Monday, 20 October 2014

लोक जीवन की सहज अभिव्यक्ति : लोकगीत

भारत की सही पहचान लोकभाषा और लोक संस्कृति के बिना नहीं हो सकती है। भारतीय संस्कृति को यदि हम अलग-अलग लोक अंचलों की संस्कृतियों का जैविक समुच्चय कहें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भारत के हृदय अंचल 'मालवाÓ में तो समूची भारतीय संस्कृति गागर में सागर की तरह समाई हुई है। मालवा की परम्पराएँ समुचे भारत से प्रभावित हुई हैं और पूरे भारत को मालवा की संस्कृति ने किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है।
मालवा की धरती अत्यन्त उपजाऊ और धन-धान्य से परिपूर्ण रही है। यथा-
'देश मालवा का गहन गंभीर
डग-डग रोग पग-पग नीर।Ó(कबीरदास)
इसका बाहरी रूप जितना मनोरम है, उतना ही सुन्दर, कोमल और आत्मीय है इसका अंतरंग। हृेनसांग सातवीं शदी मेें मालवा में आया था तो वह भी यहाँ के पर्यावरण और लोकजीवन से गहरे प्रभावित हुआ था। तब उसने लिखा भी था कि इसकी भाषा मनोहर और सुस्पष्ट है। मालवा क्षेत्र के जल, पर्यावरण और सदैव सुकाल की अवस्था पर संत कवि सुन्दरदास लिखते हैं-
'वृच्छ अनन्त सुनीर वहंत सुसुन्दर संत बिराजे तहीं ते
नित्य सुकाल पड़ै न दुकाल सुमालवं देस भलो सबहीं ते।Ó
मालवा भारत का हृदय अंचल है। आज का मालवा संपूर्ण पश्चिमी मध्यप्रदेश और उसके साथ सीमावर्ती पूर्वी राजस्थान के कुछ जिलों तक विस्तार लिए हुए हैं। इसकी सीखा रेखा के सम्बन्ध में एक पारम्परिक दोहा प्रचलित है-
'इस चम्बल उस बेतवा, मालव सीमं सुजान।
दक्षिण दिसि है नर्मदा, यह पूरी पहचान।।Ó
मालवा के लगभग दो करोड़ बाशिंदे इसकी संस्कृति को अपने सुख-दु:ख, संस्कार व्रत-तेवार, अनुष्ठान के मौकों पर गीत कथा गाथा से लेकर विविध लोकाभिव्यक्तियों के जरिए जिंदा रखे हुए है। महज मालवी भाषा और साहित्य की दृष्टि से ही नहीं, वेशभूषा, श्रृंगार-प्रसाधन, लोकाचार, खान-पान, चित्र, मूर्ति, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में मालवा की अभी खास पहचान शताब्दियों से बनी हुई है।
यहाँ का लोकमानस अतीत ही नहीं, अपने वर्तमान से भी सीधे संवाद करता है। यथा-
'बीरा थारा कारणे वोट का भिखारी उबारे द्वार।
एक बोट का माँगे दान, बेनड़ी रखजे म्हारो मान।।Ó
मालवा लोक-साहित्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। जीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जब मालवजन अपने हर्ष-उल्लास सुख-दु:ख को दर्ज करने के लिए लोक-साहित्य का सहारा न लेता हो।
'छोटी-छोटी नानी होण ने माँडी संजा प्यारी।
संजा बइका गीत उगेरया या धुन सबसे न्यारी।।Ó
ई हिकी-मिकी ने जीवने को संगीत गुंजाणे लागी
म्हणे लाल-गुलाबी संजा देखी, तो दूर उदासी भागी।
इनने जग का सुख-दुख गाया कई भीनी राख्यो है सेस।
यो हँसतो-गातो म्हारो देस। मदनमोहन ब्यास
धार्मिक चेतना के विकास के फलस्वरूप लोक-कथाओं, लोकगीतों, लोकनाट्यों, लोकनृत्यों आदि का निर्माण सुगम हो गया। जातीय रीति-रिवाज का निर्माण हुआ और अन्त में सामाजिक मूल्यों के निर्धारण में लोक साहित्य समृद्ध होकर समाज की दिशा और दशा निर्धारित करने लगा।
'कुर्सी का मद में चर हुवो, बोले तो एँठई ने बोले।
कोई साँचा रोणा केवे तो मकना हाथी सरको डोले।
जिको दिल नी समन्दर सो गेरो, ऊराज चलाणो कइँजाणे।
जिने देखी नी टूटी नान कदी, ऊ पार लगाणो कइँजाणे।Ó
            -नरेन्द्र सिंह तोमर
लोक साहित्य के अन्तर्गत लोकगीतों की भी कई शैलियाँ प्रचलित हैं। इनमें वसन्त-ऋतु के गीत जैसे-फगुआ, होरी, रसिया, कबीर चैती, वर्षा-ऋतु के गीत, जैसे सावन, हिण्डोला, कजरी, चौमासा, बारहमांसा, मल्हार, व्रत-पूजा के गीत जैसे लंगुरियँ, छठीमाता, के गीत देवी गीत, भजन श्रम गीत जैसे-सोहनी, रोपनी के गीत, कोल्हू के गीत, चरखा गीत, जतसार, चाँचर, जाति गीत, जैसे-बिरहा(अहीरों के गीत), कहरवा,(कहारों के गीत)पचरा(दुसाधों के गीत), तेलियों के गीत, धोबियों के गीत, चमारों के गीत आदि। बच्चों के गीत जैसे-लोरी, ओक्का-बोक्का, चन्दामामा, चुटकुलें आदि, अन्प्य गीत-जैसे दादरा, पुरबी, नयारी, झूमर आदि।
भारतीय समाज में संस्कारों का बड़ा महत्व माना गया है। गर्भधान से लेकर मृत्यु तक संस्कारों का क्रम चलाता रहता है। इस समय व्यक्ति को इन समस्त संस्कारों के शास्त्रीय तथा लौकिक अनुष्ठानों के बीच से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक संस्कार के अपने गीत हैं, जो उत्संवों पर गाए जाते हैं। जन्म-संस्कार के गीत, जैसे साथ, सरिया, रोचना, सोहर, खेलावना, मंगल, बधाई नेग-निछावर, जच्चा-बच्चा की देखभाल से संबंधित गीत, छठी नामकरण के गीत, मुण्डन तथा जनेऊ के गीत जैसे-बरूआ विवाह, के गीत, जैसे सगुन, लगन, कोहवर, बन्ना-बन्नी, नहछू, घोडी़, सेहरा, सोहाग, जोग नकदा गाली विदाई, भात भांवर अत्येष्टि-संस्कार के गीत आदि के माध्यम से लोक जीवन ही अभिव्यक्त होता है।
मालवी लोक से गहरा तादातम्य लिए श्री बालकवि बैरागी की भाव एवं सौन्दर्य-दृष्टि का साक्ष्य देती कुछ पंक्तियाँ देखिए-
'उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा कामणगारा की याद
नेणा की काँवड़ को नीर चढांऊ
हिवड़ा को रातों-रातों हिंगलु लगाऊं
रूडा़-रूड़ा रतनारा थाक्या पगा से
ओठों ही ओठों ती मेहंदी रचाऊँ
ढव थारे चन्दा को चड़लो चिराऊं
नौलख तारा की बिछियाँ पेराऊँ
ने उतारूँ थारा वारणा ऐ म्हारा मन मतवारा की याद।Ó
विज्ञान और तकनीकी के इस भौतिक दौर में लोक साहित्य की परम्पराओं का काफी हृास हुआ है। परिवार में नाना-नानी और दादा-दादी अपने नातियों-नतनियों और पोते-पोतियों को कहानियाँ सुनाकर तथा उनके यश-प्रश्रों का उत्तर देकर जिस परम्परा का पालन और रस का अनुभव करते थे, वह परम्परा ही खोखली हो गई है। आधुनिकता की आँधी ने उन्हें इस प्रकार के सरोकारों से दूर कर दयिा है। बाल सुलभ मानवीय उत्सुकता के साथ जुड़कर अधिक उम्र का अनुभव एक वृद्ध के जीवन में जो चाव पैदा करता था, आज वह नहीं है। बच्चे के भीतर आत्म विश्वास का जो संचार इससे होता था, आज वह गायब है। वाचिक-परम्परा केवल बोली जानेवली भाषा ही नहीं है अपितु वह जीवन-दर्शन भी है। लेकिन बदलते परिवेश ने इस जीवन दर्शन का सर्वाधिक अवमूल्यन किया है।
उपभोक्तवादी संस्कृति और हर वस्तु के खरीदे जाने की मानसिकता ने लोक साहित्य की परम्पराओं पर कुठाराघात किया है, जिसके तले हमारी लोक संस्कृति दबी जा रही है। आज इसके सूख रहे खेतों पर प. विद्यानिवास मिश्र ने अपनी चिन्ता को इन शब्दों में व्यक्त किया -''साहित्यकारों, शास्त्रकारों और कलाकारों-सबकों अपनी जड़ों का रस चाहिए। वह रस कभी लोकसाहित्य में मिलता है, लोकाचार में मिलाता है, लोक-कला, लोक-संगीत मेें मिलता है, लोक नृत्य में मिलता है लोक-गीत में मिलता है और कभी केवल ऐसे आदमी के साथ बैठकर मिलता है जो स्मृतियों में जीता नहीं, स्मृतियों को जीता है, स्मृतियों को व्यतीत नहीं मानता, अपने जीवन और जातीय जीवन से अविलग देखता है।ÓÓ
''लोक साहित्य में प्राचीन संस्कृतियों के तत्व विद्यमान रहते हैं।ÓÓ रूसी-साहित्य वाई.एम.सोकोलोव। ऐसे ही विचार ओरोलियो एम. एसपिनोजा ने भी व्यक्त किए हैं.
आज का कोई भी सभ्य मानव यह दावा नहीं कर सकता है कि उसने अपने अंदर से आदिम संस्कारों के बीजों को नष्ट कर दिया है। लोक साहित्य में सर्व भूत हिताय और सर्वजन सुखाय की भावना प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
लोक-साहित्य उस निर्मल दर्पण के समान हैं जिसमें लोकमानस का अविरल तथा विराट स्वरूप पूर्णरूपेण दिखाई पड़ता है। जो भगवान के विराट स्वरूप की ही भांति विराट और अनन्त है लोक संस्कृति के वास्वविक रूप को देखने के लिए हमें लोक-साहित्य का ही अनुसंधान करना होगा।
अन्त में- डॉ. शिव चौरसिया का मालवी-गीत-
''धरती से आकास तलक जो फेल्यो हे आंखो संसारयो सगलो म्हारो परिवार।
सूरज दादो चंदो मामो, तारा संग-संगाती,
समन्दर-परबत खेत-खला सब, रुत हण रंग उड़ाती
इन्दरधनुष करतब जादू को, कुदरत को
अदॅभत सिणगांर यो संगलो म्हारो परिवार।
धरती तो माता हे म्हारी, फसल नरी निपजावे
बीर बायरो बादल साँते, बरखा-अमरत लावें।
बिजली नयन कड़-कड़ नाचे, डरप भरी लागे चमकार।
यो संगलो म्हारो परिवार।
भोत बड़ा आकास दायजी, सीतल गेरी छाया,
बायर की बाधा झेले वी, अपने सदा बचाया।
रोजरात की चौपड़ माँडें, गिरह-नरवत देखे नर-नारे।
यो सगलो म्हारो परिवार।
नाना-मोटा झाड़-झड़कला सब साँचा हम जोली।
नदरी बेन्या नखराली सब धरती पे रंगोली।
जुग-जुग ती जीवन बाँटी री, महिमा इनकी अपरम्पार
यो सगलो म्हारो परिवार।
मोरया नाचे गाय डेंडका, झिंगर झन-झन गाजे।
उड़े चिरकलीरची ची करतीं तार हिया का बाजे।
लंगे सेंत का झरना सरखी, कोयल की मीठी लयकार।
यो सगलो म्हारो परिवार।
वेद-पुरान कुरान-बाइबिल राम-रहीमा-ईसा।
बुदष जरस्दुत-महावीर से ग्यान मिल्या है बीसा।
योग-भोग ने दरसन संगला धरम-करम को जो विस्तार
यो सगलो म्हारो परिवार।
व्यास-वाल्मिकी, चेखव-गेटे, तुलसी-सूर-कबीरा।
गालिब-भूषण-नानक, दादू, दरद दीवानी मीरा।
प्रेमचन्द सा साँचा सेवक जितरा भी है रचनाकार।
यो संगलो म्हारो परिवार।
 साभार रउताही 2014 

प्रेम और अनुराग का लोक स्वर : ददरिया

लोक का नाम जब भी हमारे सामने आता है, तब वह हमारी वाणी और हृदय को रससिक्त कर जाता है। हमारे अंतस में भावात्मक और रसात्मक आनंद की हिलोरे पैदा करता है और हमारी आंखों के सामने रूपायित होता है-सहज, सरल, भोले-भाले, परिश्रमी, झूमते, नाचते-गाते लोगों का समूह जो अपनी परम्परा, सभ्यता, और संस्कृति को अपनी लोक कलाओं के माध्यम से पोषित करता है। यही वह लोक है जो कोयल की तरह गाता है, मोर की तरह नाचता है तथा श्यामल मेघ की तरह सबकी प्यास बुझाता है।
शिष्ट जन इस लोक को अशिष्ठ कहते हैं। शायद शिष्टता का उन्हें ज्यादा भान हो। पर मुझे लगता है कि किसी को अशिष्ट कहना ही ज्यादा अशिष्टता है। किसी को अशिष्ट कहकर हम शिष्ट नहीं हो सकते। शिष्ट का संसार भौतिकता ही चकाचांैध से आप्लावित, स्वप्रिल, काल्पनिक और जीवन के सत्य से दूर होता है। वहां केवल दिखावा ही दिखावा, छलावा ही छलावा होता है। न शांति होती है न प्रेम। केवल आपाधापी, और तनाव, कुंठा का बोलबाला होता है। भला ऐसे में क्या तथाकथित शिष्ट सुखी हो सकता है? कदापि नहीं। लोक का अपना सहज, सरल परंतु सुखद और यथार्थ परक संसार होता है। भले ही लोक सुविधाओं से वंचित होता है। पर प्रेम, शांति, सद्भाव और साहचर्य से परिपूरित रहता है। इसकी अनुभूति तो लोक कला का सानिध्य प्राप्त कर ही किया जा सकता है। इसकी प्रतीति तो इनके साहित्य का अध्ययन और मनन कर ही किया जा सकता है। हां साहित्य, लोक का भी अपना साहित्य होता है। लोक का साहित्य ''लोक साहित्यÓÓ कहलाता है। लोक साहित्य लोक की निधि है। इस निधि में है लोक-गीतों के हीरे-मोती, लोक कथाओं और लोक गाथाओं के नीलम, लोकोक्तियों और पहेलियों के पन्ना-जवाहरात। यदि संपत्ति शिष्टता का सूचक है, तो भला इतनी संपत्तियों का मालिक ''लोकÓÓ  अशिष्ट कैसे हो सकता है? हां निरीहता, अभाव ग्रस्तता, गरीबी, सहजता और सरलता अशिष्टता का बोध है तो ''लोकÓÓ जरूर अशिष्ट है, असभ्य है पर अपनी संस्कृति के संरक्षण और संर्वधन में इनकी यह अशिष्टता व असभ्यता कला-संस्कृति व प्रेम और प्रकृति के मामले में शिष्ट से भी विशिष्ट है। लोक की यही विशिष्टता लोक जीवन का माधुर्य है। लोक जीवन तो सदानीरा नदी की तरह आदिम काल से लोक मंगल के हित प्रवाहित हो रहा है। यदि कोई इस नदी से दूर रहकर प्यासा है तो गलती नदी की नहीं उस प्यासे की है, जो शिष्ट का आचरण कर, दंभ के कारण नदी के पास जाने में भी अपनी तौहीन समझता है। नदी का जल कंठ की प्यास बुझाता है और लोक गीत कंठ से निसृत हो श्रवणेन्द्रिय से प्रवेश कर मन और आत्मा की प्यास बुझाते हैं।
लोक गीत जहां जीवन में रस घोलते हैं, वही श्रम की क्लांति को भी मिटाते हैं। लोक गीत लोक के लिए ऊर्जा और प्रेरणा का कार्य करते हैं। लोक में लोक गीतों की महत्ता कभी कम हुई है, न होगी। लोग गीतों के उद्गम और अंत के विषय में डॉ. श्याम परमार ने लिखा है-''लोक गीतों के प्रारंभ के प्रति एक संभावना हमारे पास है। पर उसके अंत की कोई कल्पना नहीं। यह वह धारा है, जिसमें अनेक छोटी-मोटी धाराओं ने मिलकर उसे सागर की तरह गंभीर बना दिया है। सदियों के घातों-प्रतिघातों ने उसमें आश्रम पाया है। मन की विभिन्न परिस्थितियों ने उसमें अपने मन के ताने-बाने बुने हैं। स्त्री पुरूष ने थक कर इसके माधुर्य में अपनी थकान मिटाई है। इसकी ध्वनि में बालक सोये हैं। जवानों में प्रेम की मस्ती आई हैं। बूढ़ों ने अपने मन बहलाए हैं। वैरागियों ने उपदेशों का पालन कराया है। विरही युवकों ने मन की कसम मिटाई है। किसाने ने अपने बड़े-बड़े खेत जोते, मजदूरों ने विशाल भवनों पर पत्थर चढ़ाए हैं और मौजियों ने चुटकुले छोड़े हैं। कहने का आशय यह है कि लोक गीत जीवन को स्पंदित करते हैं। लोक जीवन के सुख-दुख को अपने में समेट कर लोक में आश्रय पाते हैं। लोक के हर वर्ग और जीवन के हर रंग के चितेरे हैं-लोक गीत।ÓÓ
छत्तीसगढ़ तो लोक गीतों का कुबेर है। छत्तीसगढ़ मेहनतकश इंसानों की धरती है। किसान और बसुंधरा की धरती है। यहां न जंगल जमीन की कमी है, न डोली डांगर की ना ही ''जांगरÓÓ की। हरे-भरे खेत-खार, जंगल-पहाड़, धन-धान्य से भरे कोठार जैसे इस धरती के श्रृंगार हैं। इस रत्नगर्भा धरती की कला और संस्कृति भी ठीक इन्द्र-धनुष की तरह बहुरंगी है। इसकी अलौकिक आभा लोक जीवन को आलोकित करती है। यहां लोक गीतों का अक्षय भण्डार है। इस अक्षय भण्डार का अनमोल हीरा है ''ददरियाÓÓ। ददरिया श्रम की साधना और प्रकृति की आराधना में रत किसानों और श्रमिकों का गीत है। यह प्रेम और अनुराग की लोक अभि-व्यक्ति है। लोक साहित्य विद्वानों का कथन है कि ''दादरÓÓ यानी ऊंचा स्थान। जंगल पहाड़ में गाये जाने के कारण इसका नाम ''ददरियाÓÓ पड़ा। यदि ददरिया के नामकरण के पक्ष में इस तथ्य को सही माना जाए तो यह भी सच है कि ददरिया केवल ऊंचे स्थानों अर्थात् जंगलों-पहाड़ों में नहीं गाया जाता। यह मैदानी इलाकों के सपाट खेतों में भी गाया जाता है। कुछ विद्वान ''दादराÓÓ से साम्यता के कारण दादरा गीत/ ताल में इसके नामकरण का सूत्र तलाशते हैं। यह भी सत्य है कि ददरिया में वाद्य का प्रयोग नहीं होता। तब ताल के नाम पर नामकरण का सवाल ही नहीं उठता। विद्वानों ने ददरिया के चार भेदों का भी निरूपण किया है। ठाढ़ ददरिया, सामान्य ददरिया, साल्हों और गढ़हा ददरिया। बैल गाड़ी हांकते गाड़ी वानों द्वारा गाये जाने वाले ददरिया गढ़हा ददरिया कहलाता है। संभवत: इसी आधार पर साल वनों में गाये जाने वाले ददरिया को साल्हो कहा गया हो?
तो क्या नांगर जोतते हलावाए द्वारा गाये जाने वाले ददरिया को नंगारिहा ददरिया कहां जाएगा? इस प्रकार ददरिया का भेद उचित नहीं जंचता। जो भी हो पर ददरिया है गीतों की रानी। ठाढ़ ददरिया और सामान्य ददरिया को खेतों में काम करते ग्रामीणों से सुना जा सकता है। इसकी स्वर लहरी बड़ी मीठी होती है।
पारंपरिक रूप में ददरिया खेतों में फसलों की निंदाई-कटाई करते, जंगल पहाड़ में श्रम में संलग्र लोगों द्वारा गाया जाता है। यह और बात है कि अब मंच पर ददरिया वाद्यों के संगत में गाया जाता है। लड़के-लड़कियों को नचाया जाता है। इसलिए शहरी परिवेश में जीने वाले लोक कला मर्मज्ञ ददरिया को लोक गीत न कहकर लोक नृत्य कहते हैं पर यह कला का विकास नहीं है। यह पारंपरिकता के साथ खिलवाड़ है। उसके मूल रूप को विकृत करने का प्रयास है। मेरी दृष्टि में ऐसा कोई भी प्रयास ना लोक कला के हित में हैं न लोक कलाकार के।
ददरिया का सामूहिक स्वर सुनकर जिसने उसका माधुर्य पान किया होगा, वही व्यक्त कर सकता है ददरिया के आनंद और अनुभूति को। इसे अकेले-दुकेले भी गाया जाता है, सवाल जवाब के रूप में। साथ देने वाला हो तो माधुर्य द्विगुणित हो जाता है-
बटकी मा बासी, अऊ चुटकी का नून।
मैं गावत हंव ददरिया, तैं कान देके सुन।
ददरिया मुक्तक श्रेणी का लोक काव्य है। यह दोहे की शैली में होता है। इस प्रभाव दोहे की ही तरह मर्मस्पर्शी होता है। ददरिया की श्रृंखला बड़ी लम्बी होती है। ये परस्पर भिन्न होते हैं। इनका परस्पर संबंध विच्छेदित रहता है। सतसई के दोहे के बारे में जिस प्रकार कहा जाता है-
सतसईया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर,
देखन में छोटे लगे, घाव करत गंभीर।
निष्ठुर निर्दयी और निर्माेही व्यक्ति को भी ददरिया मोम की तरह पिघला देता है। पत्थर में भी प्रसून खिला देता है लोक कंठ में गूंजने वाले ददरिया का माधुर्य मंदिर में गूंजती घंटियों की तरह मन को शांति देता है। काम करते-करते जब काया थकने लगती है, तब ददरिया की तान थकान मिटाती है या यूं भी कहा जाता सकता है कि ददरिया गाते-गाते काम करने से थकान आती ही नहीं बल्कि शरीर में ऊर्जा और मस्तिष्क में चेतना का संचार करता है। इसलिए कि यह लोक गीत का स्वभाव है और गीत मनुष्य का स्वभाव है। लोक जीवन में कोई भी कार्य गीत के बिना संपन्न नहीं होता। हल चलाने वाला हल चलाते-चलाते गीत गाता है। गाडीवान भी गीत गाता है। नाव चलाने वाला गीत गाता है। घर में चक्की चलाती, धान कूटती स्त्रियाँ गीत गाती हैं। लोक जीवन में लोक गीत का ही साम्राज्य है।
ददरिया में दोहे की तरह दो पक्तियाँ ही होती हैं। प्रथम पंक्ति में लोक जीवन के व्यवहृत वस्तुओं का उल्लेख है या कहें कि प्रकृति व परिवेश का समावेश और दूसरी पंक्ति में होता है अंतर मन की व्यथा-कथा, सुख-दुख, हास-परिहास और हर्ष-विषाद का प्रकटीकरण। कथ्य का भाव, क्रिया-प्रतिक्रिया, मनोदशा और पारस्परिक प्रभावों का चित्रण। ''तुकांतताÓÓ ददरिया की विशेषता है। स्वाभाविक रूप से दोनों पंक्तियों के तुक मिलते हैं। किसी-किसी ददरिया में दोनों पक्तियों में पारस्परिक प्रभाव तादात्मय स्थापित रहता है। यथा-
करिया रे हडिय़ा के, उज्जर हावय भात।
निकलत नई बने, अंजोरी हावय रात।।
ददरिया में विषयों की विविधता है पर मूलत: विषय श्रृंगार है। इसमें कृषि संस्कृति और आदिवासी संस्कृति पूर्णत: प्रतिबिम्बित होती है क्योंकि यही लोक जीवन का मूलाधार है। लोक व्यवहार के शब्द ददरिया के श्रृंगार हैं। फलस्वरूप ददरिया की पंक्तियों के भाव का हृदय में अमिट छाप पड़ता है-
आमा ला टोरे खाहूंच कहिके।
तैं दगा दिये मोला, आहूँच कहिके।।
प्रेम और अनुराग इसका मूल स्वर है। प्रेम तो जीवन का सार है, श्रृंगार है। प्रेम के बिना सारा संसार निस्सार है। युवा-हृदय में जब प्रेम की कोपलें फूटती हैं, तो वह किसी का प्रेम पाकर पल्लवित होता है। ददरिया प्रेमी हृदय की अभिव्यंजना है आकुल प्राण की पुकार, भोले भाले मन की काव्य सर्जना है। ददरिया के विषय में डॉ. पालेश्वर शर्मा कहते हैं-छत्तीसगढ़ी लोक गीत ददरिया यौवन और प्रणय का उच्छवास है। यौवन जीवन का वासंती ओज है, तो सौंदर्य उसका मधुर वैभव और प्रेम वह तो प्राणों का परिजात है, जिसके पराग से संसार सुवासित हो उठता है। प्रेम का पराग ददरिया की इन पंक्तियों में दृष्टव्य है-
एक पेड़ आमा, छत्तीस पेड़ जाम।
तोर सेती मयारू, मैं होगेंव बदनाम।।
आमा के पाना, डोलत नई हे।
का होगे मयारू, बोलत नई हे।।
ददरिया में प्रेम और अनुराग का ही वर्चस्व होता है। प्रेम गंगा जल की तरह पवित्र होता है। प्रेमी हृदय जिस छवि को अपनी आँखों में बैठा लेता है, वही उसका सर्वस्व होता है। उस प्रेम मूर्ति को वह अपनी कोमल भावनाएं पुष्प की तरह अर्पित करता है। मरने पर ही प्रीत छूटने की बात कहता है-
माटी के मटकी फोरे म फूट ही।
तोर मोर पिरित मरे में छुट ही।।
लोक मन का यह अनुराग, लोक मन की यह प्रेमाभिव्यक्ति और विश्वास धरती की तरह विस्तृत आकाश की तरह ऊंचा और सागर की तरह गहरा है। भला कोई प्रेम की ऊंचाई और गहराई को नाप सका है? प्रेमी हृदय की ललक और प्रिय की तलाश को कितनी सार्थक करती है, ददरिया की ये पंक्तियाँ-
बागे-बगीचा, दिखे ला हरियर।
झुलुप वाला नई दिखे, बदे हँव नरियर।।
लोक जीवन के क्रिया व्यवहार का यथार्थ भी प्रस्तुत करता है ददरिया। जब मुद्रा का प्रचलन नहीं था, तब लोक वस्तु-विनिमय द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे तथा परस्पर वस्तुओं को अदल-बदल कर अपनी रोजमर्रा की चीजों की पूर्ति करते हैं। छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन में भी छुट-पुट प्रथा देखने में आता है। जैसे रऊताईन कोदो या धान के बदले मही देती है। गाँवों में लोग बबूल बीज के बदले नमक ले लेते हैं-
ले जा लान दे जँवारा,
कोदो के मिरचा ओ, ले जा लान दे हो।
धाने रे लुवे, गिरे ला कांसी।
भगवान के मंदिर म बाजथे बंसी।।
नवा रे मंदिर कलस नई हे।
दू दिन के अवईया, दरस नई हे।।
ददरिया के शाब्दिक अर्थ सौन्दर्य, अर्थ गांभीर्य और इसके माधुर्य के कारण इसे गीतों की रानी कहा जाता है। यह सम्मान इसे इसकी सहजता, सरलता और सरसता के कारण भी मिला है। ददरिया वह गीत है जिसके रचनाकार का पता नहीं है। यह वाचिक परम्परा द्वारा एक कंठ से दूसरे कंठ तक पहुंचता है। कुछ छुटता है, कुछ जुड़ता है। इस छुटने और जुडऩे के बाद भी यह कभी निष्प्रभावी नहीं हुआ है। इसका तेज और लालित्य बढ़ता ही गया है। लोक गायक जो देखता है, उसे ही गीत के रूप में कर गढ़ कर गाता है और समूह कें कंठ में जो बस जाता है वही लोक गीत कहलाता है। ददरिया लोक को गाने वाला गीत है-
संझा के बेरा, तरोई फूले।
तोर झूल-झूल रंगना, तोहि ला खुले।।
बगरी कोदई, नदी मा धोई ले।
तोर आगे लेवईहा, गली मा रोई ले।।
तिली के तेल, रिकोयेंव बिल मा।
रोई-रोई समझायेंव नई धरे दिल मा।।
ददरिया की कडिय़ाँ एक दूसरे के साथ पिरोई जाती है। ददरिया की धुनें अलग-अलग होती है। पर एक ही कड़ी को भिन्न-भिन्न धुनों में भी गाया जाता है। ददरिया की यह भी विशेषता है। ददरिया गाने वाले चाहे वह स्त्री हों या पुरूष वे इतने कुशल होते हैं कि अपनी कल्पना शक्ति से तत्काल ददरिया की पंक्तियाँ जोड़ लेते हैं। यदि इन्हें आशु कवि कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। परंतु इस सृजन में इनका कोई व्यक्तिगत प्रभाव नहीं होता। उनकी अभिव्यक्ति  लोकमय हो जाती है। लोक तो निष्पृह और निराभिमानी होता है। वह केवल अपने स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ता है तथा लोकमंगल का पथ गढ़ता है।
ददरिया की एक सुनिश्चित गायन शैली नहीं है। भिन्न-भिन्न धुनों, भिन्न-भिन्न रागों में यह लोककंठ से फूटता है। राग का आशय यहां शास्त्रीय रागों से कतई नहीं है। लोक में सुर को राग कहा जाता है। शास्त्रीय राग मेें बंधन होता है। लोक को बंधन स्वीकार्य नहीं। वह तो फूल की खुशबू के मानिंद है जो सबको सुवासित करता है। ददरिया की कडिय़ाँ को जोडऩे के लिए ''घोरÓÓ का प्रयोग किया जाता है जिसे हम टेक भी कहते हैं। ये पँक्तियाँ ददरिया की कडिय़ों के बीच-बीच में दुहराई जाती है-
हवा ले ले रे, पानी पिले रे गोला।
नई छोडंव तोला का रे, हवा ले ले।
का साग रांधे, महि म कुँदरू।
गाड़ी भागथे दबोल म, नई बाजय घुंघरू। हवा ले ले......
रस्ता म रेंगे, हलाय कोहनी,
तोर आँखी म सलोनी, खोप म मोहनी। हवा ले ले.....
कांचा लिमऊ के रे, रस चुचवाय।
    भौजी बिना देवर के, मन कचुवाय। हवा ले ले......
ददरिया में धुनों के विविधता के कारण इसके गायन में किसी प्रकार की दुहरूता नहीं आती बल्कि इस विविधता के कारण इसकी एकरसता समाप्त होती है। अक्सर गीतों की एकरसता श्रोता के मन में ऊब पैदा करती है। ददरिया से तो ऊबने का सवाल ही नहीं है-
ये भागबो पल्ला का गा,
जाम झिरिया में...हवा म कलगी डोले।(घोर)
एक पेड़ आमा, झऊर करे।
मया वाली दोसदारी बर, दऊंड़ करे।।
सायकिल चलाए, हेंडिल धरिके।
तोला बइठे ल बलायेंव, कंडिल धरिके।
बाँस के लाठी, चुने ला भइगे।
तोर खातिर मयारू, गुने ला भइगे।
नांगर के मुठिया, दबाय नहीं।
तोर दिए खुरहोरी, चबाय नहीं।।
नवा रे हडिय़ा, भेर ला मडिय़ा।
निकलत नई बने, रांधत हडिय़ा।।
ददरिया सबाल-जवाब के रूप में अभिव्यक्त होता है। एक समूह सवाल करता है, दूसरा समूह जवाब देता है। या ऐसा भी कह सकते हैं कि दो प्रेमी हृदय परस्पर सवाल-जवाब करते हैं। ददरिया हृदय में अंकुरित प्रेम को अपनी स्वर लहरी से सींचता है उसे अनुराग का आश्रय देता है-
ये दे संझा के बेरा, बगइचा में डेरा
तोला कोन बन खोजंव रे.....
ये दे संझा के बेरा.......।
गहूं के रोटी, जरोई डारे।।
मोला बोली बचन में, हरोई डारे।।
बासी ल खाए, अढ़ई कौंरा।
तोला बईठे ल बालयेंव, बढ़ई चौंरा।।
चंदा रे उवे, सुरूज लाली ओ।
बखरी ले ढेला मारे, पिरित वाली ओ।।
ददरिया छोटे पद का गीत है। थोड़ी शब्द सीमा में बहुत अधिक कह देना, लोकगीतों की विशेषता है। यह सामथ्र्य ददरिया के पास अधिक है। लोक जिव्हा में रचे-बसे शब्द, हीरे मोती की तरह शोभा पाते हैं। इसमें मात्राओं की  कमी-बेसी को गायक अपनी लयात्मकता से पूर्ण कर लेते है। शब्दों की कमी पडऩे पर संगी, संगवारी, दोस मयारू, जहुंरिया आदि शब्द जोड़ लिए जाते हैं। यह उनकी गायकी का कमाल होता है। लोक गायक तो वैसे भी स्वर-पूर्ति में कुशल व परिपक्व होते हैं। ददरिया गायन में कभी-कभी स्वर सन्तुलन के अतिरिक्त पंक्ति भी जोड़ी जाती है-
फूल रे फूले, धवई के र वार,
कोन गलियन में होबे, मोर जीव के आधार,
तुक-तुक के गोटी मारे, गिंजर के आना।
खाल्हे बाहरा म रे.......
खाए कलिन्दर रे, फोकला बधार,
इही गलियन में आबे, मोर जीव के आधार।
तुक-तुक के गोटी मारे, गिंंंंंंंंंंजर के आना।।
खाल्हे बाहरा म रे.....
घर के निकलती रे, कुरिया के टोंक।
मैं बोलन नई तो पायेंव रे, आदमी के झोंप।।
ओली के हरदी, कुचर जल्दी।
तुक-तुक के गोटी मारे, गिंजर के आना।।
खाल्हे बहरा म रे.......
ओली के हरदी, कुचर जल्दी।
देरी होगे पतरेंगी, निकल जल्दी।।
लोक की अपनी मर्यादा है, अपनी सीमा है। लोक मर्यादा का उल्ल्रंघन नही करता। ददरिया गांव की गलियों में नहीं गाया जाता। इसे खेत खार, जंगल-पहाड़ में ही गाया जाता है। वहां भी लोक समूह की उपस्थिति इसे मर्यादित रखती है। प्रेम और अनुराग का यह गीत यदा-कदा अश्लीलता को छूने का प्रयास भी करता है। यह प्रयास कुछ हम उम्र मित्रों के हास-परिहास के रूप में होता है, सार्वजनिक नहीं। समूह इस प्रयास को अस्वीकार करता है। नदी यदि तट का उल्लंघन करे तो वह अहितकर ही होता है-
करे मुखारी, जामुन डारा ग।
बइठे ल आबे तैं बइहा, हमर पारा।।
ददरिया में बही-बईहा का सम्बोधन, प्रगाढ़ प्रेम को प्रदर्शित करता है। बही अर्थात पगली, बईहा माने पागल। प्रेम में तो आदमी पागल ही होता है। जो अतिप्रिय उसे ही पागल कहने का अधिकार दिया है प्रेम ने। भला कोई दूसरा पागल कह सकता है?
चांदी के डबिया, सोने के ढकना।
नानपन के संगवारी, देवथे सपना।।
आधू नंगारिहा, बईला हे टिकला।
डोली म उतरहूं, हो जही चिखला।।
ददरिया की पंक्ति-पंक्ति कानों को सुकुन देती है और आत्मा को तृप्ति। यूं तो ददरिया में प्रेम का रंग गाढ़ा है। ददरिया में प्रेम के दोनेा रूप संयोग और वियोग का समन्वय मिलता है। इसके साथ ही ग्रामीण रीति-रिवाज, धार्मिक आस्था और लोक विश्वास तथा समकालीन परिस्थितियां भी इसमें आकार लेती है-
सिया राम भज ले संगी,
चरदिनिया जिनगी ग......
सिया राम भज ले।
चारे रे खुरा के चारे पाटी।
कंचन तोर काया, हो जही माटी।।
इधर छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने भी ददरिया छंद में गीत लिखना प्रारंभ िकया है। ये गीत लोकप्रिय भी हुए हैं। पर पारम्परिक ददरिया का सौन्दर्य और माधुर्य उनमें नहीं आ पाया। शायदा इसका कारण मौलिक प्रयास हो। व्यक्ति विशेष की छाप हो। जबकि दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि इनमें गा्रमीण जीवन के शब्दों का अभाव रहता है। इसीलिए लोक मन में ये गीत गहराई से उतर नहीं पाते। छत्तीसगढ़ के कुछ गायक कलाकारों व रचनाकारों के नाम लिप्सा के कारण ददरिया की गरिमा के साथ मजाक किया है। या तो इन्हें पारम्परिक ददरिया को अपनी रचना बताकर रचनाकार के रूप में अपना नाम जोडऩे का कुत्सित प्रयास किया है या पंक्तियों को इधर-उधर कर इसके मूल स्वरूप को क्षति पहुंचाई है। जिन पारम्परिक ददरियों को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। जिन ददरियों को एक पैसठ वर्षीय लोक  कलाकार अपनी किशोरावस्था से गाते आ रहे हैं, उन गीतों के साथ 30 वर्षीय कलाकार, रचनाकार के रूप में अपना नाम जोड़ता है। यह कितनी हास्यापद स्थिति है। पारम्परिक गीतों को, पारम्परिक ही रहने दें तो क्या हर्ज है? पारम्परिक गीतों को अपनी मौलिक रचना बताना अच्छी बात नहीं है। नाम ही चाहिए तो नाम के लिए अच्छे काम की जरूरत होती है।
कुल मिलाकर ददरिया मेहनतकश लोगों के हृदय की अभिव्यक्ति है। पसीने की बूंदों से सिंचित लोक की गर्जना है। प्रेम आतुर मन का मादक स्वर है, लोककंठ से झरता निर्झर है। जिसकी धारा कभी न क्षीण होगी न मलिन। ददरिया लोक मानस की शक्ति है। उसके प्रेम और अनुराग की अभिव्यक्ति है। लोक की अभिव्यक्ति का यह सिलसिला अनवरत जारी रहे। लोकगीतों की रानी ददरिया का स्वरूप लोक हाथों में सजता रहे, संवरता रहे। यह लोक स्वर अतृप्त आत्मा को संतृप्त करता रहे। लोकगीतों का लोकमंगल स्वरूप बना रहे। यहीं मंगल कामना है-
छोटे हे केरी, बड़े हे केरा।
राम-राम ले लव, जाये के बेरा।
जुन्ना लुगरा, कथरी के खिलना।
जिनगी रही त, फेर होही मिलना।
साभार रउताही 2014

लोक गीत बिहार के

हर मनुष्य अपने जीवन में हमेशा गाता गुनगुनाता रहता है। चाहे वह मन ही मन गुनगुनाये या बोल कर गाये गाता जरूर है। जब किसी के मन में जो भावना जगती है वह अपने भावों को प्रकट करने के लिए बातचीप से या संलाप से या गीत के रूप में अवश्य गायेगा। वह भी मनुष्य जिस परिवेश में या वातावरण में रहता है, उसी वातावरण से प्रभावित होकर गीत गाता है और उस गीत पर आंचलिक भावों का व्यवहारों का एवं भाषाओं का पूर्ण रूपेण प्रभावित होता है इसे ही हम लोकगीत कहते हैं।
लोकगीत हमारे जीवन काल के वर्षों के महीनों में आने वाले सांस्कृतिक शादी-विवाह, त्यौहार, पूजा-पाठ के कार्यक्रम के अवसरों के हिसाब से बंधा हुआ होता है और उसी पर आधारित है- जैसे कि शादी-विवाह पर गाये जाने वाले, सन्तान प्राप्ति के उत्सव पर गाये जाने वाले तीज त्यौहार पर एवं अन्य उत्सवों पर होते रहते हैं। ऐसे ही बिहार के मिथिला के आंचलिक गीत आप के सामने कुछ प्रस्तुत हैं।
वैसे तो गुलाल का टीका हर खुशी के अवसर पर लगाये जाते हैं परन्तु खासकर जब माता सरस्वती की पूजा जब हो जाती है उस दिन से गुलाल का टीका या मुखड़े पर हल्का सा लगाना शुरू कर देते हैं। परन्तु बसंत पंचमी से तो अधिकाधिक प्रयोग किया जाता है। होलिका दहन एवं नवसंवत सर के अवसर पर वो कहना ही कया? तभी तो होली के हुड़दंग में गा एवं नाच उठते हैं। फिर क्या डफली ढोलक लेकर नगाड्े की घाव पर गा उठते हैं-
भर फागुन, भर फागुन बुढ़वा देवर लागे भर फागुन।
काहू के हाथ में रंग पिचकारी,
हां काहू काहू के हाथ में रंग पिचकारी
कोई लगा के गुलाल भागे।। भर फागुन।।
चाहे कोई पहिने सफेद नवा साड़ी
नव रंग डाल चहेरा बिगाड़ डारे भर फागुन
इसके बाद कोई दूसरी टोली गाते हुए आते है और गाती है
जिसमें कोई कृष्ण जी का वेश बनाये रहता है।
होली से खेलत है नंदलाल बिरज में।
केहू के हाथ में रंग पिचकारी
केहू के हाथ में गुलाल बिरज में।।
राधा के हाथ में रंग पिचकारी
कान्हा के हाथ में गुलाल।
बिरज में होली खेलत हैं नंदलाल।।
बिहार में देवर भाभी की होली सदा खेली जाती है परन्तु अन्यों के साथ नहीं, अन्यसाथ और पुरूष और गैर औरत से। औरत औरतों के साथ, पुरूष पुरूषों के साथ ही। चैत महीनें में चैता गाये जाते हैं। छत्तीसगढ़ जिस तरह अषाढ़ महीनेें में सावन महीने में, हरितालिका, कमरछठ मनाया जाता है, बिहार में उसी तरह हरियाली सावनी घड़ी मनायी जाती है। भादो महीने में जन्माष्टमी, गणेश पूजा होती है। गणेश पूजा बिहार में स्कूलों में ही ज्यादातर मनाये जाते हैं। घरों में भी परन्तु साधारण तौर पे, मूर्ति स्थापना करके नहीं। उस रोज उपवास रहकर एवं पुआ-पकवान बनाकर शाम को चाँद को दिखाकर अर्ध देकर देकर फिर उस घर में भोजन कर लिया जाता है और सथ ही इष्ट मियों को दावत दिया जाता है। जन्माष्टमी पर भी ऐसे ही होता है। दिन भर उपवास रहते हैं शाम को बैठकर रात्रि के बारह बजे तक भजन कीर्तन करते हैं। फिर भगवान के जन्म के बाद उनकी आरती उतार कर प्रसाद वितरण करके लोग भोजन कर लेते हैं। यह कार्यक्रम अधिकतर मंदिरों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
आज कन्हैया के जन्म भयो रे,
सब दुख दूर भ गइले रे।
जेल के द्वार खुल खुल गइले,
कंश गरव चूर भइले रे।
माई यशोदा के भाग-जग गइले
नंदबाबा खुश गइले रे।।
मइया देवकी देखि कान्हा के
ले वसुदेव भागी भइले रे
बटथीन नंद बाबा सूपा भर अंजूरी
देत साड़ी मुस्कइसे रे।।
सब दूख दूर भ गइले रे।।
जब सावन का महीना आता है तब कदम की डाली पर फूल लग जाता है। एक तरफ कृष्णा सब साथियों के साथ दूसरे तरफ राधा अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलने लगती हैं। लोग देख देख कर आनंद विभोर हो जाते हैं। आनंद का वातावरण इतना बढ़ जाता है कि लोग देखकर दिल से गा उठते हैं-
झूला लगे कदम की डारी झूले कृष्ण मुरारी का।
माथे पे मोर मुकुट बिराजे, कानों में कुंडल वा।
श्याम सुन्दर चित चोर जो झूले राधा मुस्काए ना।।
एक टक देखे राध प्यारी, दिल हर्षाये ना,
बोली मोहन प्यारे रूक जा, भुले भी झुलाओ ना।।
फूलत फूलत मारे नजरिया जग को भुलाये ना
कहां जाऊं तुम्हें छोड़ कन्हैया, कहीं लागे न मनया ना।।
तदुपरांत दशहरा का समय आता है जिसे नौरात्री भी कहा जाता है। लेकिन बिहार में इसे दसईं कुंछ क्षेत्रों में कहा जाता है। इस दसई में मां भगवती कहें या मां दुर्गा की तो हर घर में मंदिरों में पूजा होती ही है शाम को लड़कियाँ एवं नवयुवतियां इकट्ठी हो कर पांच पांच या दस दस के झुण्ड में एक मटका रखती है। यह मटका कुम्हारों द्वारा अलग से बनाया जाता है। जिसमें करीब 15-20 छिद्र चारों तरफ से किया जाता है। उस मटके में दीप जला कर रख दिया जाता है। उसे एक लड़की सिर पर रख कर वही नृत्य करती है जिसे कुछ नृत्य करने का अभ्यास हो, क्योंकि गोल गोल बार बार नृत्य करने से सिर चकरा जाता है। गिरने का भय भी रहता है। अन्य सहेलियां अनेकों गीत गाते रहती है जिसे देख और सुनकर बड़ा ही मनो भावन लगता है। यह गीत मां दुर्गा के प्रति होती है जिसमें उनसे विनती की जाती है कि मां यहां पर बहुत से जादू-टोना वाले हैं उनसे मेरे भाईयों-भतीजों व अन्य प्रिय जनों की रक्ष करो मैं तेरी हमेशा पूजा करूंगी। इस नृत्य को उत्तरी बिहार के मिथिलांचल में झिंझिया कहते हैं। प्रस्तुत है गीत-
सात बहिनियां हे भागमत, सातो कुमार हे।
हर बहिनी योगे रे कुम्हारा, झिंझिया गढि़ लाब रे।
एके वहिनिया हे भागमत, गेल कुम्हरा दुकान रे।
लेई कर झिंझिया रे भागमत, ललई मकान रे।
सातो वहिनिया रे भागमत, गेल तेलिया दुकान रे।
वहिनि योगे आ रे तेलिया, तेलवा पेडि़लाव रे
लेइ के वहिनिया तेल, दीया तेल कई जराये हे।
रखि दीया झिंझिया में बहिनी, नान्की रहथी रिझाए हैं।
सब सखी कलकई विनितिया, मोर भइया के देहू बचाये हे।
बहुत हउए इहवा टोनहिया, ओकरा से करहू दोराप हे।
मोर भतीजवा के माता, देहू उमर का बढा़ए हे
सब दिन पुजबौ हे माता, सिन्दुरवा चुड़ी चढ़ाए हे।
उसके बाद भैरव बाबा गंगा स्नान की तैयारी करने लगते हैं तब उनके सेवक रोकते हैं:-
भैरव बाबा चलल गंगा स्नान, सेवक भेल उनके अगुआर।
मति जाहू गंगा स्नान हो बाबा, अंगना
देवौ दोनों कुंइया खोदाई।
चंदन, चौका इहवा पुराई देव बाबा,
दुध से भी पंईया देवभरवाड़
तब भैरव बाबा बोले:- अंगना के कुंइया
नरक होत-भष्म चाहे देव लगाव
फिर बहने भतीजों से- जिय हो अमुक
भैया के बेटवा, जे झिंझिया मैं तेल पहुंचाय
मर ऊंक डयनी के बेटवा, जे हमरा के देत सराप।
जे झिंझिया में नजर लगौलक अब गेल झिंझिया बताये।
धन भाग तोहरा के झिंझिया,
जे भइया के दिहलक बचाये।।
और जब दशहरा समाप्त हो जाता है तब सहेलियां शाम को एक जगह इकट्ठा हो कर पुष्प एवं दीप अगरबत्ती से पूजा करके गीत गा करके घर लौट जाती है।
जाऊ जाऊ भगवती मैया, गोर लगइथी दू आशीष हे।
रऊआ के रहिते बड़ा सुख पउली किये दीअऊ नेबकशीष हे
घर उजियारा भेल पावन म गेलई और का चाहिए मइया आस हे।
मेवा मिठाई पेड़ा लड्डू के खोंइथा करीं स्वीकार सनंस हे।
धन भाग जिनगी के राऊर भइल दरशन आगे कब होई मिलाप हे
ऐई जिनगी कौन टिकाना कब मिलक देदी आशीष है।
इसके बाद कार्तिक महीनें में दशहरा के 26 दिनों बाद यह व्रत जिसे डाला धट भी कहते हैं। यह हिन्दुओं का खास कर बिहार वासियों के लिए बहुत ही पुष्पशीला मनोकामना पूर्ति करने वाला व्रत है। इसमें बहुत ही स्वच्छता पूर्वक कार्य किया जाता है। कहते हैं कि इसमें पवित्रता की थोड़ी सी भी लापरवाही हुई तो दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। इस व्रत में जो भी सामग्री प्रयोग में थानी काम में लाये जाते हैं वे सभी नये होते हैं तो यह व्रतियों के लिए हैं। वहीं लड़कियों एवं नव युवतियों के लिए मनोरंजन का कार्यक्रम भी है जिसने शामो चकवा एवं खंरचीच का प्रसंग है साम्ब बाबा चकवा पोता औरा संरिच पोती का संलाप डाला के साथ होता है और सब सहेलियां गाती है।
खंररिच- डाला ले बाहर भेली खंररिच बहिनी,
चकवा भैया तेल डाला छीन, सुनु राम सजनी।
सामने बैतल तुहु बाबा तु बर जिता-
चकवा भैया तेल डाला छीन, सुनुराम सजनी।
साम्ब- कथीं के तोहर डलवा के मोती
कथीं ए लगा ओल चारो कोण, सुनुराम सजनी।
खंररिच- कांचही बांस के डलवा हो बावा,
चम्पा, चमेलिया चारो कोण, सुनु राम सजनी।
साम्ब- जब हम डलवा देआइदेब गे पोती
भैया के लिए देबू दान सुनु राम सजनी।
खंररिच- जब हम बसवई सजन घर हो बाबा
सासू दोहन देऊआ ननदिया, खोइंहल धान सनु राम सजनी
फिर तोहरो देवौ बा, चढऩे के घोड़वा,
भैया के देवई नन्दी दान, सुनु राम सजनी।
जब चकवा भैया जुआ खेलने जाता है तो वहन खंररिच को बहुत दुख होता है परिवार समेत तब बहन को दुख होता है कि भाई कहीं जुए में सब हार जाए तो मेरा और परिवार का भविष्य क्या होगा। इसी पर दुख प्रकट करती है बहन:-
ओई पार चकवा भैया खेले जुआ सार, एई पार खररिच वहिनी रोइना पसार।
चकवा:- चुप होहु चुपहोहु खंररिच बहिनी, बहवा के संपतिया देवौ तोहरो बांट।
खंररिच:- बाबा के संपतिया हो भैया तुही लोग भागिहा जाये,
बाकी भतिजवा भैया भोगतई खुश हो राज जाये।
हम बेटी पर देशी भेलि अई भइया केवल मोटरी के आस।
और मोर जिनगी भैया सिन्दुरवा करतई आस।
छोटकी वहिनिया के भइया मत विस रईहा।
बाबूजी के हम सब डाल पात।
इसी तरह अपनी अपनी व्यथा शिकायत जिन्दगी को संभालने के लिए करते हैं जब बहन खेलते खेलते भैया के द्वार तक जाती है तो डाला और बिछिया चोरी हो जाती है तो शिकायत, मां और भाई से करती है।
सामा खेले गेली आई हे चकवा भाई दुअरा,
खेलइते बिछिया गेल हेराय।
रहलई अनमोल बिछिया खोजइते खोजइते
डलवा भी लेलकई चोराय।
एक मुट्टी खर हो भइया, फुंकी कर इजोर करा,
देखा त कौन लेल चोराय
खोजते खोजइते में बहनोइया निकलल चोर हो
बांधी भार धंडकी से जाय।
छाती चढि़ मारिहा भैया चोरवा बहनोइया के
जब ले न ढारे नयना लोर।
कर जोड़े लगलथीन बहिनियां माफी कर दहू
बड़ा दुलरूआ हवे चोर।
            म. 2 ए सड़क-25 सेक्टर 5 भिलाई नगर जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ 490006
आज मेरी नातिक का जन्म तिथि
है जो वर्षा की हो गयी है,
उसके जन्म पर बधाई है।
नातिन का नाम अमूबा सिंह है।
जन्मदिन
जगदीश राय गुमानी -
जन्मदिन पे मूली है तुमकी बधाई।
जन्म दिन तेरे बटेंगे लड्डू पेड़े।
खुशियों की घडिय़ा मजे की आज आई।।
सब आये हैं मेहमां ले आशिषों के अरमां।
शतायु बनने की कसमें हैं खायी अरमां।
सबकी है तु प्यारी दिल की है दुलारी
तु हर की जबां पर बन लक्ष्मी है आयी।।
तुमको पाकर माता खुश हुए बाबा पापा।
दादी खुश हो मुस्काई जो फूले न समाई।।
तू जब से घर में आई है रौनक बढ़ाई।
दिल वाग वाग हो कर चिडिय़ो सी चहचहाई।।
गुमानी नानी-नाना लाया प्यार का नजराना।
देकर शुकुन पाया अपनी जीया जुड़ाई।।
 साभार रउताही 2014

Sunday, 19 October 2014

छत्तीसगढ़ के लोकनृत्यों में 'राउत नृत्य'

मनुष्य अपनी आत्माभिव्यक्ति हंसकर, रोकर, गाकर या नाच कर व्यक्त करता है। वह जब अत्यधिक प्रसन्न हो जाता हैं खुशी से भर उठता है तब उसके अंगों में हलचल होने लगती है। पैर थिरकने लगते हैं हाथ हरकत करने लगते हंै। पूरा शरीर झूमने लगता है। इस प्रकार की आत्माभिव्यक्ति को हम नृत्य कहते हैं। नृत्य के द्वारा मनुष्य का मन दुख, कठिनाईयों जीवन की जटिलताओं से दूर हो आनंद के प्रवाह में प्रवाहित होने लगता है।
लोक जीवन की भावुकता को अभिव्यक्त करने वाली प्रकृति से प्रभावित बंधनहीन उन्मुक्त नृत्य को लोक नृत्य कहा जाता है। लोक नृत्य वस्तुत: प्राकृतिक नृत्य है क्योंकि जब मनुष्य ने हवा में पेड़-पौधों को हिलते और इठलाते देखा तो वह भी आनन्द विभोर होकर अपने शरीर को उसी प्रकार हिलाने-डुलाने लगा।
हिलाने-डुलाने से इस क्रिया ने धीरे-धीरे नाच का रुप धारण कर लिया और समय बीतने पर हम उसे लोकनृत्य कहने लगे। लोक नृत्य में सरलता, सर्वगम्यता अप्रत्यनशील सरलता स्वसर्जित वैविध्य में एकरुपता आदि विशेषताएं होती हंै। लोक नृत्य में जन जीवन की परम्परा, उसके संस्कार तथा लोगों का आध्यात्मिक विश्वास होता है। लगभग सभी लोक नृत्य सामूहिक होते हैं जो शास्त्रीय नृत्यों की तरह शास्त्रीय बंधनों और सीमाओं से परे होते हैं। शस्त्रीय एवं लोकनृत्यों में वही भेद है जो सीमाओं से आबद्ध तालाब तथा स्वच्छंद प्रवाहमान सरिता में है।
भारत  के चप्पे-चप्पे में अनुगूंजित लोक नृत्य ने लोक जीवन के हृदय को सुरक्षित रखा है। इस संदर्भ में श्री जवाहरलाल नेहरु के विचार उल्लेखनीय है- 'यदि मुझ से कोई पूछे कि भारत की प्राचीन संस्कृति और उसकी जनता के स्फूर्ति पूर्ण जीवन और कला प्रेम का सबसे सुन्दर चित्रण कहाँ होता है तो मैं कहूंगा कि हमारे लोकनृत्यों में।Ó
छत्तीसगढ़ ने हमेशा लोककलाओं जिनमें जनता के प्राणों का स्पन्दन है को जीवित रखा इसलिए यहाँ की लोक संस्कृति जीवित रही। यहां के लोकनृत्य एवं लोकगीत यहां की संस्कृति के सच्चे प्रतीक हैं। छत्तीसगढ़ में अतीत गौरव के प्रतीक लोक नृत्य किसी ग्राम उत्सव के समय प्राय: अपने पुरानेपन में भी सौन्दर्य को समाए मानव मन को आनन्दित एवं आकर्षित किये रहते हैं। डॉ. कुन्तल गोयल ने लिखा है -'छत्तीसगढ़ लोक नृत्यों की भूमि है। लोकनृत्य यहाँ के लोक जीवन के आधार हैं। प्रकृति के उन्मुक्त प्रागंण में विचरण करने वाले इन प्रकृति पुत्रों का वास्तविक स्वरूप इनके नृत्य में ही परिलक्षित होता है। सच कहा जाए तो नृत्य के बिना इनकी भक्ति अधूरी है, इनके कर्म अधूरे हैं और जीवन अधूरा है।Ó
छत्तीसगढ़ के लोक मानस ने गीत और नृत्य के माध्यम से अपने मन में उत्पन्न भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करने में विशिष्ट योगदान दिया है यहां के जन जीवन में नृत्य इस प्रकार  घुलमिल  गया है कि इसे कभी अलग नहीं किया जा सकता।
इनके रीति रिवाज इतने अधिक है कि प्रत्येक माह में एक न एक त्यौहार आता है और इस अवसर पर मानो नृत्य की घटा छा जाती है और गीत की वर्षा होने लगती है। इनके अनेकानेक त्यौहारों को नृत्य प्रधान त्यौहार कह सकते हंै।
छत्तीसगढ़ में विभिन्न लोकनृत्य प्रचलित है वे इस प्रकार हैं-
(1) करमा नृत्य (2) सुआ नृत्य (3) डंडा नाच (4) पंथी नृत्य (5) गोरा नृत्य (6) जंवारा तथा माता सेवा नृत्य (7) देवार नृत्य (8) गेड़ी नृत्य (9) सरहुल नृत्य (10) झूमर नृत्य (11) गवर नृत्य (12) नाचा (13) डोमकच नृत्य (14) डिड़वा नृत्य (15) रहस नृत्य (16) बार नाच (17) होलेडाँड़ नृत्य (18) दहिकाँदो नृत्य (19) वसुदेव व किसबिन नाच (20) राउत नाच
राउत नाच-
अब वांछित लेख 'राउत नाचÓ का विवरण इस प्रकार है- राउत नाच छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख नाच है। इस नाच को राउत जाति के लोग बड़े उत्साह के साथ नाचते हैं। यह नृत्य कार्तिक एकादशी से प्रारंभ हो जाता है। इस नृत्य को प्रारंभ करने से पूर्व राउत जाति के बालक युवक व प्रौढ़ विभिन्न प्रकार के आकर्षक पोषाक धारण करते हंै। साज सज्जा के लिए पीले रंग का रामरज फूलों अथवा कागज के फूलों की माला सिर पर लपेटते हंै।
आँखों में रंगीन चश्मा, घुटनों तक मोजा, पैरों में जूते चुस्त धोती बाँधे व चुस्त कमीज व जाकेट पहन कर वे साक्षात वीर रस के अवतार प्रतीत होते हैं। हाथों में सुशोभित लाठी व दूसरे हाथ में ढाल बाँधे हुए अपने परंपरागत आन-बान शान का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ये अपने हाथ में लाठी लिए हुए वादक गण को घेरकर नृत्य करते हैं। नृत्य करते हुए ये घर-घर जाते हैं और नृत्य के बदले गृह स्वामी से धन-वस्त्र आदि प्राप्त करते हैं। राउत नाच के पूर्णता विभिन्न सोपानों को पार करने पर ही प्राप्त है, वे सोपान इस प्रकार है-
1. अखरा-
अखरा शब्द हिन्दी के 'अखाड़ाÓ शब्द का अप्रभंश है। शौर्य और श्रृंगार के संगम राउत नाच की शुरुआत अखरा से की जाती है। राउत नाच में राऊतों को घंटों नाचना व शस्त्र संचालन करना पड़ता है। अखरा में वे बारंबार अभ्यास कर नृत्य कुशलता व देर तक नाचने की शक्ति प्राप्त करते हैं। अखरा, ग्राम के बाहर दइहान पर प्रतिस्थापित किया जाता है। कार्तिक एकादशी के समय इसे गोबर से लीप कर आम पत्तों के तोरण आदि से सजाया जाता है चारों कोने में पत्थर गड़ा कर देवताओं की स्थापना प्रतीक रुप में करते हैं। देव स्थापना के बाद नृत्य अभ्यास प्रारंभ हो जाता है।
 (2) देवाला -
राउत अपने निवास स्थान में एक पूजा कक्ष विशेष रूप से रखता है इसे ही देवाला कहते हैं। देवाला में मिट्टी से गोल या चौकोर आकृति का छोटा चबूतरा बना कर इसमें दूल्हादेव की स्थापना करके कुछ गोलाकार या त्रिशंकु पत्थर स्थापित कर दिये जाते हैं। देवाला में ही विभिन्न प्रकार के अस्त्र शस्त्र रखकर उनको नित्य पूजा की जाती हैं।
(3) काछन-
राउत देवालय में पूजा करने के पश्चात अस्त्र से सुसज्जित होकर एक विशेष भाव में भावाविभूत होकर बाहर आंगन में आता है। उस समय उसके शरीर में इष्ट देव आवाहित होकर विद्यमान रहते हैं, परिणामत: वह रोमांच से परिपूर्ण होता है इसी भाव को 'काछनÓ कहते हैं। काछन प्रत्येक राउत पर नहीं चढ़ता। यह कोमल एवं अत्यधिक भावानुभूति ग्रहण करने वाले राउत पर ही चढ़ता है।
(4) सुहई-
सुहई पलाश के धागे से बना हुआ तीन या पांच तागों से कलात्मक ढंग से गुथी हुई माला होती है। कार्तिक एकादशी के दिन चन्द्रोदय होते ही राउत अपने मालिकों एवं किसानों के घर जाता है और दुधारु गायों के गले में सुहई पहनाता है और आशीर्वचन के रूप में यह दोहा कहता है-
चार महीना चरायेंव खायेंव मही के मोहरा
आइस मोर दिन देवारी, छोड़ेंव तोर निहोरा।
(5) सुखधना-
सुहई बाँधने की प्रक्रिया के बाद राउत गृहस्वामी के अन्नागार (धान की कोठी) में सुखधना देने पहुंचता है। सुखधना का अर्थ है कि सुख समृद्धि, अन्न धन देने वाला। राउत एक थाली में सेम पत्ती चांवल, चंदन दीपबाती फूल और सुगंधित धूप लेकर कोठी के पास पहुंचता है और धनदेवी का चित्र बनाकर पूजा करता है। तत्पश्चात यह दोहा कहता है।
    अंगना लीपे चक चंदन-हरियर गोबर भीने।
    गाय-गाय तोर सार भरे बढ़हर है सै तीनों।
(6) राउत नाच एवं आशीष-
राउत दल सुसज्जित हो एक स्थान पर एकत्र होते हैं। तत्पश्चात घुंघरु की सुमधुर ध्वनि की झंकार गड़वा बाजे के गुदगुदरुम का मादक स्वर और दोहा पारने की वीरोन्मत शैली का प्रदर्शन करते हुए गलियों को निनादित करते हुए अपने मालिक के यहां पहुंचते हैं। मालिक के घर के सामने पहुंचते ही संबंधित राउत अपने आगमन की सूचना दोहा पार कर देता है-
ऐसन झन जानबे मालिक कि अहिरा दौड़ आये हो
बरीक दिन के पावन मं मुख दरसन बर आये हो।
वे स्वामी के आँगन में नृत्य प्रस्तुत करते है और नृत्य समाप्ति के पश्चात गृहस्वामी अपने आर्थिक स्तर के अनुरुप अन्न-वस्त्र एवं मुद्रा प्रदान करता है। इस समय आशीर्वाद स्वरुप राउत अपनी भावाभिव्यक्ति प्रगट करता है-
जइसे मालिक लिहे-दिहे तइसे देबो असीस।
अन्न धन ले घर भरै-जीओ लाख बरीस।।
(7) मड़ई- राउत नाच के अवसर पर स्थापित की जाने वाली मड़ई का बहुत महत्व है। यह राउत नाच का प्रमुख अंग है। इसलिए मड़ई राउत नाच का पर्याय बन गया है। मड़ई का अर्थ मंडप होता है।
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पवित्र कार्य पर मण्डप का उपयोग होता है। राउत नाच श्रीकृष्ण की स्मृति में किया जाने वाला नृत्य है। मड़ई, शाल्मली, बांस जैसे वृक्षों से बना 10-15 फुट का स्तंभ होता है। इसे रंग बिरंगी फूलों व कागजों से सजाया जाता है। इसके शीर्ष पर मयूर पंख व पलाश बाँधकर उसके साथ श्रीकृष्ण का चित्र नारियल व पूजा का सामान लटका देते है। मड़ई का निर्माण निषाद या गोंड़ जाति के लोग करते हैं तथा बनाने वाला ही मड़ई को लेकर दल के साथ चलता है। एक मड़ई के निमंत्रण पर अन्य मड़ईयां अपने दल के साथ पहुंच जाते हैैं। दल के सभी सदस्य नृत्य करते हुए इस मड़ई की परिक्रमा करते हंै। विभिन्न दलों के आ जाने से मेला सा लग जाता है इसलिए इस आयोजन को मड़ई मेला भी कहा जाता है।
(8) बाजार परिभ्रमण- बाजार परिभ्रमण राउत नाच का अंतिम सोपान है। इसे बाजार बिहाना भी कहते हैं। स्थानीय साप्ताहिक बाजार के दिन को ध्यान में रखकर ही मड़ई मेला आरंभ होता है। राउत नाच के विभिन्न दलों में प्रतिस्पर्धा होती है। उक्त क्रमबद्ध प्रक्रिया का परम्परागत रूप से आज भी पालन किया जाता है।
राउत नाच में लोक गीतों का संसार
राउत अपने उत्सव कार्तिक अमावस्या से मड़ई समाप्ति तक निरंतर दोहे कहते जाते हैं। इन दोहों में गंभीरता, कथा, जन जीवन अपने व्यवसाय से संबंधित वस्तुओं का वर्णनात्मक चित्रण व्यक्त करता है। छोटे-छोटे दोहों में बड़ी से बड़ी बात कह दी जाती है।
राउत दोहों में प्रमुखत: पर्व उत्सव से संबंधित जातिगत कार्य से संबंधित कवियों से संबंधित मौलिक एवं पारम्परिक दोहे, आधुनिकता से संबंधित दोहे आते है। इनका संक्षेप में क्रमानुसार उल्लेख इस प्रकार है-
पर्व उत्सव से संबंधित दोहे-
कृष्ण बाजत आवय बाँसुरी उड़ावत आवय धूल
नाचत आवय कन्हाई खोंचे कमल के फूल
लागत महीना भादों के आठे दिन बुधवार हो
रुप गुन महि आगर ले के मथुरा अवतार हो।
जातिगत कार्य से संंबंधित दोहे
तोर मां चदन रुख वजोर माढ़े दइहान हो
डारा-डारा माँ पंडरा बछुरा पाल्हा बगरगय गाय हो।
खाय दूध धौरी के बइहां रखे भोगाय
चार कोरी तोर सेना बर राउत बइहां देहय उड़ाय।
संत कवि से संबधित दोहे
चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीर
तुलसीदास चंदन घिसै तिलक देय रघुवीर।
मौलिक एवं पारम्परिक दोहे
बरीख दिन के पावन मां संगी मुख दर्शन बर आये हो
ऐसन देवारी नाचे संगी जीव रहे कि जाय हो।
सदा भवानी दाहिनी सम्मुख रहे गनेश
पांच देव रक्षा करें ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
5 आधुनिकता से संबंधित दोहे
सतयुग त्रेतायुग द्वापर बीतगे धरती घलो बुढ़ागे
देवता धामी मन पथरा लहुटगे, नीति धर्म गंवागे।
पंच परमेश्वर बनिन अन्यायी मचगे हा हा कारगा
जनता मन अनजान बनिन अठ नेता मन बटमारगा।
6. विविध दोहे
चिरई मां सुंदर पतरेंगवा सांप सुघर मनिहार
रानी मां सुघर कनिका मोहत हे संसार।
संगत करले साधु के भोजन करले खीर
बनारस मां बासा कर ले मरना गंगा तीर।
राउत नाच ऐसा नृत्य हैं जिसमें श्रृंगार रस और वीर रस का अद्भुत संगम है। अपनी विशेषता और आयोजन की विशालता के कारण राउत नाच ने छत्तीसगढ़ के लोक नृत्यों में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है। छत्तीसगढ़ में राउत नाच जितने उल्लास और व्यापकता के साथ प्रदर्शित होता है उतना भारत वर्ष ही क्या पूरे विश्व में शायद ही कोई लोक नृत्य प्रदर्शित होता हो।
इस राउत नाच में निहित मनोरंजन, शिक्षा, विकास एवं सभ्यता की झलक स्पष्ट रूप से दर्शकों को आनंदित व लाभान्वित करती है। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इस लोक नृत्य ने अपनी विशिष्टता के कारण लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। लोगों का यह आकर्षण छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति के प्रति अनुराग को प्रदर्शित करता हैं जो कि राष्ट्रोत्थान का एक शुभ चिह्न है।
 
 

मेरी दृष्टि में यदुवंशियों का इतिहास

यादव यह शब्द यदु से उत्पन्न हुआ है। गांवों में यादवों को अधिकतर 'राउत के नाम से पुकारा जाता है। गांवों में अधिकतर राउत निर्धन पाये जाते हैं तथा उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय होती है। इसका मुख्य कारण उनका शिक्षित न होना। शिक्षित न होने की वजह से वे अपने अधिकारों को समझ नहीं पाते हैं।
यादव तथा अहीर क्षत्रीय वर्ण के अंतर्गत आते हैं। महाभारत कालीन में यादव अत्यंत समृद्धशाली ही नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी पर उनका शासन था। यादव कुल के पूर्वज श्री कृष्ण है। इन्होंने गीता में उपदेश दिया है। इन्होंने गीता में मुक्ति के लिए देवी संपदा तथा बंधन के लिए बाँसुरी संपदा की बात कही है। भगवान श्रीकृष्ण के अनेक रुप हैं । वे गोपी, ग्वाल, बालसखा आदि भी हैं।
इनकी एक मुख्य विशेषता यह थी कि वे घर-घर जाकर माखन चुराते तथा खाते  थे। यादव क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुआ है। राजा सुबल की गंधारी नामक कन्या एवं पुत्र शकुनि आदि दस पुत्र थे।
कैकरा- एक राजा थे तथा कुन्ती बहन श्रुति कीर्ति से इनका विवाह हुआ।
शाक्य लिच्छयि- ये क्षत्रिय थे तथा इनका प्रसिद्ध गणराज्य था। इसके शासन काल में सबसे शक्तिशाली राज्य गंगा की घाटी में कोशल, माधव, मगध और वत्स।
बिंबसार- यह मगध का राजा था। इन्होंने अंग राज्य को जीत लिया था।
अजातशत्रु- बिम्बसार के पुत्र थे तथा इन्होंने भी अपने पिता के साम्राज्य को आगे बढ़ाने की अत्यंत कोशिश की।
नंद- चौथी सदी में मगध पर राजा नंद का शासन था वह भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था।
चाणक्य- यह एक ब्राह्मणमंत्री थे। आगे चलकर ये कौटिल्य के नाम से जाने गये।
चंद्रगुप्त- चाणक्य के शिष्य तथा इन्होंने अपनी सेना का संगठन किया।
चालुक्य- इसका केन्द्र वातापी में थे। यहां चालुक्य पुलकेशन द्वितीय का शासन था। उसकी महत्वाकांक्षा समूचे दक्षिण भारत पर शासन करने की थी।
राष्ट्रकुल तथा पल्लव- चालुक्य राजा के दो शत्रु थे राष्ट्रकुल तथा पल्लव । राष्ट्रकुल का शासन उत्तरी दक्षिणी भारत के एक छोटे से राज्य पर था।
हमारे छत्तीसगढ़ गांवों में तथा शहर दोनों में अगर कोई एक व्यक्ति तरक्की कर ले तो उसके मन में अन्य यादवों (व्यक्तियों) के प्रति घृणा की भावना आ जाती है। जबकि उसे भाई चारे की भावना रखना चाहिये तथा यदि वह उच्च पदों पर नियुक्त हो तो यादव कुल को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करना चाहिये।
मैं तो कहती हूं कि छत्तीसगढ़ ही खुद अपनी बरबादी, निर्धनता, गरीबी, अशिक्षा आदि का जिम्मेदार है। वे चाहते तो वे भी खुशी एवं कुशल रूप से जीवन यापन कर सकते हैं, वे चाहे तो वे शिक्षित हो सकते हैं तथा शिक्षा के माध्यम से उच्च पदों पर भी नियुक्त हो सकते हैं। मैंने अधिकतर गांवों में यादव का शोषण होते देखा है। गाँवों में राउत का मुख्य काम गाय चराना कृषि कार्य है। मंै यह नहीं कहती की वे ये काम न करें लेकिन मैं यह जरुर कहूंगी कि उन्हें अपने आने वाली पीढ़ी को समृद्धशाली बनाना चाहिए तथा उनकी आने वाली पीढ़ी शिक्षित हो, जागरुक हो।
छत्तीसगढ़ में खासकर गाँवों में राउत को अपने ढंग सुधारना चाहिये तथा गाँव में यदि मुखिया या जागीरदार कोई गलत कदम उठाए तो यादव भाईयों को उनका साथ न देकर उन्हें सही मार्ग पर लाना चाहिये। सभी को आपस में भाई-चारे की भावना रखनी चाहिये सभी कहते हैं कि बड़ी की बातें हमेशा माननी चाहिये तथा उनका आदर सत्कार करना चाहिये लेकिन मेरा कहना है कि कभी-कभी कुछ कार्यों में छोटों की सलाह भी लेना चाहिये। हो सकता है कि कल वही बालक एक भावी नागरिक बनकर उभरे। अगर यादव भाई-बहन लोग इन सब कार्यों का पालन उचित रूप से करे तो मैं ईश्वर से कामना करती हूं कि भविष्य में यादव कुल प्रतिष्ठित हो इस शब्द का तथा इस जाति का अधिकाधिक विकास हो। यदि इन सब बातों का ठीक ढंग से पालन किया गया तो मैं निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि प्राचीन  समय की तरह आज भी यादव पृथ्वी पति तो नहीं किन्तु समृद्धशाली अवश्य ही हो जाएंगे। यादव में खासतौर से यह भावना होनी चाहिये कि वे बहकावे में आकर आपस में न लड़ें बल्कि संकट का मिलजुलकर सामना करना चाहिए।
साभार रउताही 2014
 

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति

छत्तीसगढ़ संस्कृति का विकास अरण्यों-तपोवनों में हुआ है। इसलिये यह ऋषि भूमि है। स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने यहां की संस्कृति को नए आयाम दिये।
आज द्विज तथा अद्विज जातियों का धर्म एक ही है संस्कार एक है, भाव तथा विचार एक है, तथा जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भी एक है। उनका मिश्रण इतनी सघनता से हुआ कि उनके बिलगाव का प्रयत्न कठिन है। अद्विज जातियों ने राजीव लोचन, शिवरीनारायण, सिरपुर, आरंग, खरौद, पाली के भव्य मंदिरों का निर्माण किया।
शैव तथा शाक्त धर्म एवं भक्तिवाद का भी अद्विजों ने विकास किया, जिनमें कबीरपंथ और सतनामी पंथ प्रमुख है। यहां के निर्मल मन जल-छल कपट से दूर हैं। वे परिश्रमी उदारमना और संतोषी स्वभाव के हैं। आदिम जातियों की धर्म-शक्ति उपासना के समीप है। मंत्र शक्ति पर उनका विश्वास है। छत्तीसगढ़ के लोग धर्म के प्रति अडिग एवं अखंडनीय श्रद्धा के अपूरित हैं तो दूसरे धर्मों का समादर करने में उदार हैं।
पर्व और त्यौहार-
छत्तीसगढ़ की प्रमुख जाति हिन्दू है पर अन्य जाति और धर्म के लोग भी निवास करते हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है। इनमें मुसलमान और ईसाई अपेक्षाकृत अधिक हैं। कुल जनसंख्या का करीब 40 प्रतिशत अनुसूचित जाति-जनजाति का है। आध्यात्म की भावना यहां की संस्कृति के कण-कण में है। शिवरात्रि, रामनवमी, श्रावणी, होली, दीवाली हिन्दुओं के प्रमुख पर्व हैं तथा मुसलमानों के ईद, मुहर्रम, रमजान, सम्पूर्ण अंचल में भरने वाले उर्स भावनात्मक एकता की सुगंध बिखेरते हैं। सभी लोग मुक्त भाव से एक-दूसरे के त्यौहार में भाग लेते है। धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता छत्तीसगढ़ की अपनी विशेषता है।
पर्व और त्यौहार एक अंचल तथा जाति का सामूहिक आनन्दोल्लास है जो विशेष अवसरों पर ऋतुओं के परिवर्तन पर खेती के उगने, लहलहाने और पकने पर अभिव्यक्त या प्रदर्शित होते है। इनके पीछे धार्मिक आस्था और विश्वास के रंग भी अभिव्यंजित होते हैं। उक्त अवसरों पर इन्द्रधनुषी भारतीय संस्कृति की छटा भी दिखलाई देती है।
छत्तीसगढ़ के त्यौहारों का अपना बांकपन है। यहां कोई त्यौहार अनाहूत की भांति दबे पांव नहीं आता। सामान्य अतिथि होता है जिसका भावभीना स्वागत होता है। विपन्नता उल्लास में कोई कमी नहीं ला पाती। उसके मनाने की विशिष्ट परिपाटी होती है। खास व्यजन बनते है, नृत्य तथा संगीत प्राण फूंकते हंै।
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का अपना-
छेर-छेरा छत्तीसगढ़ का अपना लोकपर्व है जो पौष पूर्णिमा को मनाया जाता है। धान की फसल पककर झूमने लगती है और अपने श्रम का एवं त्याग को फलीभूत पाकर मद आल्हादित होता है-
पीस कूट के छेरछेरा मनाबो
नाचे ल डंडा घरोघर जाबो।
परस्पर एकता एवं बंधुत्व, औदार्य, त्याग एवं समाजवादी भावना का सन्निवेश- छेरछेरा का मूल प्राण है। नवयुवक इस अवसर पर डंडा नृत्य करते हैं। यह सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता का संदेशवाहक पर्व है।
एक दूसरा पर्व है भोजली । इसमें कुमारी कन्याएं श्रावण में भोजली की साधना करती है, जो श्रावण शुक्ल 9 से नौ दिनों तक चलती है। कषि के प्रतीक पात्रों में टोकनी में अन्न के पौधे उगाकर गंगा से वर्षा की याचना करती हैं।
नवरात्रि में दुर्गा पूजा, कुमारी कन्याओं की संध्या पूजा भी छत्तीसगढ़ी पर्व है। दुर्गापूजा कर जीवन की संधि बेला  में पत्रों से संध्या की उपासना करती हैं।
नदी पूजा, नाग पूजा, वृक्ष पूजा, गो वृषभ पूजा जीवन की सहयोगी सभी को पूज्य ऐसी समन्वय युक्त जीवन दृष्टि का विकास, जिन्होंने किया वे साधारण मानव नहीं थे।
लोकनृत्य-
छत्तीसगढ़ के लोक नृत्यों में राउत नृत्य, डंडा नृत्य, गेंड़ी नृत्य, देवार नृत्य, सुआ नृत्य, गौरा नृत्य, झूमर नृत्य, आंगनई नृत्य, रीना, सरहुल, करमा, पंथी, बार नृत्य, जात्रा नृत्य आदि उल्लेखनीय हैं। इनकी अपनी विशेषताएं है।
राउत नृत्य अहीर लोगों का है तो खानाबदोश देवार जाति का देवार नृत्य। सैला- सरगुजा की उरांव जाति का। राउत राउत नृत्य कार्तिक अमावस्या से प्रारंभ होकर पौष पूर्णिमा तक अनवरत रूप से चलता है। डंडा या सैला-नृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी से फागुन पूर्णिमा तक। गेंड़ी नृत्य हरियाली अमावस्या के दिन तो कार्तिक मास में- सुआ नृत्य। करमा छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक चर्चित नृत्य है जो सरगुजा के उरांव बड़े उल्लास से मनाते हंै, जिसमें स्त्री पुरुष दोनों भाग लेते हंै। सुग्गी नृत्य मात्र स्त्रियों का है और इसी तरह गौरा भी झूमर नृत्य के लिए समय या त्यौहार की आवश्यकता नहीं। सभी जाति की स्त्रियां इसमें भाग लेती है।
गोवर्धन पूजा राउत नाचा का मूल है। यह एक उत्तेजक वीर नृत्य है जिसमें गीत कम व नृत्य अधिक रहता है। लाठी राउत की सज्जा का एक अंग है। लाठी चलाने की कला में  वे बहुत प्रवीण होते हैं-
तेन्दू सार की लाठी, सेर भर घी खाई।
एक लाठी परगे, टें टे नरियाई।।
रावत नाच में अखरा का पूज्य और महत्वपूर्ण स्थान हैं। वह अस्त्र-शस्त्र विद्यार्जन की पाठशाला है।
रावत नाच में नृत्यकों की वेशभूषा देखते ही बनती है। इस अवसर पर वे भड़कीली रेशमी, सूती, मखमली जरी कारीगरी से युक्त कपड़े, धारण करते हैं। पैरों में मोजे, जूते, घुंघरु, बांधे घुटने तक धोती, कमर में करधन गले में तिलरी या पुतरी, मुंह पीले रंग से पुता हुआ, आंखों में चश्मा, सिर पर कागज के फूलों से बना गजरा दाये, में तेंदू की लाठी, बाये हाथ में ढाल सम्हाले, कौडिय़ों की माला गले से कमर तक।
वीर श्रृंगार रस का इसका मूल स्त्रोत है नाचते समय फटी गदका, पठा बनेठी आदि में अपनी निपुणता दिखाते हैं।
उनके नृत्य का लालित्य व पग संचालन उमंग थिरकन सब में एक लय रहती है। नृत्य के समय गाए जाने वाले गीत दोहा या सोरठा होते हैं जिनमें जीवन के विविध पक्ष की झांकी देखने को मिलती है।
पंथी नृत्य सतनामी समाज का श्रम साध्य नृत्य है। निर्गुन भजन या गुरु घासीदास के गुणानुवाद के गीत गाये जाते हैं। पिरामिड बनाने की कलात्मकता इस नृत्य को विलक्षण बना देती है। कंवर जाति का वार नृत्य हर तीसरे वर्ष आयोजित होता है जो निरंतर बारह दिन या 288 घंटे चलता है। अंतिम दिन बांस से बनाई गाड़ी में शराब पिलाये बैलों को फांदकर बैगा को बैठाकर दौड़ाया जाता है।
नर्तकों की नृत्य के समय अपनी वेशभूषा और साज श्रृंगार रहता है। उसके अपने नियम और तरीके रहते हैं और लोक वाद्य भी नगाड़ा-मांदर, ढोलक, तम्बूरा, डफ, चिकारा, ढिसकी, झांझ, सिगी खंजरी बांसुरी, ढेकी, ढोल, तुड़बड़ी आदि लोक वाद्य हैं जिनका समय और आवश्यकतानुसार उपयोग किया जाता है।
यहां का संगीत-नृत्य प्रदान रहस, गीत गम्मत से पुराजोर नाचा तथा हाव भावयुक्त पंडवानी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के उद्योषक हैं। रहस अर्थात रास याने भगवान कृष्ण का विविध लीलाभिनय। पूरी कथा को मामा-भाँजे की कहानी कहा जाता है। इसे कई लीलाओं में विभाजित कर खेला जाता है। अभिनय नृत्य परक होता है। प्रसंगानुसार मूर्तियों का संयोजन किया जाता है जिनकी अधिकतम संख्या 120 रहती है। इन्हें चितेरे बनाते हैं।
नाचा में गीत और गम्मत दो अंग होते है। गीत नृत्य के साथ होता है और गम्मत अभिनय के रूप में। गम्मत का व्यंग्य बेधने वाला होता है।
पंडवानी छत्तीसगढ़ी लोकशैली में महाभारत गायन है और जिसे 'लोक बैलेÓ की संज्ञा दी जा सकती है। यह छत्तीसगढ़ी की अपनी विशेषता है। उत्तर भारत में महाभारत का पाठ स्त्रियों के लिए वर्जित है। वह मात्र द्विजों तक सीमित है। छत्तीसगढ़ में द्विजेतर स्त्रियां तीजनबाई, प्रभाकुमारी यादव, लक्ष्मी बाई सतनामी, रितु वर्मा ने पंडवानी में ख्याति अर्जित की है। तीजनबाई ने विदेशों में इसे प्रतिष्ठापित किया और राष्ट्रपति द्वारा पद्यमश्री से अलंकृत की गई।
छत्तीसगढ़ी-
छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ की लोक बोली है जो करीब एक हजार वर्ष पुरानी है इसकी उत्पत्ति अर्ध मागधी अपभ्रंश से हुई है। अर्ध मागधी तीन बोलियों का समूह है अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। छत्तीसगढ़ी में शौरसेनी की अपेक्षा मागधी की विशेषता प्रमुख है। कालान्तर में छत्तीसगढ़ी, ओडिय़ा और मराठी के प्रभाव में आकर अवधी से दूर होगई और आसपास के परिधान से अलंकृत छत्तीसगढ़ी बन गई। अब इसका मानक रूप बन गया है और इसका अपना व्याकरण है।
छत्तीसगढ़ी एक सरस, प्रवाहमयी और लचीली बोली है और करीब दो करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है।
छत्तीसगढ़ी का लोक साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसका समृद्ध साहित्य लोक गीतों, लोक कथाओं, प्रकीर्ण साहित्य, मुहावरा, कहावत, पहेली आदि से भरा पड़ा है।
देवेन्द्र सत्यार्थी के मत से लोकगीत किसी संस्कृति के मुंह बोलते चित्र होते है। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों का इतिहास चिर प्राचीन हंै। पुरानी पीढ़ी  निरक्षर किन्तु परम्परा के धनी लोगों ने युग युगान्तरों से मौखिक रुप से अधुना युग तक पहुंचा दिया। यह एक बड़ी उपलब्धि है। लोकसाहित्य का एक चिरन्तन स्वरूप हुआ करता है जिसमें मानवीय संवेदना के हर्ष-विषाद का एक व्यवस्थित स्वरूप उत्तरी धु्रव के हिम परतों के समान कालातीत होकर लिपटा हुआ रहता है। लोक साहित्य की विशेष उल्लेखनीय प्रवृत्ति तो यही है कि इसके पावन संगम में मानवीय नैसर्गिक प्रकृति का उन्माद तथा करुणा का अवसाद युगपत से दो समान्तर रेखाओं के समान मिलता है। समीक्षात्मक शिल्प की विधा से भावात्मक अनुभूति की संस्पर्शनीयता और ताल की संगीतात्मकता सरसता की रमणीयता लोकगीत की एक विशिष्ट खूबी है। छत्तीसगढ़ी लोकगीत इन खूबियों से आप्लावित है। इसके सिवाय भी इसकी अन्य विशेषताएं भी दृष्टव्य है। गीतों में संगीतात्मकता सरलता, बोली की मिठास, लघुता, समूहगत सामाजिकता, मानवीय रागों की भावान्विति है।
छत्तीसगढ़ी गीतों में धुनों की विविधता है जो अन्यत्र दुर्लभ है। ताल इसकी लोकप्रियता का कारण है। उदाहरणार्थ- जंवारा गीत पर बजने वाला ताल जवारा पार से गायक या श्रोताओं पर देवी विराजमान हो उठती है।
छत्तीसगढ़ी की शब्दावली वृहद है। आसपास की भाषाओं और बोलियों के शब्दों को अपने में समावेशित कर इसने अपनी सार्वभौमिकता को बढ़ाया है। इसे समझना दुरुह नहीं।
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का चित्रफलक अत्यंत व्यापक है। वह जन्म से लेकर सारे जीवन को परिव्यापत करके चलता है। जनता के जीवन से उसकी एकरसता है। ये लोकगीत प्रकृति के उद्गार हंै। प्रकृति जब तरंग में आती है तब वह गति करती है। संगीत की उत्पत्ति में प्रकृति और मानव की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का बड़ा योगदान है।
नृत्य और संगीत छत्तीसगढ़ी में आदिवासियों का जन्मजात गुण है। संतोषपूर्ण सरल सहज जीवन और चारों और उन्मुक्त नैसर्गिक सौन्दर्य उनको गति प्रदान करता है। उनका लोक संगीत नृत्य को ताल में आत्म विभोर कर देता है। उनका सम्पूर्ण जीवन संगीत में समाहित है। आदिवासी संगीत में सामुदायिक उत्सवों का एक जीवन्त स्वर है। सामूहिक सुख-दुख का दर्पण है। इनका संगीत से ही प्रारंभ होता है और संगीत में समाप्त होता है।
लोक चित्रांकन-
छत्तीसगढ़ी के लोक चित्रांकन का इतिहास आदिम जनजातियों द्वारा चित्रित शैलाश्रयों से प्रारंभ होता है, जिसके साक्षी है रायगढ़ के सिखनपुर और कवरा पहाड़ के बहुसंख्यक चित्र। बाद में सभ्यता के विकास के साथ लोक चित्रांकन भी संस्कृति का अंग बन गया और हमारे मानव जीवन में अब प्रत्येक कर्मकाण्ड में निहित है। संस्कारों में लोक संस्कृति और लोक चित्रांकन का संगन है। ये जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते आए हैं। ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था को, विभिन्न संस्कारों को, लोकाचारी को वह विभिन्न अभिप्रायों से चित्रित करते आ रहा है ।
कोई भी मंगल कार्य हो, उत्सव या पर्व हो स्त्रियां चौक पूरती हंै। कहा जा सकता है कि यह उनकी जन्मजात प्रवृति है। चौक पूरने की कला ग्राफिक डिजाइन के अंतर्गत सम्मिलित की जा  सकती है।
छत्तीसगढ़ में हरियाली अमावस्या को सावन की अगवानी के रूप में सवनाही चित्र बनाये जाते हैं। मान्यता है कि इनके बनाने से घर में खर विकार याने बाधाएं नहीं आती। सवनाही के चित्र किशोरियाँ या महिलाएं गोबर के घोल से उंगुलियों द्वारा बनाती हैं। दीवारों को गोबर की दोहरी रेखाओं से घेर दिया जाता है। फिर मनुष्य अनुष्य आकृतियां, शेर तथा अन्य पशु आकृतियां उकेरी जाती हंै। ये प्रागैतिहासिक चित्रों से साम्य रखती हैं।
दीपावली के समय राउत जाति की स्त्रियां मालिकों के घरों पर ज्यामिती के आधार पर विशेष मांगलिक आकृतियां बनाती हैं। ये प्रकृति जन्य रंगों का उंगुलियों के द्वारा उपयोग करती हैं।
केंवट (निषाद) दीवारों पर रामकृष्ण की लीलाओं पर आधारित चित्रों का निर्कांण करते है। वे देवी मान्यताओं का अपनी दृष्टि से लौकीकरण करते हैं और उन्हें अपने बीच का व्यक्ति ही मानते हैं।
देवउठनी के दिन जब धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी होती है महिलाएं आंगन में छुई से घर में प्रवेश करते हुए देवी लक्ष्मी के पैरों का चित्रांकन करती हैं। बर्तन, सिक्कों से भरा हंडा आदि समृद्धि और सम्पन्नता के सूचक प्रतीक भी बनाये जाते हैं।
जन्माष्टमी के दिन दीवारों पर आठे कन्हैया का चित्र बनाया जाता है जिनमें कृष्ण के आठ जन्मों का चित्रण ज्यामिती पर आधारित होता है। उसके साथ ही सांप, बिच्छू,फूल-पत्ती, गाय की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। यह लोक चित्रांकन का एक अनूठा और अपूर्व उदाहरण है। चित्र सीधे-सादे ढंग से कम से कम रेखाओं में बनाये जाते हैं।
अन्य शिल्प-
मिट्टी के खिलौने और जीवनोपयोगी पात्र, काष्ठ शिल्प, लोह शिल्प, प्रस्तर शिल्प आदि की अपनी विशेषताएं है। छत्तीसगढ़ अपने काँसे के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है। बांस की बनी वस्तुएं भी मनोहारी होती हैं। यहाँ का नादिया बैल लोक शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है। सांमरी जूतों का अपना अलग स्थान है। यहाँ के कोसा के कपड़े सारे देश में प्रसिद्ध है।
राष्ट्रीय पर्वों पर बनने वाली देवी-देवताओं की मूर्तियां-
रहस के आयोजन के समय बनने वाली विशिष्ट विशाल मूर्तियां दर्शनीय होती हंै। रावण की मूर्ति में दस सिर बनाये जाते हैं और विभिन्न मुखों में विभिन्न मुद्राओं को मूत्र्त रूप प्रदान किया जाता है, जो छत्तीसगढ़ी शैली का अद्भुत नमूना है। आरंग के हाथी और डोंगरगढ़ के घोड़े की आकृतियां सहज ही मन मोह लेती है।
धातु शिल्प में सरगुजा की मलार, रायगढ़ की झारा और बस्तर की घड़वा जाति के लोग अपने उत्कृष्ट शिल्प के लिए जाने जाते हैं।
आभूषण शिल्प गजब है। छत्तीसगढ़ में स्त्रियां शताधिक प्रकार के आभूषण करती हैं कुछ आभूषण इस प्रकार है पैरी, गठिया, तोड़ा, घुंघरु, चुटकी, बिंदिया, सांटी, झांझर, लच्छा, नथ बेसर, लौंग फूली, खिनवा, झुमका, बाली, तरकी, बहुटा, बाजूबंद, पहुंची, सूता, हमेल, ढुलरी, तितरी, कौड़ी, मोती और मूंगे की मालाएं, परकोटा, मुंदरी करधनी इत्यादि गुदना उनका स्थायी आभूषण है जो मरने पर भी उनके साथ जाता है। स्त्रियां आभूषण प्रिय है उनमे सौंदर्य बोध है।
प्रकृति प्रेम, कठोर श्रम, अबाध, आनंद छत्तीसगढ़ का जीवन इन्हीं तीन तत्वों से ओतप्रोत है। सादगी ऋतुजा और धर्मभीरुता का पुट वैशिष्टय का परिपाक करता है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति बहुआयामी है कहां तक उसकी विशेषताओं को कहा जाये।
साभार रउताही 2014
 

Friday, 17 October 2014

रावत नाच महोत्सव छात्रवृत्ति हेतु छात्रों का चयन

बिलासपुर। रावत नाच महोत्सव समिति द्वारा आगामी 15 नवम्बर  2014 को रावत नाच महोत्सव के अवसर पर इस वर्ष कुल 24 छात्र-छात्राओं को 70 हजार रुपये की राशि छात्रवृत्ति स्वरुप प्रदान की जाएगी। डॉ. आर.जी. यादव की अध्यक्षता में गठित समिति द्वारा अंतिम तिथि 31 अगस्त 2014 तक प्राप्त आवेदन पत्रों में से सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले निम्नलिखित छात्र-छात्राओं का चयन छात्रवृत्ति हेतु किया गया है।
सामान्य यादव परिवार वर्ग से चयनित छात्र-छात्राएं- हायर सेकेण्डरी छात्र, अमन यादव पिता स्व. श्री विनोद यादव ऊर्जा पार्क राजकिशोर नगर बिलासपुर, छात्रा कु. चंचल यादव पिता श्री शंकर यादव कुदुदण्ड, हाईस्कूल- अभिषेक सिंह यादव पिता तेरस राम यादव नूतन चौक सरकंडा बिलासपुर, चकोरी यादव पिता कृष्ण कुमार यादव चोरहा देवरी लखराम, पूर्व माध्यमिक अभिषेक यादव पिता शत्रुहन सिंह यादव ऊर्जा पार्क के पास राजकिशोर नगर बिलासपुर, कुमारी रश्मि यादव पिता श्री राजेश यादव कस्तूरबा  नगर, प्राथमिक प्रमाण पत्र निखिल यादव पिता राजेन्द्र यादव टिकारीपारा तखतपुर, कुमारी आस्था यादव पिता केशव यादव मंगला, रावतनाच गोल दल से सम्बद्ध परिवार हायर सेकेण्डरी, राहुल यादव पिता स्व. श्री विनोद यादव, कुंदरापारा तिफरा, कुमारी दुर्गेश्वरी यादव पिता श्री खेदूराम यादव टिकरापारा बिलासपुर, हाईस्कूल प्रमाण पत्र अविनाश यादव पिता श्री लक्ष्मी प्रसाद यादव, परसदा-भरनी, संदीप यादव पिता रज्जू यादव सेंवार, सृष्टि यादव पिता बहोरन यादव कुदुदण्ड, ममता यादव पिता जीवराखन यादव टिकरापारा, पूर्व माध्यमिक देवकुमार यादव मोहितराम यादव बिजराडीह भाठापारा, माधव यादव पिता शिवकुमार यादव शांतिनगर ठेठाडबरी, दीपांजलि यादव पिता बसंतराम यादव मोपका, त्रिपती यादव पिता श्री सहसराम यादव, प्राथमिक प्रमाण पत्र, प्रेमसागर यादव पिता श्री प्रहलाद यादव बसिया, हिमांशु यादव पिता कमलेश यादव बसिया, तरुण यादव पिता शिवकुमार यादव शांतिनगर ठेठाडबरी बिलासपुर, कुमारी शारदा यादव पिता रामेश्वर यादव बसिया, कुमारी अंजू यादव पिता श्री बऊवा यादव शांतिनगर दिव्या यादव पिता राजकमल यादव बसिया बिलासपुर इन्हें कक्षावार क्रमश: 5000, 3000, 2000, 2000 रुपये की राशि  छात्रवृत्ति के रुप में नकद एवं प्रमाण पत्र के साथ सम्मानित किया जावेगा। इस तरह लगभग 70,000 रुपये प्रदान की जायेगी। डॉ. आर.जी. यादव, डॉ. कालीचरण यादव, आर.एन. यादव, माखनलाल यादव, विजय यादव, मनीराम यादव, संतोष यादव, उमेश यादव एवं रामकुमार यादव छात्रवृत्ति परीक्षण समिति की बैठक में उपस्थित थे।