Tuesday, 19 February 2013

रावत नाच और उसका स्वरूप

रावतनाच- रावत नाच को राव नृत्य भी कहते हैं। इसकी व्युत्पत्ति राजपुत्र से हुई पौराणिक समय में या काल में यह नृत्य राजपुत्रों द्वारा किया जाता था यही शब्द परिवर्तित होकर राजपूत्र से राउत और अन्त में रावत का प्रयोग किया गया।
रावत लोग अपने को श्रीकृष्ण का वंशज मानते हंै तथा कृष्ण को अपना आराध्य देव, इसलिए जो कार्य कृष्ण किया करते थे अर्थात गाय चराना, बांसुरी बजाना, दूध, दही, माखन खाना तथा चुराना आदि उसी प्रकारके कार्य ये लोग भी करते हैं और अपने को यदुवंशी कहते हैं।
यादव सम्पूर्ण भारत देश में है तथा इन्हें लोग विभिन्न नाम से बुलाते हैं यादव, अहीर, ग्वाला, चरवाहा, बरदिहा (गायों को झुंड के झुंड लेकर जाने वाला) गहिरा, देसहा, पहटिया, ठेठवार आदि कहा जाता है। जातीय दृष्टि से रावत लोग उच्च माने जाते हैं तथा इनकी गणना सवर्णों में की जाती है तथा समाज में इन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। प्राय: इनके रंग और शरीर तथा हृष्ट-पुष्ट होने के कारण भी इन्हें लोग पसंद करते हैं और बहुत तीक्ष्ण बुद्धि होती है, ये चतुर होते हैं।
राउत नाच को कई नामों से पुकारते है नाचा, मड़ई, नाच आदि। राउत नाच कार्तिक मास के आसपास प्रारंभ होता है विशेषकर गोवर्धन पूजा से प्रारंभ होकर पन्द्रह या धीरे-धीरे महीना दिन तक चलता है। यादव लोग गांव या शहर सभी जगह अपना शौर्य प्रदर्शन कर नृत्य प्रस्तुत करते हंै।
कार्तिक महीना हिन्दुओं का सबसे उत्तम एवं पावन महीना माना जाता है। विशेष बात यह है कि कार्तिक में लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है ताकि धन-धान्य से घर भरा रहे, दूसरे दिन गोवर्धन अर्थात् कृष्ण की पूजा करते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ की सबसे छोटी उंगली जिसे कनिष्का कहते हैं पर उठाया था और सारे गांव वालों की रक्षा की और तीसरे दिन भाई दूज के दिन बहीन के घर जाकर तिलक  लगवाते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करके वह नृत्य करने के लिए प्रस्थान करता है।
इस आनन्द और उल्लास को व्यक्त करने के लिए राउत टोलियां घर-घर जाकर (अर्थात् राउत उसी घर में जाता है जिसकी गायों को दूहता या चराता है) मालिकों से मिलता है और अपनी रोजी-रोटी देने वाले पशुओं से मिलकर उनकी सेवा करता है अर्थात उन पशुओं के सींगों में तेल लगाता है फिर उनके गले में सुहई (माला) बांधता है और गाय के कोठा (पशु बांधने या रहने का स्थान) में जाकर पूजा करता है तथा पशुओं की साल भर सुरक्षा की कामना ईश्वर से करता है । सुहई एक प्रकार से पशुओं के लिए रक्षा कवच माना जाता है। इसके पीछे यह मान्यता है कि यह सुहई साल भर भूत-प्रेत, डायन आदि आसुरी शक्तियों से पशुओं की रक्षा करती है। गृह स्वामी इसके बदले में धान या रूपए देकर इन यादवों का उत्साह वर्धन करता है।
इन सारी रस्मों को पूरा करने के बाद रावतों की टोली आंगन में एकत्र होकर नृत्य प्रस्तुत करते हैं और दोहा पारते हैं-
'सबके लाठी रींगी-चींगी, मोर लाठी कुशवा।
धर बांध के डउकी लानेव, ओहू ल लेगे मुसवाÓ
इस प्रकार दोहा पारने के बाद हो- करके बाजा बजाते हुए नृत्य करते हंै और अंतिम दोहा कह कर आशीर्वाद देकर चले जाते हंै। प्रदाय अंतिम दोहा-
'जइसे मालिक दिहे-लिहे-तइसे देबो असीस हो।
धन दोगनि ले घर भरे, जियो लाख बरीस होÓ
अर्थात् जिस प्रकार आपने हमारा सम्मान करते हुए इच्छानुसार धन, रूपए आदि दिये वैसे ही ईश्वर आपको दे आपका घर सदा धन धान अर्थात सभी चीजों से भरा रहे, सुख-शांति ईश्वर आपको दे इस प्रकार आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
यह आशीष अक्सर दो पंक्तियों की कवितामय तुकबन्दी के रूप में होता है इसे दोहा पढऩा कहते हैं। ये दोहों अक्सर कबीर, तुलसी, रहीम, सूर या स्वयं के द्वारा बनाए गए दोहों को पढ़ते हैं यो बोलते हैं।
जिन दोहों का निर्माण यादव करते हैं उसमें सुख, दुख, समाज, परिस्थिति वर्तमान, भूत-भविष्य की स्थिति का वर्णन करते हंै पर आज आधुनिक युग में फिल्मी गानों पर भी दोहे तैयार किये जाते हैं। ज्यादातर दोहे श्रृंगारी बनाए जा रहे हैं। रावत लोग इतने उत्साह में रहते हैं कि रात भर नृत्य करते बीत जाता है और ये लोग थकते नहीं हंै कुछ-कुछ तो मदिरा सेवन करते हंै जिससे थकान न रहे कुल लोग स्वयं मदिरा पीकर लाठी को भी इसका सेवन कराते है क्योंकि इनके देवता को भी मदिरा चाहिए या मिल जाए वह भी प्रसन्न हो जाए।
जब कोई नर्तक लाठी उठाकर दोहा पढऩा प्रारंभ करता है तो टोली के सभी सदस्य थम जाते हैं और हुंकार भरकर उसका अनुगमन करते हैं दोहा समाप्त होते ही फिर से नृत्य प्रारंभ हो जाता है।
रावत नाच एक पुरुष प्रधान नृत्य है। महिलाओं को इसमें सम्मिलित नहीं किया जाता है। बल्कि 'नारी के बिना पुरुष अधूरा होता है।Ó शायद इसलिए पुरुष ही नारी का वेश धारण कर नारी का अभिनय करता है जिससे नाच में आकर्षण और बढ़ जाता है। सभी बच्चे बूढ़े, जवान स्त्रियां सभी लोग उस नर्तकी को देखते रहते हैं जिससे लोग बार-बार देखते रहने की इच्छा प्रकट करते हैं।
इस नृत्य में नर्तकों की वेशभूषा विविधतापूर्ण तथा आकर्षक होती है। नर्तकगण सिर में पगड़ी बांधते हैं। इसे पागा कहा जाता है यह सफेद कपड़े का रहता है जिसकी किनारी लाल-हरी रहती है। पागा को कागज के फूलों की लम्बी माला से सजाया जाता है पर वर्तमान में चमकीले पन्नी से माला बनाते हैं जो अत्यधिक चमकदार होती है। पगड़ी में एक किनारे मोर पंख की कलगी सजी होती है। नर्तक अपने तन पर रंगीन छींटदार सलूखा पहनता है। यह एक पूरी आस्तीन वाली लंबी कमीज होती है। कमीज के ऊपर एक हाफ कांटे पहनते हैं जिसमें सितारे जड़े होते हैं तथा कौडिय़ों का भी प्रयोग करते है। कमर के नीचे के भाग में वह धोती या चोलना पहनता है।
 यह चोलना  घुटनों के ऊपर तक कसा होता है। इस चोलने की किनारी रंगीन कुन्दों से सजी होती है। सीने को ढंकने के लिए वे एक ऐसा वस्त्र पहनते हैं जो कौडिय़ों का ही बना होता है। नर्तकगण अपने कमर में घुंघरुओं से सजी पेटी बांधे रहते हैं इसे जलाजल कहते हैं, पैरों में जूता तथा लालरंग मोजे पहनते हंै वे अपने चेहरों को रामरज अथवा पीली मिट्टी से पोत लेते हंै तथा आंख, ठोढी, गाल, माथा तथा भौहों के ऊपर रंग-बिरंगे चन्दन का टीका लगाए रहते हंै। मुंह में पान और आंखों में काला चश्मा लगाए नर्तक राउत के एक हाथ में तेंदू की लाठी और दूसरे हाथ में फरी रखते हैं। ये ढाल दोनों ओर से नुकीला रहता है ढाल लोहे या पीतल की होती है। कभी-कभी ये हाथों में एक विशेष प्रकार का शस्त्र भी रखे जाते हैं। इसे फरी कहा जाता है यह हिरण के सींगों से बना होता है।
राउत नृत्य एक श्रृंगार परक नृत्य तो है ही साथ ही शौर्य परक नृत्य भी है। नृत्य के दौरान शौर्य प्रदर्शन भी किया जाता है। शौर्य प्रदर्शन के लिए लाठी, तलवार, भाले तथा गुरुद आदि विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का भी प्रयोग किया जाता है। गुरूद नाम अस्त्र एक फुट के गोलरिंग से बनी होती है, इसके चारों ओर लम्बी चेन में गोल लकड़ी तथा टीन के गुटके लगे रहते हंै। गुरूद को बीच से पकड़कर चलाया जाता है। प्रत्येक नर्तक टोली के अपने-अपने बाजे होते हंै। इन्हें बजाने वालों को बजनियां कहा जाता है। ये गांड़ा जाति के होते हैं। गंड़वा बाजा वस्तुत: गन्धर्व शब्द से बना है। पुराणों में यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि जातियों का उल्लेख किया गया है। गन्धर्व स्वर्ग में संगीतज्ञों को कहा जाता है। इसका प्रमुख काम गाना-बजाना ही था।
गांड़ा लोग जिन वाद्य यंत्रों को प्रयोग में लाते है उन्हें गड़वा बाजा कहते हैं।  इनके वाद्ययंत्रों में निशान, मोहरी, टिमकी, डफड़ा और गुदुम जैसे वाद्य यंत्र मुख्य हैं। इन वाद्य यंत्रों का निर्माण गाड़ा लोग स्वयं करते हैं।
राउत नाच की एक और विशेषता यह है कि मड़ई साथ लेकर चलते हंै। मड़ई एक तरह से ध्वज वहन करने वाली पताका है। इसका संबंध संभवत: उस काल से है, जब युद्धभूमि में जाने वाले सैनिक आगे-आगे अपने अपने राज्य के प्रतीक चिन्ह लेकर चलते थे। आज भी क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में अलग-अलग दलों के खिलाड़ी अपना-अपना ध्वज साथ में लेकर चलते हंै।
मड़ई एक लम्बे बंास से बनाई जाती है। इसको कदम, चम्पक, गेंदा आदि फूलों और उनकी पत्तियों से सजाया जाता है। मड़ई का निर्माण अक्सर केंवट जाति के लोगों द्वारा किया जाता है।
रावत नृत्य में मड़ई का उपयोग विभिन्न अंचलों में अलग-अलग तरीके से किया जाता है। कहीं पर इसे किसी साफ-सुथरे स्थान पर विधि विधान से स्थापित किया जाता है। तब नर्तक इसके चारों ओर घूम-घूमकर नृत्य करते हैं। कहीं-कहीं विशेषकर बिलासपुर जिले में मड़ई को साथ में लेकर चलते हुए नृत्य करने की परम्परा है।
प्रतिवर्ष यहां राउत नाचा प्रदर्शन के लिए प्रदेश भर से नृत्य का भव्य प्रदर्शन करते हैं कहीं-कहीं यह भी परम्परा है कि पुरुष महिलाओं का वेश धारण कर नृत्य करते हंै।
यादव कुल में उत्पन्न लोक नायक श्रीकृष्ण वंशजों द्वारा छत्तीसगढ़ में आज भी राउत नृत्य को परम्परागत अपने मनोहारी रूप में प्रचलित है, इस लोक नृत्य की सांस्कृतिक विरासत के मूल रूप का संरक्षण और परिवर्धन किया जाना चाहिए पर इससे भी अधिक आवश्यकता इसे विकृत होने से बचाएं जाना चाहिए।
साभार- रऊताही 2004

संस्कृति के एक आयाम 'राउत नाचा'

यादव जाति यदुवंश कुल है। काल-कर्म से स्वतंत्र अजन्मा भगवान श्री कृष्ण का इसी कुल में प्रादुर्भाव हुआ। भगवान श्री कृष्ण के सिर पर वैदूर्धमणि जटित किरीट था और कानों में कुण्डली की अपूर्व शोभा थी। वे सुन्दर करधनी, बाजूबन्द कड़े आदि आभूषणों से शोभायमान थे। आज भी वही प्रतीक उस कुल में आज भी परिलक्षित होते हैं। इसलिए सचमच ही ये यदुवंशी कुल के ही हैं। इस तथ्य का विरोध नहीं किया जा सकता और उनकी पोषाक स्वांग उस वंश का प्रमाण है। प्रकृति के प्रवर्तक पुरुष के वंश यादव ही हैं, इसमें जरा भी संदेह नहीं है। यादव जिसे राउत की संज्ञा से अभिभूत है उनका ही अंश माना जाता है। ये यदुवंश के साक्षी हैं।
भगवान श्री कृष्ण के बाल्यकाल का वर्णन पुराण में है कि जब गोपी कहती है कि तू बड़ा अच्छा नृत्य करता है, तब भगवान बालक के समान नृत्य करने लगते हैं। जब गाने की प्रशंसा की जाती है ऊंचे स्तर से गाने लगते थे। ये सब प्रसंग, तरह-तरह की बाल क्रीड़ाएं पढ़कर मन हर्षातिरेक भर जाता है। जब श्री कृष्ण की अवस्था पांच वर्ष की थी वे गोप बालकों के साथ गाय चराने का दूर-दूर स्थानों में जाया करता था। ऐसे ही संस्कारों से संस्कारित यादव थे जाति है। पृथ्वी के कंसादि राक्षसों से द्रोह करने वाले सूर्य से अलंकृत हैं यह वंश ! क्षुद्र जीव से सूर्य देवता पर्यंत सभी के पूजनीय हैं यादव वंश।
उस समय का एक पवित्र जीवन था, सीधी सीधी चाल-ढाल, सीधा रहन-सहन और वन में गौओं एवं सखाओं के साथ भ्रमण करते समय गुजरता था, उस समय सब धनों में गो-धन ही सब धनों में श्रेष्ठ माना जाता था। गौ के प्रभाव से पुरुष बल- वीर्यशाली बड़े पराक्रमी होते थे। शास्त्रों और उपनिषदों में गो पालन की मुक्त कंठ की प्रशंसा की गई है। श्री बलराम जी और भगवान कृष्ण के  गांवों में ग्वाल बालों के संग गो चराते थे।  एक बार नहीं देता और न  ही फल को खाने देता था। भगवान के संग ये सखाओं ने फल खाने की इच्छा व्यक्त किया- तब वे बलराम सहित एकाएक तालवन में प्रवेश हुए। फल गिराने पर श्री बलराम और कृष्ण पर जंगल में निद्र्वन्द होकर फल खाये तथा गायें भैंसे निर्भयता से चारा चरने लगे। गायें और ग्वाल बाल कालिन्दी की तट पर कालिंग विषधर के विष से दूषित जल ग्रहण कर     प्राणहीन हो गए, तब भगवान कृष्ण ने अपनी अमृतमयी दृष्टि से देखकर उन्हें जीवन-दान दिया। ये यदुवंशी राउत उसी के वंशज है। भगवान कृष्ण कालिंग को दण्ड देने चंदन के पेड़ पर से यमुना जी में कूद पड़े और जल क्रीड़ा किये तब सर्पक्रोध से फन उठाकर भगवान को लपेट लिया, कृष्ण छलांग लगाकर उसके मस्तक पर सवार हो गए और नृत्य करने लगे। आखिरकार भगवान के चरण प्रहार से घायल सर्प उनके शरणागत हुआ तथा उनकी पत्नियां भगवान के आश्रय से समुद्र से निवर्तक होने स्तुति करने लगी-
नम: कृष्णाय रामाय, वसुदेव सुताय च।
प्रद्युभ्याना निरुद्वाय सात्वनां पतये नम:।।
इस तरह भगवान यदुवंशी कुल श्री कृष्ण राक्षसों का उद्धार नहीं किया वरन् देवताओं के भी गर्व का सर्वनाश किया। एक बार इन्द्र को भी अभिमान हो गया कि इन्द्र के अलावा अन्य और कोई विधाता नहीं है, तब भगवान ने संभाषण किया-
'साकर्मणा तभभ्यच्र्य सिद्धि विन्दति मानव:Ó
हम लोगों का वर्णाश्रम कर्म गो- पालन है, गोवर्धन से पर्व से गोरक्षा होती है। इन्द्र की पूजा व्यर्थ है। गोप ने इन्द्रयज्ञ नहीं किया। इन्द्र के कोप भाजन से मेघ ने भारी जल वर्षा, वज्रपात और ओलों की वृष्टि करने लगे जिससे धरती पर प्रलय की प्रबल संभावना हो गई तब यदुवंशी नन्दपुत्र कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को हाथ की एक उंगुली से उठा लिया था। उसी के संदर्भ छत्तीसगढ़ में यदुवंशियों का लोकदर्शन और संस्कृति का दस्तावेज देवरहट की प्रणम्य भूमि के मंच में होती रउताही लोक व्यापीकरण और जन-जन की भागीदारी में एक अद्वितीय भूमिका है, ताकि आगामी यदुवंश पीढिय़ों में अपनी संस्कृति और सभ्यता कायम रहे। अहीरों की यह एक गौरवशाली परंपरा है, छत्तीसगढ़ की भूमि के इतिहास में रीति-रिवाजों में गो-पालन का मुख्य स्थान है और आज भी इस युग में श्रीकृष्ण उनके आराध्य हैं। छत्तीसगढ़ में देवी-देवताओं की आराधना का विशिष्ट स्थान है। यदुवंशी अपनी गाय-भैंसों को सर्वथा बाधामुक्त रखने ठाकुर देव, सांहड़ा देव व अपने पूर्वजों से पूजित देवों गुरु बेताल और अखरा देव आदि अन्य देवताओं को भी पूजते हैं। अहीरों में देव-पूजन की खास प्रथा है। विशेष पर्व में संगरी बनाकर परिवार व अपने समाज के लोगों को निमंत्रण देकर बुलाते हैं और पूजा पाठ के साथ भोज दिया जाता है। जन्माष्टमी जैसे विशिष्ट त्यौहार में भी श्रीकृष्ण की पूजा, भक्ति में डूबकर मटकी फोडऩा, मंदिर जाना, दही लूटना आदि करते हैं। दीपावली में अपने कुल देवता को मनाने कांछन चढ़ते हैं। सिर पर साज श्रृंगार करके पगड़ी और मौर बांधते हैं। संस्कृति के भिन्न-भिन्न आयाम में राउत नाचा भी एक लोकपर्व है। इस पर्व का प्रतीक संस्कार है जो संस्कृति का स्वरूप लेती है, इसके मूल में एक परंपरा है। यह उन्हीं की स्मृति में यह पर्व होते हैं। किसी भी पर्व को मनाने के पीछे एक परंपरा होती है, जिससे प्रभावित होकर लोग शुरुआत करते हैं, जो उत्सव के रूप में परिणित हो जाता है।
देश के विभिन्न प्रांतों के क्षेत्रों में क्षेत्रीय पर्व मनाए जाते हैं, उसी तरह छत्तीसगढ़ राज्य में लोक उत्सवों व त्यौहारों की एक लंबी श्रृंखला है। छत्तीसगढ़ में होली, पोला, छेरछेरा, खमरछठ, राउत नाचा, और गौरा लोकपर्व हैं, जो छत्तीसगढ़ में ही होते हंै। यहां लोकपर्व को मनाने के अलग-अलग ढंग, शैली, रीति हैं जो ग्रामीण परिवेश में मनाए जाते हैं। आज का युग वैज्ञानिक है, जिसमें भौतिकता का विशेष स्थान लोकतत्व विलोप होते जा रहे हैं। लोक संस्कृति की घोर उपेक्षा हो रही है। भौतिकता की आंधी के थपेड़ों से यहां के लोक संस्कृति के अस्तित्व के फूल झडऩे लगे हैं, उपेक्षित होने लगे हैं। इस युग में भौतिकवादी समाज के गांव के लोग भी भौतिकवाद के अतिक्रमण से त्रस्त होकर मानवीय कत्र्तव्य, व्यवहार  और समाज की संस्कार और संस्कृति परे हो गये हैं जिससे गांवों में लोकजीवन कठिन हो गया है। गांव में शहरीकरण होने से लोकपर्व की उपेक्षा की गिद्ध नजरों को ग्रहण लगने लगा है।
आजादी के पहले के लोक पर्वों का उत्साह लोगों में कम दिखने लगा है। लोक के आनंद और सुख का साधन लोक में प्रचलित रीति-रिवाज होते हैं जिनका मूल आधार सामूहिक व्यवहार व लोक व्यवहार के शिष्टाचार और लोकाचार हैं जो खास तौर पर लोक पर्व या कोई मांगलिक कार्यों में दृष्टिगोचार होते हैं। गांवों में बसे जाति के लोगों की उनकी अपनी जातिगत संस्कृति होती है। जातिगत संस्कृति उनके सामूहिक कार्य एवं पर्वों में स्पष्ट देखने को मिलता है। लोक संस्कृति में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान होता है। धर्म, प्रेम, उदारता, सहानुभूति उनका प्राण है।
ग्रामीण संस्कृति, लोक पर्व लोकवार्ता, लोकगीत, लोकगाथा, लोकनृत्य, लोक संस्कृति का सम्मिश्रण स्वरूप है। लोक का तात्पर्य जन से है, साहित्य में इसका संबंध सामान्य लोगों में जुड़ा हुआ है। लोक साहित्य, जन सामान्य की भाषा होती है। लोक साहित्य में लोक तत्व का विशिष्ट स्थान होता है। लोकतत्व के दायरे में प्रत्येक तत्व की अपनी विशेष भूमिका होती है। लोकनृत्य राउत नाचा की अपनी अलग-अलग विशेषता है जो राउत जाति के संस्कृति में विशेष महत्व रखता है। इस जाति का एक लोक महोत्सव होता है-जिसमें इनके लोकनृत्य का विराट स्वरूप हमें लोक तत्व के विभिन्न आयामों के सामने आता है। उनके राउत नाचा का अपना इतिहास है।  इसका इतिहास आदि युग से जुड़ा हुआ है। 'राउत नाचÓ लोक नृत्य होते हुए भी मात्र मनोरंजन नहीं है, यह एक धार्मिक अनुष्ठान और लोक उल्लास के रूप में उभरता है। राउत जाति का यह विशिष्ट लोक नृत्य राउत नाचा के नाम से विख्यात है।
राउत जाति की अलग से राउत संस्कृति है। राउत लोक संस्कृति में गायों की सेवा और गायों को चराना राउतों का धर्म-कर्म हैं सचमुच ये भगवान श्री कृष्ण  के वंशज है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला में अनेक लीलाओं के साथ गो चराने की लीला की एक अलग छवि है, उसी परंपरा को यदुवंशी जाति गाय चराने की परंपरा बनाये रखे हैं। लोक महोत्सव के समय नृत्य करते दोहा में उनकी लाठी का संदर्भ-
पातर-पातर लाठी, पातर अंग शरीर
पातर है, हमर ठाकुर, तेकर हम अहीर
इनके लोकनृत्य उस काल की घटना की याद दिलाती है जब नंद बाबा पुत्र रत्न के मिलने से आनंद में डूबते हैं और खुशी से उल्लास में गोप-जन खुशी से उनके घर में आकर नृत्य करते हुए बधाई देते हैं-
जैसे ठाकुर लिये दिये, वैसे देव असीस हो
अन्न धन तो घर भरे जुग जुग जियो लाख बरीस हो
राउत नाचा महोत्सव का दूसरा पक्ष यह भी है कि श्रीकृष्ण ने भयानक वर्षा से ब्रजवासियों की सुरक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसकी खुशी के परिप्रेक्ष्य में समस्त ब्रजवासी नंदबाबा के दरबार में जाकर उन्हें बधाई देने उनके घर में आनंदित होकर राउत नाचा करते हैं और भिन्न-भिन्न लोकोक्तियों से उन्हें बधाई देते है। उसी समय से परंपरा के अक्षुण्ण रखने के लिए यादव वंश रावत देव-उठनी एकादशी से राउत नाचा महोत्सव को एक पर्व के रूप में बड़ी खुशी से मनाते हैं-
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है -
यदा-यदा ही धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत:
अभ्युत्थानं तदात्मनं सृजाभ्यहम
वर्तमान युग में प्रतिद्वंद्विता के बीच रहकर अन्र्तमन की व्यथा शांति की तलाश करती है और धीरे-धीरे व्यक्ति के अन्तस पर स्थापित हो जाता है तब व्यक्ति धर्म से विमुख नहीं होता, श्रीकृष्ण का अवतरण धर्म की स्थापना के लिए हुआ था और अधर्म का विनाश करने। श्री कृष्ण पहले महापुरुष हैं, जिन्होंने प्रवृत्ति और निवृत्ति का समवेश स्वरुप उद्घाटित किया।
कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, प्रवृत्ति निवृत्ति का सूत्र है। कर्म बंधन नहीं है, कर्म से फल की आशा ही बंधन है। यही एकमेव महान सत्य है। आंख तो देखेगा, पाद तो चलेगा, उदर तो खाएगा, मस्तिष्क है सोचेगा अत: कर्म के बिना पूर्ण विकास की अभिलाषा नहीं की जा सकती  और निष्कर्म व्यक्ति रह ही नहीं सकता, यही कृष्ण का संदेश है। श्रीकृष्ण नियमों के प्रवर्तक थे, मर्यादाएं जानते-समझते थे। नैतिक मूल्यों की स्थापना एक आम धर्म है। इसी धर्म का परिपालन करना राउत नृत्य का आदर्श है। इसे राउतों का महायज्ञ कहा जाये जो अपनी परंपरा एवं रीति-रिवाज को बनाए रखने आज भी उसका स्वरूप विद्यमान है। राउत हमें अपने संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में पूर्ण सहायक हैं। राउत नाच संस्कृति एवं धर्म की अटूट शक्ति और विश्वास का प्रतीक है।
 साभार- रऊताही 2004

छत्तीसगढ़ संस्कृति और राष्ट्रीय एकता

संस्कृति शब्द 'संस्कृत धातु ' 'लिन ' प्रत्यय संशिलिष्ट से अद्भूत है, जिसका अर्थ है, 'सुधरी हुई जाति।Ó मनु से लेकर आज तक वे मानव की विकास यात्रा में यही संस्कृति संस्कार के रूप में, ज्ञान-अनुभव के प्रशक्ति पक्ष के रुप में सरिता-सदृश एतद् प्रवाहमान रही है। संस्कृति का निरुक्तिमूलक अर्थ है। वह कृति या प्रयत्न जो अर्जित एवं परिष्कृत ज्ञानमूलक इच्छा से उत्कर्ष विधायक या भूषण हो। संस्कार का अर्थ परिवार परिमार्जन या भीतरी भाग को प्रकाशित करना होता है। इस तरह इसका संबंध बाह्यजगत की तुलना में अंर्तजगत से अधिक होता है।
भौगोलिक सीमाएं संस्कृति को प्रभावित करती है, तद्नुरुप विश्व मानवता की शाश्वत संस्कृति सार्वजनिक होने के बावजूद देश, प्रदेश और क्षेत्र की विशिष्टताओं से रंगकर क्षेत्रीय प्रादेशिक और क्षेत्रीय या आंचलिक हो जाती है, यह भेद देश में व्याप्त अनेकता में एकता को उद्घाटित भी करती है। हमारा देश ग्रामों में निवास करता है, जहां लोक अधिष्ठित है। यही संस्कृति हमारी थाती है, लोकसंस्कृति से पार्थक्य स्थापित करती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि लोक संस्कृति अशिष्ट संस्कृति का पर्याय है। कुछ लोग शिष्ट व शिष्टेतर या नागर व ग्राम्य संस्कृति का प्रयोग करते हैं जो तर्क वितर्क के लिए भले ही उचित हो, व्यवहार और गुण संधारण की दृष्टि से सर्वथा उपयुक्त नहीं है।
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक विकास की यात्रा मानव सभ्यता की विकास यात्रा के साथ ही प्रारंभ होती है। प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक छत्तीसगढ़ में अनेक राजवंशों भारत वर्ष के विभिन्न अन्यत्रों से आये और स्वभावत: अपने साथ अपनी मूल संस्कृति भी साथ लाए इस प्रकार छत्तीसगढ़ की संस्कृति अनेक सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का सम्म्ििलत रूप एवं तदर्थ अनेकता में एकता का अनुपम उदाहरण है। छत्तीसगढ़ की जो संस्कृति हमें दृष्टि गोचर होती है, वह मिश्र संस्कृति है। वेदों में इस क्षेत्र का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं प्राप्त होता। रामायण, महाभारत एवं पौराणिक गाथाओं के अनुसार वैवस्वत मनु के दस पुत्र और एक पुत्री थी इला। इला का विवाह सोम के साथ हुआ था, जिसका बेटा पुरूरवा था, पूरूरवा ने एक वंश की स्थापना की। इसे यदुवंश भी कहते हैं। ऐल वंश से यादव वंश निकला और यादव वंश से हैहय वंश। हैहयवंशियों के छत्तीसगढ़ दीर्घकालीन शासन के प्रमाण मिलते हंै।
आंध्रप्रदेश के सातवाहन वंश के राजाओं का ईसवी सन् 200 तक महाकौशल में राज्य करने का उल्लेख चीनी यात्री व्हेनसांग ने किया। सातवाहन राजाओं के समय शिलालेख बिलासपुर जिले के बूढ़ीखार नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। बिलासपुर जिले के किरारी नामक स्थान से जो काष्यूप प्राप्त हुआ है उस पर का लेख भी सातवाहन कालीन है। सातवाहनों के प्रारंभिक समय अर्थात् ईश्वी पूर्व दूसरी सदी में कलिंग में यदुवंश का उदय हो चुका था।
कुषाण राजाओं द्वारा चलाये गये सिक्के भी बिलासपुर जिले के अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हंै। इससे स्पष्ट है, कि कुषाण राजाओं का शासन भी छत्तीसगढ़ में था। छत्तीसगढ़ में बाकाटक वंश, गुप्तवंश एवं जलवंश के शासनकाल के यद्यपि स्पष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं, तथापि उक्त राजवंशों के छत्तीसगढ़ से प्राप्त सिक्के एवं लेखों के आधार पर यह बात कही जा सकती है कि उस समय के छत्तीसगढ़ के शासक उक्त राजवंशों की आधीनता स्वीकार कर लिए थे। इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि समुद्रगुप्त की दक्षिणात्मक की विजय यात्रा के समय महाकौशल में राजा महेन्द्र का राज्य था एवं बस्तर में व्याघ्र राज का प्रभुत्व था। इन नरेशों ने समुद्रगुप्त के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी।
गुप्त संवत 102 या 202 का जो लेख आरंग में मिलता है, उसमें दक्षिण कौशल के एक राजवंश के कुछ राजाओं के नाम मिलते हंै, जिनमें सबसे पहले शूरा फिर उसके बेटे दक्षित फिर विभिषण फिर भीमसेन प्रथम फिर द्वितीय का उल्लेख है। इस प्रकार 4 थी, 5 वीं शती में शूरा का वंश दक्षिण कौशल में उक्त हो चुका था।
इसी राजवंश के राज्य काल में एक और वंश दक्षिण कौशल के एक भाग में अपना प्रभुत्व किये हुए था। इस वंश की राजधानी शरभपुर में थी। शरभपुर कहां था अभी तक निश्चय नहीं हो पाया है। अधिकारी विद्वानों का मत है कि यह स्थान रायपुर जिले में ही कहीं होना चाहिए। बाद में इन राजाओं की राजधानी शरभपुर नामक शासक सिरपुर में अधिक दिनों तक नहीं टिक सके। प्रवरराज इस वंश का अंतिम शासक था। उसके अंतिम काल में पाडवंशी योग दक्षिण कौशल के राजा हो गये।
पाण्डवंशी या सोमवंशी कहे जाने वाले राजवंश में तीवरदेव जिसे महातीवरदेव भी कहा जाता है, समस्त कौशल का अधिपाति था। तीबरदेव का राज्यकाल छठवीं या आठवीं सदी माना जाता है। तीबरदेव का उत्तराधिकारी उसका भाई चन्द्रगुप्त था। उसने सूर्यवंशी की पुत्री बासटा से विवाह किया था। रानी वासटा वैष्णव थी। उन्होंने सिरपुर में एक मंदिर का निर्माण करवाया था, वह माशिवगुप्त नागार्जुन की माता थी। शिवगुप्त परम माहेश्वर था। इस प्रकार सातवीं सदी के प्रारंभ तक नागार्जुन दक्षिण कौशल में राज्य करता था।
छत्तीसगढ़ में सबसे महत्वपूर्ण एवं गौरवपूर्ण राजवंश कलचुरियों का रहा है, कलचुरी लोग अपने शिलालेखों में अपने को हैहय और सहस्त्रार्जुन का वंशज बताते हैं। छठवी शताब्दी में कलचुरी बड़े समृद्ध और शक्तिशाली हो चुके थे। उन्होंने गुजरात, महाराष्ट्र और मालवा के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था।
कलचुरियों में प्रथम राजा लोकजल देव हुआ इसके अठारह पुत्र थे। उनमें से सबसे छोटै पुत्र कालिंगराज ने दक्षिण कौशल में अपनी राजधानी स्थापित की। कलिंगराज का पुत्र कमलराज हुआ और उसका पुत्र रत्नराज। राजा रत्नराज ने ही राजधानी तुम्माण से उठाकर रत्नपुर वर्तमान रतनपुर लायी और रतनपुर नगर बसाया। रत्नराज का पुत्र पृथ्वीदेव हुआ और उसका पुत्र जाजल्लदेव जिसने जांजगीर नगर स्थापित किया जाजल्लदेव ने कान्यकुब्ज  और बुंदेलखण्ड के राजाओं से मित्रता की और फिर आस-पास के प्रदेशों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया। अमरकंटक से गोदावरी तथा बस्तर से लेकर उड़ीसा प्रांत तक का क्षेत्र उसके राज्य के अंतर्गत आ गया था। जाजल्लदेव पुत्र का रत्नदेव (द्वितीय) उसने कलिंग देश के राजा बोडगंगा को हराकर कीजिंगाधिपति की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद जाजल्लदेव (द्वितीय) और उनके बाद रत्नदेव (तृतीय) तथा उसके बाद पृथ्वीदेव (तृतीय) रतनपुर के राजा प्रतापमल्ल हुआ था। कलचुरि राजा यद्यपि शैव थे तथापि उनके राज्य काल में शैव, वैष्णव एवं जैन तीनों धर्मों का समान रूप से सम्मान था।
उपर्युक्त राजवंशों के निवास बस्तर में ईस्वी सन् 1023 का पुराना शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिससे स्पष्ट है, वहां नागवंश का शासन था। सन् 17-0-41 ईस्वी में नागपुर के मराठा पन्त ने रायपुर एवं रतनपुर को मराठा राज्य से संबंधित किया। इसकी एक अन्य कहानी है। इस प्रकार छत्तीसगढ़ में 800 वर्षों से चले आ रहे हैहय राज्य का पराजय और मराठा राज्य की स्थापना हुई।
तृतीय वर्ग बिम्का जी सन् 1787 ईस्वी में रतनपुर में आकर बस गया। उससे अधिकार में समस्त छत्तीसगढ़ का शासन था। उसकी मृत्यु 7 दिसम्बर 1787 को हुई। इनके बाद छत्तीसगढ़ के सूबेदार नागपुर से भेजे जाते थे। 11 दिसम्बर 1853 को रघु जी तृतीय की मृत्यु के उपरांत नागपुर का राज्य मार्च 1854 में अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। अंगे्रजी राज्य में गौटियों का सीधा संबंध अंग्रेजी शासकों से हो गया और मालगुजारी प्रथा आरंभ हुई।
इस प्रकार हम देखते हैं कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति की अपनी यह विशिष्टता है कि गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम की भांति छत्तीसगढ़ में आर्य-अनार्य एवं निषाद संस्कृति नीर-क्षीर के समान आपस में मिल गयी है। यही कारण राष्ट्रीय एकता का जैसा अद्वितीय, अनुपम उदाहरण छत्तीसगढ़ में दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र दुर्लभ है।
लोक संस्कृति और साहित्य चाहे किसी भी बोली भाषा की हो परस्पर भाई-चारे एवं भावात्मक एकता के स्वर को ही मुखरित करते हैं। विश्व बंधु कबिन्द्र रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा है कि,  'यदि विश्वÓ के समस्त लोकसाहित्य को एकत्र कर उसका सूक्ष्म विवेचन किया जाये तो हम पाएंगे कि उनमें एक ही आत्मा, एक ही स्वर, एक ही हास-उल्हास, पीड़ा और आंसू है। लोक साहित्य के संत श्री देवेन्द्र सत्यार्थी के कथानुसार- 'एक लोक गीत से दूसरे लोकगीत के मुंडेर का दीप न जाने कब से जलाया जाता रहा है। एक जनपद की आत्मा दूसरे जनपद की आत्मा से उतनी भिन्न नहीं है, जितनी भाषा की दीवार के कारण नजर आती है। गीत का नाम गलिया और उनके लोकगीत भी हमारे हैं। गीत का नाना गलिया कथा का आर-पार पर्व त्यौहार, चांद-चांदनी, स्नेह- प्रतिमा कहीं भी कोई अंतर नहीं।
वहीं नदी, वही मछलियां, वही आग, हवा, पानी की सुगंध, वही रोशनी के फूल। वही हरी घाट की सीढिय़ाँ। वही पगडण्डियां। वही बीरबटूलियां। वही हरी चुनरियां, वही सुगंध की कहानी। वही छंद की गलियां। वही कथा के मोड़ वही अंर्तमन की अकुलाहट। यह टीस भरा खोया सा क्षण- मानो एक पूरा युग हो। यह मंत्र - मुग्ध सी रात मानों गूंगी झील। अपनी ही आवाज की यह गूंज। यह दर्द तो हम सबका है।
हम सब मिलाकर विराट बनते है।
'सहसत्र शीर्बा गुरूध: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपातÓ
सभी जनपद मिलकर एक महा जनपद बनते हैं। एक ही लोक, एक ही लोक संस्कृति और एक ही लोक साहित्य।
साभार- रऊताही 2004

लोक संस्कृति के निर्माण और विकास में लोक बोलियों की भूमिका

परिष्कृत और परिमार्जित समाज की परिणति है संस्कृति। संस्कृति के मूल में संस्कार प्रकार्यशील परिलक्षित है। संस्कार भेद से संस्कृति प्रकार्यशील होती है। संस्कार भेद से संस्कृति दो प्रकार की मानी गई है 1. मानक संस्कृति 2. लोक संस्कृति। संस्कारों की एकरुपता मानक संस्कृति का आधार है। संस्कारों की विधिवत और सहजता लोक संस्कृति के बोधक हंै। लोक संस्कृति में नैसर्गिकता, गतिशीलता और जीवन्तता परिव्याप्त रहते हैं। मानक संस्कृति की अभिव्यक्ति मानक या परिनिष्ठित भाषा में होती है और लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति लोक भाषा अथवा लोक बोलियों में होती है। लोक बोलियाँ लोक संस्कृति की आधार और उर्वरा भूमि है। लोक संस्कृति में निर्माण और विकास में लोक बोलियों की क्या भूमिका है ? इसका विवेचन करने से पहले लोक संस्कृति के रचना तत्वों का नामोलेख की आवश्यकता है। 1. लोक संस्कार 2. ग्रामीण देवी-देवता 3. तीज त्यौहार 4. पूजा स्थल 5. पूजा पद्धति 6. उपवास 7. व्रत 8.प्रार्थना 9. कीर्तन 10. जागरण 11. तीर्थ स्थान 12. लोक गीत 13. लोकगाथा 14. मेला दशहरा 15. ग्रामीण हाट या पैंठ 16. टोना टोटका 17. शकुन -अपशकुन  18. तीर्थ यात्रा 19. संत महात्माओं में आस्था 20. धर्मगं्रथ 21 लोक रीतियां 22. लोक परंपराए 24. लोक कलाएँ 25. लोक विश्वास और लोक आस्थाएं।
लोक संस्कृति के उपर्युक्त रचना तत्व लोक संस्कृति के बहुरूपी, बहुरंगी, बहुगंधी, बहुआयामी और बहुस्तरीय सिद्ध करते हैं। लोक संस्कृति की सार्थकता उसकी विविधता और अनेकरूपता में निहित है। इसकी पवित्रता, मधुरता, उन्मुक्तता, गत्यात्मकता और जीवन्तता की रक्षा मानवतावादी जीवन मूल्यों से जुडऩे के लिए आवश्यक है। लोक संस्कृति अपनी संरचना, प्रयोग और प्रकार्य प्रक्रिया में संशिलष्ट होती है। संश्लिष्ट संस्कृति मानक भाषा द्वारा अभिव्यंजित नहीं हो सकती। संश्लिष्ट संस्कृति की अभिव्यक्ति उन्हीं लोक बोलियों द्वारा संभव है जो ध्वनि विचार, शब्द रचना, रूप विन्यास और वाक्य तंत्र में बहु आयामी और बहुस्तरीय है। लोक संस्कृति की रचना करने वाले सभी अंग या घटक अपनी रचना और प्रयोग प्रक्रिया में बोटनी बोधक शब्दों, प्रत्ययों और विभक्ति प्रत्ययों से संबंध रखते हैं। लोक संस्कृति बोधक शब्द प्रकार्य प्रक्रिया में परिभाषिक है। नगरीयकरण, उद्योगीकरण और पश्चिमीकरण की प्रक्रियाएँ लोकभाषाओं, लोकबोलियों और लोक उपबोलियों को विखंडन और वियोजन की प्रक्रिया से जोड़ रही है। इन लोक भाषाओं, लोक बोलियों और उपबोलियों से संबंद्ध लोक संस्कृति भी विस्थापन और विचलन की प्रक्रिया से जुड़ गई है। हिन्दी साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करने से यह पता चलता है कि आदिकाल से दो प्रकार का साहित्य प्रकार्यशील रहा है- मानक हिन्दी साहित्य और हिन्दी का लोक साहित्य वीर गाथाकाल में रासो साहित्य और जैन कवियों द्वारा रचित प्रबंध काव्य मानक साहित्य की कोटि में आते हैं। इन महाकाव्यों के केन्द्र में राजा, महाराजा, सामंत और महत्त रहे हैं। मानक भाषा में अभिजातवर्गीय पात्रों की संस्कृति वर्णित रही है। वीरगाथा काल से 150 वर्ष पूर्व नाथ और सिद्ध कवियों ने लोक बोलियों और मिली-जुली संपर्क भाषा में लोक संस्कृति मूलक काव्य की रचना की। लोक संस्कृति मूलक मुक्तक काव्य होने के कारण नाथ और सिद्धों की कविताएँ जनता की कविताएं बन गईं। आचार्य युक्त जैसे प्रखर समीक्षक ने नाथ और सिद्ध कवियों की रचनाओं को साम्प्रदायिक कह कर हिन्दी साहित्य से खारिज कर दिया। उन्हें लोक भाषाओं और लोक बोलियों में रचा गया लोक संस्कृति मूल काव्य साम्प्रदायिक परिलक्षित हुआ। जनता को संजीवनी प्रदान करने वाला साहित्य शुक्ल जी को बेठिकाने का लगा।
नाथ और सिद्ध कवियों की रचनाएं ही अव्यवस्थित और बेतरतीब प्रतीत नहीं हुईं अपितु जिन रासो ग्रंथों में लोक बोलियों का प्रयोग हुआ वे ग्रंथ भी शुक्ल जी को अमानक प्रतीत हुए, आचार्य शुक्ल ने चंदरबरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो की अनुस्वारयुक्त लोकभाषा के विषय में लिखा है। अनुस्वार की बहुलता के कारण पृथ्वीराज रासो की भाषा बेतरतीब और बेठिकाने की बन गई है। भाषा में एकरुपता का अभाव है। शुक्ल जी एकरूप या समरूप मानक भाषा के प्रशंसक हंै। वे मानक संस्कृतिमूलक साहित्य को श्रेष्ठ मानते हैं। राहुल सांस्कत्यायन ने लोक भाषाओं और लोक बोलियों में रचे गए साहित्य को बहुआयामी और बहुस्पर्शी माना है। उन्होंने सरहपाद को हिन्दी का पहला कवि और सरहपाद द्वारा रचित दूहाकोश को हिन्दी की पहली काव्य रचना माना है। नाथ और सिद्धों की काव्य रचनाएँ भक्ति कालीन संत कवियों की प्रेरक और प्रोत्साहक रही हैं। नाथ और सिद्ध साहित्य को भक्तिकाल की पृष्ठभूमि माना जा सकता है। कबीर, सूर, तुलसी और जायजी भक्तिकाल के कवि हैं। इन्होंने अपनी काव्य रचनाओं की भाषा को जनभाषा माना है। कबीर ने कहा है संस्कृत 'कनिका कूप जल भाषा बहता नीर।Ó विद्यापति ने देसिख वयना सब जन मिट्ठा, कहा है। तुलसी ने भाषा निबंध भति मंजुलमातनेति कहा है। जायसी ने लिखि भाषा चौपाई कहैं। कहकर लोक भाषा और लोक बोली काव्य को महत्व दिया है। भक्तिकाल के किसी भी कवि ने न तो यह कहा है कि उनका काव्य हिन्दी काव्य है या ब्रज और अवधी काव्य है। उन्होंने इसे भाषा काव्य कहा है। कबीर की दृष्टि में भाषा बहता नीर है। जिस प्रकार बहता जल निर्मल, मधुर और जीवनदायक देता है ठीक उसी प्रकार लोक भाषा या लोक बोली मधुर, पवित्र, नैसर्गिक, सहज, स्वाभाविक  और जीवन्त होती है। इन लोक बोलियों में रचा गया साहित्य  लोक संस्कृति का अक्षय कोश होता है। तुलसी ने ब्रज और अवधी के मानक और लोक दोनों रूपों में काव्य रचना की। सूरसागर की ब्रज भी मानक होने के साथ-साथ लोक समाज से अधिक जुड़ी है। जायसी की अवधी तुलसी की अवधी की तुलना में लोक समाज और लोक संस्कृति के अधिक निकट है। कबीर की भाषा मिली जुली है। इसीलिए कबीर की भाषा को श्याम सुंदर दास ने पंचमेल खिचड़ी और आचार्य शुक्ल ने सधुक्थड़ी भाषा कहा है। भक्तिकालीन कवियों का काव्य- लोक बोलियों में रचित होने के कारण लोक समाज और लोक जीवन के अधिक निकट है। इन सभी को जनता का कवि कहा जाता है। लोक संस्कृतिमूलक लोक बोलियाँ साहित्य की लोकप्रियता की कसौटी बन गई। छायावाद के कवि, प्रयोगवाद और नई कविता के कवि मानक हिन्दी में साहित्य रचने के कारण जनता के कवि नहीं बन सके। दलितवर्गीय रचनाकार दलितवर्गीय भाषा प्रयोगों के कारण जनता के कवि बनने के प्रयत्न कर रहे हैं। रीतिकाल के रीतिमुक्त और रीति सिद्ध कवि रीतिबद्ध कवियों की तुलना में लोक- भाषा प्रयोगों के कारण लोकोन्मुख हुए हैं। प्रेमचंद की भाषा जनता की भाषा होने के कारण लोकसंस्कृति मूलक बन गई है। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, निराला, फणीश्वरनाथ रेणु और पुष्पा मैत्रेयी मनक भाशा के साथ-साथ लोक बोली प्रयोगों से जुड़े हंै। आंचलिक साहित्य, आंचलिक भाषा प्रयोगों के कारण आंचलिक संस्कृति से सम्बद्ध हुआ है।
ऊपर के विवेचन से स्पष्ट है कि लोकभाषाओं और लोक बोलियों में रचा गया साहित्य लोक की अमर संपत्ति होते हैं। वर्तमान युग संचार होते है। वर्तमान युग संचार क्रांति का युग हैं। आर्थिक उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने अंग्रेजी भाषा को विस्तृत और समृद्ध बनाया है। अंग्रेजी का बढ़ता हुआ वर्चस्व मानक हिन्दी के लिए भी खतरा बन गया है। बोली क्षेत्रों में और भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त संबोधन और अभिवादनपरक शब्द विस्थापित  होते जा रहे हैं। इनके स्थान पर अंग्रेजी भाषा के डैडी, डैड, मम्मी-माम, अंकल-अन्टी, हलो, गुडबाई, गुड मार्निंग, गुड इवनिंग संबोधन और अभिवादनपरक शब्द प्रभावी बनते जा रहे हैं। इसका अर्थ है कि भारतीय समाज अपनी मूल संसकृति से विस्थापित होकर पश्चिमी संस्कृति से जुड़ता जा रहा है। लोक बोलियों में रचना करके लोक संस्कृति को विस्थापन से बचाया जा सकता है।
साभार-रऊताही 2004

'राउत नाचा' एक विहंगम छत्तीसगढ़ी नृत्य शैली

सुरम्य वन प्रांतरों गिरि श्रृंखलाओं एवं पावन निर्मल सरिताओं से सुशोभित छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव विशिष्ट व अनूठा रहा है। छत्तीसगढ़ी संस्कृति एक ओर जहां भारतीय संस्कृति का अंग होने के कारण उसकी विशिष्टताओं का सहज ही अंगीकार करती है वहां दूसरी ओर इसकी कुछ आंचलिक विशिष्टता भी है जो जीवन आदर्श और प्रेरणा का पुंज प्रमाणित होती है क्योंकि छत्तीसगढ़ की संस्कृति अत्यंत प्राचीन है।
छत्तीसगढ़ी नृत्यों की अपनी विशिष्ट परम्परा रही है, अनोखा आकर्षण रहा है। ये नृत्य अपनी इन्हीं अनूठी विशेषताओं से छत्तीसगढ़ को धन्य करती, उसके सांस्कृतिक वैभव को पल्लवित करती, उसे धन्य बनाती है। मनमोहक, हृदय को आकर्षित करते एवं चित्त को रोमांच से भर देते ये नृत्य हर किसी को आनंद से आप्लावित करने की क्षमता रखते हैं।
छत्तीसगढ़ में परम्परागत राउत नाच- छत्तीसगढ़ की संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाला नाचा लोक जीवन में लोक शक्ति के प्रकाश से चमकता हुआ एक ऐसा अनपढ़ हीरा है जिसे बहुत अधिक तराशने की आवश्यकता नहीं है।
नामकरण- राउत नाचा दो शब्दों से मिलकर बना हैं 'राउतÓ और 'नाचाÓ अर्थात राउत जाति के लोगों के द्वारा क्रियान्वित किया जाने वाला यह नृत्य छत्तीसगढ़ के यादवों द्वारा समूह में विभिन्न भाव भंगिमाओं के माध्यम से सामूहिक नृत्य के रूप में हमें दृष्टिगोचर होता है।
नाच में आकर्षक वेशभूषा- राउत नाच पर इनकी वेशभूषा बड़ी आकर्षक होती है। वे भड़कीले रेशमी सूती कारीगरी से युक्त रंगीन कुर्ता व जाकेट तथा घुटनों तक कसी हुई धोती धारण करते हंै। पैरों में जूते, कमर  में करधन, गले में तिलरी-सुतरी, मुंह पीले रंग के रामरज से पुता हुआ, आंखों में रंगीन चश्मा, सिर पर कागज के फूलों से बना हुआ गजरा, दाएं हाथों में लाठी, बाएं हाथ में ढाल सम्भाले हुए,  कौडिय़ों की माला गले से कमर तक सुशोभित साक्षात श्रृंगार वीर रस के अवतार दिखाई देते हंै।
राउत नाच- लोक वादकों का महत्व- आम आदमी के नीरस, कठोर जीवन को रसपूर्ण एवं स्फूर्तिमय बनाने के लिए लोक संगीत, राउत नृत्य मस्ती आनंद बिखरेने वाला सर्वाधिक लोक वादकों, कलाकारों की भी एक अहम भूमिका है। जिस तरह जीत के बिना वाद्य वादन, दिनमणि सूर्य के बिना दिन चन्द्र ज्योत्सना के बिना रात्रि और शब्द-नाद-ब्रह्म के बिना समस्त संसार अधूरा लगता है उसी तरह लोक वाद्य 'गड़वाबाजाÓ राउत नृत्य को सुमधुर रसमय बनाने वाला वाद्य देव वाद्य है। गुदरुम, निशान, ढोल, डफड़ा, टिमकी, मोहरी, झुमका, डुगडुगी, झुनझुना, घुंघरु, झांझ, मंजीरा, मादर, मृदंग, नगाड़ा आदि विभिन्न वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।
नाच में दोहों का महत्व- जिस प्रकार शरीर के लिए आत्मा आवश्यक होती है उसी प्रकार राउत नाचा में दोहों का महत्व है। यह नृत्य अपनी आकर्षण साज-सज्जा  एवं नृत्य शैली के द्वारा मनोरंजकता प्रदान तो करता ही है साथ ही साथ दोहों के द्वारा प्राण तत्व भी उपस्थित  कर देता है जो अतिरंजनकारी होने के साथ जनहितकारी एवं ज्ञानवर्धक होता है।
'राउत नाचाÓ दोहा से प्रारंभ होती है प्रारंभ में देवी-देवताओं की वंदना की जाती है।
'जयमहामाय रतनपुर के, अखरा के गुरु बैताल।
चौसठ जोगिनी पुरखा के, बंईया म होने सहाय।Ó
वंदना के पश्चात राउत नाच में एक स्फूर्ति आ जाती है नृत्य में प्रत्येक सदस्य बारी-बार 'हाकÓ देकर दोहा कहता है दोहा कहते समय रावत के हाव-भाव व चेष्टाओं को देखकर अन्त: स्फूर्त हो जाती है। अधिकांश दोहा वीर- रस से पूर्ण होते हैं जो दल व दर्शक दोनों में वीरता, उत्साह, शौर्य का संचार कर देते हैं। दोहा में प्राचीन संत कवियों के दोहे होते है। इसके अलावा उनका कवि मन अपने मौलिक दोहे भी तैयार करता है-
जैसे तै लेहे देहे वैसे देहो आशीश हो
दूधे नहावब पूते फलव जीवव लाख बारीस हो।
धन गोदानी भुइया पावा-पावा हमर आशीश हो
नाती-पूते ले घर भर जावे, जीवा लाख बरीस हो।
(इन पंक्तियों में वसुधैव कुटुम्बकम एवं सर्वे भवन्तु सुखिना की ही भावना कितनी सहजता से मुखरित हुई है।)
विशेषता
1. यह नृत्य पुरुष वर्ग का ही नृत्य है। इसमें बाल, किशोर, युवा, प्रौढ़ सभी भाग लेते हैं।
2. इस नृत्य के पीछे उत्सव, वीरता, शारीरिक बल प्रदर्शन, सौंदर्य का मणिकांचन संयोग है।
3. यह जाति शिक्षा की ओर उन्मुख हो रही है साथ ही अपने पूर्वजों की जगमगाती परंपरा नृत्य पूजन की ओर आज भी निर्वाह कर रहे हैं।
4. यह उत्सव अब नव जागरण का उत्सव हो गया है।
5. राउत नाच के अवसर पर आधुनिक नए परिधान को स्थान दे रहे हैं तो दूसरी ओर कौड़ी व मयूर पंखों की साज सज्जा में सम्मिलित कर रहे हैं।
6. दोहा में कालक्रमानुसार परिवर्तन भी हो रहा है। आधुनिक  फैशन, महंगाई, आर्थिक जीवन आदि पर व्यंग्य परक सशक्त दोहे कहने लगे हैं।
7. पूर्व में राउत साधारण पोशाक ही धारण करता था परंतु जब से राउत नाच महोत्सव प्रारंभ हुआ है तब से सभी दलों में श्रेष्ठ पोशाक, नृत्य में एकरूपता व विशिष्टता का प्रदर्शन प्रारंभ हो गया।
8. यह जाति शासन के कल्याणकारी योजनाओं से प्रभावित भी हो रही है और अपने चहुमुंखी विकास के लिए प्रयत्नशील है।
यादवों के आराध्य देव श्रीकृष्ण परिपूर्ण मानव तथा सोलह कलाओं से युक्त माने जाते हैं ठीक उसी प्रकार राउत नाच भी कलाओं से परिपूर्ण है। राउत नाच छत्तीसगढ़ अंचल की अनमोल धरोहर है।
अंत में ऐसा लगता है कि 'राउत नाचाÓ का आधार नृत्य सद्भाव, आपसी भाई-चारा आपसी मेल-मिलाप दर्शन और मजबूत चिन्तन दे रहा है। राउत नाच केवल धरती छत्तीसगढ़ का ही नहीं अपितु विशाल भारत का है। हिमालय से लेकर कन्या कुमारी तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक, इसके दोहों का आधार है। पूर्व नृत्य विन्यास है। शिव, ओम और राम कृष्ण की रसधार से लेकर हमने इसका समकालीन राष्ट्रीय महत्व आंका है। यह देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचा नृत्य निश्चय का प्रतीक ही है कि देश हमेशा ऊंचा रहेगा, मर्यादाएं ऊंची रहेगी, सांस्कृतिक परम्परा ऊंची रहेंगी।
साभार-रऊताही 2004

रावत नाच का प्रारंभ

आज की उपभोक्तावादी संस्कृति ने जहां टी.वी., प्रिंट मीडिया व समाचार युग में सिमटकर लोक संस्कृति अपनी अस्मिता व अस्तित्व के लिए संघर्षरत है वहीं अनेक लोक परंपराएं अपने जीवंतरुप में आज भी विद्यमान हैं। वहीं लोक नृत्य में पंडवानी गम्मत व रावत नाचा जीवन में नया प्राण फूंक रहे हैं जिनमें रावत नाच शौर्य और संस्कृति को अपने में समेटे कलात्मकता का परिचय दे रहा है।
सिर में धोती का पागा उसमें लगी मोर पंख की कलगी मुंह में पीली मिट्टी आंखों में काजल, गाल में डिठोनी माथे में चंदन का टीका और कपड़े के रंगीन जूते, मोजे बंधी गोटिस के ऊपर घुंघरु घुटने के ऊपर तक कसा हुआ चोलना व उस पर फुंदरी, कमीज की जगह पूरे आस्तीन का रंगीन सलमा सितार युक्त आस्किट, जिसके ऊपर कौडिय़ों से बनी पेटी एवं बाहों में कौडिय़ों बांधे तेंदू की लाठी एक हाथ में, दूसरे हाथ में सुरक्षारुपी लोहे या तांबे की फरी जब रावत चलता है तो ऐसा लगता है मानो युद्ध के लिए श्रीकृष्ण की सेना रण  पर चल पड़ी हो। उनके थिरकते पांवों से सारा जहां रुक जाता है। वे नृत्य में अपनी लाठी द्वारा शौर्य प्रदर्शन करते हंै और अपने आंगन में देवउठनी एकादशी के दिन दस्तक देते हैं।
राउत नाचा की उत्पत्ति का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन पौराणिक गाथाओं के आधार पर जो धारणा प्रचलित है उसके अनुसार कार्तिक शुक्ल की एकादशी के दिन श्रीकृष्ण ने कंस के अत्याचार से पीडि़त जनता को मुक्ति दिलाई, तब से यदुवंशियों द्वारा मुक्ति  का पर्व मनाते हुए उत्सव का आयोजन किया गया। सम्भवत: तभी से राउत नाचा की शुरुआत हुई।
यह नाच द्वापर में श्रीकृष्ण और ग्वाल बाल द्वारा अत्याचार के विरुद्ध विजय पर उल्लास के रूप में मनाया जाता है। श्रीकृष्ण का जन्म सूरसेन जनपद में हुआ था और उस समय मथुरा में कंस का शासन था, उस राज सत्ता पद लोलुप अन्यायी ने अपने पिता उग्रसेन को बंदी बना मथुरा का सिंहासन हथिया लिया था। श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव ययाति वंश के वंशज थे। इन्हीं के वंश में कृष्ण, मधु, यदु और हैहय उत्पन्न हुए। वृषण के वंशज वृषिण मधु (माधव) (यदु) (यादव) और हैहयवंश कहलाएं। इसी वृष्णि वंश में श्रीकृष्ण पैदा हुए वैसे उनकी माता यदुवंशी राजा उग्रसेन की लड़की थी। वसुदेव जी कुल 14 भार्याओं में पुरुवंशीय रोहिणी, देवकी अतिरिक्त अन्य भर्याय रोहिणी के ज्येष्ठ पुत्र बलराम हुए। रोहिणी की दो कन्याएं थीं बड़ी का नाम चित्रा और छोटी का नाम सुभद्रा था जिसे अर्जुन ने हरण कर लिया था। वासुदेव जी का पैतृक राज्य तत्कालीन भूगोल के अनुसार आधुनिक ईराक-ईरान के पास स्थित था। यहां ऋषि कश्यप ने एक विशाल झील बनवाया था जिसे आज कैस्पियन सागर के नाम से जाना जाता है। उग्रसेन की कन्या से विवाह पश्चात वासुदेव मथुरा में निवास करने लगे।
आकाशीय भविष्यवाणी के अनुसार देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक आतातायी कंस का विनाश करेगा। कंस का अंत जनता के विरुद्ध अत्याचार करने के कारण वह अलोकप्रिय होने लगा उसके विरुद्ध क्रांति की स्थिति पैदा हो गई नारद ने कंश के समक्ष कमल पुष्प रखकर यह कहा कि इस कमल पुष्प की आठवीं पखुंड़ी कौन सी है यह बतलाना कठिन है।
यह कोई नहीं जानता इस घटना से उत्तेजित होकर वह सभी देवकी पुत्रों की हत्या करता चला गया। जिससे धीरे-धीरे इस घटना से जनता में कंस के प्रति विद्रोह और घृणा के भाव आ गए। परन्तु वह आठवें पुत्र श्री कृष्ण का वध करने में असफल रहा, श्री कृष्ण का जन्म होते ही उसे रात्रिकाल में नंद महाराज के यहां गोकुल में पहुंचा दिया गया,  वहीं उसका पालन पोषण हुआ। जब इस बात की जानकारी कंस को हुई तब उसने उसके खिलाफ मारने के लिए अपने षडय़ंत्र रचे परन्तु कृष्ण की चमत्कारी लीला सामने वे सभी के सभी धीरे-धीरे कालकलवित होते चले गए। उस समय आसपास दानव-दैत्यों और नागों का राज्य चल रहा था। देवताओं और मनुष्यों से उनके पारस्परिक युद्ध चलते रहते थे। इन्द्र अपनी विलासिता के कारण दुर्बल होता चला गया उसके अधीन करदाता राज्य धीरे-धीरे पकड़ से बाहर हो रहे थे।
श्रीकृष्ण ने इस विलासिता का विरोध किया और गोकुल के प्रतिवर्ष की भांति होने वाली इन्द्र की पूजा का विरोध किया और समझाया कि गोवर्धन की पूजा की जाये न कि देव इंद्र की क्योंकि गोवर्धन पर्वत पशुओं के लिए चारा और जीवों की जीविकोपार्जन और हमारी जीविका का साधन है अत: गोवर्धन की पूजा करना ही श्रेष्ठ है, श्री कृष्ण ने आगे कहा ब्राह्मण मंत्र यज्ञ को प्रधानता देते है। कृषकों के यहां कुल पूजा होती है और हम गोप के लिए गिरि यज्ञ वांछनीय है।
श्री कृष्ण ने समझाया कि वर्षा का देव इन्द्र नहीं, मेघ तो वैज्ञानिक विधि से निर्मित होते हंै वर्षा प्राकृतिक नियमों के अनुसार होती है। इन्द्र पूजा बंद होने से क्रोधित हो उठा उसने यदुवंशियों पे चढ़ाई कर दिया। कृष्णा गोपों को अपनी गायों सहित शरण लेने को कहा तब पूरा जनसमूह व पशु ही देख इन्द्र को स्थिति समझ नहीं आई और वह हताश होकर वापस चला गया। तब कृष्ण ने पर्वत को उंगुली में उठा लिया। इन्द्र को पछतावा हुआ तब वह श्रीकृष्ण के चरणों में हाथ जोड़कर गिर पड़े और क्षमा याचना की। इस खुशी के अवसर पर श्रीकृष्ण सहित बाल गोपाल ने नृत्य करना प्रारंभ किया।
श्रीकृष्ण परमज्ञानी, तत्वदर्शी, दार्शनिक, एक अच्छे कूटनीतिक, राजनीतिक, महायोद्धा, रण कुशल, रासलीला के प्रर्वतक, नृत्य व बांसुरीवाद्य के अविष्कारक, अनेक परम अस्त्रों के ज्ञाता जिन्होंने पल-पल महाभारत युद्ध को प्रभावित किया जो कि पृथ्वी पर एकमात्र विकसित सम्पूर्ण वैभव व गरिमा से सम्पन्न संस्कृति इस युद्ध के पश्चात स्पष्ट हो गई।
रावत नाचा का प्रारंभ कार्तिक मास के एकादशी से प्रारंभ होता है लगातार पौष पूर्णिमा तक चलता है। इस नृत्य को अहीर लोग देवारी नाच से संबोधित करते हैं। रावतनाचा का प्रारंभ श्रीकृष्ण के द्वारा मथुरा राजा कंस के अत्याचार से जनसामान्य की मुक्ति पर एक उत्सव का स्वरुप प्रारंभ होता है क्योंकि कंस का वध कार्तिक शुक्ल पक्ष की कार्तिक एकादशी को हुआ था, इस मुक्ति के अवसर पर ग्वाल बाल यादव नृत्य कर उठे थे।
श्रीमद भागवत के अनुसार श्रीकृष्ण ने यमुना के तट पर बालक लिंग की स्थापना के अवसर पर यदुवंशियों ने 7 दिन तक नृत्य किया। रावत नाच उद्भव के मूल में पुराण संवत यह घटना ही सर्वमान्य है। रावत नाच अपने प्रारंभिक रूप से अब तक जीवित है परन्तु आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से अछूता नहीं है। गांव में जब गोवर्धन पूजा मनाते हैं उसी दिन रावत नाचा पर्व की शुरुआत होती है इस अवसर पर सभी ग्रामवासी गोवर्धन पर्वत, गाय, बछड़े एवं रावत रौताइन की मूर्ति पवित्र गोबर से बनाकर उस सिलयारीघास, गेंदा फूल व धान से सजाते संवारते हैं और पूजा अर्चना करते है। यह इस बात का प्रतीक है, कि श्रीकृष्ण के नेतृत्व में अन्यायी शासक घमण्डी इंद्र का विद्रोह कर पहाड़ मैदान व चारागाह की पूजा की। अपनी इसी पशुधन पर्वत व चारागाह के लिए यादव ने इन्द्र व कुरु शासक कंस ने युद्ध किया। यह युद्ध किन्हीं दो शासकों के मध्य न होकर शासक के खिलाफ (विरुद्ध) सामाजिक युद्ध था जो कि शोषण व अत्याचार के विरुद्ध था।
यादव के संघर्ष गाथा अनुत्पदक तत्व और सामाजिक श्रम की उपयोगिता से जुड़ी है। यह संघर्ष किसी एक विशेष जाति का नहीं अपितु सभी वर्गों की मुक्ति के लिए था।
आज यह नाच छत्तीसगढ़ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। जब भी कभी रावत नाच हमारे गली मुहल्ले से गुजरता है तब उनकी पारम्परिक वेशभूषा जो कि सिर से पैर तक आकर्षक नैनाभिराम वस्त्र धारण किये गुरदम बाजे के थाप पर उनके पैर थिरकते व एक लय में ऊपर उठते हैं जिनके हाथों में ढाल सुरक्षा रुपी फरी तथा दूसरे हाथ में तेंदुसार की लाठी 40 या 80 के समूह में लोग रहते हैं तथा एक या दो नर्तक भी होते हैं। बाजे की आवाज से संयुक्त रूप से जोश एवं आवेश साहस व उत्सव न केवल रावत के मन में अपितु देखने वाले के मन में उत्सव का संचार होता है।
साभार- रऊताही 2003

छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य

नृत्य की परम्परा हमारे विश्व की प्राचीनतम परंपरा रही है। प्रत्येक देश तथा उस देश की आंतरिक सीमाओं में स्थित प्रत्येक राज्य का एक अलग नृत्य होता है जिन्हें हम लोकनृत्य के नाम से जानते हैं।
आदि मानव की उपासना, भाव प्रवणता, सुकुमान कल्पना और आनंद-उन्माद की स्पष्ट झलक इसमें देखने को मिलती है, अपने समावेशी चरित्र के कारण लोकनृत्य आज तक जीवित है।
लोक से जन, जन समूह और ग्राम्य तथा वेद से नगर या अभिजात्य वर्ग को बोध होता था- उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जाता है। जन प्रचलित समूह नृत्य को लोकनृत्य अपने मूल रूप में अधिक स्वच्छन्द और नित्यीज होता है।
आदि मानव के इतिहास से पता चलता है कि आदि मानव शिकार से लाए गए पशु को भूनकर खाता था और खुशी में आग के चारों ओर समूह में नाचता था। इस बात को एक प्रत्यक्ष उदाहरण से समझा जा सकता है- एक अबोध बालक खुशी के मारे किलकिने, कूदने और ताल बजाने लगता है। इसकी शिक्षा उसे कहीं से नहीं मिलती। उसकी प्रसन्नता ही उसके रक्त में घुलने लगती है और अंग विक्षेप शुरु हो जाता है। आदिम अवस्था में ये प्रवृत्तियां अधिक सबल, उत्तेजक और उदात्त रही होगीं। इसी किलकने से सुर, सुर से भाषा, भाषा से गीत, गीत से ताल और उछलकूद से नृत्य का विकास हुआ होगा।
यहीं से लोक नृत्य की प्राचीनतम परंपरा की शुरुआत हुई होगी, छत्तीसगढ़ भले ही भारत देश का सबसे पिछड़ा हुआ राज्य हो परन्तु लोक कला के विषय में छत्तीसगढ़ बिल्कुल भी पीछे नहीं, इन लोक कलाओं में से लोक नृत्य भी एक है।
छत्तीसगढ़ में एक नहीं कई लोक नृत्य इसका अध्ययन हम क्रमवार शीर्षक में कर सकते हैं-
1. सरहुल-  सरगुजा, जशपुर और धर्मजयगढ़ तहसील अंचलों में बसने वाले उरांव जाति के लोगों का यह धार्मिक नृत्य है। आदिवासियों का यह प्राचीनतम विश्वास है कि साल वृक्षों में जिन्हें स्थानीय बोली में सरना कहा जाता है महादेव वास करते हैं। महादेव और देव पितरों को प्रसन्न करने और सुख-शान्ति की कामना के लिए उरांव चैत-पूर्णिमा की रात उस उत्सव नृत्य का आयोजन होता है। इसकी शुरुआत धर्म प्रवण गीतों से होती है पर रात होने पर यह नृत्य मादक होने लगता है। यह मुख्य रूप से प्रकृति पूजा का एक रूप है। टोटका के रुप में चौरा या ऊंचे स्थल पर झंडा गाड़ा जाता है तथा इसके चारों ओर समूह में नृत्य करते हैं।
2. डोमकच- यह आदिवासी युवक-युवतियों का प्रिय पर्व होता है। इसीलिए कई विद्वान इसे विवाह- नृत्य कहते हैं यह अगहन से आसाढ़ तक रात भर चलता रहता है और लगातार यह नृत्य एक पखवाड़े तक चलता है। यह एक विलम्बित गीत वाला नृत्य में एक लड़का एक लड़की का क्रम रहता है ये एक दूसरे के गले या कमर में हाथ डालकर आगे पीछे झुकते हुए नृत्य करते हैं। इस नृत्य के प्रमुख वाद्य यंत्र मांदर, झांझ, तथा टिमकी है। इस नृत्य के गीत में सादरी बोली के शब्दों का बाहुल्य होता है।
3. सुवना- सुवना नृत्य को सुआ या सुवा के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से गोर और डिडवा स्त्रियों का समूह नृत्य है। यह नृत्य दोपहर से शाम तक या सुव्यवस्थित तक चलता है। डिंडवा विवाह के समय रात्रिकालीन नृत्य है। डिड़वा जाति की स्त्रियां इस नृत्य को पर्रे में रखे हुए कंकड़ को उछालकर बजाती हुई घुम-घुम कर करती हैं। यह नृत्य धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत आता है। इसका प्रारंभ दीवाली से होता है तथा समाप्ति अगहन की पूर्णिमा के पश्चात होता है। इस नृत्य के लिए किसी वाद्य-यंत्र की जरूरत नहीं होती है। ताली, चूड़ी की खन खनाहट, टोड़े पैरी की झुनकी ही मधुर तथा कर्णप्रिय संगीत को उत्पन्न करते हैं। इसमें एक लड़की जो सुग्गी रखती है जो कि शंकर-पार्वती के प्रतीक होते हंै।
4. डंडा नृत्य-  इसे शैला नृत्य भी कहते हैं। यह नृत्य पुरुष प्रधान नृत्य होता है। यह नृत्य छत्तीसगढ़ के रास के नाम से प्रसिद्ध है। इस नृत्य में ताल का आध्यात्मिक महत्व है और ताल मुख्य तथा डंडों की चोट से उत्पन्न होता है इसी कारण इसे मैदानी भाग में डंडा नृत्य तथा पर्वतीय भागों में शैला नृत्य के नाम से जानते हैं। इस नृत्य में कम से कम 4 तथा अधिकतम 50 नर्तक होते हंै। इन नर्तकों की संख्या सम संख्या में होती है। नर्तक घुटने के ऊपर तक धोती, कुर्ता, कुर्ते के ऊपर जैकेट आदि पहनते हैं। गेंदे की माला से लिपटी हुई पगड़ी बांधते हैं जिसमें मोर पंख की कड़ी का झुल होता है, कई जवान रुपिया, सुता, बहुरा, चूरा, पांव में घुंघरु पहनते हैं। इस नृत्य में वे श्रीकृष्ण का भेष बनाते है। आंखों में काजल, माथे पर तिलक, पान से रंग हुए होठ व रस रुप में कृष्ण की ही प्रतिमूर्ति दिखाई देते हंै। इन कलाकारों में एक मुख्य गायक एक कुहकी देने वाला जिससे नृत्य की ताल बदलते रहती है। एक मृदंग वाला और दो तीन झांझ बजाने वाले होते हंै तथा इन्हीं के चारों ओर गोला बनाकर नर्तक नृत्य करते हंै। इन नर्तकों के हाथों एक सा दो डंडे होते हैं। इसका प्रथम चरण ताल मिलाना दूसरा चरण कुहनी के पक नृत्य चालन और उसी के साथ गायन है। डंडे के समवेत ध्वनि से आहुदकारी लक्ष्य उपस्थित होता है। नृत्य के आरंभ में क्रमश: शंकर सरस्वती और गणेश तथा इनके बाद राम तथा कृष्ण के पद गाए जाते हैं। यह नृत्य कार्तिक से फागुन तक होता रहता है। इस नृत्य के माध्यम से बनगवां में वर देखने का प्रचलन है। शरद और बसंत की रात्रि में यह नृत्य वास्तव में रास जैसा ही सम्मोहक हो उठता है। इस नृत्य की कई शैली है। यह नृत्य वीरता का प्रतीक है। इसमें जुझारु शक्ति का प्रदर्शन होता है।
5. रावत नाच- इस नाच को मड़ई, अहिरा और गहिरा नाम से भी जाना जाता है। इसका प्रारंभ देवउठनी एकादशी से होता है जो पूर्णिमा तक चलता है। इस नृत्य में मुख रूप से यादव, अहीर, पहटिया, ठेठवार, राउत आदि के नाम से प्रसिद्ध जातियाँ इस नृत्य में देवारी के रूप में जाना जाता है। इस नृत्य के तीन भाग होते हैं-
1. सुहाई बांधना- रावत जाति का मुख्य पेशा गो पालन है। वे अपने मालिकों के घर जाकर उनकी गायों में सुहाई बांधकर उनकी बढ़ोत्तरी की कामना करते हैं। इसके बाद ही इस नृत्य का आरंभ होता है।
2. मातर- एकादशी के दिन ही रावत लोग देव पितरों की पूजा करते है। फिर मुखिया के घर जाकर वहां गांजा, दारु चढ़ाने के बाद गड़वा बाजा सहित नाचते हुए निकल जाते  हैं। यह नृत्य लालित्य से भरा हुआ रहता है। किसान उन्हें अनाज देकर विदा करते हैं।
3. काछन- यह इसका तीसरा भाग है। काछन चढऩे पर नर्तक दोहा गाते हंै। काछन उनके देवता चढऩे का प्रतीक है। नर्तकों की शक्ति तीक्ष्ण होती है। वे सटीक दोहों का निर्माण करते हैं।
6. करमा नृत्य- करमा सतपुड़ा और विंध्य पर्वत श्रेणी के बीच सुदूर ग्राम्यांचलों का प्रसिद्ध नृत्य है। इस नृत्य में संगीत योजना समृद्ध होती है। राग के अनुसार ही इसकी नृत्य शैली बदलते रहती है। इसके गीतों की टेक समूह गान के रूप में पदात्तर में गुंजता रहता है। पदों में ईश्वर की स्तुति से लेकर श्रृंगार परक गीत होते है। मंजिरा और झांझ की लय ताल पर नर्तक लचक-लचक कर आगे पीछे होती कदम मिलाते अपनी जगह भांवर लगाते अगल-बगल हिलते-डूलते हुए वृत्ताकार में नृत्य करते हैं। आदिवासी क्षेत्र में इसकी लय की उठान उदभूत होती है। दारु और कोसना इस नृत्य को और भी मादक बना देते हैं।
7. काकसार- यह अबूझमाड़ के माडिय़ों का महान पर्वत नृत्य है जो फसल कटने से बानी तक चलता है। इस नृत्य कला के दो पक्ष हैं। प्रथम गोत्र पूजा और दूसरा क्षेत्र की जनता के लिए मंगल-कामना हेतु देवताओं से याचना, विशेष अवधि के पश्चात पति-पत्नी सहवास, युवक-युवतियों का साथी चुनाव, गोत्र पूजा के  अंतर्गत खेती से स्थलों का चुनाव की आह्वान क्रियाएं आदि आती हैं। स्थल का चुनाव कायम मेठा अर्थात उनका बैगा करता है और उसी के आदेश पर युवक-युवती स्वच्छंद होकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य रातभर चलता है। रात के साथ-साथ इस नृत्य की मादकता भी बढ़ते जाती है।
छत्तीसगढ़ के लोकनृत्यों में काफी एकरुपता है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता हैं आदर भावना नहीं है। यहां के नृत्य मात्र मनोरंजन के साधन नहीं है। जातीय नृत्य भी धार्मिक अनुष्ठान के अंग हैं। देव-पितरों की अर्चना-पूजा के बाद मनुष्य का सुख-दुख अर्थात् लोकजीवन प्रकृति के साहचर्य के साथ यहां शामिल है। प्रकृति के अनुरुप ही यहां के नृत्य-ऋतु परिवर्तन के कारण अलग-अलग शैली में विकसित हुए हैं।
साभार  रऊताही 2003