Tuesday, 21 October 2014

समरसता के प्रतीक अहीरवाल के लोकगीत

ब्रह्माण्ड में धरती पर जन जीवन है वैसे वैज्ञानिकों की मानें तो दूसरे किसी अन्य ग्रह पर भी प्राणी रहते हैं जिनको एलियंस नाम दिया गया है। ये बातें वैज्ञानिकों की अपनी सोच व खोज पर आधारित हैं फिर भी अपनी धरती पर तो प्राणी हैं ही जो हम स्वंय हैं। धरती पर रहने वाले प्राणियों में लख चोरासी योनियों के बारे में कहा और सुना जाता है जिनमें मनुष्य श्रेष्ठ है। मनुश्य श्रेष्ठ इसलिए माना जाता है इस पर चर्चा करने से पहले लख चोरासी योनियों के इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के प्रयास किए जा रहे हैं। संपूर्ण धरती पर सभी प्रकार के जीवों को अगर गिना जाता है तो शायद ही चौरासी लाख योनियों के समकक्ष पहुचना बहुत ही असंभव होगा। इससे तात्पर्य यह है कि लख का षाब्दिक अर्थ हुआ देखना/देख। चौरासी का शाब्दिक अर्थ हुआ चवराषी यानि चार राषी/चार हिस्से। कुल मिलाकर लखचवराषी हुआ जिसे हम चार राशियों में देख सकते हैं या देखते हैं। यथा; जेरज, अण्डज, जलज और कीटज। जेर में पैदा होने वाले जीव, अण्डे में पैदा होने वाले जीव, जल में पैदा होने वाले जीव और कीट में पैदा होने वाले जीव। सकल धरा पर इन चार तरह से पैदा होने वाल जीवों में सभी जीव आ जाते हैं। सभी जीवों में मनुष्य श्रेष्ठ बुद्धि का धनी होने के कारण माना जाता है। जहां मनुष्य के पास अपनी बुद्धि अपनी सोच है तो मनुष्य अपनी पसंद की चीज की खोज भी कर सकता है। मनुष्य में खुशी और गम दोनों को महसूस करने की क्षमता भी है। जहां खुशी और गम होगा तो वहां पर हर तरह के प्रचलन भी होंगे, मनोरंजन भी होंगे, जहां मनोरंजन होगा वहां संगीत भी होगा, जहां संगीत होगा वह गीत बिना अधूरा ही होगा। गीत होगा तो वहां की संस्कृति की झलक स्वत: ही दिख पडेगी। पूरी धरती पर अगर प्रकाश डालें तो पता चलता है कि सबसे प्राचीन गूढ रहस्य के चार वेद हैं जिनका गूढ रहस्य आज भी छिपा हुआ है। उस रहस्य को आजतक किसी ने पूर्णरूप से उजागर नहीं किया है। इन चार वेदों की रचना हरियाणा की पावन धरा पर हुई है। ये वेद हैं- ़ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद। ऋग्वेद में भौतिक ज्ञान, यजुर्वेद में आयुर्वेद, सामवेद में संगीत है तो अथर्ववेद में आर्थिक ज्ञान भरा पड़ा है। हरियाणा की भूमि पर सबसे पहले अहीरों की बसाहत हुई जिससे इस क्षेत्र का नाम पहले पहल अहीरवाल पडा इसी नाम से अहिराणा बाद में उसका अपभ्रंस हरियाणा पडा। जिस धरती पर वेदों की रचना हुई जिसमें संगीत के रहस्य को छुपाए हुए एक वेद हो तो वह क्षेत्र संगीत के मामले में भला किसी से पीछे क्यों रहता। अहीरवाल के पास गीत तो हैं ही साथ में अनेक विद्वानों की राय के अनुसार संस्कृत के बाद बोली जाने वाली प्रथम भाषा अहीरवाटी थी फिर हिन्दी का जन्म हुआ। अहीरवाटी बोली एेसी सरल बोली है जिसका मेल संस्कृत से ज्यादा है, हिन्दी से कम है फिर भी थोड़ी बहुत हिन्दी भाषा को जानने वाला भी आसानी से समझ सकता है जबकि हरियाणा ही आज प्रचलित जटवाटी बोली को समझना बहुत ही कठिन है। मेरे दिल ने कहा कि संस्कृत और हिन्दी के बीच की प्यारी और श्री कृष्ण की बांसुरी की तरह सुरीली बोली अहीरवाटी में रचे गए गीतों पर एक लेख लिखा जाए ताकि सभी विद्वत जनों का ध्यान इस आेर खिचे।
अहीरवाल क्षेत्र में जीवन से मरण तक के हर अवसर पर गीतों को गाने का प्रचलन है, इन गीतों को पुरूष व महिला दोनों ही गाते हैं। आप के समक्ष महिलाआें द्वारा गाए जाने वाले गीतों पर प्रकाश डाला जा रहा है। महिलाआें द्वारा गाए जाने वाले गीतों को धरती के गीत कहा जाता है क्योंकि ये गीत धरती से जुड़े हुए हैं। लोगों के द्वारा हर अवसर पर इन गीतों को गाने का प्रचलन होने के कारण इन्हें लोक गीत की संज्ञा दी जाती है। लोक गीत साज और बाज के साथ बिना साज और बाज के भी गाए जाते हैं। आज के इस युग में बडे-बड़े शहरों और नगरों में बड़े-बड़े कवि सम्मेलनों का प्रचलन कुछ ज्यादा ही हो रहा है इन सम्मेलनों में जो कवि अपनी कविता का कविता पाठ करता है वह बिना साज और बाज के करता है। उस कवि की स्वयं द्वारा रचित गिनती की बहुत ही कम कविताएं होती हैं, बहुत से कवियों के पास तो पांच से दर्जन भर ही कविताएं होती हैं जिन्हें वह बारी-बारी से अलग-अलग शहरों में होने वाले सम्मेलनों में प्रस्तुत करके श्रोताआें की वाहवाही लूटता है। कई बार तो एेसा भी हो जाता है कि जो इस वर्ष जिस शहर में कविता प्रस्तुत की उसी कविता को अगले वर्ष उसी शहर में प्रस्तुत कर देता है। अगर श्रोताआें के सामने तुरंत किसी विषय पर कविता रच कर सुनाने को कहे तो शायद ही कोई कवि एेसा कर पाए। जबकि धरती से जुडे कवि जिन्हें लौकिक कवि/लोक कवि कहा जाता है उनकी बराबरी किसी भी तरह सम्मेलन वाले कवि नहीं कर सकते हैं। वासतव में लौकिक कवि लोगों के कवि होते हैं लोगों के प्रश्नों के उत्तर कविता के माध्यम से तुरंत देना जानते हैं और संगीत द्वारा अच्छी धुन में गाकर भी सुनाना जानते हैं। लौकिक कवि आदमी और औरत दोनों ही होते हैं। इसलिए औरत द्वारा रचित कविता को धरती के गीत/ लोक गीत कहा जाता है। महिलाआें द्वारा रचित गीतों की संख्या अहीरवाल क्षेत्र में लाखों में है। प्रख्यात साहित्यकार श्री रोहित यादव ने कड़ी मेहनत से अहीरवाल के लोक गीतों का संकलन किया है इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले लोक गीतों की  कुछ झलक प्रस्तुत हैं- सावन के गीत - सावन मास में गाए जाने वाले गीतों की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं- और सखी तो अम्मा मेरी सब चाली जी, एे जी कोई हमनै भी झूलन भेज, घल्यो एे हिन्डोलो चम्पा बाग मै जी। दूसरे गीत की पंक्तियां दृष्टव्य है- बागां में पपीहो बोल्यो, मै जानी कूण आवै सै। आवै सै यो शमशेर बीरो, के के सौदा ल्यावै सै। मां की तील भान को जाडो, बहू की रिमझिम ल्यावै सै।
सावन मास में तीज त्यौहार पर गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- आई री सासड साावन की तीज हिन्डोलो घल्यादयो जी चम्पा बाग मै। म्हारै तो बहुवड चम्पा ना बाग, जाए घलाआे अपना बाप कै। सावन मास में भाई अपनी बहनों की ससूराल में कुछ न कुछ दे कर आते हैं जिन्हें कोथली कहा जाता है। पढ़ें प्रस्तुत पंक्तियों में- मीठी तो करदे अम्मा कोथली, जाउ भान कै देष पपीहो बोल्यो पीपली। फागुण के गीत - अहीरवाल क्षेत्र में फागुण मास में जवान से बूढे तक सब किसी में मस्ती आ जाती है मस्ती भरे परिवेश में गाए जाने वाले गीतों में भी मस्ती की झलक साफ नजर आती है प्रस्तूत हैं ये पंक्तियां- एक सूसर कै दो बहू रै लाला, दोनू पानी नै जाय। रामचंद्र फागण आयो रंग भरयो रै लाला, आगली का सिर पै टोकणी रै लाला, पिछली का सिर पै माट, रामचंद्र फागण आयो रंग भरयो रै लाला। फागुण मास में मस्ती भरे माहौल में राजा, नबाब, किसान व मजदूर सभी बराबर होते हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में देखें- होली खेलन आवै नबाब कहियो मुरेटन नै, होली भी खेलै गलियों मैं उडावै गुलाल। फागुण मास की समाप्ति पर होली का त्यौहार आता है। इसलिए होली के गीत भी गाए जाते हैं जिनमें बहनें भाईयों का मान बढाने व वीर बनाने की कामना यूं करती हैं- होली होली एे तेरो लम्बो टीको, लाम्बा डस की डोरी। डोर फिरावै रजनीश बीरो, रजनीश की बहू गौरी। फागुण के मस्त मास पर ये पक्तियां दृष्टव्य हैं- भागण का मस्त महिना मन्नै तेरी सूं। कोरी-कोरी चांदी की तागड़ी घड़ाई, उस पै जड़ाया नगीना मन्नै तेरी सूं। कहियो री उस सूसर मेरे नै बिन घाली ले जाए फागण मै, कहियो री उस बोहडिया म्हारी नै, दो महिना दम खाय पिहर मै। अगली पंक्तियां - षीषी जैपूर का रै बजार मै, पडयो नगादी सांप। मेरो इब रै निवाणों दिल्ली आगरो, षीषी दिल्ली का रै बजार मै, लोटन कबूतर जाय। अगली पंक्तियां- कैठे तो बोवा केषरो, कैठे कसूबा रो पेड। कसूबे केषरो तेरा रंग पै रीझी रै, क्यारी तो बोआ केषरो रै, धोरा कसूबा रो पेड। मंगल गीत- ये गण जाया अर्जन पाण्डे, यो कण जायो हनुमान। हनुमान पियारे ये दल कित रै समाये। कुंती जाया अर्जन पाण्डे, अंजनी नै जायो हनुमान। जच्चा गीत - जब किसी महिला को बच्चा पैदा होता है तो उसे जच्चा कहा जाता है। अहीरवाल में जच्चा गीत बहूत ज्यादा गाए जाते हैं। एक गीत की पंक्तियां दृष्टव्य हैं- छोटी सी जच्चा लाडली, हरमूनयो बजा रही जी। सूसरो जी आवै, दिखा बोहडिया ललना म्हारा, ललना सो रहया पलना, मै झूला झूला रही जी। जच्चा को तरह-तरह के व्यंजन- पकवान खिलाए जाते हैं। इस पर महिलाएं प्रस्तुत गीत के माध्यम से ठिठोली करती हैं- जच्चा की चटोरी जीभ जलेबी भांवै सैं, हे सुसरा नै गिरवी धरदे हे सासू का लगादे ब्याज जलेबी भांवैं सैं। बच्चा होने पर विभिन्न नेग दिए जाते हैं। उस पर गीत की प्रस्तुत ये पंक्तियां- हां आे पिया तडकै सबेरी दाई आवैगी, हां आे पिया होलर जनाई नेग मांगै गी। हां रै गौरी दे दिये और उल्टा ले लिये, हां रै गौरी बात चितां सी राजी कर लिये, हां रै गौरी ज्यादा करै तो डण्डा दो दिये। पीला गीत- कूआ/जलवा पूजन के अवसर पर पीला आेड कर जच्चा जाती है। इस गीत को प्रस्तुत ये पंक्तियां- पीलो तो आेढ म्हारी जच्चा सरवर चाली जी कोई सारे शहर सराही गोडा मारू जी। पीलो रंगादयो जी। भायली गीत- जच्चा की सखी पीला पोतडा जच्चा के घर ले कर आती है तो महिलाआें का झुण्ड साथ ले कर गीत गाती हुई आती हैं। गीत की प्रस्तुत पंक्तियां- भवर म्हारो भायली कै जाय, भायली कै आबो-जाबो झोडदे आे, मरूंगी विष खाय, भवर म्हारो भायली कै आबो-जाबो ना छूटै आे, कल मरो जित आज। बंदडी गीत- जिस कन्या का विवाह होना होता है उसे बंदडी/बनडी/बन्नी कहा जाता है। बंनडी गीत लगन देने के उपरांत विवाह तक प्रतिरोज रात्री को गाए जाते हैं। एक गीत की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं- बन्नी की दादो बरजै, लाडो नीम तलै मत जाय, कडा नीम की कडी निम्होली चालै हुचकी। मेरो रायबर याद करै सै, डट ज्या ए हुचकी। दूसरे गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- लाडो बूझै दादी से हे दादी, लाडो बूझै ताई से हे ताई, मै कैसे देखन जाउ, रंगीले आ उतरे बागां मै। बंदडा गीत- जिस लडके का विवाह होना होता है उसे बंदडा/बनडा/बन्ना कहा जाता है। बंदडा गीत लगन लेने के उपरांत विवाह तक प्रतिरोज रात्री को गाए जाते हैं। एक गीत की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं- बन्ना हो थारी हेली कै चौसठ पैडी, बन्ना हो मै तो चडती उतरती हारी। ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं- बन्ना चावलों का हो रहया महंगा भाव हो, मै कैसे बुलाउ रिस्तेदार हो। मैनै दादा बुलाया दादी आई हो, सारे बालकां नै संग ले आई हो। भात गीत- विवाह से पूर्व बहन भाई के घर विवाह का न्योता देने जाती है तब गीत गा कर भात नोतने जाया करती हैं। ये पंक्तियां प्रस्तुत हंै- हे मै रूणझुन बहल जुडाय भात नोतने चाली। हे बाबल की आई हवेली मैनै उत ही बहली डाटी, हे इतना मै बोल्यो कन्हैयो, हम ना ल्यां भेली रूपइयो। अहीवाल सैनिकों की खान है। बहन भाई को कहती है कि भाई नौकरी पर मत जाना तैरी भान्जी का विवाह है भात भी भरना है। फिर भी भाई नौकरी पर जाता है और समय पर छुट्टी ले कर आता है और भात भरता है। ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं- रै बीरा नौकर मतना जाइये मेरा कूण भरैगा भात। एे जीजी नौकरी का के डर सै तेरा आण भरूंगा भात। रै बीरा पांचू भाई अइयो, मेरो सारो लाइयो परिवार। जब भाई भात भरने आता है और बहन को देहली पर चुन्दडी आेडाता है उस समय के गीत की ये पंक्तियां प्रस्तुत हैं- आज सीम मै मेरो बीरो जगमग्यो, आयो मेरो मा को जायो बीर, हीराबंद लायो चुन्दडी। जै मै आेढू ंतो हीरा झड पडीं, डिब्बा मै धरूं तो तरसै जी, सादी क्यूना लायो चून्दडी। अपने भाई की जिठानी दोरानी के भाईयों के द्वारा लाई गई चुन्दडी से ज्यादा बढिया बताती हुई गाती हैं जिसकी पंक्तियां प्रस्तुत हैं- मेरी जिठानी कै पांच भाई मेरी मा को जायो एक सै। वे तो पांचू आया पचाय ल्याया, मांगी तो ल्याया वे चूंदडी। बान गीत- लगन के बाद और विवाह से पहले बान किये जाते हैं। जिस मौके पर बान गीत गाए जाते हैं, बान गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- आ एे तेलन तेल एे म्हारै चमेली का तेल एे। षमषेर घर सै कुल बहू संतोष तेल चढाइयो। दूसरे गीत की पंक्तियां दृष्टव्य हैं- काहे कटोरी मै उबटनो, काहे कटोरी मै तेल। रूप कटोरी उबटनो सूण कटोरी मै तेल। विवाह वाले दिन तेल उतारा जाता है उस गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- आए एे तेलन तेल एे, म्हारै चमेली को तेल एे। संजय घर सै बोहडिया षुषीला तेल उतार एे। आरता गीत-आरता वर व कन्या दोनों का ही किया जाता है। आरता सुहागन जीजी करती है कभी-कभार बुआ/भाभी भी आरता करती हैं। आरता गीत की पंक्तियां प्रस्तुत है- एक हाथ लोटो गौद बेटो, कर एक सुहागन जीजी आरतो। एक हाथ कसीदा, गौद भतीजा कर एक सुहागन जीजी आरतो। निकासी गीत- वर की निकासी निकाली जाती है उस समय के गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- घोडी डाट ले बंदडा, चलती तो घोडी ना डटै दादी एे, एे जी या तो जाय डटैगी सूसराल। दूसरे गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- अनोखा लाडला आे रायबर, मजल्यां-मजल्यां चालै। एक मंजिल तेरी आगरै आे रायबर दूजी संगानेर। कै तीजी सासरै आे रायबर। खोडिया गीत- जब वर की बारात विवाह करने चली जाती है उस रात को घर व गांव की महिलाएं घर के आंगन में इकट्ठी हो कर खोडिया नृत्य करती हैं। इन गीतों में सभी प्रकार की हांसी व ठिठोली होती है, वहीं सभी तरह के अभिनय नर-नारी आदि महिलाएं ही करती हैं। खाडिय़ा गीत की पंक्तियां प्रस्तुत हैं- मा मेरा ब्याह कर दे ना तो बंदडे की भाभी नै लेकै भाग जाउगो। वा तो लंबी घनी रै मेरा लाल, तेरी उं की नाही बनै। दूसरे गीत की पंक्तियां यूं हैं- सपेला बीण बजाइये हो चालूगी तेरै साथ। एे महलां की रहने आली, रै तनै झोंपडी लगै उदास। झोंपडी मैं गुजर करूंगी आे पर चालूंगी तेरै साथ। अगले गीत की पंक्तियां ये दर्षाती हैं- मेरी पसली मै दर्द उठयो री मेरी माय। कहो तो बेटी तेरा सूसरा न बुलादयू, नहीं री मेरी माय, नहीं री मरी माय, उस बूडला का काम नहीं री मेरी माय। अगले गीत की मंक्तियां क्या बताती हैं- मन्नै चूंदडी मंगादे हो आे ननदी का बीरा। तनै नू तनै नू घूंघट पै राखू हो आे ननदी का बीरा। फेरा गीत- फेरों पर गाए जाने वाले गीतों में से एक गीत की बानगी देखिए- गढछोड रूकमण बाहर आई, चौरी तो छाई म्हारै बालमा। कन्यादान गीत- कन्यादान गीत की एक झलक देखिए- लाडो को दादो दे रहयो दान, दादी राणी बरज रही, मत बरजो तिरिया नार, लाडो कोई दिन की। सीठना- अहीरवाल क्षेत्र में सीठनों का बडा ही महत्तव है। सीठना एक एेसी परम्परा है जिसमें अपशब्दों, गालियों और फूहडता का इस्तेमाल भी सरेआम किया जाता है फिर भी लडाई झगडा नहीं होता है और इन सीठनों से ज्ञानवर्धन भी होता है। सीठना गीतों की कुछ पंक्तियों की निम्नलिखित झलकें प्रस्तुत हैं- बारातियों पर- हमनै बुलाये मूछाआले, ये मुछकटे क्यूं आए जी हमनै बुलाए गौरे-गौरे ये काले-काले क्यूं आए जी। समधी पर- चाकी मै राछ घलादयो री चाकी मै। समधी नै पीसन लगाादयो री चाकी मै। जै पीसैगा मोटा मारूंगी रै सोटा, भागते का पाडल्यूं लंगोटा रै समधी का। मौसा पर- सुन मेरे मौसा सुण कै जा, मौसी नै गिरवी धरकै जा। सुन मेरे मौसा सुनकै जा सोने की हसली देकै जा। दामाद पर- हे जी बडा रगड मसल धोया पाव, तडकै तो जांगा सासरै जी मा का राज। ननदौई पर- कैठासी आया प्यारा पावना जी, कैठेे लियो सै मकान ननदेउ जी। लाड जमाई प्यारा पावना जी। स्याणा सीं आया प्यारा पावना जी, आनंदपुर लियो सै मकान ननदेउ जी। जीजा पर- बिन बादल बिन बादली, यो अंबर क्यानै छायो जी।
मै तूनै पूंछू एे सखी यो षमषेर क्यानै आयो जी, यो जीजो क्यांनै आयो जी। दूसरे गीत की पंक्तियां- हरी-हरी मुरेलन कै इक्कादुक्का पान, वो तो साला बहनेउ दोनू नहायबा नै जाय, जीजा नै नहानू ना आवै वो तो लोटपलोटा खाय, उको सालो होशियार, उकै मारै दबोचा चार, मत मारा आे साला तनै भान ब्याहदूं चार। विदाई गीत- जब कन्या की शादी के बाद विदाई होती है उस अवसर पर अनेक गीत प्रचलित हैं। जिनकी बानगी देखिये- तुलियां का बंगला हो, बाबल चिडिया नै खोस लियो और मंगादयो दो चार धीयड घर जा अपने। दूसरे गीत की पंक्तियां- जीजी राम राम हे, कदे फेर भी मिलां, तू तो भूल ज्यागी हे, हम तो याद करां। तीसरे गीत की पक्तियां- सुन आे जीजा सुनतो जाइये, महारी नमस्ते लेतो जाइये। चौथे गीत की पंक्तियां- साथन चाल पडी, मेरा डबडब भर आया नैन। नापने का गीत- वर वधू को ब्याह कर घर पहूंचने पर घर के द्वार पर वधू को नापा जाता है। उस गीत की पंक्तियों के अंश देखिए- गोर गडी एे गोर गडी। सासू छोटी बहू बडी। सेडभईया गीत- वधू को ब्याह कर लाने के बाद अगले दिन सेडभईया की धोक लगाई जाती है। इस अवसर पर गाए जाने वाले गीत की ये पंक्तियां प्रस्तुत हैं- छोटो निंबू बडो एे अनार, छोटो सो निंबू रस भरयो टपक टपक रस जाय चुसन आलो घर नहीं। बधावा गीत- लडकी की शादी करने के बाद जब वह ससुराल के लिए रवाना हो जाती है उस समय पर बधावा गीत गाया जाता है। उसके अंश देखिये- म्हारै आंगन बाजो बाज्यो जी मा का राज। पिछवाडे जी साहिबा लग्यो सै निसान, बधावा नै सुनो जी मा का राज। बाबा भईया गीत- उंचा थारा कोट, नीची थारी खाई जी। उठो बाबा भोमिया खोल किवाडी जी।
गीतों की झलक जो उपर दर्शाई गई इनके अलावा उक्त अवसरों पर बहुत से गीत गाए जाते हैं तथा दर्शाए गए अवसरों के अलावा पुत्र कामना, पुत्री जन्म, आेजना, प्रसवपीड़ा, वायदा, नेग, उपहार, भतीजे के जन्म, छूछक, व्यंजन, कन्या के विवाह की चिंता, सुहाग, बारात की पहूंच, कंगण जुआ, परेवा, पनघट, चक्की, खान-पान, पहनावा, देवी-देवता, सींझा, देवोत्थान, कातक नहान, तुलसी पूजा, गनगौर, प्रेम, विरह, कृषि, सैनिक परम्परा, उल्हाना, शिक्षा, नसीहत, व्रत एवं त्यौहारों आदि अवसरों पर लोक गीत प्रचलित हैं ही साथ में पति की मौत पर, पत्नी की मौत पर, कुंवारी कन्या की मौत पर, विवाहिता पुत्री की मौत पर, जमाई की मौत पर भी लोक गीत प्रचलित हैं। महिलाएं जब गीत गाती हैं तो अपने बीच में या आस पास में पुरूष नहीं होते हैं मगर उनके गीतों को पुरूष पुरूषालय में भी बडी सहजता से सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। महिलाएं कभी कभी तो इतने अभद्र गीतों को भी गा डालती हैं फिर भी उनके द्वारा गाये गये गीतों पर अहीरवाल समाज में कोई एेतराज नहीं होता है। अहीरवाल क्षेत्र दक्षिणी हरियाणा, दिल्ली सूबा, उत्तरी राजस्थान के अलवर, जयपुर, सीकर और झुंझंूनू जनपदों के अधिकतर हिस्से में बटा हुआ है। फिर भी इसे अहीरवाल कहा जाता है। प्राचीन काल में इसका विस्तार बहुत ज्यादा था। विभिन्न राजाआें, बादशाहों की राजधानी इसी अहीवाल क्षेत्र में होने के कारण इसने बहुतसी परेशानियों को झेला है।
यहां के वीर सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुतियां दे कर देश की रक्षा की है। भारत वर्ष के प्राचीन काल से लेकर अब तक के सभी छोटे से बडे़ युद्धों  में अहीरवाल के वीर जवानों ने अपनी सहादतें बहुत ज्यादा संख्या में दी हैं। इसीलिए अहीरवाल को सैनिकों की खान कहा जाता है। अहीरवाल की मानी जाने वाली राजधानी भगवान श्री कृष्ण के बडे भ्राता बलराम की पत्नी रेवती के नाम पर पडे़ रेवती नगर जो अब रेवाड़ी नाम से जाना जाता है। अहीरवाल की राजधानी रेवाड़ी मानी जाती है। पाण्डवों का बनवास काल का अधिक समय इसी अहीरवाल क्षेत्र में बीता वहीं अज्ञातवास भी इसी क्षेत्र में बिताया। संसार की प्राचीनतम पर्वतमाला अरावली का बहुतसा हिस्सा, मरूस्थल का हिस्सा भी अहीरवाल क्षेत्र में आता है। संसार के प्रथम वैज्ञानिक ऋषि उद्दालक ने भी अहीरवाल क्षेत्र में ही अपनी तपस्या की थी। हमें भागदौड़ भरे जीवन और तकनीकी युग में लोक गीत गाए जाने का समय ही नहीं मिल पाता है क्योंकि बहुत सी शादियां समारोह स्थलों में होने लग गई हैं। लगन भी तीन या दो दिन के ही आने लग गए हैं। अन्य अवसरों पर तो लोक गीत आज भी खूब प्रचलन में हैं। अहीरवाल के लोक गीत सभी में मेलजोल बढ़ाने वाले हैं। इसीलिए ये समरसता के प्रतीक हैं। अगर इनके हर पहलू के लोक गीतों का अलग अलग संग्रह किया जाए तो अलग अलग पुस्तकें तैयार हो सकती हैं। 
साभार रउताही 2014


Monday, 20 October 2014

प्रमुख संस्कार गीत और लोकव्यवहार

छत्तीसगढ़ की जनता का धर्म के प्रति अटूट विश्वास है।  भारत के शास्त्रकारों ने जिन सोलह संस्कारों का विधान किया है उनमें से तीन प्रमुख संस्कार छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से मनाये जाते हैं - जन्म, विवाह और मृत्यु ।
1. जन्मगीत - छत्तीसगढ़ में संतान जन्म को अपार सुखकारी उत्सव के रूप में मनाया जाता है।  यहंा की नारी अपनी संपूर्णता मातृत्व सुख प्राप्त करने में समझती है ।  गर्भिणी होना उसके लिए सबसे अधिक सुखदायी होता है परंतु नौ महीने तक उसे जिस आनंदमयी कष्ट का सामना करना पड़ता है उसे अन्य कोई नहीं समझ सकता ।  इस व्यक्त/अव्यक्त प्रसन्नता से संबंधित; गर्भाधान से लेकर संतान जन्मोत्सव तक पूरे नौ माह की अवधि के गीत जन्मगीत के अंतर्गत आते हैं ।  छत्तीसगढ़ में प्रथम गर्भाधान के सातवें माह में 'सेधौरीÓ संस्कार होता है ।  नौ माह में संतानोत्पत्ति के तीसरे दिन 'कांकेपानीÓ पीने का संस्कार होता है ।  छठे दिन 'छठी' और बारहवें दिन 'बरहीÓ का संस्कार होता है ।  इसी दिन 'कांकेपानी' के घड़े को विसर्जित किया जाता है ।  इन गीतों में बालक के जनमने के पूर्व गाया जाने वाला 'सेधौरी और सोहरÓ प्रमुख है ।  सेधौरी 'साधÓ शब्द से विनिर्मित है जिसका अर्थ है - 'इच्छा की पूर्तिÓ गर्भधारण के बाद कष्ट रहित प्रसव और मनमोहक संतान की कामना हर स्त्री को होती है । उस कामना की पूर्ति के लिए गाया जाने वाला गीत 'सेधौरीÓ गीत है।  सेधौरी का संस्कार प्रथम गर्भधारण के सातवें माह के बाद और नौवे माह के पूर्व किसी भी शुभ दिन में संपन्न किया जाता है । निम्नलिखित गीत में संतान कामना से आल्हादित गर्भवती नारी की प्रसन्नता, शील-संकोच, उसकी शारीरिक अवस्था का संश्लिष्ट चित्रण हुआ है ।  वहीं दूसरी आेर सास-ननद की मनोकामनाआें और उल्लास, उमंग को प्रस्तुत करता यह गीत दृष्टव्य है -
छत्तीसगढ़ी सेधौरी एवं सोहर गीत
पहिली महिना जब लागीस अंग फरियाइस
अंग पियर मुंहु दुरदुर गरभ के लच्छन हो ॥
दूसर महिना जब लागीस सास गम पाइस
जेवनी गोड़ पिछलाय जिया मचलाये हो ॥
तीसर महिना जब लागीस ननद मुसकाइस
आहै लाल कन्हइया पंच लर पाबो जी ॥
चौथा महिना जब लागिस सास पुलकाइस
होही कुल रखवारा मोतियन लुटइहौ जी ॥
पांच महिना जब लागीस बहू माटी खाइस
बीरा पान न भाय मुंह सिट्ठाइस हो ॥
छै महिना जब लागीस पिया के पग लागीस
आआे न पलंग तुम्हार अंग मोर भारी हो ॥
सात महिना जब लागीस सास तीर रोइस
अब नहीं भीतर अमावे दरद मोला सताय हो ॥
आठ महिना जब लागीस अंग भरि आइस
कइसे करके पहिरे लुगरा न सम्हरे हो ॥
नव महिना जब लागीस सास संग मं सोइस
कब उठ जाही पीर सुइन घर दउड़बो हो ॥
दस महिना जब लागीस कन्हइया जनमिस
बजत आनंद बधइया मंगल सब गावे हो ॥
 2. विवाह गीत - विवाह छत्तीसगढ़ का ही नहीं भारत का सबसे प्रधान संस्कार है । भारत के विभिन्न प्रदेशों में विवाह की अलग-अलग परंपराएँ हैं ।  छत्तीसगढ़ की विवाह प्रणाली में आर्य और अनार्य पद्धति का मिला जुला रूप है ।  वरपक्ष द्वारा गये जाने वाले गीतों में उत्साह एवं तदजन्य हर्ष की अभिव्यक्ति होती है तो वधुपक्ष के गीतों में उत्साह और विषाद के भावों की प्रबलता होती है ।  विवाह के अवसर पर अनेक प्रकार के विधि विधानों में 'चूलमाटी, तेलचघी, मायमौरी, बरात प्रस्थान, बरात स्वागत, गारी, टिकावन, भांवर, बिदाई और डहर छेकौनीÓ गीत प्रमुख है ।  चूलमाटी को विवाह का प्रारंभ माना जाता है जिसमें विवाह में उपयोगी चूल्हों के लिए प्रयुक्त मिट्टी को खोदकर लाने के समय गाये जाने वाले गीत सम्मिलित हैं इन गीतों में हास-परिहास प्रमुख रूप से होता है ।  यथा -
तोला माटी कोड़े ला नई आवे मीत धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे तोर मेछा ला तीर धीरे-धीरे ।
जतके परोसे आेतके ला लील धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे तोर कनिहा ला ढ़ील धीरे-धीरे ॥
( एे मित्र, तुम्हें मिट्टी खोदना नहीं आता ।  तुम अपनी मूंछ को धीरे-धीरे खींचों, तुम्हें जितना परोसा जाता है उतना ही धीरे-धीरे निगल लो, कमर को धीरे-धीरे ढ़ीला छोड़ो। )
तेलचघी के गीतों में 'चूलमाटी' के उपरांत विवाह मंडप में वर-वधु के अधो अंग से उपांग में किए जाने वाले हल्दी लेपन के समय गाये जाने वाले गीत आते हैं ।  इन गीतों में वर-वधु के जीवन की सुखद कल्पना के अतिरिक्त उनके माता-पिता के हृदय के विविध भावों यथा पीड़ा, कातरता, प्रसन्नता, हर्ष, खुशी के भाव समाहित होते हैं ।
तेलचघी गीत -
एक तेल चढिग़ेे हो, हरियर हरियर,
मडवा मं दुलुरवा तोर बदन कुमहलाय ।
राम लखन के तेल चढ़ हे वो,
कहंवा के दियना होवे अंजोर ॥
'तेलचघीÓ के पश्चात संपादित होने वाले 'मायमौरीÓ के गीतों के माध्यम से घर की स्त्रियां अपने पुरखों और देवी-देवताआें का आह्वान करती है- 
मायमौरी गीत -
देवता धामी ल नेवतेंव
उन्हू ल न्योतेंव
जे घर छोडिऩ बारे थोरेन
ता घर पगुरेन हो।
माता पिता ल नेवतेंव
उन्हू ल न्योतेंव ।
बरात की पूरी तैयारी हो चुकने के बाद सजे-धजे बरात निकालने के पूर्व 'बरात प्रस्थानÓ के गीत गाते हैं, जिसमें वर के पूर्वानुराग का चित्रण मिलता है -
बारात प्रस्थान (नहडोरी) -
दे तो दाई, दे तो दाई,
असीस औ रूपैया,
सुंदरि ल लान्तेव बिहाय ।
सुंदरि-सुंदरि रटन धरे बाबू,
सुंदरि के देस बड़ दूर ।
तोर बर लानिहंव दाई, रधनी परोसनी,
मोर बर घर के सिंगार ।
बरात जब वधु के गांव पहुंचता है तो पुलकित वधुपक्ष 'बरात स्वागतÓ के गीत से वरपक्ष की अगुवानी करता है ।  इन गीतों में वर के सुदर्शन रूप, बरात की भव्यता और मंडप की शोभा का सुंदर चित्रांकन होता है-
बारात स्वागत (परघनी) -
बड़े-बड़े देवता रेंगत हे बरात
ब्रम्हा महेस
लालि हंसा मं रामचंद चघत हे,
अऊ लछमन चघे सिंह बाघ ।
लहकर रेंगत डांडी अऊ डोलवा,
नाचत रेंगय बरात ।
कै दल रेंगथे मोर हाथी अऊ घोड़ा,
कै दल रेंगथे बरात ।
हाथी मं लादके लाडू अऊ गुड़ ला,
कै ऊंटवा मां बांध चबेना ।
कै दुई घोड़वा सहस दुइ मोहथिया,
पैगा के हाबे अनलेख ।
लाली अऊ पिवरी बरतिया दिखत हे,
के कते दल दुलरू दमाद ।
झीनी पिछौरी के अलगा डारे ते,
के इह ह दुलरू दमाद ।
महल ल देखथे दुलही के भइया,
केतका दल आवते हे बरात ।
हमर सहर मं महादेव पहुंचे,
दुनियां के आवत हे देखइया ।
निकलव कइना अपन महल ले,
कि डोलवा परखिन लागव ।
नई मैं निकलव राजा अपने महल ले
कि डोलवा परिखय तोर बेटा ।
एक तोर परिखय भाई भतिजवा,
एक परिखय ममा के बेटवा ।
पानी के बूंदे सउते के बोली,
कइसे मं जनम पहाये हे ।
एक मिली रहिहो, एक मिलि रवइहौ,
एक मिली जनम पहाये हे।
एक मिली कुटि हौ, एक मिलि पिसिहौ,
एक मिली महादेव के सेवा करिहौ ।
गारी गीत के अंतर्गत वधुपक्ष द्वारा हास-परिहास और विनोद से परिपूर्ण गीत गाया जाता है, जिसमें वर पक्ष के रिश्तेदारों पर और उसके गांव खलिहान पर मधुर कटाक्ष होता है-
गारी गीत -
आमा पान के बिजना, हालत झूलत आये रे ।
किसबिन के बेटा हर, बरात लेके आये रे ।
करिया करिया दिखथय दुलरवा, काजर कस नइ आंजव रे ।
तोर दाई गेहे पठान घर, घर-घर बासी मांगी रे ।
बड़े-बड़े तोर अखियां दुलरवा, काजर कस नइ आंजव रे ।
तोर दाई गेहे लोहार संग, गोहने कसनी लागे रे ।
साम्थ्र्यानुसार कन्यापक्ष 'दामाद बेटीÓ को 'टिकतेÓ हैं ।  'टिकावनÓ के गीत इन्हीं भावों से संपन्न गीत होते हैं-
टिकावन गीत -
हलर हलर मोर मड़वा हाले,
खलर खलर दाइज परे ।
सुरहिन गइया के गोबर मंगइले,
खूंटि धरि अंगना लिपइले ।
गज मोतिन के चऊक पुरइले,
सोन कलस धरइले ।
कोन देवै मोर अचहर पचहर,
कोन देवे धेनु गाय ।
ददा मोर टिकथे लिलि हंसा घोड़ा,
दाई मोर टिकथे अचहर पचहर ।
भइया मोर टिकथे कनक के थार,
भौजी कहा किया काम ।
'भांवरÓ के गीत सात फेरों के समय गाये जाते हैं-
भांवर गीत -
कामा उलोथेकारी बदरिया
कामा ले बरसे बूंद ।
सरग उलोथे कारी बदरिया
धरती मं बरसे बूंद ।
काकर भीजे नवरंग चुनरी
काकर भीजे उरमाल ।
सीता के भीजे नवरंग चुनरी
राम के भीजे उरमाल ।
कैसे चिन्हव सीता जानकी
कैसे चिन्हव भगवान ।
कलसा बोहे चिन्हेव सीता जानकी
मुकुट पहिरे भगवान ।
कामा के चिन्हव सीता जानकी
कामा के चिन्हव भगवान ।
जामत चिन्हेंव अटहर कटहर
मौरत चिन्हेंव आमा डार ।
चऊंक मं चिन्हेंव सीता जानकी,
मटकू मं चिन्हेव भगवान ।
आगू-आगू मोर राम चलते हे,
पाहू लछिमन भाई ।
अऊ मंझोलन मोर सीता जानकी,
चित्रकूट बर चले जाई ।
सात फेरों के पड़ते ही विवाह संपन्न माना जाता है ।  बेटी की बिदाई बेला का दृश्य बड़ा कारूणिक होता है ।  'बिदाई गीत' में कन्या और उसके माता, पिता, भाई, बहन की मनोदशा का हृदय विदारक चित्रण मिलता है-
बिदाई गीत -
दाई के रेहेंव में दुलारी
दाई तोरे रोवय महल वो ।
अलिन गलिन दाई रोवय
ददा रोवय मूसरधार वो ।
बहिनी घलव रोवत हावय
भाई करय डण्ड पुकार वो ।
तुमन रहिहव अपन महल मं
दुख ल देइहव भुलाय वो ।
असुंवन तुम झन ढरियाव बहिनी
सबके दुख विसार वो ।
दुनिया के ये ह रीत ए नोनी
दिये हे पुरखा चलाय वो ।
दाई ददा के कोरा में रहेने
अचरा मं मुंह ल लुकाय वो ।
अपन घर तुम जावव नोनी
झन करव सोंच-बिचार वो ।
बिदाई के बाद वर जब वधु को लेकर अपने घर पहुंचता है तो ननदें (छोटी बहनें) नववधु के घर में प्रवेश करने के पूर्व उसका 'डहर छेंकतीÓ हैं यह मात्र एक नेंग है, इस अवसर पर भी गीत गाया जाता है ।
3. मृत्यु गीत - जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य है ।  सामान्यत: मृत्यु के अवसर पर गीत गाये जाने की प्रथा नहीं है क्योंकि मृत्यु शोक प्रसंग है तथापि छत्तीसगढ़ के कबीरपंथी समाज में दशकर्म के दिन गीत गाया जाता है ।  इस अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में आत्मा परमात्मा के मिलन को, लौकिक दृष्टांतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है ।
साथ ही मृतकों के परिजनों के करूणक्रन्दन को पंक्तिबद्ध गीत का रूप दे दिया जाता है यथा-
येदे जिनगी ह भइगे पहार,
ये जिनगी के नईये बिस्वास ।
येदें छिन भर म ढहिगे पहार,
पंछी बिन पिंजरा उदास ।
चार कांधा मं चउथिया जाये,
चारे दिन के करथे राज ।
चार आंसू मं राजा छोड़ागे,
इस तरह छत्तीसगढ़़़़ में उपरोक्तानुसार प्रमुख संस्कार हैं और उन प्रमुख संस्कारों में उपरोक्तानुसार गीत गाये जाते हैं। स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ लोकगीतों का अविरल अजस्त्र स्त्रोत है । यहॉं  दु:ख, पीड़ा, वेदना के पल हो अथवा हर्ष, मंगल या खुशी के ; छत्तीसगढ़वासियों को लोकगीतों में झूमने और लोकनृत्यों में थिरकने से कोई शक्ति, कोई ताकत नहीं रोक पायी ।  भले ही इन लोकगीतों में शब्द शिल्प या भाषा की सुगढ़ता का अभाव है किन्तु ये बिना किसी छद्म के, प्रकृति के निकट, अनुभवों की सच्चाइयों की अभिव्यक्ति से आेत-प्रोत हैं और किसी की हो या न हो; निसंदेह इन्हें सहेजने, सम्हालने और लिपिबद्ध करने की जवाबदारी छत्तीसगढ़ वासियों की है।
साभार रउताही 2014

अहीरवाल के लोकगीत

हरियाणा प्रदेश का अहीरवाल ऊबड़-खाबड़ शुष्क धरातल एवं रतीले टीलों वाला क्षेत्र है। यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यावसाय कृषि है तथा रहन-सहन और खान-पान बड़ा सादा है। परिवार की महिलाएँ पुरूषों के साथ हर काम में हाथ बँटाती हैं। कृषि एवं पशुपालन के अतिरिक्त इस क्षेत्र के लोग बड़ी संख्या में भारतीय सशस्त्र सेनाओं में सेवारत हैं।
राजनैतिक रूप से भले ही यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है, परन्तु मेलों, तीज-त्यौहारों, लोक संगीत व लोकगीतों के मामलें में यह अपना विशिष्ट स्थान रखता है। प्राचीनकाल से ही ये इस क्षेत्र की लोक संस्कृति जन जीवन के प्रमुख अंग रही है।
लोक संगीत और लोकगीत तो यहाँ के कण-कण में समाहित हैं। लोक संगीत की सरिता को अपने प्रबल आवेग के साथ बहने से यहाँ के रेत के टीले भी कभी नहीं रोक पाये। तेज लू तथा आँधियों के थपेड़ों से इन्हीं रेत के टीलों पर लहरे बनाती चली जाती हैं। सायं जब रेत ठण्डी होती है, तब यही लहरें लोकगीतों की पंक्तियाँ सी नजर आती हैं। अरावली पर्वतमाला को अपनी गोद में समेटे अहीरवाल क्षेत्र के लोकगीतों एवं उनकी लोक धुनों पर यहाँ के संघर्षमय जीवन की छाप स्पष्ट परिलक्षित होती है।
लोकगीत यहाँ के सामाजिक जीवन में ऐसे प्रकाशपुंज हैं, जो मानव-मन की अथाह अंधेरी गलियों तक को चमकाते व आलोकित करते रहे हैं। लोकगीतों से सामाजिक जीवन के परिदृश्य कितने सजे-सँवरे हैं, यह सब इन गीतों को सुन कर जाना जा सकता हैं। लोकगीतों की यह सरिता यहाँ के सामाजिक जीवन में इतने सरल व सतत प्रवाह से बहती आई है, जिसकी बदौलत न केवल मानवीय संंवेदनाएँ और संबंध ही पुख्ता होते रहे हैं, अपितु दारूण दु:खों के बादलों को भी इन गीतों ने छितराया है और खुशी के पलों को यादगार बनाया है।
तीज-त्यौहारों एवं शादी-उत्सवों पर यहाँ औरतों के सामूहिक कंठ कोयल की भाँति कुक उठते हैं, तब वातावरण की रंगत में एक खास तरह का उन्माद एवं मस्ती छा जाती है। यहाँ के जन-जीवन में आने वाली विडम्बनाओं व घटनाओं का इन गीतों में मर्मिक चित्रण हुआ है। यदि यहाँ के आदमी परिश्रमी है, तो महिलाएँ भी बेहद परिश्रमी हैं। खेतों में जाते, पनघट से आते, फसल काटते, क्यारियों में नलाते नारी कंठ हिल मिलकर जहाँ-तहाँ, यहाँ-वहाँ गाते नजर आते हैं।
यहाँ के लोक-जीवन से अगर लोकगीत पृथक कर दिए जाएँ तब जो शेष बचेगा वह या तो श्मशान की वीरानगी जैसा होगा या फिर पत्थर की भाँति खुरदुरा व कठोर होगा। इस क्षेत्र की संस्कृति के आकाश में भी ये गीत झिल-मिल सितारों की भाँति जगमगाते हैं। इन गीतों में प्रीत है, जीत है, रीति है। यहाँ को लोक विश्वास और आस्थाएँ इन गीतों में रच-बस गए हैं।
ये लोकगीत यहाँ के जन-जीवन के संस्कारों में रमे हुऐ हैं। स्मृति-रेखाओं पर सुगन्ध की तरह जमे हुए हैं। इन गीतों की लोकधुनें मन-मस्तिष्क पर आषाढ़ की बदलियों की की भाँति मँडराती हैं। ये गीत और ये धुनें जहाँ पति-पत्नी, देवर-भाभी, ननद-भावज आदि इन्सानी रिश्तोंं का अनजाने में ही मनोहारी विश्लेषण करते हैं, वहीं भाई-बहन और माँ-बेटे जैसे पवित्र रिश्तों को गौरवान्वित भी करते हैं।
ये लोकगीत इस क्षेत्र की सांस्कृतिक ऊर्जा की एक ऐसी सामाजिक अभिव्यक्ति है जो रसवादी सौन्दर्य-शास्त्र से अभिप्रेरित हैं। यहीं रसवादी सौन्दर्य बोध यहाँ के लोक-जीवन एवं संस्कृति का ऐसा ऊर्जा स्त्रोत है, जो जीवन की अनवरत विडम्बनाओं एवं घटनाओं के बीच भी आत्म-विश्वास रूपी संजीवनी प्रदान करते हैं।
यहाँ के लोकगीतों में यहाँ के रीति-रिवाज, लोकाचार, लोकविश्वास, सामाजिक मान-मर्यादा, लोक-जीवन के गुण-दोष अपनी सुघड़ताओं के साथ प्रतिपादित होते हैं। लोक-जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं, जो इन लोकगीतों में मुुुुुखरित नहीं होता है।
यहाँ के लोकगीतों में वीर रस और श्रृंगार रस की प्रधानता है। जिसमें व्याकरण और भाषा का कोई विशेष संयम देखने को नहीं मिलता। खड़ी व सरल भाषा में बिना किसी लाग-लपेट के लिखे गए इन गीतों को हिन्दी भाषा को थोड़ा-सा भी जानने वाला आसानी से समझ जाता है। इन गीतों का रचयिता कौन है, कोई नहीं जानता। ऐसा लगता है कि ये लोकगीत समय-समय पर आवश्यकतानुसार स्वयं बनते चले गए हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमें विरासत के रूप में मिलते रहे हैं।
यूँ भी गीतों की परम्परा कभी नष्ट नहीं होती। पुराने गीतों के साथ-साथ ही नये गीत भी जन्म ले लेते हैं। इसी कारण गीतों का जीवन चिरन्तन बनकर सतत् रूप से प्रवाहित होता रहा है। अनादिकाल से उनका अस्तित्व अमरत्वपूर्ण होकर चला आ रहा है।
किसी भी क्षेत्र समाज तथा जाति को जानने से पूर्व उसके लोकगीतों को जानना जरूरी है। यहाँ के लोकगीतों का अध्ययन करने से इस क्षेत्र के रंग-रंगीले उत्सवों, त्यौहारों तथा सामाजिक रीति-रिवाजों का परिचय आसानी से मिलता है। विवाह के अवसर पर महिलाएँ अनेक प्रकार के मनोरंजन व हास्य-विनोद से परिपूर्ण गीत गाती हैं। इन गीतों में वे उलाहना देना भी नहीं भूलतीं। जब बारात पूरी सज-धज कर  दुल्हन के द्वार पर पहुँचती हैं तो गाँव की महिलाएँ गीतों के माध्यम से बारातियों को चिढ़ाती हैं।
सालियाँ अपने जीजा से सीठने के रूप में हँसी-मजाक करती हैं। इसके अतिरिक्त और भी न जाने कितने भाव-प्रणय, वीर रस से सराबोर, हास्य-विनोद, करूणा-उल्लास व मस्ती से परिपूर्ण लोकगीत यहाँ की संस्कृति को समृद्ध बना रहे हैं। महिलाएँ इन्हीं गीतों से साहस, शील, भक्ति, प्रेम, दया, पतिव्रत, आज्ञपालन आदि अनेक आदर्श गुण ग्रहण करती हैं। ये गीत इस क्षेत्र की आत्मा के गीत हैं, जो खुली हवा में बड़ी रोचकता से पिरोये जाते हैं।
हरियाणा के अहीरवाल क्षेत्र के जिन लोकगीतों का यहाँ वर्णन किया जा रहा है, उनका राजस्थान के जिला अलवर का राठ क्षेत्र, जिला सीकर का नीमका थाना व माऊंडा क्षेत्र, जिला झुन्झुनू की खेतड़ी, तहसील तथा दिल्ली सूबे के नजफगढ़ क्षेत्र भी प्रचलन है। इस क्षेत्र का खान-पान, पहनावा, रीति-रिवाज और भाषा एक है। इन क्षेत्रों के निवासियों का आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता है। वैसे तो इस क्षेत्र में छत्तीस बिरादरी के लोग रहते हैं, लेकिन अहीर जाति के लोग बहुसंख्या में हैं। इसी कारण यह सम्पूर्ण क्षेत्र अहीरवाल के नाम से जाना जाता है।
यद्यपि अहीरवाल के लोकगीतों का लिखित साहित्य बहुत कम उपलब्ध है, क्योंकि इस दिशा में कभी भी सार्थक कदम नहीं उठाया गया है। इसी कारण आज इनके रेखांकन की महती आवश्यकता बनी हुई है। यह कार्य लोकसाहित्य का कोई समर्थ व तथ्यशोधक छात्र ही कर सकता है। इस क्षेत्र में प्रचलित लोकगीतों में से कुछ को ही इस पुस्तक में संकलित किया गया है। इस दिश में यह पुस्तक मात्र एक लघु कदम ही है। आशा है यह आपका भरपूर मनोरंजन तो करेगा ही, साथ ही आपकी आशा और अपेक्षा के अनुरूप खरी भी उतरेगी।
देवी-देवताओं के गीत व भजन
अहीरवाल प्रदेश में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान व अन्य लोक देवी-देवताओं को याद करने की परम्परा पुरातन से चली आ रही है, क्योंकि क्षेत्र के लोग इन देवी-देवताओं को अपने सामाजिक जीवन में शुभ अशुभ को धुरी मानते हैं। इसी कारण इन देवी-देवताओं को क्षेत्र में प्रचलित लोकगीतों में भी बड़ी श्रद्धा के साथ स्मरण किया गया है। इस कड़ी में ग्राम देवता व गौरी पुत्र गणेश को विघ्र विनाशक देवता के रूप में किसी भी मांगलिक अवसर पर गीतों के माध्यम में सबसे पहले याद किया जाता हूँ।
रतजगा, विवाह-शादी तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर देवी-देवताओं को गीत व भजनों के माध्यम से याद करने की प्रथा इस प्रदेश में यहाँ प्रचलित गीतों की शब्दावली जहाँ ठेठ देहाती हूं, वहीं इसके भावार्थ हूबहू आरतीनुमा है। इन गीतों में न कल्पना के पंख है और न ही शैलीगत पेंच। यहाँ के लोक जीवन में सदा से रची-बसी इन देवताओं की कीर्ति ही सरल सुरीले नारी कंठों से निकलकर सरस एवं सकल गीतों का अहसास बन जाती है-
गणेश जी की आरती
दुन्हाला दु:ख भजना सदा सदा उजला भेष।
सारा पहिला सुमरिया गौरी पुत्र गणेश।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता थारी पार्वती पिता महादेवा।
जय गणेश, जय गणेश..........।
एक दन्त दयावन्त चार भुजा धारी।
माथे थारे तिलक विराजे, मुसे की सवारी।
जय गणेश, जय गणेश............।
पान चढ़ै फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लडूवन का भोग लगे सन्त करें सेवा।
जय गणेश, जय गणेश............।
अन्धे को आँख देव कोढ़ी को काया।
बांझन को पुत्र देव निर्धन को माया।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
जो भी शरण आये, सफल कीजे सेवा।
जय गणेश, जय गणेश.............।
जच्चा गीत
जब किसी के घर शिशु जन्म लेता है, तो इस अवसर पर भी गीत गाने की परम्परा है, जिन्हें क्षेत्र में जच्चा गीत के नाम से पुकारा जाता है। इस अवसर पर जच्चा, कुआँ पूजन, पीला व अन्य गीत कई-कई दिन गाये जाते हैं, जो निम्न हैं-
(1)
हाय मैंने पाँचवों महिनो लाग्यो, सासू नै बेरो पाट्यो,
हे वा हलवो बणाकै ल्याई, मैंने दूर सी थरथरी आई।
हाय मैंने छठो महिनो लाग्यो, देवर न बेरो पाट्यो,
हे वो बेर तोड़ के ल्यायो, मैंने घाल जेब मैं खायो।
हाय मैंने सातवों महिनो लाग्यो, ननदी नै बेरो लाग्यो
हे वा दाल भून कै ल्याई, मैंने घाल जेब मैं खाई,
हाय मैंने आठवों महिनो लाग्यो, राजा नै बेरो लाग्यो,
हे वो बालूस्याही ल्यायो, मैंने बैठ पलंग पै खाई।
हाय मैंने नोवों महिनो लाग्यो, दाई न बेरा पाट्यो,
हे दाई इबकै गैल छुड़ा दे, फेर ना जाऊंँ पिया की अटारी
हाय मैं जलवा धोक के आई, राजा नै आँख चलाई,
हो पिया तू चाल मैं आई, तू करले गर्म रजाई।
(2)
छोटी से जच्चा लाडली,
हरमोनियम बजा रही जी।
सुसरो जी आवै, दिखा बोहडिय़ा ललणा म्हारा,
ललणा सो रह्या पलणा मैं, झूला झुला रही जी।
छोटी सी.....
विवाह के नेगाचार गीत
इस क्षेत्र में विवाह-शादी के प्रत्येक चरण में माधुर्य एवं मंगल भावना से ओत-प्रोत लोकगीत गाने की परम्परा रही है। सगाई, भात, रतजगा, लग्न, सेहरा, घुड़चढ़ी, बारात खोडिय़ा, भाँवरें, विदाई व काँगन आदि लोकचारों को भिन्न-भिन्न गीतों के माध्यम से सुमधुर एवं सौन्दर्ययुक्त किया जाता है। सचमुच इन गीतों की बदौलत ही विवाह का अवसर विवाह उत्सव में बदल जाता है। निश्चित तौर पर इन गीतों से संबंधित नेगियों को आत्मबल और उत्साह तो मिलता ही है, साथ ही इनके अन्र्तभावों से प्रस्फुटित ऊर्जा, इन अवसरों की लयात्मक गतिशीलता को निरन्तरता प्रदान करती है। इससे विवाह उत्सव का कोई भी क्रिया-कलाप थका देने वाला या उबाऊ नहीं लगता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति इनमें रमता चला जाता है।
इस क्षेत्र में वैवाहिक रस्मों का श्रीगणेश सगाई की रस्म से होता है। जब किसी के घर सगाई एवं लग्न का अवसर होता है, तो लड़के के घर 'बनड़ाÓ (बन्ना) तथा लड़की के घर बनड़ी (बन्नी) के गीत गाये जाते हैं, जो इस प्रकार हैं-
बनड़ी (बन्नी) के गीत
(1)
बन्नी को दादो बरजै सै,
लाडो नीम तलै मत जाय।
कड़ा नीम की कड़ी निम्बोरी,
चालै हुचकी।
मेरो रायबर याद करै सै,
डट ज्या ये हुचकी।
बन्नी को चाचो बरजै सै,
लाडो नीम तलै मत जाय।
कड़ा नीम की कड़ी निम्बोरी,
चालै हुचकी।
मेरो रायबर याद करै सै,
डट ज्या ये हुचकी।
मेरो रायबर याद  करै सै,
डट ज्या ये हुचकी।
बन्नी को जीजो बरजै सै,
लाडो नीम तलै मत जाय।
कड़ा नीम की कड़ी निम्बोरी,
चालै हुचकी।
मेरो रायबर याद करै सै,
डट ज्या ये हुचकी।
बन्नी को बीरो बरजै सै,
लाडो नीम तलै मत जाय।
कड़ा नीम की कड़ी निम्बोरी
चालै हुचकी।
मेरो रायबर याद करै सै,
डट ज्या ये हुचकी।
(2)
बन्नी खड़ी सड़क पर अनार माँगे।
अपणे दादा से दो-दो हजार माँगै,
अपणे ताऊ से दो-दो हजार मांगै।
अपणी दादी से गूँठी रुमाल माँगै।
अपणी ताई से गुँठी रुमाल मांगै।
बन्नी खड़ी...
अपणे चाचा से दो-दो हजार मांगै,
अपणे पिता से दो-दो हजार मांगै,
हाँ रे गोरी दे दिये और उल्टा ले लिये,
हाँ रे गोरी बातचीताँ सी राजी कर लिये,
हाँ रे गोरी ज्यादा करै तो डण्डा दो दिये।
हाँ ओ पिया तड़के सबेरे सासड़ आवैगी,
हाँ ओ पिया पोतड़ा धुवाई नेग मांगेगी,
हाँ रे गोरी दे दिये और उल्टा ले लिये,
हाँ रे गोरी बातचीताँ सी राजी कर लिये,
हाँ रे गोरी ज्यादा करै तो डण्डा दो दिये।
हाँ ओ पिया तड़के सबेरे सुसरो, आवैगो,
हाँ ओ पिया खाट पे बैठण को नेग मांगैगो,
हाँ रे गोरी दे दिये और उल्टा ले लिये,
हाँ रे गोरी बातचीतों सी राजी कर लिये,
हाँ रे गोरी ज्यादा करै तो डण्डा दो दिये।
हाँ ओ पिया तड़के सवेरे सुसरो आवैगो,
हाँ ओ पिया खाट पै बैठण् को नेग मांगैगो,
हाँ रे गोरी दे दिये और उल्टा ले लिये,
हाँ रे गोरी बातचीताँ सी राजी कर लिये,
हाँ रे गोरी ज्यादा करै तो डण्डा दो दिये।
हाँ ओ पिया तड़कै सवेरे देवर आवैगो,
हाँ ओ पिया जालिया खुलाई नेग मांगैगो,
हाँ रे गोरी दे दिये और उल्टा ले लिये,
हाँ रे गोरी बातचीताँ सी राजी कर लिये,
हाँ रे गोरी ज्यादा करै तो डण्डा दो दिये।
पीला गीत
बच्चे के जन्म पर जच्चा के पीहर से छूछक आता है, उसमें पीला की तील जरुर आती है, जिसे ओढ़कर जच्चा कुआँ पूजने जाती है। इस अवसर पर यह गीत गाया जाता है-
पाँच मोहर की साहिबा, पीलो रंगा दूयो जी।
पाँचा बीसी, गोडा मारुँ जी।
पीला रंगा...
के पीलो तेरी माँ रंगायो जी,
के काई नन्दशाला से आयो जी।
पति प्यारा जी।
पीला रंगा...
ना पीलो मेरी माँ रंगायो जी,
ना कोई नन्दशाला से आयो जी,
गोडा मारुँ जी।
पीला रंगा...
सासू रो जासो भोली,
बाई जी रो बीरो जी।
कोई उण म्हारी सेज पजोई,
पति प्यारा जी।
पीलो रंगा...
पीलो तो ओढ़ म्हारी जच्चा,
सरवर चाल्ली जी।
कोई सारे शहर सराही,
गोडा मारुँ जी
पीलो रंगा...
भायली गीत
जब जच्चा कुआँ पूजने जाती है, तो उसकी सखी-सहेली पीला तथा कुड़ता-टोपी घालती हैं। देहात में इस सहेली को 'भायलीÓ के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर यह गीत गाया जाता है-
भँवर म्हारो भायली कै जाय।
भायली कै आबो-जाबो छोड़ दे ओ,
मरुँगी विष खाय।
भँवर म्हारो....
भायली के आबो-जाबो न छूटै ओ,
कल मरो जित आज।
भँवर म्हारो...
भायली के आशा रह गई हे,
म्हारो ढोलो फिरै सै उदास।
भँवर म्हारो...
भायली के होलर हो गयो हे,
भायली रही सै खिलाय।
भँवर म्हारो...
भायली पाणी नै जाव सै ऐ,
मैँ भी पाणी नै जाऊँ।
भँवर म्हारो...
आधो होलर बाँट ले ऐ,
म्हारो भँवर उनियार।
भँवर म्हारो...
आधो होलर ना बँटे ऐ,
अपणो भँवर समझा ऐ।
भँवर म्हारो...
अटेली का थाणा कै माँय ऐ,
आई भँवर नै रुकवाय।
भँवर म्हारो...
अटेली का थाणा कै माँय ऐ,
पङ्यो ऐ न्योहरा खाय।
भँवर म्हारो...
इबकै तो छुड़वाय ले रै गोरी,
फेर जाऊँ तो तेरी सूँ।
भँवर म्हारो...
थाणा मायसी ऐ छूटतो ही,
फिर भी भायली के जाय।
भँवर म्हारो...
जो तेरो राजा ना डटै ऐ,
नाड़ा कै ले बाँध।
भँवर म्हारो...
नाड़ो तोड़ो रेशमी ऐ,
घूमर घीस्यो जाय।
भँवर म्हारो...
जै तेरो बालम ना डटै ऐ,
कोठा मैं दे ऐ रोक।
भँवर म्हारो...
तू मेरी बहना लुहार की ऐ,
एक तालो घड़ लाय।
भँवर म्हारो...
साँकल तोड़ी स्यार की ऐ,
फिर भी भायली कै जाय।
भँवर म्हारो...
भात गीत
लग्न के पश्चात अपने लड़के या लड़की के विवाह का न्यौता देने जब बहन अपने पीहर (भाई के घर) जाती है, तो उसे 'भात न्यौतनाÓ कहा जाता है। यूँ भी इस क्षेत्र की लोक संस्कृति में भात, भाई-बहन के निश्छल पवित्र संबंधों की पराकाष्ठा का एक परम पवित्र गौरवमय अवसर माना गया है। क्षेत्र में भात के अवसरों पर गाये जाने वाले गीतों की लय इतनी मार्मिक और करुणाजनक होती है कि सुनने पर समूचे नारी जगत की एक 'हूकÓ का सा अहसास होता है।
भाई-बहन के प्यार का प्रतीक भात के, विविध रुप भी देखने को मिलते हैं। कहीं प्यार, कहीं हास्य तो कहीं इन्तजार तो कहीं भाई दिल खोलकर बहन को रुपयों व कपड़ों से लाद देता है, तो कहीं उलाहणा मिलता देखा जा सकता है। अत: भात गीतों में भाई-बहन के प्यार का स्त्रोत बहता है। इन गीतों को सुनकर प्यार से आँखें गीली हुए बिना नहीं रहतीं।
बहन जब अपने भाई के घर भात न्यौतने जाती हैं, तो निम्न गीत गाये जाते हैं-
 (1)
हे! मैं रुनझुन बहल जुड़ाय,
भात नोतणे चाल्ली।
हे बाबल  की आई हबेली,
मैंने उत ही बहली डाटी।
हे! इतना मैं बोल्यो कन्हैयो,
हम ना ल्यां भेली रुपयो।
हे! भीतर से बोल्यो चोखो,
म्हारै कोन्या भात को मोको।
हे! ऊपर से बोल्यो भगवानो,
म्हारे कोन्या भात को आन्नो।
हे! मैं भीतर बड़कै रोई,
मेरी कन्ही ना धीर बँधाई।
हे! मेरो छोटो बीर लाडलो,
मेरी उण ही धीर बँधाई।
हे! मत रो मेरी माँ की जाई,
तेरे भात भरूँ बड़ो भारी।
हे! भीतर से बोल्यो कन्हैयो,
हम इब ल्यां भेली रुपयो।
हे भीतर से बोल्यो चोखो,
म्हारैं इब सै भात को मोको,
हे! ऊपर से बोल्यो भगवानो,
म्हारे इब सै भात को आणो।
रै धन्य-धन्य सै मेरी माँ का जायो,
रै रोवती की धीर बँधाई।
(2)
रै बीरा नौकर मत ना जाईये,
मेरा कौण भरेगा भात।
ऐ जीजी नौकरी का के डर सै,
तेरा आण भरुँगा भात।
रे बीरा पाँचों भाई आइयो,
मेरो सारो लाइयो परिवार।
रै मेरा काका, ताऊ सब ल्याइयो,
भावज नै ल्याइयो साथ।
बान गीत
विवाह के पाँच या सात दिन शेष रहने पर वर व कन्या को बान बैठाने की तैयारी की जाती है। वर व कन्या को नहलाने से पहले जौ या चने का आटा, हल्दी व सरसों के तेल से तैयार किया गया 'उबटनÓ लगाया जाता है। इस अवसर पर वर व कन्या को घर तथा पास-पड़ोस की औरतें तेल चढ़ाती हैं। इस समय निम्न गीत गाये जाते हैं-
तेल चढ़ाने का गीत
आ ऐ तेलण तेल ऐ,
म्हारै चमेली का तेल ऐ।
रोहताश घर सै कुल बहू,
बहू शौखा तेल चढ़ाइयो।
आ ऐ....
इसी तरह बारी-बारी से सभी औरतों के नाम आगे लिए जाते हैं।
उबटना लगाने का गीत
काहे कटोरी मैं उबटणों,
काहे कटोरी मैं तेल।
रूप कटोरी मैं उबटणों,
सूण कटोरी मैं तेल।
जौ-चणे का उबटना,
जौ ऐ चमेली का तेल।
आज लाड़ो बैठी उबटणै,
मैल झड़ै झड़-झड़ पड़ै,
नूर चढ़ै तेरै आय।
आज लाड़ो बैठी उबटणै।
आ मेरे दादा जी देखले,
आ मेरे ताऊ जी देखले,
थम देख्याँ सूख होय,
आज लाडो बैठी उबटणै।
इसी प्रकार चाचा, भाई, फूफा, जीजा आदि के नाम लेते जायें। उपर्युक्त गीत कन्या को नहलाते समय गाया जाता है। यही गीत बनड़े को नहलाते समय गाया जाता है। इसमें फर्क इतना है कि 'लाड़ो बैठीÓ की जगह 'बनड़ो बैठ्योÓ का इस्तेमाल किया जाता है।
तेल उतारने का गीत
आ ऐ तेलण तेल ऐ,
म्हारै चमेली का तेल ऐ।
यादराम घर सै धोयडिय़ा,
बाई सोमलता तेल उतार ऐ।
आ ऐ तेलण...
इसी तरह अन्य औरतों के नाम लेकर आगे यह गीत गाया जाता है।
वर व कन्या का आरता उतारने का गीत
एक हाथ लोटो, गोद बेटो,
कर एक सुहागण जीजी आरतो।
एक हाथ कसीदा गोद भतीजा,
कर एक सुहागण जीजी आरतो।
एक हाथ ताक्कू, गोद बापू,
कर एक सुहागण जीजी आरतो।
एक हाथ कैंची, गोद चाची,
कर एक सुहागण जीजी आरतो।
खोडिय़ा गीत
जब वर पक्ष के घर से बारात प्रस्थान कर जाती है, तो घर में महिलाएँ अकेली रह जाती है। इस एकान्त का वे भरपूर लाभ उठाती हैं, नाच-गान के साथ रात भर जागरण करती हैं। जिसे देहात में 'खोडिय़ाÓ के नाम से जाना जाता है। वैसे भी खोडिय़ा का उद्देश्य वर-विजय, बारात की सकुशल वापसी तथा मंगल कामनाएँ करना ही होता है।
नारी सनानत से शर्म और हया के परम्परागत आवरण से लिपटी रही है। अत: वह अपने अंतर की कोमल भावनाओं तथा पुरुष-प्रधान समाज की बंदिशों को अभिव्यक्ति नहीं दे पाती। खोडिय़ा के अवसर पर कोई पुरुष आस-पास नहीं होता। तब वे अपनी दबी हुई कोमल इच्छाओं व भावनाओं को नि:संकोच निकालती हैं।
इस अवसर पर वे घर के आंगन में सारी रात बेतुके संवाद, अश्लील गीत एवं लोकनृत्य करके एक ऐसा समाँ बाँधती हैं कि विवाह के अवसर को नई उमंग और हर्षोल्लास से सराबोर कर डालती हैं। जिस तरह वधू के घर  वर-वधू का पाणिग्रहण हो रहा होता है, उसी तरह खोडिय़ा में वर पक्ष के यहाँ महिलाएँ नकली विवाह कर आधि-व्याधि निवारण का उपक्रम करती हैं। इनका धरातल बड़ा रंग-बिरंगा, उन्मुक्त तथा जीवन की करवटों से आन्दोलित होता है।
इस अवसर पर स्त्रियाँ नृत्य के साथ निम्न गीत गाती हैं।
(1)
माँ मेरा ब्याह कर दे
ना तो बन्दड़े की भाभी नै लै कै भाग जाऊँगो।
वा तो लम्बी घणी रै मेरा लाल,
तेरी ऊँकी ना ही बणै।
माँ मेरा ब्याह कर दे,
ना तो बन्दड़े की ताई नै ले कै भाग जाऊँगो।
वा तो काली घणी रै मेरा लाल,
तेरी ऊँकी ना ही बणै।
माँ मेरा ब्याह कर दे,
ना तो बन्दड़े की चाचाी नै ले कै भाग जाऊँगो।
वा तो मोटी घणी रे मेरा लाल,
तेरी ऊँकी ना ही बणै।
(2)
सपेला बीन बजाइये हो,
चालूँगी तेरे साथ।
ये महलाँ की रहणे वाली रै,
तनै झोपड़ी लगै उदास।
झोपड़ी मैं गुजर करूँगी ओ,
पर चालूँगी तेरे साथ।
सपेला बीन...
ये हलवा खाणे वाली रै,
तनै रोटी लगै उदास।
रोटी मैं गुजर करूँगी ओ,
पर चालूँगी तेरे साथ।
सपेला बीन...
ये गद्दा पै सोणे वाली रै,
तनै खटिया लगै उदास।
खटिया पै गुजर करूँगी ओ,
पर चालूँगी तेरे साथ।
सपेला बीन...
(2)
दामण की सिमाई मांगै री दरजी को।
दामण की सिमाई म्हारो सुसरो देगो,
ससुर मेरे नै झोटी बक्शी,
ना ल्यूँ ना ल्यूँ, करै री दर्जी को,
कैंची की ओट हँसै री दरजी को।
दामण की...
दामण की सिमाई म्हारो देवर देगो,
देवर मेरे नै नारा बक्श्या,
ना ल्यूँ, ना ल्यूँ, करै री दरजी को,
कैंची की ओट हँसै री दरजी को।
दामण की...
दामण की सिमाई म्हारो राजा देगो,
राजा मेरे नै गोरी बक्शी,
इब ल्यूँ, इब ल्यूँ, कहै री दरजी को,
कैंची की ओट हँसै री दरजी को,
ले कै जूता राजा पीटण लाग्या,
ना ल्यूँ, ना ल्यूँ, करै री दरजी को
छोड़ो-छोड़ो करै री दरजी को
दामण की...
फेरों पर गाये जाने वाले गीत
फेरों के समय जब लड़की को पाणिग्रहण संस्कार हेतु पाटड़े पर बुलाया जाता है, तो लड़की का मामा उसे लेकर मंडप में आता है। तब स्त्रियाँ निम्न गीत गाती हैं।
(1)
गढ़ छोड़ रुकमण बाहर आई, चौरी तो छाई म्हारै बालमा।
मैं तो क्यूँ कर आऊँ बाबल मेरे, बाहर बैठ्यो मेरो बालमा।
तेरे बालम नै हम दान देंगे, मान देंगे, चौरी तो राखै तेरी ऊजली।
मेरा बालम के चार ओबरी, चारों मैं जगमग हो रही।
पहली ओबरी मैं लाडो जन्म लियो, दूजी मैं हवन करायो।
तीजी ओबरी मै लाडो 'लग्न लिखी सैÓ, चौथी मैं ब्याह रचायो।
(2)
या तो पहलो फेरो लियो, म्हारी लाडो, दादा की हे पोती।
या तो दूजो फेरो लियो, म्हारी लाडो, ताऊ की है बेटी।
या तो तीजो फेरो लियो, म्हारी लाडो, बाबल की हे बेटी।
या तो चोथो फेरो लियो, म्हारी लाडो, चाचा की हे बेटी।
या तो पाँचवों फेरो लियो, म्हारी लाडो, भाई की हे बहना।
या तो छठो फेरो लियो, म्हारी लाडो, मामा की हे भाणजी।
या तो सातवों फेरो लियो, म्हारी लाडो, हुई हे पराई।
सावन के गीत
प्राचीन समय से ही मेले और तीज त्यौहार इस क्षेत्र की लोक संस्कृति एवं जन-जीवन का प्रमुख हिस्सा रहे हैं। ये तीज-त्यौहार बहुत ही सादगी एवं सरलता से मनाये जाते हैं, जो बनावट से कोसों दूर रहते हैं।
सावन के महीने में जब इन्द्र भगवान कृपालु होन लगते हैं, वर्षा की बौछारें तपती धरती की प्यास बुझाने लगती हैं, तब ग्राम्यांचलों में एक खुमारी सी चढऩे लगती है। तीज का त्यौहार भी इसी महीने में आता है। वर्षा ऋतु का यह मोहक त्यौहार महिलाओं के जीवन में सरसता का संचार करता है। तीज वैसे भी महिलाओं का खास त्योहार है और झूले-झूलना इस त्योहार का प्रमुख आकर्षण है। तीज के कई-कई दिन पहले ही गतबाड़ों में खड़े नीम, पीपल के पेड़ों पर, घर के आँगन और दालान में हिन्डोले डालकर झूलने का सम्पूर्ण आनन्द लिया जाता है।
लोकगीतों का इस त्योहार के साथ गहरा संबंध माना गया है। लोकगीतों की गूँज से गाँवों का वातावरण रसमय व सजीव हो उठता है। कहीं कोयल कूकती हैं तो कहीं मयूर का नृत्य देखने को मिलता है। प्रकृति अपने पूर्ण सौन्दर्य के साथ धरती पर उतर आती है। जिस प्रकार मस्ती में मोर कूक उठता है, उसी प्रकार मस्त होकर ऊँची आवाज में गाँव की महिलाएं भी गीत गाती हुई हिन्डोले पर झूलती हैं। 
 फागुन के गीत
फागुन का महीना एक मदमस्त महीना है। इस महीने में न ठण्ड कँपकँपाती है और न ही गर्मी की तपन से शरीर झुलसता है। ऐसे सुहावने मौसम में प्रकृति की भीनी-भीनी सुगन्ध वातावरण में चारों ओर फैल जाती है और जनमानस के मन में एक हिलोर सी मचल उठती है। खेतों में फसल पककर तैयार हो जाती है। इस मौके पर चारों ओर खुशी और उल्लास छाया रहता है।
ऐसे फागुनी मौसम में होली का रंगों भरा पर्व तो तन और मन दोनों को उन्माद के रंग में रंग देता है। फागुन लगते ही होली के स्वागत और सत्कार में महिलाएँ लग जाती हैं। महिलाएँ अपने काम धन्धे से निबटकर रात को गली-मोहल्लों में इकट्ठी होकर धमाचौकड़ी मचाती हैं, वही नवयौवनाएँ झुण्डों में नाचती और गाती हैं। आधी रात तक यह सिलसिला जारी रहता है।
होली के पर्व पर इस क्षेत्र में खूब खेल तमाशे होते हैं। चाँद की चाँदनी में नवयौवन के अल्हड़ नृत्यों की मधुरता और सुन्दरता सिर चढ़कर बोलती है। किशोरियों के अन्दर की भावनाएँ गीतों में फूट पड़ती हैं। फागुन का महीना अपने संग विरह, मस्ती, उन्माद एवं उल्लास का खजाना लेकर आता है जो क्षेत्र के समूचे जनमानस को अपने रंग में रंग लेता है और गुलाल के साथ गीतों के रूप में बिखर उठता है-
(1)
एक सुसर कै दो बहू रै लाला,
दोनों पाणी नै जायँ
अमरसिंह फागण आयो रंग भरो रै लाला।
अगली का सिर पै टोकणी रै लाला,
पिछली का सिर पै माट।
अमरसिंह फागण....
अगली को बिछवो ढह पड्यो रै लाला,
पिछली नै लियो सै उठाय।
अमरसिंह फागण....
लड़ती-झगड़ती वो गयीं रै लाला,
गयीं सुसर के पास।
अमरसिंह फागण....
सुसरो म्हारो चौधरी रै लाला,
भोडिय़ाँ का न्याय चुकाय।
अमरसिंह फागण...
भोडिय़ा हमसै न्याय न चुकता रै लाला,
जाओ थारा जेठ जी के पास।
अमरसिंह फागण....
लड़ती-झगड़ती वो गयीं रै लाला,
गायीं जेठ के पास।
अमरसिंह फागण...
जेठ म्हारो चौधरी रै लाला,
भोडिय़ाँ को न्याय चुकाय।
अमरसिंह फागण....
भोडिय़ा हमसै न्याय ना चुकता रै लाला,
जाओ थारा राजा के पास।
अमरसिंह फागण....
राजा जी म्हारो मोरधी रै लाला,
दोनवाँ को न्याय चुकाय।
अमरसिंह फागण....
अगली का बिछवा दिवाय द्यो रै लाला,
पिछली नै टोकणी दुवाय।
अमरसिंह फागण....
साभार रउताही 2014
 

सावन सरब सोहाओन सखि हे बज्जिकांचल के वर्षागीत

ऋतुगीतों के गायन की परंपरा बज्जिकांचल में रही है। पारंपरिक अनुष्ठानों एवं विवाह के उपलक्ष्य में ऋतुगीत गाये जाते हैं। परंतु बरसात के गीत इनमें सबसे अलग हैं। ये गीत न सिर्फ संख्यात्मक दृष्टि से अधिक हैं, बल्कि इनके गायन का प्रचलन बरसात के समय में और भी अलग से हैं। विवाह के समय ''बटगमनीÓÓ और ''मलारÓÓ गाने की परंपरा है। इन दोनों प्रकार के गीतों में वण्र्य विषय की विविधता रहती है। विवाह के अन्य अनुष्ठानों के गीतों के विषय निर्धारित रहते हैं, पर ''मलारÓÓ और ''बटगमनीÓÓ के विषयों को सभी विषयों से अलग स्त्री समस्याओं, दंपति अनुराग और प्रेम कल्पनाओं से जोड़ा गया है। महिलाओं ने इन गीतों को उल्लास, राग और समाज सम्मोहक वातावरण के लिए और उन्हीं पर तैयार किया होगा। इस प्रकार वर्षा के गीत ''मलारÓÓ और ''बटगमनीÓÓ में बहुधा आये हैं। बज्जिकांचल में प्रकृति के स्वभावों के बारह रूप देखे गए हैं। प्रत्येक माह का अपना अपना स्वभाव दिखा है और उन सभी महीनों में कामिनी के हृदय, जीवन एवं संवेदना पर पडऩे वाले प्रभावों का सरस एवं प्रभावी वर्णन किया गया है। चैत से लेकर फागुन तक पूरे के पूरे महीने गीतों में रुपायित हुए हैं। ऐसे गीतों को बारहमासा कहा गया है ''बारहमासाÓÓ से अलग ''छौमासाÓÓ भी प्रचलित हैं और इन सबसे चौमासा गाये जाते हैं। उल्लेखनीय है कि ''बारहमासाÓÓ एवं ''छौमासाÓÓ के चार महीनों में वर्षा का जो वर्णन है, वैसा ही ÓÓचौमासाÓÓ में है। इन तीनों प्रकार के गीतों की धुनों में भी समानता है और वर्षा के आगमन से लेकर उसकी विदाई के समय का चित्रण तथा इन महीनों में कामिनी अर्थात् कामासक्त स्त्री के शारीरिक एवं मानसिक आरोह-अवरोह की अभिव्यक्ति अत्यंत सजीवता के साथ हुई है। महीनों के वर्णन करते उन गीतों में चार माह तो निस्संदेह वर्षा वर्णन के हुए हैं। इन गीतों के अतिरिक्त ''बरसातीÓÓ और ''कजरीÓÓ गाने की भी परंपरा है। ''बरसातीÓÓ तो स्वयं अपने स्वभाव का रचनाबोध कराते गीत हैं, ''कजरीÓÓ बादल के काले अर्थात् काजल रंग का द्योतक है। बरसात में किशोरियाँ एवं युवतियाँ एक विशेष प्रकार का खेल भी खेलती रही हैंं। इन गीतों में ऐसे खेलों का वर्णन है कि कजरी खेलने में सिर्फ बादल और बरसात ही स्त्रियों के बाधक बनते हैं। बज्जिका लोकगीतों में एक अद्भूत विशेषता उनकी कथात्मकता है। प्रत्येक गीत की कथावस्तु अपनी संपूर्ण दृश्यात्मकता के साथ उत्पन्न होती है। यहाँ हम बज्जिका के वर्षा गीतों के प्रकारों एवं उनकी कथात्मकता से जुडऩे का प्रयास करेंगे।
मलार
सखि! मुझे मुरारी भूल गये। पहले अषाढ़ में ही वह मुझे त्याग गये और अब अंधेरा किसके भरोसे कटेगा? रिमझिम वर्षा में यही चिंता सताये जाती है। कामाग्रि मेघ की बूंदों में बरसती है, भादो बीता जाता है और आसिन भी यही पुकार-पुकारकर कहता है-मोहन! कैसे भूल गये!
गीत:-     सखि रे बिसरल मोहि मुरारी
    प्रथम असाढ़ तेजल मोहि मोहन
    कोन विधि खेपन अन्हारी
    रिमझिम रिमझिम सावन बरसे
    बैठल सोच विचारी
    मदन मेघ बूंद बन बरसे
    हरि बिसरल गिरधारी
    आसिन कहे पुकार हे ऊधो
    बिसरल मोहे मुरारी
तब, ऊधो का बड़ा अनर्थ दिखता है, जब योग और भक्ति से अधिक गोकुल की सित्रयाँ मोहन के रंग में रंगना सर्वाेपरि मानती हैं। उनके ज्ञान का दंभ उन उपालंभों से दब जाता है, जो बार-बार स्त्रियों के मुँह और हृदय से निकलते हैं-उधो! इस कठिन बरसात में बादल गरज रहे हैं, मेरी छाती फाटी जाती है और मैं चौंक-चौंक उठती हूँ। उनका हृदय कितना कठोर हो गया। उन्होंने जन्मों के प्रेम को ठुकराकर हमारी अवहेलना कैसे कर दी उधो! क्यों नहीं आये प्राणनाथ?
गीत:-     ऊधो प्राननाथ नहीं आये
    आएल प्रबल दिवस ऋतु बरसा
    तापर घन घहराये
    चितवन चौंक फटय मोर छतिया
    कत दिन मोहि सताये
    कुलिश कठोर भेल हुन छतिया
    हरि घरिया नहिं आये
    नारि विरानि जानि मोहि त्यागल
    एहन आदेश चलाये।
    विसरल प्रेम पुरातन अब हरि
    वर नागरि मन भाये
    सुनकर वचन सुबाब कब बाँसुरी
    अमृत पाँती नहिं पाये।
        बटगमनी
''बटगमनीÓÓ रास्ते का गीत है। स्त्रियाँ रास्ते-रास्ते इसे गाती चलती हैं। परंतु यह समूह गीत है और इसे किसी पूजा, विवाहादि आदि अवसरों पर ही गाया जाता है। ''पानी काटनेÓÓ, ''आम महुआ ब्याहनेÓÓ या ऐसे ही किसी पूजा-पाठ से लौटने अथवा निर्धारित स्थल पर जाते वक्त इसे गाया जता है। बटगमनी बाट और गमनी से निर्मित शब्द है। बाट का अर्थ रास्ता औरा गमनी का अर्थ गीत लगाया जाता है। इस प्रकार के गीतों का वण्र्य, वियोग, विलास और उल्लास तो हैं ही, किसी परपुरूष की कामोदीप्त, कुदृष्टि, और उनके प्रति स्त्रियों का प्र्रतिकार भरा उत्तर भी गीतों में कथात्कता के साथ उपलब्ध हंै। यहाँ बटगमनी के बहाने वर्षा वर्णन ही हमारा अभीष्ट है।
सजनी! इस भादों मास में वह मुझे सांत्वना दे गये हैं, पर वियोग अब सहा नहीं जाता । व्याकुलता बढ़ी जाती है। सभी दिशाओं में मदन की ज्वाला धधकती प्रतीत होती है और मेरी देह में तरह-तरह की पीड़ाएँ उठती जाती हैं। यह दु:ख किसके सम्मुख बैठकर कहूँ। विद्यापति का यह गीत अपनी श्रुतिपरंपरा में लोकगीत की प्रसिद्धि पा गया है-
गीत:-     अवधि मास ई भादो सजनी गे
    निज कय गेला बुझाय
    से दिन आबि तुलायल सजनी गे
    धीरज धरल नहिं जाये
    अति आकुल पहु बिनु सजनी गे
    सुंदर अति सुकुमारी
    अकछि हिया पथ हेरथ सजनी गे
    अजहूँ न आएल मुरारी
    खन-खन मदन दसों दिस सजनी गे
    पीर उठे तन जागि
    से दु:ख काहि बुझाएल सजनी गे
    बैठूँ केकरा लग जाये
    हरि गुण सुमर बिकल भेल सजनी गे
    के बूझत दुख मोर
    विद्यापति कवि गाबे सजनी गे
    आएल नंद किशोर
        बारहमासा
चैत माह में बेलियाँ फुलायीं और मोहन पता नहीं किस अपराध के कारण मुझे त्याग गया। बैशाख आया, तो पसीने तर-ब-तर हुई जाती हूं, मोहन रहते तो शरीर में चंदन घिसकर लेप लगा देते। जेठ में भारी बूंदों के गिरने की संभावना व्यक्त करते दादुर शोर मचाने लगे। उनके बिना उदासी में मुझे कुछ भी नहीं भाता। सावन का सुहाना समय, कोयल और मोर की आवाज ; ऐसे में मेरी आँखों से गिरनेवाली विरह बूंदों से मेरी साड़ी भींगी जाती है। भादो की काली और डरावनी रात में किसके संग रहूँ। अब आसिन माह में मोहन को पत्र लिखूंगी और मोहन को भेजूंगी। पत्र भेजा पर कार्तिक में भी मोहन नहीं आया, मनोरथ की पूर्ति ना हुई। अगहन में कई प्रकार के अन्न खेतों में उपजे, हृदय डोला और मेरी कामाग्रि मुझमें और तीव्रता से दमकने लगी। पूस में ठण्डक और बढ़ी और सारी-सारी रात मैंने बैठकर बितायी। माघ में मोहन की मुरली सुनायी पड़ी। चलो सखि! मोहन कहीं जमुना के किनारे खड़ा होकर तो बंशरी नहीं टेर रहा। फागुन में रँग और गुलाल उड़े, तो मन में और हूक उठी-कृष्ण होते, तो उनके संग केलि करती, और मैं भी अबीर रंग खेलती-
गीत:- चैत हे सखि फुलल बेली, निकस कुंज नेवार हे
    तेजी मोहन गेल मधुपुर हमर कोन अपराध हे
    बैशाख हे सखि ऊष्णा ज्वाला घाम से भींजल शरीर हे
    रगडि़ चंदन अंग लेपितौ घर जो रहइत कंत हे
    जेठ हे सखि बूंद भारी दादुर शोर मचावे हे
    सुनि बिना मोहि कछु न भावे सतत सेज उदास हे
    सावन हे सखि रैनि सोहावन कोइली कहुके मोर हे
    नयन ढरि ढरि भीजें साड़ी दादुर शोर मचावे हे
    भादो हे सखि निशि भयावन सोचब कत दिन रात हे
    केकर संग हम ठाढि़ होएब के कहव निज बात हे
    आसिन हे सखि लिखन पाती मोहन निकठ पठाव हे
    अपन विनती कहब हरि से हमर खबर जनाब हे
    कार्तिक हे सखि इहे मनोरथ आएत नंदगोपाल हे
    मोर प्रियतन भेल भारी ओतहि बसु नंदलाल हे
    अगहन हे सखि उपज सारी भाँति भाँतिक अन्न हे
    हृदय डोले मदन दमके तैयो न आबे कंत हे
    पूस हे सखि बढ़ल जाड़ा पहु बिना नहिं जाय हे
    सगारि रैनि हम बइठि गमाओल होएत कखन परात हे
    माघ हे सखि कान्ह कामना मुरली टेरथि नंदलाल हे
    चलहु सखि घाट जमुना होएव तरूवर ठाढ़ हे
    फागुन हे सखि खेलब होरी उड़त रंग गुलाल हे
    अबीर अबरख धै जो रखितौ कृष्ण संग करितौं केलि हे।
बारहमासा के बारहों महीनों में कामविदग्धा स्त्री की करूण व्यथा वर्णित हुई है, जिसमें वह सखियों, ऊंधो या अपनी तरह की अन्य स्त्रियों को रो-रोकर अपना हाल कहती है। कई बारहमासाओं में कुछ दूसरे प्रकार के वण्र्य भी आये हैं, परंतु ये वण्र्य मथुरा और गोकुल से अलग नहीं हुए। यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ बारहमासाओं का गीतारंभ आषाढ़ से होता है, तो कुछ गीत सावन से भी शुरू होते हैं। अग्रलिखित बारहमासा सावन से आरंभ हुआ है- सावन में कुंजवन में ग्वालिन दही बेचने आयी है, वह हमसे विवाद कर बैठी और कंस के नाम की धमकी दे गयी। ग्वालिन! भादो में भ्रम त्यागो और वापस घर चली जाओ, यमुना घाट दान मांगता है, वह चुका देना-
गीत :     सावन शाखा कुंज वन में ग्वालरी दहि बेचुरी
    करत वाद विवाद हम से देहू कंस दोहाय री
    भादव भरम गमाय ग्वालिन धुरहू घर चलि जाहुरी
    घाट यमुना दान मांगय देहू दान चुकाय री
बारहमासा के शेष पंक्तियों में अन्य माहों में वियोगिनी का हृदयस्वर उभरा है। परंतु आषाढ़ माह में कृष्ण राधा की करूणा से द्रवित होकर राधा को आ मिले। इसे सूरदास ने गाया-
गीत :     आषाढ़ राधा ठानल करूणा कृष्ण राधा साथ री
    सूरदास गाओल इहो पद राधा कृष्ण मिलान री
अगला बारहमासा आषाढ़ से आरंभ हुआ है। जीवों के अनेक प्रकार के बोलों को सुनकर विरहिनी को नैहर भी नहीं भा रहा। पिया मुझे छोड़ गये और आँखों से बहने वाले आँसू यह पुकार-पुकार कर कहते हैं कि संसार के सभी पुरूष एक से कठोर होते हैं। सावन में सर्वत्र सुहावनी छटा बिखर आयी, बाबा की फुलवारी में झूला झूलने जाऊंगी। भादो की अंधेरी रात में कैसे अकेली रह पाऊँगी। बारहमासा के इन चार माह के वण्र्य में वर्षा वर्णन आये हैं-
गीत :     आएल मास आषाढ़ बोली बाजे हजार
    पिया बिना नीको न लागे नइहरवा में
     पिया गेलन हमरा छोड़ गिरे नैना से लोर
    होइय पुरूष कठोर सारी दुनिया में
    सावन सरब सोहावन झूला करूँ तैयार
    झूला झलि लियऊ बाबा फुलवरिया में
    भादो रैन अन्हार अति भीषण रात
    कइसे रहब अकेले अन्हरिया में
सावन में हरियाली छाने से प्रकृति में मनोरम छटा विकसित हो जाती है। ऐेसे में जिन स्त्रियों के पति उनके संग है, वे तो सौभाग्यशाली हैं पर जिनके पति अलग हैं, उनका जीवन व्यर्थ ही महसूस होता है। सावन में सर्वत्र शोभा विराजने लगी, भादो में दामिनी चमकी और रिमझिम बूंदे छिटक आयीं-
गीत: सावन सरब सोहाओन सखि हे फुलल बेली चमेली हे
    सुरभि सौरभ भ्रमर भ्रमि करे मधुरस केलि हे
    भादो घन झहराय दामिनी गरज शब्द सुनाय हे
    बरसु घन घनघोर रिमझिम मोहे न कुछ अभाव हे
आगे की पंक्तियों में वर्षा वर्णन नहीं है। पर जेठ के बाद आषाढ़ का वर्णन जैसे ही आया है वियोग की पीड़ा बढ़ चली और विदग्धा को पहाड़ सा जीवन महसूस होने लगा। वह चिंता में है किस प्रकार जीवन नैया को पार लगाया जाये-
कौन विधि अषाढ़ खेपब परम दु:ख अपार हे
बनत सरोवर बहत बहि बहि नयन युग जलधार हे
अग्रलिखित बारहमासे की शुरूआत चैत से हुई और तीसरे माह के बाद आषाढ़ से वर्षा की धमक मिली। अभी से जलधार और विद्युत का शोर देह में कँपकँपी पैदा करता है। सावन में मेघ और ठंडी हवा ने प्रिय का स्मरण करा दिया, यौवन उमड़ा पर प्रिय तो संग नहीं। भादो में जलधार और बिजली की कड़क से अचेत होकर गिरी। सखि! श्याम बिना अब जिया न जाये-
गीत:     आषाढ़ हे सखि झहरि झमकत नीर बिजुरी शोर हे
    देखि काँपे देह थरथर अपन धारा नीर हे
    आएल सावन नीर बरसत मेघ धीर समीर हे
    सुमरि यौवन उमडि़ आवत प्राणपति नहिं संग हे
    भादौ जलधर कड़कि ठनके खसब चौंकि अचेत हे
अगले बारहमासा में सीता-राम आए हैं। बारहमासाओं का अभिप्राय केलि आनंद है और इनके पात्र प्राय: कृष्ण, राधा या गोपिकाएँ हैं। परंतु राम और सीता की पवित्र जोड़ी पर भी बारहमासा गाये गये हैं। अगहन में सीता का राम से विवाह हुआ और पूस में कोहवर सजा। माघ में रघुवर को सम्मानित किया जाएगा। फागुन में फगुआ खेलवाया जायेगा, चैत में फूल तोड़ लायेंगे और बैशाख में उनके लिए पंखा झला जाएगा। जेठ की गर्मी असह्य जैसी होती है और आषाढ़ में बूंदों की झड़ी लगती है। सावन में रघुवर को झूला झूलवायेंगे। भादो की अंधेरी रात में वह याद आयेंगे, आसिन में सीता उनके लिए श्रृंगार करेगी और कातिक में उन्हें मिथिला आना पड़ेगा-
    अगहन सीता के विवाह पूस कोहवर तैयार
    माघ सीरक भराय देव रघुवर जी के
    फागुन फगुआ खेलायब चैत फूल लोढि़ लायब
    वैशाख बेनिया डोलाएब रघुवर जीके
    सावन झुलवा झूला दे रघुवर जी के
    भादो रात अन्हार आसिन करब सिंगार
    कातिक आ गेल मिथिला रघुवर जी के
वर्षा के तीन महीनों में प्रिय की याद सर्वाधिक आती है। स्त्रियाँ तमाम आध्यात्मिक एवं पौराणिक धारणाओं में रमती हैं। व्याकुल हृदय में कई प्रकार के ख्याल आते हैं और वह अपने प्रिय को तरह-तरह के वास्ते देती हैं। स्त्रियों को प्रीति सर्वाेपरि लगती है। वे अपनी इस धारणा के पीछे पारंपरिक कथाओं का हवाला देती हैं-प्रीति के कारण ही तो श्रीराम ने सेतु बंधवाया। आषाढ़ में जलधार सजी और राम सीता की तलाश में निकल पड़े। सखि! सावन में जल की बूंदे बरसते ही सभी के साजन घर लौटे, तब भी हमारे प्रिय परदेस में है। भादों की अंधेरी भयानक रात में अकेले डर लगता है।
प्रथम मास आषाढ़ हे सखि साजि चलल जलधार हे
प्रीति कारण सेतु बान्हल सीता उदेश श्रीराम हे
सावन हे सखि सर्व सुहावन रिमझिम बरसत बूंद हे
समक बलमुआ रामा घरे-घरे आएल हमर बलमुआ परदेस हे
भादो हे सखि रैन भयावन दूजे अन्हरिया रात हे
ठनका जो ठनकल राम बिजुली जे चमकये
देखि जियरा डेराय हे
आषाढ़ के पहले ही दिन जलधार सजी। सखि! मेरी तो बाली वय है, पिया परदेस है। कौन उपाय करूँ। सावन में पपीहों ने भी पिया की रट लगायी। भादो में जल-थल नदी उमड़ी और चारों दिशाओं में कालिमा छा गयी। पिया सुबह में मधुपुर गये और पुन: भोर होने को आयी, वह नहीं लौटे-
प्रथम मास आषाढ़ हे सखि साजि चलल जलधार हे
वारी वयस विदेस बालम करब कोन प्रकार हे
सावन रिमझिम बूंद बरसत पिया बसथि बड़ी दूर हे
पिया पिया के रटत पपीहा जंगल बोलत मोर हे
भादो जल-धल नदी उमडि़ गेल चहुँदिशि श्यामा श्याम हे
एक भोर जब गेल मधुपुर ओतहिं भै गेल भोर हे
बारहमासाओं में आज के संदर्भ भी व्याख्यायित हुए हैं। रोजगार की तलाश में कलकत्ता गये पुरूष की स्त्री ने उसके रास्ते हर माह देखें। अगहन में चूरा कुटवाया और पूस में दही जमाया। वह फागुन में फगुआ खेलने के लिए विकल रही और चैत में फूल तोड़कर श्रृंगार कर बैठी। वैशाख एवं जेठ ने उन्हें पंखे की हवा देने को तैयार रही। वह आषाढ़ में भी आ जाते तो सावन में दोनों केलि करते, भादो, भी ऐेसे ही बीता, आसिन में भी आशा न पूरी, कलकतिया(कलकत्ता में प्रवास करनेवाला)तो कार्तिक में आया-
कातिक अएले कलकतिया जोहन बटिया
अगहन चूरबा कुटाएब पूस दही पौराएब
फागुन फगुआ खेलाएव चैत फूल लोढि़ लाएब
बैसाख बेनिया डोलाएव जोहन बटिया
जेठ हेठ भ गमाएब आषाढ़ घर चल जाएब
सावन दुनू मिलि खेलब जोहन बटिया
भादो नहीं घहराय आसिन आस लगायब
कातिक ऐलै कलकतिया जोहन बटिया।
        चौमासा
चौमासा गीतों में बरसात के चार माह आये हैं। यद्यपि बारहमासा भी बरसात में ही गाया जाता है। प्राय: झूला झूलते स्त्री-पुरूष बारहमासाओं को गाते-सुनते हैं। तथापि, चौमासा गीतों में सिर्फ बरसात के महीनों की ही चर्चा आती है। चौमासा के चार माह के वण्र्य बारहमासा के बरसात माह के वण्र्य की तरह ही हैं। बारहमासा के चार मास निकालकर भी चौमासा गायन की परंपरा है।
ऊधो! आप स्वयं मधुपुर जाइए। अंगों में शीतल चंदन लगाकर कामिनी ने श्रृंगार किया है। अन्य दिन प्रीत भले ही भाग्य में न हो, पर आषाढ़ में सुख मिलना अति आवश्यक है। एक तो गौरी की उम्र कच्ची है, उस पर पिया परदेस जा बसे, तीसरे बूंदें झमाझम बरसीं। इस प्रकार सावन ने अधिक क्लेश किया। भादो की अंधेरी रात ने डराया, आसिन में भी आश न पूरी। कृब्जा सौतिन ने श्याम को भरमा रखा है।
गीत : ऊधो अपने से मधुपुर जाऊ
    शीतल चंदन अंग लगाओल कामिली कैल सिंगार
    आये दिन के प्रीत पाछे सुख करू मास आषाढ़ हे
    एक त गौरी बारी बयस के दोसरे पिया परदेस
    तेसर बूंद झमाझम बरसे साओन अधिक कलेस
    भादो हे सखि रैन भयाओन एक त अन्हरिया रात हे
    ठनका जे ठनके बिजुली जे चमके होएव ककरा लग ठाढ़ हे
    आसिन हे सखि आस लगाओल आसो न पूरल हमार हे
    आसो जे पुरलइ कुब्जा सौतिनिया के जे कंत रखल लोमाय हे
       कजरी
कजरी बादल के कज्जल रंगों से जुड़ा राग का खेल है जिसमें स्त्रियाँ जमा होकर गाती हैं। ऐसे खेल में बादल ही बाधक बनता है, गीतों में इसका चित्रण है- ननद! कैसे कजरी खेलने जाऊँ। बादल घिर आये-
गीत :     कइसे खेले जाएब सावन में कजरिया
    बदरिया घेरि आये ननदी
बज्जिका के लोकगीतों में बरसात के गीत सिर्फ प्रिय-वियोग से नहीं जुड़े। बरसा के अभाव में कृषकों की स्थितियाँ भी चित्रित हुईं:-
गीत :- बरसहु बरसहु इन्नर देवता
पानी बिना पड़ल अकाल हो राम
वर्षा नहीं होने की स्थिति में बज्जिकांंचल में कई अनुष्ठान भी होते हैं। स्त्रियाँ जट-जटिन खेलती हैं और विधवाएँ अंधेरी रात में हल चलाकर इन्द्र से अनुनय करती हैं। ऐसी कई क्रीड़ाए यहाँ प्रचलित हैं।
बज्जिकांचल के वर्षागीत मनोरम वण्र्य एवं कर्णप्रिय धुन के लिए अत्यंत प्रसिद्ध हैं।         
साभार रउताही 2014 

लोक जीवन की सहज अभिव्यक्ति : लोकगीत

भारत की सही पहचान लोकभाषा और लोक संस्कृति के बिना नहीं हो सकती है। भारतीय संस्कृति को यदि हम अलग-अलग लोक अंचलों की संस्कृतियों का जैविक समुच्चय कहें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भारत के हृदय अंचल 'मालवाÓ में तो समूची भारतीय संस्कृति गागर में सागर की तरह समाई हुई है। मालवा की परम्पराएँ समुचे भारत से प्रभावित हुई हैं और पूरे भारत को मालवा की संस्कृति ने किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है।
मालवा की धरती अत्यन्त उपजाऊ और धन-धान्य से परिपूर्ण रही है। यथा-
'देश मालवा का गहन गंभीर
डग-डग रोग पग-पग नीर।Ó(कबीरदास)
इसका बाहरी रूप जितना मनोरम है, उतना ही सुन्दर, कोमल और आत्मीय है इसका अंतरंग। हृेनसांग सातवीं शदी मेें मालवा में आया था तो वह भी यहाँ के पर्यावरण और लोकजीवन से गहरे प्रभावित हुआ था। तब उसने लिखा भी था कि इसकी भाषा मनोहर और सुस्पष्ट है। मालवा क्षेत्र के जल, पर्यावरण और सदैव सुकाल की अवस्था पर संत कवि सुन्दरदास लिखते हैं-
'वृच्छ अनन्त सुनीर वहंत सुसुन्दर संत बिराजे तहीं ते
नित्य सुकाल पड़ै न दुकाल सुमालवं देस भलो सबहीं ते।Ó
मालवा भारत का हृदय अंचल है। आज का मालवा संपूर्ण पश्चिमी मध्यप्रदेश और उसके साथ सीमावर्ती पूर्वी राजस्थान के कुछ जिलों तक विस्तार लिए हुए हैं। इसकी सीखा रेखा के सम्बन्ध में एक पारम्परिक दोहा प्रचलित है-
'इस चम्बल उस बेतवा, मालव सीमं सुजान।
दक्षिण दिसि है नर्मदा, यह पूरी पहचान।।Ó
मालवा के लगभग दो करोड़ बाशिंदे इसकी संस्कृति को अपने सुख-दु:ख, संस्कार व्रत-तेवार, अनुष्ठान के मौकों पर गीत कथा गाथा से लेकर विविध लोकाभिव्यक्तियों के जरिए जिंदा रखे हुए है। महज मालवी भाषा और साहित्य की दृष्टि से ही नहीं, वेशभूषा, श्रृंगार-प्रसाधन, लोकाचार, खान-पान, चित्र, मूर्ति, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में मालवा की अभी खास पहचान शताब्दियों से बनी हुई है।
यहाँ का लोकमानस अतीत ही नहीं, अपने वर्तमान से भी सीधे संवाद करता है। यथा-
'बीरा थारा कारणे वोट का भिखारी उबारे द्वार।
एक बोट का माँगे दान, बेनड़ी रखजे म्हारो मान।।Ó
मालवा लोक-साहित्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। जीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जब मालवजन अपने हर्ष-उल्लास सुख-दु:ख को दर्ज करने के लिए लोक-साहित्य का सहारा न लेता हो।
'छोटी-छोटी नानी होण ने माँडी संजा प्यारी।
संजा बइका गीत उगेरया या धुन सबसे न्यारी।।Ó
ई हिकी-मिकी ने जीवने को संगीत गुंजाणे लागी
म्हणे लाल-गुलाबी संजा देखी, तो दूर उदासी भागी।
इनने जग का सुख-दुख गाया कई भीनी राख्यो है सेस।
यो हँसतो-गातो म्हारो देस। मदनमोहन ब्यास
धार्मिक चेतना के विकास के फलस्वरूप लोक-कथाओं, लोकगीतों, लोकनाट्यों, लोकनृत्यों आदि का निर्माण सुगम हो गया। जातीय रीति-रिवाज का निर्माण हुआ और अन्त में सामाजिक मूल्यों के निर्धारण में लोक साहित्य समृद्ध होकर समाज की दिशा और दशा निर्धारित करने लगा।
'कुर्सी का मद में चर हुवो, बोले तो एँठई ने बोले।
कोई साँचा रोणा केवे तो मकना हाथी सरको डोले।
जिको दिल नी समन्दर सो गेरो, ऊराज चलाणो कइँजाणे।
जिने देखी नी टूटी नान कदी, ऊ पार लगाणो कइँजाणे।Ó
            -नरेन्द्र सिंह तोमर
लोक साहित्य के अन्तर्गत लोकगीतों की भी कई शैलियाँ प्रचलित हैं। इनमें वसन्त-ऋतु के गीत जैसे-फगुआ, होरी, रसिया, कबीर चैती, वर्षा-ऋतु के गीत, जैसे सावन, हिण्डोला, कजरी, चौमासा, बारहमांसा, मल्हार, व्रत-पूजा के गीत जैसे लंगुरियँ, छठीमाता, के गीत देवी गीत, भजन श्रम गीत जैसे-सोहनी, रोपनी के गीत, कोल्हू के गीत, चरखा गीत, जतसार, चाँचर, जाति गीत, जैसे-बिरहा(अहीरों के गीत), कहरवा,(कहारों के गीत)पचरा(दुसाधों के गीत), तेलियों के गीत, धोबियों के गीत, चमारों के गीत आदि। बच्चों के गीत जैसे-लोरी, ओक्का-बोक्का, चन्दामामा, चुटकुलें आदि, अन्प्य गीत-जैसे दादरा, पुरबी, नयारी, झूमर आदि।
भारतीय समाज में संस्कारों का बड़ा महत्व माना गया है। गर्भधान से लेकर मृत्यु तक संस्कारों का क्रम चलाता रहता है। इस समय व्यक्ति को इन समस्त संस्कारों के शास्त्रीय तथा लौकिक अनुष्ठानों के बीच से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक संस्कार के अपने गीत हैं, जो उत्संवों पर गाए जाते हैं। जन्म-संस्कार के गीत, जैसे साथ, सरिया, रोचना, सोहर, खेलावना, मंगल, बधाई नेग-निछावर, जच्चा-बच्चा की देखभाल से संबंधित गीत, छठी नामकरण के गीत, मुण्डन तथा जनेऊ के गीत जैसे-बरूआ विवाह, के गीत, जैसे सगुन, लगन, कोहवर, बन्ना-बन्नी, नहछू, घोडी़, सेहरा, सोहाग, जोग नकदा गाली विदाई, भात भांवर अत्येष्टि-संस्कार के गीत आदि के माध्यम से लोक जीवन ही अभिव्यक्त होता है।
मालवी लोक से गहरा तादातम्य लिए श्री बालकवि बैरागी की भाव एवं सौन्दर्य-दृष्टि का साक्ष्य देती कुछ पंक्तियाँ देखिए-
'उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा कामणगारा की याद
नेणा की काँवड़ को नीर चढांऊ
हिवड़ा को रातों-रातों हिंगलु लगाऊं
रूडा़-रूड़ा रतनारा थाक्या पगा से
ओठों ही ओठों ती मेहंदी रचाऊँ
ढव थारे चन्दा को चड़लो चिराऊं
नौलख तारा की बिछियाँ पेराऊँ
ने उतारूँ थारा वारणा ऐ म्हारा मन मतवारा की याद।Ó
विज्ञान और तकनीकी के इस भौतिक दौर में लोक साहित्य की परम्पराओं का काफी हृास हुआ है। परिवार में नाना-नानी और दादा-दादी अपने नातियों-नतनियों और पोते-पोतियों को कहानियाँ सुनाकर तथा उनके यश-प्रश्रों का उत्तर देकर जिस परम्परा का पालन और रस का अनुभव करते थे, वह परम्परा ही खोखली हो गई है। आधुनिकता की आँधी ने उन्हें इस प्रकार के सरोकारों से दूर कर दयिा है। बाल सुलभ मानवीय उत्सुकता के साथ जुड़कर अधिक उम्र का अनुभव एक वृद्ध के जीवन में जो चाव पैदा करता था, आज वह नहीं है। बच्चे के भीतर आत्म विश्वास का जो संचार इससे होता था, आज वह गायब है। वाचिक-परम्परा केवल बोली जानेवली भाषा ही नहीं है अपितु वह जीवन-दर्शन भी है। लेकिन बदलते परिवेश ने इस जीवन दर्शन का सर्वाधिक अवमूल्यन किया है।
उपभोक्तवादी संस्कृति और हर वस्तु के खरीदे जाने की मानसिकता ने लोक साहित्य की परम्पराओं पर कुठाराघात किया है, जिसके तले हमारी लोक संस्कृति दबी जा रही है। आज इसके सूख रहे खेतों पर प. विद्यानिवास मिश्र ने अपनी चिन्ता को इन शब्दों में व्यक्त किया -''साहित्यकारों, शास्त्रकारों और कलाकारों-सबकों अपनी जड़ों का रस चाहिए। वह रस कभी लोकसाहित्य में मिलता है, लोकाचार में मिलाता है, लोक-कला, लोक-संगीत मेें मिलता है, लोक नृत्य में मिलता है लोक-गीत में मिलता है और कभी केवल ऐसे आदमी के साथ बैठकर मिलता है जो स्मृतियों में जीता नहीं, स्मृतियों को जीता है, स्मृतियों को व्यतीत नहीं मानता, अपने जीवन और जातीय जीवन से अविलग देखता है।ÓÓ
''लोक साहित्य में प्राचीन संस्कृतियों के तत्व विद्यमान रहते हैं।ÓÓ रूसी-साहित्य वाई.एम.सोकोलोव। ऐसे ही विचार ओरोलियो एम. एसपिनोजा ने भी व्यक्त किए हैं.
आज का कोई भी सभ्य मानव यह दावा नहीं कर सकता है कि उसने अपने अंदर से आदिम संस्कारों के बीजों को नष्ट कर दिया है। लोक साहित्य में सर्व भूत हिताय और सर्वजन सुखाय की भावना प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
लोक-साहित्य उस निर्मल दर्पण के समान हैं जिसमें लोकमानस का अविरल तथा विराट स्वरूप पूर्णरूपेण दिखाई पड़ता है। जो भगवान के विराट स्वरूप की ही भांति विराट और अनन्त है लोक संस्कृति के वास्वविक रूप को देखने के लिए हमें लोक-साहित्य का ही अनुसंधान करना होगा।
अन्त में- डॉ. शिव चौरसिया का मालवी-गीत-
''धरती से आकास तलक जो फेल्यो हे आंखो संसारयो सगलो म्हारो परिवार।
सूरज दादो चंदो मामो, तारा संग-संगाती,
समन्दर-परबत खेत-खला सब, रुत हण रंग उड़ाती
इन्दरधनुष करतब जादू को, कुदरत को
अदॅभत सिणगांर यो संगलो म्हारो परिवार।
धरती तो माता हे म्हारी, फसल नरी निपजावे
बीर बायरो बादल साँते, बरखा-अमरत लावें।
बिजली नयन कड़-कड़ नाचे, डरप भरी लागे चमकार।
यो संगलो म्हारो परिवार।
भोत बड़ा आकास दायजी, सीतल गेरी छाया,
बायर की बाधा झेले वी, अपने सदा बचाया।
रोजरात की चौपड़ माँडें, गिरह-नरवत देखे नर-नारे।
यो सगलो म्हारो परिवार।
नाना-मोटा झाड़-झड़कला सब साँचा हम जोली।
नदरी बेन्या नखराली सब धरती पे रंगोली।
जुग-जुग ती जीवन बाँटी री, महिमा इनकी अपरम्पार
यो सगलो म्हारो परिवार।
मोरया नाचे गाय डेंडका, झिंगर झन-झन गाजे।
उड़े चिरकलीरची ची करतीं तार हिया का बाजे।
लंगे सेंत का झरना सरखी, कोयल की मीठी लयकार।
यो सगलो म्हारो परिवार।
वेद-पुरान कुरान-बाइबिल राम-रहीमा-ईसा।
बुदष जरस्दुत-महावीर से ग्यान मिल्या है बीसा।
योग-भोग ने दरसन संगला धरम-करम को जो विस्तार
यो सगलो म्हारो परिवार।
व्यास-वाल्मिकी, चेखव-गेटे, तुलसी-सूर-कबीरा।
गालिब-भूषण-नानक, दादू, दरद दीवानी मीरा।
प्रेमचन्द सा साँचा सेवक जितरा भी है रचनाकार।
यो संगलो म्हारो परिवार।
 साभार रउताही 2014 

प्रेम और अनुराग का लोक स्वर : ददरिया

लोक का नाम जब भी हमारे सामने आता है, तब वह हमारी वाणी और हृदय को रससिक्त कर जाता है। हमारे अंतस में भावात्मक और रसात्मक आनंद की हिलोरे पैदा करता है और हमारी आंखों के सामने रूपायित होता है-सहज, सरल, भोले-भाले, परिश्रमी, झूमते, नाचते-गाते लोगों का समूह जो अपनी परम्परा, सभ्यता, और संस्कृति को अपनी लोक कलाओं के माध्यम से पोषित करता है। यही वह लोक है जो कोयल की तरह गाता है, मोर की तरह नाचता है तथा श्यामल मेघ की तरह सबकी प्यास बुझाता है।
शिष्ट जन इस लोक को अशिष्ठ कहते हैं। शायद शिष्टता का उन्हें ज्यादा भान हो। पर मुझे लगता है कि किसी को अशिष्ट कहना ही ज्यादा अशिष्टता है। किसी को अशिष्ट कहकर हम शिष्ट नहीं हो सकते। शिष्ट का संसार भौतिकता ही चकाचांैध से आप्लावित, स्वप्रिल, काल्पनिक और जीवन के सत्य से दूर होता है। वहां केवल दिखावा ही दिखावा, छलावा ही छलावा होता है। न शांति होती है न प्रेम। केवल आपाधापी, और तनाव, कुंठा का बोलबाला होता है। भला ऐसे में क्या तथाकथित शिष्ट सुखी हो सकता है? कदापि नहीं। लोक का अपना सहज, सरल परंतु सुखद और यथार्थ परक संसार होता है। भले ही लोक सुविधाओं से वंचित होता है। पर प्रेम, शांति, सद्भाव और साहचर्य से परिपूरित रहता है। इसकी अनुभूति तो लोक कला का सानिध्य प्राप्त कर ही किया जा सकता है। इसकी प्रतीति तो इनके साहित्य का अध्ययन और मनन कर ही किया जा सकता है। हां साहित्य, लोक का भी अपना साहित्य होता है। लोक का साहित्य ''लोक साहित्यÓÓ कहलाता है। लोक साहित्य लोक की निधि है। इस निधि में है लोक-गीतों के हीरे-मोती, लोक कथाओं और लोक गाथाओं के नीलम, लोकोक्तियों और पहेलियों के पन्ना-जवाहरात। यदि संपत्ति शिष्टता का सूचक है, तो भला इतनी संपत्तियों का मालिक ''लोकÓÓ  अशिष्ट कैसे हो सकता है? हां निरीहता, अभाव ग्रस्तता, गरीबी, सहजता और सरलता अशिष्टता का बोध है तो ''लोकÓÓ जरूर अशिष्ट है, असभ्य है पर अपनी संस्कृति के संरक्षण और संर्वधन में इनकी यह अशिष्टता व असभ्यता कला-संस्कृति व प्रेम और प्रकृति के मामले में शिष्ट से भी विशिष्ट है। लोक की यही विशिष्टता लोक जीवन का माधुर्य है। लोक जीवन तो सदानीरा नदी की तरह आदिम काल से लोक मंगल के हित प्रवाहित हो रहा है। यदि कोई इस नदी से दूर रहकर प्यासा है तो गलती नदी की नहीं उस प्यासे की है, जो शिष्ट का आचरण कर, दंभ के कारण नदी के पास जाने में भी अपनी तौहीन समझता है। नदी का जल कंठ की प्यास बुझाता है और लोक गीत कंठ से निसृत हो श्रवणेन्द्रिय से प्रवेश कर मन और आत्मा की प्यास बुझाते हैं।
लोक गीत जहां जीवन में रस घोलते हैं, वही श्रम की क्लांति को भी मिटाते हैं। लोक गीत लोक के लिए ऊर्जा और प्रेरणा का कार्य करते हैं। लोक में लोक गीतों की महत्ता कभी कम हुई है, न होगी। लोग गीतों के उद्गम और अंत के विषय में डॉ. श्याम परमार ने लिखा है-''लोक गीतों के प्रारंभ के प्रति एक संभावना हमारे पास है। पर उसके अंत की कोई कल्पना नहीं। यह वह धारा है, जिसमें अनेक छोटी-मोटी धाराओं ने मिलकर उसे सागर की तरह गंभीर बना दिया है। सदियों के घातों-प्रतिघातों ने उसमें आश्रम पाया है। मन की विभिन्न परिस्थितियों ने उसमें अपने मन के ताने-बाने बुने हैं। स्त्री पुरूष ने थक कर इसके माधुर्य में अपनी थकान मिटाई है। इसकी ध्वनि में बालक सोये हैं। जवानों में प्रेम की मस्ती आई हैं। बूढ़ों ने अपने मन बहलाए हैं। वैरागियों ने उपदेशों का पालन कराया है। विरही युवकों ने मन की कसम मिटाई है। किसाने ने अपने बड़े-बड़े खेत जोते, मजदूरों ने विशाल भवनों पर पत्थर चढ़ाए हैं और मौजियों ने चुटकुले छोड़े हैं। कहने का आशय यह है कि लोक गीत जीवन को स्पंदित करते हैं। लोक जीवन के सुख-दुख को अपने में समेट कर लोक में आश्रय पाते हैं। लोक के हर वर्ग और जीवन के हर रंग के चितेरे हैं-लोक गीत।ÓÓ
छत्तीसगढ़ तो लोक गीतों का कुबेर है। छत्तीसगढ़ मेहनतकश इंसानों की धरती है। किसान और बसुंधरा की धरती है। यहां न जंगल जमीन की कमी है, न डोली डांगर की ना ही ''जांगरÓÓ की। हरे-भरे खेत-खार, जंगल-पहाड़, धन-धान्य से भरे कोठार जैसे इस धरती के श्रृंगार हैं। इस रत्नगर्भा धरती की कला और संस्कृति भी ठीक इन्द्र-धनुष की तरह बहुरंगी है। इसकी अलौकिक आभा लोक जीवन को आलोकित करती है। यहां लोक गीतों का अक्षय भण्डार है। इस अक्षय भण्डार का अनमोल हीरा है ''ददरियाÓÓ। ददरिया श्रम की साधना और प्रकृति की आराधना में रत किसानों और श्रमिकों का गीत है। यह प्रेम और अनुराग की लोक अभि-व्यक्ति है। लोक साहित्य विद्वानों का कथन है कि ''दादरÓÓ यानी ऊंचा स्थान। जंगल पहाड़ में गाये जाने के कारण इसका नाम ''ददरियाÓÓ पड़ा। यदि ददरिया के नामकरण के पक्ष में इस तथ्य को सही माना जाए तो यह भी सच है कि ददरिया केवल ऊंचे स्थानों अर्थात् जंगलों-पहाड़ों में नहीं गाया जाता। यह मैदानी इलाकों के सपाट खेतों में भी गाया जाता है। कुछ विद्वान ''दादराÓÓ से साम्यता के कारण दादरा गीत/ ताल में इसके नामकरण का सूत्र तलाशते हैं। यह भी सत्य है कि ददरिया में वाद्य का प्रयोग नहीं होता। तब ताल के नाम पर नामकरण का सवाल ही नहीं उठता। विद्वानों ने ददरिया के चार भेदों का भी निरूपण किया है। ठाढ़ ददरिया, सामान्य ददरिया, साल्हों और गढ़हा ददरिया। बैल गाड़ी हांकते गाड़ी वानों द्वारा गाये जाने वाले ददरिया गढ़हा ददरिया कहलाता है। संभवत: इसी आधार पर साल वनों में गाये जाने वाले ददरिया को साल्हो कहा गया हो?
तो क्या नांगर जोतते हलावाए द्वारा गाये जाने वाले ददरिया को नंगारिहा ददरिया कहां जाएगा? इस प्रकार ददरिया का भेद उचित नहीं जंचता। जो भी हो पर ददरिया है गीतों की रानी। ठाढ़ ददरिया और सामान्य ददरिया को खेतों में काम करते ग्रामीणों से सुना जा सकता है। इसकी स्वर लहरी बड़ी मीठी होती है।
पारंपरिक रूप में ददरिया खेतों में फसलों की निंदाई-कटाई करते, जंगल पहाड़ में श्रम में संलग्र लोगों द्वारा गाया जाता है। यह और बात है कि अब मंच पर ददरिया वाद्यों के संगत में गाया जाता है। लड़के-लड़कियों को नचाया जाता है। इसलिए शहरी परिवेश में जीने वाले लोक कला मर्मज्ञ ददरिया को लोक गीत न कहकर लोक नृत्य कहते हैं पर यह कला का विकास नहीं है। यह पारंपरिकता के साथ खिलवाड़ है। उसके मूल रूप को विकृत करने का प्रयास है। मेरी दृष्टि में ऐसा कोई भी प्रयास ना लोक कला के हित में हैं न लोक कलाकार के।
ददरिया का सामूहिक स्वर सुनकर जिसने उसका माधुर्य पान किया होगा, वही व्यक्त कर सकता है ददरिया के आनंद और अनुभूति को। इसे अकेले-दुकेले भी गाया जाता है, सवाल जवाब के रूप में। साथ देने वाला हो तो माधुर्य द्विगुणित हो जाता है-
बटकी मा बासी, अऊ चुटकी का नून।
मैं गावत हंव ददरिया, तैं कान देके सुन।
ददरिया मुक्तक श्रेणी का लोक काव्य है। यह दोहे की शैली में होता है। इस प्रभाव दोहे की ही तरह मर्मस्पर्शी होता है। ददरिया की श्रृंखला बड़ी लम्बी होती है। ये परस्पर भिन्न होते हैं। इनका परस्पर संबंध विच्छेदित रहता है। सतसई के दोहे के बारे में जिस प्रकार कहा जाता है-
सतसईया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर,
देखन में छोटे लगे, घाव करत गंभीर।
निष्ठुर निर्दयी और निर्माेही व्यक्ति को भी ददरिया मोम की तरह पिघला देता है। पत्थर में भी प्रसून खिला देता है लोक कंठ में गूंजने वाले ददरिया का माधुर्य मंदिर में गूंजती घंटियों की तरह मन को शांति देता है। काम करते-करते जब काया थकने लगती है, तब ददरिया की तान थकान मिटाती है या यूं भी कहा जाता सकता है कि ददरिया गाते-गाते काम करने से थकान आती ही नहीं बल्कि शरीर में ऊर्जा और मस्तिष्क में चेतना का संचार करता है। इसलिए कि यह लोक गीत का स्वभाव है और गीत मनुष्य का स्वभाव है। लोक जीवन में कोई भी कार्य गीत के बिना संपन्न नहीं होता। हल चलाने वाला हल चलाते-चलाते गीत गाता है। गाडीवान भी गीत गाता है। नाव चलाने वाला गीत गाता है। घर में चक्की चलाती, धान कूटती स्त्रियाँ गीत गाती हैं। लोक जीवन में लोक गीत का ही साम्राज्य है।
ददरिया में दोहे की तरह दो पक्तियाँ ही होती हैं। प्रथम पंक्ति में लोक जीवन के व्यवहृत वस्तुओं का उल्लेख है या कहें कि प्रकृति व परिवेश का समावेश और दूसरी पंक्ति में होता है अंतर मन की व्यथा-कथा, सुख-दुख, हास-परिहास और हर्ष-विषाद का प्रकटीकरण। कथ्य का भाव, क्रिया-प्रतिक्रिया, मनोदशा और पारस्परिक प्रभावों का चित्रण। ''तुकांतताÓÓ ददरिया की विशेषता है। स्वाभाविक रूप से दोनों पंक्तियों के तुक मिलते हैं। किसी-किसी ददरिया में दोनों पक्तियों में पारस्परिक प्रभाव तादात्मय स्थापित रहता है। यथा-
करिया रे हडिय़ा के, उज्जर हावय भात।
निकलत नई बने, अंजोरी हावय रात।।
ददरिया में विषयों की विविधता है पर मूलत: विषय श्रृंगार है। इसमें कृषि संस्कृति और आदिवासी संस्कृति पूर्णत: प्रतिबिम्बित होती है क्योंकि यही लोक जीवन का मूलाधार है। लोक व्यवहार के शब्द ददरिया के श्रृंगार हैं। फलस्वरूप ददरिया की पंक्तियों के भाव का हृदय में अमिट छाप पड़ता है-
आमा ला टोरे खाहूंच कहिके।
तैं दगा दिये मोला, आहूँच कहिके।।
प्रेम और अनुराग इसका मूल स्वर है। प्रेम तो जीवन का सार है, श्रृंगार है। प्रेम के बिना सारा संसार निस्सार है। युवा-हृदय में जब प्रेम की कोपलें फूटती हैं, तो वह किसी का प्रेम पाकर पल्लवित होता है। ददरिया प्रेमी हृदय की अभिव्यंजना है आकुल प्राण की पुकार, भोले भाले मन की काव्य सर्जना है। ददरिया के विषय में डॉ. पालेश्वर शर्मा कहते हैं-छत्तीसगढ़ी लोक गीत ददरिया यौवन और प्रणय का उच्छवास है। यौवन जीवन का वासंती ओज है, तो सौंदर्य उसका मधुर वैभव और प्रेम वह तो प्राणों का परिजात है, जिसके पराग से संसार सुवासित हो उठता है। प्रेम का पराग ददरिया की इन पंक्तियों में दृष्टव्य है-
एक पेड़ आमा, छत्तीस पेड़ जाम।
तोर सेती मयारू, मैं होगेंव बदनाम।।
आमा के पाना, डोलत नई हे।
का होगे मयारू, बोलत नई हे।।
ददरिया में प्रेम और अनुराग का ही वर्चस्व होता है। प्रेम गंगा जल की तरह पवित्र होता है। प्रेमी हृदय जिस छवि को अपनी आँखों में बैठा लेता है, वही उसका सर्वस्व होता है। उस प्रेम मूर्ति को वह अपनी कोमल भावनाएं पुष्प की तरह अर्पित करता है। मरने पर ही प्रीत छूटने की बात कहता है-
माटी के मटकी फोरे म फूट ही।
तोर मोर पिरित मरे में छुट ही।।
लोक मन का यह अनुराग, लोक मन की यह प्रेमाभिव्यक्ति और विश्वास धरती की तरह विस्तृत आकाश की तरह ऊंचा और सागर की तरह गहरा है। भला कोई प्रेम की ऊंचाई और गहराई को नाप सका है? प्रेमी हृदय की ललक और प्रिय की तलाश को कितनी सार्थक करती है, ददरिया की ये पंक्तियाँ-
बागे-बगीचा, दिखे ला हरियर।
झुलुप वाला नई दिखे, बदे हँव नरियर।।
लोक जीवन के क्रिया व्यवहार का यथार्थ भी प्रस्तुत करता है ददरिया। जब मुद्रा का प्रचलन नहीं था, तब लोक वस्तु-विनिमय द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे तथा परस्पर वस्तुओं को अदल-बदल कर अपनी रोजमर्रा की चीजों की पूर्ति करते हैं। छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन में भी छुट-पुट प्रथा देखने में आता है। जैसे रऊताईन कोदो या धान के बदले मही देती है। गाँवों में लोग बबूल बीज के बदले नमक ले लेते हैं-
ले जा लान दे जँवारा,
कोदो के मिरचा ओ, ले जा लान दे हो।
धाने रे लुवे, गिरे ला कांसी।
भगवान के मंदिर म बाजथे बंसी।।
नवा रे मंदिर कलस नई हे।
दू दिन के अवईया, दरस नई हे।।
ददरिया के शाब्दिक अर्थ सौन्दर्य, अर्थ गांभीर्य और इसके माधुर्य के कारण इसे गीतों की रानी कहा जाता है। यह सम्मान इसे इसकी सहजता, सरलता और सरसता के कारण भी मिला है। ददरिया वह गीत है जिसके रचनाकार का पता नहीं है। यह वाचिक परम्परा द्वारा एक कंठ से दूसरे कंठ तक पहुंचता है। कुछ छुटता है, कुछ जुड़ता है। इस छुटने और जुडऩे के बाद भी यह कभी निष्प्रभावी नहीं हुआ है। इसका तेज और लालित्य बढ़ता ही गया है। लोक गायक जो देखता है, उसे ही गीत के रूप में कर गढ़ कर गाता है और समूह कें कंठ में जो बस जाता है वही लोक गीत कहलाता है। ददरिया लोक को गाने वाला गीत है-
संझा के बेरा, तरोई फूले।
तोर झूल-झूल रंगना, तोहि ला खुले।।
बगरी कोदई, नदी मा धोई ले।
तोर आगे लेवईहा, गली मा रोई ले।।
तिली के तेल, रिकोयेंव बिल मा।
रोई-रोई समझायेंव नई धरे दिल मा।।
ददरिया की कडिय़ाँ एक दूसरे के साथ पिरोई जाती है। ददरिया की धुनें अलग-अलग होती है। पर एक ही कड़ी को भिन्न-भिन्न धुनों में भी गाया जाता है। ददरिया की यह भी विशेषता है। ददरिया गाने वाले चाहे वह स्त्री हों या पुरूष वे इतने कुशल होते हैं कि अपनी कल्पना शक्ति से तत्काल ददरिया की पंक्तियाँ जोड़ लेते हैं। यदि इन्हें आशु कवि कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। परंतु इस सृजन में इनका कोई व्यक्तिगत प्रभाव नहीं होता। उनकी अभिव्यक्ति  लोकमय हो जाती है। लोक तो निष्पृह और निराभिमानी होता है। वह केवल अपने स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ता है तथा लोकमंगल का पथ गढ़ता है।
ददरिया की एक सुनिश्चित गायन शैली नहीं है। भिन्न-भिन्न धुनों, भिन्न-भिन्न रागों में यह लोककंठ से फूटता है। राग का आशय यहां शास्त्रीय रागों से कतई नहीं है। लोक में सुर को राग कहा जाता है। शास्त्रीय राग मेें बंधन होता है। लोक को बंधन स्वीकार्य नहीं। वह तो फूल की खुशबू के मानिंद है जो सबको सुवासित करता है। ददरिया की कडिय़ाँ को जोडऩे के लिए ''घोरÓÓ का प्रयोग किया जाता है जिसे हम टेक भी कहते हैं। ये पँक्तियाँ ददरिया की कडिय़ों के बीच-बीच में दुहराई जाती है-
हवा ले ले रे, पानी पिले रे गोला।
नई छोडंव तोला का रे, हवा ले ले।
का साग रांधे, महि म कुँदरू।
गाड़ी भागथे दबोल म, नई बाजय घुंघरू। हवा ले ले......
रस्ता म रेंगे, हलाय कोहनी,
तोर आँखी म सलोनी, खोप म मोहनी। हवा ले ले.....
कांचा लिमऊ के रे, रस चुचवाय।
    भौजी बिना देवर के, मन कचुवाय। हवा ले ले......
ददरिया में धुनों के विविधता के कारण इसके गायन में किसी प्रकार की दुहरूता नहीं आती बल्कि इस विविधता के कारण इसकी एकरसता समाप्त होती है। अक्सर गीतों की एकरसता श्रोता के मन में ऊब पैदा करती है। ददरिया से तो ऊबने का सवाल ही नहीं है-
ये भागबो पल्ला का गा,
जाम झिरिया में...हवा म कलगी डोले।(घोर)
एक पेड़ आमा, झऊर करे।
मया वाली दोसदारी बर, दऊंड़ करे।।
सायकिल चलाए, हेंडिल धरिके।
तोला बइठे ल बलायेंव, कंडिल धरिके।
बाँस के लाठी, चुने ला भइगे।
तोर खातिर मयारू, गुने ला भइगे।
नांगर के मुठिया, दबाय नहीं।
तोर दिए खुरहोरी, चबाय नहीं।।
नवा रे हडिय़ा, भेर ला मडिय़ा।
निकलत नई बने, रांधत हडिय़ा।।
ददरिया सबाल-जवाब के रूप में अभिव्यक्त होता है। एक समूह सवाल करता है, दूसरा समूह जवाब देता है। या ऐसा भी कह सकते हैं कि दो प्रेमी हृदय परस्पर सवाल-जवाब करते हैं। ददरिया हृदय में अंकुरित प्रेम को अपनी स्वर लहरी से सींचता है उसे अनुराग का आश्रय देता है-
ये दे संझा के बेरा, बगइचा में डेरा
तोला कोन बन खोजंव रे.....
ये दे संझा के बेरा.......।
गहूं के रोटी, जरोई डारे।।
मोला बोली बचन में, हरोई डारे।।
बासी ल खाए, अढ़ई कौंरा।
तोला बईठे ल बालयेंव, बढ़ई चौंरा।।
चंदा रे उवे, सुरूज लाली ओ।
बखरी ले ढेला मारे, पिरित वाली ओ।।
ददरिया छोटे पद का गीत है। थोड़ी शब्द सीमा में बहुत अधिक कह देना, लोकगीतों की विशेषता है। यह सामथ्र्य ददरिया के पास अधिक है। लोक जिव्हा में रचे-बसे शब्द, हीरे मोती की तरह शोभा पाते हैं। इसमें मात्राओं की  कमी-बेसी को गायक अपनी लयात्मकता से पूर्ण कर लेते है। शब्दों की कमी पडऩे पर संगी, संगवारी, दोस मयारू, जहुंरिया आदि शब्द जोड़ लिए जाते हैं। यह उनकी गायकी का कमाल होता है। लोक गायक तो वैसे भी स्वर-पूर्ति में कुशल व परिपक्व होते हैं। ददरिया गायन में कभी-कभी स्वर सन्तुलन के अतिरिक्त पंक्ति भी जोड़ी जाती है-
फूल रे फूले, धवई के र वार,
कोन गलियन में होबे, मोर जीव के आधार,
तुक-तुक के गोटी मारे, गिंजर के आना।
खाल्हे बाहरा म रे.......
खाए कलिन्दर रे, फोकला बधार,
इही गलियन में आबे, मोर जीव के आधार।
तुक-तुक के गोटी मारे, गिंंंंंंंंंंजर के आना।।
खाल्हे बाहरा म रे.....
घर के निकलती रे, कुरिया के टोंक।
मैं बोलन नई तो पायेंव रे, आदमी के झोंप।।
ओली के हरदी, कुचर जल्दी।
तुक-तुक के गोटी मारे, गिंजर के आना।।
खाल्हे बहरा म रे.......
ओली के हरदी, कुचर जल्दी।
देरी होगे पतरेंगी, निकल जल्दी।।
लोक की अपनी मर्यादा है, अपनी सीमा है। लोक मर्यादा का उल्ल्रंघन नही करता। ददरिया गांव की गलियों में नहीं गाया जाता। इसे खेत खार, जंगल-पहाड़ में ही गाया जाता है। वहां भी लोक समूह की उपस्थिति इसे मर्यादित रखती है। प्रेम और अनुराग का यह गीत यदा-कदा अश्लीलता को छूने का प्रयास भी करता है। यह प्रयास कुछ हम उम्र मित्रों के हास-परिहास के रूप में होता है, सार्वजनिक नहीं। समूह इस प्रयास को अस्वीकार करता है। नदी यदि तट का उल्लंघन करे तो वह अहितकर ही होता है-
करे मुखारी, जामुन डारा ग।
बइठे ल आबे तैं बइहा, हमर पारा।।
ददरिया में बही-बईहा का सम्बोधन, प्रगाढ़ प्रेम को प्रदर्शित करता है। बही अर्थात पगली, बईहा माने पागल। प्रेम में तो आदमी पागल ही होता है। जो अतिप्रिय उसे ही पागल कहने का अधिकार दिया है प्रेम ने। भला कोई दूसरा पागल कह सकता है?
चांदी के डबिया, सोने के ढकना।
नानपन के संगवारी, देवथे सपना।।
आधू नंगारिहा, बईला हे टिकला।
डोली म उतरहूं, हो जही चिखला।।
ददरिया की पंक्ति-पंक्ति कानों को सुकुन देती है और आत्मा को तृप्ति। यूं तो ददरिया में प्रेम का रंग गाढ़ा है। ददरिया में प्रेम के दोनेा रूप संयोग और वियोग का समन्वय मिलता है। इसके साथ ही ग्रामीण रीति-रिवाज, धार्मिक आस्था और लोक विश्वास तथा समकालीन परिस्थितियां भी इसमें आकार लेती है-
सिया राम भज ले संगी,
चरदिनिया जिनगी ग......
सिया राम भज ले।
चारे रे खुरा के चारे पाटी।
कंचन तोर काया, हो जही माटी।।
इधर छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने भी ददरिया छंद में गीत लिखना प्रारंभ िकया है। ये गीत लोकप्रिय भी हुए हैं। पर पारम्परिक ददरिया का सौन्दर्य और माधुर्य उनमें नहीं आ पाया। शायदा इसका कारण मौलिक प्रयास हो। व्यक्ति विशेष की छाप हो। जबकि दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि इनमें गा्रमीण जीवन के शब्दों का अभाव रहता है। इसीलिए लोक मन में ये गीत गहराई से उतर नहीं पाते। छत्तीसगढ़ के कुछ गायक कलाकारों व रचनाकारों के नाम लिप्सा के कारण ददरिया की गरिमा के साथ मजाक किया है। या तो इन्हें पारम्परिक ददरिया को अपनी रचना बताकर रचनाकार के रूप में अपना नाम जोडऩे का कुत्सित प्रयास किया है या पंक्तियों को इधर-उधर कर इसके मूल स्वरूप को क्षति पहुंचाई है। जिन पारम्परिक ददरियों को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। जिन ददरियों को एक पैसठ वर्षीय लोक  कलाकार अपनी किशोरावस्था से गाते आ रहे हैं, उन गीतों के साथ 30 वर्षीय कलाकार, रचनाकार के रूप में अपना नाम जोड़ता है। यह कितनी हास्यापद स्थिति है। पारम्परिक गीतों को, पारम्परिक ही रहने दें तो क्या हर्ज है? पारम्परिक गीतों को अपनी मौलिक रचना बताना अच्छी बात नहीं है। नाम ही चाहिए तो नाम के लिए अच्छे काम की जरूरत होती है।
कुल मिलाकर ददरिया मेहनतकश लोगों के हृदय की अभिव्यक्ति है। पसीने की बूंदों से सिंचित लोक की गर्जना है। प्रेम आतुर मन का मादक स्वर है, लोककंठ से झरता निर्झर है। जिसकी धारा कभी न क्षीण होगी न मलिन। ददरिया लोक मानस की शक्ति है। उसके प्रेम और अनुराग की अभिव्यक्ति है। लोक की अभिव्यक्ति का यह सिलसिला अनवरत जारी रहे। लोकगीतों की रानी ददरिया का स्वरूप लोक हाथों में सजता रहे, संवरता रहे। यह लोक स्वर अतृप्त आत्मा को संतृप्त करता रहे। लोकगीतों का लोकमंगल स्वरूप बना रहे। यहीं मंगल कामना है-
छोटे हे केरी, बड़े हे केरा।
राम-राम ले लव, जाये के बेरा।
जुन्ना लुगरा, कथरी के खिलना।
जिनगी रही त, फेर होही मिलना।
साभार रउताही 2014

लोक गीत बिहार के

हर मनुष्य अपने जीवन में हमेशा गाता गुनगुनाता रहता है। चाहे वह मन ही मन गुनगुनाये या बोल कर गाये गाता जरूर है। जब किसी के मन में जो भावना जगती है वह अपने भावों को प्रकट करने के लिए बातचीप से या संलाप से या गीत के रूप में अवश्य गायेगा। वह भी मनुष्य जिस परिवेश में या वातावरण में रहता है, उसी वातावरण से प्रभावित होकर गीत गाता है और उस गीत पर आंचलिक भावों का व्यवहारों का एवं भाषाओं का पूर्ण रूपेण प्रभावित होता है इसे ही हम लोकगीत कहते हैं।
लोकगीत हमारे जीवन काल के वर्षों के महीनों में आने वाले सांस्कृतिक शादी-विवाह, त्यौहार, पूजा-पाठ के कार्यक्रम के अवसरों के हिसाब से बंधा हुआ होता है और उसी पर आधारित है- जैसे कि शादी-विवाह पर गाये जाने वाले, सन्तान प्राप्ति के उत्सव पर गाये जाने वाले तीज त्यौहार पर एवं अन्य उत्सवों पर होते रहते हैं। ऐसे ही बिहार के मिथिला के आंचलिक गीत आप के सामने कुछ प्रस्तुत हैं।
वैसे तो गुलाल का टीका हर खुशी के अवसर पर लगाये जाते हैं परन्तु खासकर जब माता सरस्वती की पूजा जब हो जाती है उस दिन से गुलाल का टीका या मुखड़े पर हल्का सा लगाना शुरू कर देते हैं। परन्तु बसंत पंचमी से तो अधिकाधिक प्रयोग किया जाता है। होलिका दहन एवं नवसंवत सर के अवसर पर वो कहना ही कया? तभी तो होली के हुड़दंग में गा एवं नाच उठते हैं। फिर क्या डफली ढोलक लेकर नगाड्े की घाव पर गा उठते हैं-
भर फागुन, भर फागुन बुढ़वा देवर लागे भर फागुन।
काहू के हाथ में रंग पिचकारी,
हां काहू काहू के हाथ में रंग पिचकारी
कोई लगा के गुलाल भागे।। भर फागुन।।
चाहे कोई पहिने सफेद नवा साड़ी
नव रंग डाल चहेरा बिगाड़ डारे भर फागुन
इसके बाद कोई दूसरी टोली गाते हुए आते है और गाती है
जिसमें कोई कृष्ण जी का वेश बनाये रहता है।
होली से खेलत है नंदलाल बिरज में।
केहू के हाथ में रंग पिचकारी
केहू के हाथ में गुलाल बिरज में।।
राधा के हाथ में रंग पिचकारी
कान्हा के हाथ में गुलाल।
बिरज में होली खेलत हैं नंदलाल।।
बिहार में देवर भाभी की होली सदा खेली जाती है परन्तु अन्यों के साथ नहीं, अन्यसाथ और पुरूष और गैर औरत से। औरत औरतों के साथ, पुरूष पुरूषों के साथ ही। चैत महीनें में चैता गाये जाते हैं। छत्तीसगढ़ जिस तरह अषाढ़ महीनेें में सावन महीने में, हरितालिका, कमरछठ मनाया जाता है, बिहार में उसी तरह हरियाली सावनी घड़ी मनायी जाती है। भादो महीने में जन्माष्टमी, गणेश पूजा होती है। गणेश पूजा बिहार में स्कूलों में ही ज्यादातर मनाये जाते हैं। घरों में भी परन्तु साधारण तौर पे, मूर्ति स्थापना करके नहीं। उस रोज उपवास रहकर एवं पुआ-पकवान बनाकर शाम को चाँद को दिखाकर अर्ध देकर देकर फिर उस घर में भोजन कर लिया जाता है और सथ ही इष्ट मियों को दावत दिया जाता है। जन्माष्टमी पर भी ऐसे ही होता है। दिन भर उपवास रहते हैं शाम को बैठकर रात्रि के बारह बजे तक भजन कीर्तन करते हैं। फिर भगवान के जन्म के बाद उनकी आरती उतार कर प्रसाद वितरण करके लोग भोजन कर लेते हैं। यह कार्यक्रम अधिकतर मंदिरों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
आज कन्हैया के जन्म भयो रे,
सब दुख दूर भ गइले रे।
जेल के द्वार खुल खुल गइले,
कंश गरव चूर भइले रे।
माई यशोदा के भाग-जग गइले
नंदबाबा खुश गइले रे।।
मइया देवकी देखि कान्हा के
ले वसुदेव भागी भइले रे
बटथीन नंद बाबा सूपा भर अंजूरी
देत साड़ी मुस्कइसे रे।।
सब दूख दूर भ गइले रे।।
जब सावन का महीना आता है तब कदम की डाली पर फूल लग जाता है। एक तरफ कृष्णा सब साथियों के साथ दूसरे तरफ राधा अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलने लगती हैं। लोग देख देख कर आनंद विभोर हो जाते हैं। आनंद का वातावरण इतना बढ़ जाता है कि लोग देखकर दिल से गा उठते हैं-
झूला लगे कदम की डारी झूले कृष्ण मुरारी का।
माथे पे मोर मुकुट बिराजे, कानों में कुंडल वा।
श्याम सुन्दर चित चोर जो झूले राधा मुस्काए ना।।
एक टक देखे राध प्यारी, दिल हर्षाये ना,
बोली मोहन प्यारे रूक जा, भुले भी झुलाओ ना।।
फूलत फूलत मारे नजरिया जग को भुलाये ना
कहां जाऊं तुम्हें छोड़ कन्हैया, कहीं लागे न मनया ना।।
तदुपरांत दशहरा का समय आता है जिसे नौरात्री भी कहा जाता है। लेकिन बिहार में इसे दसईं कुंछ क्षेत्रों में कहा जाता है। इस दसई में मां भगवती कहें या मां दुर्गा की तो हर घर में मंदिरों में पूजा होती ही है शाम को लड़कियाँ एवं नवयुवतियां इकट्ठी हो कर पांच पांच या दस दस के झुण्ड में एक मटका रखती है। यह मटका कुम्हारों द्वारा अलग से बनाया जाता है। जिसमें करीब 15-20 छिद्र चारों तरफ से किया जाता है। उस मटके में दीप जला कर रख दिया जाता है। उसे एक लड़की सिर पर रख कर वही नृत्य करती है जिसे कुछ नृत्य करने का अभ्यास हो, क्योंकि गोल गोल बार बार नृत्य करने से सिर चकरा जाता है। गिरने का भय भी रहता है। अन्य सहेलियां अनेकों गीत गाते रहती है जिसे देख और सुनकर बड़ा ही मनो भावन लगता है। यह गीत मां दुर्गा के प्रति होती है जिसमें उनसे विनती की जाती है कि मां यहां पर बहुत से जादू-टोना वाले हैं उनसे मेरे भाईयों-भतीजों व अन्य प्रिय जनों की रक्ष करो मैं तेरी हमेशा पूजा करूंगी। इस नृत्य को उत्तरी बिहार के मिथिलांचल में झिंझिया कहते हैं। प्रस्तुत है गीत-
सात बहिनियां हे भागमत, सातो कुमार हे।
हर बहिनी योगे रे कुम्हारा, झिंझिया गढि़ लाब रे।
एके वहिनिया हे भागमत, गेल कुम्हरा दुकान रे।
लेई कर झिंझिया रे भागमत, ललई मकान रे।
सातो वहिनिया रे भागमत, गेल तेलिया दुकान रे।
वहिनि योगे आ रे तेलिया, तेलवा पेडि़लाव रे
लेइ के वहिनिया तेल, दीया तेल कई जराये हे।
रखि दीया झिंझिया में बहिनी, नान्की रहथी रिझाए हैं।
सब सखी कलकई विनितिया, मोर भइया के देहू बचाये हे।
बहुत हउए इहवा टोनहिया, ओकरा से करहू दोराप हे।
मोर भतीजवा के माता, देहू उमर का बढा़ए हे
सब दिन पुजबौ हे माता, सिन्दुरवा चुड़ी चढ़ाए हे।
उसके बाद भैरव बाबा गंगा स्नान की तैयारी करने लगते हैं तब उनके सेवक रोकते हैं:-
भैरव बाबा चलल गंगा स्नान, सेवक भेल उनके अगुआर।
मति जाहू गंगा स्नान हो बाबा, अंगना
देवौ दोनों कुंइया खोदाई।
चंदन, चौका इहवा पुराई देव बाबा,
दुध से भी पंईया देवभरवाड़
तब भैरव बाबा बोले:- अंगना के कुंइया
नरक होत-भष्म चाहे देव लगाव
फिर बहने भतीजों से- जिय हो अमुक
भैया के बेटवा, जे झिंझिया मैं तेल पहुंचाय
मर ऊंक डयनी के बेटवा, जे हमरा के देत सराप।
जे झिंझिया में नजर लगौलक अब गेल झिंझिया बताये।
धन भाग तोहरा के झिंझिया,
जे भइया के दिहलक बचाये।।
और जब दशहरा समाप्त हो जाता है तब सहेलियां शाम को एक जगह इकट्ठा हो कर पुष्प एवं दीप अगरबत्ती से पूजा करके गीत गा करके घर लौट जाती है।
जाऊ जाऊ भगवती मैया, गोर लगइथी दू आशीष हे।
रऊआ के रहिते बड़ा सुख पउली किये दीअऊ नेबकशीष हे
घर उजियारा भेल पावन म गेलई और का चाहिए मइया आस हे।
मेवा मिठाई पेड़ा लड्डू के खोंइथा करीं स्वीकार सनंस हे।
धन भाग जिनगी के राऊर भइल दरशन आगे कब होई मिलाप हे
ऐई जिनगी कौन टिकाना कब मिलक देदी आशीष है।
इसके बाद कार्तिक महीनें में दशहरा के 26 दिनों बाद यह व्रत जिसे डाला धट भी कहते हैं। यह हिन्दुओं का खास कर बिहार वासियों के लिए बहुत ही पुष्पशीला मनोकामना पूर्ति करने वाला व्रत है। इसमें बहुत ही स्वच्छता पूर्वक कार्य किया जाता है। कहते हैं कि इसमें पवित्रता की थोड़ी सी भी लापरवाही हुई तो दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। इस व्रत में जो भी सामग्री प्रयोग में थानी काम में लाये जाते हैं वे सभी नये होते हैं तो यह व्रतियों के लिए हैं। वहीं लड़कियों एवं नव युवतियों के लिए मनोरंजन का कार्यक्रम भी है जिसने शामो चकवा एवं खंरचीच का प्रसंग है साम्ब बाबा चकवा पोता औरा संरिच पोती का संलाप डाला के साथ होता है और सब सहेलियां गाती है।
खंररिच- डाला ले बाहर भेली खंररिच बहिनी,
चकवा भैया तेल डाला छीन, सुनु राम सजनी।
सामने बैतल तुहु बाबा तु बर जिता-
चकवा भैया तेल डाला छीन, सुनुराम सजनी।
साम्ब- कथीं के तोहर डलवा के मोती
कथीं ए लगा ओल चारो कोण, सुनुराम सजनी।
खंररिच- कांचही बांस के डलवा हो बावा,
चम्पा, चमेलिया चारो कोण, सुनु राम सजनी।
साम्ब- जब हम डलवा देआइदेब गे पोती
भैया के लिए देबू दान सुनु राम सजनी।
खंररिच- जब हम बसवई सजन घर हो बाबा
सासू दोहन देऊआ ननदिया, खोइंहल धान सनु राम सजनी
फिर तोहरो देवौ बा, चढऩे के घोड़वा,
भैया के देवई नन्दी दान, सुनु राम सजनी।
जब चकवा भैया जुआ खेलने जाता है तो वहन खंररिच को बहुत दुख होता है परिवार समेत तब बहन को दुख होता है कि भाई कहीं जुए में सब हार जाए तो मेरा और परिवार का भविष्य क्या होगा। इसी पर दुख प्रकट करती है बहन:-
ओई पार चकवा भैया खेले जुआ सार, एई पार खररिच वहिनी रोइना पसार।
चकवा:- चुप होहु चुपहोहु खंररिच बहिनी, बहवा के संपतिया देवौ तोहरो बांट।
खंररिच:- बाबा के संपतिया हो भैया तुही लोग भागिहा जाये,
बाकी भतिजवा भैया भोगतई खुश हो राज जाये।
हम बेटी पर देशी भेलि अई भइया केवल मोटरी के आस।
और मोर जिनगी भैया सिन्दुरवा करतई आस।
छोटकी वहिनिया के भइया मत विस रईहा।
बाबूजी के हम सब डाल पात।
इसी तरह अपनी अपनी व्यथा शिकायत जिन्दगी को संभालने के लिए करते हैं जब बहन खेलते खेलते भैया के द्वार तक जाती है तो डाला और बिछिया चोरी हो जाती है तो शिकायत, मां और भाई से करती है।
सामा खेले गेली आई हे चकवा भाई दुअरा,
खेलइते बिछिया गेल हेराय।
रहलई अनमोल बिछिया खोजइते खोजइते
डलवा भी लेलकई चोराय।
एक मुट्टी खर हो भइया, फुंकी कर इजोर करा,
देखा त कौन लेल चोराय
खोजते खोजइते में बहनोइया निकलल चोर हो
बांधी भार धंडकी से जाय।
छाती चढि़ मारिहा भैया चोरवा बहनोइया के
जब ले न ढारे नयना लोर।
कर जोड़े लगलथीन बहिनियां माफी कर दहू
बड़ा दुलरूआ हवे चोर।
            म. 2 ए सड़क-25 सेक्टर 5 भिलाई नगर जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ 490006
आज मेरी नातिक का जन्म तिथि
है जो वर्षा की हो गयी है,
उसके जन्म पर बधाई है।
नातिन का नाम अमूबा सिंह है।
जन्मदिन
जगदीश राय गुमानी -
जन्मदिन पे मूली है तुमकी बधाई।
जन्म दिन तेरे बटेंगे लड्डू पेड़े।
खुशियों की घडिय़ा मजे की आज आई।।
सब आये हैं मेहमां ले आशिषों के अरमां।
शतायु बनने की कसमें हैं खायी अरमां।
सबकी है तु प्यारी दिल की है दुलारी
तु हर की जबां पर बन लक्ष्मी है आयी।।
तुमको पाकर माता खुश हुए बाबा पापा।
दादी खुश हो मुस्काई जो फूले न समाई।।
तू जब से घर में आई है रौनक बढ़ाई।
दिल वाग वाग हो कर चिडिय़ो सी चहचहाई।।
गुमानी नानी-नाना लाया प्यार का नजराना।
देकर शुकुन पाया अपनी जीया जुड़ाई।।
 साभार रउताही 2014