Tuesday, 6 October 2015
Tuesday, 11 August 2015
रावत नाच महोत्सव छात्रवृत्ति के लिए आवेदन आमंत्रित
आवेदन जमा अंतिम तिथि 31 अगस्त
बिलासपुर. रावत नाच महोत्सव समिति आगामी 38 वें रावत नाच महोत्सव के अवसर पर प्रतिभावान नियमित यादव छात्र-छात्राओं को पूर्व की •भाति नगद छात्रवृत्ति देगी. छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हायर सेकेण्ड्री सामान्य पाठ्यक्रम 12वीं व हाईस्कूल 10वीं के अतिरिक्त आठवीं एवं पांचवी की परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले बिलासपुर जिला पुरानी सीमा- कोरबा, जांजगीर-चांपा, लोरमी, पण्डरिया, मुंगेली, कोटा, पेण्ड्रा आदि क्षेत्र के यादव छात्र-छात्राओं को पृथक-पृथक क्रमश: पांच हजार, तीन हजार एवं दो-दो हजार रुपये की नगद छात्रवृत्ति प्रदान की जायेगी. उपरोक्त छात्रवृत्तियों के अतिरिक्त रावत नाच दल से सम्बद्ध परिवारों के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा की गयी है. जिसमें इस वर्ष 8 छात्र और 8 छात्राओं को चवालिस हजार रुपयों की राशि प्रदान की जायेगी.इससे संबंधित सूचना एवं आवेदन पत्र का प्रारूप गोल दल के मुखिया को डाक द्वारा भेजी गई है. छात्र-छात्राएं अपने मुखिया से फार्म की फोटोकाफी प्राप्त कर सकते हैं. इन छात्रवृत्तियों के लिए सत्र 2014-15 की बोर्ड परीक्षाओं में उत्तीर्ण यादव छात्र-छात्राएं अपना आवेदन सीधे अथवा अपने पालकों के माध्यम से सादे कागज में पूर्ण विवरण सहित अंक-सूची की अभाप्रमाणित छायाप्रति संलग्न कर 31 अगस्त तक डॉ. कालीचरण यादव, संयोजक रावत नाच महोत्सव समिति बनियापारा, जूना बिलासपुर छत्तीसगढ़ के पते पर भेज सकते हैं. डी.पी. विप्र महाविद्यालय के पूर्व ग्रंथपाल डॉ. रामगोपाल यादव इस समिति के अध्यक्ष एवं डॉ. कालीचरण यादव संयोजक हैं. रामनारायण यादव, माखनलाल यादव, मनीराम यादव, रामकुमार यादव, आर सी यादव, विजय यादव, उमेश यादव संतोष कुमार यादव सदस्य हैं. रावत नाच महोत्सव समिति के मंच से यादव समाज के प्रतिभावान छात्रों को दी जाने वाली इस प्रतिष्ठापूर्ण छात्रवृत्ति का यह 18 वां वर्ष होगा. इस वर्ष दोनों छात्रवृत्तियों में कुल 24 छात्र-छात्राओं को सत्तर हजार रुपयों की राशि नगद प्रदान की जावेगी. हायर सेकेण्डरी एवं हाईस्कूल परीक्षा में छत्तीसगढ़ राज्य में प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त करने वाले यादव छात्रों को शाल, श्रीफल, प्रमाण पत्र के साथ क्रमश: 5 व 3 हजार रुपये की नगद राशि भेट कर सम्मानित करने की पृथक व्यवस्था है.
बिलासपुर. रावत नाच महोत्सव समिति आगामी 38 वें रावत नाच महोत्सव के अवसर पर प्रतिभावान नियमित यादव छात्र-छात्राओं को पूर्व की •भाति नगद छात्रवृत्ति देगी. छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हायर सेकेण्ड्री सामान्य पाठ्यक्रम 12वीं व हाईस्कूल 10वीं के अतिरिक्त आठवीं एवं पांचवी की परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले बिलासपुर जिला पुरानी सीमा- कोरबा, जांजगीर-चांपा, लोरमी, पण्डरिया, मुंगेली, कोटा, पेण्ड्रा आदि क्षेत्र के यादव छात्र-छात्राओं को पृथक-पृथक क्रमश: पांच हजार, तीन हजार एवं दो-दो हजार रुपये की नगद छात्रवृत्ति प्रदान की जायेगी. उपरोक्त छात्रवृत्तियों के अतिरिक्त रावत नाच दल से सम्बद्ध परिवारों के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा की गयी है. जिसमें इस वर्ष 8 छात्र और 8 छात्राओं को चवालिस हजार रुपयों की राशि प्रदान की जायेगी.इससे संबंधित सूचना एवं आवेदन पत्र का प्रारूप गोल दल के मुखिया को डाक द्वारा भेजी गई है. छात्र-छात्राएं अपने मुखिया से फार्म की फोटोकाफी प्राप्त कर सकते हैं. इन छात्रवृत्तियों के लिए सत्र 2014-15 की बोर्ड परीक्षाओं में उत्तीर्ण यादव छात्र-छात्राएं अपना आवेदन सीधे अथवा अपने पालकों के माध्यम से सादे कागज में पूर्ण विवरण सहित अंक-सूची की अभाप्रमाणित छायाप्रति संलग्न कर 31 अगस्त तक डॉ. कालीचरण यादव, संयोजक रावत नाच महोत्सव समिति बनियापारा, जूना बिलासपुर छत्तीसगढ़ के पते पर भेज सकते हैं. डी.पी. विप्र महाविद्यालय के पूर्व ग्रंथपाल डॉ. रामगोपाल यादव इस समिति के अध्यक्ष एवं डॉ. कालीचरण यादव संयोजक हैं. रामनारायण यादव, माखनलाल यादव, मनीराम यादव, रामकुमार यादव, आर सी यादव, विजय यादव, उमेश यादव संतोष कुमार यादव सदस्य हैं. रावत नाच महोत्सव समिति के मंच से यादव समाज के प्रतिभावान छात्रों को दी जाने वाली इस प्रतिष्ठापूर्ण छात्रवृत्ति का यह 18 वां वर्ष होगा. इस वर्ष दोनों छात्रवृत्तियों में कुल 24 छात्र-छात्राओं को सत्तर हजार रुपयों की राशि नगद प्रदान की जावेगी. हायर सेकेण्डरी एवं हाईस्कूल परीक्षा में छत्तीसगढ़ राज्य में प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त करने वाले यादव छात्रों को शाल, श्रीफल, प्रमाण पत्र के साथ क्रमश: 5 व 3 हजार रुपये की नगद राशि भेट कर सम्मानित करने की पृथक व्यवस्था है.
Wednesday, 26 November 2014
Thursday, 30 October 2014
रावत नाच महोत्सव छात्रवृत्ति हेतु छात्रों का चयन
बिलासपुर। रावत नाच महोत्सव समिति द्वारा आगामी 15 नवम्बर को रावत नाच महोत्सव के अवसर पर इस वर्ष कुल 24 छात्र-छात्राओं को 70 हजार रुपये की राशि छात्रवृत्ति स्वरुप प्रदान की जाएगी। डॉ. आर.जी. यादव की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा अंतिम तिथि 31 अगस्त 2014 तक प्राप्त आवेदन पत्रों में से सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले निम्नलिखित छात्र-छात्राओं का चयन छात्रवृत्ति हेतु किया गया है।
सामान्य यादव परिवार वर्ग से चयनित छात्र-छात्राएं- हायर सेकेण्डरी छात्र, अमन यादव पिता स्व. श्री विनोद यादव ऊर्जा पार्क राजकिशोर नगर बिलासपुर, छात्रा कु. चंचल यादव पिता श्री शंकर यादव कुदुदण्ड, हाईस्कूल- अभिषेक सिंह यादव पिता तेरस राम यादव नूतन चौक सरकंडा बिलासपुर, चकोरी यादव पिता कृष्ण कुमार यादव चोरहा देवरी लखराम, पूर्व माध्यमिक अभिषेक यादव पिता शत्रुहन सिंह यादव ऊर्जा पार्क के पास राजकिशोर नगर बिलासपुर, कुमारी रश्मि यादव पिता श्री राजेश यादव कस्तूरबा नगर, प्राथमिक प्रमाण पत्र निखिल यादव पिता राजेन्द्र यादव टिकारीपारा तखतपुर, कुमारी आस्था यादव पिता केशव यादव मंगला, रावतनाच गोल दल से सम्बद्ध परिवार हायर सेकेण्डरी, राहुल यादव पिता स्व. श्री विनोद यादव, कुंदरापारा तिफरा, कुमारी दुर्गेश्वरी यादव पिता श्री खेदूराम यादव टिकरापारा बिलासपुर, हाईस्कूल प्रमाण पत्र अविनाश यादव पिता श्री लक्ष्मी प्रसाद यादव, परसदा-भरनी, संदीप यादव पिता रज्जू यादव सेंवार, सृष्टि यादव पिता बहोरन यादव कुदुदण्ड, ममता यादव पिता जीवराखन यादव टिकरापारा, पूर्व माध्यमिक देवकुमार यादव मोहितराम यादव बिजराडीह भाठापारा, माधव यादव पिता शिवकुमार यादव शांतिनगर ठेठाडबरी, दीपांजलि यादव पिता बसंतराम यादव मोपका, त्रिपती यादव पिता श्री सहसराम यादव, प्राथमिक प्रमाण पत्र, प्रेमसागर यादव पिता श्री प्रहलाद यादव बसिया, हिमांशु यादव पिता कमलेश यादव बसिया, तरुण यादव पिता शिवकुमार यादव शांतिनगर ठेठाडबरी बिलासपुर, कुमारी शारदा यादव पिता रामेश्वर यादव बसिया, कुमारी अंजू यादव पिता श्री बऊवा यादव शांतिनगर दिव्या यादव पिता राजकमल यादव बसिया बिलासपुर इन्हें कक्षावार क्रमश: 5000, 3000, 2000, 2000 रुपये की राशि छात्रवृत्ति के रुप में नकद एवं प्रमाण पत्र के साथ सम्मानित किया जावेगा। इस तरह लगभग 70,000 रुपये प्रदान की जायेगी। डॉ. आर.जी. यादव, डॉ. कालीचरण यादव, आर.एन. यादव, माखनलाल यादव, विजय यादव, मनीराम यादव, संतोष यादव, उमेश यादव एवं रामकुमार यादव छात्रवृत्ति परीक्षण समिति की बैठक में उपस्थित थे।
सामान्य यादव परिवार वर्ग से चयनित छात्र-छात्राएं- हायर सेकेण्डरी छात्र, अमन यादव पिता स्व. श्री विनोद यादव ऊर्जा पार्क राजकिशोर नगर बिलासपुर, छात्रा कु. चंचल यादव पिता श्री शंकर यादव कुदुदण्ड, हाईस्कूल- अभिषेक सिंह यादव पिता तेरस राम यादव नूतन चौक सरकंडा बिलासपुर, चकोरी यादव पिता कृष्ण कुमार यादव चोरहा देवरी लखराम, पूर्व माध्यमिक अभिषेक यादव पिता शत्रुहन सिंह यादव ऊर्जा पार्क के पास राजकिशोर नगर बिलासपुर, कुमारी रश्मि यादव पिता श्री राजेश यादव कस्तूरबा नगर, प्राथमिक प्रमाण पत्र निखिल यादव पिता राजेन्द्र यादव टिकारीपारा तखतपुर, कुमारी आस्था यादव पिता केशव यादव मंगला, रावतनाच गोल दल से सम्बद्ध परिवार हायर सेकेण्डरी, राहुल यादव पिता स्व. श्री विनोद यादव, कुंदरापारा तिफरा, कुमारी दुर्गेश्वरी यादव पिता श्री खेदूराम यादव टिकरापारा बिलासपुर, हाईस्कूल प्रमाण पत्र अविनाश यादव पिता श्री लक्ष्मी प्रसाद यादव, परसदा-भरनी, संदीप यादव पिता रज्जू यादव सेंवार, सृष्टि यादव पिता बहोरन यादव कुदुदण्ड, ममता यादव पिता जीवराखन यादव टिकरापारा, पूर्व माध्यमिक देवकुमार यादव मोहितराम यादव बिजराडीह भाठापारा, माधव यादव पिता शिवकुमार यादव शांतिनगर ठेठाडबरी, दीपांजलि यादव पिता बसंतराम यादव मोपका, त्रिपती यादव पिता श्री सहसराम यादव, प्राथमिक प्रमाण पत्र, प्रेमसागर यादव पिता श्री प्रहलाद यादव बसिया, हिमांशु यादव पिता कमलेश यादव बसिया, तरुण यादव पिता शिवकुमार यादव शांतिनगर ठेठाडबरी बिलासपुर, कुमारी शारदा यादव पिता रामेश्वर यादव बसिया, कुमारी अंजू यादव पिता श्री बऊवा यादव शांतिनगर दिव्या यादव पिता राजकमल यादव बसिया बिलासपुर इन्हें कक्षावार क्रमश: 5000, 3000, 2000, 2000 रुपये की राशि छात्रवृत्ति के रुप में नकद एवं प्रमाण पत्र के साथ सम्मानित किया जावेगा। इस तरह लगभग 70,000 रुपये प्रदान की जायेगी। डॉ. आर.जी. यादव, डॉ. कालीचरण यादव, आर.एन. यादव, माखनलाल यादव, विजय यादव, मनीराम यादव, संतोष यादव, उमेश यादव एवं रामकुमार यादव छात्रवृत्ति परीक्षण समिति की बैठक में उपस्थित थे।
छत्तीसगढ़ी लोकगीत और लोकस्वर
मानव के लिए गीत पुरातन समय से मीत रहा है। गीत मानव के हृदय से सस्कंृत होने वाली वह समस्त भावनाएँ हैं जो भीतर से बाहर लोकस्वर बन झरते रहता है। और हर मन को हरते रहता है। लोकगीतों की परंपरा तो आदि युग से चली आ रही है। वह अपने जीवन को बोलियों मेें प्रकाशित करता रहा है। उसने समय-समय पर शोषण के विरूद्ध गीतों में आवाज उठाई, अपने श्रम का परिहार गीतों के सहारे किया, नया उत्साह, नई लगन गीतों द्वारा प्राप्त की। और इतना ही नहीं, मन की छिपी हुई गीतों बातों के सुख और दु:ख को उन्हीं गीतों में ढाला।
ये लोक-गीत लिपिबद्ध हो या न हो, इन्हें भावनाओं की कण्ठ ध्वनि ही कहना चाहिए। हर राष्ट्र के हर क्षेत्र में अपनी निजी बोलियों में गीत पाये जाते है। छत्तीसगढ़ की अपनी भाषा में या बोली में जो गीत गाते हैं उनका अपना अलग मार्धुय है। छत्तीसगढ़ी लोक-गीतों की जो अतुल संपदा व अनन्त भण्डार है, वह शाश्वत् है। लोकप्रिय बाल-लोक-गीत बड़ा ही मधुर है:-''अटकन-बटकर,दही चटाकन
लौहा लाटा बन के काँटा
तुहुर-तुहुर पानी आवे /सावन म करेला पाके
चल-चल बहिनी गंगा जाबो
गंगा ले गोदावरी /पाका-पाका आमा खाबो
आमा के डारा टूटगे/ भरे कटोरा फूट गे।''
इन गीतों मेें जनजीवन का पारंपरिक एंव स्वाभाविक चित्र सुलभ होता है। हमारा सारा सामाजिक जीवन संगीतमय है। भारतीय समाज में जीवन के प्रत्येक अवसर को, प्रत्येक कर्म को संगीतमय सुण्ठुता प्रदान किया जाता है। पुरूष खेतों में काम करते हों या जंगलों में गाय चराते हों, चाहे स्त्रियाँ खेतों में धान रोपती हों या घर में चक्की चलाती हों वे बराबर मन तथा शरीर में स्फूर्तिं लाने के लिए सरस गीतेां की लहरों पर झूमती दिखाई देती हैं। जन्म, विवाह आदि मांगलिक अवसरों को लोकगीत अनुपम बना देता है। विवाह में चुलमाटी एक प्रथा है ढेड़हा जब मिट्टी खोदता है, उसके लिए हास्य रस से भरे हुए लोकगीत प्रसिद्ध हैं ,जो मन को गुदगुदता है:
''तोला माटी कोडें़ ल नई आवै मीत
धीरे-धीरे!
तेहां, तोर कनिहा ल ढ़ील, धीरे-धीरे!
जतके मैं पोरसेंव तैं ओतके ल लील धीरे-धीरे!
तोर बहिनी ल तीर, धीरे-धीरे! '' जीवन की प्रत्येक छोटी-बड़ी परिस्थितियों का, परंपरा व नीतियों का ,रोने व हंसने का, व्यंग-बाण कसने का मधुर तरीका लोकगीत-लोकस्वर है। लोक संस्कृति की आकृति लोकगीत में सुलभ होती है। डॉ. देवेन्द्र सत्यार्थी कहते है-''लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोलते चित्र हंै। '' लोकगीत के आइने में लोक-संस्कृति मायने पाती है। पंडवानी, पंथी गीत, भरथरी, चंदैनी गायन,ददरिया,सुआ गीत, बांसगीत,ढोला मारू-किस्सा गीत, मड़ई गीत, देवार गीत, भोजली -जंवारा-जसगीत, विवाह व 'भड़ौनीÓ गीत एंव बच्चों को मीठी नींद सुलभ कराने 'लोरी-गीतÓ हमारी समृद्ध परंपरा की पहचान कराते है। छत्तीसगढ़ बच्चियाँ गाँव में जब अपनी सहेलियों के साथ फुगड़ी नृत्य करती हैं तो भूमिका के रूप में एक स्वर में लोकस्वर देती है। मनमोहक बन पड़ता है:-''गोबर दे बछरू गोबर दे,
चारों ख्ॉूट ल लीपन दे, चारों देरानी ल बइठन दे
अपन खाथे गूदा-गूदा, हमला देथे बीजा,
रही जाबो तीजा
तीजा के बीहान दिन झमझम ले लूगरा
हेर-दे-भौजी-हेर-दे कपाट के खीला
चींव-चींव नरियाये मजूर के पीला
एक गोड़ म लाल भाजी एक गोड़ म कपूर
कतेक ल मानो मोर देवर-ससुर।
सचमुच छत्तीसगढ़ी के लोकगीतों में यहाँ की मिट्टी की सोंधी महक बसी हुई है तथा वातायन में इसका स्वर गँूज रहा है। वास्तव में , इन गीतों के भीतर प्रेम, ईष्र्या, द्वेष, टीस, सिरहर, पड़प, कसक, मादकता, उल्लास, राग-विराग तथा अन्य अनेक भाव अभिव्यक्ति स्थितियों का पुरातन एंव सामायिक चित्र एक साथ देखने को मिल जाते हैं।
साभार रउताही 2014
ये लोक-गीत लिपिबद्ध हो या न हो, इन्हें भावनाओं की कण्ठ ध्वनि ही कहना चाहिए। हर राष्ट्र के हर क्षेत्र में अपनी निजी बोलियों में गीत पाये जाते है। छत्तीसगढ़ की अपनी भाषा में या बोली में जो गीत गाते हैं उनका अपना अलग मार्धुय है। छत्तीसगढ़ी लोक-गीतों की जो अतुल संपदा व अनन्त भण्डार है, वह शाश्वत् है। लोकप्रिय बाल-लोक-गीत बड़ा ही मधुर है:-''अटकन-बटकर,दही चटाकन
लौहा लाटा बन के काँटा
तुहुर-तुहुर पानी आवे /सावन म करेला पाके
चल-चल बहिनी गंगा जाबो
गंगा ले गोदावरी /पाका-पाका आमा खाबो
आमा के डारा टूटगे/ भरे कटोरा फूट गे।''
इन गीतों मेें जनजीवन का पारंपरिक एंव स्वाभाविक चित्र सुलभ होता है। हमारा सारा सामाजिक जीवन संगीतमय है। भारतीय समाज में जीवन के प्रत्येक अवसर को, प्रत्येक कर्म को संगीतमय सुण्ठुता प्रदान किया जाता है। पुरूष खेतों में काम करते हों या जंगलों में गाय चराते हों, चाहे स्त्रियाँ खेतों में धान रोपती हों या घर में चक्की चलाती हों वे बराबर मन तथा शरीर में स्फूर्तिं लाने के लिए सरस गीतेां की लहरों पर झूमती दिखाई देती हैं। जन्म, विवाह आदि मांगलिक अवसरों को लोकगीत अनुपम बना देता है। विवाह में चुलमाटी एक प्रथा है ढेड़हा जब मिट्टी खोदता है, उसके लिए हास्य रस से भरे हुए लोकगीत प्रसिद्ध हैं ,जो मन को गुदगुदता है:
''तोला माटी कोडें़ ल नई आवै मीत
धीरे-धीरे!
तेहां, तोर कनिहा ल ढ़ील, धीरे-धीरे!
जतके मैं पोरसेंव तैं ओतके ल लील धीरे-धीरे!
तोर बहिनी ल तीर, धीरे-धीरे! '' जीवन की प्रत्येक छोटी-बड़ी परिस्थितियों का, परंपरा व नीतियों का ,रोने व हंसने का, व्यंग-बाण कसने का मधुर तरीका लोकगीत-लोकस्वर है। लोक संस्कृति की आकृति लोकगीत में सुलभ होती है। डॉ. देवेन्द्र सत्यार्थी कहते है-''लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोलते चित्र हंै। '' लोकगीत के आइने में लोक-संस्कृति मायने पाती है। पंडवानी, पंथी गीत, भरथरी, चंदैनी गायन,ददरिया,सुआ गीत, बांसगीत,ढोला मारू-किस्सा गीत, मड़ई गीत, देवार गीत, भोजली -जंवारा-जसगीत, विवाह व 'भड़ौनीÓ गीत एंव बच्चों को मीठी नींद सुलभ कराने 'लोरी-गीतÓ हमारी समृद्ध परंपरा की पहचान कराते है। छत्तीसगढ़ बच्चियाँ गाँव में जब अपनी सहेलियों के साथ फुगड़ी नृत्य करती हैं तो भूमिका के रूप में एक स्वर में लोकस्वर देती है। मनमोहक बन पड़ता है:-''गोबर दे बछरू गोबर दे,
चारों ख्ॉूट ल लीपन दे, चारों देरानी ल बइठन दे
अपन खाथे गूदा-गूदा, हमला देथे बीजा,
रही जाबो तीजा
तीजा के बीहान दिन झमझम ले लूगरा
हेर-दे-भौजी-हेर-दे कपाट के खीला
चींव-चींव नरियाये मजूर के पीला
एक गोड़ म लाल भाजी एक गोड़ म कपूर
कतेक ल मानो मोर देवर-ससुर।
सचमुच छत्तीसगढ़ी के लोकगीतों में यहाँ की मिट्टी की सोंधी महक बसी हुई है तथा वातायन में इसका स्वर गँूज रहा है। वास्तव में , इन गीतों के भीतर प्रेम, ईष्र्या, द्वेष, टीस, सिरहर, पड़प, कसक, मादकता, उल्लास, राग-विराग तथा अन्य अनेक भाव अभिव्यक्ति स्थितियों का पुरातन एंव सामायिक चित्र एक साथ देखने को मिल जाते हैं।
साभार रउताही 2014
छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य रहस में गीत योजना
छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य रहस में एक ओर यदि कथानक के साथ गीत की योजना मिलती है,तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का भी समाहार किया जाता है। जहाँ भाव या विचार प्रमुख होते हैं, वहाँ कथानक को छोड़कर गीत नि:सृत होते हैं। छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य रहस में कई प्रकार के गीत गाये जाते है, जिनका विवरण अधोलिखित है-
(1) मंगलगीत :
मंगलगीत सामान्यत: मांगलिक अवसरों पर ही गाये जाते हैं, चाहे वह पुत्र जन्म का उल्लाह भरा अवसर हो, विवाह की शुभ बेला हो या अन्य मांगलिक अनुष्ठान हो। भगवान श्री कृष्ण के जन्म सुनकर सखियाँ मंगल-कलश सजाकर नंद जी के द्वार पहुंचकर गीत गाती है-
''प्रगटे अज यदुरैया, गोकुलपुर बाजे बधैया।
थोड़ा भी लूँगी, हाथी भी लँूगी,
लूँगी लागत गैया।
हीरा भी लूँगी, मोती भी लूँगी,
लूँगी ठनम रूपैया।ÓÓ
(2) 'नाल छीलने का गीत :
जन्म के बाद बच्चे की नाल काटी जाती है। जो दाई यह काम करती है, वह उसके बदले में अच्छा सा उपहार चाहती है। लोकनाट्य रहस में भी भगवान श्रीकृष्ण की नाल काटने हेतु मैया यशोदा के आँगन में दाई आती है यथा-
''हरि के नारा छिनन आई।
सजना सप्त श्रंृगार अंग पर,आई महर अंगनाई।
पद पखारि गयो गृह भीतर, जिये तेरे कुंवर कन्हाई।
शिशु के काज करत में झंगुरी, मुख चुमन पर पाई।
भूषन बसन न्योछावर दीन्हों, प्रभु के चरन मन लाई। ''मैया यशोदा दाई को बदले में वस्त्राभूषण दिये और दाई प्रसन्न होकर अपने घर चली गई।
(3) न्योछावर :
छोटे बालक को देखने और प्यार करने से बहुधा उसे अपनी ही प्रियजनों की नजर लग जाती है। एेसे में राई नमक या मिर्च से उसकी नजर उतारी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव में नंदजी अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिए,जिसे देखकर कुबेर जी लज्जित हो गये-
''पूत सपूत जनि यशोदा, इतनी सुनिके वसुधा सब दौरी।
देवन को आनंद भयो, सुनि गावत धावत मंगल गौरी।
नंद कछु इतनी जो दियो, घनश्याम कुबेरहु के मति बौरी।
ब्रज देख ही लुटाय दियो, न बचे बछिया-छछिया न पिछौरी।ÓÓ
(4) बधाई :
पुत्र जन्म के उपलक्ष्य में माता को बधाई दी जाती है,तथा नवजात शिशु को जो आशीर्वाद दिया जाता है, वही बधावा कहलाता है। श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के समय ब्रज में बधाई का बाजा बज रहा है-
''ब्रज बाजे रे आज बधाई।
कान्हा के जन्म ला सुनके सखियाँ,
दउड़े कुदै रे धाई।
नाचय रे गावय,बजावै सुनावै,
देखय देखावै परम सुख पावे।
देवय आशीष धन-धन हे कुंवर कन्हाई।। ''ब्रज मण्डल में बधाई के समय नंदजी अन्न-धन लुटा रहे हंै।ÓÓ
(5) असीस :
बस्ती जनपद में शिशु -जन्म क समय 'असीस 'नाम का गीत गाया जाता है। यो इस अवसर पर प्राय: सभी प्रदेशों में बच्चे को आशीर्वाद देने और उसकी मंगल मनाने की प्रथा है। कृ ष्ण के जन्म सुनकर सखियाँ नंद गृह पहँुचकर बाले कृष्ण को आशीर्वाद देती हैं-
''आजु सखी श्री नंद महर घर,
गृह - गृह से गोप -ग्वालनी,
मंगल गावत आई री।
आसीस देत सकल ब्रजनारी
जुग-जुग जिये कन्हाई री।ÓÓ
6) झूला गीत :
मैया यशोदा बालक श्रीकृष्ण को झूला में लेकर झूलाने लगती है। सखियाँ भी यशोदा मैया की आज्ञा पाकर हरि को झूला झूलाने हेतु पँहुचती हैं:-''आवो री सखी , झुलावै हरि पलना।
कंचन पलना रतन जड़ो है,
मोतियन लागी डोरना।
रेशम डोर झूल मोतियन के, सोवत नंद जू के छौना।
चंद्रसखी भजु बाल-कृष्ण छवि,
ध्यान लगे तोर चरना। '' कृष्ण पालने में पड़े-पड़े रोते है,शायद किसी गुजरिया की नजर उन्हें लग गई है। यशोदा मैया राई और नमक से उनकी नजर उतारती है, और कहती है, जो मेरे लाल का पालना झुलाएगा उसे मैं जड़ाऊ कं गन दूँगी-
''झूला दे मैया श्याम परे पलना।
काहू गुजरिया की नजर लगी है,
सो रोवत हैं ललना।
रई नोन उतारो जशोदा,
खुशी भये ललना।
जो मोरे ललना को पलना झूला है,
दैहों जगऊ कंगना।
(7) नामकरण :
यों तो बच्चे के जन्म की प्रसन्नता से संसार का हर कोना सराबोर होता है, किन्तु लोक -सस्ंकृति में यह खुशी गीतों के माध्यम से प्रकट होती है। श्रीकृष्ण के जन्म सुनाकर और वसुदेव जी के कहने पर गर्गाचार्य जी महाराज नामकरण हेतु गोकुल पहँुचते हैं, और भगवान के नाम रखते है-''नामकरण को गर्ग ऋषि आयो।
चंदन खड़ाऊ बेद कर सोहा,
द्वादस तिलक लगायो
नंद बाबा ने देखत पंडित
पुस्तक बगल दबायो।।''
''नान धरे बर भगवान के,
गर्गाचार हर आईस।
माथा म चंदन, भुजा मा बंदन,
कि ताब ला काख दबाईस।
(8) विवाह गीत :
विवाह गीत वर और कन्या दोनों पक्षों में समान रूप से गाये जाते हैं। वर पक्ष के गीतों में उल्लास और कन्या पक्ष के गीतों में करूणा होती है।
महाराज कंस अपनी बहन देवकी की विवाह श्री वासुदेव जी के साथ किये। देवकी जी को लेकर सब सखियाँ मण्डप की ओर चली-
''चलो दुल्हनियाँ पिया मिलन को,
छोटी सी घुंघट निकालिके।
गोरे-गोरे हाथों में मेंहदी लगी है,
नयनों में कजना डारिके। ''श्री देवकी-वासुदेव विवाह प्रसंग से गीत प्रस्तुत है- ''बिहा लगाइस कंस,देवकी,
बहिनी के बसुदेव संग मा।
धूमधाम से बिदा करिस,
दे दाइज छोर अतेक संग म।
दाइज डोर सबे ला गाड़ी मा भरवा के,
देवकी बहिनी ला सोनहा रथ मा बइठा के।
सोयम कंस बइठिस रथ ऊपर अमराये बर,
हाँसत मारे खुसी रास ला घोड़ा के घर ।ÓÓ
(9) जादू-टोना के गीत :
छत्तीसगढ़ अंचल में टोना-जादू आज भी दृष्टिगोचर होता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग टोना-जादू के नाम से भयभीत रहते हंै। रहस में श्रीकृष्ण के विरह में राधा मूर्छित होकर गिर पड़ती है, और गिरते समय सखियों से कहती है-सखियों ! मुझे काले साँप ने डस लिया है, देखों कहीं किसी की नजर मुझ पर न लग जाय। सखियाँ माता कीर्ति से जाकर कहती है-''याको कारो डसो री माई।
कहत सखी सब आपस माहीं,
देखत नीको आई।
भई बिकल बन सुधि कछु नाहीं,
कहा भयो कछु जान न जाई।
देह गेह कर नेह भलायो,
याको कारो कुंवर कन्हाई।
हरि मुसक्यात विषम बिष डारै ,
हमहँू पर फ ँूक चलाई।
10) चकई :
भौंरा खेलना-ग्रामीण अचंल में भौंरे का खेल आज भी बहु प्रचलित है। लोकनाट्य रहस में भी इसका निर्वाह हुआ है। मैया यशोदा बाल-कृष्ण को चकई-भौंरा लेकर देती है। तब श्री कृष्ण सब सखाओं के साथ मिलकर भौंरा खेलते हैं-
''खेलत कान्ह भँवर चक डोरी।
कांहू सो हँसि बोलहि कान्हा,
काहू सो मुख मोरी।
संग सखा मिलि खेलत कान्हा,
लेकर ब्रज की खोरी।
लै आये हँसि श्याम तुरूतहि,
बहुत रंगन की डोरी।ÓÓ
(11) बियारी गीत :
सब सखियाँ मिलकर भगवान श्री कृष्ण को भोजन खिलाने के लिए अपने -अपने घर से व्यंजन बनाकर ले जाती हैं और खाना खिलाती हैं। मैया यशोदा भी आनंद के साथ खाना खिलाती है-''आज ललन करत बियारी,
करत बियारी श्री गिरधारी।
जेवन बइठे मदन गोपाल,
हुलसि-हुलसि परसैं महतारी।
सोने की थारी गंगाजल झारी,
निरखि-निरखि हरषत महवारी।
खाजा-खुरमा सुघर-जलेबी।
सीरा पुरी सरस सोंहारी।
भाँति-भाँति के बन अथाना,
नाना भाँति की बनी तरकारी।ÓÓ
(12) गाली :
भगवान श्री कृष्ण को भोजन खिलाने के पश्वात् सब सखियाँ भगवान को गालियाँ देती हंै। इस गीत में श्रीकृष्ण की बहन, उसकी फूफू आदि को भी समेटकर गाली गाई जाती है, यथा-''गारी गावे सकल ब्रजनारी, सुनिये हो घनश्याम
गोरे नंद यशोदा गोरी, गोरे बरण बलराम।
कैसे तुम भये कारे मोहन, प्रगटे नंद के धाम।
बहन तुम्हारी रानी सुभद्रा, जानत सकल जहान।
सो भागी अर्जुन के संग में ,डूबेउ कुल के नाम।
धरणी भार उतारण कारण, प्रकट भये ब्रज धाम।ÓÓ
इस प्रकार की गाली मे अभद्रता न होकर प्रेमभाव छिपा है, ये सखियों की मंगल गाली है।
(13) कृष्ण विदाई के गीत :
भगवान श्रीकृष्ण को मथुरापुरी भेजते समय मैया यशोदा पथिक से कहती है-''संदेशों देकी सो कहयो।
हँू तो दासी तिहारे सूत की, सूरत करत रहियो।ÓÓ
(14) मृत्यु के गीत :
गीता के अनुसार वस्तुत: मृत्यु मात्र शरीर बदलते की प्रक्रिया है।''मृ'' धातु में 'ल्यूकÓ प्रत्यय लगाकर 'मृत्युÓशब्द बनता है जिसका अर्थ है- मरण। आत्मा एक शरीर से निकलकर अपने प्रियतम मरमात्मा से मिलने जाती है। संसार से उसकी विदाई का अत्यन्त करूण एंव मार्मिक चित्रण मिलता है, किन्तु जाने वाले को तो परमात्मा प्रियतम से साक्षात्कार होता है, इसलिए संसाररूपी नैहर को छोडऩे की व्यवस्था उसे छू भी नहीं पाती। छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य रहस में पूतना की मृत्यु पर बाल-सखाओं द्वारा इस प्रकार के गीत गाये जाते हैं-''मर गे पुतना नारी रे।
तोर मरे के बेरीया मा रहितेन,
तोर मँुह मा पानी डारतेंन,
आज्ञा लेकर कंसराय के गोकुल मा छलठानी रे। '' कवि कपिलनाथ कश्यप पूतना वध को इस प्रकार व्यक्त करते हैं-
''दूध पियत पीरा के मारे, होगे नियट बिहाल।
संग मा लेके बाल कृष्ण ला, उडि़स उहाँ ले व्याकुल होके।
हाय-हाय करिस गर्जना, गिरते भुईयाँ पाँपिन मरगे।ÓÓ
ऋतुओं के गीत
(1) वर्षा ऋतु के गीत :
वर्षा ऋतु गीतों की ऋतु है। पावस के गीत लगभग चार महीने तक गाये जाते हैं किन्तु इनमें सावन सबसे अधिक वर्षा की प्रतीक है। सावन की ऋतु में राधा अपनी सखी से कहती है, कि सखी! वर्षा ऋतु का आगमन हो गया है, किन्तु अभी तक वो संावला-कन्हैया नहीं आया-''सावन की ऋतु आई री सजनियाँ,
कान्हा घर नहीं आये। भादो भोरवा बोल रहा है,
मनवा मोरा रो- रो रहा है। नाहक प्रित लगाए।।ÓÓ
(2) बारहमासा :
जैसा कि नाम से स्पष्ट है 'बारहमासाÓ नामक गीत में बारहों महीने के गीत का बड़ा रूचिकर वर्णन होता है। ऋतु गीतों मे यह बड़ा लोक प्रिय है। ये गीत वर्षा ऋतु से प्रारंभ होकर ज्येष्ठ मास तक गाया जाता है।
(3) झूला गीत :
बारह मासों के मासक्रम को कोई नियम नहीं है। यह वर्णन चैत से आरंभ कर के फागुन में भी समाप्त किया जा सकता है।
भादों में तीज तक हिंडोला चलता है तथा गीत गाये जाते हैं इस प्रकार के गीत विशेष रूप से झूले पर ही बैठकर गाये जाते हं। लोकनाट्य रहस में भी इस प्रकार के गीत का प्रचलन है यथा-''झूला-झूले राधिका प्यारी
संग में कृष्ण मुरारी ना।
सोने के पलना रेशम के डोरी,
कदम के डारी ना।
साभार रउताही 2014
(1) मंगलगीत :
मंगलगीत सामान्यत: मांगलिक अवसरों पर ही गाये जाते हैं, चाहे वह पुत्र जन्म का उल्लाह भरा अवसर हो, विवाह की शुभ बेला हो या अन्य मांगलिक अनुष्ठान हो। भगवान श्री कृष्ण के जन्म सुनकर सखियाँ मंगल-कलश सजाकर नंद जी के द्वार पहुंचकर गीत गाती है-
''प्रगटे अज यदुरैया, गोकुलपुर बाजे बधैया।
थोड़ा भी लूँगी, हाथी भी लँूगी,
लूँगी लागत गैया।
हीरा भी लूँगी, मोती भी लूँगी,
लूँगी ठनम रूपैया।ÓÓ
(2) 'नाल छीलने का गीत :
जन्म के बाद बच्चे की नाल काटी जाती है। जो दाई यह काम करती है, वह उसके बदले में अच्छा सा उपहार चाहती है। लोकनाट्य रहस में भी भगवान श्रीकृष्ण की नाल काटने हेतु मैया यशोदा के आँगन में दाई आती है यथा-
''हरि के नारा छिनन आई।
सजना सप्त श्रंृगार अंग पर,आई महर अंगनाई।
पद पखारि गयो गृह भीतर, जिये तेरे कुंवर कन्हाई।
शिशु के काज करत में झंगुरी, मुख चुमन पर पाई।
भूषन बसन न्योछावर दीन्हों, प्रभु के चरन मन लाई। ''मैया यशोदा दाई को बदले में वस्त्राभूषण दिये और दाई प्रसन्न होकर अपने घर चली गई।
(3) न्योछावर :
छोटे बालक को देखने और प्यार करने से बहुधा उसे अपनी ही प्रियजनों की नजर लग जाती है। एेसे में राई नमक या मिर्च से उसकी नजर उतारी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव में नंदजी अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिए,जिसे देखकर कुबेर जी लज्जित हो गये-
''पूत सपूत जनि यशोदा, इतनी सुनिके वसुधा सब दौरी।
देवन को आनंद भयो, सुनि गावत धावत मंगल गौरी।
नंद कछु इतनी जो दियो, घनश्याम कुबेरहु के मति बौरी।
ब्रज देख ही लुटाय दियो, न बचे बछिया-छछिया न पिछौरी।ÓÓ
(4) बधाई :
पुत्र जन्म के उपलक्ष्य में माता को बधाई दी जाती है,तथा नवजात शिशु को जो आशीर्वाद दिया जाता है, वही बधावा कहलाता है। श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के समय ब्रज में बधाई का बाजा बज रहा है-
''ब्रज बाजे रे आज बधाई।
कान्हा के जन्म ला सुनके सखियाँ,
दउड़े कुदै रे धाई।
नाचय रे गावय,बजावै सुनावै,
देखय देखावै परम सुख पावे।
देवय आशीष धन-धन हे कुंवर कन्हाई।। ''ब्रज मण्डल में बधाई के समय नंदजी अन्न-धन लुटा रहे हंै।ÓÓ
(5) असीस :
बस्ती जनपद में शिशु -जन्म क समय 'असीस 'नाम का गीत गाया जाता है। यो इस अवसर पर प्राय: सभी प्रदेशों में बच्चे को आशीर्वाद देने और उसकी मंगल मनाने की प्रथा है। कृ ष्ण के जन्म सुनकर सखियाँ नंद गृह पहँुचकर बाले कृष्ण को आशीर्वाद देती हैं-
''आजु सखी श्री नंद महर घर,
गृह - गृह से गोप -ग्वालनी,
मंगल गावत आई री।
आसीस देत सकल ब्रजनारी
जुग-जुग जिये कन्हाई री।ÓÓ
6) झूला गीत :
मैया यशोदा बालक श्रीकृष्ण को झूला में लेकर झूलाने लगती है। सखियाँ भी यशोदा मैया की आज्ञा पाकर हरि को झूला झूलाने हेतु पँहुचती हैं:-''आवो री सखी , झुलावै हरि पलना।
कंचन पलना रतन जड़ो है,
मोतियन लागी डोरना।
रेशम डोर झूल मोतियन के, सोवत नंद जू के छौना।
चंद्रसखी भजु बाल-कृष्ण छवि,
ध्यान लगे तोर चरना। '' कृष्ण पालने में पड़े-पड़े रोते है,शायद किसी गुजरिया की नजर उन्हें लग गई है। यशोदा मैया राई और नमक से उनकी नजर उतारती है, और कहती है, जो मेरे लाल का पालना झुलाएगा उसे मैं जड़ाऊ कं गन दूँगी-
''झूला दे मैया श्याम परे पलना।
काहू गुजरिया की नजर लगी है,
सो रोवत हैं ललना।
रई नोन उतारो जशोदा,
खुशी भये ललना।
जो मोरे ललना को पलना झूला है,
दैहों जगऊ कंगना।
(7) नामकरण :
यों तो बच्चे के जन्म की प्रसन्नता से संसार का हर कोना सराबोर होता है, किन्तु लोक -सस्ंकृति में यह खुशी गीतों के माध्यम से प्रकट होती है। श्रीकृष्ण के जन्म सुनाकर और वसुदेव जी के कहने पर गर्गाचार्य जी महाराज नामकरण हेतु गोकुल पहँुचते हैं, और भगवान के नाम रखते है-''नामकरण को गर्ग ऋषि आयो।
चंदन खड़ाऊ बेद कर सोहा,
द्वादस तिलक लगायो
नंद बाबा ने देखत पंडित
पुस्तक बगल दबायो।।''
''नान धरे बर भगवान के,
गर्गाचार हर आईस।
माथा म चंदन, भुजा मा बंदन,
कि ताब ला काख दबाईस।
(8) विवाह गीत :
विवाह गीत वर और कन्या दोनों पक्षों में समान रूप से गाये जाते हैं। वर पक्ष के गीतों में उल्लास और कन्या पक्ष के गीतों में करूणा होती है।
महाराज कंस अपनी बहन देवकी की विवाह श्री वासुदेव जी के साथ किये। देवकी जी को लेकर सब सखियाँ मण्डप की ओर चली-
''चलो दुल्हनियाँ पिया मिलन को,
छोटी सी घुंघट निकालिके।
गोरे-गोरे हाथों में मेंहदी लगी है,
नयनों में कजना डारिके। ''श्री देवकी-वासुदेव विवाह प्रसंग से गीत प्रस्तुत है- ''बिहा लगाइस कंस,देवकी,
बहिनी के बसुदेव संग मा।
धूमधाम से बिदा करिस,
दे दाइज छोर अतेक संग म।
दाइज डोर सबे ला गाड़ी मा भरवा के,
देवकी बहिनी ला सोनहा रथ मा बइठा के।
सोयम कंस बइठिस रथ ऊपर अमराये बर,
हाँसत मारे खुसी रास ला घोड़ा के घर ।ÓÓ
(9) जादू-टोना के गीत :
छत्तीसगढ़ अंचल में टोना-जादू आज भी दृष्टिगोचर होता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग टोना-जादू के नाम से भयभीत रहते हंै। रहस में श्रीकृष्ण के विरह में राधा मूर्छित होकर गिर पड़ती है, और गिरते समय सखियों से कहती है-सखियों ! मुझे काले साँप ने डस लिया है, देखों कहीं किसी की नजर मुझ पर न लग जाय। सखियाँ माता कीर्ति से जाकर कहती है-''याको कारो डसो री माई।
कहत सखी सब आपस माहीं,
देखत नीको आई।
भई बिकल बन सुधि कछु नाहीं,
कहा भयो कछु जान न जाई।
देह गेह कर नेह भलायो,
याको कारो कुंवर कन्हाई।
हरि मुसक्यात विषम बिष डारै ,
हमहँू पर फ ँूक चलाई।
10) चकई :
भौंरा खेलना-ग्रामीण अचंल में भौंरे का खेल आज भी बहु प्रचलित है। लोकनाट्य रहस में भी इसका निर्वाह हुआ है। मैया यशोदा बाल-कृष्ण को चकई-भौंरा लेकर देती है। तब श्री कृष्ण सब सखाओं के साथ मिलकर भौंरा खेलते हैं-
''खेलत कान्ह भँवर चक डोरी।
कांहू सो हँसि बोलहि कान्हा,
काहू सो मुख मोरी।
संग सखा मिलि खेलत कान्हा,
लेकर ब्रज की खोरी।
लै आये हँसि श्याम तुरूतहि,
बहुत रंगन की डोरी।ÓÓ
(11) बियारी गीत :
सब सखियाँ मिलकर भगवान श्री कृष्ण को भोजन खिलाने के लिए अपने -अपने घर से व्यंजन बनाकर ले जाती हैं और खाना खिलाती हैं। मैया यशोदा भी आनंद के साथ खाना खिलाती है-''आज ललन करत बियारी,
करत बियारी श्री गिरधारी।
जेवन बइठे मदन गोपाल,
हुलसि-हुलसि परसैं महतारी।
सोने की थारी गंगाजल झारी,
निरखि-निरखि हरषत महवारी।
खाजा-खुरमा सुघर-जलेबी।
सीरा पुरी सरस सोंहारी।
भाँति-भाँति के बन अथाना,
नाना भाँति की बनी तरकारी।ÓÓ
(12) गाली :
भगवान श्री कृष्ण को भोजन खिलाने के पश्वात् सब सखियाँ भगवान को गालियाँ देती हंै। इस गीत में श्रीकृष्ण की बहन, उसकी फूफू आदि को भी समेटकर गाली गाई जाती है, यथा-''गारी गावे सकल ब्रजनारी, सुनिये हो घनश्याम
गोरे नंद यशोदा गोरी, गोरे बरण बलराम।
कैसे तुम भये कारे मोहन, प्रगटे नंद के धाम।
बहन तुम्हारी रानी सुभद्रा, जानत सकल जहान।
सो भागी अर्जुन के संग में ,डूबेउ कुल के नाम।
धरणी भार उतारण कारण, प्रकट भये ब्रज धाम।ÓÓ
इस प्रकार की गाली मे अभद्रता न होकर प्रेमभाव छिपा है, ये सखियों की मंगल गाली है।
(13) कृष्ण विदाई के गीत :
भगवान श्रीकृष्ण को मथुरापुरी भेजते समय मैया यशोदा पथिक से कहती है-''संदेशों देकी सो कहयो।
हँू तो दासी तिहारे सूत की, सूरत करत रहियो।ÓÓ
(14) मृत्यु के गीत :
गीता के अनुसार वस्तुत: मृत्यु मात्र शरीर बदलते की प्रक्रिया है।''मृ'' धातु में 'ल्यूकÓ प्रत्यय लगाकर 'मृत्युÓशब्द बनता है जिसका अर्थ है- मरण। आत्मा एक शरीर से निकलकर अपने प्रियतम मरमात्मा से मिलने जाती है। संसार से उसकी विदाई का अत्यन्त करूण एंव मार्मिक चित्रण मिलता है, किन्तु जाने वाले को तो परमात्मा प्रियतम से साक्षात्कार होता है, इसलिए संसाररूपी नैहर को छोडऩे की व्यवस्था उसे छू भी नहीं पाती। छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य रहस में पूतना की मृत्यु पर बाल-सखाओं द्वारा इस प्रकार के गीत गाये जाते हैं-''मर गे पुतना नारी रे।
तोर मरे के बेरीया मा रहितेन,
तोर मँुह मा पानी डारतेंन,
आज्ञा लेकर कंसराय के गोकुल मा छलठानी रे। '' कवि कपिलनाथ कश्यप पूतना वध को इस प्रकार व्यक्त करते हैं-
''दूध पियत पीरा के मारे, होगे नियट बिहाल।
संग मा लेके बाल कृष्ण ला, उडि़स उहाँ ले व्याकुल होके।
हाय-हाय करिस गर्जना, गिरते भुईयाँ पाँपिन मरगे।ÓÓ
ऋतुओं के गीत
(1) वर्षा ऋतु के गीत :
वर्षा ऋतु गीतों की ऋतु है। पावस के गीत लगभग चार महीने तक गाये जाते हैं किन्तु इनमें सावन सबसे अधिक वर्षा की प्रतीक है। सावन की ऋतु में राधा अपनी सखी से कहती है, कि सखी! वर्षा ऋतु का आगमन हो गया है, किन्तु अभी तक वो संावला-कन्हैया नहीं आया-''सावन की ऋतु आई री सजनियाँ,
कान्हा घर नहीं आये। भादो भोरवा बोल रहा है,
मनवा मोरा रो- रो रहा है। नाहक प्रित लगाए।।ÓÓ
(2) बारहमासा :
जैसा कि नाम से स्पष्ट है 'बारहमासाÓ नामक गीत में बारहों महीने के गीत का बड़ा रूचिकर वर्णन होता है। ऋतु गीतों मे यह बड़ा लोक प्रिय है। ये गीत वर्षा ऋतु से प्रारंभ होकर ज्येष्ठ मास तक गाया जाता है।
(3) झूला गीत :
बारह मासों के मासक्रम को कोई नियम नहीं है। यह वर्णन चैत से आरंभ कर के फागुन में भी समाप्त किया जा सकता है।
भादों में तीज तक हिंडोला चलता है तथा गीत गाये जाते हैं इस प्रकार के गीत विशेष रूप से झूले पर ही बैठकर गाये जाते हं। लोकनाट्य रहस में भी इस प्रकार के गीत का प्रचलन है यथा-''झूला-झूले राधिका प्यारी
संग में कृष्ण मुरारी ना।
सोने के पलना रेशम के डोरी,
कदम के डारी ना।
साभार रउताही 2014
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