार करने की परम्परा है। ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य जाति में बरुआ उपनयन संस्कार के गीत मिलते हैं। जिसे बरुआ गीत कहा जाता है। बरुआ गीत की बानगी
हाथे म धरो छतरंगी, खखोरी चिपे पाटी हो
बरुआ के बोलम मोर बरुआ भीखम लाल
हम का ब्राह्मण बनावा हो
पंडित के बोलेव मोर पंडित महंगूराम
हमका ब्राह्मण बनावा हो।
अइसन तपसी जातितेन बाबूराय
मूंगा-मोती सहेज रखितेनु हो
अइसन तपसी जातितेन भाँचा मोर
कामधेनु मंगा रखितेन हो।
विवाह संस्कार :
भारतीय संस्कृति में विवाह एक प्रमुख संस्कार है। विवाह के माध्यम से दाम्पत्य जीवन में बंधकर दो अपरिचित, दो आत्माएं एक हो जाती हैं। यह दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। जिससे दो परिवारों के साथ ही अन्य परिजन और स्वजन आत्मीय बंधन में बंध जाते हैं। छत्तीसगढ़ में विवाह संस्कार के समय गाए जाने वाले गीत ''बिहाव गीतÓÓ  कहलाते हैं। गड़वा बाजा अर्थात सींग, दफड़ा, टिमकी, मोहरी और मंजीरा के साथ ये गीत हमारी आत्मा को संतृप्त करते हैं। छत्तीसगढ़ी विवाह में अनेक नेग होते हैं। जिनमें मंगनी, चुलमाटी, मड़वा, देवतला, तेलचघ्घी, हरदाही, चिकट, मायन, मायमौरी, नहडोरी, नकटा नाच, परघौनी, लालभाजी, कुंवर कलेवा, टिकावन-भाँवर, बिदा आदि प्रमुख नेग है। प्रत्येक नेंग कें अलग-अलग गीत हैं। कुछ प्रमुख नेंगों में गाए जाने वाले गीत इस प्रकार हैं-
मंगनी :
वैवाहिक नेंग (परम्पराएं) मंगनी के साथ प्रारंभ होती है। मंगनी अर्थात सगाई- यह वर कन्या के कुल खानदान के साथ ही उनकी जन्म कुण्डली आदि का मिलान कर सम्पन्न की जाती है। तब नारी कंठों से विवाह गीतों की अविरल धारा प्रवाहित होने लगती है।
सजन जोरन बर आयेन ये समधी
सजन जोरन बर आयेन
जोरे गठुरी झन छूटे ये समधी
जोरे गठुरी झन छूटे
लुगरा मंगायेंव सुघर चुक ले ये समधी
लुगरा मंगायेंव सुघर चुक ले
ओहू लुगरा हवय हल्का
ले जा तोर नाक म अरो ले ये समधी
ले जा तोर नाक मे अरोले
लगिन:
''लगिन बारातÓÓ के दिन लग्न देखकर पंडित की उपस्थिति में विवाह की तिथि (मुहुर्त) तय की जाती है। सुविधानुसार मंगनी का लगिन साथ-साथ संपन्न होती है-
तोरे अंगना म मैं आयेंव होई रे मैं आयेंव
तोर घर के दुआरी ल नई पायेंव होई रे होई रे
साते दुवारी पूछत आयेंव रे पूछत आयेंव
तोर घर के मुहारी ल नई पायेंव होई रे होई रे
बागे बगीचा बाबू के डेरा हो बाबू के डेरा
थोरिक पानी पिया दे, धरम के बेरा, होई रे होई रे
चुलमाटी :
चुलमाटी जाने के पूर्व आँगन में सुवासा व सुवासिनों द्वारा हरे बाँस का मड़वा विधि-विधान पूर्वक गड़ाया जाता है। दो बाँसों की जोड़ी बनाकर गड्ढे में सुपाड़ी हल्दी व सिक्का डालकर यह रस्म पूरी की जाती है। तत्पश्चात सुवासिनों व महिलाएं गांव के पवित्र स्थान यथा तालाब या गौठान से मिट्टी लाती हैं। तब महिलाएं चुलमाटी गीत गाती हैं।
तोला माटी कोड़े ल तोला माटी कोड़े ल
नई आवय मीत धीरे-धीरे
धीरे-धीरे तोर बहिनी के कनिहा ढील धीरे-धीरे
जतके ल परसे ततके ल लील धीरे-धीरे
तोला साबर धरे ल, तोला साबर धरे ल नई आवय मीत धीरे धीरे
धीरे-धीरे तोर तोलगी ढील धीरे-धीरे
जतके ल परसे ततके ल लील धीरे-धीरे।
मड़वा छवई:
छत्तीसगढ़ में विवाह  तीन तेल, पांच तेल या सात तेल चढ़ाकर सम्पन्न किया जाता है। चुलमाटी के दूसरे दिन आँगन को गुलर की डालियों से छाया जाता है। मंडपाच्छादन का यह कार्य सुवासा व अन्य लोगों द्वारा किया जाता है। जीजा या फूफा द्वारा ही सुवासा का कार्य किया जाता है। मंडप के कोने में हल गाड़ा जाता है। यह छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति का द्योतक है। गुलर की डालियाँ छाने के साथ ही मंगरोहन व पिढली इसी लकड़ी से बनाई जाती है। यह लोक परंपरा गाँवों में आज भी जीवित है। मंगरोहन मंगल काष्ठ है। जो वर-वधु के मंगल का प्रतीक है। मंगरोहन गुलर की लकड़ी से ही बनाए जाने के पीछे यह किवंदती प्रचलित है कि महाभारत काल में गांधार नरेश की बेटी गांधारी जब विवाह योग्य हुई तब उसकी सगाई हुई, जिससे उसकी सगाई हुई उस वर की मृत्यु हो गई। पुन: सगाई होने पर दूसरा वर भी मृत्यु को प्राप्त हुआ। जिससे गांधारी की सगाई होती वह काल का ग्रास बनता। राजा ने पंडितों से इसका कारण जानना चाहा। पंडितों ने राजा को इस अपशकुन से बचने के लिए सलाह दी की पहले गांधारी का विवाह गुलर (डूमर) के पेड़ से करो। क्योंकि बचपन में गांधारी ने बात स्वभाव के अनुसार खेलते-खेलते गुलर पेड़ में बने घोंसले को तोड़कर चिडिय़ा के बच्चों को नुकसान पहुँचाया था। तब गुलर पेड़ ने उसे श्राप दिया था। यह जानकर राजा ने गांधारी का विवाह गुलर पेड़ से किया। लोक जीवन में यह परम्परा अपशकुन से बचने के लिए किया जाता है-
डूमर डारा के दाई मड़वा छवई ले
बरे बिहे के रहि जाय
के ये मोर दाई सीता ल बिहाये राजा राम
बखरी के तीर-तीर दाई पड़की परेवना
कनकी ल चुनि-चुनि खाय
के ये मोर दाई सीता ल बिहाये राजा राम।
देवतला :
लोक मानस आज भी अपने लोक देवी देवताओं को पूजा में प्राथमिकता देता है। विवाह में यह आमंत्रण देवतला कहलाता है। महिलाएं स्थानीय मंदिरों में जाकर ठाकुर देव, शीतला, साहड़ादेव, हनुमान आदि देवी-देवताओं को हल्दी व तेल का लेप चढ़ाती है। विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होने की कामना कर आशीर्वाद लेती हैं तथा विवाह कार्य में शामिल होने के लिए आमंत्रित करती हैं। इस समय महिलाएं रास्ते में गीत गाकर व देवालयों में नाचकर अपनी खुशियों को व्यक्त करती हैं-
तोर घर आयेन बइठ नई केहे
का गुन का गोठियाबो रे भाई
आमा ल मारे झेंझरिया-झेंझरिया
अमली ल मारे तुसार रे भाई
बैगिन ल मारे बोली बचन में
के खड़े-खड़े पछताय रे भाई
खड़े-खड़े पछताये
तेल चघ्घी- मंडप को गोबर से लीपकर चौक पूरा जाता है। मंगल कलश जलाए जाते हैं। वर-कन्या को अलग-अलग उनके घरों में सुवासिनें हाथ में हल्दी लेकर अधोअंग से उपांग की ओर पांच या सात बार चढ़ाती हैं। इसे तेल चढ़ाना कहा जाता है-
एक तेल चढिग़े, एक तेल चढिग़े ओ हरियर हरियर
मड़वा म दुलरु तोर बदन कुम्हलाय।
रामे ओ लखन के दाई रामे आ लखन तेल चढ़त हे
जहवाँ के दियना मोर करय ओ अंजोर
कोन तोर लाने मोर हरदी-सुपारी
कोन तोर लाने काँचा तिलि के तेल
कोन चढ़ावे तोर तन भर हरदी
कोन देवय तोला अँचरा के छांव
फुफु चढ़ावे तोर तनभर हरदी
दाई देवय तोला अँचरा के छाँव
नहडोरी गीत :
वर का तेल उतारने के बाद नहडोरी का नेंग सम्पन्न होता है। उसे वस्त्राभूषण से अलंकृत कर उसके हाथ में कंकन बांधा जाता है-
दे तो दे तो दाई आसी ओ रुपैया
के सुंदरी ला लातेंव ओ बिहाय
के मोर दाई सुंदरी ल लातेंव ओ बिहाय
सुंदरी-सुंदरी बेटा तुम झन रटिहौ ग
के सुंदरी के देस बड़ दूर
के मोर बेटा सुंदरी के देस बड़ दूर
तोर बर लानिहौं दाई रंधनी-परोसनी
के मोर बर घर के सिंगार
के मोर दाई मोर बर घर के सिंगार
मौरसौंपनी :
दूल्हे के माथे पर मौर (मुकुट) बंधा जाता है। कमर में कटार, मुंह में पान का बीड़ा। सूरज की तरह दमकता दूल्हा का चेहरा। महिलाएं मौर सौंप कर दूल्हा को दुल्हन लाने के लिए बिदा करती हैं-
पाँचे ओ अंगुरी म दाई पानी छिटकारे
सउँपव दाई मोर माथे के मउर
पाँचे हाथे म सउंपव चंदा ओ सूरुज ल
पांचे हाथे व सउंपव मोर माथे के मउर
काजर अंजई ले सोने कजरउटी
सउंपव दाई मोर माथे के मउर
नकटा नाच :
बारात प्रस्थान करने के बाद घर में केवल महिलाएं रह जाती हैं। घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं रह जाता। अत: महिलाएं रात्रि में नाना प्रकार का स्वांग नाच-गान करती हंै। पुरुष का वेश धारण कर हास-परिहास और मनो विनोद करती हैं। यह नकटा नाच कहलाता है। यह महिलाओं का आनंदोत्सव है-
उतरो-उतरो सुवना अरछिन-परछिन
फोलो चना कई दारे हो महारंगी सुवा
जीव नैना लड़ा के उडि़ चले
उडि़ चले नई तो भागि चले महारंगी सुवा
नई उतरन हम अरछिन-परछिन
नई फोलन चना कई दारे हो
हमतो उतरबो समधिन के अंगना
समधिन के रस लेबे हो महारंगी सुवा
भड़ौनी गीत :
बारात जब वधु के गाँव पहुँचती है, तब बारातियों का स्वागत किया जाता है। महिलाएं हास-परिहास युक्त भड़ौनी गीत गाकर प्रेम आनंद को अभिव्यक्त करती हैं-
बने-बने तोला जानेंव समधी
मड़वा म डारेंव बाँस रे
जाला-पाला लुगरा लाने
जरगे तोर नाक रे।
दार करे चाँउर करे
लगिन ल धराय रे
बेटा के बिहाव करे
बाजा ल डर्राय रे
मेछा हवय लाम-लाम
मुँह हवय करिया रे
समधी बिचारा का करे
पहिरे हवय फरिया रे।
टिकावन गीत :
मंत्रोच्चार के साथ वर-वधु का पाणिग्रहण सम्पन्न होता है। इस समय कन्या के माँ-बाप द्वारा टिकावन में पचहर (पांच बर्तन) व अन्य सामग्रियाँ दी जाती हैं। स्वजन, परिजन सभी यथाशक्ति टिकावन टिकते हैं-
हलर-हलर मड़वा डोले ओ
अवो दाई खलर-खलर दाईज परे ओ
कोन तोर टिके नोनी अचहर-पचहर
के कोन तोर टिके धेनु गाय
दाई तोर टिके नोनी अचहर-पचहर
के ददा तोर टिके धेनु गाय
कोन तोर टिके नोनी लिलि हंसा घोड़वा
 के कोन तोर टिके कनक थार
भाई तोर टिके नोनी लिलि हंसा घोड़वा
के भऊजी तोर टिके कनक थार
भाँवर गीत :
अग्नि की साक्षी में फेरे पड़ते हैं और दो आत्माएं एक हो जाती हैं। यह नेंग ''भॉवरÓÓ  कहलाता है। महिलाओं द्वारा ''भाँवरÓÓ  गीत गाए जाते हैं-
हलु-हलु पाँव धरौ ओ दुल्हिन नोनी
तुँहर रजवा के अंग झन डोलय वो
हलु-हलु पॉव धरौ हो दूल्हा बाबू
तुँहर रनिया के अंग झन डोलय हो
एक भाँवर एक जुग भइगे वो दुल्हिन नोनी
तुँहर रजवा के अंग झन डोलय ओ।
बिदाई गीत :
बेटी की विदाई का क्षण बड़ा हृदय विदारक होता है। माँ-बाप के हृदय में जहां बेटी के व्याह सम्पन्न होने की खुशी होती हैं, वहीं उसकी पराई होने, दूर जाने का गम होता है। आँखों के कोरों से आँसू छलक  पड़ते हैं। बिदा गीतों के माध्यम से करुणा की अजस्र धारा फूट पड़ती है। सभी सुबक-सुबक कर बेटी को बिदा करते हैं।
अलिन-गलिन म दाई मोर रोवय, दाई मोर रोवय
ददा रोवय मूसर धारे ओ दीदी, ददा रोवय मूसर धार
बहिनी बिचारी लुक-छिप रोवय, लुक छिप रोवय
भाई करे दण्ड पुकार, ओ दीदी भाई करे दण्ड पुकार
अंसुअन तुम झन ढारिहौ बहिनी ढारिहौ बहिनी
सबके दुख बिसराहौ दीदी, सबके दुख बिसराहौं।
मृत्यु संस्कार :
मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। जो आया है व जाएगा ही। मृत्यु से कोई बच नहीं सकता। छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में मृत्यु संस्कार के समय गीत गाए जाने की परम्परा ''कबीर पंथीÓÓ  समुदाय में है। हमारे संत-महात्माओं ने इस शरीर को नश्वर तथा आत्मा को अनश्वर बताया है। इन गीतों में शरीर की क्षणभंगुरता और आत्मा की अनश्वरता का बखान होता है-
बंगला अजब बने रे भाई, बंगला अजब बने रे भाई
ये बंगला के दस दरवाजा, पवन चलावय हंसा
आवत-जावत कोनो नई देखे, ईश्वर कर मनसा।
हाड़ चाम के ईटा बनाए, लहू रकत के लोहा
रोवा केस के छानही बन हे, हंसा रहे सुख सोवा
गजब सुघ्घर बने हे बंगला, ऊपर चाम छाया
हंसा भुलागे इही बंगला म, छोड़ नई हे काया
करे पाप हंसा इहें रहिके, होवय नहीं इही बंगला
अग्नि कुंड म बासा करिहि, होवय नास इही बंगला
रइही अमरपुर में हँसा, करय रात दिन मंगला
बंगला अजब बने रे भाई...
छत्तीसगढ़ी संस्कार गीतों में लोक जीवन की समग्रता समाहित है। लोक जीवन के सुख-दुख, हर्ष विषाद, जय-पराजय आदि उसके कंठों से निसृत होने वाले लोकगीतों में स्पष्ट रुप से प्रतिबिम्बित होते हैं। लोकगीत लोकजीवन के लिए संजीवनी का  कार्य करते हैं। एक प्रकार से लोकगीत लोकजीवन के सहचर हैं।
जहां लोकजीवन है वहां लोकगीत है और जहां लोकगीत है वहां लोकजीवन। लोकजीवन में लोक संस्कारों की अपनी अलग ही महत्ता है। ये संस्कार लोकजीवन के आधार स्तंभ हैं। इन लोक संस्कारों में लोकगीतों की परिव्याप्ति है। जन्म संस्कार हो या विवाह संस्कार या फिर मृत्यु संस्कार सब में लोकगीतों का साम्राज्य है। लोकगीतों के बिना लोक का कोई भी कार्य संपादित नहीं होता। अत: ये लोकगीत हमारे संस्कारों के संवाहक हैं और संस्कार जीवन की
अनिवार्यता हैं।
साभार रऊताही 2015

कुमाउनी लोकगीत उत्तराखण्ड की शान

लोकगीतों को परिभाषित करना उतना ही कठिन कार्य है जितना सूर्य को दीपक दिखाना। लोकगीत जीवन की स्थूल सूक्ष्म और सहज स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। लोक संस्कृति मानव धर्म है और लोक गीत धरती के गीत हैं। मानव अपनी खुशी, हर्ष, उत्साह या दु:ख दर्द को गीतों के माध्यम से प्रकट करता है और जब यह भाव उसके मन से प्रस्फुटित होते हैं तो उसकी अपनी का ही चोला पहनते हैं और इसी से लोकगीतों का जन्म होता है।
लोकगीत वह है जो लोक का रंजन करे। कुमाउनी लोकगीत यहाँ की लोकसंस्कृति की अलग पहचान है। उत्तराखण्ड अपने विशिष्ट लोकगीतों, लोकनृत्यों और लोक वाद्ययंत्रों की धुन से परिपूर्ण और गुंजायमान है। जटिल भौगोलिक स्थिति में कठोर परिश्रम कर जीवन यापन करने वाले लोग, विभिन्न प्रकार के लोकगीतों के माध्यम से अपनी थकान को विस्मरित करते हैं। धर्म, संस्कार, प्रकृति, देवी देवता और पर्व लोकगीतों की रीढ़ बनते हैं।
गीत, वाद्य और नृत्य के समन्वय को संगीत कहा जाता है। लोकगीतों की सृष्टि गेयता के आधार पर होती है। गायन का वाद्य तथा नृत्य से अभिन्न संबंध होता है। कुमाऊ  के सभी लोकगीत गेय हैं और उनके साथ प्राय किसी न किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग भी अवश्य होता है। अधिकांश लोकगीत नृत्य के साथ प्रचलित हैं। इसमें वाद्य यंत्रों की ताल इतनी ओजपूर्ण होती है कि पैर खुद ही थिरकने लगते हैं। अत: इस प्रकार के नृत्य से संबंधित लोकगीतों को नृत्य गीत कहना अधिक समीचीन रहेगा लोकगीतों के भावों के अनुरुप ही इसमें नृत्य का विधान रहता है।
प्रत्येक क्षेत्र की अपनी परंपरा है, अपने त्यौहार उत्सवों को मनाने का अपना तरीका है। भिन्न-भिन्न त्यौहारों उत्सवों पर आनन्द की प्राप्ति के लिए अपनी रचनाएं गीत आदि लोगों के द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं। इन्हें विभिन्न वर्ग समूहों में बांटा गया है जैसे धार्मिक गीत, ऋतु गीत, संस्कार गीत आदि।
धार्मिक गीत- जैसे आन्ठू या अष्टमी में कुमाऊ में प्रचलित पर्व में गाये जाने वाले गमरा मैंसर (गौरा-ममेश्वर) के गीत।
संस्कार गीत- शादी-ब्याह, यज्ञोपवीत, नामकरण आदि में गाये जाने वाले गीत।
ऋतु गीत- जैसे होली, शरदोत्सव आदि में गाये जाने वाले गीत। कुमाउनी होली का लोक संगीत में अपना महत्व है। जिस प्रकार का वर्णन इन होलियों में है, वैसी होली सम्भवत ही भारत में कहीं गाई जाती है। कुमाउनी होली में अपने इष्ट से लेकर सभी देवी देवताओं का पूजन किया जाता है और उन्हें याद किया जाता है।
कृषि गीत-जैसे हुड़का बुल। खेतों की जुताई करते समय, कटाई करते समय कृषक का उत्साह ठण्डा न पड़े, या उसे अपने काम में थकान ना महसूस हो, इसलिए कृषि गीत गाये जाते हैं। जैसे हिटो दीदी हिटो भोला, हिट वे बैना घास कटैना, पार डाना....।
इसी प्रकार से कितने और न जाने लोकगीतों की रचना कुमाऊ की धरती की देन है। जिसे देखकर यही प्रतीत होता है कि जितना रंगीला कुआऊ है, उतने ही रंगीले यहां के लोग। कोई भी उत्सव गीत संगीत के बिना अधूरा सा लगता है। कठोर पर्वतों पर भी निवास करते हुए यहां के लोग अपने हृदय में एक कोमलता लिए हुए हैं। जिसकी देन है यहां का लोक संगीत, मन को लुभाता और एक जोश और उत्साह भरता लोक संगीत।
यहां के गीतों में जो रिदम होती है तथा वाद्य यंत्रों के साथ जो तारतम्य होता है उसको सुनकर पैर नृत्य के लिए खुद ही उठने लगते हैं। लोकगीत और लोकनृत्य लोक जीवन की अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम है। थोड़ा सा काम से फुरसत मिली कि थकान मिटाने और उल्लास व्यक्त करने के लिए नृत्य और गीतों की महफिल प्रारंभ हो जाती है। मेले इन गीतों के रंग स्थल है। अत: प्रत्येक व्यक्ति के मन में मेलों कौतिकों में जाने की उत्कट हौस रहती है। दो-दो, तीन-तीन दिन की पैदल यात्रा करके एक दिन के नाच गान के लिए वह मेले में जा पहुंचता है। लोक कवि  दो दिन के अस्थाई जीवन में नाचने गाने को अनिवार्य मानते हैं, कहते हैं- नाचि ल्हियो खेलि ल्हियो, दवि दिन वचन।
लोक नृत्य के बिना लोक गीतों का महत्व कम हो जाता है इसलिए कुछ लोक नृत्यों को नामांकित कर रही हूं।
1. छोलिया नृत्य - यह कुमाऊ का परंपरागत नृत्य है। हर पर्व उत्सव में प्राय: किया जाता है।
2. हिल जात्रा - हिल जात्रा पिथारोगढ़ जनपद के सौर क्षेत्र में मनाये जाने वाले उत्सव विशेष हैं। इसमें समूह में नृत्य किया जाता है।
3. हिरन चिन्तन- आन्ठू के अवसर पर अस्कोट पट्टी में हिरन चिन्तल नामक लोक नृत्य का आयोजन होता है। इसमें नगाड़े और दमाने एक  ही स्वर क्रम में बजते हैं और नृत्य मुद्राओं को प्रदर्शित करने तथा पदक्रम संचालन में सहयोग देते हैं।
4. छपेली चन्चल गति एवं क्षिप्रता से युक्त नृत्य गीत छपेली है। छपेली का आयोजन प्राय: मेलों एवं खेल कौतिकों में होता है। विषय की दृष्टि से छपेली प्रेम एवं श्रृंगार प्रधान नृत्य गीत है। इसका मुख्य वाद्य यंत्र हुड़का है। ''हाय तेरी रुमाल गुलाबी मुखडी...।ÓÓ
5. चीन्चरी - चीन्चरी कुमाऊ की प्रसिद्ध सामूहिक नृत्य गीत शैली है। चीचरी का आयोजन मुख्यत: मेलों, उत्सवों, पर्वों एवं मांगलिक कार्यों के अवसर पर होता है।
6. झोड़ा- गायन हेतु परस्पर हाथ जोड़कर दो दलों द्वारा गाये जाने के कारण ये गीत झोड़ा कहलाये जाते हैं।
7. भ्वीन- भ्वीन में पौराणिक एवं स्थानीय देवी देवताओं, राजाओं और ऐतिहासिक पुरुषों की गाथाएँ गाई जाती हैं।
8. उजागर नृत्य- इस नृत्य के मूल में लोक मानस का आदिम धार्मिक विश्वास निहित रहता है।
9. गमरा नृत्य - गमरा नृत्य का अर्थ है अष्टमी के दिन गौरा को लेकर किया जाने वाला नृत्य।
10. ठुलखेल- पिथौरागढ़ जनपद के अस्कोट क्षेत्र में इस नृत्य का विशेष प्रचलन है। ठुलखेल में रामकथा के विविध प्रसंगों को प्रबन्धात्मक रुप में गाया जाता है।
11. चैती-बसन्त आगमन पर ऋतु गीतों और रितुरेन गायन के साथ यह नृत्य चलता है।
12. भडा- भाट अथवा चारणों द्वारा गाई जाने वाली भटों की गाथा क को भडा कहा जाता है।
उत्तराखण्ड संगीत और वाद्य यंत्रों का विस्तार - कुमाउनी गीतों और नृत्यों का परस्पर अभिन्न संबंध है। कुमाउनी गीतों और वाद्यों ने न सिर्फ उत्तराखण्ड और भारत में अपनी पहचान बनाई वरन विदेशों में भी यह अपनी जगह और पहचान बना रहे हैं। अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के संगीत के प्रोफेसर स्टीफन सिओल ने उत्तराखण्ड के ढोल दमाऊ मसक जैसे वाद्य यंत्रों पर शोध करने का मन बनाया और 2010 में सोहनलाल और उनके भाई सुक्वारु दास के शिष्य बनकर अनेक वाद्य यंत्रों को सीखा। उनसे प्रभावित होकर इन्होंने अपना नाम फ्याली दास रख लिया। इन वाद्य यंत्रों को बजाते समय बोली जाने वाली वार्ताएं, जागर, चैत्वाली, ऐतिहासिक कथाएं और मांगलिक गीतों का भी प्रशिक्षण प्रापत किया। प्रश्ििाक्षत होकर अमेरिका लौटने पर इन्होंने ढोल मसक को पाठ्य क्रम में एक विषय के रुप में सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा जिसे मान लिया गया। सिनसिनाटी विश्व विद्यालय ने सोहन लाल और सुक्वारु डस को विजिटिंग प्रोफेसर के रुप में आमंत्रित किया है।
बेडू पाको बार मासा हो नाराय काफल पाकी चैता मेरी छैला (गीतकार स्व. ब्रजेन्द्र लाल शाह, संगीतकार स्व. मोहन उप्रेती) इस गीत को प्रथम बार 1952 में नैनीताल के जी.आई.सी. में गाया था। परन्तु जब तीन मूर्ति भवन दिल्ली में प्रादेशिक संस्कृतियों के समन्वय उत्सव पर गाया गया तो पंडित नेहरु ने इसे लोक संगीत तथा लोक गायन में सबसे बेहतर स्थान दिया।
चिपको आंदोलन में भी कुमाउनी लोकगीतों ने लोगों को बहुत प्रोत्साहित किया और चिपको आन्दोलन को आगे बढ़ाया। गीत की एक बानगी देखिए
जग्या हम बिज्या हम, अब नी चलली चोरों की।
घोर अपणू बीन अपणू, अब नी चलली औरों की।।
माटू विकिगी पाणी विकिगी, बिकी गया हमारा बौन भी।
हाथ खाली छन पेट खाली छ:, ठिकाणु नी रैगी रौन कू
इस तरह कुमाउनी लोक गीतों ने बहुत लोकप्रियता अर्जित की है। जहां तक लोक संस्कृति और लोकगीतों के विकास का प्रश्न है, मेरे विचार से इनके विकास के विषय में सोचना वैसे ही होगा जैसे हम किसी पूर्ण विकसित फूल को विकसित करने का विचार करें। हमें लोकगीतों को संरक्षित करने की, संजोने की आवश्यकता है। यह हमारी पहचान हैं।
वह लोकगीत जो हमारे बुजुर्गों के साथ-साथ काल कवलित होता जा रहा है, उसे नई पीढ़ी को एक नए कलेवर के साथ हस्तांतरित करें। वे लोक गीत एवं लोक वाद्य जिनकी गूँज से कभी वादियाँ झूम उठती थी, पैर थिरकने लगते थे, जन जीवन श्रम की थकान एवम् अपने कष्टों को भूलकर मदमस्त हो उठता था, शनै:शनै: उसके स्वर मंद पड़ते जा रहे हैं। वे मात्र पुस्तकों की और संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। जो कभी हमारे पूर्वजों की खोज, तपस्या एवं साधना का परिणाम था, हमारा अभिज्ञान था आज अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज इन धरोहरों को आवश्यकता है हमारे ध्यानाकर्षण की, हमारी श्रद्धा की, संरक्षण के साथ-साथ इन लोकगीतों को पुन: उजागर करने की। इसके लिए जरुरी है कि देश के अन्य संगीतकारों, कलाकारों की भांति इन लोक कलाकारों को भी समय-समय पर पुरस्कारों से नवाजा जाए। विवाहादि शुभ अवसरों पर अपने लोक गायकों को आमंत्रित करना चाहिए। इससे उनमें उत्साहवर्धन के साथ-साथ मनोबल की भी वृद्धि होगी और अपने पूर्वजों की धरोहर भावी पीढ़ी को सौंपने में उन्हें गौरवानुभूति होगी। साथ ही भावी पीढ़ी भी उसे सहर्ष स्वीकार करेगी। इससे हमारी लोक प्रचलित कलाएं, परम्पराएं और संस्कृति स्वत: जीवन्त रहेंगी और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहेंगी।
साभार रऊताही 2015

Thursday, 21 February 2019

लोकगीतों में सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की प्रखर अभिव्यक्ति

छत्तीसगढ़ राज्य विविध लोकगीतों, लोकनृत्यों और बोलियों का संगम स्थल है। लोकगीतों में सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम्  की प्रखर अभिव्यक्ति इसकी विशिष्टता की परिचायक है। गीत साहित्य की अत्यंत सूक्ष्म एवं प्राणवंत विधा है। जबकि लोकगीतों ने हमारी सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता को सजाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। गीतों का जन्म किसी अज्ञात कवि के मुख से लोक जीवन में हुआ। यही कारण है कि लोकगीत, लोकजीवन का श्रृंगार ही नहीं वरन् उसकी आत्मा का प्रतीक है। लोकगीतों में वस्तुत: कवि की नहीं वरन् जनसमाज की वाणी मुखरित होती है। छग में विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग विविध तरह के गीत गाये जाते हैं। ये जनभावना के सच्चे प्रतीक होते है। सधौरी गीत, सोहर गीत, ददरिया, बांस गीत, फाग गीत, फूगड़ी गीत, करमा गीत, जसगीत, पंडवानी, पंथी, चूलमाटी, तेलमाटी, भांवर, विदा गीत, सुआ गीत, डण्डा गीत, देवी गीत, हरेली, गेडी गीत, छेरछेरा, भोजली गीत, गौरा गीत, जवारा गीत, मडई व राउत नाचा में गाये जाने वाले गीत व दोहे जैसे-आंचलिक लोकगीतों में आंचलिक बोलियों के सौंदर्य के साथ ही यहां के निवासियों के हृदय की निश्छलता, सहृदयता व भक्तिभावना की स्पष्ट झलक दिखाई पड़ती है। लोकगीतों की गंगोत्री आदिकाल से गतिमान है। सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् की भावना के साथ युगों-युगों से प्रभावित यह अविरल निर्झरणी जन-जन के हृदय को सींचती है।
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार- ''ग्राम गीत आर्येत्तर के वेद हैं।ÓÓ  जबकि आचार्य श्री रामचंद्र शुक्ल का मानना है कि ''मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है।Ó उसकी अपनी सत्ता का ज्ञान लोकबद्ध है। लोक के भीतर  ही कविता का या किसी कला का प्रयोजन और विकास होता है।Ó  लोकगीतों में नारी, माता, पत्नी, बहन, आदि अनेक रुपों में सामने आती है। इन गीतों में नारी जीवन के दु:ख दर्द का वास्तविक चित्रण होता है। नारी गीतों में संगीत तत्वों का पर्याप्त समावेश होता है, जिसका वास्तविक मूल्यांकन लोकगीतों की मौलिक स्वर-लहरियों के आंचल में ही संभव है। जो गीत कर्णप्रिय हो, हृदय को झंकृत करें वह विशेष अंचल की बोली में जब गाया जाये और जन-जन के कंठ का हार बने वह लोकगीत कहलाता है। समाज लोकगीतों के दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखता आया है। लोकगीतों को गाकर मजदूर और कृषक जहां अपनी थकान मिटाते हैं, वही नारी इन्हीं गीतों के माध्यम से अपने जीवन के सुख-दु:ख का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है। नारी के सुआ गीत, भोजली, ददरिया आदि गीतों में उनके प्राणों के वेदना की स्पष्ट दिग्दर्शन होता है उन गीतों की प्रवाहशीलता में हृदय द्रवीभूत हो जाता है।
लोकगीतों में रंग-बिरंगे परिधानों में इन्द्रधनुषी छटा बिखेरते हुए ग्रामीणों में जीवन के प्रति आस्था के स्वर हिलोरे मारते दृष्टिगोचर होते हंै। लोकगीतों की अविरल धारा को प्रवाहित करते ये विभिन्न क्षेत्रों में गाये जाने वाले गीत अपनी अनुपम छटा इस प्रकार बिखेर रहे हैं।
1. चुलमाटी गीत-
तोला माटी कोड़े ल, नई आवय मित धीरे-धीरे
धीरे-धीरे तोर कनिहा ल ढील धीरे-धीरे
तेलमाटी-
एक तेल चढग़े वो हरियर-हरियर मोर हरियर-हरियर
मड़वा मा दुलरु तोर बदन कुम्हलाय।
3. भांवर गीत-
जनम-जनम गांठ जोर दे ये जोड़ी जनम-जनम गांठ जोर दे
4. बिदा-
अलिन-गलिन मा दाई रोवय ददा रोवय मूसरधार वो
बहिनी बिचारी लुक-छिप रोवय, भाई के दण्ड पुकार वो।
5. ददरिया गीत- बटकी मा बासी, अउ चुटकी मा नून
मय गावत हंव ददरिया, तंय कान दे के सुन
6. बांस गीत- कारी-कारी दिखे करिया, कारी भादो रात
बनेच करिया संग भांवर परगे, दिन भेटव ना रात।
7. राउत नाचा-
सोना मोल बेचागे चांदी, चांदी मोल मे ताम रे
माटी मोल बेचावत हवय अस मानुष के चाम रे।
8. सुआ गीत-
तरी हरी नाना मोर ना ना ना, मय का जानव, मय का करव
9. छेरछेरा गीत- छेरछेरा-छेरछेरा, कोठी के धान ल हेरते हेरा।
ग्रामीण जीवन अपने पर्वों का स्वागत लोकगीतों के माध्यम से करता है। छ.ग. का ददरिया, सावर-भादो की तरह नहीं बरसता वरन बारहमासी रस से रस विभोर करता है। सावन की भोजली, भादो शुक्ल की एकादशी से करमा, क्वांर शुक्ल में जवारा, कार्तिक मास में गौरी-गौरा तथा सुआगीत, बसंत ऋतु में डंडा गीत, फागुन में फागगीत, चैत्रशुक्ल में माता सेवा व रामनवमी में रामधुन के धुन में हमारी लोक संस्कृति महत्वपूर्ण लोकगीतों का श्रृंगार किये हुए दिखाई पड़ती है। विवाह के अवसर पर चुलमाटी, तेलमाटी, हरदाही, नहडोरी, परगहनी, रातीभाजी, समधीभेंट, भड़ौनी, भांवर, टीकावन, व बिदा गीत जैसे नेगो में भी लोकगीतों के सुन्दर छटा का दिग्दर्शन भंलीभांति होता है। घर की चौखट से गुड़ी के गोठ व चौपालों तक, खेत से खलिहानों तक बालक, युवा, वृद्ध और महिलाएं लोकगीतों की रसवंती धारा में निमग्न रहते हैं। लोकगीतों की मौखिक परंपरा श्रुति परम्परा ही रही है जो समय के साथ ही निरंतर आगे बढ़ रही है। लोकगीतों को समूचे काव्य की जननी माना गया है। लोकगीतों की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी मनुष्य जाति की। यही कारण है कि वाचिक परंपरा में लोकगीत, लोकहृदयों व कंठों में आज सुरक्षित है तभी तो लक्ष्मण मस्तुरिहा की ये रचना आज भी लोकप्रिय है- ''मय बंदत हव दिनरात वो मोर धरती मइया जय होवय तोर।ÓÓ
लोकगीतों का सफर नई पीढ़ी के नए भावों के साथ लोकगायकों, कलाकारों, कथाकारों, पत्रकारों, पारम्परिक त्यौहारों के माध्यम से निरंतर प्रवाहित हो रही है। इन लोकगीतों में ऐसी हजारों-हजार पंक्तियां है जिनमें विचार, सिद्धांत, व्याख्या के साथ ही नव रसों का सागर भी समाहित है। करुणा, व्यंग्य और श्रृंगार की बेजोड़ अनुभूति के साथ ही साथ आडम्बर, आध्यात्म, भ्रष्टाचार, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक विसंगतियों पर गहरे कटाक्ष भी हैं। लोकगीतों के महान गायक व प्रचारक के रूप में जिन महानविभूतियों का स्मरण मुझे आ रहा है मैं उनके नामों के अंकन का एक गिलहरी प्रयास कर रहा हूं। जिन महापुरुषों का नाम भूलवंश अंकन नहीं हो पाएगा वे अथवा उनके जानकार मुझे क्षमा करते हुए मेरे शब्द पुष्प का स्वीकार करेंगे। संत कवि पवन दीवान, संत कृष्णा रंजन, रामरतन सारथी, हीरलाल काव्योपाध्याय, प्यारेलाल गुप्त, चतुर्भुज देवांगन, द्वारिका प्रसाद विप्र, रामकैलाश तिवारी, विमल पाठक, डॉ. विनय पाठक, पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, डॉ. पालेश्वर शर्मा, दानेश्वर शर्मा, मुकुंद कौशल, प्रभंजन शास्त्री, मेहतर राम साहू, ऊधोराम, बद्री विशाल, हरि ठाकुर, लाला जगदलपुरी, हनुमंत नायडू, पं. रविशंकर शुक्ल, दादू सिंग, नारायण लाल परमार, जीवन यदु, कोदूराम दलित, झाड़ूराम देवांगन, तिजन बाई, सुरेन्द्र दुबे, नंदकिशोर तिवारी, कृष्ण कुमार भट्ट, हेमनाथ यदु, बुधराम यादव, ममता चंद्राकर, लक्ष्मण मस्तुरिहा व प्रसिद्ध बांसुरी वादक तथा भरथरी गायक मेरे पूज्य पिता पं. चंदूलाल तिवारी जैसे महान हस्तियों ने छग महतारी के आंचल में बिखरे लोकगीतों की अनमोल मोतियों को संजाने संवारने का प्रयास किया है हमें निश्चित तौर पर लोक गीतों की महत्ता पर गर्व होना चाहिए इस परम्परा के निर्वहन में अपना तन मन धन समर्पित करने हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए।
साभार - रऊताही 2015

ओडिय़ा लोकगीतों में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना

'लोक शब्द का अर्थ विश्व ब्रह्माण्ड की तरह व्यापक है। सामान्यत: लोक का अर्थ आम जनता या जन सामान्य के रुप में ग्रहणीय है। कन्ध, गण्ड, परजा, गदबा, कोल्ह, भूइयां सरीखे आदिवासी गिरिजनों से लेकर ग्राम शहर के अशिक्षित अर्धशिक्षित जन सामान्य इस लोक के परिसर में आते हैं। इस जन समुदाय की संस्कृति ही लोक संस्कृति है। लोक साहित्य, लोक कला, लोक संगीत, लोकाचार आदि लोक संस्कृति के अंग है। मूलत: लोक जीवन में प्रचलित साहित्य ही लोक साहित्य है। 'लोकÓ शब्द को परिभाषित करती हुई श्रीमती प्रमोदा पण्डा लिखती हैं- 'लोकÓ एक लाक्षणिक शब्द है। व्यक्ति, जन समुदाय, भूमण्डल आदि इसके शाब्दिक अर्थ है, पर पारिभाषिक अर्थ में इसकी संज्ञा स्वतंत्र है। इस लोक का तात्पर्य केवल जन समुदाय नहीं है। यह एक प्राचीन पारंपरिक, विश्वास निष्ठ, अन्त:सम्बन्ध संपन्न जन समुदाय को ही इंगित करता है। आधुनिक प्रगतिशील तथा व्यक्ति स्वातंत्रयवादी जन समुदाय के संदर्भ में यह प्रायोगिक नहीं है।
अंग्रेजी में 'लोकÓ शब्द के पारिभाषिक अर्थ के रुप में  स्नशद्यद्म शब्द व्यवहृत है। प्रारंभिक दौर में समाज के नीचे तबके के लोगों के लिए यह शब्द प्रयुक्त होता था। पश्चिमी विद्वान हॉर्डर (॥द्गह्म्स्रद्गह्म्) ने पहली बार व्यापक अर्थ में इस  स्नशद्यद्म शब्द का प्रयोग किया। इस शब्द को जर्मन विद्वान थॉमस  (ञ्जद्धशद्वड्डह्य) ने एक नई रुप रेखा दी और उन्होंने  स्नशद्यद्म रुशह्म्द्ग शब्द को लोक साहित्य के लिए इस्तेमाल किया। पाश्चात्य समाजशास्त्री बर्ने (क्चह्वह्म्ठ्ठद्ग) की नवीन आलोचना दृष्टि ने इस फोकलोर शब्द को मौखिक रुप से लोक साहित्य या लोककला के रुप में ग्रहण किया और फिर लोक साहित्य शास्त्री मर्यादा हासिल करने में कामयाब हुआ। इसके बाद फोण्र्टर, रथबेनिडिकेड, रेडफील्ड, पोटर, सरीखे पश्चिमी आलोचकों ने इसे व्यापक रुप दिया और साहित्य को लोक साहित्य एवं शिष्ट साहित्य के रुप में स्वतंत्र भागों में बांटते हुए इसे साहित्यिक प्रतिष्ठा दी।
ओडि़शा की लोक संस्कृति का तात्पर्य यहां के मूल निवासियों, अधिवासियों की कला, साहित्य, संगीत, परंपरा, आचार-विचार, रहन-सहन, तीज-त्यौहार, पर्वोन्सव आदि का समाहार है। ओडि़शा के सर्वप्राचीन मूल निवासी के रुप में शबर समुदाय कोमाना जाता है। शबर यहां के मूल निवासी है। इन शबरों द्वारा ओडि़शा वासियों के आराध्यदेव भगवान जगन्नाथ की प्रतिष्ठा व पूजा अर्चना शुरु हुई थी। उसके बाद यहां द्रविड़ आए और फिर आर्य आए, जिन समुदायों ने आर्यों की अधीनता स्वीकार कर ली, वे समाज के निम्न जाति के रुप में पहचाने जाने लगे। जिन लोगों ने उनके अधीन रहना पसंद नहीं किया और उनसे परास्त होकर वन जंगलों में जाकर रहने लगे वे गिरिजन या आदिवासी के रुप में परिचित हुए। इन जन समुदायों की सामूहिक जीवन जिज्ञासा ही ओडि़शा की लोक संस्कृति है।
लोक संस्कृति को अज्जीवित करने वाला साहित्य ही लोक साहित्य है। जो साहित्य लोकग्राह्य है, वही लोक साहित्य है। खुले आसमान में उड़ते पक्षी की तरह यह स्वतंत्र है, इसमें न तो कोई बंधन है और न ही कोई नीति नियम। यह प्रचारधर्मी नहीं है। लोक साहित्य के सर्जक गुमनाम रहते हैं। वे प्रतिष्ठा, ख्याति, यश के लोभी नहीं होते। परिपूरित मन के उन्मुक्त भाव इसके मूल सम्बल है। नित-नवीन रुप परिवर्तन इसका प्राणधर्म है। विशिष्ट ओडिय़ा समालोचक डॉ. गौरांग चरण दाश इसकी व्यापकता सिद्ध करते हुए कहते हैं- 'समाज  के प्रत्येक वर्ग की जीवन जिज्ञासा, जीवन आदर्श, जो मनुष्य के लिए ग्राह्य है जो अन्तरचेतना को अभिभूत कर सके। जिसके अंदर वे अपनापन तलाश सकें, वही उस जनसामान्य का साहित्य, कला संगीत तथा व्यापक पैमाने पर लोक हृदय का उद्गार ही लोक साहित्य है, वही लोकवेद है।
लोक साहित्य मनुष्य की बात करता है। मनुष्य की नित दिनचर्या के जीवन प्रसंग, सुख-दुख आंसू मुस्कान से यह साहित्य अतिरंजित है। प्रताप सहगल की इन स्पेष्टोक्तियों से इसे और बारीकी से समझा जा सकता है- लोक साहित्य में जितनी अनगढ़ता है, कच्चापन है, उतनी ही उसमें मिट्टी की खुशबू भी है। उसमें एक सम्मोहन है। मानवीय संवेदनाओं का वाहक है लोक साहित्य, वह कभी हिंसक नहीं होता, सांप्रदायिक भी नहीं, संकुचित भी नहीं। वह तो समूह धर्मी है, सामाजिक प्रतिबद्धता है उसमें। लोक साहित्य मौखिक वाचिक परंपरा में उज्जीवित है। इसमें लोक जीवन की सच्चाई प्राकृतिक रुप से रुपांकित होती है, अत: नैसर्गिकता इसका प्राण तत्व है।Ó
लोक साहित्य मनुष्य के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का परिप्रकाश है। वसन्त के मलयानिल की तरह हमारे मन को आनन्दित, पुलकित करने वाला साहित्य है। यह हमेशा हमें अपने परिवेश से, अपनी परिस्थिति से तथा पूरी प्रकृति से रागात्मक संबंध कायम करता है। यह मनुष्य के बीच मुखा-मुख, कानों-कान वाचिक, मौखिक रुप से प्राणवन्त है। स्वच्छ, सरल, पवित्र, मन्थर गति से गतिशील निर्झर झरने की तरह हमारे तन मन को रसाप्लुत करते हुए युगों-युगों तक पाठक समाज को मोहाविष्ट करता यह लोक साहित्य चिर-प्राकृतिक है, शाश्वत है। इसमें ग्राम जीवन की आशा-आकांक्षाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति, अपेक्षित है, अत: यह हृदयग्राही है। लोक साहित्य के तीन प्रमुख अंगों में लोकगीत, लोककथा  एवं लोक नाट्य में से लोकगीत का महत्व सर्वोपरि है।
लोकगीत मानव हृदय का प्रथम स्फुरण है। सबसे पहले मनुष्य के अन्तर्मन से गीतों के रुप में उसकी भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। आदिम युगीन मनुष्य जब घने जंगल में जीवन जी रहा था, फल-फूल उसका आहार था, पेड़-पौधों का वल्कल उसका परिधान था। उस समय वह अपनी सभ्यता, संस्कृति से अनजान था। उस समय उसकी ज्ञान परिसीमा सीमित  थी। उस समय प्राकृतिक आरण्यक परिवेश, प्राकृतिक सुषमा, आकाश की नीलिमा, फूलों का सौरभ झरने की कल-कल नाद, पक्षियों का कूजन, बारिश की रिमझिम ध्वनि, विस्तृत हरीतिमा आदि मनुष्य के मन को न सिर्फ रम्य रंजित करते थे, वरन उसके अन्त:करण को उद्वेलित करते थे। उसी समय उसके कण्ठ से हृदय का उच्छवास उसके कण्ठ से गीतों के रुप में प्रस्फुटित होता था, यही प्रारंभिक गीत लोकगीत है। लोकगीतकार, प्रकृति के प्रागंण में बैठकर प्राकृतिक विषयों को लेकर गीत गाता चला गया है, अत: लोकगीत कृत्रिम न होकर प्राकृतिक है।
ओडिय़ा लोक साहित्य के अन्वेषक लोकरत्न डॉ. कुंजबिहारी दाश के शब्दों में, ''लोक गीत प्राचीन है, फिर चरि नवीन है। युगान्तर में बाह्य परिवेश होने पर भी प्राचीनधारा निरंतर प्रवाहित होती है। पुराने युगों का संदेश लोक गीतों के जरिए हमारे पास पहुंच सका है। इस दृष्टि से लोक साहित्य शिष्ट साहित्य का जनक है, नियामक है। लिपि उद्भावन से पहले यह मौखिक रुप से प्रचलित था, बाद में लिपिबद्ध हुआ। नए-नए रुप रंगों के साथ लोकगीत अतीत से वर्तमान, वर्तमान से भविष्य की ओर गतिशील होने लगा।ÓÓ अर्थात लोकगीत अतीत का साक्षी, वर्तमान का वाहक और भविष्य का रक्षक है। यह निराश मन में नई आशा-संचार करता है, जीवन जीने की कला सिखाता है। समाज को स्वस्थ, सुंदर बनाने के साथ-साथ यह हमारे अंदर प्रेम, सद्भाव, शांति, मैत्री की भावना भर देता है।
ओडिय़ा लोकगीत ओडि़शा के लोकजीवन का मौखिक इतिहास है। ओडिय़ा लोकगीतों में गिरि-कन्दराओं में, घने जंगलों में, गांव-देहातों में निवास कर रहे जन समूहों का सामाजिक जीवन मुखर है। ओडिय़ा लोकगीत लोकजीवन का पुष्कल परिप्रकाश है। यहां के लोकगीतों में केवल मनुष्य के लिए संवेदना व्यक्त नहीं हुई है, बल्कि समाज को कलुषित करने वाले असामाजिक तत्वों के प्रति कटुक्ति या व्यंग्योक्ति भी व्यक्त हुई है। लोक कवि उन्मुक्त भाव से गीत गाता चला गया है। गीत गाने की प्रक्रिया असीम है। अपने समाज, प्रकृति तथा मानव जीवन के सुख-दुख, हर्ष-उल्लास, आशा-आकांक्षा आदि को लेकर मुक्त कण्ठ से वह गाता चला गया है। इसकी भाषा अत्यंत सरल पर भाव अत्यंत गंभीर है। ओडिय़ा के लोक जीवन में हलवाला गीत गाड़ीवान गीत चरवाहा गीत, मल्लाह गीत, विवाह गीत, लोरी गीत, झूला गीत आदि लोकगीतों का विशिष्ट महत्व है-
1. हलवाहा गीत- ओडि़शा एक कृषि प्रधान ग्राम बहुल राज्य है। यहां के लोगों की मुख्य जीविका कृषि है। कृषि कार्य करते हुए किसान अपने खेत में गीतों का अम्बार लगा देता है। यहां का किसान-मजदूर दिन रात अपने खेत में जुटा रहता है चाहे जेठ की कड़ी दोपहरी हो या पूष की कंपकंपाती ठण्डी रात, वह कृषि कार्य में जुटा रहता है।  वह खून-पसीना बहाकर खेत में सोने की फसल उगाता है। सावन की झड़ी बरसात हो या जेठ की कड़ी धूप हो, हल चलाता हुआ हलवाहा गीतों की झड़ी लगा देता है, जिससे पूरा परिवेश झंकृत हो उठता है। वह पौराणिक कथा प्रसंगों को लेकर गीत संयोजन करता है, बशर्ते उन गीतों के शाब्दिक अर्थों से उसका कोई सरोकार नहीं होता। हल चलाता हुआ हलवाहा गा उठता है-
राम लक्ष्मण दुई गोटी भाई
के फान्दे लंगल, के फान्दे आड़ मई
पल्हा परशिबे राम जे लक्ष्मण
 सीतया जिबे रोई हो....
(राम लक्ष्मण दोनों भाई खेत में हल चला रहे हैं। फिर दोनों भाई धान पौधों को देवी सीता के पास पहुंचा रहे हैं। सीताजी धान रोपाई में लगी हुई हैं।)
2. चरवाहा गीत- गाँव के खेतों में, परती जमीन पर चरवाहा गाय-भैंस चराता हुआ गाता फिरता है- 'प्यारे मन की गठरी खोल, उसमें भरे लाल अनमोल।Ó गाय भैंसों का चरवाहा बारिश, गर्मी, सर्दी के दिनों में घर से दूर अपने साथियों के साथ समय बीताता है। बारिश के दिनों की मूसलाधार बारिश में, सर्दी के दिनों की कंपकंपाती ठण्ड में तथा गर्मी के दिनों की कड़ाके की धूप में अपने प्रवासी जीवन में थोड़ा सा आनंद संचार के लिए वह गीत गाने लगता है। गीतों के माध्यम से वह अपनी वियोग-व्यथा व्यक्त करके मन को थोड़ा  हल्का करता है। उसकी नजर के सामने अपनी प्रेयसी पत्नी का खूबसूरत मुखड़ा खिल उठता है। कई दिनों बाद जब वह अपने मवेशियों के साथ घर लौटता है, तो उसकी पत्नी मुंह लटकाई हुई बैठी रहती है। मुस्कुराती हुई एक शब्द भी नहीं बोल रही है, क्योंकि उसके पति की गैर मौजूदगी में सास-ससुर ने बहुत कुछ खरी-खोटी सुनाई है, इसीलिए वह अपने मायके चले जाने की जिद लिए बैठी है। चरवाहा अपनी हृदय साम्राज्ञी को मनाता हुआ गाता है- 'मईषि खाइले बिरि उठिआ लो
खरि पडिय़ा रे गोठ
दूहां बरडिय़ा अलगा कर लो
बोहू मड़ाइबे भार
माआ माइला कि बाआ माइला
काहा बोले गल रुषि
आणे पनिआ मा रे उकुणि
खंजा महुड़ा रे बीस।Ó
3. गाड़ीवान गीत- आज इक्कीसवीं सदी के प्रथम चरण में हमारी सभ्यता इतनी विकसित हो गई है कि गांव-देहात में बैलगाड़ी, घोड़ा-गाड़ी नोहर हो गई है। आज के मशीनी युग में अत्याधुनिक मनुष्य इतना मशीनी दास हो चुका है कि एक मील दूरी पैदल चलना भी उसके लिए दूभर हो गया है। धीरे-धीरे सायकिल  भी सड़कों पर कम चलती हुई दिखाई दे रही है। कहीं ऐसा न ही कि कुछ वर्षों बाद गांव-देहात की सड़कों पर सायकिल चलना बंद हो जाये, जिस खतरे के बारे में गांधी जी ने 'हिन्द स्वराजÓ में बीसवीं सदी के प्रारंभ में ही आगाह कर दिया था। पहले जमाने में बैलगाड़ी सवारी और सामान दोनों ढोने के लिए इस्तेमाल होती थी। दूर दराज में व्यापार करने तथा रिश्तेदार के घर जाने के लिए गाड़ीवान को दिन रात गाड़ी चलानी पड़ती है। रातभर की थकान से जब उसकी आंखें मूंदने को बेताब होती हैं, तब गाड़ीवान अपनी नींद भगाने के लिए गीत गाने लगता है। उसके गीतों की लय में अपनी थकान भूल कर बैल भी दौडऩे चलने लगते हैं। गाड़ीवान ऊंचे स्वर में गाने लगता है-
'दूर कु सुन्दर त परबत माल
गाँ कु सुन्दर त नडिय़ा गुआ ताल
बन्धु कु सुन्दर त दिशई दूर बाट
सिन्धु कु सुन्दर त लहड़ा भंगा घाट
सभा कु सुन्दर त पधान सान भाई
गोठ कु सुन्दर त दुहांलिआ गाई
घर कु सुन्दर जेबे लो धरणी
न जिबु बाप घर लो।Ó
4. मल्लाह गीत-(मांझी गीत) ओडि़शा नदियों का राज्य है। यहां की महानदी ओडि़शावासियों की जीवन रेखा है। महानदी पर निर्मित हीराकुंड बांध विश्व प्रसिद्ध जल परियोजना है जहां का बिजली उत्पादन पूरे राज्य को प्रकाशित करता है। नदियों में, समुद्र में नाव चलाते हुए मछली पकड़ते हुए मल्लाह जाति के लोग अपनी आजीविका चलाते हैं। नाव चलाते हुए मांझी सुमधुर स्वर में गीत अलापने लगता है। अपने मर्मस्पर्शी गीतों से वह सवारियों का मनोरंजन करता है। हवा अनुकूल होने पर नाव में पाल बांधकर पतवार पकड़े हुए नदी किनारे के लोगों को लक्ष्य करके गीतों की लहर छोड़ता है और जब हवा प्रतिकूल होती है तो अपने शारीरिक कष्ट से क्षणिक छुटकारा पाने के लिए गीत गाते लगता है। इसके अलावा नदी में स्नान कर रही किशोरी-युवतियों, कमर लचकाती हुई कलसी  से पानी ले जा  रही पनिहारिनों को देखकर मांझी आशु कवि बन जाता है। नदी किनारे कोई हल्दी उबटन लगाई हुई चावल धो रही युवती को देखकर मल्लाह का प्रेमी मन उद्वेलित हो उठता है और उसका प्रेम इन शब्दों में प्रकट होने लगता है-
'कि गीत गाइलु नाआ मंगे बसि
कान पारिथिब सोल बयसि
चाऊल धोई आसि हो...
कदली पतर बाआ कु फर-फर
ओदा लुगा पिन्धी गोरी बाहार
हल्दी जर-जर हो...Ó
5. डोली गीत - ओडि़शा के सामाजिक सांस्कृतिक जीवन में डोली गीतों की विशेष भूमिका रही है। विशेष रुप से शादी के समय और शादी के बाद कन्या इसी डोली में सवार होकर ससुराल से मायके और मायके से ससुराल आया करती है। प्राचीन युग में यह डोली ही दुल्हन के आने-जाने का माध्यम थे। इस डोली को चार लोग कन्धे पर लाद कर दूर-दराज का रास्ता तय करते थे। कहार अपनी थकान से निजात पाते के लिए  तथा यात्रा को सुगम बनाने के लिए अनेक गीत गाया करते हैं। इन गीतों को पहले तक कहार गाता है फिर बाकी तीनों उसकी आवृत्ति करते हैं। इन गीतों  में विविध सवाल जवाब, मौज-मजलिस तथा रसिकता पूर्ण वाक्यों  द्वारा कहार अपने पथ-परिश्रम व क्लान्ति भूल जाते हैं और गीतों का समां बांध देते हैं-
'पान भांगुथिबु खिलेई करि लो
चुनि चुनि गुआ खइर मिशालो
बड़ नई कूल बड़ उठाणो लो
केमिति काढि़बि खरारे पाणि लो?
गामुछा काणि रे आणिबि टाणिलो
अन्टा नक नक बाँऊश कणिलो।
6. बिदाई गीत- हमारे पारिवारिक सामाजिक जीवन में वैवाहिक-मांगलिक उत्सव विशिष्ट महत्व रखता है। विवाह के समय पूरा घर परिवेश खुशियों से भरापूरा रहता है। सभी के मन में खुशी की लहर उठ रही होती है। विवाह के दौरान बारात-आगमन कन्या पक्ष के लिए बड़ी हर्षोल्लास की घड़ी होती है। बारातियों तथा दूल्हेराजा के स्वागत में किशोरियाँ-युवतियाँ मंगलगान करती हैं और फूलों की बारिश करते हुए आनन्दातिरेक हो उठती हैं। कन्या अपनी सहेलियों के साथ छिप कर किसी भी तरह से अपने सपने के राजकुमार को देख लेती है और खुशियों से झूम उठती है। पूरे वैदिक रीति से विवाह संपन्न होता है। फिर विदाई की घड़ी आती है, जो प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को हिलाकर रख देती है। कन्या बाबूल का आंगन छोड़ ससुराल के लिए कदम बढ़ाती है। इस गीतों में माँ-बाप, परिवार-स्वजन, सखी सहेलियों से बिछुडऩे की पीड़ा कन्या व्यक्त कर रही है।
'आहा कषि काकुड़ी
मुं त जाउछि छाडि़
मन रे पकाऊ थिब घड़ी की घड़ी
आहा संगात सखि
दया थिबटी रखि
नयनु न रहे नीर तुमकु देखिÓ
7.लोरी गीत- माँ के चरणों में जन्नत होती हैं। माँ तो धरती माता की तरह होती है, जो अपने वक्षस्थल  में सभी दुख संताप, हर्ष विषाद  को धारण करके त्याग बलिदान की प्रतिमूर्ति के रुप में चुनौतीपूर्ण जीवन जीती है। वह अपनी संतान को खून से सींचकर बड़ा करती है, अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से दबाकर रखती है। ममतामयी माँ अपने बच्चे की परिवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ती। वह अपने लाल को हल्दी-तेल मालिश करते, नहलाते, खिलाते, घुमाते, सुलाते समय अनेक गीत गाकर सुनाती है। माँ की लोरी और कोमल हाथ की थकान से बच्चे को नींद आने लगती है और माँ की गोदी में या पलंग पर वह सो जाता है। धीमी आवाज में शांत रस से सराबोर माँ इस तरह से गुनगुनाने लगती हैं-
धो रे बाया धो
जोऊ किआरि रे गहल माण्डिया
सेई किआरि रे शो...
झूला गीत- ओडि़शावासियों में बारह महीने में तेरह पर्व मनाने की सुंदर परंपरा है। यहां का लोक  जीवन तीज-त्यौहार, पर्व उत्सव मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। होली, दिवाली, रज पर्व, चैत पर्व, फाल्गुन पर्व, नुआ खाई, प्रथमाष्टमी, जन्माष्टमी, रथयात्रा, झूलन यात्रा, धनु यात्रा, पौष पुन्नी, लक्ष्मी पूजा, मोरिया पूजा, जुड़ो पर्व इत्यादि जाने कितने पर्व उत्सव, तीज-त्यौहार यहां के ग्रामजनों, गिरिजनों में मनाए जाते हैं। यहां का ग्राम परिवेश इस अवसर पर नाच-गान, बाजे-गाजे से झंकृत हो उठता है। रजसंक्राति के अवसर पर बड़ी धूमधाम से रज पर्व मनाया जाता है। यह युवक-युवतियों का आनंद पर्व है। यह तीन दिनों तक चलता है। इस मौके पर युवतियां झूला लगाकर झूला झूलती हुई गीत गाती है। युवतियाँ-किशोरियां अपने संगी-साथी, प्रेमियों, भाभियों को इंगित करके सुमधुर स्वर में गीत गान करती हैं। किशोरी प्राण का यह सामूहिक गीत उनकी सुरीली आवाज से अत्यंत सरस-आकर्षक बन पड़ता है। किशोरियों भाव-विभोर होकर गाने लगती है-
कोइली डाकिला मो बुद्धि हजिला
धइली धसाई पशि
दोली उन्चे गला चालि
खसि आसु आसु किबा देखिलि
पराण समर्पि देलि
कटिली सुगन्धि बेणा
नास्ति करु करु धइले डेणा
करि न पारिलि मना
लोकगीत ओडिय़ा लोक जीवन में लोक वेद के रुप में परिचित है। इसकी भाषा सरल तथा भाव गंभीर है। जनमानस में प्रचलित मौखिक बोलचाल की भाषा में रचित लोकगीत सर्वग्रहणीय है। ओडिय़ा लोक गीत ग्राम जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना की मार्मिक अभिव्यक्ति हैं। इसमें लोक जीवन के सुख-दुख, आशा-आकांक्षा, आस्था-विश्वास, सामाजिक सरोकार तथा सांस्कृतिक जीवन स्पन्दन चिर भास्वर है। निष्कर्ष के रुप में यह स्पष्टोक्ति रखी जा सकती है। ओडिय़ा लोकगीत भाव एवं रस का समाहार है। यह कला कल्पना की गगन चुम्बी मीनार है। यह पुराण, इतिहास और विश्वास बोध का त्रिवेणी संगम है। सत्य की ज्योति शिव की मंगलमयता एवं सौन्दर्य की मनोहरता से यह विमण्डित है। यह लोक गीत रह चलते राही की थकान ही दूर नहीं करता, नैराश्य हृदय में आशा का संचार करता है।
साभार - रऊताही 2015

छत्तीसगढ़ के बारहमासी लोकगीत

व्यक्ति अकेला हो तो थोड़ी देर भी स्थिर बैठा नहीं रह सकता। उसका मस्तिष्क हर समय कुछ न कुछ करते रहना चाहता है। नदी किनारे बैठा हो तो रेत पर पड़ा तिनका उठाकर या उंगलियां फिराकर आड़ी तिरछी रेखाएं  खींचता है। जमीन पर बैठा हो तो खपरैल के टुकड़े से कुछ आकृतियां बनाने लगता है। पत्थर के दो टुकड़ों को आपस में टकराकर बजाने लगता है। कुछ न मिले तो प्रकृति के दृश्यों को देखकर कुछ गुनगुनाने लगता  है, सीटी बजाने लगता है। दीवालों पर लाल-पीली मिट्टी की पट्टियाँ और उन पर बनाई गई विभिन्न आकृतियां हमारी सृजनात्मकता की सहज-सरल लयात्मक अभिव्यक्ति ही लोककला है।
लोककला मन में उठने वाले भावों को सहज रुप में अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वत: स्थानांतरित हो जाने वाली विधा है। लोक कला हमारी संस्कृति की पहचान होती है, हमारी खुशी को प्रकट करने का माध्यम होती है।
लोककला का क्षेत्र एवं स्वरुप विस्तृत है। लोककला का वर्गीकरण यदि हम करना चाहें तो वर्ग के और उपवर्ग करने पड़ेंगे यथा लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोक नृत्य, लोक संगीत, लोक वाद्य, लोक श्रृंगार, लोक परम्परा, लोक व्यंजन, लोक शिष्टाचार आदि। यहां हम केवल लोकगीतों पर ही ध्यान केन्द्रित करें तो हम पाते हैं कि लोकगीत जीवन के अभिन्न अंग है। लोकगीत विभिन्न अवसरों पर गाये जाते हैं। तात्कालिक उत्पन्न परिस्थिति में, सामाजिक धार्मिक पर्व में, विशेष आयोजन में। बच्चे के जन्म पर, षष्ठी (छट्ठी) पर उपनयन, जनेऊ संस्कार, विद्यारंभ संस्कार, विवाहादि अवसरों पर हम लोकगीतों के माध्यम से खुशी व्यक्त करते हैं।
त्यौहारों की शुरुआत आषाढ़ मास में रथ-यात्रा से होती है। भगवान जगन्नाथपुरी जी मथुरा से पुरी पधारते हैं तो उनके भक्त उनका धन्यवाद ज्ञापित करते हैं-
ठाकुर भले बिराजेव हो, ठाकुर भले बिराजेव हो।
उड़ीसा जगन्नाथपुरी म भले बिराजेव हो।।
आषाढ़ में वर्षा की बूंदे पड़ते ही किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। वे अपने नांगर-बैलों को लेकर खेतों की ओर चल पड़ते हैं। ऐसा लगता है मानो बैलों के गले की घंटियां हमें गीता-पाठ पढ़ा रही हो, कर्म करने को प्रेरित कर रही हों-
आगे आषाढ़ गिर गे पानी, भींजगे ओरिया भींजगे छानी
धर ले नांगर धर तुतारी, अरररर अर त त त...
किसान नांगर जोतकर खेतों में बीज बो देता है। खेत में काम करते अपने नंगरिहा के लिए जब किसानिनें हाथों में ककनी-हरैय्या-बनुरिया पहने, पैरों में पैरी छनकाती, बटकी में बासी और मलिया में नून-चटनी लेकर खेत पहुंचती हैं, तो बरबस नंगरिहा के मुंह से बोल फूट पड़ते हैं-
बटकी म बसी बऊ चुटकी म नूंन
मैं गावत हौं ददरिया तैं कान देके सून ओ चना के दार...
किसानिन अपनी विरह व्यथा को प्रकट करती है
तरी फतोही ऊपर कुरथा, रहि-रहि के मोला आथे तोरेच सुरता
कुंआ के पानी कुंआसी लगै, परदेश झन जा राजा रोवासी लागै
बागे बगइचा दिखे ल हरियर, मोटरवाला नई दीखै बदे हौं नरियर
नायिका का प्रमोद्गार सुनकर नायक कभी कभी मर्यादा का मौखिक अतिक्रमण कर जाता है-
करची के पानी गरम करले, तोर चढ़ती जवानी धरम कर ले।
सावन महीने में कुंवारी कन्याएं छोटी-छोटी बाँस की
टोकनी में रेत भरकर और उसमें गेंहू के दाने बोकर भोजली उगाती हैं। श्रावण पूर्णिमा को बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। भोजली के गंगा का रुप मानकर दूसरे दिन नदी या तालाब में ले जाकर एक साथ विसर्जित करती हुई गाती हैं-
देवी गंगा देवी गंगा लहरा तुरंगा हो लहरा तुरंगा
हमर सुघ्घर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा, अहो देवी गंगा
आसा खेलेन पासा खेलेन, अऊ खेलेन डंडा
हमर सुघ्घर भोजली दाई के सोने के हंडा, अहो देबी गंगा..
बहनें भाइयों को खुशी-खुशी राखी बांधती हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा अपनी साड़ी का पल्ला चीरकर कृष्ण जी की कटी उंगली में बांधने और सुभद्राजी द्वारा बलराम श्रीकृष्ण को राखी बांधने और भाई द्वारा बहन की रक्षा की बात का स्मरण किया जाता है।
भादों अंधियारी पाख अष्टमी को अर्धरात्रि में कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है और सोहर गाया जाता है-
जनम लिए कृष्ण कुरारी जगत हितकारी,
भगत सुखकारी हो ललना
हो ललना...
जबहिं गोपाल चले मधुबन को घर
आंगन न सुहाई ए हां जू...
मुरली बजावत धेनु चरावत
बसहि जमुना जी के तीरे ए हां जू...
भादों अंजोरी पाख में गणपति पूजन किया जाता है
गणपति महाराज गणपति महराज, तोरे भरोसा मोला भारी
अहो मन भजो गणपति गणराज, कुमति कलुष कटै...
हिन्दू जनमानस क्वाँर जेंवारा पाख में जगह-जगह दुर्गा माँ का जस गीत, जेंवारा गीत सुनकर भक्तिभाव में डूब जाता है
तुम्हरें दरस बर हां हम आयेन माता तुम्हरे दरस बर हां
हम आयेन माता तुम्हरे दरस बर हाँ
तुम्हरे दरस बर आयेन माता ब्रह्मा विष्णु महेशा
चंढ़े नांदिया शम्भू आए हाथ म धर के लबेदा
ब्रह्मा आए विष्णु आए शिव आए कैलासा
महामाई के रुप देख सब देवतन के मन हुलसा...
कार्तिक महीना भर कुंवारी कन्याएं मुंह अंधेरे उठकर नदी तालाब जाकर स्नान करती हैं और कृष्ण समान अच्छे सुंदर वर की कामना करती हुई शिव पूजन करती हैं। घर-घर दीपावली सजाकर लक्ष्मी पूजा की जाती है। इन्हीं दिनों सुहागिनी स्त्रियाँ 10-12 की झुण्ड में सुवा गीत गाती हुई सुआ नृत्य करने निकलती हैं। एक टोकनी में मिट्टी का बना सुआ रखकर उसे आदरपूर्वक ढांककर बैठाती हैं और उसके चारों ओर लयबद्ध ताली बजाती हुई घूम-घूमकर सुआ गीत गाती हुई नाचती हंै। इन गीतों में नारी मन के भावों की अभिव्यक्ति छिपी रहती है। सुआगीत के माध्यम से नारी मन की व्यथा, सुख-दुख, सम्पन्नता-विपन्नता, विरह वेदना उभर आती है-
तरि हरि नाना मोर नाना सुवना के तरि-हरि नाना रे ना...
नारे सुअना के तिरिया जनम झनि देय। नारे सुअना
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर रे सुअना
के जिहां पठवय तिहां जाय। नारे सुवना...
सुआ नृत्य देवउठनी एकादशी तक चलता है। इसी समय दीपावली के दूसरे दिन गौरी-गौरा विवाह का आयोजन गोंड/यादव समाज में बड़े उल्लास से मनाया जाता है। मिट्टी से गौरी-गौरा बनाकर मिट्टी से ही मंडप सजाने के बाद जोत जलाकर शोभायात्रा निकाली जाती है। गंड़वा बाजा की धुन में बरुआ नाचते हुए हाथ बढ़ाकर साँट लेते हैं। फिर उसे नदी या तालाब के जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
देवउठनी एकादशी के दिन अहीर-यादव-रावत समाज के द्वारा रावत नाच महोत्सव मनाया जाता है। रंग बिरंगे परिधानों से सजे जरी क जाकेट, रंग-बिरंगे कागज के फूलों से बने कलगी लगे पगड़ी बांधे, एक हाथ में फरी और दूसरे हाथ में पांच हाथ के लाठी, पैरों में रंगीन मोजे, घुंघरु और चरमर करते पनही यही अहीर जवान का बाना होता है। टिमकी, डफड़ा और गंड़वा बाजा के साथ जब 15-20 जवानों का दल दोहा बोलकर नाचता है, वह दृश्य देखते ही बनता है। दल में गंड़वा बाजा के साथ एक पुरुष नर्तक स्त्री वेश में सज धज कर परी बनकर शामिल होता है।
दोहे ऐसे हैं-
कुकरी के पिलवा रन-बन बगरे, धर-धर खाय बिलाय।
होबे बेटा क्षत्री के रे तैं कै दिन रहिबे लुकाय।।
चार दिन के जिनगी भइया, चार दिन के खेल।
चार दिन के देवारी, फेर कउन मरही कउन जीही।।
जइसे के मालिक लिहेव, दिहेव, तइसे के देबो असीस
रंग महल म बइठै मालिक, जुग जियो लाख बरीस
अगहन पूस मास में खेतों में पककर खड़ी फसल को काटकर किसान खलिहान में ले आता है और मिसाई कर दाना कोठी में रख लेता है। पूस पूर्णिमा की रात में छोटे-छोटे बच्चे अलग-अलग समूहों में घरों घर जाकर अन्नपूर्णा माता का आह्वान करते हुए दान मांगने निकलते हैं और आवाज लगाते हैं-
छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान हेरते हेरा...
किसान भी बच्चों को थोड़ा-थोड़ा अनाज दान करके खुश होता है। इस त्यौहार में दान की महिमा बताई गई है। इन्हीं दिनों ओडिय़ा बसदेवा भी चटकउला बजाते सुबह-सुबह जय गंगा गाते हुए दान मांगने आते हैं। इन्हीं दिनों सतनामी समाज गुरुघासीदास बाबा के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करता है और सत्य की स्थापना के लिए उनकी जयंती मनाकर उन्हें याद करता है। झांझ और मांदर की थाप पर 20-22 नवयुवाओं का दल को झूमकर एक ताल बंधान पर नाचते देखते ही बनता है। गुरु घासीदास की महिमा को एक नर्तक गाता है और शेष नर्तक दुहराते हुए ताल गति पर नाचते हैं
जै हो जै हो गुरुघासीदास, चरण म तोर गंगा बहै...
ऋतुराज बसंत के आगमन पर मदनोत्सव मनाने के पूर्व मदन दाहक महादेव की पूजा भी तो जरुरी है। अंचल में शिव-पूजा की धूम मचती है। लोग दूर-दूर से काँवरियों में जल लाकर शिवलिंग में चढ़ाते हुए यथाशक्ति भजन पूजन करते हैं।
फागुन में ऋतुराज बसंत के आते ही धूप सुहानी हो जाती है। होली लोकगीतों के साथ-साथ नगाड़े की थाप पैरों को थिरकने पर मजबूर कर देता है और छैल छबीलों के मुंह से बरबस निकल पड़ता है यह लोकगीत-
चल हाँ रे संतों देबी शारदा गा लइहौ
अरे देबी शारदा गालइहौं संतों देवी शारदा गा लइहौ...
चल हां बिरिज में नाचे नंद के कान्हैया
पिताम्बर उडि़-उडि़ जाय बिरिज में नाचे नंद के कान्हैया...
होली लोकपर्व पर कुछ समय पूर्व तक फाग गीत में वेश्या नचाने की प्रथा थी जो अब बंद हो गई है। यह नारी सम्मान की दृष्टि से बहुत अच्छा है। किन्तु यही बुराई महानगरों में बार बालाओं के नाच के रुप में आज भी जारी है जो दुखद है।
इसके अतिरिक्त बांसगीत, चंदैनी गीत, देवार गीत, डंडा गीत, आल्हा, झूमर गीत, बिहाव गीत आदि अनेक क्षेत्रीय लोकगीत अंचलों में गाये जाते हैं। न केवल हमारे छत्तीसगढ़ में वरन देशमें और विश्व में हर क्षेत्र की अलग-अलग बोली और भाषाओं में अलग-अलग लोकगीत हैं, जो जनमन में बसे हैं और लोकरंजन करते हैं।
साभार - रऊताही 2015

विवाह के इंद्रधनुषी लोकगीत

लोकगीत ग्रामीण परिवेश से बाहर आकर आज शहरों के लोकमंच और गलियों में प्रतिध्वनित हो रहे हैं। स्त्री विमर्श हिन्दी साहित्य  में बहुत बाद में शुरु हुआ लेकिन गाँव में पीडि़त लोक नायिका ने लोकगीत के माध्यम से अपनी पीड़ा को शब्द देने का प्रयास किया- पइंया मंय लागत हंव चन्दा सुरुज के सुअना, तिरिया जनम झनि देय। कहते हैं प्राचीन काल में सुआ ही चिट्ठी पत्री ले जाता था इसलिये सुआ को संबोधित यह इतिहास की नारी पीड़ा आंसुओं से भारी नायिका के अंतर्मन का रेखांकित दस्तावेज है। लोकगीत ग्रामीण जिंदगी के ऐसे पृष्ठ हैं जिसमें समय स्पष्ट नहीं है लेकिन ग्रामीण लोक की झांकियाँ शब्दों में पिरोकर इतिहास के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, मिलन-विरह, रिश्ते नातों के भाव, मनोवैज्ञानिक, पृष्ठभूमि, अर्थहीनता, सीमित सुविधाएं जारी इच्छा और जीवन के संदर्भ प्रसंग पर लोकगीतों में लोक ने अपनी वाणी दी है।
छत्तीसगढ़ अंचल में विवाह को लेकर चिडिय़ा के क्रमश: बनते घोंसले के तिनकों की तरह विवाह के प्रत्येक प्रसंग पर लोकगीतों की सार्थक संरचना हुई है। विवाह शहर-ग्रामों में गंूजे और वैवाहिक लोकगीत न गूंजे तो विवाह का माहौल सूना लगता है लेकिन मैंने स्वयं अनुभव किया है कि जब मेरे घर में यह हमारे रिश्तेदारों के घरों में विवाह होते हैं तो मेरी सगी बड़ी बहिन श्रीमती सुशीला जालिम सिंह भट्ट जो उस वैवाहिक मंडप में प्राय: लोकगीतों की अकेली जानकार होती है, विवाह का ऐसा समां बाँधती है कि पूरा वैवाहिक परिवेश और आसपास के घरों तक जाती साथ ही महिलाओं की आवाजें 'विवाह हो रहा हैÓ का संदेश दूर तक पहुंचा देती हैं।
छत्तीसगढ़ में लड़की देखने की परम्परा है। कभी-कभी माता पिता लड़की का सौंदर्य रुप रंग, घरेलू कामों में निपुणता, पढ़ाई-लिखाई, दूसरे अन्य कामों में दक्षता देख आते हैं, लड़की के पड़ोस का भी परिचितों के माध्यम से सहारा लेते हैं। कन्या पसन्द आने पर लौट कर घरेलू चर्चा आजकल के फैशन के अनुसार लड़के को लड़की दिखाकर लड़के की स्वीकृति लेते हैं, पहले केवल माता-पिता का देखना पर्याप्त समझा जाता था और विवाह के समय ही होने वाली दुल्हन देख पाता था। प्राचीन समय में लड़की ब्याह का संदेश नाई लाते, ले जाते थे जिसके लिए स्वर्गीय रमेश वर्मा 'सरसÓ  ने लिखा था 'कांदा बारी म कांटा के रुधान, जइसे मोटियारी बर नाऊ सियान।Ó
विवाह योग्य उमर हो जाने पर कुंआरा लड़का अपनी दाई (माँ) से आग्रह करता है कि अब उसके विवाह के लिए भी रुपये-पैसे की तैयारी की जाय और इस शालीन विवाह लोकगीत में लड़का माँ के घरेलू कामों में बंटवारे के लिए बहू की अनिवार्यता सिद्ध करता है-
दे दो आई दाई लाख रुपइया
के सुंदरी बिहाये चले जांव
उहां कहां जाबे बेटा
सुंदरी के गाँव बड़ दूर हे
बेटा तोर बर दूरिहा मोर बर लकठा
तोर लांव दाई घर लिपईया
मोर जनम के जोड़ी। ओ दाई दे दे...
तोर बर लांव दाई दार भात रंधइया
मोर जनम के जोड़ी। ओ दाई दे दे...
तोर बर दाई-भडंवा मंजइया
मोर जनम के जोड़ी ओ दाई दे दे...
छत्तीसगढ़ में विवाह के प्रारंभिक रस्मों मंडप छाने के बाद लड़के को हल्दी चढ़ाई जाती है और घर की महिलाएं बुआ, माँ, बहनें एवं चाची आदि तीन से पाँच दिनों तक लड़के के शरीर में हल्दी का लेपन भी करती हैं। लड़की वालों के यहां भी महिलाएं हल्दी चढ़ाने एवं लेपन की रस्म निबाहती हैं। हल्दी चढ़ाने एवं लेपन के समय महिलाओं में प्रचलित एक लोकगीत इस प्रकार है-
पीले-पीले दुल्हा दाई कअन गुना
उनकी अम्मा ने खाई हरदी सो पीले हैं ओ ही गुना
गोरी-गोरी दुल्हन दे ई कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई बतासा सो गोरी है ओ ही गुना
काली-काली दुल्हन  दे ई कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई जमुनिया सो काली है ओ ही गुना
दूबली दुबली है दुल्हन कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई है खेड़ा सो दुबली है ओ ही गुना
सुंदर-सुंदर है दुल्हन कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई गुलाब सो सुंदर है ओ ही गुना
हल्दी चढ़ाने एवं लेपन के तीसरे या पाँचे दिन बारात ब्याह के जाने या लड़की के घर बारात आने के दिन वर कन्या को नहलाया जाता है।
विवाह के दिन क्षण पास आने से घराती-बाराती परिवार में एक इन्द्रधनुषी परिदृश्य की प्रसन्नता होती है। इस प्रसन्न अठरवेलियों में नहलाते समय का एक लोकगीत है-
छोटी राधा प्यारी पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
ठंडे से पानी गरम कर लाई सफरे न राधा प्यारी
पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
लौंग खिल-खिल बीड़ा लगाये रचें राधा प्यारी
पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
तोड़ कली रस गेंदा बनाये खेले न राधा प्यारी
पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
छत्तीसगढ़ में वर पक्ष कन्या ब्याहने के लिए निकलते हैं तो बारातियों की वेश-भूषा, साज-सज्जा (कोई टोपी-कोई पगड़ी) एवं अलग-अलग रंग के पहिनावे रंगारंग परिवेश लेकर बारात बिदा होता है। बारात ब्याह करने के लिए निकलते समय का एक लोकगीत है-
मेरे आँगन गेंदा फूल, कुसुमरंग
फीको लागे रे बना के
मामा है सरदार बना को ऐसे साजे रे
जइसे सज गये लक्ष्मण राम
वशिष्ठ मुनी आगे आवय रे
बना जीजा है, सरदार बना को
जइसे सज गये लक्ष्मण राम
वशिष्ठ मुनी आगे आवय रे
इस क्रम में फूफा, भइया एवं नाना दादा आदि रिश्तेदारों को महिलाएं इस तरह के क्रमश: टेक दुहराती हुई जोड़ लेती हैं।
बारात जब लड़की के घर (आजकल कहीं कहीं विवाह मंडप, मंगल भवन) पहुंचती है तब बारात के स्वागतक्षणों में 'द्वारचारÓ होता है, महिलाएं पीले चाँवल जोर से पुरुषों के ऊपर फेंक कर एवं पुरुष हलके से उछाल कर मारते हैं। पंडित के द्वारचार पूजा कराने से पहिले महिलाएं पीतल के घड़े में पानी रखकर नेग मांगती हैं, दूल्हा मंडप की पत्तियों को कहीं से छूता है फिर पंडित जी द्वारचार पूजा कराते हैं।
द्वारचार के बाद दूल्हा खाना खाने के पहले  रुठने का अभिनय करते हुए खाने की नेग की मांग करता है। खाने के समय पहले दूल्हा अपनी कोई बड़ी मांग नेग के रुप में रखता है। कन्या पक्ष अपनी हैसियत के अनुसार आर्थिक स्थिति को देखते हुए दूल्हे की माँग पूरा करते हैं। नेग पूर्ति के बाद बारातियों का खाना होता है, खाना खाते समय महिलाएं गाली गाती हैं जिसे छत्तीसगढ़ में 'शादी की गारीÓ 'खाये के गारीÓ नाम से लोकगीत गाती हंै-
गोरे गोरे मटकी में दहिया जमाये
कुछ खाये, कुछ भुइंया गिराये राम
अपनी बहिनी के गाले लगाये। मोरे... राम
कुछ लछमन अपनी बहिनी के गाले लगाये। टेक...
कुछ भरत अपनी बहिनी के गाले लगाये। टेक...
इस तरह बारात में शामिल महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम जोड़कर महिलाएं अपनी गालियों का क्रम पूर्ण करती हैं।
छत्तीसगढ़ में 'बेटी के बिदाÓ के क्षण अपनी मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए पहचाने जाते हैं। बेटी की बिदा के बाद उसकी माँ का आँगन जहाँ कभी बेटी बचपन में खेली-कूदी थी उसकी अभिव्यक्ति 'छत्तीसगढ़ी लोकगीत ददरियाÓ में 'मोर अंगना ले उड़ाथे चिरई चिरगुनÓ शब्द समूह रेखांकित कर  कहा गया है- ऐसा लगता है कि चिडिय़ा गौरेया फिर मेरे आँगन में नहीं आएगी। विवाह के बाद बेटी बिदा हो जाएगी- की कल्पना माँ शादी के पहले ही कर लेती है और फिर इतिहास सचमुच  बेटी की बिदा लेकर आ जाता है। बेटी को बिदा करते माँ बाप पर स्व. द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्रÓ श्यामलाल चतुर्वेदी पूर्व अध्यक्ष- छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ी में प्रथम भागवत भाष्यकार राष्ट्रपति पुरस्कृत पं. दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, बुधराम यादव, ने आंसुओं से भरे संवेदनापूर्ण छत्तीसगढ़ी गीत रचे हैं-
ये दे सब्बे झन रोवंथंय फफक फफक
बेटी जावाथे जावाथे ससुरार
डॉ. विमल कुमार पाठक
'बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिलेÓ जैसे फिल्मी गीतों में 'बेटी के बिदाÓ को शब्द दिये हैं तो लोकगीत में चित्रित है कि बेटी मायके में क्या छोड़ जाती है-
दो हंसों के कार दरवाजे खड़ी
आज मेरी बन्नो ससुरार चली रे
बाबूल छोड़े, अम्मा, छोड़ी के बन्नो
आज हो गई पराई रे
चाची छोड़ो, चाचा छोड़े बन्नो हो गई...
मामी छोड़ी, मामा छोड़े
बन्नी आज हो गई पराई रे...
सखियाँ छोड़ी, सहेलियाँ छोड़ीं
बन्नो हो गई आज पराई रे...
विवाह के मांगलिक अवसर पर छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के अनेक लोकगीत की गूंज देवउठनी एकादशी से ग्रीष्मकाल की तपिश और वर्षा की प्रथम फुहारों के कुछ समय बाद तक अनुगूंजित होकर वातावरण में सुखों की सृष्टि रचते हैं। बारात लेकर बाराती जब कन्या के ग्राम शहर चले जाते हैं महिलाएं स्वतंत्र डिड़वा नाच या नकटौरा करती हुई अनेक स्वांग रचती है। बारात जब कन्या के निवास पहुंचती है तब बारात स्वागत लोकगीत सगले बाराती के जूता नहीं, पावों में पायल पहनाव मेरी बहिना से स्वागत होता है। द्वारचार के मंगल गीत सुनने में अच्छे लगते हैं। बेटी जब ससुराल से पहली बार मायके आती है- सहेलियाँ पूछती हैं पति, ससुर, जेठ एवं देवर कैसे हैं? विवाहित नायिका एक लोकगीत में उनके उत्तर देती हुई- देवर के लिए कहती है 'सब सखियां पूछे, तेरा देवरा कैसा है, वो तो गलियों में मचाये शोर हल्बा जइसे है।Ó
साभार - रऊताही 2015

मैथिली लोकगीत : परम्परा, स्वरुप एवं सौन्दर्य

लोकगीत एक ऐसी मौखिक परम्परा हे, जो विभिन्न मनुष्य में वंशानुगत क्रम से चला आ रहा है एवं जिसका जड़ मूल रुप से सुदूर अतीत में विद्यमान होता है। अशिक्षित ग्रामीण एवं निरीह जनता के भावुक हृदय की संवेदनशीलता से फूट कर 'लोकगीतÓ उसके होंठ पर आकर सुर एवं ताल-लय के संग गुंजित होने लगता है।
लोकगीत मूलत: एवं सिद्धांत: जातीय एवं सामुदायिक रचना है। एक सर्जक एक कलाकार, एक व्यक्ति नहीं अपितु इसके रचनाकार सम्पूर्ण लोक होते हैं। समस्त जाति ही लोकगीत की उद्भावना एवं पोषण के आधार होते हैं। लोकगीत अन्तोगत्वा एक निर्वेक्तिक, सामूहिक एवं सामाजिक रचना है, जिसका विशिष्ट गुण गेयता है।
साधारणतय ग्रामीण जनता के जीवन में जन्म के पहले से लेकर मृत्यु तक लोकगीत व्याप्त रहता है। बच्चा के जन्म पर सोहर गाकर प्रसन्नता प्रकट किया जाता है। दादी माँ बच्चा को 'लोरीÓ सुना कर सुलाती है। खेलने-कूदने के समय भी  गीत गाते हैं। युवकवृंद प्रेमपूर्वक गीत गाकर स्नेह की अभिव्यक्ति करते हैं एवं प्रेमिका को रिझाते हैं। विवाह के प्रत्येक विधि विधान के समय स्त्रीगण गीत गाकर सुखद वातावरण उत्पन्न करती हैं तथा हास-परिहास करती हैं। वर्षा ऋतु में 'कजरीÓ फागुन में 'फागÓ  एवं चैत में 'चैतावरÓ गाकर साधारण जनानंदित होती है। श्रमजन्य कष्ट को विस्मृत करने हेतु जाँत पिसने के समय लंगनी, बाट चलते समय 'बटगमनीÓ, गोदना गोदाते समय 'गोदना गीतÓ गाये जाते हैं। तिरहुंति, मान, झुम्मर, बिरहा, आदि मनोरंजन एवं आनंद के उद्देश्य से गाये जाते हंै। नचारी, महेश, वाणी, साँझ, पराती आदि गीत गाए जाते हैं। बहुसंख्यक लोग अपने वैयक्तिक जीवन में, परिवार में तथा समाज में रोग-व्याधि से छुटकारा, सुहाग एवं पुत्र की कामना एवं रक्षा तथा शांति एवं अभ्युदय की मंगल कामना के भाव लेकर भाओं-भगैत, गहबर गीत को झाल-मृदंग, करताल आदि के संग यथास्थान बने धर्म के गहबर में निष्ठापूर्वक गाए जाते हैं। वयोवृद्ध भी निर्गुण, उदासी गाकर अपने मन को शांत करते हैं। स्पष्टत: 'लोकगीतÓ जीवन में रचा ओ पचा है, धुलल ओ मिला है।
'लोकगीतÓ मनोरंजक शिक्षा भी देती है तथा परिवार, समाज एवं देश के प्रति कर्तव्य-बोध कराती है। इतना ही नहीं अपितु लोकगीत गाकर वीर पुरुष एवं शहीद के शौर्य एवं बलिदान का गौरव गान कर देश प्रेम की भावना जगाती है। हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम के क्रम में लोकगीतकार अपनी तेजस्वी एवं देशभक्तिपूर्ण गीत गा-गाकर हजारों-हजार व्यक्ति में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न किए थे।
लोकगीत जनकंठ की सम्पत्ति रही है एवं श्रुति परम्परा से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को प्राप्त होता रहा है। तथापि थोड़ा अतीत में झाँकने पर देखी जाती है कि वैदिक समाज में विभिन्न प्रकार के यज्ञ में स्लोम, स्त्रोत, एवं विशेष प्रकार के सामगान सब होता था, जिसमें वैदिक देवता सबों का स्तवन किया जाता था। विवाहादि संस्कार में वैदिक मंत्र का वाचन, पाठ एवं सामगान होता था। विभिन्न लोकोत्सव के अवसर पर ऋचा एवं सामगान से इतर लौकिक गान, नाराशंसी, रेम्य आदि कहा जाता था। ऋतु विशेष में साम विशेषक गान, निरंतर श्रमसाध्य, व्यावसायिक कार्य में श्रमहरण एवं रंजक गान होता था। परवर्ती काल प्रवाह में वैदिक देवता के स्थान में पौराणिक देवी-देवता गण स्थापित हो गए एवं यज्ञादिक स्थान पूजा, व्रत एवं पर्व-त्यौहार ले लिया। क्रमश: पितृकर्म में भारुदण्ड, अन्त्येष्टिकाल में श्राद्ध कर्म के प्रकरण में कबिराहा निर्गुण प्रभेद आदि सामूहिक गान का प्रचलन हो गया। पमरिया, झिझिया, झरनी, डोमकच आदि चलने लगा।
एक तरफ जहां जर्मनी के श्री विलियम ग्रीम लोकगीत की समारंभ के विषय में सामूहिक विकास  तथा उत्पत्ति का प्रतिपादन किया तो दूसरी तरफ इसका खण्डन रुसी विद्वान सोकोलोव इस उक्ति से किया है- 'कोई कृति आदि ऐसा कभी नहीं रहा है, जिनका कोई भी रचयिता नहीं हो अथवा सम्पूर्ण जनता की ही रचना रहा हो। इसी तरह ए.एच.क्रेय, डॉ. सत्येन्द्र, डॉ. जवाहर लाल हाण्डू एवं ईन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका भी इसके संबंध में अपने-अपने ढंग से विचार रखा है। जहां लिखित साहित्य का इतिहास लिखना प्राय: संभव होता है, वहीं मौखिक होने के कारण लोकगीत का इतिहास लिखना असंभव प्राय: अर्थात् अत्यंत कठिन रहता है। परन्तु इतना अवश्य कि लोकगीत उस वन्य वृक्ष के समान होता है, जिसका जड़ अतीतकाल में गहरा रोपा रहता है एवं उसमें नित नव शाखा, पत्ते एवं पुष्प प्रस्फुटित होता रहता है। अर्थात लोकगीत यदि एक तरफ कल्पना है तो दूसरी तरफ भावना एवं रसवृत्ति। एक तरफ यदि उल्लास है, उमंग की रेशमी इजोरिया है, नृत्य का हिलोर है, भावुक मन का मनुहार है, तो दूसरी तरफ जीवन का निषाद-नैराष्य का गहन अन्हरिया है, घनीभूत पीड़ा का आकुलता-व्याकुलता एवं टीस है, थका मांदा आत्मा का शलाध्य उच्छवास है।
लोकगीत के स्वरुप पर विचार करने पर हम देखते हैं कि इसका महत्व एवं उपादेयता असंदिग्ध है। शुक्ल जी, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर डॉ. एलवीन, देवेन्द्र सत्यार्थी तक इसके महत्व पर विस्तृत रुप से विचार किया है। द्विवेदी लिखते हैं- ग्राम्यगीत अपने सभ्यता का वेद है। वेद तो भी अपने आरंभिक काल में श्रुति कहाता था एवं ग्राम्य गीत की तरह ही सुन-सुन कर याद रखा जाता था। जिस प्रकार वेद द्वारा आर्य सभ्यता का ज्ञान होता है, उसी प्रकार लोकगीत के द्वारा आर्य पूर्व सभ्यता का ज्ञान कर सकते हैं। ईंट-पत्थर के प्रेमी विद्वान यदि धृष्टता नहीं समझें तो जोर देकर कहा जा सकता है, कि लोकगीतक महत्व मोहनजोदड़ों से कहीं ज्यादा है। मोहनजोदड़ों जैसा भग्र-स्तूप ग्राम्य गीत के भाष्य का कार्य दे सकता है।
लोकगीत का एक सुदीर्घ परम्परा रहा है। एक बार पुन: पीछे चले। वेद परायण से ज्ञात होता है कि विविध संस्कार अवसर पर यहां लोकगान होता था। पालि जातक, बाल्मीकि रामायण में भगवान राम का जन्म के अवसर पर गंधर्व का मधुर गान एवं नृत्य व्यासदेव का श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण जन्म के अवसर एवं बड़े होने पर भी कृष्ण-ब्रज रमणी के मध्य स्वयं लोकगीत गायन, महाकवि, कालिदास का रघुवंश महाकाव्य में ग्रामीण स्त्री द्वारा महाराजा रघु का यश-गान, किरातार्जुनीय एवं माघ्य महाकाव्य के रंग-संग प्राकृत युग में राजा हाल तथा शालिवाहन संग्रह 'गाथा सप्तशतीÓ एवं महाकवि श्री हर्ष में स्त्रीगण द्वारा विभिन्न प्रकार के लोकगीत का उल्लेख है। इसी तरह विवाह संबंधी गाथा सबों का उल्लेख पारस्कर गृह सूत्र में हुआ है। अश्वमेघ राजसूय जैसा यज्ञ  के अवसर पर मांगलिक गीत गानने का प्रमाण है। महिषासुर वध करने के अवसर पर अप्सराओं के द्वारा नृत्य करने एवं गंधर्वों के द्वारा गीत गाने का उल्लेख एक तरफ यदि मिलता है तो दूसरी तरफ कविराज जयदेव के 'गीत-गोविन्दÓ बंगभूमि में 'यात्राÓ नाम का उल्लेख में गाए जाने वाला प्रत्येक प्रचलित धर्मगीत के मध्य का उपज है।
महाकवि विद्यापति मिथिला का शास्त्रीय संगीत एवं लोकसंगीत के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग द्वारा एक क्रांति ला दिए। वे सामान्य जन में प्रचलित विभिन्न भास के अनुरुप गीत रचना किए तथा स्वयं अभिनव भासों का परिकल्पना कर तदनुरुप अजस्त्र गीत रचना किए जो काफी लोकप्रिय हुआ। यह कहने का प्रयोजन नहीं है। सतरहम शताब्दी में लोचन उपाध्याय रागतरंगिनी में पन्द्रह की संख्या में राग-भैरवी, बड़ारी, कौशिक, देशारख, राम करी, ललिता, केदार, कामोद, श्रीराग, वसन्त, मालव, आसावरी, मलारी, भूपाली तथा गुजरी पर विद्यापति एवं अन्य प्राचीन कवि की गीत रचना पर लोकगीत के भाव, छंद एवं आस का गंभीर प्रभाव पड़ा है। यहाँ एक उदाहरण देखा जा सकता है-
लोचन माधवीय बड़ारी के निदर्शन में विद्यापति का प्रसिद्ध गीत उद्धृत किया है-
ससन-परसें खसु अम्बर रे, देखल धनी देह।
नव जलधर तर चमकाए के, जनि बिजुरी रेह।।
इस छंद पर विद्यापति के तिरहुति भास पर गेय प्रसिद्ध गीत है-
सुग्ल छलहुँ हम घरबा रे, गरबा मोति हार।
राति जखन भिनसरबा रे, पहु आयल हमार।।
इस तरह कतिपय उदाहरण लोकगीत के परम्परा एवं स्वरुप को दर्शाती है। वह लोकगीत संस्कार गीत, उत्सव व्रतोपासनापरकगीत, भक्तिपरक गीत, श्रमापनोदक गीत, समैया गीत एवं मनोरंजन गीत होता है। डॉ. महेन्द्र नारायण राम के भाओ-भगैत गहबर गीत, नव अन्वेषण एवं धरती से जुड़े गीतों का संग्रह चर्चित है। इन गीतों का कुछ गान मुद्रा लोकगीत के स्वरुपों की विशेषता है। नडुआ पमरिया नृत्य सहित यदि लोकगीतों का गान के अंतर्गत उनके द्वारा सिर, आँख, हाथ एवं पैर के विविध मुद्रा, संकेत एवं गति से गीत के भाव स्वत: व्यक्त होता है। अभिव्यक्ति की इस स्थिति को डॉ. रामदेव झा बतान कहते हैं पुरुष जब बिरहा, लोकगाथा एवं भाओ-भगैत-गहबर गीत तार स्वर में गाने लगते हैं, तो साधारणत: बाँये हाथ की तरहत्थी बाँये कान पर रख लेते हैं। कोई-कोई दाँये हाथ का भी उपयोग करते हैं। स्त्रीगण भी दाँये (कभी बाँये) हाथ मुंह पर रखती जिसमें मध्यमा अंगूली एवं अंगूठे से बनी वृत्त पर ठोंड़ी टिका रहता है एवं तर्जनी ऊपर के होंठ के ऊपर में रहता है। यह भांस का स्वर-लय का नियंत्रण के लिए किया जाता है। लोकगीत के गायन में वाद्ययंत्र यथा-मनारि, मृदंग, परवाओज, ढोलक, ढोलकी, डफला, डम्फा, खुदरक (ढोलपिपही), बसुली, खजूरी, करताल, चुटकुल, मंजीरा, भालि, ओरनी, एकतारा, सरंगी, हुडुक, आदि का उपयोग किया जाता है।
जीवन का कोई एक पक्ष नहीं है, जिसका रागात्मक अभिव्यक्ति लोकगीत में नहीं होता हो। तुलसी, कुश, आम, महु, नीम, बाँस, काछु, पुरैनिक पात, तिलकोर का पात से लेकर भोजन विन्यास तक लोकगीत में मिलता है। गर्भ धारण से मृत्यु तक समस्त संस्कार लोकगीत में अपने पृथक राग-भास एवं विषय वस्तु के संग अनुस्यूत है। इसमें युग-युग का अनुभव सुरक्षित है, जो सम्प्रति पारम्परिक लोकज्ञान के स्त्रोतक रुप में मान्यता पा गई है।
श्रम, नेना, संस्कार एवं भाओ भगैत संदर्भित दो उदाहरण यहाँ लोकगीत सौन्दर्य को स्पष्ट करता है-
सासु कहि गेलखिन हे दिलवर, एक सेर मरुआ उलबिह हे।
हम दिलवर बिसरि गेलीयै, चारि सेर मरुआ उलेतियै हे।।
सासु कहलखिन हे दिलवर, एक गो रोटी पकबिह हे।
हम दिलवर बिसरि गेलीयै चारि गो रोटी पकबिह हे।।
सासु कहि गेलखिन हे दिलवर बुढ़वा के सेवा करीह हे।
हम दिलवर बिसरि गेलीयै, बुढ़वा के टांग तोडि़ देलीयै हे।।
लगनी
अटकन-मटकन-दहिया चटकन
केरा कूरा महागर जागर
पुरनिक पत्ता हिलै-डोलै
माघमास करैला फड़ै
तइ पर सबहिक ना की?
आमुन गोटी जामुन गोटी
तेतरी सोहाग गोटी
लएह पुत्ता डाभर
करए गए कामर
बाँस काटे ठांय-ठांय
नदी गुगुआए
कमल फूल दुनू अलगल जाए।
सिंगही लेबह की मुंगरी ?
नेना गीत
अबटन गीत-
कओन नाना मेथिया बेसाहल ? कओन नानी पीसत?
अपन नाना मेथिया बेसाहल, सूहब नानी पीसत।।
हरदीक बड़ा सजावट जनक जी, हरदी में बड़ा सजावट।
पहिल हरदी दादा चढ़ावे, पाछू सँ दादी सोहागिन जनकजी।
हरदी का बड़ा सजावट
भाओ-भगैत... गहबरगीत
पर्वत मोहार पर चनसुर है बुनलौं
सेहो चनसुर गिरिगबा चरि गेल।
बरजू-बरजू राजा जी अपनो मिरिगबा
सबरे चनसुर मिरिगवा चरि जेल
मिरगा के मारि हो राजा जी खलरी घिचेबै
गांगों छौड़ी के चौलिया देबै सिलाइ
चोलिया पहिरि गांगों भेल समतुलबा
चलि गेलै लवि ससुरारि
एक कोस गेलै गांगों पहर पयरा हे बितलै
जुमि गेलै लवी ससुरारि।
माड़ों गीत
उपर्युक्त उदाहरण मात्र प्रतीकात्मक रुपे दिया गया है। इस तरह अनेको लोकगीत मनुष्य के जेहन में है। उपर्युक्त गीतों में आधुनिकता का प्रभाव पड़ रहा है। इसका एक उदाहरण यहां समीचीन होगा-
नेना गीत-
अटकन मटकन हार्लिक्स चटकन
लेमनचूस महागर जागर
बिजलीक पंखा नाचय डोल
पाँच बरख पर जनमत फूलय
तइ पर सबहिक ना की?
पहनाक गोटी दिल्ली क गोटी
मिनिस्ट्रीक सोहागक गोटी
लएह पुत्ता डिप्सोमा
देखइ गए सिनेमा
प्रेस छापय धायँ-धायँ
रेडियो गुगुआय
मानवक सभ्यता
अलगल जाए
एटम लेबह की पौंड़की?
यह लोकगीत का लोचकता है एवं जो लोकगीत का प्रवाह होता हे, जिसे रोक नहीं सकते। यह प्रवाह स्वच्छंद, सहज एवं सतत बहने वाली होती है, जिसे रोका नहीं जा सकता। लोकगीत में उपयोगिता, रागात्मकता, सौन्दर्यप्रियता एवं सामाजिकता का महत्ंव अत्यंत है। सामाजिकता रागात्मकता से कैसे मंडित रहता है, इसका एक बानगी निम्नलिखित पंक्ति मे द्रष्टव्य है। 'सेन्टो गमकदारÓ एवं 'चाचीÓ का प्रयोग प्राचीन नहीं है। यह लोकगीत के लोचकता को प्रदर्शित करता है-
जनकपुर में धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।
चाचीक हाथ में तेल-फुलेल, भामीक हाथ कसार अछि।
मौसीक हाथ में अत्तर सुगन्धित, सेन्टो गमकदार अछि।
जनकपुर में धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।
स्पष्ट है, लोकगीत में परिवेश का असर होता है। दरअसल जब परिवेश बदलता है। लोगों की आवश्यकता एवं रुचि बदलता है। संबंध एवं सरोकार बदलता है। इससे सामाजिक जीवन में परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन का प्रभाव लोक के जीवन-यापन पर पड़ता है। उद्योगीकरण एवं शहरीकरण से श्रम का पलायन आरंभ हुआ। गाँव-घर, खेत-पथार, पोखर-भाखर, वन-पर्वत के स्थान पर लोग का गोठूलला में रहने की बाध्यता हो गई। वे भिन्न भाषा-भाषी एवं संस्कृति के लोगों के बीच जीने को विवश होते रहे। पहले देश के एक कोना से दूसरे कोना तक लोग जाते थे। अब विश्व के एक कोना से दूसरे कोना तक उड़ जाते हैं। जहां सब कुछ अंधकार रहता है। अपरिचित  रहता है। बाजारवाद अपना सुरसा मुंह बाकर सब कुछ गिड़ (घोंट जाना) अपना रंग पसारने हेतु द्रूत वेग से चारों ओर पसर रहा है। जाँत पीसना अथवा ढेंकी कूटना अनावश्यक हो गया है। तब लंगनी का कौन प्रयोजन रह जाएगा। पहिले से ही 'वर कनियांÓ हाय-हेलो करते रहते हैं, तब मुंहबज्जी अथवा कोहबर के गीतों का क्या होगा ? बाजार में रंग-बिरंग का क्रीम एवं लोशन उपलब्ध है, नानी 'मेथीÓ क्यों पीसेगी? गोदना अब गोदाया नहीं जाता है। खोदपारनी आयेगी कहां से जो अवसरोचित गीत द्वारा हास-परिहास होगी। टेटू के फाहा में लहरिया कहां से आएगी, जिसकी तुलना पति-वियोग के लहर से किया जा सकेगा। नवजात का अथवा नेना का स्वास्थ्य रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के औषधि एवं सुई आदि का निर्माण हुआ है, तब पांच अथवा उस अवसर पर गाने जाने वाला 'पचगीतÓ का कौन प्रयोजन रह जाएगा? पसरते यांत्रिक, सांस्कृतिक तथा संचार माध्यम के माध्यम से अहर्निश प्रहार से लोकगीत प्रभावित हो रहा है।
ऐसी स्थिति में एक मात्र समाधान सांस्कृतिक चेतना जागृति एवं सबलता है। इस अभियान में लोकगीत का संरक्षण प्रयोजनीय ही नहीं अपितु अनिवार्य भी है।
साभार रऊताही 2015