Thursday, 21 February 2019

छत्तीसगढ़ के बारहमासी लोकगीत

व्यक्ति अकेला हो तो थोड़ी देर भी स्थिर बैठा नहीं रह सकता। उसका मस्तिष्क हर समय कुछ न कुछ करते रहना चाहता है। नदी किनारे बैठा हो तो रेत पर पड़ा तिनका उठाकर या उंगलियां फिराकर आड़ी तिरछी रेखाएं  खींचता है। जमीन पर बैठा हो तो खपरैल के टुकड़े से कुछ आकृतियां बनाने लगता है। पत्थर के दो टुकड़ों को आपस में टकराकर बजाने लगता है। कुछ न मिले तो प्रकृति के दृश्यों को देखकर कुछ गुनगुनाने लगता  है, सीटी बजाने लगता है। दीवालों पर लाल-पीली मिट्टी की पट्टियाँ और उन पर बनाई गई विभिन्न आकृतियां हमारी सृजनात्मकता की सहज-सरल लयात्मक अभिव्यक्ति ही लोककला है।
लोककला मन में उठने वाले भावों को सहज रुप में अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वत: स्थानांतरित हो जाने वाली विधा है। लोक कला हमारी संस्कृति की पहचान होती है, हमारी खुशी को प्रकट करने का माध्यम होती है।
लोककला का क्षेत्र एवं स्वरुप विस्तृत है। लोककला का वर्गीकरण यदि हम करना चाहें तो वर्ग के और उपवर्ग करने पड़ेंगे यथा लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोक नृत्य, लोक संगीत, लोक वाद्य, लोक श्रृंगार, लोक परम्परा, लोक व्यंजन, लोक शिष्टाचार आदि। यहां हम केवल लोकगीतों पर ही ध्यान केन्द्रित करें तो हम पाते हैं कि लोकगीत जीवन के अभिन्न अंग है। लोकगीत विभिन्न अवसरों पर गाये जाते हैं। तात्कालिक उत्पन्न परिस्थिति में, सामाजिक धार्मिक पर्व में, विशेष आयोजन में। बच्चे के जन्म पर, षष्ठी (छट्ठी) पर उपनयन, जनेऊ संस्कार, विद्यारंभ संस्कार, विवाहादि अवसरों पर हम लोकगीतों के माध्यम से खुशी व्यक्त करते हैं।
त्यौहारों की शुरुआत आषाढ़ मास में रथ-यात्रा से होती है। भगवान जगन्नाथपुरी जी मथुरा से पुरी पधारते हैं तो उनके भक्त उनका धन्यवाद ज्ञापित करते हैं-
ठाकुर भले बिराजेव हो, ठाकुर भले बिराजेव हो।
उड़ीसा जगन्नाथपुरी म भले बिराजेव हो।।
आषाढ़ में वर्षा की बूंदे पड़ते ही किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। वे अपने नांगर-बैलों को लेकर खेतों की ओर चल पड़ते हैं। ऐसा लगता है मानो बैलों के गले की घंटियां हमें गीता-पाठ पढ़ा रही हो, कर्म करने को प्रेरित कर रही हों-
आगे आषाढ़ गिर गे पानी, भींजगे ओरिया भींजगे छानी
धर ले नांगर धर तुतारी, अरररर अर त त त...
किसान नांगर जोतकर खेतों में बीज बो देता है। खेत में काम करते अपने नंगरिहा के लिए जब किसानिनें हाथों में ककनी-हरैय्या-बनुरिया पहने, पैरों में पैरी छनकाती, बटकी में बासी और मलिया में नून-चटनी लेकर खेत पहुंचती हैं, तो बरबस नंगरिहा के मुंह से बोल फूट पड़ते हैं-
बटकी म बसी बऊ चुटकी म नूंन
मैं गावत हौं ददरिया तैं कान देके सून ओ चना के दार...
किसानिन अपनी विरह व्यथा को प्रकट करती है
तरी फतोही ऊपर कुरथा, रहि-रहि के मोला आथे तोरेच सुरता
कुंआ के पानी कुंआसी लगै, परदेश झन जा राजा रोवासी लागै
बागे बगइचा दिखे ल हरियर, मोटरवाला नई दीखै बदे हौं नरियर
नायिका का प्रमोद्गार सुनकर नायक कभी कभी मर्यादा का मौखिक अतिक्रमण कर जाता है-
करची के पानी गरम करले, तोर चढ़ती जवानी धरम कर ले।
सावन महीने में कुंवारी कन्याएं छोटी-छोटी बाँस की
टोकनी में रेत भरकर और उसमें गेंहू के दाने बोकर भोजली उगाती हैं। श्रावण पूर्णिमा को बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। भोजली के गंगा का रुप मानकर दूसरे दिन नदी या तालाब में ले जाकर एक साथ विसर्जित करती हुई गाती हैं-
देवी गंगा देवी गंगा लहरा तुरंगा हो लहरा तुरंगा
हमर सुघ्घर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा, अहो देवी गंगा
आसा खेलेन पासा खेलेन, अऊ खेलेन डंडा
हमर सुघ्घर भोजली दाई के सोने के हंडा, अहो देबी गंगा..
बहनें भाइयों को खुशी-खुशी राखी बांधती हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा अपनी साड़ी का पल्ला चीरकर कृष्ण जी की कटी उंगली में बांधने और सुभद्राजी द्वारा बलराम श्रीकृष्ण को राखी बांधने और भाई द्वारा बहन की रक्षा की बात का स्मरण किया जाता है।
भादों अंधियारी पाख अष्टमी को अर्धरात्रि में कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है और सोहर गाया जाता है-
जनम लिए कृष्ण कुरारी जगत हितकारी,
भगत सुखकारी हो ललना
हो ललना...
जबहिं गोपाल चले मधुबन को घर
आंगन न सुहाई ए हां जू...
मुरली बजावत धेनु चरावत
बसहि जमुना जी के तीरे ए हां जू...
भादों अंजोरी पाख में गणपति पूजन किया जाता है
गणपति महाराज गणपति महराज, तोरे भरोसा मोला भारी
अहो मन भजो गणपति गणराज, कुमति कलुष कटै...
हिन्दू जनमानस क्वाँर जेंवारा पाख में जगह-जगह दुर्गा माँ का जस गीत, जेंवारा गीत सुनकर भक्तिभाव में डूब जाता है
तुम्हरें दरस बर हां हम आयेन माता तुम्हरे दरस बर हां
हम आयेन माता तुम्हरे दरस बर हाँ
तुम्हरे दरस बर आयेन माता ब्रह्मा विष्णु महेशा
चंढ़े नांदिया शम्भू आए हाथ म धर के लबेदा
ब्रह्मा आए विष्णु आए शिव आए कैलासा
महामाई के रुप देख सब देवतन के मन हुलसा...
कार्तिक महीना भर कुंवारी कन्याएं मुंह अंधेरे उठकर नदी तालाब जाकर स्नान करती हैं और कृष्ण समान अच्छे सुंदर वर की कामना करती हुई शिव पूजन करती हैं। घर-घर दीपावली सजाकर लक्ष्मी पूजा की जाती है। इन्हीं दिनों सुहागिनी स्त्रियाँ 10-12 की झुण्ड में सुवा गीत गाती हुई सुआ नृत्य करने निकलती हैं। एक टोकनी में मिट्टी का बना सुआ रखकर उसे आदरपूर्वक ढांककर बैठाती हैं और उसके चारों ओर लयबद्ध ताली बजाती हुई घूम-घूमकर सुआ गीत गाती हुई नाचती हंै। इन गीतों में नारी मन के भावों की अभिव्यक्ति छिपी रहती है। सुआगीत के माध्यम से नारी मन की व्यथा, सुख-दुख, सम्पन्नता-विपन्नता, विरह वेदना उभर आती है-
तरि हरि नाना मोर नाना सुवना के तरि-हरि नाना रे ना...
नारे सुअना के तिरिया जनम झनि देय। नारे सुअना
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर रे सुअना
के जिहां पठवय तिहां जाय। नारे सुवना...
सुआ नृत्य देवउठनी एकादशी तक चलता है। इसी समय दीपावली के दूसरे दिन गौरी-गौरा विवाह का आयोजन गोंड/यादव समाज में बड़े उल्लास से मनाया जाता है। मिट्टी से गौरी-गौरा बनाकर मिट्टी से ही मंडप सजाने के बाद जोत जलाकर शोभायात्रा निकाली जाती है। गंड़वा बाजा की धुन में बरुआ नाचते हुए हाथ बढ़ाकर साँट लेते हैं। फिर उसे नदी या तालाब के जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
देवउठनी एकादशी के दिन अहीर-यादव-रावत समाज के द्वारा रावत नाच महोत्सव मनाया जाता है। रंग बिरंगे परिधानों से सजे जरी क जाकेट, रंग-बिरंगे कागज के फूलों से बने कलगी लगे पगड़ी बांधे, एक हाथ में फरी और दूसरे हाथ में पांच हाथ के लाठी, पैरों में रंगीन मोजे, घुंघरु और चरमर करते पनही यही अहीर जवान का बाना होता है। टिमकी, डफड़ा और गंड़वा बाजा के साथ जब 15-20 जवानों का दल दोहा बोलकर नाचता है, वह दृश्य देखते ही बनता है। दल में गंड़वा बाजा के साथ एक पुरुष नर्तक स्त्री वेश में सज धज कर परी बनकर शामिल होता है।
दोहे ऐसे हैं-
कुकरी के पिलवा रन-बन बगरे, धर-धर खाय बिलाय।
होबे बेटा क्षत्री के रे तैं कै दिन रहिबे लुकाय।।
चार दिन के जिनगी भइया, चार दिन के खेल।
चार दिन के देवारी, फेर कउन मरही कउन जीही।।
जइसे के मालिक लिहेव, दिहेव, तइसे के देबो असीस
रंग महल म बइठै मालिक, जुग जियो लाख बरीस
अगहन पूस मास में खेतों में पककर खड़ी फसल को काटकर किसान खलिहान में ले आता है और मिसाई कर दाना कोठी में रख लेता है। पूस पूर्णिमा की रात में छोटे-छोटे बच्चे अलग-अलग समूहों में घरों घर जाकर अन्नपूर्णा माता का आह्वान करते हुए दान मांगने निकलते हैं और आवाज लगाते हैं-
छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान हेरते हेरा...
किसान भी बच्चों को थोड़ा-थोड़ा अनाज दान करके खुश होता है। इस त्यौहार में दान की महिमा बताई गई है। इन्हीं दिनों ओडिय़ा बसदेवा भी चटकउला बजाते सुबह-सुबह जय गंगा गाते हुए दान मांगने आते हैं। इन्हीं दिनों सतनामी समाज गुरुघासीदास बाबा के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करता है और सत्य की स्थापना के लिए उनकी जयंती मनाकर उन्हें याद करता है। झांझ और मांदर की थाप पर 20-22 नवयुवाओं का दल को झूमकर एक ताल बंधान पर नाचते देखते ही बनता है। गुरु घासीदास की महिमा को एक नर्तक गाता है और शेष नर्तक दुहराते हुए ताल गति पर नाचते हैं
जै हो जै हो गुरुघासीदास, चरण म तोर गंगा बहै...
ऋतुराज बसंत के आगमन पर मदनोत्सव मनाने के पूर्व मदन दाहक महादेव की पूजा भी तो जरुरी है। अंचल में शिव-पूजा की धूम मचती है। लोग दूर-दूर से काँवरियों में जल लाकर शिवलिंग में चढ़ाते हुए यथाशक्ति भजन पूजन करते हैं।
फागुन में ऋतुराज बसंत के आते ही धूप सुहानी हो जाती है। होली लोकगीतों के साथ-साथ नगाड़े की थाप पैरों को थिरकने पर मजबूर कर देता है और छैल छबीलों के मुंह से बरबस निकल पड़ता है यह लोकगीत-
चल हाँ रे संतों देबी शारदा गा लइहौ
अरे देबी शारदा गालइहौं संतों देवी शारदा गा लइहौ...
चल हां बिरिज में नाचे नंद के कान्हैया
पिताम्बर उडि़-उडि़ जाय बिरिज में नाचे नंद के कान्हैया...
होली लोकपर्व पर कुछ समय पूर्व तक फाग गीत में वेश्या नचाने की प्रथा थी जो अब बंद हो गई है। यह नारी सम्मान की दृष्टि से बहुत अच्छा है। किन्तु यही बुराई महानगरों में बार बालाओं के नाच के रुप में आज भी जारी है जो दुखद है।
इसके अतिरिक्त बांसगीत, चंदैनी गीत, देवार गीत, डंडा गीत, आल्हा, झूमर गीत, बिहाव गीत आदि अनेक क्षेत्रीय लोकगीत अंचलों में गाये जाते हैं। न केवल हमारे छत्तीसगढ़ में वरन देशमें और विश्व में हर क्षेत्र की अलग-अलग बोली और भाषाओं में अलग-अलग लोकगीत हैं, जो जनमन में बसे हैं और लोकरंजन करते हैं।
साभार - रऊताही 2015

विवाह के इंद्रधनुषी लोकगीत

लोकगीत ग्रामीण परिवेश से बाहर आकर आज शहरों के लोकमंच और गलियों में प्रतिध्वनित हो रहे हैं। स्त्री विमर्श हिन्दी साहित्य  में बहुत बाद में शुरु हुआ लेकिन गाँव में पीडि़त लोक नायिका ने लोकगीत के माध्यम से अपनी पीड़ा को शब्द देने का प्रयास किया- पइंया मंय लागत हंव चन्दा सुरुज के सुअना, तिरिया जनम झनि देय। कहते हैं प्राचीन काल में सुआ ही चिट्ठी पत्री ले जाता था इसलिये सुआ को संबोधित यह इतिहास की नारी पीड़ा आंसुओं से भारी नायिका के अंतर्मन का रेखांकित दस्तावेज है। लोकगीत ग्रामीण जिंदगी के ऐसे पृष्ठ हैं जिसमें समय स्पष्ट नहीं है लेकिन ग्रामीण लोक की झांकियाँ शब्दों में पिरोकर इतिहास के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, मिलन-विरह, रिश्ते नातों के भाव, मनोवैज्ञानिक, पृष्ठभूमि, अर्थहीनता, सीमित सुविधाएं जारी इच्छा और जीवन के संदर्भ प्रसंग पर लोकगीतों में लोक ने अपनी वाणी दी है।
छत्तीसगढ़ अंचल में विवाह को लेकर चिडिय़ा के क्रमश: बनते घोंसले के तिनकों की तरह विवाह के प्रत्येक प्रसंग पर लोकगीतों की सार्थक संरचना हुई है। विवाह शहर-ग्रामों में गंूजे और वैवाहिक लोकगीत न गूंजे तो विवाह का माहौल सूना लगता है लेकिन मैंने स्वयं अनुभव किया है कि जब मेरे घर में यह हमारे रिश्तेदारों के घरों में विवाह होते हैं तो मेरी सगी बड़ी बहिन श्रीमती सुशीला जालिम सिंह भट्ट जो उस वैवाहिक मंडप में प्राय: लोकगीतों की अकेली जानकार होती है, विवाह का ऐसा समां बाँधती है कि पूरा वैवाहिक परिवेश और आसपास के घरों तक जाती साथ ही महिलाओं की आवाजें 'विवाह हो रहा हैÓ का संदेश दूर तक पहुंचा देती हैं।
छत्तीसगढ़ में लड़की देखने की परम्परा है। कभी-कभी माता पिता लड़की का सौंदर्य रुप रंग, घरेलू कामों में निपुणता, पढ़ाई-लिखाई, दूसरे अन्य कामों में दक्षता देख आते हैं, लड़की के पड़ोस का भी परिचितों के माध्यम से सहारा लेते हैं। कन्या पसन्द आने पर लौट कर घरेलू चर्चा आजकल के फैशन के अनुसार लड़के को लड़की दिखाकर लड़के की स्वीकृति लेते हैं, पहले केवल माता-पिता का देखना पर्याप्त समझा जाता था और विवाह के समय ही होने वाली दुल्हन देख पाता था। प्राचीन समय में लड़की ब्याह का संदेश नाई लाते, ले जाते थे जिसके लिए स्वर्गीय रमेश वर्मा 'सरसÓ  ने लिखा था 'कांदा बारी म कांटा के रुधान, जइसे मोटियारी बर नाऊ सियान।Ó
विवाह योग्य उमर हो जाने पर कुंआरा लड़का अपनी दाई (माँ) से आग्रह करता है कि अब उसके विवाह के लिए भी रुपये-पैसे की तैयारी की जाय और इस शालीन विवाह लोकगीत में लड़का माँ के घरेलू कामों में बंटवारे के लिए बहू की अनिवार्यता सिद्ध करता है-
दे दो आई दाई लाख रुपइया
के सुंदरी बिहाये चले जांव
उहां कहां जाबे बेटा
सुंदरी के गाँव बड़ दूर हे
बेटा तोर बर दूरिहा मोर बर लकठा
तोर लांव दाई घर लिपईया
मोर जनम के जोड़ी। ओ दाई दे दे...
तोर बर लांव दाई दार भात रंधइया
मोर जनम के जोड़ी। ओ दाई दे दे...
तोर बर दाई-भडंवा मंजइया
मोर जनम के जोड़ी ओ दाई दे दे...
छत्तीसगढ़ में विवाह के प्रारंभिक रस्मों मंडप छाने के बाद लड़के को हल्दी चढ़ाई जाती है और घर की महिलाएं बुआ, माँ, बहनें एवं चाची आदि तीन से पाँच दिनों तक लड़के के शरीर में हल्दी का लेपन भी करती हैं। लड़की वालों के यहां भी महिलाएं हल्दी चढ़ाने एवं लेपन की रस्म निबाहती हैं। हल्दी चढ़ाने एवं लेपन के समय महिलाओं में प्रचलित एक लोकगीत इस प्रकार है-
पीले-पीले दुल्हा दाई कअन गुना
उनकी अम्मा ने खाई हरदी सो पीले हैं ओ ही गुना
गोरी-गोरी दुल्हन दे ई कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई बतासा सो गोरी है ओ ही गुना
काली-काली दुल्हन  दे ई कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई जमुनिया सो काली है ओ ही गुना
दूबली दुबली है दुल्हन कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई है खेड़ा सो दुबली है ओ ही गुना
सुंदर-सुंदर है दुल्हन कऊन गुना
उनकी अम्मा ने खाई गुलाब सो सुंदर है ओ ही गुना
हल्दी चढ़ाने एवं लेपन के तीसरे या पाँचे दिन बारात ब्याह के जाने या लड़की के घर बारात आने के दिन वर कन्या को नहलाया जाता है।
विवाह के दिन क्षण पास आने से घराती-बाराती परिवार में एक इन्द्रधनुषी परिदृश्य की प्रसन्नता होती है। इस प्रसन्न अठरवेलियों में नहलाते समय का एक लोकगीत है-
छोटी राधा प्यारी पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
ठंडे से पानी गरम कर लाई सफरे न राधा प्यारी
पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
लौंग खिल-खिल बीड़ा लगाये रचें राधा प्यारी
पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
तोड़ कली रस गेंदा बनाये खेले न राधा प्यारी
पतलो शरीर चलो देखन चलियो रे
छत्तीसगढ़ में वर पक्ष कन्या ब्याहने के लिए निकलते हैं तो बारातियों की वेश-भूषा, साज-सज्जा (कोई टोपी-कोई पगड़ी) एवं अलग-अलग रंग के पहिनावे रंगारंग परिवेश लेकर बारात बिदा होता है। बारात ब्याह करने के लिए निकलते समय का एक लोकगीत है-
मेरे आँगन गेंदा फूल, कुसुमरंग
फीको लागे रे बना के
मामा है सरदार बना को ऐसे साजे रे
जइसे सज गये लक्ष्मण राम
वशिष्ठ मुनी आगे आवय रे
बना जीजा है, सरदार बना को
जइसे सज गये लक्ष्मण राम
वशिष्ठ मुनी आगे आवय रे
इस क्रम में फूफा, भइया एवं नाना दादा आदि रिश्तेदारों को महिलाएं इस तरह के क्रमश: टेक दुहराती हुई जोड़ लेती हैं।
बारात जब लड़की के घर (आजकल कहीं कहीं विवाह मंडप, मंगल भवन) पहुंचती है तब बारात के स्वागतक्षणों में 'द्वारचारÓ होता है, महिलाएं पीले चाँवल जोर से पुरुषों के ऊपर फेंक कर एवं पुरुष हलके से उछाल कर मारते हैं। पंडित के द्वारचार पूजा कराने से पहिले महिलाएं पीतल के घड़े में पानी रखकर नेग मांगती हैं, दूल्हा मंडप की पत्तियों को कहीं से छूता है फिर पंडित जी द्वारचार पूजा कराते हैं।
द्वारचार के बाद दूल्हा खाना खाने के पहले  रुठने का अभिनय करते हुए खाने की नेग की मांग करता है। खाने के समय पहले दूल्हा अपनी कोई बड़ी मांग नेग के रुप में रखता है। कन्या पक्ष अपनी हैसियत के अनुसार आर्थिक स्थिति को देखते हुए दूल्हे की माँग पूरा करते हैं। नेग पूर्ति के बाद बारातियों का खाना होता है, खाना खाते समय महिलाएं गाली गाती हैं जिसे छत्तीसगढ़ में 'शादी की गारीÓ 'खाये के गारीÓ नाम से लोकगीत गाती हंै-
गोरे गोरे मटकी में दहिया जमाये
कुछ खाये, कुछ भुइंया गिराये राम
अपनी बहिनी के गाले लगाये। मोरे... राम
कुछ लछमन अपनी बहिनी के गाले लगाये। टेक...
कुछ भरत अपनी बहिनी के गाले लगाये। टेक...
इस तरह बारात में शामिल महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम जोड़कर महिलाएं अपनी गालियों का क्रम पूर्ण करती हैं।
छत्तीसगढ़ में 'बेटी के बिदाÓ के क्षण अपनी मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए पहचाने जाते हैं। बेटी की बिदा के बाद उसकी माँ का आँगन जहाँ कभी बेटी बचपन में खेली-कूदी थी उसकी अभिव्यक्ति 'छत्तीसगढ़ी लोकगीत ददरियाÓ में 'मोर अंगना ले उड़ाथे चिरई चिरगुनÓ शब्द समूह रेखांकित कर  कहा गया है- ऐसा लगता है कि चिडिय़ा गौरेया फिर मेरे आँगन में नहीं आएगी। विवाह के बाद बेटी बिदा हो जाएगी- की कल्पना माँ शादी के पहले ही कर लेती है और फिर इतिहास सचमुच  बेटी की बिदा लेकर आ जाता है। बेटी को बिदा करते माँ बाप पर स्व. द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्रÓ श्यामलाल चतुर्वेदी पूर्व अध्यक्ष- छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ी में प्रथम भागवत भाष्यकार राष्ट्रपति पुरस्कृत पं. दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, बुधराम यादव, ने आंसुओं से भरे संवेदनापूर्ण छत्तीसगढ़ी गीत रचे हैं-
ये दे सब्बे झन रोवंथंय फफक फफक
बेटी जावाथे जावाथे ससुरार
डॉ. विमल कुमार पाठक
'बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिलेÓ जैसे फिल्मी गीतों में 'बेटी के बिदाÓ को शब्द दिये हैं तो लोकगीत में चित्रित है कि बेटी मायके में क्या छोड़ जाती है-
दो हंसों के कार दरवाजे खड़ी
आज मेरी बन्नो ससुरार चली रे
बाबूल छोड़े, अम्मा, छोड़ी के बन्नो
आज हो गई पराई रे
चाची छोड़ो, चाचा छोड़े बन्नो हो गई...
मामी छोड़ी, मामा छोड़े
बन्नी आज हो गई पराई रे...
सखियाँ छोड़ी, सहेलियाँ छोड़ीं
बन्नो हो गई आज पराई रे...
विवाह के मांगलिक अवसर पर छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के अनेक लोकगीत की गूंज देवउठनी एकादशी से ग्रीष्मकाल की तपिश और वर्षा की प्रथम फुहारों के कुछ समय बाद तक अनुगूंजित होकर वातावरण में सुखों की सृष्टि रचते हैं। बारात लेकर बाराती जब कन्या के ग्राम शहर चले जाते हैं महिलाएं स्वतंत्र डिड़वा नाच या नकटौरा करती हुई अनेक स्वांग रचती है। बारात जब कन्या के निवास पहुंचती है तब बारात स्वागत लोकगीत सगले बाराती के जूता नहीं, पावों में पायल पहनाव मेरी बहिना से स्वागत होता है। द्वारचार के मंगल गीत सुनने में अच्छे लगते हैं। बेटी जब ससुराल से पहली बार मायके आती है- सहेलियाँ पूछती हैं पति, ससुर, जेठ एवं देवर कैसे हैं? विवाहित नायिका एक लोकगीत में उनके उत्तर देती हुई- देवर के लिए कहती है 'सब सखियां पूछे, तेरा देवरा कैसा है, वो तो गलियों में मचाये शोर हल्बा जइसे है।Ó
साभार - रऊताही 2015

मैथिली लोकगीत : परम्परा, स्वरुप एवं सौन्दर्य

लोकगीत एक ऐसी मौखिक परम्परा हे, जो विभिन्न मनुष्य में वंशानुगत क्रम से चला आ रहा है एवं जिसका जड़ मूल रुप से सुदूर अतीत में विद्यमान होता है। अशिक्षित ग्रामीण एवं निरीह जनता के भावुक हृदय की संवेदनशीलता से फूट कर 'लोकगीतÓ उसके होंठ पर आकर सुर एवं ताल-लय के संग गुंजित होने लगता है।
लोकगीत मूलत: एवं सिद्धांत: जातीय एवं सामुदायिक रचना है। एक सर्जक एक कलाकार, एक व्यक्ति नहीं अपितु इसके रचनाकार सम्पूर्ण लोक होते हैं। समस्त जाति ही लोकगीत की उद्भावना एवं पोषण के आधार होते हैं। लोकगीत अन्तोगत्वा एक निर्वेक्तिक, सामूहिक एवं सामाजिक रचना है, जिसका विशिष्ट गुण गेयता है।
साधारणतय ग्रामीण जनता के जीवन में जन्म के पहले से लेकर मृत्यु तक लोकगीत व्याप्त रहता है। बच्चा के जन्म पर सोहर गाकर प्रसन्नता प्रकट किया जाता है। दादी माँ बच्चा को 'लोरीÓ सुना कर सुलाती है। खेलने-कूदने के समय भी  गीत गाते हैं। युवकवृंद प्रेमपूर्वक गीत गाकर स्नेह की अभिव्यक्ति करते हैं एवं प्रेमिका को रिझाते हैं। विवाह के प्रत्येक विधि विधान के समय स्त्रीगण गीत गाकर सुखद वातावरण उत्पन्न करती हैं तथा हास-परिहास करती हैं। वर्षा ऋतु में 'कजरीÓ फागुन में 'फागÓ  एवं चैत में 'चैतावरÓ गाकर साधारण जनानंदित होती है। श्रमजन्य कष्ट को विस्मृत करने हेतु जाँत पिसने के समय लंगनी, बाट चलते समय 'बटगमनीÓ, गोदना गोदाते समय 'गोदना गीतÓ गाये जाते हैं। तिरहुंति, मान, झुम्मर, बिरहा, आदि मनोरंजन एवं आनंद के उद्देश्य से गाये जाते हंै। नचारी, महेश, वाणी, साँझ, पराती आदि गीत गाए जाते हैं। बहुसंख्यक लोग अपने वैयक्तिक जीवन में, परिवार में तथा समाज में रोग-व्याधि से छुटकारा, सुहाग एवं पुत्र की कामना एवं रक्षा तथा शांति एवं अभ्युदय की मंगल कामना के भाव लेकर भाओं-भगैत, गहबर गीत को झाल-मृदंग, करताल आदि के संग यथास्थान बने धर्म के गहबर में निष्ठापूर्वक गाए जाते हैं। वयोवृद्ध भी निर्गुण, उदासी गाकर अपने मन को शांत करते हैं। स्पष्टत: 'लोकगीतÓ जीवन में रचा ओ पचा है, धुलल ओ मिला है।
'लोकगीतÓ मनोरंजक शिक्षा भी देती है तथा परिवार, समाज एवं देश के प्रति कर्तव्य-बोध कराती है। इतना ही नहीं अपितु लोकगीत गाकर वीर पुरुष एवं शहीद के शौर्य एवं बलिदान का गौरव गान कर देश प्रेम की भावना जगाती है। हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम के क्रम में लोकगीतकार अपनी तेजस्वी एवं देशभक्तिपूर्ण गीत गा-गाकर हजारों-हजार व्यक्ति में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न किए थे।
लोकगीत जनकंठ की सम्पत्ति रही है एवं श्रुति परम्परा से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को प्राप्त होता रहा है। तथापि थोड़ा अतीत में झाँकने पर देखी जाती है कि वैदिक समाज में विभिन्न प्रकार के यज्ञ में स्लोम, स्त्रोत, एवं विशेष प्रकार के सामगान सब होता था, जिसमें वैदिक देवता सबों का स्तवन किया जाता था। विवाहादि संस्कार में वैदिक मंत्र का वाचन, पाठ एवं सामगान होता था। विभिन्न लोकोत्सव के अवसर पर ऋचा एवं सामगान से इतर लौकिक गान, नाराशंसी, रेम्य आदि कहा जाता था। ऋतु विशेष में साम विशेषक गान, निरंतर श्रमसाध्य, व्यावसायिक कार्य में श्रमहरण एवं रंजक गान होता था। परवर्ती काल प्रवाह में वैदिक देवता के स्थान में पौराणिक देवी-देवता गण स्थापित हो गए एवं यज्ञादिक स्थान पूजा, व्रत एवं पर्व-त्यौहार ले लिया। क्रमश: पितृकर्म में भारुदण्ड, अन्त्येष्टिकाल में श्राद्ध कर्म के प्रकरण में कबिराहा निर्गुण प्रभेद आदि सामूहिक गान का प्रचलन हो गया। पमरिया, झिझिया, झरनी, डोमकच आदि चलने लगा।
एक तरफ जहां जर्मनी के श्री विलियम ग्रीम लोकगीत की समारंभ के विषय में सामूहिक विकास  तथा उत्पत्ति का प्रतिपादन किया तो दूसरी तरफ इसका खण्डन रुसी विद्वान सोकोलोव इस उक्ति से किया है- 'कोई कृति आदि ऐसा कभी नहीं रहा है, जिनका कोई भी रचयिता नहीं हो अथवा सम्पूर्ण जनता की ही रचना रहा हो। इसी तरह ए.एच.क्रेय, डॉ. सत्येन्द्र, डॉ. जवाहर लाल हाण्डू एवं ईन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका भी इसके संबंध में अपने-अपने ढंग से विचार रखा है। जहां लिखित साहित्य का इतिहास लिखना प्राय: संभव होता है, वहीं मौखिक होने के कारण लोकगीत का इतिहास लिखना असंभव प्राय: अर्थात् अत्यंत कठिन रहता है। परन्तु इतना अवश्य कि लोकगीत उस वन्य वृक्ष के समान होता है, जिसका जड़ अतीतकाल में गहरा रोपा रहता है एवं उसमें नित नव शाखा, पत्ते एवं पुष्प प्रस्फुटित होता रहता है। अर्थात लोकगीत यदि एक तरफ कल्पना है तो दूसरी तरफ भावना एवं रसवृत्ति। एक तरफ यदि उल्लास है, उमंग की रेशमी इजोरिया है, नृत्य का हिलोर है, भावुक मन का मनुहार है, तो दूसरी तरफ जीवन का निषाद-नैराष्य का गहन अन्हरिया है, घनीभूत पीड़ा का आकुलता-व्याकुलता एवं टीस है, थका मांदा आत्मा का शलाध्य उच्छवास है।
लोकगीत के स्वरुप पर विचार करने पर हम देखते हैं कि इसका महत्व एवं उपादेयता असंदिग्ध है। शुक्ल जी, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर डॉ. एलवीन, देवेन्द्र सत्यार्थी तक इसके महत्व पर विस्तृत रुप से विचार किया है। द्विवेदी लिखते हैं- ग्राम्यगीत अपने सभ्यता का वेद है। वेद तो भी अपने आरंभिक काल में श्रुति कहाता था एवं ग्राम्य गीत की तरह ही सुन-सुन कर याद रखा जाता था। जिस प्रकार वेद द्वारा आर्य सभ्यता का ज्ञान होता है, उसी प्रकार लोकगीत के द्वारा आर्य पूर्व सभ्यता का ज्ञान कर सकते हैं। ईंट-पत्थर के प्रेमी विद्वान यदि धृष्टता नहीं समझें तो जोर देकर कहा जा सकता है, कि लोकगीतक महत्व मोहनजोदड़ों से कहीं ज्यादा है। मोहनजोदड़ों जैसा भग्र-स्तूप ग्राम्य गीत के भाष्य का कार्य दे सकता है।
लोकगीत का एक सुदीर्घ परम्परा रहा है। एक बार पुन: पीछे चले। वेद परायण से ज्ञात होता है कि विविध संस्कार अवसर पर यहां लोकगान होता था। पालि जातक, बाल्मीकि रामायण में भगवान राम का जन्म के अवसर पर गंधर्व का मधुर गान एवं नृत्य व्यासदेव का श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण जन्म के अवसर एवं बड़े होने पर भी कृष्ण-ब्रज रमणी के मध्य स्वयं लोकगीत गायन, महाकवि, कालिदास का रघुवंश महाकाव्य में ग्रामीण स्त्री द्वारा महाराजा रघु का यश-गान, किरातार्जुनीय एवं माघ्य महाकाव्य के रंग-संग प्राकृत युग में राजा हाल तथा शालिवाहन संग्रह 'गाथा सप्तशतीÓ एवं महाकवि श्री हर्ष में स्त्रीगण द्वारा विभिन्न प्रकार के लोकगीत का उल्लेख है। इसी तरह विवाह संबंधी गाथा सबों का उल्लेख पारस्कर गृह सूत्र में हुआ है। अश्वमेघ राजसूय जैसा यज्ञ  के अवसर पर मांगलिक गीत गानने का प्रमाण है। महिषासुर वध करने के अवसर पर अप्सराओं के द्वारा नृत्य करने एवं गंधर्वों के द्वारा गीत गाने का उल्लेख एक तरफ यदि मिलता है तो दूसरी तरफ कविराज जयदेव के 'गीत-गोविन्दÓ बंगभूमि में 'यात्राÓ नाम का उल्लेख में गाए जाने वाला प्रत्येक प्रचलित धर्मगीत के मध्य का उपज है।
महाकवि विद्यापति मिथिला का शास्त्रीय संगीत एवं लोकसंगीत के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग द्वारा एक क्रांति ला दिए। वे सामान्य जन में प्रचलित विभिन्न भास के अनुरुप गीत रचना किए तथा स्वयं अभिनव भासों का परिकल्पना कर तदनुरुप अजस्त्र गीत रचना किए जो काफी लोकप्रिय हुआ। यह कहने का प्रयोजन नहीं है। सतरहम शताब्दी में लोचन उपाध्याय रागतरंगिनी में पन्द्रह की संख्या में राग-भैरवी, बड़ारी, कौशिक, देशारख, राम करी, ललिता, केदार, कामोद, श्रीराग, वसन्त, मालव, आसावरी, मलारी, भूपाली तथा गुजरी पर विद्यापति एवं अन्य प्राचीन कवि की गीत रचना पर लोकगीत के भाव, छंद एवं आस का गंभीर प्रभाव पड़ा है। यहाँ एक उदाहरण देखा जा सकता है-
लोचन माधवीय बड़ारी के निदर्शन में विद्यापति का प्रसिद्ध गीत उद्धृत किया है-
ससन-परसें खसु अम्बर रे, देखल धनी देह।
नव जलधर तर चमकाए के, जनि बिजुरी रेह।।
इस छंद पर विद्यापति के तिरहुति भास पर गेय प्रसिद्ध गीत है-
सुग्ल छलहुँ हम घरबा रे, गरबा मोति हार।
राति जखन भिनसरबा रे, पहु आयल हमार।।
इस तरह कतिपय उदाहरण लोकगीत के परम्परा एवं स्वरुप को दर्शाती है। वह लोकगीत संस्कार गीत, उत्सव व्रतोपासनापरकगीत, भक्तिपरक गीत, श्रमापनोदक गीत, समैया गीत एवं मनोरंजन गीत होता है। डॉ. महेन्द्र नारायण राम के भाओ-भगैत गहबर गीत, नव अन्वेषण एवं धरती से जुड़े गीतों का संग्रह चर्चित है। इन गीतों का कुछ गान मुद्रा लोकगीत के स्वरुपों की विशेषता है। नडुआ पमरिया नृत्य सहित यदि लोकगीतों का गान के अंतर्गत उनके द्वारा सिर, आँख, हाथ एवं पैर के विविध मुद्रा, संकेत एवं गति से गीत के भाव स्वत: व्यक्त होता है। अभिव्यक्ति की इस स्थिति को डॉ. रामदेव झा बतान कहते हैं पुरुष जब बिरहा, लोकगाथा एवं भाओ-भगैत-गहबर गीत तार स्वर में गाने लगते हैं, तो साधारणत: बाँये हाथ की तरहत्थी बाँये कान पर रख लेते हैं। कोई-कोई दाँये हाथ का भी उपयोग करते हैं। स्त्रीगण भी दाँये (कभी बाँये) हाथ मुंह पर रखती जिसमें मध्यमा अंगूली एवं अंगूठे से बनी वृत्त पर ठोंड़ी टिका रहता है एवं तर्जनी ऊपर के होंठ के ऊपर में रहता है। यह भांस का स्वर-लय का नियंत्रण के लिए किया जाता है। लोकगीत के गायन में वाद्ययंत्र यथा-मनारि, मृदंग, परवाओज, ढोलक, ढोलकी, डफला, डम्फा, खुदरक (ढोलपिपही), बसुली, खजूरी, करताल, चुटकुल, मंजीरा, भालि, ओरनी, एकतारा, सरंगी, हुडुक, आदि का उपयोग किया जाता है।
जीवन का कोई एक पक्ष नहीं है, जिसका रागात्मक अभिव्यक्ति लोकगीत में नहीं होता हो। तुलसी, कुश, आम, महु, नीम, बाँस, काछु, पुरैनिक पात, तिलकोर का पात से लेकर भोजन विन्यास तक लोकगीत में मिलता है। गर्भ धारण से मृत्यु तक समस्त संस्कार लोकगीत में अपने पृथक राग-भास एवं विषय वस्तु के संग अनुस्यूत है। इसमें युग-युग का अनुभव सुरक्षित है, जो सम्प्रति पारम्परिक लोकज्ञान के स्त्रोतक रुप में मान्यता पा गई है।
श्रम, नेना, संस्कार एवं भाओ भगैत संदर्भित दो उदाहरण यहाँ लोकगीत सौन्दर्य को स्पष्ट करता है-
सासु कहि गेलखिन हे दिलवर, एक सेर मरुआ उलबिह हे।
हम दिलवर बिसरि गेलीयै, चारि सेर मरुआ उलेतियै हे।।
सासु कहलखिन हे दिलवर, एक गो रोटी पकबिह हे।
हम दिलवर बिसरि गेलीयै चारि गो रोटी पकबिह हे।।
सासु कहि गेलखिन हे दिलवर बुढ़वा के सेवा करीह हे।
हम दिलवर बिसरि गेलीयै, बुढ़वा के टांग तोडि़ देलीयै हे।।
लगनी
अटकन-मटकन-दहिया चटकन
केरा कूरा महागर जागर
पुरनिक पत्ता हिलै-डोलै
माघमास करैला फड़ै
तइ पर सबहिक ना की?
आमुन गोटी जामुन गोटी
तेतरी सोहाग गोटी
लएह पुत्ता डाभर
करए गए कामर
बाँस काटे ठांय-ठांय
नदी गुगुआए
कमल फूल दुनू अलगल जाए।
सिंगही लेबह की मुंगरी ?
नेना गीत
अबटन गीत-
कओन नाना मेथिया बेसाहल ? कओन नानी पीसत?
अपन नाना मेथिया बेसाहल, सूहब नानी पीसत।।
हरदीक बड़ा सजावट जनक जी, हरदी में बड़ा सजावट।
पहिल हरदी दादा चढ़ावे, पाछू सँ दादी सोहागिन जनकजी।
हरदी का बड़ा सजावट
भाओ-भगैत... गहबरगीत
पर्वत मोहार पर चनसुर है बुनलौं
सेहो चनसुर गिरिगबा चरि गेल।
बरजू-बरजू राजा जी अपनो मिरिगबा
सबरे चनसुर मिरिगवा चरि जेल
मिरगा के मारि हो राजा जी खलरी घिचेबै
गांगों छौड़ी के चौलिया देबै सिलाइ
चोलिया पहिरि गांगों भेल समतुलबा
चलि गेलै लवि ससुरारि
एक कोस गेलै गांगों पहर पयरा हे बितलै
जुमि गेलै लवी ससुरारि।
माड़ों गीत
उपर्युक्त उदाहरण मात्र प्रतीकात्मक रुपे दिया गया है। इस तरह अनेको लोकगीत मनुष्य के जेहन में है। उपर्युक्त गीतों में आधुनिकता का प्रभाव पड़ रहा है। इसका एक उदाहरण यहां समीचीन होगा-
नेना गीत-
अटकन मटकन हार्लिक्स चटकन
लेमनचूस महागर जागर
बिजलीक पंखा नाचय डोल
पाँच बरख पर जनमत फूलय
तइ पर सबहिक ना की?
पहनाक गोटी दिल्ली क गोटी
मिनिस्ट्रीक सोहागक गोटी
लएह पुत्ता डिप्सोमा
देखइ गए सिनेमा
प्रेस छापय धायँ-धायँ
रेडियो गुगुआय
मानवक सभ्यता
अलगल जाए
एटम लेबह की पौंड़की?
यह लोकगीत का लोचकता है एवं जो लोकगीत का प्रवाह होता हे, जिसे रोक नहीं सकते। यह प्रवाह स्वच्छंद, सहज एवं सतत बहने वाली होती है, जिसे रोका नहीं जा सकता। लोकगीत में उपयोगिता, रागात्मकता, सौन्दर्यप्रियता एवं सामाजिकता का महत्ंव अत्यंत है। सामाजिकता रागात्मकता से कैसे मंडित रहता है, इसका एक बानगी निम्नलिखित पंक्ति मे द्रष्टव्य है। 'सेन्टो गमकदारÓ एवं 'चाचीÓ का प्रयोग प्राचीन नहीं है। यह लोकगीत के लोचकता को प्रदर्शित करता है-
जनकपुर में धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।
चाचीक हाथ में तेल-फुलेल, भामीक हाथ कसार अछि।
मौसीक हाथ में अत्तर सुगन्धित, सेन्टो गमकदार अछि।
जनकपुर में धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।
स्पष्ट है, लोकगीत में परिवेश का असर होता है। दरअसल जब परिवेश बदलता है। लोगों की आवश्यकता एवं रुचि बदलता है। संबंध एवं सरोकार बदलता है। इससे सामाजिक जीवन में परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन का प्रभाव लोक के जीवन-यापन पर पड़ता है। उद्योगीकरण एवं शहरीकरण से श्रम का पलायन आरंभ हुआ। गाँव-घर, खेत-पथार, पोखर-भाखर, वन-पर्वत के स्थान पर लोग का गोठूलला में रहने की बाध्यता हो गई। वे भिन्न भाषा-भाषी एवं संस्कृति के लोगों के बीच जीने को विवश होते रहे। पहले देश के एक कोना से दूसरे कोना तक लोग जाते थे। अब विश्व के एक कोना से दूसरे कोना तक उड़ जाते हैं। जहां सब कुछ अंधकार रहता है। अपरिचित  रहता है। बाजारवाद अपना सुरसा मुंह बाकर सब कुछ गिड़ (घोंट जाना) अपना रंग पसारने हेतु द्रूत वेग से चारों ओर पसर रहा है। जाँत पीसना अथवा ढेंकी कूटना अनावश्यक हो गया है। तब लंगनी का कौन प्रयोजन रह जाएगा। पहिले से ही 'वर कनियांÓ हाय-हेलो करते रहते हैं, तब मुंहबज्जी अथवा कोहबर के गीतों का क्या होगा ? बाजार में रंग-बिरंग का क्रीम एवं लोशन उपलब्ध है, नानी 'मेथीÓ क्यों पीसेगी? गोदना अब गोदाया नहीं जाता है। खोदपारनी आयेगी कहां से जो अवसरोचित गीत द्वारा हास-परिहास होगी। टेटू के फाहा में लहरिया कहां से आएगी, जिसकी तुलना पति-वियोग के लहर से किया जा सकेगा। नवजात का अथवा नेना का स्वास्थ्य रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के औषधि एवं सुई आदि का निर्माण हुआ है, तब पांच अथवा उस अवसर पर गाने जाने वाला 'पचगीतÓ का कौन प्रयोजन रह जाएगा? पसरते यांत्रिक, सांस्कृतिक तथा संचार माध्यम के माध्यम से अहर्निश प्रहार से लोकगीत प्रभावित हो रहा है।
ऐसी स्थिति में एक मात्र समाधान सांस्कृतिक चेतना जागृति एवं सबलता है। इस अभियान में लोकगीत का संरक्षण प्रयोजनीय ही नहीं अपितु अनिवार्य भी है।
साभार रऊताही 2015

मालवा की खास लोकगीत शैलीहुण

मालवा भारत का हिरदा का माया बस्यो हे। उकी खास लोकगीत शैलीहुण के ओलखने-परखणे का पेलाँ हमारे एका आड़े-छोड़े का वातावरण के पेचाणनों घणो अच्छो रेगा।
मालवा का आड़े-छोड़े को वातावरण घणो अच्छो, धनी आने तरे-तरे को हे। भारत की धरऊ आड़ी से दखणऊ आने उगणु आड़ी से आथणु तक की आणे जाने की बातहुण को चौरायो मालवा की जुन्नी राजधानी उज्जण हे। इणी बात की मालम नरा जुग हुण का सिक्का पे उज्जण निसाण दिखणे से पड़ती अइरी हे। धन (+) जेसा बण्यो इणा निसाण चारीमेर से आणे वाली जात्राबाट का रुप में इणी जगा के बतई है। आज को मालवो आखा अथणऊ मध्यप्रदेश आने एका साँतेज उगणऊ राजेस्थान का डाक जिलाहुण तक फेल्यो हे। ईका बारा में दुहो सुणने में आयो हे।
इत चम्बल उत बेतवा मालव सीम सुजान।
दक्षिण दिसि हे नर्मदा, यह पुरी पहचान।।
एका बले यो केणो फाँकणो नी हे के  मालवा की संस्कृति को रंग धनकताण जसो हे ने साहित्य से भर्यो-पुर्यो भी हे। मालवो कलाहुण को घर हे। एमे लोकगायन-लोकनृत्य-लोकनाट्य-लोकचित्र-तेवार मेला-ठेला, की पेलाँ सेज परथा चली अईरी हे। जदे हम लोक शैलीहुण की बात कराँ तो हमारा मन में लोक सबद जाणनें की हरस आये हे। लोक सबद को अरथ हे चल्यो अरइ्यो या फेर जीवन को हिस्सो। 'भारती नजर मेंÓ 'लोकÓ महज अथणऊ आड़ी से आयो सबद 'फोकÓ को दूसरो नी हे। फोक का माय अथणऊ ज्ञानी ध्यानीहुण उणा लोगहुण की बोलने (गाने) की परथा ने राखे हे जिवाकी लिखी हुई परना हेज कोनी/ फेर भारत में लोकपरथा की बड़ी हुई सभ्यताहुण की जसी भूली जईरी, घणी जुन्नी या पुरानी भी नी हे। उतो जवीन को हिस्सो है। मालवा की लोक शैली लोकहुण के गाणे की नरी शैलीहुण पेलासेज चली आईरी हे। तीज-तेवार, पूजा-पाठ-अनुष्ठान-रितु-आने संस्कार से जुड्या लोकगीत गाणे की परम्परा या परथा सगलीज जगे मले हे। आदमीहुण आने बैराहुण दोई सेज जुड़ी   गाणे की शैली हुण जागे जाग पाय हे। आबे यां बस मालवा ठाम की गाणे की शैलीहुण की बात करनो घणो अच्छो रेगा
मालवी लोकगीत- मालवा में पुसंवन, जनम, मुंडन, जणेऊ, सगई-ब्याव का टेम पे पेलां से चल्या अइर्या लोकगीत गाणे का नेम हे। तीज-तेवार रितु, किरावर से, जुड्या, गीतहुण गाणे का रिवाज मालवा में हे। मालवी लोकगायन में एकतरे से बोली के रस के गेले-गेल वा को प्रकृति धरती आने संस्कृति की उन्नति अच्छी लागे हे। लाड़ा-लाड़ी के नव्हाण्ने का बाद ग्राम की बैराहुण जसी के काकी-भाभी, भुआ-मासी, हुण लाड़ा-लाड़ी का मुण्डा में पतासा दई के गीतहुण गाय है। एक एसोज गीत देखो-
म्हारा नाना सो लाड़ो कोल्या जीमे रे
ओकी काकी भाभी आड़े छेड़े ढुकी रई रे
एक पतासा का दोई चार बटका दोई चार बटका
लाड़ा सी काकी भाभी करे दूणा लटका। योज गीत लाड़ी बेले भी गाय है।
भरथरी गायन- मालवा का माय नाथपंथ से जुड्या लोगहुण चिंकारा (वाद्ययंत्र) की धून पे भरथरी कथा गाता रेहे। चिंकारो नायल की नट्टी, बस आने घोड़ा की पूंछ का बाल से बण्यो जुन्ना आने पेलासेज चल्यो अइर्यो बजाणे को समान है। चिंकारो घोड़ा की पूंछ का बाल से बण्या धनुष से बजे हे जेमे से रुँ-रुँ को मीठो-मीठो राग हिटे हे। राजा भरथरी राणी पिंगला से घणो हेत राखता था पिंगला के मरीजाणे का बाद में राजा भरथरी एकेज रट्टो लगाता र्या। यो गीत म्हने गॉम में एक जोगी बाबा से बालपणा में सुण्यों यो
हाय पिंगला हाय पिंगला
इणी बात पे स्माईल जोगी केणे लम्यो-
हाय! पिंगल!  हाय पिंगला! कई करेरे
पिंगला बणइदू नो लाख
म्हरी डिबिया सर की डिबिया नी मले जी।
फेर राजा भरथरी केणे लग्या- हाय! डिबीया, हाय! डिबिया कंई करे र डिबीया बणई दू नो लाख म्हारी पिगलां सरकी पिगलां नी मले जी।
स्माईल जोगी ने तो नो लाख पिंगला बणईदी या पण राजा भरथरी से एक डब्बी भी नी बणी
निरगुणिया भजनगायन - मालवा में निर्गुणी भजन गाणे की परथा भोत जुन्नी हे। इणा भजणहुण माय परमात्मा की आस्था की छाप रे हे जेमे काया का नास ने आत्मा के अमर होने की बात करी हे। निरगुणिया भजणहुण में इकतार या फेर तंबुरा ने मजीराहुण की धुन का गेल-गेल मालवा की लोकधुन ने मालवी बोली की मीठास दिखे हे। आज भी मालवा में नरी निरगुणिया भजनमंडली हे उणमें से श्री पेलादसिंग ठीपाण्या की मण्डली सबसे अच्छी बतई हे। इन्ने निरगुणिया भजन गाणे में खाली देस मेज नी परदेश में भी अपणी अलग पेचाण बणई। एक निरगुणिया भजन का चरण देखो-
थारा भर्या समंद माय हीरा मरजीवाल लावीया
थारा घटमाय ज्ञान का जंजीरा मालिक सुलझावीया
यो मन लोभी लालची रे यो मन कालूकीट कुबुद्धि की जाला चलावे
यो मन लोभी लालची रे यो मन कालूकीट भरम की जाल चलावे रे हाँ
संजागीत- दख्यो जाय तो संजागीत खास रुप से मालवा की मोट्यार छोरीहुण को पेला स चली अईरी गाणे की शैली हे इ गीतहुण में बजाणे की कोई समान नी रे। सीलेसराद में छोरीहुण संजा को तेवार मनाय हे। गोबर ने फूल-पत्ति हुण से संजा की तरे-तरे की मन में भाव जसी चित्रावण बणय हे, सांजे उनकी पूजा ने आरती करे ने संजा का गीत भी गाती जाया। रोज तरे-तरे की संजा बणाय ने अम्मास का दन की राते राज बणई हुई संजा बणाय हे ने उणा दन छोरीहुण गोयण संजा के मोज मनाती हुई गीत गई के बिदा कर हे। संजा एक गीत तेवार के एक संजा गीत दिखी र्यो हे-
एतल बेतला को तोर्यो बेतल की तलवार
प्रदीप बीरो भाग लगावे सोना बेन्या छींछे रे।
हीड़ गायन- मालवा में हीड़ गाणे की नेम खाली सावण मइनामेज हे। अँयड़ी बाग-बगीचा हुण में झूला पडय़ा हे गाम हुण में हीड़ गाणे सी होड़ पड़ी हे। हीड़ की खास रुप में तो अहीर हुण से जुड्यो गीत हे जेमे खेती संस्कृति के भीतर की परता हुण को भोत नाना सो बखान मिले हे। ग्यारस माता की कथा चालर माता की छोला बैला की कथा हुण के गणे को भी योज ओसर हे। हीड़ ने बड़ा आलाप भी ले हे। इणा तेवार पे पड़वा का दन भेंस का मर्या होया पड़ा-पाड़ी (बछड़ा) हुण की छाल सुखई के ओड़को (छोड़ो) बाणइ के ओसे गायहुण के छोड़ो खलाय भड़काय गाय जदे छोड़ा में माया से मारे उणी बखत गाँम का लोग-लुगाया छोरा-छोरीहुण के घणा मजा आया। चालर की हिड़ को एक उधारण तो देखा-
'हे हीड़ बरस दना में नापो आयो पामणो जी।
भाई रे जेकी कई हे रे मखार हे हे होय।।Ó
पर्व तेवार से जुड्या गीतहुण- होली पे फागण दिवाली पे जनमअठमी पे कृष्णलीला गीत नोमीनोड़ता में देवी गीत की परम्परा आखा मालवा में हे। भाभी-देवर में मजाक को एक गीत (फाग) -हाँरे देवर म्हारा
रे यो केशरिया रुमाल वालो रे देवर म्हारो रे
भम्मर्यो घड़य्दे देवर घर में थारो तारो रे।
बरसाती बारता : मालवा में बरसात में बारता गई-गई ने के हे इकाबेल इको नाम बरसाती बारता पडि़ग्यो। मालवा का गाँमहुण में घर में बैठी के बारता रात-रात भरलोग हुणे हे। इणी बारता की शैली चम्पूकाव्य जसी हे इने मालवी गद्य आने पद्य दोई की बड़ा ऊँचो स्थान है। बारहमासा गीत भी बरसात मेज गायो जाय है।
सार : सार बात तो या हे के मालवो साहित्य का हिसाब से घणोज घनी हे। यॉ का लोगहुण सो-सो साल से कथा बार्ता गाथा, गीत नाटक पारसी केवात असा नरा ठंग बात विचार आने समझता बुझाता अईर्या हे।  जिनगी को असो कई को भी टेम नी हे के जदे मालवा का लोग लुगाया हुण हॉसी खुशी सुख दुख के बताणे बले लोकसाहित्य का सामरो नपी ले हे। इणा सगलाज ढंग हुण में लोकगीत लोकगायन शैली हुण को अपनी एक बगतेज घणी हव जागा है।
एक खास बात- इणा लिख्या हाया बिचार में यो बात खास हे के म्हने जो गरंथ हुण के बाची ने एक सरमाण द्या के वी सब हिन्दी में था पण म्हने मालवी में करल्या हे म्हार माफ करजो! जे मालवी जीवे मालवी।
साभार रऊताही 2015

मालवा विवाह गीतों में प्रकृति वर्णन

प्रकृति अने पर्यावरण का बिना संस्कृति अने संस्कार की बात करनो असो लागे जाणे झाड़-झडूकल्या हुण के भूली ने फूल-फल अने पत्ता होण की बात करणो।लोक परम्परा, संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा बोली अने लोक-जीवन के समझवा सार वां की प्रकृति अने मोसम का मिजाज के समझणों जरुरी हे। इनी बात के जमाना भर में ठावी, अणी केवात से बी समझी सकां, 'जसो देस वसो भेसÓ जणी देस की जसी प्रकृति के हे वां की वसीज परम्परा, लोकभाषा, बोली, रेण-सेण, अने वेवार देखवा में आय हे। लोक में बिखरी थकी परम्परा हुण प्रकृति से अछूती नी रई सके, अने वा प्रकृति कणी ने कणी भायना ती हमारे पारम्परिक गीत में नगे आय हे। प्रकृति का माय रई ने ज् हम अपणी परम्परा हुण, संस्कार अने रीति-रिवाज हुण के निभावां हां। या यूँ कई सकां के हम अपणी परम्परा के निभावा सारु जो बी चीज (वस्तु) लेणो चावां वा वांकी प्रकृति हमारे दई सके। प्रकृति से लई न जद्-जद् बी हम परम्परा के निभावां हां तो वणी परम्परा से जुडया गीत में प्रकृति के आणो ते हे। उदाहरण का लेण-ब्वाय मे या कणी सुब काम में हमारे कोय चीज चई पड़े तो वी हे-केल का पत्ता, अम्बा की डाली, आम्बा की लकड़ी अने पत्ता, नारेल, अम्मरबेल, खेजड़ी, खांखरा की लाकड़ी, फूल-फल, पाणी, मिट्टी अने मंडप सजावा सारु बाँस आदि अणी चीज होण सारु हमारे प्रकृति में जाणो पड़े, प्रकृति के मनाणो पड़े अने प्रकृति मनावा मारु गीत गाणो पड़े।
लोक परम्परा में अने लोक जीवन में असा हजारों हजार गीत हे, जो नदी, तलाब, पनघट, समदर, झाड़-झडूकल्या, जिन-जिनावर, अने पहाड़ होण की वंदना, अर्चना में युगा-युगा ती मंत्र की तरे मनख्या गाता चल्या अईर्या हे।
मालवा में गाया जाणे वाला ब्वाय गीत हुण में प्रकृति को बखाण ब्वाय संस्कार की नी-नी करता सगली, रीत में नगे आय हे, चाये वे बधावा हो, परबात्या हो कामण हो, सातंगवरत, हल्दी-मेंदी, उकल्डी, मायमाता ती लगई ने गाल गीत तक भारतीय परम्परा अने संस्कृति में कोन सी बी सुभ काम होय विकी सरुआत गणपति पूजन से ज् होय हे। गणपति खुद माँ परवती अने शंकर भगवान का छोरा हे या यूं कई संका के खुद प्रकृति अने पुरुष/आकाश का छोरा हे। बईरा सब ती पेला ब्वाय में गणपति जी के आपणा गीत का भायने  पाती भेजे अने अरज करे-
तम तो वेगा वेगा आओ हो गणेश/तम बिन घड़ी नी सरे
तमने सूरज, मनावे, तमने चन्दरमा मनावे
तमने रामचन्दर मनावे हो गणेश....
मालवा में एक केवात हे 'चार कोस पे पाणी बदले बारा कोस पे वाणी।Ó पाणी को मायनो होय-प्रकृति अने वाणी याने बायरो (हवा) ई दोई नी होय तो अणी धरती पे जीवन बी नी वई सके। वाणी अने पाणी पेज् भौगोलिक, आर्थिक, राजनेतिक, सामाजिक, अने पारिवारिक बणवट, रेण-सेण, रीति-रिवाज, आचार-विचार अने खान-पान, तक को खाको ते होय तो फेर मनक अपणा गीत हुण में प्रकृति के कसे भूली सके? ब्याव संस्कार का माय कई तरे का छोटा-मोटा रिवाज निभाणा पड़े जो अपणी-अपणी जात-बिरादरी में थोड़ा भोत अलग वई सके पण खास-खास रीत के सब में एक जसीज रेवेकणी समाज में कोय सी बी परम्परा असी नी हे, जो बिना गीत के पुरी वई सके। जिस्तन बिना मत्रं के कोय बी वैदिक परम्परा पुरी नी वई सके, विस्तन बिना गीत के कोई बी लोकिक परम्परा पुरी नी वई सके। स्वराघात अणे सप्रंसारण से भर्या-पूर्या अणी गीत हुण में वेदिक संहितापाठ जसी एकरुपता देखवा में आय हे।
अणी परम्परागत श्रुतिगीत हुण में जो कि लोकमन की भावना से जनम लई अने शिव रुप आकाश में सतत् प्रवाहमान वई ने नद्दी की तरे बईर्या याने (अर्थात्) गाया जईर्या हे, वी प्रकृति का बखान के अछूता किस तन रई सके? ब्याव गीत की सुरुआत में गणपति गावा का बाद सबती पेली रीत हे, खानागार-खरमाटी, लावा की अणे कुम्हार का चाक के बदावा की। अपणी मिट्टी से लगाव, जुड़ाव, अणे सृष्टि का प्रतीक रुप में चाक को पूजणो एक तरे ती सम्पूर्ण सृष्टि को पूजन मान्यो जाय हे। चाक बदाती बखत बईरा हुण जो गीत गावे विन में प्रकृति का जो खास रुपक हे उनके लेवा की कोसिस करी हे।-
भवंरा, पेलो बदावो म्हारे आवीयो
भवंरा मोकल्यो म्हारो ससुराजी री पोल
वाड़ी रा भवंरा दाख मीठी ने रस सेवर्यो।
ब्याव को पेलोज बदावो प्रकृति में बसंत ऋतु की अगवानी को संदशो देतो प्रतीत होय हे। छ: ऋतु में खास अने जिके सगली ऋतु होण को राजो मान्यो जाय वणी  ऋतु से ज् ब्याव गीत हुण की सुरुआत अने लगनसरा हुण की सुरुआत, अणी संस्कार को प्रकृति से कितरो जुड़ाव हे, यो बतलाय हे। बसंत ऋतु की अगवानी को प्रतीक भवंरा अने फूल ती अणी बदावा की सरुआत ब्याव संस्कार का भायने मनख जिन्दगी की गृहस्थ जीवन में जावा की (प्रवेश) सुचना देणो हे। अणी सुन्दर बाड़ी (बगीचा) रुपी गृहस्थ आश्रम में बसंतरुप रुपी ब्याव संस्कार का भायने छोरा-छोरी, कली-भंवरा का रुप में लाड़ा-लाड़ी बणी ने अपणो पेलो पांव आगे धरे तो अणी ती अच्छो गीत कंई वई सके 'दाख मीठी अने रस सेवर्योÓ प्रेम का अणी मीठा सा बंधन का गठजोड़ में बंधी प्रेम रुपी दाख को मीठो रस चारी मोर बिखेर्यो जाय हे। अतरो चोखो प्रकृति परक भाव, मधुर लोकधुन अणे अतरी सरल भाषा शैली के बस... गाया जावा अणे सुण्या जाव, देख्यो जाय तो ब्याव की सगली रीति, परम्परागत प्रकृति ती जुड़ी थकी हे। ब्याव में अपणा कुल का देवी-देवता को बी पूजन होय, कलश स्थापना होय, जवारा थेपाय अणे गीत गाया जाय वणी की एक बानगी-
रमा-झमा हो करती वरद आई, आय आँगणे पग दियो
सुता के जागो राज सूरज जी, तम घर वरद उतावली
सुता के जागो राज चंदरमाजी तम घर वरद उतावली।।
अणी तरे ती बईरा हुण अधिकतर गीत हुण में सूरज अणे चंदरमा के मनाय हे, बिना चंदरमा अणे सूरज के प्रकृति का बारा मे सोचणो बी बेकार हे। गीत हुण का भायने प्रकृति में रच्या-बस्या मनख हुण अपणी भावना के अणी वरत-तेवार अने परम्परा हुण में पुरी आस्था, अणे श्रद्धा की सांते उकेरवा की कोसिस करे हे। ब्याव जसा आयोजन में तो घणों ती घणों बखान प्रकृति को वयो हे। भारतीय संस्कृति में ब्याव संस्कार की सरुवातज् बसंत ऋतु से होय जो प्रकृति में बदलाव की बखत (समय) हे। या ऋतु ब्याव संस्कार में परणवा वाला लाड़ा-लाड़ी बण्या जुवान छोरा-छोरी हुण के यो संदेश देवे हे के अबे अणी मनख जिन्दगी में नरा-नरा बदलाव आणा हे जो अणी जिन्दगी की दशा अणे दिशा ते करेगा।
यो बदलाव अणे यो संस्कार खाली लोक जीवन मेज निभायो जाय असो नी हे बल्कि बसंत ऋतु में प्रकृति बी इनी बदलाव अणे संस्कार में पुरी तरे ती लीन रे हे असो लागे। म्हने अपणी मालवी लोकभाषा में लिखी थकी खण्डकाव्य कृति 'आँबा को ब्याव में अणी बात के पुरी तरे ती मेहसुस करी हे। बसंत पंचमी तो लोक जीवन में लाड़ा के मोड़ बंधे, लाड़ी के मेंदी लगे अणे सगला घराती अणे बराती सजी धजी ने तैयार हुई जाय। असोज प्रकृति में आबां (आम) का झाड़ में मोड़ बंधी जाय (फुल आना)Ó आमली (इमली) का झाड़ में लग्या फल में मेंदी को रंग उतरवा लागी जाये अने सगला झाड़-झड़ूकल्या, फूल-फल ती सजी-धजी ने महकवा लगी जाये। म्हने अपनी पोथी 'आँबा को ब्यावÓ में आम्बा के लाड़ो अणे आमली के लाड़ी बणई ने मालवा का सवा सो झाड़-झंकार के घराती अणे बराती बणई के अणी में प्रस्तुत कर्या हे। म्हारो केवा को मतलब यो हे के हमारा कोई बी रीति-रिवाज प्रकृति से अछूता नी हे। लोक परम्परा में ब्याव की जितरी खूबी अणे रीति-रिवाज वई सके वी सगली रीति म्हने प्रकृति में ढूंढवा की कोसिस करी हे। खेर यो एक अलग विषय हे, फेर भी म्हारा हिसाब ती अणे ब्याव संस्कार को जीतरो गेरो संबंध प्रकृति ती हे, अतरो कणी ओर संस्कार अणे रीत को नी वई सके।
लगन, बदावा, गणेश, खानागार-खरमाटी लावा अणे चाक बदावा की सांते-सांते ब्याव में जो पेली रीत हे, वा हे उकल्ड़ी। उकल्ड़ी पूजवा को मतलब प्रकृति अणे पर्यावरण के बचावा को संकल्प लेणो होय हे। अपणा घर की रोज साफ-सफाई करी ने गांव ती बायर उन कचरा के इकट्ठो कर्यो जाय हे, उन कचरा का ढेर के उकल्डो केवे हे। मनख जिनगी में अणी छोटी-छोटी बात हुण को ध्यान रखणा अणे अपणा से छोटा  मनख के बी वितरोज सम्मान देणो यो अणी रीत को खास संदेश हे। प्रकृति अणे पर्यावरण का प्रति समर्पित अणी रीति को गीत बी सबके जगावा  को काम करे हे। बईरा हुण अपणी शैली में सबको नाम लई-लई ने केवे के फलां-फलां जागी ग्या हे, तम बी जागो-ई तो इन्द्रासन से सूरज जी जागीया/ई तो तारा हुण में चन्दरमा जी जागीया। ई तो जाग्या-जाग्या चारु ई देव/ के कजली बन (वन) रो कुंकडो (मुर्गा)
लोक जीवन अणे प्रकृति से जुडय़ा हजारों गीत अणी संस्कृति से जुडय़ा हे। जरोत हे तो इनके समेटवा की। हल्दी, मेंदी, आम्बो, अमरबेल, अशोक, चम्पा, चमेली, गुलाब, गेंदा, बांस, खेजड़ी, खाखरा, कपास, पान, सुपारी, केल, अने, खजुर, जसा नरा-नरा झाड़ हुण को अणी ब्याव संस्कार में वपराव होणो कंई ने कंई हमारे प्रकृति से जोड़े हे। इन सबका न्यारा-न्यारा सैकड़ों गीत हे। नरी-नरी रीत तो खाली प्रकृति से ज् जुड़ी हे। ब्याव में सवेरा-सवेरी उठी के घट्टी-फेरती लुगायां द्वारा गाया जाये उणके परबात्या केवे। परबात्या में सबेरा-सबेरी की जो लोक लुभावणी झांकी अपणा गीत में बईरा हुण प्रस्तुत करे वी की कंई केणी। तम बी सुणो-
म्हारा बालाजी वायण जागो, परभात्यो तारो उगीयो।
तारो उगो माताबई री कूंख, जणे सूरज जी सरका जनमिया
तारो उगो माताबाई री कूंख, जणे चंद्ररमा जी सरका जनमिया
अणी तरे दूसरा परबत्या की बानगी रखणो चऊँ-
अणी लिम्बड़ली रा लांबा-लांबा पान
छलंग्या पे सूरज उगीयो!
अणी तरे घणा-घणा गीत हुंण में प्रकृति को घेणो चोखो अने जस को तस बखाण अणी ब्याव गीत हूण में कर्यो हे। चंवरी फेरा, सातंग-वरत, बान-मामेरा, सिचावणी, परबात्या, बधावा, कामण अने गाल गीत में प्रकृति को बखाण हुओ हे ओर तो ओर बनड़ा-बनड़ी का ज्यादा तर गीत हुण में 'हरियाली बनड़ीÓ अणे 'हरियाला बनड़ाÓ सबद को आणो हमारे कंई ने कंई प्रकृति ती जोड़े हे। लोकगीत हुण हमारो इतिहास हे, वर्तमान हे अणे भविष्य बी हे। एक असी पगडंडी हे जिके बणावा वालो कोय एक मनख नी हे, बल्कि आखी की आंखी संस्कृति अणे आखो समाज हे जो युगां-युगां ती उणी गीत परम्परा के वेद पुराण की तेरे संजोतो चल्यो अईर्यो हे। प्रकृति अणे लोक में रच्या-बस्या अणी गीत हुण में हमारी परंपरा हमारी प्रकृति अणे हमारी सभ्यताज् नी हे बल्कि हमारी श्रद्धा अणे आस्था मूल भावना भी अणे में ज् समई थकी हे।
साभार रऊताही 2015

विवाह संस्कार और बन्ना-बन्नी के गीत

मानव की मूल प्रवृत्ति ही उत्सवधर्र्मी है. पाषाणयुग से बात शुरु करें, वह अपने समूह में आखेट के लिए निकलता था और किसी पशु को अपना शिकार बनाने के बाद उसके इर्द-गिर्द झूम-झम कर नाचता-गाता-खुशी मनाता था. $फुर्सद के समय में वह कन्दराओं में इसके चित्र भी उकेरता था. क्रमश: वह सभ्य होता गया. उसकी उत्सवधर्मिता परवान चढऩे लगी. उसने जाना कि छह ऋतुएं होती है। उसमें शरद ऋतु के आगमन के ठीक पहले वर्षा का अवसान हो रहा है. वर्षा ऋतु में जैसे ही पहली बौझार पडती है,पृथ्वी के अंग-अंग में नवजीवन लहलहा उठता है. धरती पर सब तरफ  हरियाली का गलीचा बिछ जाता है. मोर के पावों में थिरकन आ जाती है. पपिहा पी..आ...पी..आ गाने लग जाता है. नदियां तरुणाई से भर उठती हंै.. बरसते पानी की रसधार में भींगते हुए उसने हल चलाते हुए गीत गाए. खेतों में लहलाती $फसलें और अपने श्रमसा$फ्ल्य को अनाज के रुप में $फलता-$फूलता देख वह प्रसन्नता से भर उठता है और कटाई के बाद पूरा परिवार ढोलक की थाप पर थिरक उठता है. इस तरह उसने अपने आप को ईश्वर की लीलाओं से  पर्वों-त्योहारों को जोडते हुए अपनी उत्सवधर्मिता को नए-नए आयाम दिए. दस कोस पर पानी और बीस कोस पर वाणी के बावजूद भारतीय समाज ने सांस्कृतिकता को विशिष्ट स्थान दिलाया. लोक-अंचल में ही संस्कृति की असली विरासत सुरक्षित है. यद्दपि अधुनिकता ने का$फी हद तक सांस्कृतिकता को प्रभावित किया है, इसके बाद भी हमारे लोक क्षेत्रों से जुड़े लोग, ग्रामीण समुदाय संस्कृति के सजक-प्रहरी के रुप में  नजर आते हैं. संस्कृति का यह कार्य लोक-अंचल में आसानी से ²ष्टिगत होता है. चाहे वह छत्तीसगढ़ हो, असम हो, या फिर, त्रिपुरा, कुंमायू ,पूर्वांचल, बुंदेलखंड आदि कोई भी हो, कोई भी राज्य हो, सभी जगहों पर सांस्कृतिक विशिष्टता को संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. बुंदेलखण्ड क्षेत्र हमेशा से ही लोक के प्रति सचेत रहा है.शौर्य गाथाओं, लोक-गाथाओं या $िफर लोक-देवताओं के सहारे उसने अपनी संस्कृति को जीवित रखा है. पर्वों-त्योहारों, उत्सवों के साथ-साथ वैवाहिक कार्यक्रमों का उत्साह भी यहां देखने को मिलता है. यह एक ऐसा संस्कार है जहाँ अनेक प्रकार के रस्मों के साथ सम्पन्न किया जाता है. लडका-लडकी की बात पक्की हो जाने के बाद लगुन लिखाई, तिलक, मगरमाटी, मंडपाच्छादन, देवपूजन, तेलपूजन, चीकट ,बारात निकासी, द्वारचार, पांव पखराई, कुंवर कलेवा, भांवर, कन्यादान, बिदाई,, मुँह दिखाई,,आदि-आदि. अनेकानेक रस्मों के यह संस्कार पूरा होता है.
इन रस्मों को संपन्न करते समय घर की महिलाएं बन्ना-बन्नी के गीत गाती हैं. इनकी स्वर-लहरी सुनकर सभी लोग आनन्दित हो उठते हैं. हम यहाँ पर कुछ रस्मों पर गाए जाने वाले गीतों पर चर्चा करते चलें. यथा-
 लगुन लिखाई जा चुकी है. मगरमाटी भी लाई जा चुकी है और लडकी जिसे अब बन्नी के रुप में जाना जाता है, हल्दी चढाई जा रही है. इस अवसर पर घर तथा पास-पडौस की महिलाएँ सामुहिक रुप से बन्नी को आधार बनाकर गीत गाती हैं.जिसके बोल सीधे हृदय को पिघला देने वाले होते हैं. यथा-
बाबुल उडन चिरैया, तुमने काहे पोसे
वो तो उड चली देस-बिदेस
अम्मा की कोयल उड चली
 (२) दिहरी बिरानी बाबुल बिटिया बिरानी
बिटिया की इक जनमी पाती रे
मोरे बाबुल बिटिया बिरानी
वधु के यहाँ लगुन-लिखाई होती है,जिसका विधिवत पूजन किया जाता है. पूजा के बाद लगुन के साथ नेग के रुप में कुछ रुपये भी रखे जाते हैं. $िफर घर के कुछ सदस्य जिसमें वधू का भाई, मुहल्ले-पडौस के कुछ युवा तुर्कों के साथ लगुन वर के घर पहुंचाई जाती है. लगुन के वहां पहुंच जाने के बाद उसको किसी पंडित से पूजा करवाने के बाद पढ़ा जाता है. इसके करने के पीछे उद्देश्य यह होता है कि वर-पक्ष को इस बात की जानकारी से अवगत करवाना होता है कि फला दिन आपको बारात लेकर आना होगा. लगुन के आने पर स्त्रियां इस गीत को गाती हैं
लगुन आने पर
रघुननदन फूले ना समाये, लगुन आई अरे...अरे
लगुन आई मोरे अंगना
रंग बरसत है, रस बरसत है
मोरे बन्ना की लगुन चढत है
कानों में कुण्डल पहनो राजा बनड़े?
गले मुतियन की माल बिरसत है
मोरे बन्ना की लगुन चढ़त है
आज मोरे रामजू की लगुन चढत है.
वर पक्ष के यहाँ भी वे सारी रस्में संपन्न होती है, जो वधु के यहाँ की जा रही होती है. इधर वर पक्ष में बन्ना को मण्ढे के नीचे खांब के पास बिठाया जाता है और फिर तेल चढ़ावे की रस्म शुरु की जाती है. महिलाएं सामुहिक रुप से गाती हैं. यथा-
तेल मायना
आज मोरे बन्ना(बन्नी) को तेल चढत है
तो तेल चढ़त है फुले चढ़त है
चढ गओ तेल $फूल की पाँखुरिया
जीजी चढ़ावे तेल ,बन्ना की बाहुलिया
भौजी चढ़ावे $फूल की पाँखुरिया
तेलन लाई तेल, मालन लाई पाँखुरिया
(२)   
चढ गओ तेल फुले चंपो तेरी दोई कलिया कौन बाई तेल चढ़ावे, कौन राय की बेन्दुलिया (बहन का नाम)बाई तेल चढ़ाये (भाई का नाम) राय की बेन्दुलिया
विवाह के अवसर पर गौरी-गणेश के आव्हान पूजन के पश्चात पितरों को एवं प्रकृति प्रदत्त भौतिक वस्तुओं का भी आव्हान किया जाता है. इस अवसर पर बन्ना या बन्नी की माता एवं चाची चक्की पर गेहूँ पीसती जाती है एवं एक-एक पितरों का नाम लेती जाती है. साथ ही बन्ना या बन्नी नाम के साथ ही चक्की पर चांवल के दाने निमंत्रण स्वरुप $फेंकते जाते हैं. इस अवसर पर कुटुंब के सभी सदस्य उपस्थित रहते हैं. इस अवसर पर गाए जाने वाला गीत-यथा
काज करो कजमन करो, आज को नेवतो पाइयो
(पितर का नाम) बाबा नेवतियो
आज को नेवतो पाइयो ( एक-एक व्यक्ति के नाम का उच्चारण करते हुए इसे दोहराया जाता है)
(पितरों को नेवतने के बाद आग-पानी, बदरा-पानी, लठ्ठा-भोंगा, हवा-आँधी सबको नेवतने के बाद बन्ना के हाथों से गोबर के द्वारा चक्की का मुँह बंद कर दिया जाता है ताकि मंगल कार्य में कोई विघ्न न आने पावे.
इसके बाद बारात निकासी होती है. सभी आमंत्रित सदस्यों-रिश्तेदारों तथा परिवार और कुटुंब के सन्मानित सदस्यों को साथ लेकर बारात घर से निकलती है. इस बीच कई प्रकार की रस्में होती है.
 माँ अपने बेटा की नजर उतारती है. नारियल की गिरि तथा गुड़ से मुँह मीठा कराती है. अपना दूध पिलाकर बेटे से वचन लेना नहीं भूलती कि शादी के बाद उसकी अच्छे से देखरेख करेगा. इस अवसर पर महिलाएं गीत गाती हैं.यथा-
(दुल्हा की निकासी पर गाए जाने वाला गीत)
मझोल- मझोल चलो जइयो रे हजारी दुल्हा
तुने को के भरोसे घर छोड़े रे हजारी दुल्हा
मैंने मइया के भरोसे घर छोड़ों रे हजारी बन्ना
तेरी मैया को नइया पतियारों रे हजारी दुल्हा
तू तो ताला लगाये कुँजी ले जैयो रे हजारी दुल्हा
(२)
बन्ना के आँगन गेंदा फूल, कुसुम रंग फीका पड़ गओ रे
बन्ना पापा(दादा-चाचा-मामा-फूफा भैया,जीजा)
सजे बरात, सजन घर खलबल मच गई रे
सजन घर खलबल मच गई रे
बन्ना के आगे तबल निशान, पतुरिया छम-छम नाचे रे
पतुरिया छम-छम नाचे रे
रुपइया खन-खन बाजे रे
(३)
ऐसो सजीलो मेरो बन्ना रे, शोभा सजी सीस चांदनी बनके
कोई तो नजर उतारो, ऐसो सजीलो मेरो बन्ना रे
सीस बन्ना के सेहरा, सोहे कलगी पे जाऊँ बलिहारी रे
दिल मे कब से था अरमान, बन्ना मेरा दूल्हा बने
चन्दन के मण्डवा रुच रुच के लाओ रे.....बन्ना मेरा
वधु के यहाँ बारात पहुँच चुकी है. बारात की अगवानी की जाती है. सजन-समधियों की भेंट होती है.इस अवसर भी गीत गाए जाते हैं.
ठाड़े-ठाड़े जनक जी के द्वार हो
रामचन्द्र दुल्हा बने
मंगल साज सजे अंगना में
कम्मर में सोहे कटार हो...रामचन्द्र.....
मुतियन चौक सुनयना पूरे
मन में हरष अपार हो.......रामचन्द्र......
बंदी बिरुदावली उच्चारे
हो रही जय जयकार.......  रामचन्द्र.....
चन्दन पीढा विराजो राजा बनड़े
पहरो नौ लख हार हो...रामचन्द्र.....
महिलाएँ गारी गाती हैं इस अवसार पर
आए मोरे सजना,सुहानो लागे अंगना
सजना के लाने मैंने पुडिया पकाई
आवे री खावे सजना(समधी)
पीछे री खावे बलमा...आए मोरे सजना...
पाँव पखराई के समय का गीत
बिच गंगा बिच जमना,तीरथ बड़े हैं प्रयाग
बिच बिच बैठे बाबुल उनके, लेत कुमारन दान
दैयो रुप-रुपैया, छिनरिया को खनकत जाये
दैयो उजरी सी गैया, छिनरिया को खोवा खाये
चढाव चढाई के अवसर पर गीत
सिया सुकुमारी को चढ रौव चढाव, हरे मंडप के नीचे
बेटी मैके की बेंदी उतार धरो
ससुरे की बेंदी को कर लेव सिंगार, हरे मंडप के नीचे
सिया सुकुमारी को चढ रओ चढाव, हरे मंडप के नीचेह्व
चढाव के बाद भावरें पडती है. इसके बाद जेवनार होता है. जेवनार के अवसर पर गाए जाने वाला गारी गीत. इसमे समधी-समधन को ताना मारा जाता है.
बन में बघनी बियानी, सुनो भौंरा रे
ओको दूध दुहा लई, सुनो भौंरा रे
समधी नेवत बुला लई,सुनो भौंरा रे
ओकी खीर बना लई,सुनो भौंरा रे
उनने आतर चाटे,पातर चाटे,ले ले दोना नाचे
जेवनार के बाद दुल्हा दुल्हन को लेहकोर के लिए लेकर जाते हैं. इस अवसर पर महिलाएं समधी को ताना मारते हुए गाती हैं क्योंकि समधी की ओर से पान-बताशे बंटवाने का रिवाज है.
पानो की बिडिया कलेजे में लग गई
कलेजे में लग गई, मेरे हियरे में लग गई
डलिया में तेरी समधन पान भी नइया
तो समधी को जियरा ठिकाने में नइया
बिदाई के अवसर पर गाए जाने वाला गीत
इस समय बिटिया को आशीष दिया जाता है
जाओ ललि तुम फलियो फुलियो
 सदा सुहागन रैयो मोरे लाल
 सास ससुर की सेवा करिओ
 पति आज्ञा में रहियो.
( बिदाई के बाद बेटी का अपने ससुराल आना, वहाँ पर भी अनेकानेक रस्में करवाई जाती है. )
लोकगीतों की महत्ता लोक जीवन में हमेशा बनी रही है. विवाह संस्कार में गाए जाने वाले गीतों में संदेश सम्प्रेषित होते हैं. लोकगीतों द्वारा विवाह संस्कार की गरीमा बढ जाती है. लोकगीतों के मध्यम से हमारी लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा, विरासत पल्लवित,पोषित और संरक्षित होती रहेगी. ऐसा विश्वास है.
नोट;- विवाह संस्कार में अनेक स्थानों पर छोटे-छोटे रस्मों को निभाए जाने का वर्णन मिलता है. उसे विस्तारित न करते हुए कम से कम शब्दों में पूरा किया गया है.ताकि आलेख बोझिल न होने पाए. साभार रऊताही 2015

छत्तीसगढ़ मा गीत परम्परा

गीत के जनम कोनो अज्ञात कवि के  मुंह ले लोक जीवन मा होय हे। इही कारण ए कि लोक गीत लोकजीवन के श्रृंगार नोहे बल्कि वोकर आत्मा आय।  ए लोक गीत हमर खेतिहर समाज के जीवन पद्धति अऊ संस्कृति के दरपन आय। बरसो ले प्रचलित लोकगीत वाचिक परम्परा के अइसे बहाव आय जमा वोकर अन्तर्मन के व्यथा कथा छलकथे।
लोकगीत अपन संस्कृति के मुंह बोलत चित्र आय। लोक के भाऊक अउ निरमल मन जनम ले मरन तक लोक गीत मन के सहारा खोजथे। जनम के मरन तक ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ मा तो नारी मन के महतारी बने के साध पूरी होय के खुसी मा अम्मल मा सात महीना के रथे तभे सधौरी गीत गाए के परम्परा  हे- महल मा खड़े बालम, अपन रानी ला मधु पीपर पीये बर मनावत हे-
महला मा ठाढि़ बलम जी, अपन रनिया मनावत हो
रानी पीलो मधुर पीपर, होरिल बर दूध आहै हो-
रानी कथे-
करु कसैल पीपर ला कइसे पीयवं ? मोर दांत तो कपूर कस उज्जवल हे-
कइसे के पियऊँ करुरायर, अउ झर कायर हो
कपूर बरन मोर दाँत पीपर कइसे पियब हो-
बालम कथे-
मधुर पीपर नी पीबे ते मैं दूसर बिहाव
कर लुहूं। पीपर के झार पहर भर रथे, अउ मधु के झार हा दुपहर फेर सउत के झार हर जनम भर रही
मधुर पीपर नइ पीबे
त कर लेहूं दूसर बिहाव
पीपर के झार पहर  भर
मधु के दुई पहर हो
सउती के झार जनम भर
सेजरी बंटोतिन हो...
सउत के झार जनम भर ला सुन के रानी कटोरा ला उठाके मधु पीपर पी लेथे
कंचर कटोरा उठावव
पीलेहूं मधु पीपर हो...
छट्ठी सांवर अउ सोहर
लइका जनम के छै दिन मां छट्ठी होथे। परिवार अउ कुटुम्ब के मनखे मन इही दिन 'सांवरÓ बनाथे। छट्ठी के दिन जच्चा अउ बच्चा ला नहवा खोरा के पवित्र करथे लइका जनम के खुशी मा संझा कना रामायण के पवित्र कार्यक्रम होथे जेमा लइका के नाम धरे के संगे संग सोहर गीत घलो गाए के परम्परा है-
पहिली गनेस पद गावौं मैं चरन मनावौं
हो ललना बिघन हरन जन नायक हो
ललना सोहर पद गावौं हो...
लोरी गीत
लइका हा जब पदोथे नी ते पेट सेंके के बखत रोथे ता एदे गीत ला गावत गावत भुलवारथे-
तरी नरी नाना रे बेटा
तरी नरी नाना गा
तरी नरी नाना रे बेटा
तरी नरी नाना ये गा
सुति जबे सुति जबे बेटा
सुति जबे सुति जबे गा
सुति जबे सुति जबे बेटा
सुति जबे सुति जबे गा
लोक खेल गीत
छत्तीसगढ़ मा लगभग एक सौ पचास से जादा लोक खेले जाथे। चन्द्रमोहन चकोर हा अपन किताब 'छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक खेलÓ मा लोक खेल मन के संकलन करे हे। गीत प्रधान लोक खेल मा अजला, बजला, चुनचुन मलिया, अटकन, बटकन, गोल गोल रानी, घान्दी मुन्दी घोर दे, पोसम पा, खुड़वा नख्खी, कोबी, चिकि-चिकि बाम्बे, फुगड़ी, डांडी पौहा, इल्लर-डिल्लर, जांवर-जीयर, दार भात, झूलना, अउ भौरा आंथ। कुछ लोक खेल गीत मन के बानगी प्रस्तुत हे-
अटकन भटकन खेल गीत
अटकन भटकन के शुरुआत एदे गीत ले होथे...
अटकन-भटकन, दही चटाकन,
लउआ लाटा बन मा कांटा
चिहुरी-चिहुरी पानी गिरे, सावन मा करेला फूले
चल-चल बेटी गंगा जाबो न
गंगा ले गोदावरी जाबोन
बेल के डारा टूटगे
भरे कटोरा फूटगे
खुडुवा खेल गीत
खुडुवा शब्द छत्तीसगढ़ मा लोक प्रिय है। दुसर जघा खुड़ुवा ला कबड्डी के नाव ले जाने जाथे
वर्तमान समे मा खुडुवा ला अन्तरराष्ट्रीय चिन्हारी मिलगे हे। खुडुवा मा खुडवाये बर खु डु डु डु के संगे सगे एके हास्य गीत घलो प्रचलन मा हे...
खुमरी के आल-पाल-खाले बेटा बीरा पान
मैं चलवंव गोंटी, तोर दाई पोवय रोटी
मै मारंव मुटका, तोर ददा करे कुटका।
आमा लगे अमली, बगईचा लागे झोर
उतरत बेंदरा, खोंधरा ला टोर
राहेर के तीन पान, देखे जाही दिन मान
तुआ के तूत के, झपट भूर के
बिच्छी के रेंगना, बूक बाय टेंगना
तुआ लगे कुकरी, बहरा ला झोर
उतरा बेंदरा, खोंधरा ला टोर
चल कबड्डी ताले ताल, मोर मेछा लाले लाल।
फुगड़ी खेल गीत
फुगड़ी हा छत्तीसगढ़ मा नोनी मन के मनभावन खेल आय। नोनी मन फुगड़ी खेले के शुरुआत एदे गीत ले होथे
गोबर दे बछरु गोबर दे
चारो खूंट ला लीपन दे
चारो देरानी ला बइठन दे
अपन खाये गुदा-गुदा
हमला देथे बीजा
ये बीजा ला काय करबो
रहि जाबो तीजा
तीजा के बिहान दिन घरी-घरी लुगरा
चींव-चींव करे मंजूर के पिला
हेर दे भउजी कपाट के खीला
एक गोड़ मा लाल भाजी
एक गोड़ मा कपूर
कतेक लाल मानंव मैं
देवर ससुर
फुगड़ी रे फूं-फूं...
फुगड़ी रे फूं...
भौंरा ले जुड़े खेल गीत
भौंरा पुरुष प्रधान खेल आय। छत्तीसगढ़ मा भौंरा के तीन रुप चांदा, नौगोदिया अउ रट्ठ प्रचलित है। भौंरा गीत वोमा निकलइया ध्वनि ऊपर केन्द्रित है जइसे-
लॉवर मा लोर-लोर, तिखुर मा झोर-झोर
राय झुम-झुम बाँस पान, हंसा करेला पान
सुपली मा बेलपान
लट्ठर जा रे भौंरा
भुन्नर जा रहे...
बिहाव गीत
वंश परम्परा ला बढ़ाये बर पुरुष अउ माई लोगन के एक दूसर के संबंध ला पति अऊ पत्नी के रुप मा सामाजिक मान्यता मिले हे। बिहाव दु तन के मिलन के संगे संग दु आत्मा के मिलन आय। दुनो आत्मा ला मिलाए बर बिहाव संस्कार होथे, बिहाव संस्कार के अंतर्गत मंगनी, लगिन, सिकसा, मड़वा, चुलमाटी, मड़वा पूजा, मंडपाच्छादन, देवतला,  चिकट, लाईलावा, हरदाही, माय-मौरी, नहडोरी, मौर सौंपी, नकटा नाच, परघऊनी बरात स्वागत, मड़वा छुवउनी, भाजी खवउनी, कुवर कलेवा, कुंआरी पूजा, पाणिग्रहण, टिकावन, भांवर, पंगत, जेवनार, बिदाई, डोला परछन, धरमटीका, चौथिया आगमन अउ मउर विसर्जन आये।
विवाह संस्कार के गीत मन ला डॉ. पीसी लाल यादव हा छत्तीसगढ़ी संस्कार गीत मा अउ जमुना प्रसाद कसार हा छत्तीसगढ़ी गीत लोक कंठ का कलकल निनाद मा संकलित करे हे। उदाहरण स्वरुप कुछ बिहाव संस्कार गीत प्रस्तुत हे-
मंगनी गीत
ऊंचे चौंरा बबा ओ चोंपलिया
धन तुलसी के पेड़ हो
जेहि तरि बैठि बेटिया
वाही तरी हिंगुन सोना हो
मड़पाच्छादन गीत
सरई सरगोना के दाई
मड़वा छवई ले
बरे बिहई के रहि जाय
कि ये मोर दाई
सीता ला बिहावे राजा राम
चुलमाटी गीत
तोला माटी कोड़े ला, तोला माटी कोड़े ला
नई आवय मीत धीरे-धीरे
तोर बहिनी के कनिहा ला तीर धीरे-धीरे
तेलचघनी गीत
एक तेल चढिग़े
एक तेल चढिग़े
दाई हरियर-हरियर
वो हरियर-हरियर
मड़वा मा दुलरु
तोर बदन कुम्हलाय
नहडोरी गीत
तोला झूलना झूले ला
नई आवे हो दुलरु बाबू
तोर भाई ले के खोर गिंजरा
खा ले खा ले मिठई पेड़ा
तोर बहिनी ला लेगे साहेब डेरा
मौर सौंपनी गीत
दे तो दाई दे तो दाई
अस्सी वो रुपेया
के सुन्दरी ला लातेव बिहाय
सुंदरि सुंदरि बाबू
तुम झन रटिहौ
के सुंदरि देश बड़ दूर
बारात गीत
गांव अवधपुर ले चले बरतिया
गांव जनकपुरी जाये
ये हो राम गांवे जनकपुरी जाये
राजा जनक के पटपर भांठा
तंबू ला देवय तनाये
ये हो राम तंबू ले देवय तनाये...
नकटा नाच गीत
पांच रुपैया के भेड़वा बिसायेन
भेड़वन दारी रे तोरे लगवार भेड़वा...
खाल्हेच खाल्हे लेई चलो देवरा
ऊपरे हो देवरा परथे गोहारे ऊपरे...
धमसा नाच गीत
ये पार नंदी वो पार नंदी
बीच में भांठा कछार
हमर भईया के बिहाव होवत हे
लगे हे रुपिया हजार
वो भईया लगे हे रुपिया हजार
बारात स्वागत गीत
कै दल आवथे
हथियन घोड़वा
के कै दल आवथे बराते
के अब देखो हो ललना
दस दल आवथे हथियन घोड़वा
के बीस दल आवथे बराते...
परघनी गीत
हाथ धरे लोटिया
खांधे मा धरे पोतिया
सगरी नहाय चले जाबो
पनिया हिलोरे
गौरी नहावय
परगे महादेव के छांही
साते समुंदर ला तैं धोये महादेव
परगे महादेव के छाहीं...
भड़वनी गीत
नदिया तीर के पटुवा भाजी
उल्हवा-उल्हवा दिखथे रे
आये हे बरतिया ते मन
बुढ़वा-बुढ़वा दिखथे रे...
2
बाजा रे बाजे
दमऊ नइहे रे दमऊ नइहे
तोर घर के दुवारी में
समझ नई हे हो रे हो रे...
3
अइसन समधी
खोलाये-खोलाये, खोलाये-खोलाये
के लानव माटी छाबी देबो समधी ला
के लानब माटी छाबी देबो रे भाई...
भाँवर गीत
मधुरि-मधुरि पग धारव हो
दुल्हिन नोनी
तुहंर रजवा के
अंग झन डोलय हो
मधुरि-मधुरि पग धारव हो
दुल्हा बाबू
तुहंर रनिया के
अंग झन डोलय हो...
लगिन गीत
दे तो बाम्हन लगिन-चांउर हो
परे लखन के फेर बाम्हन हो
परे लखन के फेर
बाम्हन बोले गुरतुर बोली हो
परे लखन के फेर
बाम्हन बोले गुरतुर बोली हो
परे लखन के फेर
टिकावन गीत
कोन तोरे टिके नोनी
अचहर-पचहर
कोन तोर टिके धेनु गाय
के अवो नोनी कोन तोर टिके धेनु गाय
दाई तोर टिके नोनी अचहर-पचहर वो
ददा तो टिके धेनु गाय
सोहाग गीत
बांस लागे पोंगरी, पुरावन लागे कलगी
नोनी के मांग म सुहाग भरव ना
सबके सुहाग बहिनी अइसन-तइसन
नानी दाई के सुहाग मा सुहाग बाढ़े ना...
बिदा गीत
दाई-ददा बेटी ला ननपन ले पाले पोसे रथे बिहाव
के बिदा के दुख ला महतारी बाप जानथे-
आजि के  चंदा नियरे वो नियरे
दाई मैं काली जाहूं बड़ दूरे
वो दाई मैं
काली जाहूं बड़ दूरे...
डोला परछन गीत
काहन ला मारे
काहन लाल झोरे, काहन लाल झोरे
तैं काहन के कैना ला लाने
मालूद ला मारेंव दाई
बेलौदी ला झोरेंव वो
बेलौदी ला झोरेंव
परसोदा के कैना ला लानेंव दाई मोर
परसोदा के कैना ला लानेव दाई मोर...
मड़वा विसर्जन गीत
धन-धन बैंहा तुम्हरे ए राजा
हरिना मारन नई आवै ए राजा
हरिना तो मारथे उचाटे ए राजा
ओली-ओली खाए गुर चिंउरा ए राजा...
मृत्यु संस्कार गीत
छत्तीसगढ़ मा मृत्यु संस्कार गीत कबीर पंथी समाज मा मिलथे कबीर साहेब अउधनी धर्मदास के रचे साखी के माध्यम ले चौंका मा जीव उद्धार के कामना करथे-
बंगला अजब बने रे भाई
बंगला अजब बने रे भाई
ए बंगला के दस दरवाजा, पवन चलाव हंसा
जावत-जावत कोनो नई देखय, करे इसवर मनसा।।
गंगोरिया मन के स्वागत गीत
इंतकाल के बाद अस ला गंगा लेगथे अब अस ला छत्तीसगढ़ के प्रयाग राजिम मा घलो अस्थि विसर्जन करथे। गंगोरिया मन के स्वागत मा जउन गीत गाथे वो प्रस्तुत हे...
गंगा बड़े गोदावरी
तीरथ बड़े केदार
सबले बड़े अजोधिया हो
जिंहे राम लिये अवतार हो
रंगमहल मा उड़त हे गुलाल हो
हो मुरली वाले बजइया
यशोदा मइया के लाल हो
तोर चरण के लागत हे मोला आस हो
मुरली वाला बजइया
साभार रऊताही 2015