Thursday, 30 October 2014

उज्जर देवारी तिहार अऊ राऊत नाचा

किसान अऊ अन्न : देवारी तिहार के नाँव आते च सुरता आये बर लगथे उमंग, जोश, नवा जिन्गी के रद्दा देखइया तिहार के। चारो कोती एक बढिय़ा वातावरण बन जाथे। सबो के चेहरा म गोंदा फूल फूलगे अइसन लागथे। घरो-घर के दूवारी अंगना म बइठे नानकुन लइका अऊ डोकरी दाई काली अवइया आनंद के सुरता करत मुस्कुरावत हावे। गांव-गांव, सहर-सहर, जम्मो जगा के मकान, घर-कुरिया म अपन-अपन हैसियत ले रंग-रोगन किये जाथे। चारों कोती अइसने चमक-दमक ल देख के अइसन लागथे, आज धरती म सरग उतर आय हावे। येही च अइसन तिहार आय जौन के चार महीना ले अगोरा करे जाथे। बरसात के आखिरी भादो महीनो हाथे येखर बाद मौसम ह अपन रंग-ढंग बदले बर लागथे। का लइका, का जवान, का सियान, सब कार्तिक महीना ले अपन-अपन जिन्गी म नवा-नवा सृजन करे बर धर लेथें। भविष्य बर बिचार बदलथे। क्वारं महीना के घाम जादा चरचराथे, अऊ खेत म निंदा गडिय़ावन किसान निहरे रहिथे। ये बेरा किसान अपन खेती खार के मया म बूड़े रहिथे। किसान अपन चुहत पसीना ल खेत के पानी संग मिलाथे तब धान के नान्हे पौधा आनंदित होके लहलहाय बर धरथे, अऊ कंसा लेथे। एक ठन पौधा के चार-पांच कँसा हो जाथे। ओहा किसान के आभार मानथे। किसान अपन मेहनत ल जानके, धनहा के धान के खुसी ल मान के अपन भाग सहराथे। जिन्गी के पल-पल लोकगीत म संवर जाथे। खेत के मेड़ म चोंगी पियत गाये बर धर लेथे-
'कुंवार गइस, कातिक आगे, बादर निच्चट फरियागे,
देख देवारी लक्ठागे, धान लुये के दिन आगे।Ó
अन्न माता के आनंद : दशहरा अऊ सरद पुन्नी माने के बाद धान मोटियारी ले अधेर हो जाथे। ओहा अपन घेरा च भर म हवा के संग झूम-झूम के मानो नाचे बर धर लेथे। खेत के धान किसान संग बात करथे- 'बाबू, हमन ल अब हमर मइके में लेवा के कब लेके जाहू। अब तो चुंदी पाकगे, हाथ-गोड़ पडऱागे।Ó किसान ह मुचमुचाके कहिथे- 'थोरिक दम धरव माता, ये दे देवारी तिहार के करत हावंव अगोरा, फांफा, माहू दिया के बाती के आंच म सब जर जाही, तब राऊत मन दोहा पारही, बियारा के खुरदई कराके बरोबर करके ओला गोबर म लिप के तोर ठौर ल सुग्घर बना डारे हन, तोर अगवानी म लोग लइका संग मिलके आरती सजाबो, फूल पान सकेल के तोर पंवरी म चढ़ाबो, अन्न माता, हमर घर म जब होही तुंहर आना, तभे तो हमर भरही खजाना, हमर खुलही भाग, कर्जा-बोड़ी ल छूट के अपन भाग ल सहराबो, बारहो महीना के कमई तभे सफल होही। ओखरे खातिर देवारी तिहार के करत हवन अगोरा। हांसत धान के बाली ह किसान के बात सुनके गौर करत केहे लागिस- 'भइया किसनहा, रोज सुकुवा उगत उठथस तैं बिहनिहा, तोरे मिहनत म तो मोर बांचे हावे जिन्गानी, तोरे उज्जर मन ले बने हावे मोर चिन्हारी। तोरे पसीना मोर तन हरियाय हे, तभे तो तोर कोठार म मोर मन भाय हे। बारहो महीना खटावत रहिथस तन ला, खाये पीये के सुध नइ रहय तभो मनावत रहिथस मन ला, थोरहे दिन अऊ होही कस्ट सहना, ये हा कोनो चिंता के बात नइये, इही हावे मोर कहना, आवन दे देवारी, मना ले भइया तिहार, परन दे राऊत के दोहा, गांव म रहिके सबला कर जोहार।Ó किसान कथे- 'तै बने केहे अन्नमाता, जइसन तुंहर बिचार, ओला लगाहूं माथा, रात दिन तोरे गावत रहिथंव गाथा, मैं बिस्वास के कोड़त हावंव कोर, हाथ के मिहनत मजबूत हावय मोर, माता रात-दिन करते रहिथंव तोरे शोर।Ó
सुरहोती अऊ गौरा-गौरी: वास्तव में देवारी अइसन तिहार आय, जेमा अन्न गऊ गौरा-गौरी के होथे गोहार, राऊत मन इन सबके करथें जोहार। सुरहोती के दिन अन्नमाता लक्ष्मी के होथे पूजा। फूल, पान, मिठाई, नवा कपड़ा के करथे माता बर बिछौना, तन समर्पित, मन अर्पित कर उजराथें घर के कोना-कोना, घर भर के लोगन करथें मिलके आरती, माता के चरन म नवाथे माथ बेटी भारती, फोरत फटाका मजा उड़वाय, घर-घर, द्वार-द्वार माटी के दीया बारके अंचरा सजावय, जगमग-जगमग जोत जलाके पर्वा म मढ़ावय, फराक नवा पहिरे चुनमुन मुस्कावय, खेती खार लगय चकाचक, माता अन्नपूर्णा के आसन ममहावय। रतिहाकुन फेर ओ बेरा आथे जिहां गांव के बीचो-बीच गौरा चौंरा म गौरा-गौरी के स्थापना करे जाथे। ओ समे कलसा गीत गूंजत रहिथे-
'करसा सिंगारत बहिनी रिगबिग सिगबिग,
करसा सिंगारत बहिनी बड़ निक लागे,
बहिनी सिंगारत बड़ सुख लागे भइया।
गौरा-गौरी के जुलूस : गांव के हर घर ले कलसा पूजा करके ओमा दीया बार के उही गौरा-गौरी के चौरा म लाये जाथे। गौरा-गौरी के जुलूस आगू चलथे, पाछू-पाछू घर-घर ले आये कलसा चलथे। गांव भर के कलसा ऊपर माटी दीया के ज्योत जलत रहिथे। ओ समे अइसे लागथे जानो मानो गंगान में चमकत चंदइनी-सुकुवा मन धरती म आ गे हावे। ये जुलूस  मं गांव के सब मनखे मन सामिल रहिथें। उंकर मन म भारी उछाह मंगल बने रहिथे। माइ लोगन मन गौरी माता के रुप में चुंदी छरिया के गौरा-गौरी के धुन में बाजत बाजा अऊ गीत के संग डड़इया चढ़के नाचत-गावत चलथें। वो बेरा के वातावरण देखे के लाइक रहिथे। नवजवान लड़का मन देवता बनके आगू-आगू झूपत रहिथे। ओ बेरा बर कासी डोरी के बने सांकड़ रखाय रहिथे। दूसर जवान हर उंकर हाथ-पाँव म ऊही सांकड़ से सड़ाक-सड़ाक सोंट थे। ओला सांकड़ लेना केहे जाथे। अइसन खेल-खेलत रतिहा पहा जाथे। येखर पाय के पता घला चल नी पाय कि बिहनिया कब होगे। गौरा चौरा म आये के बाद, गौरा-गौरी ल पहिली मढ़ाये जाथे। ओखर चारो कोती घर-घर ले आये कलसा मन ल ओरी ओर रखे जाथे। गांव के बैगा अऊ माइलोगन मन सबके पूजा करथें। एक बात के जिकर करना जरुरी हो जाथे कि गौरा-गौरी ल कइसे बनाय जाथे, अऊ ओला कइसे सजावट करे जाथे। वास्तव में गौरा-गौरी भगवान भोले शंकर अऊ माता पार्वती के मूर्ति होथे। गौरा-गौरी बनाना अऊ पूजा, वास्तव में ये संसार के बनइया आदि देव शंकर जी हरे, येखर पाय के उंकरे पूजा-पाठ करे जाथे। गौरा-गौरी दू ठन लकड़ी के पीढ़ा में माटी के मूर्ति बनाके रखे जाथे। मूर्ति पीढ़ा के बीच में स्थापित रहिथे। पीढ़ा के चारों कोना म माटी के खम्भा बनाये जाथे। उंकर आधार बनाय बर भरुहा काड़ी बांस के कमचील के उपयोग करे जाथे। ओखर आधार ले के माटी के खम्भा खड़ा करे जाथे। चारो खम्भा ल काड़ी से जोड़ के मजबूती दिये जाथे। ये खम्भा मन ला चाउंर, धान ल रंगा के कलाकारी करके सुन्दर रुप दिये जाथे। येखर ऊपर म दीया मढ़ाये जाथे। चारो खम्भा म दीया जलाये जाथे। गौरा-गौरी दूनो झन बन अलग-अलग पीढ़ा में मूर्ति स्थापित करे जाथे। मूर्ति बनाये बर पहिली माटी लाय बर जाथे। माटी लान के ओकर पूजा किये जाथे। माटी म पोनी अऊ राखड़ डाल के ओला मुलायम किये जाथे, जेकर सेती ओहा नई चटके। गौरा ल नंदी में बइठारे जाथे। गौरी माता ल कछुआ में बइठारे जाथे। गौरा-गौरी के हर प्रकार ले सिंगार करे जाथे। गौरा भगवान तिरसूल धरे रहिथे। ओकर पारम्परिक पहनावा करे जाथे। दोनों पीढ़ी के सवारी ल सिलियारी, धान के बाली, मेमरी के डारा लगा के जंगल असन सजाये जाथे। कल्पना करे जा सकथे गौरा-गौरी कैलास पहाड़ ले उतर के धरती म आ गे हावे। दूनो पीढ़ा ल लड़का अऊ लड़की मन मुड़ म बोह के चलथें। कुल मिलाके सुरहोती के रतिहा ले बिहिनिया तक लोगन मन म भारी उमंग बने रहिथे। ओ समे लोकगीत माई लोगन मन लोकधुन म गाये लगथे-
'धान के भूसा समुन्दर के पानी, गौरी ह साने माटी,
धनि-धनि बइला हो, धनि हो गोसइया,
हो काकर बइला तो आय।Ó
गौरा-गौरी बने के बाद गौरा-गौरी के
पूजा करत धानी उंकर सम्मान म धला
लोकगीत गाये जाथे-
'एक पतरी रइनी, राय रतनपुरि
दुर्गा देवी, तोरे सीतल छांव,
चौंकी चन्दन, पिढ़ली मढ़ाके,
गौरी के होथे मान।Ó
सब देवता मन ल मान देवत ओमन ल पूजा ठौर म आये के नेवता दिये जाथे। ओ समे लोकगीत फूट पड़थे-
'बारे डड़इया मोर बड़ रंगरेली, चढ़े लीमन के डार,
लिमुआ के डारा टूटि-टूटि जइहे, तिरनी जाही छरियाय,
कोन सकेले मूठ म तिरनी, कोन सकेले तोर केंस,
भौजी सकेले तोर मूठ म तिरनी, भइया सकेले केंस।Ó
येखर बाद बिहिनिया के उत्सव के आखिरी बेरा म गौरा-गौरी ल सोय बर बिनती किये जाथे ओ बेरा म गांव के लोक गायिका ह गा उठथे-
'गौरी सुते, गौरा सुते, सुते सहर के लोग,
बइगा सुते, बैगिन सुते, सुते जगइया लोग,
गौटिया सुते, गौटिया सुते, सुते मुखिया लोग,
बाजा सुते, बजइया सुते, सुते देखइया लोग,
गौरी सुते, गौरा सुते, सुतन चले सब लोग।Ó
गौरा-गौरी के बिदाई : ये लोकगीत के गुंजार के बीच देवारी तिहार के दिन खरखा उसलत ले गौरा गौरी के मूर्ति ल बाजा गाजा के साथ तरिया म विसर्जन कर दिए जाये। येमा को नो प्रकार ले संदेह नइये कि ये लोकगीत लोगन मन मा आस्था अऊ विश्वास के संस्कार लगे हावे। जौन ह आदिकाल ले पारम्परिक रूप से चले आवत हावे। ये समे लोगन मन म भारी उछाह भरे रहिथे। अपन जिन्गी म आय दुख ल भुलाके एक जूट होके ये परब ल उत्साहपूर्वक सबो जुर मिलके मनाथे।
राऊत मन के तैयारी : गौरा-गौरी ल बिदा करे के बाद राऊत मन के कार्यक्रम चालू होथे। देवारी तिहार मनाय खातिर राऊत और रौताइन मन तन-मन-धन ले जुट जाथे। देवारी तिहार के दिन राऊत मन बिहिनिया नौ-दस बजे गरूआ उसलत समे उंकर जागरन के समे आये। देवारी तिहार बर राऊत मन ल बरदी चराय के, दूध दुहे ले छुट्टी मिले रहिथे। राऊत मन अपन घर म तेल पियाय लाठी रखे रहिथे। ओला साल भर म निकालथे। ये बेरा ओमन सिंगार नई करे रहंय, वो मन दोहा घला पारथे:-
''तेंदुसार के लाठी भइया, सेर-सेर घी खाय,
एके लाठी परे ले, पुरखा याद आय।
सादा सर्वदा रोजमर्रा के अंगरखा पहिरे दुनो हाथ म लाठी ले के, पगड़ी बांधे सब राऊत मन के घरो घर जाके ऊंकर घर के भीतर बिराजे देवता मन ल नेवते बर जाथें। उंकर बाजा-गाजा संग म रहिये। उहां जाके दूवारी म जाते च दोहा पारथे अऊ पर्वा म लाठी बरसाथें। देवारी तिहार म खपरा फोरना गरब के बात माने जाथे:-
''एक काछ काछैंव मइया, दूसर दियेंव मलाई,
तीसर कांछ काछेंव तो माता-पिता के दुहाई,
कलकत्ता के कालिका, पर्वत के किलकार,
जा दुस्मन ल चांट मइया, देहंव रकत के धार।ÓÓ
सबो राऊत मन के घर के देवता धामी ल नेवते के बाद गांव के जाने-माने परमुख मनखे मन के घर जाके ओमन ल घला देवारी तिहार के गोवर्धन खुंदाय के परब म सामिल होय खातिर नेवता देथें। रौताइन मन मंझनिया ले गोबर्धन खुंदाय के तैयारी करथें।
गोबर के गोवर्धन पहाड़ बनाके, गोबरे के गौरा-गौरी बनाथे। ओ जगा ल ठाकुर देव कहिथें। उहां गोवर्धन पहाड़ म सिलियारी मेमरी धान के बाली ल पौधा बनाके खोंचथे। उहें धजा, नारियल, बंदन, दुबी रखथे। फूल पान के साथे-साथ सुपारी घला चढ़ाके गोवर्धन पर्वत बनाके किसन-कन्हैया के पूजा-आरती करथे।
राऊत मन के सिंगार : नेवता नेवते के बाद राऊत मन अपन-अपन घर लहुटथे, अऊ अपन सिंगार करथें। सबले पहिली ओमन नवा धोती या पंछा अलग ढंंग ले पहिनथें। धोती के एक भाग ल कनिहा म अइसे लपेट के गांव बांधथे, जेकर से साधारण रूप ले छूट झन जाय। धोती के दूसर भाग के तोनगी कसथे। तोनगी ल अइंठ के करधन म फंसाके कनिहा में अइसे खोंचथे जौन ह बिना निकाले नई छूट सके। ओमन अंगरखा पहिनथे, जौन ह रंग-बिरंगी अऊ चमकदार होथे। चमकदार कपड़ा पहिरना जादा पसन्द करथें। बहुत झन राऊत मन कोसाही या अंडी के कुरता सिलवा के पहिनथें। ओ कुरता के ऊपर अइसन सलूखा पहिनथें जेकर पहिचान अलग होथे। सलूखा के ऊपर म कौड़ी व मंजूर पाख के बनाये साज पहिनथें, जौन उंकर चिन्हारी बनथे। आंखी म काजर आंजे, मुंह म करताल चुपरे रहिंथे। ओ दिन ओमन दाढ़ी बनाके मेंछा अन्टियाय रहिथें। मुड़ म पगड़ी विसेस रूप से रंगीन पंछा ल अंटिया के बांधे रहिथें। उंकर पगड़ी म रंगीन कागज ले बने फूल के कलगी लगे रहिथे। दूनो हाथ म करिया तेल चुपरे लाठी धर के अपर गोर्ररइयां अऊ देवता ल सुमर के बाहिर निकरथे। गांव के मुखिया राऊत मन पहली संभर के बाजा-गाजा के साथ दोहा पारत सबे राऊत मन घर दूसर घावं परघाय बर जायें। जेकर घर मुखिया मन जाथें, ओमन पर्वा ल पीटत खपरा फारत दोहा पारत हुंत कराथे। घर वाला राऊत ह पहिली च ले तैयार बइठे रहिथे। ओ समे ओ राऊत ह दोहा पारत काछन चाड़त अपन देवता म हुंम देके राऊत दल के स्वागत करत ओमा सामिल हो जाथे। सबे राऊत मन राऊत नाचा करत दोहा पारत बिधुन होके मस्ती म चलथें। ये बेरा उंकर नाचा देखे के लाइक रहिथे। इही ह तो हमर छत्तीसगढ़ के राऊत नाचा आय, जौन हमर सान आय। भगवान किसन कन्हैया गाय चरावत रहिस। गाय के सेवा करत उनला पुचकारत रहिस। येखर कारन ओकर नांव गोपाल परिस। ये राऊत मन उंखरे बंसज आय। येमन गोवर्धन खुंदात ले ओकर जय जयकार करथें। गाय गरू के संग रहत, उंकर सेवा करत पूरा जिन्गी बीत जाये। बात चले हे गऊ सेवा के, तो ये राऊत मन अपना बरदी के हर गाय बछरू के पहिचान रखथें। ओमन के अलग-अलग नांव ले पुकारथें। ओ गाय मन अपन राऊत ल पहिचानथें। जब राऊत ऊंकर नाव ले के बलाथे, तब अपन कान ल टेड़ के देखके अऊ ओकर नजीक आ जाथें। ओमन देख के रंभाये अऊ अपन राऊत के पुचकारे के आसा करथें। दूध दुहे बर जब राउत ह ओ घर म जाथे, तब ओकर आरो पाके बछरू अऊ गाय दुनों गजब खुस हो जाथें। गाय बछरू अऊ राऊत के बीच अइसे प्रेम के संबंध बन जाथे जौन कभू दूरिहा नई हो पाय। ओमन जब गाय ल सोहई बांधथे तेन समय के दोहा सुनके मन गदगद हो जाथे। वास्तव म केहे जाय कि आज के किसन कन्हैया इही राऊते च मन हंय। ये मन अपन ठाकुर मन के भारी मान रखथें। उंकर मया, दया अऊ सेवा च उंकर चिन्हारी आय। येखरे पाय के राऊत मन बर मोर मन म भारी सरधा हे, मान हे, आभार हे।
गोवर्धन खुदाना: जब राऊत मन सज संवर के पगड़ी बांधे मेछा अंटिया के दूनो हाथ म लाठी पकड के दोहा पारत नाचथें, तब अइसे लागथे आज गांव गली ह बिंदाबन बन गे हे। जिहां ग्वाल बाल मन हांसत गावत दोहा पारत, नाचा करत चलथे अऊ जोन धूर्रा उड़थे, अइसे लगथे मानो गोकुल के गली म ग्वाल बाल अऊ धेनु के खुर ले धुर्रा उड़त आवत हे। गली में आके दोहा पारत कहिथे:-
''ओहो, दसो अंगूठी धरी-धरे, ऊपर धरे पचासे,
तीन मूर्ति नेत्र हरे कि पंडित करे बिचारे।
बाजा के धुन आगू बढ़थे। सबो झन झमाझम पांव उठाके पांव म पहिरे घुंघरू बजाके नाचत जाथें। थोरकिन दूरिहा जाके दूसर राऊत ह दोहा पारथे:-
''ओहो, करकर-करकर कुकरा करय, फरफर-फरफर पांखी,
तरमर-तरमर झन करबे, बइरी तोला जमाहूं लाठी।ÓÓ
ये ग्वाल बाल संग गांव के जवान, सियान, बहू बेटी, माई सबो झन ये उमंग के साथी बनथे। आगू-आगू राऊत चले, मंझोत म बाजा-गाजा, पाछू-पाछू जनता चले लेवत उत्सव के मजा। इही बेरा राऊत मन मस्ती म दोहा पारके, लाठी लहरा के लोगन मन ल चकित कर देथे। सबो दोहा परइया राऊत ऊपर नजर दौड़ाथे:-
''रंग माते रंगीला, छापा माते गाय,
राऊत माते देवारी रे, देखत मन भर जाय।ÓÓ
अइसने गली-गली गिंजरत य टोली गोवर्धन खुंदाय के जगा ठाकुर देव के ठौर म पहुंचत बहुत बेरा हो जाथे। दिन बुड़ताही सबो झन पहुंच पाथे। ओही बेरा म खइरखा के गरूवा मन ल गोवर्धन ठाकुर के जगा सकेल के लाय जाथे। ओ बेरा गाय गरू मन आधा डर आधा बल करके मेछराय बर धर लेथे। जेती जगा पाथें, ओती दौड़े बर धर लेथें। उही बरदी के एक ठन बछरू ल पकड़ के गोवर्धन ठाकुर देवता के जगा लान के ओकर पूजा पाठ करथें। फेर ओला सिलियारी, मेमरी अऊ धान के बनाय सोहई ल पहिराथे अऊ बने गोबर के गोवर्धन पहाड़ के ऊपर ओला रेंगा के खुंदावथे अऊ राऊत मन ओ बेरा मार्मिक रूप ले अइसे दोहा पारथे कि ओ समे आम जानता के हिरदे गदगदायमान हो जाये:-
''बोकरा लेबे ते मेंदरा नाचन, लेबे रकत के धार,
मय तो जावत हंव मतराही मा, तोला लागे भार।ÓÓ
फेर बाजा बाजे बर लगथे। ओखर बाद सबो झन बछरू के खुंदाय गोवर्धन के गोबर लेके एक दूसर के माथ म गोबर के टीका लगाके अपन अपन नता के अनुसार अभिवादन करथें, गला लगाथें, पैर छूके परनाम करथें। ये दिन गांव के सब लोगन मन सबके टीका लगाथें। अपन जुन्ना मन मुटाव, बैरभाव ल भुलाके परेम से मिलथे। ओ दिन के भाईचारा एकता के परतीक आय। एक दूसर बर परेम के सागर उमड़े परथे। ये दिन जिन्गी जिये के नवा दिन होथे। ये देवारी तिहार एक-दूसर के सुख-दुख म साथ देय के संकलप के दिन आय। राऊत मन भगवान राधे-गोपाल ले बिनती करथें कि हमर गांव अइसने एकता के डोरी में बंधाय रहय। मुखिया राऊत ह आय सबो जनता जनार्दनके आभार मानत कहिथे-आप मन इहां आके हमर उछांह ल दुगुुना कर देव। ये गाँव के सबो सियान, माई, बहू, बेटी, लइका, पिचका सबला मोर जय जोहार। सब परिवार के उन्नत के भार आपे मन के हावे। येखर बर जौन बलिदान लगही हमर ये समाज देय बर सदा तैयार रही। येखर बाद दोहा पारथे:-
''हरी खाय खरी भइया, दूबर खाय मोटाय,
सब झन खांवव दूध भात, बइरी रहय मुरझाय।
येखर बाद देवारी के तिहार के समापन के बाद गाय मन सोहई बांधे के रिवाज रतिहा तक बाजा गाजा अऊ दोहा के साथ पूरा करथें। तब तक गांव म सोवा पर जाय रहिथे।
मातर मनाना : देवारी परब मनाय के बाद राऊत मन के खास तिहार बिहाने दिन मातर आथे। ये दिन गांव के सबे समाज के लोगन मन ल ये तिहार म आय बर राऊत मन के तरफ ले नेता दिये जाथे। गांव के खइरथा डाड़ जेला दईहान भी कहे जाथे, में ये तिहार के जबरदस्त कार्यक्रम के आयोजन राऊत समाज द्वारा किये जाथे। ये दिन उहां मेला लगे रहिथे। लोग मन परम्परागत ये तिहार देखे खातिर बिहिनिया आठ नौ बजे ले आय बर धर लेथें। राऊत मन बिसेस रूप से गांव के सब ठाकुर मन ल नेवता दिये बर घरो घर जाथें। अऊ मातर म आय बर बिनती करथें। मातर में गोड़ समाज के बनाय बैरक अऊ मड़ई देवता ल नरियर भेंट करके मातर म बिनती करके लाये जाथे। बैरक मड़ई पकड़ के लाने वाला बइगा या बैरक वाला होथे। बैरक सम्हालके मातर ठौर म लानथे। ओमन मड़ई, बैरक ल नाच नचावत लाथें। जेकर मजा जनता जनार्दन ल अबड़ बढिय़ा ढंग ले लेथें। दोपहर तक नेवता नेवतई म अऊ बेवस्था करई म समय निकर जाथे। दर्शक मन मेला दूसर काम में व्यस्त रहिथें। दूसर पहर में मंझनिया कुन से राऊत मन सबे देवता धामी करा जाके दोहा पारत नेवते बर जाथे। सबे राऊत मन घर-घर जाके बलाथे। ओ दिन सबे ठाकुन मन घर ले पूरा बरवाही मंाग के दूध इकट्ठा करथें। रौताइन मन खइरवा डांड़ आके देवता धामी के पूजा पाठ करथे। सबे राऊत मन के घर के देवता मन ल घला नेवत के लाय जाथे। मातर परब म गांव भर के जनता-जनार्दन तो आबे च करथें, आस-पास के गांव के रहइया मन घला आथें। बैरक या मड़ई पकडऩे वाला मन मातर ठौर खइरखा डाड़ म आके मड़ई दौड़ करथे, बैगा अपन अनुसार ओला दौड़े पर दिसा बताथे। मंतर पढ़े के नाटक करके कार्यक्रम ल रोचक बना देथे। कार्यक्रम के आयोजन एकदम खुले जगा करे जाथे। लाठी चलाय के कमाल दिखाय जाथे। अपन-अपन कला के प्रदर्शन कलाकार मन करथें। अऊ जनता के मनोरंजन करथें। कुस्ती, लाठी लेझिम के अचरज भरे कतको कमाल होथें। आखिर म पूरा गांव के लोगन मन ल खीर खाये बर दिये जाथे। आये जनता के अभिनंदन करथें।
ठाकुर जोहारना : देवारी अऊ मातर परब ल निपटाय के बाद पारम्परिक कार्यक्रम में राऊत नाचा के माध्यम ले ठाकुर जोहारे के बुता करथें। सज-धज के दूनो हाथ म लाठी लेके, नाचत, दोहा पारत घर-घर ठाकुर जोहारे बर जाथें। ये बात के उल्लेख करना जरूरी हो जाथे के ओ बेरा ओमन देवारी अऊ मातर तिहार जइसन पूरा सिंगार के साथ ताल-लय के साथ बहुते बढिय़ा ढंग ले रोचक ढंग ले झूमत, नाचत ठाकुर जोहारे के काम करथें। वास्तव में ये कहना गलत नई होही कि राऊत मन हमर संस्कृति, परम्परा ल बचाय रखे हावे। राऊत मन के ये कार्यक्रम ल देखे बर लोगन मन म भारी उत्साह बने रहिथे। उंकर काछन चढऩा अऊ देवता धामी म हूंम धूप दे के धर्म के प्रति आस्था रखना ही संस्कृति ल बचाय हावे। अपन ले बड़का मन के कइसे अभिवादन किये जाथे। ये बात उंकर ले सीख मिलथे। ठाकुर जोहारे के समय डरौठी में जाके लाठी ल जमीन पटकत कथे-ओहो। अऊ दोहा पारथे। आखिरी म ऊंकर तरफ ले ठाकुर मन के प्रति आभार व्यक्त किये जाथें। ठाकुर जोहारे के समे राग से दोहा पारथे, जौन हिरदे ल छूने वाला होथे:-
 ''ठाकुर जोहारे ल आयेन संगी, खायेन पान सुपारी,
रंगमहल म बइठव मालिक, राम रमऊवा लेव हमारी,
जइसन मालिक लियेन-दियेन तैसे के देबोन आसिसे,
रंगमहल म बइठव मालिक, तुम जीवव लाख बरिसे।
अइसन प्रकार ले देवारी तिहार किसान, अन्न, मान-सम्मान, ईमानदार, मेहनत के प्रति आस्था आय। राऊत मन के कला-संस्कृति अऊ संस्कार के बार-बार नमन हे।
साभार रउताही 2014

छत्तीसगढ़ का अनूठा लोकगीत बाँस-गीत

बाँस गीत छत्तीसगढ़ का बहु प्रचलित लोकगीत है। एक तरह से यह यादव समाज की निजी धरोहर है, क्योंकि इस विधा में यादव बंधु ही पारंगत होते हैं। यादव मूलत: पशु पालक होते हैं, वैदिक काल से लेकर आज पर्यन्त तक अधिकांश यादवों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन ही है। ये अपने पशुओं को चराने के लिए जंगलों में जाते थे और वहीं निवास करते थे, जाहिर है जंगलों में मनोरंजन का कोई साधन नहीं होने के कारण मन-बहलाव के लिए प्राकृतिक संसाधनों से युक्त इस विधा का जन्म हुआ होगा।
सर्वप्रथम बाँस-गीत में वादन यंत्र के रुप में प्रयुक्त बाँस की संरचना का विश्लेषण करते हैं, जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है इस लोकगीत का नाम बाँस-गीत है अर्थात इसमें बाँस और गीत दोनों सम्मिलित हैं। बाँस बजाया जाता है, शंख की तरह फूंककर बाँस बजाने वाले को बँसकहार  की संज्ञा दी जाती है और समाज में इनका विशिष्ट स्थान होता है। बँसकहार बाँस का मर्मज्ञ होता है, वह जंगल या गाँव से जहाँ बाँस का भीरा उपलब्ध हो से बाँस जो न तो ज्यादा मोटा होता है न पतला और आगे की ओर जरा सा मुड़ा हुआ होता है जिसे स्थानीय भाषा में ठेडग़ी बाँस की संज्ञा दी जाती है का लगभग तीन फीट लंबा टुकड़ा आरी से काटकर लाया जाता है। हालांकि बाँस पोला होता है लेकिन उसमें गाँठ होते हैं जिस लोहे की सरिया को गर्म कर भेदा जाता है ताकि स्वर आसानी से पार हो सके तत्पश्चात लगभग छ: इंच की दूरी में एक बड़ा छेद बनाया जाता है जिसे ब्रह्मरंध कहा जाता है इसे मोम (मैंद) लगाकर दो भागों में विभक्त किया जाता है तथा तालपत्र से आधा आच्छादित किया जाता है ताकि विशेष स्वर स्फुटन हो। बाँस के मध्य में क्रमश: चार छिद्र किये जाते हैं आखिरी छिद्र थोड़ी बुजुर्गों के कथनानुसार इसे धर्म, अर्थ काम एवं मोक्ष का परिचायक बताया गया है और इस तरह शुरु होता है नाद ब्रह्म को साधने का उपक्रम।
बाँस गीत में मुख्यत: चार लोगों की भूमिका होती प्रथम बाँस को बजाने वाला बँसकहार दूसरा गीत गाने वाला गायक जिसे गीत गायन कहा जाता है तीसरा गायक का साथ देने वाला रागी जो गायक के स्वर से स्वर मिलाता है तथा चौथा गीत की समाप्ति पर रामजी रामजी का उद्घोष करने वाला जिसे टेहीकार कहा जाता है। टेहीकार विशेष गुण और स्वर प्रतिभा संपन्न व्यक्ति होता है जो लोकोक्ति एवं मुहावरों तथा स्वरचित दोहों को पिरोकर श्रोताओं को मुग्ध कर बांधने का कार्य करता है। वैसे तो बाँस-गीत परिणयोत्सव, मांगलिक पर्व पर आयोजित होते हैं किन्तु यह एक ऐसा लोकगीत है जो अधिकांश शोकमय वातावरण दशगात्र एवं तेरहवीं के समय भी आयोजित होते हैं। इसका मनोवैज्ञानिक तथ्य है जो परिवार शोक संतप्त होता है इन गीतों मेंं समाहित आध्यात्मिक एवं उपदेशात्मक तथ्यों के द्वारा उनके जनजीवन को सामान्य बनाने का अभीष्ट कार्य संपन्न किया जाता है।
बाँस गीत में छत्तीसगढ़ के जनजीवन से संबंधित गीत, यादव वीरों की गाथा, रामायण के दोहे, कबीर के दोहे तथा आध्यात्मिक गीतों का समावेश होता है, इन गीतों में लोकभाषा में गूढ़ रहस्यों का भी प्रतिपादन किया जाता है जो विद्वानों के लिए भी आश्चर्य का विषय प्रस्तुत करती है। बाँस गीत मात्र लोकगीत ही नहीं अपितु हमारे सरल, सहज, सादगी पूर्ण संस्कार का भी द्योतक है, इसके श्रोताओं में महिलाएं, बच्चे, पुरुष सभी होते हैं।
बाँस गीत के आयोजन में किसी विशेष प्रयास या आर्थिक प्रयोजनों की आवश्यकता नहीं होती एक दरी बिछाकर बाँस-गीत के कलाकारों को सम्मानपूर्वक विराजित करा दिया जाता है और उनके सम्मुख श्रोतागणों को बिठा दिया जाता है और शुरु हो जाता है रसास्वादन का दौर। सर्वप्रथम गीतगायन द्वारा अपने ईष्ट देव एवं देवताओं का स्मरण किया जाता है ताकि उसके उत्तरदायित्व के निर्वहन में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो यथा:-
अंठे मा बइठै गुरु कंठा न तो, जिभिया मा गौरी गणेश।
ज्यों-ज्यों अक्षर भूल बिसरौ माता, भूले अक्षर देवे सम झाय।।
इसे सुमरनी कहते हैं तत्पश्चात गायक दोहों के माध्यम से अपने कुल गौरव का भी बखान करते हैं जैसे-
कऊने दियना तोरे दिन मा बरे, कउने दियना बरे रात
कऊने दियना घर अंगना मा बरे, कऊने दिया दरबार हो।।
सुरूज दियना तोरे दिन मा बरे, चंदा दियना बरे रात।
सैना दियना घर अंगना मा बरे, भाई दियना दरबार हो।
इसी प्रकार इन लोकगीतों में रामायण के प्रसंगों को भी रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है जैसे सीता हरण का प्रसंग ही ले लें जटायु सीता जी से पूछते हैं:
काखर हौ तुम धिया पतोहिया, काखर हौ भौजाई।
काखर हौ तुम प्रेम सुन्दरी, कऊन हरण लेई जाई।।
दशरथ के मैं धिया पतोहिया, लछमन के भौजाई।
रामचन्द्र के प्रेम सुन्दरी, रावण हर ले जाई।।
गीत का पद खत्म होते ही टेहीकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए टेही लगाता है रामजी-रामजी सत्य हे और हास्य उत्पन्न करने के लिए स्वरचित आशु कविता उद्धृत करता है।
इहाँ ले गयेन कुण्डा, सब लइका होवत रहंय मुण्डा
इहां ले गयेन दाबो, सब टुरी कहंय तुंहरे घर जाबो।
साधारण लोकगीतों के माध्यम से गूढ़ रहस्यों का प्रतिपादन भी गायकों की अपनी विशिष्टता होती है जिसकी बानगी देखिए-
केंवट घर के बेंवट लइका, घन के गांथय जाल।
दहरा के मछरी थर-थर कांपय, चिंगरा टोरय जाल।।
अर्थात् परब्रह्मा रूपी केंवट के बच्चे अंशावतारी देवों के द्वारा मायारूपी घना जाल बुना जाता है जिसको देखकर गहरे मोह रुपी संसार में रहने वाला जीव भय से कांपता है लेकिन ज्ञानरुपी आरा का आलंबन करने वाला ज्ञानी इस माया रूपी जाल से सहज ही मुक्त हो जाता है। इसी तरह ढोला-मारु यादव वीर लाला छऊरा आदि की कथाओं को भी बाँसगीत के गायन में समाविष्ट किया जाता है। बाँस गीत सनातन है तथा छत्तीसगढ़ के संस्कारों का परिवाहक है लेकिन दुख है यह विलुप्तता के कगार पर है इसे पोषित और संरक्षित किये जाने की आवश्यकता है।
जय जोहार।
साभार रउताही 2014
 

आधुनिकता की चकाचौंध में दम तोड़ते सोहर गीत

आपसीपिरीत की डोर को थामे, पारिवारिक खट्टे-मिट्ठे अनुभवों को समेटे, शिशु के जन्म का आनंद बिखेरते सोहर गीत और ढोलक के थाप की गूंजती स्वर लहरियाँ वातावरण को अपनत्व के अहसास से सराबोर कर देती थी।
आज के बच्चे तो बच्चे युवा पीढ़ी भी इस बात से अनजान है कि ये 'सोहर गीतÓ क्या है? टी.वी. सिनेमा एवं भारत उत्सव जैसे छुटमुट आयोजनों के जरिये, विवाहगीत, लोकगीत, फाग गीत आदि तीज त्यौहारों के विशेष पारंपरिक गीतों के कैसेट  कभी कभार आ जाते हैं बाजारों में उन्हीं के माध्यम से इन्हें औपचारिक जानकारी मिल जाती है।
आज की दौड़ती भागती जिंदगी में न सौरगृह की परंपरा रही न सोहर गायन का रिवाज रहा। अब तो बस संतान पैदा होने की खुशी में यथाशक्ति पार्टी एवं उटपटांग पापुलर गाने कैसेटों के जरिये कानों में मिश्री घोलना तो दूर ध्वनि प्रदूषण फलाते, तनाव बढ़ाते हैं।
शिशु का जन्म पुरुष के पौरुष और नारी के नारीत्व को सार्थकता देने के साथ पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को आनंद आप्लावित करता है। शिशु का जन्म जीवन में नया आकर्षण भर देता है और उसी आकर्षण की अनुभूतियों को समेटे ये सोहर मंगल गीत, मातृत्व का अभिनंदन एवं नवागत के स्वागत की हर्षपूर्ण गीतमयी अभिव्यक्ति हैं।
शिशु के जन्म के दूसरे तीसरे दिन से लेकर छठीं और बरही (बारहवें दिन) तक इन गीतों का सिलसिला चलता रहता था। प्रमुख वाद्य ढोलक, मंजीरा तो होता ही था आनंदातिरेक में थाली, लोटा, चम्मच भी वाद्ययंत्र बन जाते हैं। इन गीतों में गर्भावस्था के लक्षण, पुत्र प्राप्ति के लिए किये गये विविध प्रयास, व्रत, उपवास, प्रसूता की लालसा मान, प्रसन्नता, नेग, ससुराल वालों की वधू के प्रति उपेक्षा का बदला, मायके वालों के प्रति सहज लगाव आदि भावनाएं मुखरित होती हैं।
उदा. गर्भ के लक्षणों का सुखद अहसास कराती सोहर की पंक्तियाँ-
हमका आवै ओकाई हमार जिया..
हमका भावै खटाई हमार जिया हमका आवै ओकाई
हमका न भावै मिठाई हमार जिया..
पुत्र प्राप्ति के लिए किये गये व्रत उपवास मनौतियां...
रहेंव मैं कतका उपास, जोरेंव दूनो हाथ हो
ललना ला पायेंव मैं आज, मोर मन हुलास हो...
आसन्न प्रसवा की तड़प और पारिवारिकजनों का अनुमान कि पुत्र होगा कि पुत्री इसी भाव की अभिव्यक्ति है इन पंक्तियों में
(1) पीरों पे पीर ओर जच्चा बेकरार है
कोई कहे लल्ली होगी कोई कहे लाल हैं
लाख मैने चाहा कि अम्मा को बुलाऊंगी
पर मैं क्या जानू ये कि सासु दौड़ आएगी
पीरों पे पीर...
(2) दरद उठती है कमरवा में न जाने लाल कब होंगे
पुत्र जन्म की खुशी और नेग, अलग अलग क्षेत्रों में अलग नेग चलता है-जिनमें  सास, ननद, जिठानी, देवर, भाई, पिता, ननदोई के मार्फत नवागत के साथ रिश्तों की सुदृढ़ नींव तो पड़ती ही है साथ ही माता बनी वधू की पूछ परख भी बढ़ती है उसे अधिकारों की सौगात मिलती है।
भाई के द्वारा बंदूक छुटाई, देवर द्वारा बंशी बजाई नेग, जिठानी द्वारा पिपरी पिसाई, जीजी द्वारा सोहार गवाई, ननद द्वारा काजर अंजाई, सासु द्वारा दैव पूजवाई, ससुर द्वारा नाम धराई का कार्य समारोह पूर्वक सम्पन्न होता है बदले में कोई हार चाहता है तो कोई कंगन कोई झुमके तो कोई करधनी इन्हीं क्रिया कलापों को गीतों में पिरोकर सोहर रचे जाते हैं-
ननदी बुलायेंव उहू नई आईस ननदी हमार का करिलेहब
बहिनी बला के कांके बड़ाबोन,
हम छबीली सबो के काम आबोन
ननदोई बलायेन उहू नहीं आईस
भाटो बलाके नरियर फोड़ाबोन
इसी तरह जेठानी के न आने पर बड़ी दीदी ने सोहर गीत गाया, ससुर के न आने पर पिता को बुलवाकर नामकरण करवाया। ये नेग छत्तीसगढ़ क्षेत्र में होते हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार में सासु द्वारा चरुवा चढ़ाई,
जिठानी द्वारा पिपरी पिसाई, ननद द्वारा कजरा अंजाई...
उदा. सीता के वन में लाल भये कुँवर कहैया कोऊ नहीं..
वहाँ अम्मा नहीं वहाँ सासु नहीं, चरुआ के चढ़ैया कोऊ नहीं...
वहाँ भैया नहीं वहां देवरा नहीं, बंशी के बजैया कोऊ नहीं...
सोहर गीतों में पारिवारिक खट्टे मीठे अनुभूतियों के अलावा कृष्ण राम, गणेश, जन्म के गीत भी गाये जाते हैं।
 साभार रउताही 2014











Tuesday, 21 October 2014

सम्बलपुरी लोकगीतों में सांस्कृतिक भाव स्पन्दन

लोकजीवन में लोकगीत, लोक कथा, लोक नृत्य, लोक संगीत, लोक नाट्य आदि लोक कलाओं का विशिष्ट महत्व है। इन्हीं लोक कलाओं को लेकर लोक जीवन सुशोभित हैं, लोक गीत लोक जीवन का कंठहार। प्रकृति की गोद में निरानन्द जीवन जीने वाले ग्रामीण-आदिवासी लोक मानस अनेक पर्वों, तीज त्यौहारों, मांगलिक उतसवों, जन्मोत्सव, संस्कारों, पूजा पाठ सरीखे सांस्कृतिक सरोकारो में संगीत गान करते हुए, नृत्य करते हुए ढोल-नगाड़े के ताल पर ताल मिलाकर झूमने लगते हैं, गीत संगीत के माध्यम से अपने देवी-देवताओं को संतुष्ट करके अपने कष्ट निवारण का उपाय भी करते हैं।
लोकगीत को परिभाषित करते हुए नरसिंह प्रसाद गुरू लिखते हैं: लोकगीत का तात्पर्य लोक मुख में प्रचलित गीत से है, शरीर के पौष्टिक खुराक के लिए भोजन जिस तरह आवश्यक है उसी तरह मन की स्फूर्ति के लिए संगीत अपरिहार्य है। मानसिक शान्ति तथा वेदना विलष्ट हृदय में उल्लास के संचार के लिए संगीत एक रामबाण है।0़़1
भारत वर्ष के पूर्वीतट पर बसा हुआ ओडि़शा प्रदेश अपनी संस्कृति और परंपरा के लिए विश्वविख्यात है। ओडिशा की संस्कृति जगन्नाथ संस्कृति है। वहाँ के जनमानस में महाप्रभु जगन्नाथ जी के प्रति अटूट आस्था परिपूरित है। जगन्नाथ जी की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है। बारह महीने में तेरह पर्व मनाने की सुन्दर परंपरा यहाँ प्रचलित है। उत्कलीय संस्कृति की महानता जाहिर करते हुए डॉ. मन्मथ कुमार प्रधान लिखते हैं:- ओडि़शा की संस्कृति जगन्नाथ संस्कृति हैं। प्रभु जगन्नाथ ओडि़शा जाति के राष्ट्रीय देवता है। जगन्नाथ जी के पास सभी धर्मों का समन्वय हैं, जगन्नाथ प्रभु की बारह महीने में तेरह यात्राओं के आधार ओडि़शा के तीज-त्यौहार मनाए जाते हैं। यहाँ की संस्कृति लोक संस्कृति पर पर्यवसित है, जिसके अन्तराल में लोक साहित्य लोक कला, लोक धर्म, लोक संगीत, लोक नृत्य, लोक नाट्य, लोक तन्त्र, लोकाचार सरीखे समाहित हैं।02
लोक गीतों में ग्रामीण जीवन के सुख-दुख, हर्ष विषाद, आशा-निराशा तथा जीवन दर्शन की स्वच्छ छवि प्रतिबिम्बित होती है, लोक गीतों में ग्रामीणों के सांस्कृतिक जीवन स्पन्दन मुखरित होते हैं, इसमें संगीत के नियम, अर्थ गाम्भीर्य का प्राधान्य भले ही न स्वाभाविक आत्मप्रकाश व सौन्दर्यबोध का सुन्दर रूपायन होता है, वह अति सहजता से मनुष्य हृदय को स्पर्श करता है, गाँव-परिवेश के सादगीमय जीवन जीनेवाले लोकमानस के हृदयोदगार करते लोक गीत व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को झंकृत करके रख देते हैं।
परिवेशगत भिन्नता तथा सामाजिक कार्यकलापों के आधार पर सम्बलपुरी लोक गीतों का अनेक रूपों में देखा जा सकता है। लोक गीत सामान्यत: लोकमुख से लोक मुख तक प्रसारित होता है। लोकगीत की प्राचीन परंपरा श्रबद्ध है। अशिक्षित अनपढ़ लोगों के जीवन स्पन्दन से जुड़े हुए ये गीत मौखिक रूप से एक-दूसरे से पासरित होकर उज्जीवित है। इसकी वाचिक मौखिक परंपरा इसे अभिनवत्व देती है।(वंश परंपरानुसार)लोक जीवन में पीढ़ी पर पीढ़ी महोत्सव तीज-त्यौहार, सामाजिक सांस्कृतिक अनुष्ठान आदि में प्रचलित यह लोक गीत एक गांव से दूसरे गांव तथा एक अंचल से दूसरे अंचल में संप्रसारित होती हैं।
पश्चिम ओडि़शा के सम्बलपुर, बरगढ़, झारससुगुड़ा, नलांगीर, रेढ़ाखोल, सुन्दरगढ़ तथा कलाहाण्डी जिलों में सम्बलपुरी लोकगीत प्रचलित  हैं। इन अंचलों के लोक जीवन में सम्बलपुरी भाषा में यह गीत गाया जाता हैं। ओडिय़ा भाषा की प्रमुख शाखा इस सम्बलपुरी भाषा में हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, लरिया तथा यहाँ की आदिवासी भाषाओं का प्रभाव पड़ा है। सम्बलपुरी संस्कृति छत्तीसगढ़ी, लरिया तथा आदिवासी संस्कृति का समाहार है। यह लोक गीत लोगों के हृदय का स्फुरण है। प्रकृति की गोद में निरानन्द जीवन-यापन करनेवाले प्रकृति की सन्तानों में अपनी लोक संस्कृति के प्रति अपार सम्मोहन है, जिसे लोग गीतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है सम्बलपुरी लोक गीतों में हलिया गीत, कुमारी गीत, विदाई गीत, विवाह गीत, नचनिया गीत, करमा गीत, डालखाई, रसरकेली, माइलाजढ़, झुमकुझुमा, धुमुरा, जाईफूल, ढाप गीत इत्यादि गीत प्रमुख हैं।
1. हलिया गीत (हलवाहा गीत):
गाँव देहात में लोक कृषिकार्य में खुद को नियोजित करते हैं। सालभर वहाँ खेतिहार-मजदूर खेतों में काम करते हुए दिखाई पड़ते हैं। चाहे पूस की रात की कपकंपाती ठंड हो या जेठ की दोपहरी की झुलसा देनेवाली धूप है किसान मजदूर खेत में डटे रहते हैं खेत में हल चलाते हुए हलवाहे या बैलगाड़ी हाँकते हुए गाड़ीवान हलिया गीत से वातावरण को मन्त्रमुगध कर देते हैं। पावस ऋतु की पहली बारिश जब धरती की व्यास बुझाने को तत्पर रहती है और मुसलाधार वर्षा से धरा-प्लावित होने लगती है, किसान खेत में बड़ी उमंग के साथ हल चलाते हुए यह गीत गाता है:- 
बएलारे........
ज्येष्ठ मासे हुए हो देव जे स्राहान
स्राहान सारिण शिरी भगवान...
आगे बलभद्र पद्येता भवानी
बिजे करिछन्ती जे तिनि भाईभउणी
हो.......तत तत तत तत् रे तत्।03
हलवाह भगवान जगन्नाथ की स्तुतिगान करता हुआ कहता है जेष्ठ महीने में भगवान देव स्नान करते हैं और अपना ब्रम्ह वेश धारण करते हैं। बलभद्र, जगन्नाथ और देवी सुभद्रा तीनों भाई-बहन मन्दिर(बड़ देऊल)में विराजमान हो रही हैं।
कुमारी गीत (कुँआरी गीत)
पश्चिम ओडि़शा के आदिवासी बहुल अंचलों में गाँव में कँवारी किशोरियाँ शाम को दलबद्ध होकर कुमारी गीत गाती हुई दिखाई पड़ती है। उनके समूह सुमधुर स्वर से ग्राम परिवेश छलकने लगता है। विशेषत: वसन्त और शरद ऋतु की चाँदनी रात में किशोरियों द्वारा यह गीत गान होता है और गाँव के सभी लोग इस नृत्य गीत का आनन्द लेते हैं। कुमारी गीत हुमो, बांगरी, कोकिल, छिलोलाई, सिपाईफूल के नाम से भी जाने जाते हैं, कुमारियों दो दल बन कर एक दूसरे की कमर पकड़ कर एक दूसरे के प्रति प्रश्नोत्तर करते हुए इस तरह गीत गाती है-
तुमर देश कि कि करमु
तुच्छाए गंजर गंजा
गंजार गंजाकु फूलबिछवा
नाक तले दण्डी गुणा
केते हलाऊछू नाकर गुणा
मो भाई कमानी सिना बइली रे
मो भाई कमानी सिनारे। 04
(तुम्हारे देश में जाकर क्या करेंगे, तुम सिर्फ बड़ी-बड़ी डिंगे हाँकती हो। तुम फूलों को सेज क्या बनाओगी। तुम्हारी नाक की बाली (नथनी) को कितना हिला रही हो, मेरे भाई की कमाई से यह बाली आई है।
(3) बिहा गीत, नाचुणियाँ गीत (विवाह गीत,
    नचनियाँ गीत)
ग्राम जीवन में मांगलिक उत्सव अति पवित्रता से मनाया जाता है। उनमें विवाह सम्बन्ध को लेकर धार्मिक विश्वास होता है कि यह भगवान द्वारा निर्धारित होता है। विवाह के अवसर पर पश्चिम ओडि़शा के गाँव में घरों में विवाह गीत सुनने को मिलता है। शादी के इस खुशी के अवसर पर घर के सभी युवक-युवती लड़की-लड़कियाँ यहाँ तक कि बूढ़े बुजुर्ग भी शामिल होकर विवाहोत्सव को आनन्द मुखर बना देते है। ढोल, शहनाई, तासा, निसान, टिमकिड़ी आदि देशी बाजे-गाजे के साथ यह गीत बहुत ही आकर्षक बन पड़ता है। इस अवसर पर बाहर से नचनियाँ भी बुलाए जाते हैं और उनके नृत्य गान का आनन्द पूरे गाँव के लोग लेते हैं-
साहाज पतर बेनी रसबती
साहाज पतर बेनी
काहीं गले तुमर दुई बहनी
सते बऊलेर खुसा थी रख महनी
तमर खुसा तले भमर बुले
भमर बुले त, खजा अछी बली नुरे ।  05
(युवक युवती के बीच गीत के माध्यम से खींचा-तानी हो रही है, युवक कह रहा है कि तुम्हारी चोटी साहाजा पत्तों से बनी है।  तुम्हारी दोनों बहनें कहां है। सचमुच तुम्हारे जुड़े में मोहनी लगी है। तुम्हारे जुड़े के नीचे भंवरा मँडरा रहा है। वह मोहनी रस का खजाना ढूंढ रहा है।)
4. रसरकेली, डालखाई माइलाजड़- ग्रामीण जीवन में आदिवासी समुदाय तथा सामान्य लोगों में वैवाहिक उत्सव या दशहरा पर्व के अवसर पर ये गीत गाये जाते हैं। ये गीत गाँव की युवतियों द्वारा परिवेषण होता है। युवतियाँ दल बद्ध होकर कमर लचकाते हुए नृत्य करते हुए ये गीत गाती हैं। नृत्य-गीत के साथ ढोल, निशान, शहनाई, टिमकिड़ी, नगाड़ा आदि अनेक बाजे-गाजे बजते हैं। रसकेली गीत दर्शकों-स्रोताओं के मन को रसासिक्त करता तो, माइलाजड़, उनके मन को भाव विहल कर देता है। डालखाई तथा झुमकझुमा गीत सुनते-सुनते दर्शकों-श्रोताओं की आँखों की नींद उड़ जाती है। गाँव की युवतियाँ सुमधुर स्वर में गाने लगती हैं- डाल खाई रे
बाटर खजुर बुट लम लम कँटा
शाशा घर में जिमि बोली साजिथिलि अँटा
माँ घर के जिमि बोली साजिथिलि केरी
पेररी ऊपरे नागर
सुना केरो केरी कि... डालखाई रे...06
5. सजनी गीत: सजनी गीत, दुला गीत, दुली गीत, जाई फुल आदि श्रृंगार धर्मी गीत हैं। इन गीतों में ग्राम जीवन के सुख-दुख, हँसी, रुलाई, आशा-आकांक्षा, अभाव- अनाटन आदि की हकीकत प्रतिबिम्बित होती है। गाँव की नारियाँ तेन्दूपत्ता तोड़ते-बांधते समय खेत में काम करते समय तथा बालू पत्थर, इंट का काम करते समय श्रम-समय की थकान मिटाने के लिए ये गीत गाया करती है। जिसमें श्रम-समय का बोझा उन्हें कमजोर नहीं कर पाता। इन गीतों में श्रृंगारिकता के साथ परिवेशजन्य दृश्य चित्रित होता है-
पतर बँधा-बाँधी जाएगी
पतर बन्धा ठाने भेटी पाएतीरे
धन, सुता, उलाउली देतीं सजनी रे...07
6. करमा गीत: सम्बलपुर अंचल के गाँवों में आदिवासी समुदाय के लोग करमा पर्व बड़ा ही उमंग से मनाते हैं। भादों के महीने में एकादशी के दिन करमासानी देवी की पूजा अर्चना की जाती है। गाँव के लोगों में करमासानी माता के प्रति अटूट आस्था रहती है। गाँव में शान्ति और खुशहाली बनाए रखने के लिए लोग 'करमासानीÓ से गुहार लगाते हैं। आदिवासी अन्यज रातभर सजधज कर शराब पीकर  'मान्दरÓ के ताल में ताल मिलाकर गीत गाकर, नाच कर मगन हो जाते हैं। युवक-युवतियाँ (चाँप) पाँव में घुंघरु बांध कर, गले में फूल माला धारण करके हत्ताकार होकर नाचते हैं। बीच में मान्दर बजाता हुआ मन्दरिया उन्हें नचाता है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए अंचलों में लरिया भाषा में लोग यह गीत गाते हैं।
'विपत्ति में कौन नया साथी रे भाई लछमन
विपत्ति में कौनो नहीं साथी
इक विपत्ति में राम और लछमन ला
लंका के रावन भाई सीताला चुराई भाई
विपत्ति कौन नया साथीÓ । (08)
रामायाण सीता हरण प्रसंग को करमासानी के सामने गाते हुए लोग भाव विभोर हो रहे हैं। विपत्ति में कौन नया साथी साथ दे रहा है। राम और लक्ष्मण जंगल में भटक रहे हैं। लंका पति रावण ने सीतामाता का हरण कर लिया है।
7. ढाप गीत : यह गीत विशेषत: कालाहण्डी, कोरापुट जिलों के आदिवासी गिरिजनों में गाये जाते हैं, चैत पर्व, फाल्गुन पर्व के विशेष मुहूर्तों में आदिवासी युवक-युवतियाँ पंक्तिबद्ध होकर ढोल-नगाड़े की ताल में ताल मिलाकर नृत्य गान करती हैं। रातभर चाँदनी रात के उजाले में जंगलों में गिरिजन इस गीत का आनंद लेते हैं। युवक-युवतियाँ, हाथ पकड़कर, कमर पकड़कर, कँधा पकड़कर, कमर झुका कर नाचती है और भाव विह्वल होकर गाने लगते हैं-
'जुहार गो माँ डुकरी बूढ़ी
वेश मुड़े तोर गुड़ी
तके अंगर रकत काढ़ी देविस
मके पद आसु जुड़ी जुड़ी
इरित सिरित केराण्ड माछर पित
गाँ गराम पति न बन्घिले किए गइबा
पालिया गीतÓ। (09)
ग्राम देवी को विनती करती हुई युवक-युवती ढाप गीत का मंगलाचरण करते हैं। ग्रामदेवी माँ  चौराहे पर तेरा मन्दिर है। आने अंगों से तुम्हें खून देंगे, हाथ जोड़कर तेरी वन्दना करेंगे। तुम हमारे गाँव की शोभा श्री हो गाँव की रक्षिका हो। पूरा गाँव तुम्हारी विनती करता है। तुम्हारी कृपा हम पर बनी रहे। ये लोक गीत अशिक्षित, अवहेलित, तिरस्कृत ग्रामीणों आदिवासियों के संगीतमुखर जीवन और सरल कलाप्रेम के जीवन्त दस्तावेज हैं। देश की उन्नत संस्कृति व कला का विकास परंपरा में ये लोक गीत पश्चिम ओडिशा के अप्रितम अवदान है। देश के संगीत कला प्रेमी व्यक्तियों की चेतनाशीलता, आन्तरिकता व शोधात्मक मनोवृत्ति के अभाव में ये लोकगीत समय अन्तराल में जंगली फूल की तरह जंगल में प्रस्फुटित होकर वहीं मुरझा जाएंगे, इसमें कोई शक नहीं। जरुरत है इन लोकगीतों को हमारे जीवन में सहेजने व गतिशील बनाने की। इन लोकगीतों में हमारी सांस्कृतिक भाव धाराएं प्रवाहित हैं। यदि हमें अपनी संस्कृति को जीवित रखना है, तो इन लोकगीतों को धरोहर के रुप में हमें सहेजना होगा।
साभार रउताही 2014